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प्रभास खण्ड · अध्याय 48

शुक्र लिंग माहात्म्य वर्णन

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (skanda.7.48.1)

॥ ईश्वर उवाच ॥ ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं शुक्रप्रतिष्ठितम्॥ सर्वपापहरं देवि विभूतीश्वरपश्चिमे

|| īśvara uvāca || tato gacchenmahādevi liṁgaṁ śukrapratiṣṭhitam|| sarvapāpaharaṁ devi vibhūtīśvarapaścime

ईश्वर ने कहा - फिर हे महादेवि! शुक्र द्वारा प्रतिष्ठित, सर्वपापहारी लिंग के पास जाना चाहिए, जो विभूतीश्वर के पश्चिम में स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.48.2)

नातिदूरे स्थितं तत्र स्वयं शुक्रेण निर्मितम्॥ यत्र संजीवनीं प्राप्तो विद्यां रुद्रप्रभावतः

nātidūre sthitaṁ tatra svayaṁ śukreṇa nirmitam|| yatra saṁjīvanīṁ prāpto vidyāṁ rudraprabhāvataḥ

वहाँ अधिक दूर नहीं, स्वयं शुक्र द्वारा निर्मित, जहाँ उन्होंने रुद्र के प्रभाव से संजीवनी विद्या प्राप्त की।

श्लोक 3 (skanda.7.48.3)

संतप्य तु महाघोरं तपोवर्षसहस्रकम् ॥ संप्रसाद्य विरूपाक्षं योऽवाप ग्रहतां सुधीः

saṁtapya tu mahāghoraṁ tapovarṣasahasrakam || saṁprasādya virūpākṣaṁ yo'vāpa grahatāṁ sudhīḥ

महाघोर तपस्या हजार वर्षों तक करके, विरूपाक्ष को प्रसन्न कर, उस सुधी (शुक्र) ने ग्रहत्व प्राप्त किया।

श्लोक 4 (skanda.7.48.4)

ग्रस्तेन शंभुना येन देवकार्यार्थसिद्धये ॥ तत्रोदरगतेनैव तपस्तप्तं सुदुष्करम्

grastena śaṁbhunā yena devakāryārthasiddhaye || tatrodaragatenaiva tapastaptaṁ suduṣkaram

शंभु द्वारा निगले गए उस (शुक्र) ने देवकार्य की सिद्धि के लिए उसी उदर में स्थित होकर अत्यंत दुष्कर तपस्या की।

श्लोक 5 (skanda.7.48.5)

वर्षाणामयुतं साग्रं तुष्टिं नीतो महेश्वरः ॥ निष्कासितस्ततः शीघ्रं शुक्र मार्गेण शंभुना

varṣāṇāmayutaṁ sāgraṁ tuṣṭiṁ nīto maheśvaraḥ || niṣkāsitastataḥ śīghraṁ śukra mārgeṇa śaṁbhunā

दस हजार वर्षों से कुछ अधिक तक तप करके महेश्वर को संतुष्ट किया गया; तब शंभु द्वारा उसे शुक्र-मार्ग से शीघ्र बाहर निकाल दिया गया।

श्लोक 6 (skanda.7.48.6)

ततः शुक्रेति नामाभूद्भार्गवस्य महात्मनः ॥ तदाराधयते लिंगं यः कृत्वा निश्चलं मनः

tataḥ śukreti nāmābhūdbhārgavasya mahātmanaḥ || tadārādhayate liṁgaṁ yaḥ kṛtvā niścalaṁ manaḥ

उसी से उस महात्मा भार्गव का नाम "शुक्र" पड़ा। जो कोई मन को स्थिर करके उस लिंग की आराधना करता है -

श्लोक 7 (skanda.7.48.7)

मृत्युंजयं जपेल्लक्षं स समीहितमाप्नुयात्

mṛtyuṁjayaṁ japellakṣaṁ sa samīhitamāpnuyāt

- तथा मृत्युंजय मंत्र का एक लाख जप करता है, वह अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (skanda.7.48.8)

तं दृष्ट्वा त्वथवा स्पृष्ट्वा जन्मादिमरणान्तकात्॥ मुच्यते पातकान्मृत्योः प्रसादात्तस्य भामिनि

taṁ dṛṣṭvā tvathavā spṛṣṭvā janmādimaraṇāntakāt|| mucyate pātakānmṛtyoḥ prasādāttasya bhāmini

उसका दर्शन अथवा स्पर्श करने से, हे भामिनि! उसकी कृपा से जन्म से लेकर मृत्यु-पर्यंत के पापों से तथा मृत्यु से भी मुक्ति मिलती है।

श्लोक 9 (skanda.7.48.9)

मृतसंजीवनार्थं यदैश्वर्यमणिमादिकम्॥ प्राप्नुयान्नात्र संदेहो यस्य भक्तिः सुनिश्चला

mṛtasaṁjīvanārthaṁ yadaiśvaryamaṇimādikam|| prāpnuyānnātra saṁdeho yasya bhaktiḥ suniścalā

जिसकी भक्ति सुदृढ़ है, वह मृत को जीवित करने की शक्ति तथा अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्त करता है - इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 10 (skanda.7.48.10)

पंचामृतेन संस्नाप्य देवं शुकप्रतिष्ठितम्॥ सुगन्धपुष्पैः संपूज्य शौक्रीं पीडां स नाप्नुयात्

paṁcāmṛtena saṁsnāpya devaṁ śukapratiṣṭhitam|| sugandhapuṣpaiḥ saṁpūjya śaukrīṁ pīḍāṁ sa nāpnuyāt

शुक्र द्वारा प्रतिष्ठित देव को पंचामृत से स्नान कराकर, सुगंधित पुष्पों से पूजा करने वाले को शुक्र-संबंधी पीड़ा नहीं होती।

श्लोक 11 (skanda.7.48.11)

इति सर्वं समासेन माहात्म्यं शुक्रदैवतम् ॥ कथितं तव सुश्रोणि श्रुतं पापभयापहम्

iti sarvaṁ samāsena māhātmyaṁ śukradaivatam || kathitaṁ tava suśroṇi śrutaṁ pāpabhayāpaham

इस प्रकार संक्षेप में शुक्रदेवता संबंधी सम्पूर्ण महिमा तुम्हें बताई गई, हे सुश्रोणि! जिसका श्रवण पापभय को दूर करने वाला है।

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