श्रीमहादेव उवाच | ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना विधाय रामायणकीर्तिमुत्तमाम् | चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो राजर्षिवर्यैरभिसेवितं यथा ||५-१||
śrī mahādeva uvāca | tato jaganmaṅgala maṅgalātmanā vidhāya rāmāyaṇa kīrtim uttamām | cacāra pūrvācaritaṃ raghūttamo rājarṣivaryair abhisevitaṃ yathā ||5-1||
।।5.1।। श्रीमहादेव ने कहा: तत्पश्चात् जगत् के मंगल स्वरूप रघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम ने रामायण की उत्तम कीर्ति स्थापित करके, अपने पूर्वज राजर्षियों द्वारा सेवित आचरण का अनुसरण किया।
Modern Reflection
राम गीता किसी संकट से नहीं, बल्कि एक विजयी राजा से शुरू होती है। राम ने रावण को हराया, अयोध्या लौटे, सिंहासन ग्रहण किया। फिर भी वे आराम में नहीं बैठे। उन्होंने अपने पूर्वजों की आध्यात्मिक साधना अपनाई। भारत में यह श्लोक उन लोगों से बात करता है जो जीवन के किसी बड़े पड़ाव पर 'पहुँच' चुके हैं: IAS परीक्षा पास करने वाला अधिकारी, सफल exit के बाद उद्यमी, या वह माता-पिता जिनके बच्चे settled हैं। श्लोक का सवाल तीखा है: जब दुनिया की सारी अपेक्षाएँ पूरी हो जाएँ, तो आप अपने आप के साथ क्या करते हैं? राम का उत्तर है कि बिना भीतरी काम के उपलब्धि अधूरी है। महल मंज़िल नहीं है। मन है।