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युद्धकाण्ड · सर्ग 30

शार्दूल द्वारा रावण को वानर-सेना का विवरण

सर्ग 29सर्ग-सूचीसर्ग 31

श्लोक 1 (yuddha.30.1)

ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्काधिपतये चराः । सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन् ॥ ६-३०-१ ॥

tatas tam akṣobhyabalaṃ laṅkādhipataye carāḥ | suvele rāghavaṃ śaile niviṣṭaṃ pratyavedayan || 6-30-1 ||

तदनन्तर उन गुप्तचरों ने लंकापति रावण को सूचित किया कि अक्षुब्ध बलशाली राघव सुवेल पर्वत पर डेरा डाले हुए हैं।

श्लोक 2 (yuddha.30.2)

चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम् । जातोद्वेगोऽभवत् किंचिच्छार्दूलं वाक्यमब्रवीत् ॥ ६-३०-२ ॥

cārāṇāṃ rāvaṇaḥ śrutvā prāptaṃ rāmaṃ mahābalam | jātodvego'bhavat kiṃcic chārdūlaṃ vākyam abravīt || 6-30-2 ||

गुप्तचरों से महाबली राम के आ पहुँचने का समाचार सुनकर रावण कुछ उद्विग्न हो उठा और शार्दूल से यह वचन कहा --

श्लोक 3 (yuddha.30.3)

अयथावच्च ते वर्णो दीनश्चासि निशाचर । नासि कच्चिदमित्राणां क्रुद्धानां वशमागतः ॥ ६-३०-३ ॥

ayathāvac ca te varṇo dīnaś cāsi niśācara | nāsi kaccid amitrāṇāṃ kruddhānāṃ vaśam āgataḥ || 6-30-3 ||

"हे निशाचर! तेरा वर्ण स्वाभाविक नहीं है और तू दीन-सा दिख रहा है; क्या तू क्रुद्ध शत्रुओं के वश में तो नहीं पड़ गया था?

श्लोक 4 (yuddha.30.4)

इति तेनानुशिष्टस्तु वाचं मन्दमुदीरयत् । तदा राक्षसशार्दूलं शार्दूलो भयविह्वलः ॥ ६-३०-४ ॥

iti tenānuśiṣṭas tu vācaṃ mandam udīrayat | tadā rākṣasaśārdūlaṃ śārdūlo bhayavihvalaḥ || 6-30-4 ||

इस प्रकार पूछे जाने पर, भय से विह्वल हुआ शार्दूल राक्षसश्रेष्ठ रावण से धीमी वाणी में बोला --

श्लोक 5 (yuddha.30.5)

न ते चारयितुं शक्या राजन् वानरपुङ्गवाः । विक्रान्ता बलवन्तश्च राघवेण च रक्षिताः ॥ ६-३०-५ ॥

na te cārayituṃ śakyā rājan vānarapuṅgavāḥ | vikrāntā balavantaś ca rāghaveṇa ca rakṣitāḥ || 6-30-5 ||

"हे राजन्! वे पराक्रमी, बलवान् और राघव द्वारा रक्षित श्रेष्ठ वानर, गुप्तचरी द्वारा जाने नहीं जा सकते।

श्लोक 6 (yuddha.30.6)

नापि सम्भाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न लभ्यते । सर्वतो रक्ष्यते पन्था वानरैः पर्वतोपमैः ॥ ६-३०-६ ॥

nāpi sambhāṣituṃ śakyāḥ sampraśno'tra na labhyate | sarvato rakṣyate panthā vānaraiḥ parvatopamaiḥ || 6-30-6 ||

उनसे बातचीत भी नहीं की जा सकती, न ही कुछ पूछताछ सम्भव है; सारा मार्ग पर्वत-सदृश वानरों द्वारा चारों ओर से रक्षित है।

श्लोक 7 (yuddha.30.7)

प्रविष्टमात्रे ज्ञातोऽहं बले तस्मिन्नचारिते । बलाद्गृहीतो रक्षोभिर्बहुधास्मि विचारितः ॥ ६-३०-७ ॥

praviṣṭamātre jñāto'haṃ bale tasminn acārite | balād gṛhīto rakṣobhir bahudhāsmi vicāritaḥ || 6-30-7 ||

उस सेना में प्रवेश करते ही, बिना अच्छी तरह देखे-भाले, मैं पहचान लिया गया; बलपूर्वक पकड़ लिया गया और राक्षसों (विभीषण के अनुचरों) ने मुझसे बहुत प्रकार से पूछताछ की।

श्लोक 8 (yuddha.30.8)

जानुभिर्मुष्टिभिर्दन्तैस्तलैश्चाभिहतो भृशम् । परिणीतोऽस्मि हरिभिर्बलवद्भिरमर्षणैः ॥ ६-३०-८ ॥

jānubhir muṣṭibhir dantais talaiś cābhihato bhṛśam | pariṇīto'smi haribhir balavadbhir amarṣaṇaiḥ || 6-30-8 ||

घुटनों, मुक्कों, दाँतों और हथेलियों से मुझे बुरी तरह पीटा गया; बलवान् और क्रोधित वानरों ने मुझे घसीटते हुए घुमाया।

श्लोक 9 (yuddha.30.9)

परिणीय च सर्वत्र नीतोऽहं रामसंसदि । रुधिराधिग्धसर्वाङ्गो विह्वलश्चलितेन्द्रियः ॥ ६-३०-९ ॥

pariṇīya ca sarvatra nīto'haṃ rāmasaṃsadi | rudhirādhigdhasarvāṅgo vihvalaś calitendriyaḥ || 6-30-9 ||

इस प्रकार सब ओर घुमाकर, मुझे राम की सभा में ले जाया गया -- मेरे सम्पूर्ण अंग रक्त से रँगे हुए थे, मैं व्याकुल था, मेरी इन्द्रियाँ विचलित थीं।

श्लोक 10 (yuddha.30.10)

हरिभिर्वध्यमानश्च याचमानः कृताञ्जलिः । राघवेण परित्रातो मा मेति च यदृच्छया ॥ ६-३०-१० ॥

haribhir vadhyamānaś ca yācamānaḥ kṛtāñjaliḥ | rāghaveṇa paritrāto mā meti ca yadṛcchayā || 6-30-10 ||

वानरों द्वारा वध किए जाते हुए, हाथ जोड़कर याचना करते हुए मुझे, राघव ने सौभाग्यवश "मत मारो, मत मारो" कहकर बचा लिया।

श्लोक 11 (yuddha.30.11)

एष शैलैः शिलाभिश्च पूरयित्वा महार्णवम् । द्वारमाश्रित्य लङ्काया रामस्तिष्ठति सायुधः ॥ ६-३०-११ ॥

eṣa śailaiḥ śilābhiś ca pūrayitvā mahārṇavam | dvāram āśritya laṅkāyā rāmas tiṣṭhati sāyudhaḥ || 6-30-11 ||

यह राम, पर्वतों और शिलाओं से महासागर को पाटकर, लंका के द्वार पर अस्त्र-शस्त्र सहित खड़ा है।

श्लोक 12 (yuddha.30.12)

गरुडव्यूहमास्थाय सर्वतो हरिभिर्वृतः । मां विसृज्य महातेजा लङ्कामेवाभिवर्तते ॥ ६-३०-१२ ॥

garuḍavyūham āsthāya sarvato haribhir vṛtaḥ | māṃ visṛjya mahātejā laṅkām evābhivartate || 6-30-12 ||

गरुड़-व्यूह की रचना करके, चारों ओर वानरों से घिरा हुआ, वह महातेजस्वी मुझे छोड़कर अब सीधे लंका की ओर बढ़ रहा है।

श्लोक 13 (yuddha.30.13)

पुरा प्राकारमायाति क्षिप्रमेकतरं कुरु । सीतां वापि प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम् ॥ ६-३०-१३ ॥

purā prākāram āyāti kṣipram ekataraṃ kuru | sītāṃ vāpi prayacchāśu yuddhaṃ vāpi pradīyatām || 6-30-13 ||

इससे पहले कि वह प्राकार तक पहुँचे, शीघ्र एक निश्चय कर लीजिए -- या तो तुरन्त सीता को सौंप दीजिए, या फिर युद्ध ही दे दीजिए।"

श्लोक 14 (yuddha.30.14)

मनसा तत्तदा प्रेक्ष्य तच्छ्रुत्वा राक्षसाधिपः । शार्दूलं सुमहद्वाक्यमथोवाच स रावणः ॥ ६-३०-१४ ॥

manasā tat tadā prekṣya tac chrutvā rākṣasādhipaḥ | śārdūlaṃ sumahad vākyam athovāca sa rāvaṇaḥ || 6-30-14 ||

यह सुनकर और मन में विचार कर, उस राक्षसाधिपति रावण ने शार्दूल से यह महत्त्वपूर्ण वचन कहा --

श्लोक 15 (yuddha.30.15)

यदि मां प्रतियुध्येरन् देवगन्धर्वदानवाः । नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि ॥ ६-३०-१५ ॥

yadi māṃ pratiyudhyeran devagandharvadānavāḥ | naiva sītāṃ pradāsyāmi sarvalokabhayād api || 6-30-15 ||

"चाहे देवता, गन्धर्व और दानव सब मिलकर मुझसे युद्ध करें, तो भी मैं सम्पूर्ण लोकों के भय से भी सीता को नहीं दूँगा।

श्लोक 16 (yuddha.30.16)

एवमुक्त्वा महातेजा रावणः पुनरब्रवीत् । चरिता भवता सेना केऽत्र शूराः प्लवंगमाः ॥ ६-३०-१६ ॥

evam uktvā mahātejā rāvaṇaḥ punar abravīt | caritā bhavatā senā ke'tra śūrāḥ plavaṃgamāḥ || 6-30-16 ||

इस प्रकार कहकर, महातेजस्वी रावण ने फिर पूछा -- "क्या तूने उस सेना का भलीभाँति निरीक्षण किया? उसमें शूरवीर वानर कौन-कौन हैं?

श्लोक 17 (yuddha.30.17)

किंप्रभाः कीदृशाः सौम्य वानरा ये दुरासदाः । कस्य पुत्राश्च पौत्राश्च तत्त्वमाख्याहि राक्षस ॥ ६-३०-१७ ॥

kiṃprabhāḥ kīdṛśāḥ saumya vānarā ye durāsadāḥ | kasya putrāś ca pautrāś ca tattvam ākhyāhi rākṣasa || 6-30-17 ||

हे सौम्य! जो वानर दुर्जेय हैं, उनका तेज कैसा है, वे किस प्रकार के हैं? वे किसके पुत्र और पौत्र हैं -- हे राक्षस, यह यथार्थ बता।"

श्लोक 18 (yuddha.30.18)

तथात्र प्रतिपत्स्यामि ज्ञात्वा तेषां बलाबलम् । अवश्यं खलु संख्यानं कर्तव्यं युद्धमिच्छता ॥ ६-३०-१८ ॥

tathātra pratipatsyāmi jñātvā teṣāṃ balābalam | avaśyaṃ khalu saṃkhyānaṃ kartavyaṃ yuddham icchatā || 6-30-18 ||

"उनके बल और दुर्बलता को जानकर ही मैं इस विषय में निर्णय करूँगा; जो युद्ध की इच्छा रखता है, उसे शत्रु की गणना अवश्य करनी चाहिए।

श्लोक 19 (yuddha.30.19)

अथैवमुक्तः शार्दूलो रावणेनोत्तमश्चरः । इदं वचनमारेभे वक्तुं रावणसंनिधौ ॥ ६-३०-१९ ॥

athaivam uktaḥ śārdūlo rāvaṇenottamaś caraḥ | idaṃ vacanam ārebhe vaktuṃ rāvaṇasaṃnidhau || 6-30-19 ||

इस प्रकार रावण द्वारा पूछे जाने पर, वह उत्तम गुप्तचर शार्दूल रावण के समक्ष यह वचन कहने लगा --

श्लोक 20 (yuddha.30.20)

अथर्क्षरजसः पुत्रो युधि राजन् सुदुर्जयः । गद्गदस्याथ पुत्रोऽत्र जाम्बवानिति विश्रुतः ॥ ६-३०-२० ॥

atharkṣarajasaḥ putro yudhi rājan sudurjayaḥ | gadgadasyātha putro'tra jāmbavān iti viśrutaḥ || 6-30-20 ||

हे राजन्! ऋक्षरजा का पुत्र सुग्रीव युद्ध में अत्यन्त दुर्जेय है। यहाँ गद्गद का पुत्र जाम्बवान् नाम से विख्यात है।

श्लोक 21 (yuddha.30.21)

गद्गदस्यैव पुत्रोऽन्यो गुरुपुत्रः शतक्रतोः । कदनं यस्य पुत्रेण कृतमेकेन रक्षसाम् ॥ ६-३०-२१ ॥

gadgadasyaiva putro'nyo guruputraḥ śatakratoḥ | kadanaṃ yasya putreṇa kṛtam ekena rakṣasām || 6-30-21 ||

गद्गद का ही एक और पुत्र है, तथा इन्द्र के गुरु का पुत्र (केसरी) भी है, जिसके एक ही पुत्र ने राक्षसों का संहार किया।

श्लोक 22 (yuddha.30.22)

सुषेणश्चात्र धर्मात्मा पुत्रो धर्मस्य वीर्यवान् । सौम्यः सोमात्मजश्चात्र राजन् दधिमुखः कपिः ॥ ६-३०-२२ ॥

suṣeṇaś cātra dharmātmā putro dharmasya vīryavān | saumyaḥ somātmajaś cātra rājan dadhimukhaḥ kapiḥ || 6-30-22 ||

यहाँ धर्मात्मा और पराक्रमी सुषेण है, जो धर्मराज (यम) का पुत्र है; और हे राजन्, सौम्य स्वभाव वाला दधिमुख भी है, जो चन्द्रमा का पुत्र है।

श्लोक 23 (yuddha.30.23)

सुमुखो दुर्मुखश्चात्र वेगदर्शी च वानरः । मृत्युर्वानररूपेण नूनं सृष्टः स्वयंभुवा ॥ ६-३०-२३ ॥

sumukho durmukhaś cātra vegadarśī ca vānaraḥ | mṛtyur vānararūpeṇa nūnaṃ sṛṣṭaḥ svayaṃbhuvā || 6-30-23 ||

यहाँ सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी नामक वानर भी हैं; निश्चय ही ये स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा वानर-रूप में रचित साक्षात् मृत्यु हैं।

श्लोक 24 (yuddha.30.24)

पुत्रो हुतवहस्यात्र नीलः सेनापतिः स्वयम् । अनिलस्य तु पुत्रोऽत्र हनूमानिति विश्रुतः ॥ ६-३०-२४ ॥

putro hutavahasyātra nīlaḥ senāpatiḥ svayam | anilasya tu putro'tra hanūmān iti viśrutaḥ || 6-30-24 ||

यहाँ अग्नि का पुत्र नील स्वयं सेनापति है; और यहाँ वायु का पुत्र हनुमान् नाम से विख्यात है।

श्लोक 25 (yuddha.30.25)

नप्ता शक्रस्य दुर्धर्षो बलवानङ्गदो युवा । मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ बलिनावश्विसम्भवौ ॥ ६-३०-२५ ॥

naptā śakrasya durdharṣo balavān aṅgado yuvā | maindaś ca dvividaś cobhau balināv aśvisambhavau || 6-30-25 ||

इन्द्र का दुर्धर्ष और बलवान् पौत्र युवा अंगद है; तथा मैन्द और द्विविद दोनों, दोनों अश्विनीकुमारों से उत्पन्न, बलशाली हैं।

श्लोक 26 (yuddha.30.26)

पुत्रा वैवस्वतस्याथ पञ्च कालान्तकोपमाः । गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ॥ ६-३०-२६ ॥

putrā vaivasvatasyātha pañca kālāntakopamāḥ | gajo gavākṣo gavayaḥ śarabho gandhamādanaḥ || 6-30-26 ||

यमराज के पाँच पुत्र, प्रलयकाल के समान भयंकर -- गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन,

श्लोक 27 (yuddha.30.27)

दश वानरकोट्यश्च शूराणां युद्धकाङ्क्षिणाम् । श्रीमतां देवपुत्राणां शेषं नाख्यातुमुत्सहे ॥ ६-३०-२७ ॥

daśa vānarakoṭyaś ca śūrāṇāṃ yuddhakāṅkṣiṇām | śrīmatāṃ devaputrāṇāṃ śeṣaṃ nākhyātum utsahe || 6-30-27 ||

और युद्ध की कामना करने वाले शूर वानरों की दस करोड़ सेना -- शेष श्रीमान् देवपुत्रों का वर्णन करने का मैं साहस नहीं कर पाता।

श्लोक 28 (yuddha.30.28)

पुत्रो दशरथस्यैष सिंहसंहननो युवा । दूषणो निहतो येन खरश्च त्रिशिरास्तथा ॥ ६-३०-२८ ॥

putro daśarathasyaiṣa siṃhasaṃhanano yuvā | dūṣaṇo nihato yena kharaś ca triśirās tathā || 6-30-28 ||

यह जो सिंह जैसे गठन वाला युवक है, वह दशरथ का पुत्र है, जिसने दूषण, खर और त्रिशिरा को मार गिराया।

श्लोक 29 (yuddha.30.29)

नास्ति रामस्य सदृशे विक्रमे भुवि कश्चन । विराधो निहतो येन कबन्धश्चान्तकोपमः ॥ ६-३०-२९ ॥

nāsti rāmasya sadṛśe vikrame bhuvi kaścana | virādho nihato yena kabandhaś cāntakopamaḥ || 6-30-29 ||

पृथ्वी पर पराक्रम में राम के समान कोई नहीं है, जिसने विराध को और यमराज-सदृश कबन्ध को मार डाला।

श्लोक 30 (yuddha.30.30)

वक्तुं न शक्तो रामस्य गुणान् कश्चिन्नरः क्षितौ । जनस्थानगता येन तावन्तो राक्षसा हताः ॥ ६-३०-३० ॥

vaktuṃ na śakto rāmasya guṇān kaścin naraḥ kṣitau | janasthānagatā yena tāvanto rākṣasā hatāḥ || 6-30-30 ||

पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य राम के गुणों का पूर्ण वर्णन करने में समर्थ नहीं है, जिसने जनस्थान में रहने वाले असंख्य राक्षसों का वध कर डाला।

श्लोक 31 (yuddha.30.31)

लक्ष्मणश्चात्र धर्मात्मा मातंगानामिवर्षभः । यस्य बाणपथं प्राप्य न जीवेदपि वासवः ॥ ६-३०-३१ ॥

lakṣmaṇaś cātra dharmātmā mātaṃgānām ivarṣabhaḥ | yasya bāṇapathaṃ prāpya na jīved api vāsavaḥ || 6-30-31 ||

यहाँ धर्मात्मा लक्ष्मण भी है, जो हाथियों में श्रेष्ठ गजराज के समान है, जिसके बाणों की राह में पड़कर स्वयं इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकता।

श्लोक 32 (yuddha.30.32)

श्वेतो ज्योतिर्मुखश्चात्र भास्करस्यात्मसम्भवौ । वरुणस्याथ पुत्रोऽथ हेमकूटः प्लवंगमः ॥ ६-३०-३२ ॥

śveto jyotirmukhaś cātra bhāskarasyātmasambhavau | varuṇasyātha putro'tha hemakūṭaḥ plavaṃgamaḥ || 6-30-32 ||

यहाँ श्वेत और ज्योतिर्मुख हैं, दोनों सूर्य के पुत्र; और वरुण का पुत्र, वानर हेमकूट भी है।

श्लोक 33 (yuddha.30.33)

विश्वकर्मसुतो वीरो नलः प्लवगसत्तमः । विक्रान्तो वेगवानत्र वसुपुत्रः स दुर्धरः ॥ ६-३०-३३ ॥

viśvakarmasuto vīro nalaḥ plavagasattamaḥ | vikrānto vegavān atra vasuputraḥ sa durdharaḥ || 6-30-33 ||

विश्वकर्मा का पुत्र वीर नल, वानरों में श्रेष्ठ है; और यहाँ वसुओं का पुत्र वह दुर्धर भी है, जो पराक्रमी और वेगवान् है।

श्लोक 34 (yuddha.30.34)

राक्षसानां वरिष्ठश्च तव भ्राता विभीषणः । प्रतिगृह्य पुरीं लङ्कां राघवस्य हिते रतः ॥ ६-३०-३४ ॥

rākṣasānāṃ variṣṭhaś ca tava bhrātā vibhīṣaṇaḥ | pratigṛhya purīṃ laṅkāṃ rāghavasya hite rataḥ || 6-30-34 ||

और राक्षसों में श्रेष्ठ तुम्हारा भाई विभीषण भी वहाँ है, जो लंकापुरी को (राम से भावी उपहार के रूप में) स्वीकार करके राघव के हित में ही रत है।

श्लोक 35 (yuddha.30.35)

इति सर्वं समाख्यातं तवेदं वानरं बलम् । सुवेलेऽधिष्ठितं शैले शेषकार्ये भवान् गतिः ॥ ६-३०-३५ ॥

iti sarvaṃ samākhyātaṃ tavedaṃ vānaraṃ balam | suvele'dhiṣṭhitaṃ śaile śeṣakārye bhavān gatiḥ || 6-30-35 ||

इस प्रकार सुवेल पर्वत पर डेरा डाले हुए इस सम्पूर्ण वानर-सेना का वर्णन मैंने तुम्हें बता दिया। अब जो शेष कार्य है, उसमें आप ही निर्णायक हैं।"

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