अयोध्याकाण्ड · सर्ग 42
दशरथ का विषाद
श्लोक 1 (ayodhya.42.1)
यावत् तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत। नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत् संजहारात्मचक्षुषी॥ 42.1 ॥
yāvat tu niryatastasya rajorūpamadṛśyata| naivekṣvākuvarastāvat saṃjahārātmacakṣuṣī
जब तक उनके जाने से उठी हुई धूल का रूप दिखाई देता रहा, तब तक इक्ष्वाकुश्रेष्ठ राजा ने अपने नेत्र उससे नहीं हटाए।
श्लोक 2 (ayodhya.42.2)
यावद् राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम्। तावद् व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने॥ 42.2 ॥
yāvad rājā priyaṃ putraṃ paśyatyatyantadhārmikam| tāvad vyavardhatevāsya dharaṇyāṃ putradarśane
जब तक राजा अपने अत्यंत धर्मपरायण और प्रिय पुत्र को देख पा रहे थे, तब तक पृथ्वी पर वह धूल मानो पुत्र-दर्शन के लिए ही बढ़ती जा रही थी।
श्लोक 3 (ayodhya.42.3)
न पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिपः। तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले॥ 42.3 ॥
na paśyati rajo'pyasya yadā rāmasya bhūmipaḥ| tadārtaśca niṣaṇṇaśca papāta dharaṇītale
परंतु जब भूपति दशरथ को राम के रथ की धूल भी दिखाई न पड़ी, तब वे व्यथित और शिथिल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 4 (ayodhya.42.4)
तस्य दक्षिणमन्वागात् कौसल्या बाहुमङ्गना। परं चास्यान्वगात् पार्श्वं कैकेयी सा सुमध्यमा॥ 42.4 ॥
tasya dakṣiṇamanvāgāt kausalyā bāhumaṅganā| paraṃ cāsyānvagāt pārśvaṃ kaikeyī sā sumadhyamā
कौसल्या उनकी दाहिनी भुजा की ओर आईं, और वह क्षीणकटि कैकेयी उनके दूसरे पार्श्व में आ गई।
श्लोक 5 (ayodhya.42.5)
तां नयेन च सम्पन्नो धर्मेण विनयेन च। उवाच राजा कैकेयीं समीक्ष्य व्यथितेन्द्रियः॥ 42.5 ॥
tāṃ nayena ca sampanno dharmeṇa vinayena ca| uvāca rājā kaikeyīṃ samīkṣya vyathitendriyaḥ
नीति, धर्म और विनय से संपन्न राजा ने व्यथित इंद्रियों से कैकेयी की ओर देखकर उनसे इस प्रकार कहा।
श्लोक 6 (ayodhya.42.6)
कैकेयि मामकाङ्गानि मा स्प्राक्षीः पापनिश्चये। नहि त्वां द्रष्टुमिच्छामि न भार्या न च बान्धवी॥ 42.6 ॥
kaikeyi māmakāṅgāni mā sprākṣīḥ pāpaniścaye| nahi tvāṃ draṣṭumicchāmi na bhāryā na ca bāndhavī
"हे कैकेयी! तू मेरे अंगों को मत छू, पापपूर्ण निश्चय वाली! मैं तुझे देखना भी नहीं चाहता — अब न तू मेरी भार्या है, न बांधवी।"
श्लोक 7 (ayodhya.42.7)
ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम। केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम्॥ 42.7 ॥
ye ca tvāmanujīvanti nāhaṃ teṣāṃ na te mama| kevalārthaparāṃ hi tvāṃ tyaktadharmāṃ tyajāmyaham
"जो तुझ पर आश्रित हैं, न मैं उनका हूँ, न वे मेरे हैं। केवल स्वार्थपरायण और धर्म को त्याग चुकी तुझे मैं भी त्याग देता हूँ।"
श्लोक 8 (ayodhya.42.8)
अगृह्णां यच्च ते पाणिमग्निं पर्यणयं च यत्। अनुजानामि तत् सर्वमस्मिंल्लोके परत्र च॥ 42.8 ॥
agṛhṇāṃ yacca te pāṇimagniṃ paryaṇayaṃ ca yat| anujānāmi tat sarvamasmiṃlloke paratra ca
"मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया और अग्नि की परिक्रमा की थी, उस सबका मैं इस लोक और परलोक दोनों में परित्याग करता हूँ।"
श्लोक 9 (ayodhya.42.9)
भरतश्चेत् प्रतीतः स्याद् राज्यं प्राप्यैतदव्ययम्। यन्मे स दद्यात् पित्रर्थं मा मां तद्दत्तमागमत्॥ 42.9 ॥
bharataścet pratītaḥ syād rājyaṃ prāpyaitadavyayam| yanme sa dadyāt pitrarthaṃ mā māṃ taddattamāgamat
"यदि इस अक्षय राज्य को पाकर भरत प्रसन्न होगा, तो पितृ-कार्य के निमित्त वह जो कुछ भी अर्पित करेगा, वह मुझे प्राप्त न हो।"
श्लोक 10 (ayodhya.42.10)
अथ रेणुसमुद्ध्वस्तं समुत्थाप्य नराधिपम्। न्यवर्तत तदा देवी कौसल्या शोककर्शिता॥ 42.10 ॥
atha reṇusamuddhvastaṃ samutthāpya narādhipam| nyavartata tadā devī kausalyā śokakarśitā
तब शोक से क्षीण हुई देवी कौसल्या ने धूल से आवृत हुए उस नरेश को उठाकर वहाँ से लौटा दिया।
श्लोक 11 (ayodhya.42.11)
हत्वेव ब्राह्मणं कामात् स्पृष्ट्वाग्निमिव पाणिना। अन्वतप्यत धर्मात्मा पुत्रं संचिन्त्य राघवम्॥ 42.11 ॥
hatveva brāhmaṇaṃ kāmāt spṛṣṭvāgnimiva pāṇinā| anvatapyata dharmātmā putraṃ saṃcintya rāghavam
वह धर्मात्मा राजा अपने पुत्र राघव का चिंतन करते हुए इस प्रकार संतप्त हो उठे, मानो जान-बूझकर ब्राह्मण की हत्या कर दी हो, या हाथ से अग्नि को छू लिया हो।
श्लोक 12 (ayodhya.42.12)
निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु। राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा॥ 42.12 ॥
nivṛtyaiva nivṛtyaiva sīdato rathavartmasu| rājño nātibabhau rūpaṃ grastasyāṃśumato yathā
बार-बार पीछे मुड़ते हुए, रथ के मार्ग में ही ढहते जा रहे राजा का रूप वैसे ही निस्तेज हो गया, जैसे ग्रहण से ग्रस्त सूर्य का।
श्लोक 13 (ayodhya.42.13)
विललाप स दुःखार्तः प्रियं पुत्रमनुस्मरन्। नगरान्तमनुप्राप्तं बुद्ध्वा पुत्रमथाब्रवीत्॥ 42.13 ॥
vilalāpa sa duḥkhārtaḥ priyaṃ putramanusmaran| nagarāntamanuprāptaṃ buddhvā putramathābravīt
दुःख से पीड़ित होकर वे अपने प्रिय पुत्र का स्मरण करते हुए विलाप करने लगे, और यह जानकर कि पुत्र अब नगर की सीमा तक पहुँच चुका है, उन्होंने यह कहा।
श्लोक 14 (ayodhya.42.14)
वाहनानां च मुख्यानां वहतां तं ममात्मजम्। पदानि पथि दृश्यन्ते स महात्मा न दृश्यते॥ 42.14 ॥
vāhanānāṃ ca mukhyānāṃ vahatāṃ taṃ mamātmajam| padāni pathi dṛśyante sa mahātmā na dṛśyate
"मेरे उस पुत्र को ले जाने वाले उत्तम वाहनों के पदचिह्न तो मार्ग में दिखाई देते हैं, परंतु वह महात्मा स्वयं अब दिखाई नहीं देता।"
श्लोक 15 (ayodhya.42.15)
यः सुखेनोपधानेषु शेते चन्दनरूषितः। वीज्यमानो महार्हाभिः स्त्रीभिर्मम सुतोत्तमः॥ 42.15 ॥
yaḥ sukhenopadhāneṣu śete candanarūṣitaḥ| vījyamāno mahārhābhiḥ strībhirmama sutottamaḥ
"जो मेरा सर्वश्रेष्ठ पुत्र चंदन से अनुलिप्त होकर सुख से मृदु शय्याओं पर लेटता था, और महामूल्य आभूषणों वाली स्त्रियाँ जिस पर पंखा झलती थीं..."
श्लोक 16 (ayodhya.42.16)
स नूनं क्वचिदेवाद्य वृक्षमूलमुपाश्रितः। काष्ठं वा यदि वाश्मानमुपधाय शयिष्यते॥ 42.16 ॥
sa nūnaṃ kvacidevādya vṛkṣamūlamupāśritaḥ| kāṣṭhaṃ vā yadi vāśmānamupadhāya śayiṣyate
"...वही अब आज कहीं किसी वृक्ष के मूल का आश्रय लेकर, काठ या पत्थर को सिरहाना बनाकर सोएगा।"
श्लोक 17 (ayodhya.42.17)
उत्थास्यति च मेदिन्याः कृपणः पांसुगुण्ठितः। विनिःश्वसन् प्रस्रवणात् करेणूनामिवर्षभः॥ 42.17 ॥
utthāsyati ca medinyāḥ kṛpaṇaḥ pāṃsuguṇṭhitaḥ| viniḥśvasan prasravaṇāt kareṇūnāmivarṣabhaḥ
"वह अभागा धूल से लिपटा हुआ पृथ्वी से उठेगा, और गहरी साँस लेता हुआ वैसे ही सिसकेगा जैसे पर्वत की ढाल से उतरता हुआ गजराज सिसकता है।"
श्लोक 18 (ayodhya.42.18)
द्रक्ष्यन्ति नूनं पुरुषा दीर्घबाहुं वनेचराः। राममुत्थाय गच्छन्तं लोकनाथमनाथवत्॥ 42.18 ॥
drakṣyanti nūnaṃ puruṣā dīrghabāhuṃ vanecarāḥ| rāmamutthāya gacchantaṃ lokanāthamanāthavat
"अब वनचारी पुरुष उस दीर्घबाहु लोकनाथ राम को उठकर, मानो अनाथ के समान, विचरते हुए देखेंगे।"
श्लोक 19 (ayodhya.42.19)
सा नूनं जनकस्येष्टा सुता सुखसदोचिता। कण्टकाक्रमणक्लान्ता वनमद्य गमिष्यति॥ 42.19 ॥
sā nūnaṃ janakasyeṣṭā sutā sukhasadocitā| kaṇṭakākramaṇaklāntā vanamadya gamiṣyati
"जनक की वह प्रिय पुत्री, जो सदा सुख की अभ्यस्त थी, आज कांटों पर चलते-चलते थककर वन में जाएगी।"
श्लोक 20 (ayodhya.42.20)
अनभिज्ञा वनानां सा नूनं भयमुपैष्यति। श्वपदानर्दितं श्रुत्वा गम्भीरं रोमहर्षणम्॥ 42.20 ॥
anabhijñā vanānāṃ sā nūnaṃ bhayamupaiṣyati| śvapadānarditaṃ śrutvā gambhīraṃ romaharṣaṇam
"वनों से अनभिज्ञ वह निश्चय ही भयभीत हो उठेगी, हिंसक पशुओं की उस गंभीर और रोमांचकारी दहाड़ को सुनकर।"
श्लोक 21 (ayodhya.42.21)
सकामा भव कैकेयि विधवा राज्यमावस। नहि तं पुरुषव्याघ्रं विना जीवितुमुत्सहे॥ 42.21 ॥
sakāmā bhava kaikeyi vidhavā rājyamāvasa| nahi taṃ puruṣavyāghraṃ vinā jīvitumutsahe
"हे कैकेयी! तेरी कामना पूर्ण हो, तू विधवा होकर इस राज्य में निवास कर। मैं उस पुरुषव्याघ्र राम के बिना जीवित रहने की इच्छा नहीं रखता।"
श्लोक 22 (ayodhya.42.22)
इत्येवं विलपन् राजा जनौघेनाभिसंवृतः। अपस्नात इवारिष्टं प्रविवेश गृहोत्तमम्॥ 42.22 ॥
ityevaṃ vilapan rājā janaughenābhisaṃvṛtaḥ| apasnāta ivāriṣṭaṃ praviveśa gṛhottamam
इस प्रकार विलाप करते हुए राजा, प्रजा-समूह से घिरे हुए, अपने उत्तम भवन में इस प्रकार प्रविष्ट हुए मानो अशौच-स्नान किए हुए व्यक्ति किसी अशुभ गृह में प्रवेश कर रहा हो।
श्लोक 23 (ayodhya.42.23)
शून्यचत्वरवेश्मान्तां संवृतापणवेदिकाम्। क्लान्तदुर्बलदुःखार्तां नात्याकीर्णमहापथाम्॥ 42.23 ॥
śūnyacatvaraveśmāntāṃ saṃvṛtāpaṇavedikām| klāntadurbaladuḥkhārtāṃ nātyākīrṇamahāpathām
उन्होंने देखा उस नगरी को, जिसके चौराहे और घरों के भीतरी भाग सूने पड़े थे, दुकानों के चबूतरे बंद थे, प्रजा थकी, दुर्बल और दुःख से पीड़ित थी, और जिसके राजमार्ग अब पहले जैसी भीड़ से रहित थे।
श्लोक 24 (ayodhya.42.24)
तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन्। विलपन् प्राविशद् राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम्॥ 42.24 ॥
tāmavekṣya purīṃ sarvāṃ rāmamevānucintayan| vilapan prāviśad rājā gṛhaṃ sūrya ivāmbudam
उस समस्त नगरी को इस दशा में देखकर और केवल राम का ही चिंतन करते हुए, विलाप करते हुए राजा अपने भवन में इस प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे सूर्य किसी बादल में प्रवेश करता है।
श्लोक 25 (ayodhya.42.25)
महाह्रदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम्। रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन च॥ 42.25 ॥
mahāhradamivākṣobhyaṃ suparṇena hṛtoragam| rāmeṇa rahitaṃ veśma vaidehyā lakṣmaṇena ca
राम, विदेहकुमारी सीता और लक्ष्मण से रहित वह भवन ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह विशाल सरोवर, जिससे गरुड़ ने सारे नागों का हरण कर लिया हो, अब शांत पड़ गया हो।
श्लोक 26 (ayodhya.42.26)
अथ गद्गदशब्दस्तु विलपन् वसुधाधिपः। उवाच मृदु मन्दार्थं वचनं दीनमस्वरम्॥ 42.26 ॥
atha gadgadaśabdastu vilapan vasudhādhipaḥ| uvāca mṛdu mandārthaṃ vacanaṃ dīnamasvaram
तब वह पृथ्वीपति गद्गद स्वर से विलाप करते हुए, कोमल, अस्पष्टार्थ, दीन और लगभग अश्रव्य वचन बोले।
श्लोक 27 (ayodhya.42.27)
कौसल्याया गृहं शीघ्रं राममातुर्नयन्तु माम्। नह्यन्यत्र ममाश्वासो हृदयस्य भविष्यति॥ 42.27 ॥
kausalyāyā gṛhaṃ śīghraṃ rāmamāturnayantu mām| nahyanyatra mamāśvāso hṛdayasya bhaviṣyati
"मुझे शीघ्र ही राम की माता कौसल्या के गृह में ले चलो; क्योंकि अन्यत्र कहीं भी मेरे हृदय को संतोष नहीं मिलेगा।"
श्लोक 28 (ayodhya.42.28)
इति ब्रुवन्तं राजानमनयन् द्वारदर्शिनः। कौसल्याया गृहं तत्र न्यवेस्यत विनीतवत्॥ 42.28 ॥
iti bruvantaṃ rājānamanayan dvāradarśinaḥ| kausalyāyā gṛhaṃ tatra nyavesyata vinītavat
ऐसा कहते हुए राजा को द्वारपालों ने ले जाकर कौसल्या के भवन में विनयपूर्वक शय्या पर लिटा दिया।
श्लोक 29 (ayodhya.42.29)
ततस्तत्र प्रविष्टस्य कौसल्याया निवेशनम्। अधिरुह्यापि शयनं बभूव लुलितं मनः॥ 42.29 ॥
tatastatra praviṣṭasya kausalyāyā niveśanam| adhiruhyāpi śayanaṃ babhūva lulitaṃ manaḥ
तत्पश्चात् कौसल्या के उस निवास में प्रवेश करके और शय्या पर पहुँचने पर भी उनका मन अत्यंत व्याकुल ही रहा।
श्लोक 30 (ayodhya.42.30)
पुत्रद्वयविहीनं च स्नुषया च विवर्जितम्। अपश्यद् भवनं राजा नष्टचन्द्रमिवाम्बरम्॥ 42.30 ॥
putradvayavihīnaṃ ca snuṣayā ca vivarjitam| apaśyad bhavanaṃ rājā naṣṭacandramivāmbaram
राजा ने उस भवन को अपने दोनों पुत्रों से रहित और पुत्रवधू से भी वंचित इस प्रकार देखा, मानो चंद्रविहीन आकाश हो।
श्लोक 31 (ayodhya.42.31)
तच्च दृष्ट्वा महाराजो भुजमुद्यम्य वीर्यवान्। उच्चैःस्वरेण प्राक्रोशद्धा राम विजहासि नौ॥ 42.31 ॥
tacca dṛṣṭvā mahārājo bhujamudyamya vīryavān| uccaiḥsvareṇa prākrośaddhā rāma vijahāsi nau
यह देखकर वीर्यवान महाराज ने अपनी भुजा उठाकर उच्च स्वर से चिल्लाकर कहा, "हा राम! तूने हम दोनों को त्याग दिया!"
श्लोक 32 (ayodhya.42.32)
सुखिता बत तं कालं जीविष्यन्ति नरोत्तमाः। परिष्वजन्तो ये रामं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्॥ 42.32 ॥
sukhitā bata taṃ kālaṃ jīviṣyanti narottamāḥ| pariṣvajanto ye rāmaṃ drakṣyanti punarāgatam
"धन्य हैं वे श्रेष्ठ पुरुष, जो उस समय तक जीवित रहेंगे जब राम पुनः लौटकर आएँगे, और वे उन्हें आलिंगन में भर सकेंगे!"
श्लोक 33 (ayodhya.42.33)
अथ रात्र्यां प्रपन्नायां कालरात्र्यामिवात्मनः। अर्धरात्रे दशरथः कौसल्यामिदमब्रवीत्॥ 42.33 ॥
atha rātryāṃ prapannāyāṃ kālarātryāmivātmanaḥ| ardharātre daśarathaḥ kausalyāmidamabravīt
तत्पश्चात् जब रात्रि हुई, जो उन्हें अपने लिए मानो कालरात्रि के समान प्रतीत हुई, तब आधी रात को दशरथ ने कौसल्या से यह कहा।
श्लोक 34 (ayodhya.42.34)
न त्वां पश्यामि कौसल्ये साधु मां पाणिना स्पृश। रामं मेऽनुगता दृष्टिरद्यापि न निवर्तते॥ 42.34 ॥
na tvāṃ paśyāmi kausalye sādhu māṃ pāṇinā spṛśa| rāmaṃ me'nugatā dṛṣṭiradyāpi na nivartate
"हे कौसल्या! मुझे तुम दिखाई नहीं दे रही हो; अपने हाथ से मुझे भली-भाँति स्पर्श करो। मेरी दृष्टि राम के पीछे-पीछे चली गई थी, वह अब तक लौटी ही नहीं है।"
श्लोक 35 (ayodhya.42.35)
तं राममेवानुविचिन्तयन्तं समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम्। उपोपविश्याधिकमार्तरूपा विनिश्वसन्तं विललाप कृच्छ्रम्॥ 42.35 ॥
taṃ rāmamevānuvicintayantaṃ samīkṣya devī śayane narendram| upopaviśyādhikamārtarūpā viniśvasantaṃ vilalāpa kṛcchram
राम का ही निरंतर चिंतन करते हुए उस राजा को शय्या पर देखकर, देवी कौसल्या उनके निकट बैठ गईं, और अत्यंत व्यथित मुख वाली वे निःश्वास लेती हुई गहरे कष्ट के साथ विलाप करने लगीं।