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प्रभास खण्ड · अध्याय 68

गौरीतपोवनमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (skanda.7.68.1)

ईश्वर उवाच। इति प्रोक्तानि ते देवि वक्त्रलिंगानि पंच वै। अथ ते संप्रवक्ष्यामि यत्र गौर्यास्तपोवनम्। स्थानं महाप्रभावं हि सुरसिद्धनिषेवितम्

īśvara uvāca| iti proktāni te devi vaktraliṅgāni paṁca vai| atha te saṁpravakṣyāmi yatra gauryāstapovanam| sthānaṁ mahāprabhāvaṁ hi surasiddhaniṣevitam

ईश्वर ने कहा—हे देवि, इस प्रकार तुम्हें पाँच मुख-लिंग बताए गए। अब मैं तुम्हें उस स्थान के विषय में बताता हूँ जहाँ गौरी का तपोवन है—देवों और सिद्धों द्वारा सेवित महाप्रभावशाली स्थान।

श्लोक 2 (skanda.7.68.2)

सोमेशात्पूर्वदिग्भागे षष्टिधन्वंतरे स्थितम्। यत्र देव्या तपस्तप्तं सत्या वै पूर्वजन्मनि

someśātpūrvadigbhāge ṣaṣṭidhanvaṁtare sthitam| yatra devyā tapastaptaṁ satyā vai pūrvajanmani

यह सोमेश से पूर्व दिशा में साठ धनुष की दूरी पर स्थित है; जहाँ पूर्वजन्म में सती देवी ने तप किया था।

श्लोक 3 (skanda.7.68.3)

कृत्वा च प्रणयात्कोपं मया सार्द्धं वरानने। प्रभासक्षेत्रमासाद्य संस्थिता सा तपस्विनी

kṛtvā ca praṇayātkopaṁ mayā sārddhaṁ varānane| prabhāsakṣetramāsādya saṁsthitā sā tapasvinī

हे वरानने, मुझसे प्रेमवश क्रोधित होकर वह तपस्विनी प्रभासक्षेत्र में जाकर वहीं स्थिर हो गई।

श्लोक 4 (skanda.7.68.4)

देव्युवाच। किमर्थं सा परित्यज्य सती त्वां तपसि स्थिता। कस्मिन्स्थाने स्थिता देवी एतन्मे विस्तराद्वद

devyuvāca| kimarthaṁ sā parityajya satī tvāṁ tapasi sthitā| kasminsthāne sthitā devī etanme vistarādvada

देवी ने कहा—सती ने किस कारण से तुम्हें त्यागकर तप में स्थित हो गई? वह देवी किस स्थान में स्थित रहीं? मुझे यह विस्तार से बताइए।

श्लोक 5 (skanda.7.68.5)

ईश्वर उवाच। पुरासीस्त्वं महादेवि श्यामवर्णा मनस्विनी। नामार्थं च मया प्रोक्ता कालीति रहसि स्थिता

īśvara uvāca| purāsīstvaṁ mahādevi śyāmavarṇā manasvinī| nāmārthaṁ ca mayā proktā kālīti rahasi sthitā

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, पूर्वकाल में तुम श्यामवर्णा और स्वाभिमानिनी थीं। तुम्हारे नाम के संदर्भ में मैंने एकांत में तुम्हें 'काली' कहकर संबोधित किया था।

श्लोक 6 (skanda.7.68.6)

सा श्रुत्वा विस्मयं वाक्यं भृशं रोषपरायणा। अब्रवीत्परुषं वाक्यं भृकुटीकुटिलानना

sā śrutvā vismayaṁ vākyaṁ bhṛśaṁ roṣaparāyaṇā| abravītparuṣaṁ vākyaṁ bhṛkuṭīkuṭilānanā

यह विस्मयकारी वचन सुनकर वह अत्यंत क्रोधित हो उठी और भौंहें टेढ़ी करके कठोर वचन बोली।

श्लोक 7 (skanda.7.68.7)

यस्मात्कालीत्यहं प्रोक्ता त्वया शंभोऽतिविप्लवात्। तस्माद्यास्यामि गौरीति भविष्यामि च यत्र हि

yasmātkālītyahaṁ proktā tvayā śambho'tiviplavāt| tasmādyāsyāmi gaurīti bhaviṣyāmi ca yatra hi

"हे शंभो, चूँकि तुमने अत्यंत अनुचित रूप से मुझे 'काली' कहा है, इसलिए मैं यहाँ से चली जाऊँगी, और जहाँ भी जाऊँगी, 'गौरी' बन जाऊँगी।"

श्लोक 8 (skanda.7.68.8)

एवमुक्त्वा महाभागा सखीगणसमावृता। गत्वा प्रभासक्षेत्रं सा प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्। गौरीश्वरेति विख्यातं पूजयंती विधानतः

evamuktvā mahābhāgā sakhīgaṇasamāvṛtā| gatvā prabhāsakṣetraṁ sā pratiṣṭhāpya maheśvaram| gaurīśvareti vikhyātaṁ pūjayaṁtī vidhānataḥ

ऐसा कहकर वह महाभागा सखियों के समूह से घिरी हुई प्रभासक्षेत्र में गई, और वहाँ महेश्वर को प्रतिष्ठित करके, गौरीश्वर नाम से विख्यात उस लिंग की विधिपूर्वक पूजा करने लगी।

श्लोक 9 (skanda.7.68.9)

ततो लिंगसमीपस्था एकपादे स्थिता सती। लिंगमाराधयंती सा चकार सुमहत्तपः

tato liṅgasamīpasthā ekapāde sthitā satī| liṅgamārādhayaṁtī sā cakāra sumahattapaḥ

तत्पश्चात् वह सती लिंग के समीप एक पैर पर खड़ी रहकर, लिंग की आराधना करते हुए, अत्यंत महान् तप करने लगी।

श्लोक 10 (skanda.7.68.10)

पंचाग्निसाधिका देवी ग्रीष्मे जाप्यपरायणा। वर्षास्वाकाशशयना हेमंते सलिलाशया

paṁcāgnisādhikā devī grīṣme jāpyaparāyaṇā| varṣāsvākāśaśayanā hemaṁte salilāśayā

वह देवी पंचाग्नि-साधना करने वाली, ग्रीष्म ऋतु में जप में तत्पर, वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे शयन करने वाली, और हेमंत ऋतु में जल में निवास करने वाली थी।

श्लोक 11 (skanda.7.68.11)

यथा यथा तपो वृद्धिं याति तस्या महाप्रभा। तथातथा शरीरस्य गौरत्वं प्रतिपद्यते

yathā yathā tapo vṛddhiṁ yāti tasyā mahāprabhā| tathātathā śarīrasya gauratvaṁ pratipadyate

जैसे-जैसे उसका महान् तप बढ़ता गया, वैसे-वैसे उसके शरीर में गौरत्व (गोरापन) उत्पन्न होता गया।

श्लोक 12 (skanda.7.68.12)

कालेन महता गौरी सर्वांगेणाथ साऽभवत्। ततो विहस्य भगवानुवाच शशिशेखरः

kālena mahatā gaurī sarvāṁgeṇātha sā'bhavat| tato vihasya bhagavānuvāca śaśiśekharaḥ

दीर्घकाल के पश्चात् गौरी अपने संपूर्ण शरीर से गौरवर्णा हो गईं। तब मुस्कुराते हुए शशिशेखर भगवान ने कहा,

श्लोक 13 (skanda.7.68.13)

गौरीति च मुहुर्वाक्यमुत्तिष्ठ व्रज मन्दिरम्। वरं वरय कल्याणि यत्ते मनसि वर्त्तते

gaurīti ca muhurvākyamuttiṣṭha vraja maṁdiram| varaṁ varaya kalyāṇi yatte manasi varttate

"गौरी" यह वचन बार-बार कहते हुए—"उठो, मंदिर को चलो। हे कल्याणि, जो तुम्हारे मन में हो, वह वरदान माँग लो।"

श्लोक 14 (skanda.7.68.14)

गौर्युवाच। यो मामत्र स्थितां पश्येन्नारी वा पुरुषोऽथ वा। स भूयात्सुतसौभाग्यैः सप्तजन्मानि संयुतः

gauryuvāca| yo māmatra sthitāṁ paśyennārī vā puruṣo'tha vā| sa bhūyātsutasaubhāgyaiḥ saptajanmāni saṁyutaḥ

गौरी ने कहा—जो स्त्री अथवा पुरुष यहाँ स्थित मुझे देखेगा, वह सात जन्मों तक पुत्र-सौभाग्य से युक्त होगा।

श्लोक 15 (skanda.7.68.15)

गीतवाद्यादिकं नृत्यं यः कुर्यात्पुरतो मम। तस्यान्वये न दौर्भाग्यं भूयात्तव प्रसादतः

gītavādyādikaṁ nṛtyaṁ yaḥ kuryātpurato mama| tasyānvaye na daurbhāgyaṁ bhūyāttava prasādataḥ

जो मेरे समक्ष गीत, वाद्य आदि सहित नृत्य करेगा, तुम्हारी कृपा से उसके वंश में कभी दुर्भाग्य नहीं होगा।

श्लोक 16 (skanda.7.68.16)

मया प्रतिष्ठितं लिंगं पूर्वमभ्यर्च्य मां ततः। पूजयिष्यति यो भक्त्या स यास्यति परं पदम्

mayā pratiṣṭhitaṁ liṅgaṁ pūrvamabhyarcya māṁ tataḥ| pūjayiṣyati yo bhaktyā sa yāsyati paraṁ padam

जो पहले मेरे द्वारा प्रतिष्ठित लिंग की पूजा करके, फिर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, वह परम पद को प्राप्त होगा।

श्लोक 17 (skanda.7.68.17)

गौरीश्वरेति विख्यातं नाम तस्य भवेत्प्रभो। तथेत्यहं प्रतिज्ञाय तत्र स्थाने स्थितोऽभवम्

gaurīśvareti vikhyātaṁ nāma tasya bhavetprabho| tathetyahaṁ pratijñāya tatra sthāne sthito'bhavam

"हे प्रभो, इसका नाम गौरीश्वर के नाम से विख्यात हो।" "ऐसा ही हो" कहकर प्रतिज्ञा करके मैं वहीं उस स्थान में स्थित हो गया।

श्लोक 18 (skanda.7.68.18)

देव्या सह महादेवि प्रहृष्टेनांतरात्मना। अद्यापि अयने प्राप्ते उत्तरे दक्षिणेऽपि वा

devyā saha mahādevi prahṛṣṭenāṁtarātmanā| adyāpi ayane prāpte uttare dakṣiṇe'pi vā

हे महादेवि, देवी के साथ प्रसन्न अंतःकरण से। आज भी, जब उत्तरायण अथवा दक्षिणायन का संधिकाल आता है,

श्लोक 19 (skanda.7.68.19)

गौरींस्थानं समभ्येति तत्र देव गुणैर्युतः। तस्मिन्नहनि यस्तत्र विशिष्टानि फलानि च। संप्रयच्छति विप्रेभ्यस्तस्य पुत्रा भवंति च

gaurīṁsthānaṁ samabhyeti tatra deva guṇairyutaḥ| tasminnahani yastatra viśiṣṭāni phalāni ca| saṁprayacchati viprebhyastasya putrā bhavaṁti ca

गुणों से युक्त व्यक्ति वहाँ गौरी के स्थान पर पहुँचता है। उस दिन जो वहाँ विशिष्ट फल ब्राह्मणों को अर्पित करता है, उसे पुत्र प्राप्त होते हैं।

श्लोक 20 (skanda.7.68.20)

पुत्रहीना तु या नारी नालिकेरं प्रयच्छति। पुत्रं सा लभते शीघ्रं सबलं लक्षणान्वितम्

putrahīnā tu yā nārī nālikeraṁ prayacchati| putraṁ sā labhate śīghraṁ sabalaṁ lakṣaṇānvitam

जो स्त्री पुत्रहीन हो और नारियल अर्पित करती है, वह शीघ्र ही बलवान और शुभ लक्षणों से युक्त पुत्र प्राप्त करती है।

श्लोक 21 (skanda.7.68.21)

घृतेन दीपकं तत्र या नारी संप्रयच्छति। रक्तवर्त्त्या महादेवि यावत्तस्यैव तंतवः

ghṛtena dīpakaṁ tatra yā nārī saṁprayacchati| raktavarttyā mahādevi yāvattasyaiva taṁtavaḥ

हे महादेवि, जो स्त्री वहाँ घी से और लाल बत्ती से दीपक अर्पित करती है, उस बत्ती में जितने तंतु होते हैं,

श्लोक 22 (skanda.7.68.22)

तावज्जन्मांतराण्येव सा सौभाग्यमवाप्नुयात्

tāvajjanmāṁtarāṇyeva sā saubhāgyamavāpnuyāt

उतने ही जन्मों तक वह सौभाग्य प्राप्त करती है।

श्लोक 23 (skanda.7.68.23)

या नृत्यं कुरुते तत्र भक्त्या परमया युता। आरोग्यसुखसौभाग्यैः संयुक्ता सा भवेच्चिरम्

yā nṛtyaṁ kurute tatra bhaktyā paramayā yutā| ārogyasukhasaubhāgyaiḥ saṁyuktā sā bhavecciram

जो स्त्री परम भक्ति से युक्त होकर वहाँ नृत्य करती है, वह चिरकाल तक आरोग्य, सुख और सौभाग्य से युक्त रहती है।

श्लोक 24 (skanda.7.68.24)

तत्रांते सुमहत्कुडं तीर्थं स्वच्छोदपूरितम्। यः स्नानमाचरेत्तत्र मुच्यते सर्वपातकैः

tatrāṁte sumahatkuḍaṁ tīrthaṁ svacchodapūritam| yaḥ snānamācarettatra mucyate sarvapātakaiḥ

वहाँ समीप में स्वच्छ जल से भरा एक अत्यंत विशाल कुंड-तीर्थ है; जो वहाँ स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.7.68.25)

यः श्राद्धं कुरुते तत्र पितॄनुद्दिश्य भक्तितः। स याति परमं स्थानं पितृभिः सह पुण्यभाक्

yaḥ śrāddhaṁ kurute tatra pitṝnuddiśya bhaktitaḥ| sa yāti paramaṁ sthānaṁ pitṛbhiḥ saha puṇyabhāk

जो वहाँ भक्तिपूर्वक पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करता है, वह पुण्यशाली होकर पितरों सहित परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 26 (skanda.7.68.26)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत्। गीतवाद्यादिभिर्नृत्यै रात्रौ कुर्वीत जागरम्

tasmātsarvaprayatnena śrāddhaṁ tatra samācaret| gītavādyādibhirnṛtyai rātrau kurvīta jāgaram

इसलिए हर प्रकार से प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिए। गीत, वाद्य और नृत्य के साथ रात्रि में जागरण करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.7.68.27)

दंपत्योः परिधानं च तत्र देयं सदक्षिणम्। यश्चैतत्पठते नित्यं तृतीयायां विशेषतः। पार्वत्याः पुरतो देवि स सौभाग्यमवाप्नुयात्

daṁpatyoḥ paridhānaṁ ca tatra deyaṁ sadakṣiṇam| yaścaitatpaṭhate nityaṁ tṛtīyāyāṁ viśeṣataḥ| pārvatyāḥ purato devi sa saubhāgyamavāpnuyāt

वहाँ दक्षिणा सहित दम्पति को वस्त्र देना चाहिए। जो नित्य, विशेषतः तृतीया को, पार्वती के समक्ष इसका पाठ करता है, हे देवि, वह सौभाग्य प्राप्त करता है।

श्लोक 28 (skanda.7.68.28)

शृणुयाद्वाऽपि यो भक्त्या सम्यग्भक्तिपरायणः। सोऽपि सौभाग्यमाप्नोति यावज्जीवं न संशयः

śṛṇuyādvāpi yo bhaktyā samyagbhaktiparāyaṇaḥ| so'pi saubhāgyamāpnoti yāvajjīvaṁ na saṁśayaḥ

और जो भक्तिपूर्वक, सम्यक् भक्ति में तत्पर होकर इसे सुनता है, वह भी जीवनभर निःसंदेह सौभाग्य प्राप्त करता है।

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