प्रभास खण्ड · अध्याय 410
कनखलतीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.410.1)
पुलस्त्य उवाच ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् तस्मिन्कनखलंनाम पर्वते पापनाशने
pulastya uvāca tato gacchennṛpaśreṣṭha tīrthaṁ trailokyaviśrutam tasminkanakhalaṁnāma parvate pāpanāśane
पुलस्त्य जी ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ, तदनन्तर त्रैलोक्य में विख्यात उस तीर्थ में जाना चाहिए, जो उस पापनाशक पर्वत पर कनखल नामक स्थान में है।
श्लोक 2 (skanda.7.410.2)
शृणु तत्राऽभवत्पूर्वं यदाश्चर्यं महीपते पार्थिवः सुमतिर्नाम संप्राप्तोऽर्बुदपर्वते
śṛṇu tatrā'bhavatpūrvaṁ yadāścaryaṁ mahīpate pārthivaḥ sumatirnāma saṁprāpto'rbudaparvate
हे महीपते, सुनो, वहाँ पूर्वकाल में जो आश्चर्य हुआ था — सुमति नामक एक राजा अर्बुद पर्वत पर पहुँचा।
श्लोक 3 (skanda.7.410.3)
सूर्यग्रहे महीपाल तीर्थं कनखलं गतः तेन विप्रार्थमानीतं सुवर्णं जात्यमेव हि
sūryagrahe mahīpāla tīrthaṁ kanakhalaṁ gataḥ tena viprārthamānītaṁ suvarṇaṁ jātyameva hi
हे महीपाल, सूर्यग्रहण के अवसर पर वह कनखल तीर्थ को गया; उसने ब्राह्मणों के लिए उत्तम जाति का शुद्ध स्वर्ण लाया था।
श्लोक 4 (skanda.7.410.4)
प्रभूतं पतितं तोये प्रमादात्तस्य भूपतेः न लब्धं तेन भूपाल अन्वेषणपरेण च
prabhūtaṁ patitaṁ toye pramādāttasya bhūpateḥ na labdhaṁ tena bhūpāla anveṣaṇapareṇa ca
हे भूपते, उस राजा की असावधानी से वह बहुत-सा स्वर्ण जल में गिर पड़ा, और हे भूपाल, ढूँढ़ने पर भी उसे वह प्राप्त नहीं हुआ।
श्लोक 5 (skanda.7.410.5)
ततः स्नात्वा गृहं प्राप्तः पश्चात्तापसमन्वितः ततः कालेन महता स भूयस्तत्र चागतः
tataḥ snātvā gṛhaṁ prāptaḥ paścāttāpasamanvitaḥ tataḥ kālena mahatā sa bhūyastatra cāgataḥ
तब स्नान करके पश्चाताप से युक्त होकर वह घर लौट आया। फिर बहुत समय बीत जाने पर वह पुनः वहाँ आया।
श्लोक 6 (skanda.7.410.6)
स्नानार्थं भास्करे ग्रस्ते तं च देशमपश्यत चिंतयामास मेधावी ह्यस्मिन्देशे तदा मम
snānārthaṁ bhāskare graste taṁ ca deśamapaśyata ciṁtayāmāsa medhāvī hyasmindeśe tadā mama
सूर्यग्रहण होने पर स्नान के लिए उसने उस स्थान को देखा, और बुद्धिमान् उस राजा ने सोचा — यहीं मेरे हाथ से
श्लोक 7 (skanda.7.410.7)
सुवर्णं पतितं हस्तान्न च लब्धं कथंचन
suvarṇaṁ patitaṁ hastānna ca labdhaṁ kathaṁcana
स्वर्ण गिर गया था और वह किसी भी प्रकार प्राप्त नहीं हुआ।
श्लोक 8 (skanda.7.410.8)
पुलस्त्य उवाच एवं चिंतयतस्तस्य वागुवाचाशरीरिणी नात्र नाशोऽस्ति राजेन्द्र इह लोके परत्र च
pulastya uvāca evaṁ ciṁtayatastasya vāguvācāśarīriṇī nātra nāśo'sti rājendra iha loke paratra ca
पुलस्त्य जी ने कहा — इस प्रकार सोचते हुए उससे एक अशरीरी वाणी बोली — हे राजेन्द्र, यहाँ इस लोक और परलोक में कोई नाश नहीं है।
श्लोक 9 (skanda.7.410.9)
अत्र कोटिगुणं जातं सुवर्णं यत्पुरातनम् पश्चात्तापस्त्वया भूरि कृतो यद्द्रव्यनाशने
atra koṭiguṇaṁ jātaṁ suvarṇaṁ yatpurātanam paścāttāpastvayā bhūri kṛto yaddravyanāśane
यहाँ वह पुरातन स्वर्ण करोड़गुना हो गया है, क्योंकि द्रव्य-नाश पर तूने बहुत पश्चाताप किया।
श्लोक 10 (skanda.7.410.10)
तस्मात्संख्या च संजाता तथैवाकल्पितस्य च येऽत्र श्रद्धासमायुक्ताः सुवर्णैर्नृपसत्तम यत्नाच्छ्राद्धं करिष्यंति सुवर्णं च विशेषतः
tasmātsaṁkhyā ca saṁjātā tathaivākalpitasya ca ye'tra śraddhāsamāyuktāḥ suvarṇairnṛpasattama yatnācchrāddhaṁ kariṣyaṁti suvarṇaṁ ca viśeṣataḥ
इसलिए उसकी गणना हो गई है, और साथ ही उस अगणित स्वर्ण की भी। हे नृपसत्तम, जो भी यहाँ श्रद्धायुक्त होकर स्वर्ण से यत्नपूर्वक श्राद्ध करते हैं, और विशेषतः स्वर्ण
श्लोक 11 (skanda.7.410.11)
ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यंति संख्या तस्य न विद्यते अत्रान्वेषय देशे त्वं प्राप्स्यसे नाऽत्र संशयः
brāhmaṇebhyaḥ pradāsyaṁti saṁkhyā tasya na vidyate atrānveṣaya deśe tvaṁ prāpsyase nā'tra saṁśayaḥ
ब्राह्मणों को देते हैं, उनकी संख्या का पता नहीं है। तू इस स्थान में खोज कर, तुझे अवश्य प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 12 (skanda.7.410.12)
स श्रुत्वा भारती तत्र ह्याकाशादुत्थितां नृप अन्वेषमाणोऽस्मिन्देशे सुवर्णं तच्च लब्धवान्
sa śrutvā bhāratī tatra hyākāśādutthitāṁ nṛpa anveṣamāṇo'smindeśe suvarṇaṁ tacca labdhavān
हे राजन्, आकाश से उठी उस दिव्य वाणी को सुनकर, उस स्थान में खोजते हुए उसने वह स्वर्ण प्राप्त कर लिया —
श्लोक 13 (skanda.7.410.13)
शुभ्रं कोटिगुणं प्राज्यं ततस्तुष्टिं समागतः ज्ञात्वा तीर्थप्रभावं तं ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः प्रददौ च दयायुक्त उद्दिश्य पितृदेवताः
śubhraṁ koṭiguṇaṁ prājyaṁ tatastuṣṭiṁ samāgataḥ jñātvā tīrthaprabhāvaṁ taṁ brāhmaṇebhyaḥ sahasraśaḥ pradadau ca dayāyukta uddiśya pitṛdevatāḥ
चमकीला, करोड़गुना, प्रचुर। तब वह संतुष्ट हो गया। तीर्थ का प्रभाव जानकर, दयायुक्त होकर उसने पितृ-देवताओं का उद्देश्य करके वह स्वर्ण सहस्रों ब्राह्मणों को दे दिया।
श्लोक 14 (skanda.7.410.14)
ततस्तस्य प्रभावेण स दानस्य महीपतिः संजातो धनदोनाम यक्षो नानाधनप्रदः
tatastasya prabhāveṇa sa dānasya mahīpatiḥ saṁjāto dhanadonāma yakṣo nānādhanapradaḥ
तब उस दान के प्रभाव से वह राजा धनद नामक यक्ष बन गया, जो नाना प्रकार के धन प्रदान करने वाला है।
श्लोक 15 (skanda.7.410.15)
तत्र यः कुरुते श्राद्धं ग्रहे सूर्यस्य भूमिप आकल्पं पितरस्तस्य तृप्तिं यांति सुतर्पिताः
tatra yaḥ kurute śrāddhaṁ grahe sūryasya bhūmipa ākalpaṁ pitarastasya tṛptiṁ yāṁti sutarpitāḥ
हे भूमिप, जो भी वहाँ सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त सुतृप्त होकर तृप्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 16 (skanda.7.410.16)
स्नानेन ऋषयो देवास्तुष्टिं यांति महोरगाः नाशः संजायते सद्यः पापस्य पृथिवीपते
snānena ṛṣayo devāstuṣṭiṁ yāṁti mahoragāḥ nāśaḥ saṁjāyate sadyaḥ pāpasya pṛthivīpate
स्नान से ऋषि, देवता और महानाग तृप्ति को प्राप्त होते हैं; हे पृथ्वीपते, पाप का नाश तत्क्षण हो जाता है।
श्लोक 17 (skanda.7.410.17)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत् यथाशक्त्या तथा दानं श्राद्धं च नृपसत्तम
tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret yathāśaktyā tathā dānaṁ śrāddhaṁ ca nṛpasattama
इसलिए हे नृपसत्तम, सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिए, तथा यथाशक्ति दान और श्राद्ध करना चाहिए।