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छान्दोग्योपनिषद्

Chāndogyopaniṣad

Chhandogya UpanishadChandogyopanishad

छान्दोग्योपनिषद् सामवेद से संबद्ध, प्रधान उपनिषदों में सबसे प्राचीन और विशालतम में से एक है। आठ प्रपाठकों में यह उद्गीथ तथा ॐकार की उपासना से आरम्भ होकर मधुविद्या, "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" का शाण्डिल्य-उपदेश, पञ्चाग्नि-विद्या और मृत्यु के पश्चात् दो मार्ग, वैश्वानर आत्मा, उद्दालक आरुणि और श्वेतकेतु का प्रसिद्ध संवाद जिसमें नौ बार महावाक्य "तत्त्वमसि" दोहराया जाता है, सनत्कुमार द्वारा नारद को भूमविद्या का उपदेश, और अन्त में हृदय के भीतर का आकाश (दहर) तथा प्रजापति द्वारा इन्द्र को आत्मा का उपदेश — इन सब तक पहुँचता है।

शांतिपाठ (सामवेद)

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

oṃ āpyāyantu mamāṅgāni vākprāṇaścakṣuḥ śrotramatho balamindriyāṇi ca sarvāṇi | sarvaṃ brahmaupaniṣadaṃ māhaṃ brahma nirākuryāṃ mā mā brahma nirākarodanirākaraṇamastvanirākaraṇaṃ me'stu | tadātmani nirate ya upaniṣatsu dharmāste mayi santu te mayi santu | oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

ॐ मेरे अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कान तथा समस्त इन्द्रियाँ और बल पुष्ट हों। यह सब उपनिषदों में वर्णित ब्रह्म है। मैं ब्रह्म का निराकरण (अस्वीकार) न करूँ, ब्रह्म मेरा निराकरण न करे; अनिराकरण हो, मेरे प्रति अनिराकरण रहे। आत्मा में रमे हुए मुझमें उपनिषदों के जो धर्म हैं वे स्थित रहें, वे मुझमें स्थित रहें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।

प्रथम प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ।। १ ।।

omityetadakṣaramudgīthamupāsīta | omiti hyudgāyati tasyopavyākhyānam || 1 ||

उद्गीथ के रूप में इस ओंकार अक्षर की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि उद्गान 'ॐ' से ही आरम्भ होता है। इसी की यहाँ व्याख्या की जाती है।

मंत्र 2

एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या अपो रसः अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ।। २ ।।

eṣāṃ bhūtānāṃ pṛthivī rasaḥ pṛthivyā apo rasaḥ apāmoṣadhayo rasa oṣadhīnāṃ puruṣo rasaḥ puruṣasya vāgraso vāca ṛgrasa ṛcaḥ sāma rasaḥ sāmna udgītho rasaḥ || 2 ||

इन समस्त प्राणियों का रस (सार) पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुरुष है, पुरुष का रस वाणी है, वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है, और साम का रस उद्गीथ है।

मंत्र 3

स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो यदुद्गीथः ।। ३ ।।

sa eṣa rasānāṃ rasatamaḥ paramaḥ parārdhyo'ṣṭamo yadudgīthaḥ || 3 ||

यह उद्गीथ समस्त रसों में रसतम (सर्वश्रेष्ठ रस) है, परम है, सबसे ऊँचे स्थान का अधिकारी है, और (इस क्रम में) आठवाँ है।

मंत्र 4

कतमा कतमर्क्कतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ।। ४ ।।

katamā katamarkkatamatkatamatsāma katamaḥ katama udgītha iti vimṛṣṭaṃ bhavati || 4 ||

कौन-सी है, कौन-सी ऋचा है? कौन-सा, कौन-सा साम है? कौन-सा, कौन-सा उद्गीथ है? — इस प्रकार विचार (जिज्ञासा) किया जाता है।

मंत्र 5

वागेवर्क्प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथस्तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चर्क्च साम च ।। ५ ।।

vāgevarkprāṇaḥ sāmomityetadakṣaramudgīthastadvā etanmithunaṃ yadvākca prāṇaścarkca sāma ca || 5 ||

वाणी ही ऋचा है, प्राण ही साम है, और यह 'ॐ' अक्षर उद्गीथ है। वाणी और प्राण, तथा ऋचा और साम — यह एक युग्म (जोड़ा) है।

मंत्र 6

तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ।। ६ ।।

tadetanmithunamomityetasminnakṣare saṃsṛjyate yadā vai mithunau samāgacchata āpayato vai tāvanyonyasya kāmam || 6 ||

यह युग्म इस 'ॐ' अक्षर में एक साथ मिल जाता है। जब जोड़े के दोनों (सदस्य) एक साथ आते हैं, तब वे परस्पर एक-दूसरे की कामना पूर्ण करते हैं।

मंत्र 7

आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।। ७ ।।

āpayitā ha vai kāmānāṃ bhavati ya etadevaṃ vidvānakṣaramudgīthamupāste || 7 ||

जो इस प्रकार जानकर उद्गीथ रूप इस अक्षर की उपासना करता है, वह (दूसरों की) कामनाओं को पूर्ण करने वाला बन जाता है।

मंत्र 8

तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदाहैषो एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।। ८ ।।

tadvā etadanujñākṣaraṃ yaddhi kiṃcānujānātyomityeva tadāhaiṣo eva samṛddhiryadanujñā samardhayitā ha vai kāmānāṃ bhavati ya etadevaṃ vidvānakṣaramudgīthamupāste || 8 ||

यह अक्षर अनुज्ञा (सहमति) का अक्षर है, क्योंकि जब भी कोई किसी बात की स्वीकृति देता है तो 'ॐ' ही कहता है। और अनुज्ञा ही समृद्धि है। जो इस प्रकार जानकर उद्गीथ रूप इस अक्षर की उपासना करता है, वह कामनाओं को समृद्ध (पूर्ण) करने वाला बन जाता है।

मंत्र 9

तेनेयं त्रयीविद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमितिशंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन ।। ९ ।।

teneyaṃ trayīvidyā vartate omityāśrāvayatyomitiśaṃsatyomityudgāyatyetasyaivākṣarasyāpacityai mahimnā rasena || 9 ||

इसी (ॐ) के द्वारा यह त्रयी-विद्या (ऋक्, यजुः, साम) चलती है — 'ॐ' कहकर आश्रावण किया जाता है, 'ॐ' कहकर शंसन (स्तुति-पाठ) किया जाता है, 'ॐ' कहकर उद्गान किया जाता है — इसी अक्षर के सम्मान में, इसकी महिमा और रस के कारण।

मंत्र 10

तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद । नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ।। १० ।।

tenobhau kuruto yaścaitadevaṃ veda yaśca na veda | nānā tu vidyā cāvidyā ca yadeva vidyayā karoti śraddhayopaniṣadā tadeva vīryavattaraṃ bhavatīti khalvetasyaivākṣarasyopavyākhyānaṃ bhavati || 10 ||

इसके द्वारा दोनों ही कर्म करते हैं — वह भी जो इसे इस प्रकार जानता है और वह भी जो नहीं जानता। परन्तु विद्या और अविद्या भिन्न हैं। जो कर्म विद्या, श्रद्धा और उपनिषद् (रहस्य-ज्ञान) के साथ किया जाता है, वही अधिक वीर्यवान् (प्रभावशाली) होता है। यही इस अक्षर की व्याख्या है।

मंत्र 11

देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ।। १ ।।

devāsurā ha vai yatra saṃyetire ubhaye prājāpatyāstaddha devā udgīthamājahruranenainānabhibhaviṣyāma iti || 1 ||

जब देव और असुर — दोनों ही प्रजापति की सन्तान — परस्पर संघर्ष कर रहे थे, तब देवों ने उद्गीथ को ग्रहण किया, यह सोचकर कि 'इसके द्वारा हम इन (असुरों) को पराजित कर देंगे।'

मंत्र 12

ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ।। २ ।।

te ha nāsikyaṃ prāṇamudgīthamupāsāṃcakrire taṃ hāsurāḥ pāpmanā vividhustasmāttenobhayaṃ jighrati surabhi ca durgandhi ca pāpmanā hyeṣa viddhaḥ || 2 ||

उन्होंने नासिका के प्राण (घ्राण) को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुरों ने उसे पाप से बेध दिया; इसीलिए उससे मनुष्य सुगन्ध और दुर्गन्ध — दोनों सूँघता है, क्योंकि वह पाप से बिंधा हुआ है।

मंत्र 13

अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ।। ३ ।।

atha ha vācamudgīthamupāsāṃcakrire tāṃ hāsurāḥ pāpmanā vividhustasmāttayobhayaṃ vadati satyaṃ cānṛtaṃ ca pāpmanā hyeṣā viddhā || 3 ||

फिर उन्होंने वाणी को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुरों ने उसे पाप से बेध दिया; इसीलिए उससे मनुष्य सत्य और असत्य — दोनों बोलता है, क्योंकि वह पाप से बिंधी हुई है।

मंत्र 14

अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ।। ४ ।।

atha ha cakṣurudgīthamupāsāṃcakrire taddhāsurāḥ pāpmanā vividhustasmāttenobhayaṃ paśyati darśanīyaṃ cādarśanīyaṃ ca pāpmanā hyetadviddham || 4 ||

फिर उन्होंने नेत्र को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुरों ने उसे पाप से बेध दिया; इसीलिए उससे मनुष्य देखने योग्य और न देखने योग्य — दोनों देखता है, क्योंकि वह पाप से बिंधा हुआ है।

मंत्र 15

अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ।। ५ ।।

atha ha śrotramudgīthamupāsāṃcakrire taddhāsurāḥ pāpmanā vividhustasmāttenobhayaṃ śṛṇoti śravaṇīyaṃ cāśravaṇīyaṃ ca pāpmanā hyetadviddham || 5 ||

फिर उन्होंने श्रोत्र (कान) को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुरों ने उसे पाप से बेध दिया; इसीलिए उससे मनुष्य सुनने योग्य और न सुनने योग्य — दोनों सुनता है, क्योंकि वह पाप से बिंधा हुआ है।

मंत्र 16

अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं संकल्पते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ।। ६ ।।

atha ha mana udgīthamupāsāṃcakrire taddhāsurāḥ pāpmanā vividhustasmāttenobhayaṃ saṃkalpate saṃkalpanīyaṃ cāsaṃkalpanīyaṃ ca pāpmanā hyetadviddham || 6 ||

फिर उन्होंने मन को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुरों ने उसे पाप से बेध दिया; इसीलिए उससे मनुष्य संकल्प करने योग्य और न करने योग्य — दोनों प्रकार के संकल्प करता है, क्योंकि वह पाप से बिंधा हुआ है।

मंत्र 17

अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तं हासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ।। ७ ।।

atha ha ya evāyaṃ mukhyaḥ prāṇastamudgīthamupāsāṃcakrire taṃ hāsurā ṛtvā vidadhvaṃsuryathāśmānamākhaṇamṛtvā vidhvaṃsetaivam || 7 ||

फिर उन्होंने इस मुख्य प्राण को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुर उस पर टकराकर वैसे ही नष्ट हो गए, जैसे मिट्टी का ढेला किसी ठोस पत्थर से टकराकर बिखर जाता है।

मंत्र 18

यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसत एवं हैव स विध्वंसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ।। ८ ।।

yathāśmānamākhaṇamṛtvā vidhvaṃsata evaṃ haiva sa vidhvaṃsate ya evaṃvidi pāpaṃ kāmayate yaścainamabhidāsati sa eṣo'śmākhaṇaḥ || 8 ||

जैसे पत्थर से टकराकर मिट्टी का ढेला बिखर जाता है, वैसे ही वह मनुष्य नष्ट हो जाता है जो इस ज्ञानी का अनिष्ट चाहता है अथवा जो इसे कष्ट पहुँचाता है। ऐसा व्यक्ति (पत्थर से टकराने वाला) मिट्टी का ढेला ही है।

मंत्र 19

नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रमति व्याददात्येवान्तत इति ।। ९ ।।

naivaitena surabhi na durgandhi vijānātyapahatapāpmā hyeṣa tena yadaśnāti yatpibati tenetarānprāṇānavati etamu evāntato'vittvotkramati vyādadātyevāntata iti || 9 ||

इस (मुख्य प्राण) के द्वारा न सुगन्ध का ज्ञान होता है, न दुर्गन्ध का, क्योंकि यह पाप से रहित है। इसके द्वारा मनुष्य जो खाता-पीता है, उसी से वह अन्य प्राणों का पोषण करता है। अन्त में इसे न पाकर ही मनुष्य शरीर छोड़ता है; इसीलिए अन्त समय में वह मुख खोल देता है।

मंत्र 20

तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ।। १० ।।

taṃ hāṅgirā udgīthamupāsāñcakra etamu evāṅgirasaṃ manyante'ṅgānāṃ yadrasaḥ || 10 ||

अङ्गिरस् ने इसी को उद्गीथ मानकर उपासना की; इसीलिए इस प्राण को ही 'अङ्गिरस' कहते हैं, क्योंकि यह अङ्गों (इन्द्रियों) का रस (सार) है।

मंत्र 21

तेन तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिः ।। ११ ।।

tena taṃ ha bṛhaspatirudgīthamupāsañcakra etamu eva bṛhaspatiṃ manyante vāgghi bṛhatī tasyā eṣa patiḥ || 11 ||

इसीलिए बृहस्पति ने इसे उद्गीथ मानकर उपासना की; इसीलिए इस प्राण को ही 'बृहस्पति' मानते हैं, क्योंकि वाणी बृहती (महान्) है और यह प्राण उसका पति (स्वामी) है।

मंत्र 22

तेन तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ।। १२ ।।

tena taṃ hāyāsya udgīthamupāsāñcakra etamu evāyāsyaṃ manyanta āsyādyadayate || 12 ||

इसीलिए आयास्य ने इसे उद्गीथ मानकर उपासना की; इसीलिए इस प्राण को ही 'आयास्य' मानते हैं, क्योंकि यह मुख (आस्य) से आता (गति करता) है।

मंत्र 23

तेन तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार । स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ।। १३ ।।

tena taṃ ha bako dālbhyo vidāñcakāra | sa ha naimiśīyānāmudgātā babhūva sa ha smaibhyaḥ kāmānāgāyati || 13 ||

बक दाल्भ्य ने इसे जाना। वह नैमिषीयों (नैमिष-निवासियों) का उद्गाता बना, और वह उनके लिए उनकी कामनाओं का गान (पूर्ति) करता था।

मंत्र 24

आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ।। १४ ।।

āgātā ha vai kāmānāṃ bhavati ya etadevaṃ vidvānakṣaramudgīthamupāsta ityadhyātmam || 14 ||

जो इस प्रकार जानकर उद्गीथ रूप इस अक्षर की उपासना करता है, वह कामनाओं का गान (पूर्ति) करने वाला बन जाता है। यह अध्यात्म (स्वयं के सन्दर्भ में) कथन हुआ।

मंत्र 25

अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति । उद्यंस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ।। १ ।।

athādhidaivataṃ ya evāsau tapati tamudgīthamupāsītodyanvā eṣa prajābhya udgāyati | udyaṃstamo bhayamapahantyapahantā ha vai bhayasya tamaso bhavati ya evaṃ veda || 1 ||

अब अधिदैवत (देवताओं के सन्दर्भ में): जो यह सूर्य तपता है, उसे उद्गीथ मानकर उपासना करनी चाहिए। उदित होता हुआ यह प्रजाओं के लिए उद्गान करता है। उदित होते ही यह अन्धकार और भय को दूर कर देता है। जो ऐसा जानता है, वह भय और अन्धकार का नाश करने वाला बन जाता है।

मंत्र 26

समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ।। २ ।।

samāna u evāyaṃ cāsau coṣṇo'yamuṣṇo'sau svara itīmamācakṣate svara iti pratyāsvara ityamuṃ tasmādvā etamimamamuṃ codgīthamupāsīta || 2 ||

यह (प्राण) और वह (सूर्य) समान हैं — यह भी उष्ण है और वह भी उष्ण। इसको लोग 'स्वर' कहते हैं और उसको 'प्रत्यास्वर' कहते हैं। इसीलिए इस (प्राण) और उस (सूर्य) — दोनों को उद्गीथ मानकर उपासना करनी चाहिए।

मंत्र 27

अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः । अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् । तस्मादप्राणन्ननपानन्वाचमभिव्याहरति ।। ३ ।।

atha khalu vyānamevodgīthamupāsīta yadvai prāṇiti sa prāṇo yadapāniti so'pānaḥ | atha yaḥ prāṇāpānayoḥ sandhiḥ sa vyāno yo vyānaḥ sā vāk | tasmādaprāṇannanapānanvācamabhivyāharati || 3 ||

अब व्यान को ही उद्गीथ मानकर उपासना करनी चाहिए। जो श्वास बाहर निकलती है वह प्राण है, जो भीतर जाती है वह अपान है। प्राण और अपान का जो सन्धि-स्थल है वह व्यान है, और जो व्यान है वही वाणी है। इसीलिए मनुष्य न श्वास बाहर निकालते हुए और न भीतर लेते हुए (अर्थात् श्वास रोककर) वाणी का उच्चारण करता है।

मंत्र 28

या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्ननपानन्नृचमभिव्याहरति यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्ननपानन्साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन्नुद्गायति ।। ४ ।।

yā vāksarktasmādaprāṇannanapānannṛcamabhivyāharati yarktatsāma tasmādaprāṇannanapānansāma gāyati yatsāma sa udgīthastasmādaprāṇannanapānannudgāyati || 4 ||

जो वाणी है वही ऋचा है; इसीलिए मनुष्य श्वास रोककर ऋचा का उच्चारण करता है। जो ऋचा है वही साम है; इसीलिए वह श्वास रोककर साम गाता है। जो साम है वही उद्गीथ है; इसीलिए वह श्वास रोककर उद्गान करता है।

मंत्र 29

अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानंस्तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ।। ५ ।।

ato yānyanyāni vīryavanti karmāṇi yathāgnermanthanamājeḥ saraṇaṃ dṛḍhasya dhanuṣa āyamanamaprāṇannanapānaṃstāni karotyetasya hetorvyānamevodgīthamupāsīta || 5 ||

और जितने भी अन्य बल-साध्य कर्म हैं — जैसे अग्नि मथना, दौड़ में वेग से भागना, कठोर धनुष को खींचना — इन्हें मनुष्य श्वास रोककर ही करता है। इसी कारण व्यान को ही उद्गीथ मानकर उपासना करनी चाहिए।

मंत्र 30

अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितम् ।। ६ ।।

atha khalūdgīthākṣarāṇyupāsītodgītha iti prāṇa evotprāṇena hyuttiṣṭhati vāggīrvāco ha gira ityācakṣate'nnaṃ thamanne hīdaṃ sarvaṃ sthitam || 6 ||

अब 'उद्गीथ' के अक्षरों की उपासना करनी चाहिए। 'उद्' प्राण है, क्योंकि प्राण से ही मनुष्य उठता (उत्थान करता) है। 'गी' वाणी है, क्योंकि वाणी को 'गिर्' कहते हैं। 'थ' अन्न है, क्योंकि इस अन्न पर ही यह सब कुछ टिका हुआ है।

मंत्र 31

द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ।। ७ ।।

dyaurevodantarikṣaṃ gīḥ pṛthivī thamāditya evodvāyurgīragnisthaṃ sāmaveda evodyajurvedo gīrṛgvedasthaṃ dugdhe'smai vāgdohaṃ yo vāco doho'nnavānannādo bhavati ya etānyevaṃ vidvānudgīthākṣarāṇyupāsta udgītha iti || 7 ||

द्युलोक 'उद्' है, अन्तरिक्ष 'गी' है, पृथ्वी 'थ' है। सूर्य 'उद्' है, वायु 'गी' है, अग्नि 'थ' है। सामवेद 'उद्' है, यजुर्वेद 'गी' है, ऋग्वेद 'थ' है। जो इस प्रकार जानकर उद्गीथ के अक्षरों की उपासना करता है, उसके लिए वाणी अपना दोहन (दूध) देती है — वही वाणी का दोह है; वह अन्नवान् और अन्न का भोक्ता बन जाता है।

मंत्र 32

अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ।। ८ ।।

atha khalvāśīḥsamṛddhirupasaraṇānītyupāsīta yena sāmnā stoṣyansyāttatsāmopadhāvet || 8 ||

अब मनोकामनाओं की सिद्धि को 'उपसरण' (आश्रय-साधन) मानकर उपासना करनी चाहिए। जिस साम से स्तुति करने वाला हो, उसी साम का आश्रय (ध्यान) करना चाहिए।

मंत्र 33

यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ।। ९ ।।

yasyāmṛci tāmṛcaṃ yadārṣeyaṃ tamṛṣiṃ yāṃ devatāmabhiṣṭoṣyansyāttāṃ devatāmupadhāvet || 9 ||

वह साम जिस ऋचा में है, उस ऋचा का; जिस ऋषि (आर्षेय) से सम्बन्धित है उस ऋषि का; और जिस देवता की स्तुति करने वाला हो उस देवता का आश्रय (ध्यान) करना चाहिए।

मंत्र 34

येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तं स्तोममुपधावेत् ।। १० ।।

yena cchandasā stoṣyansyāttacchanda upadhāvedyena stomena stoṣyamāṇaḥ syāttaṃ stomamupadhāvet || 10 ||

जिस छन्द से स्तुति करने वाला हो उस छन्द का, और जिस स्तोम से स्तुति करने वाला हो उस स्तोम का आश्रय (ध्यान) करना चाहिए।

मंत्र 35

यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ।। ११ ।।

yāṃ diśamabhiṣṭoṣyansyāttāṃ diśamupadhāvet || 11 ||

जिस दिशा की ओर मुख करके स्तुति करने वाला हो, उसी दिशा का आश्रय (ध्यान) करना चाहिए।

मंत्र 36

आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ।। १२ ।।

ātmānamantata upasṛtya stuvīta kāmaṃ dhyāyannapramatto'bhyāśo ha yadasmai sa kāmaḥ samṛdhyeta yatkāmaḥ stuvīteti yatkāmaḥ stuvīteti || 12 ||

अन्त में अपने आत्मा का आश्रय लेकर, अपनी कामना का सावधानी से ध्यान करते हुए स्तुति करनी चाहिए। जिस कामना से वह स्तुति करता है, वह कामना उसके लिए शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है — हाँ, जिस कामना से वह स्तुति करता है।

मंत्र 37

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ।। १ ।।

omityetadakṣaramudgīthamupāsītomiti hyudgāyati tasyopavyākhyānam || 1 ||

उद्गीथ के रूप में इस ओंकार अक्षर की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि उद्गान 'ॐ' से ही आरम्भ होता है। इसी की यहाँ व्याख्या की जाती है।

मंत्र 38

देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ।। २ ।।

devā vai mṛtyorbibhyatastrayīṃ vidyāṃ prāviśaṃste chandobhiracchādayanyadebhiracchādayaṃstacchandasāṃ chandastvam || 2 ||

देव मृत्यु से भयभीत होकर त्रयी-विद्या (तीनों वेदों) में प्रविष्ट हो गए। उन्होंने अपने आप को छन्दों से ढक लिया। क्योंकि उन्होंने इनसे स्वयं को आच्छादित (ढका) किया, इसीलिए छन्दों का नाम 'छन्दस्' पड़ा।

मंत्र 39

तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु विदित्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ।। ३ ।।

tānu tatra mṛtyuryathā matsyamudake paripaśyedevaṃ paryapaśyadṛci sāmni yajuṣi | te nu viditvordhvā ṛcaḥ sāmno yajuṣaḥ svarameva prāviśan || 3 ||

किन्तु मृत्यु ने उन्हें वहाँ भी देख लिया, जैसे कोई जल में मछली को देख लेता है — ऋचा में, साम में और यजुः में। यह जानकर वे ऋक्, साम और यजुः से ऊपर उठकर स्वर (ॐ) में ही प्रविष्ट हो गए।

मंत्र 40

यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवं सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ।। ४ ।।

yadā vā ṛcamāpnotyomityevātisvaratyevaṃ sāmaivaṃ yajureṣa u svaro yadetadakṣarametadamṛtamabhayaṃ tatpraviśya devā amṛtā abhayā abhavan || 4 ||

जब कोई ऋचा का उच्चारण करता है, तो 'ॐ' कहकर ही उच्च स्वर करता है; इसी प्रकार साम और यजुः के साथ भी। यह स्वर वही 'ॐ' अक्षर है, जो अमृत और अभय है। उसमें प्रवेश करके देव अमर और निर्भय हो गए।

मंत्र 41

स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ।। ५ ।।

sa ya etadevaṃ vidvānakṣaraṃ praṇautyetadevākṣaraṃ svaramamṛtamabhayaṃ praviśati tatpraviśya yadamṛtā devāstadamṛto bhavati || 5 ||

जो इस प्रकार जानकर इस अक्षर (ॐ) का उच्चारण करता है, वह इसी अक्षर में — अमृत और अभय स्वर में — प्रवेश करता है। उसमें प्रवेश करके, जैसे देव अमर हुए, वैसे ही वह भी अमर हो जाता है।

मंत्र 42

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ।। १ ।।

atha khalu ya udgīthaḥ sa praṇavo yaḥ praṇavaḥ sa udgītha ityasau vā āditya udgītha eṣa praṇava omiti hyeṣa svaranneti || 1 ||

अब, जो उद्गीथ है वही प्रणव (ॐ) है, और जो प्रणव है वही उद्गीथ है। वह सूर्य उद्गीथ है, वही प्रणव है, क्योंकि यह 'ॐ' की ध्वनि करता हुआ चलता है।

मंत्र 43

एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ।। २ ।।

etamu evāhamabhyagāsiṣaṃ tasmānmama tvameko'sīti ha kauṣītakiḥ putramuvāca raśmīṃstvaṃ paryāvartayādbahavo vai te bhaviṣyantītyadhidaivatam || 2 ||

'मैंने इसी (सूर्य-प्रणव) का ही गान किया है, इसीलिए तू मेरा एकमात्र (पुत्र) है' — ऐसा कौषीतकि ने अपने पुत्र से कहा। 'तू सूर्य की किरणों का (अनेक रूप में) ध्यान करना, तो तेरे अनेक पुत्र होंगे।' यह अधिदैवत कथन हुआ।

मंत्र 44

अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ।। ३ ।।

athādhyātmaṃ ya evāyaṃ mukhyaḥ prāṇastamudgīthamupāsītomiti hyeṣa svaranneti || 3 ||

अब अध्यात्म (स्वयं के सन्दर्भ में): जो यह मुख्य प्राण है, उसे उद्गीथ मानकर उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह 'ॐ' की ध्वनि करता हुआ चलता है।

मंत्र 45

एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणांस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ।। ४ ।।

etamu evāhamabhyagāsiṣaṃ tasmānmama tvameko'sīti ha kauṣītakiḥ putramuvāca prāṇāṃstvaṃ bhūmānamabhigāyatādbahavo vai me bhaviṣyantīti || 4 ||

'मैंने इसी (प्राण) का ही गान किया है, इसीलिए तू मेरा एकमात्र (पुत्र) है' — ऐसा कौषीतकि ने अपने पुत्र से कहा। 'तू प्राणों का बहुत्व (भूमा) के रूप में गान करना, तो मेरे अनेक (वंशज) होंगे।'

मंत्र 46

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीथमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ।। ५ ।।

atha khalu ya udgīthaḥ sa praṇavo yaḥ praṇavaḥ sa udgītha iti hotṛṣadanāddhaivāpi durudgīthamanusamāharatītyanusamāharatīti || 5 ||

'जो उद्गीथ है वही प्रणव है, और जो प्रणव है वही उद्गीथ है' — यह जानकर होता के आसन से भी (जानकार पुरोहित) बुरी तरह गाए गए उद्गीथ को सुधार देता है — हाँ, सुधार देता है।

मंत्र 47

इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ।। १ ।।

iyamevargagniḥ sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyata iyameva sāgniramastatsāma || 1 ||

यह पृथ्वी ही ऋचा है, अग्नि साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित (आधारित) है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। यह पृथ्वी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 48

अन्तरिक्षमेवर्ग्वायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ।। २ ।।

antarikṣamevargvāyuḥ sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate'ntarikṣameva sā vāyuramastatsāma || 2 ||

अन्तरिक्ष ही ऋचा है, वायु साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। अन्तरिक्ष ही 'सा' है और वायु 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 49

द्यौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ।। ३ ।।

dyaurevargādityaḥ sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate dyaureva sādityo'mastatsāma || 3 ||

द्युलोक ही ऋचा है, सूर्य साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। द्युलोक ही 'सा' है और सूर्य 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 50

नक्षत्राण्येवर्क्चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ।। ४ ।।

nakṣatrāṇyevarkcandramāḥ sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate nakṣatrāṇyeva sā candramā amastatsāma || 4 ||

नक्षत्र ही ऋचा हैं, चन्द्रमा साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। नक्षत्र ही 'सा' हैं और चन्द्रमा 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 51

अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।। ५ ।।

atha yadetadādityasya śuklaṃ bhāḥ saivargatha yannīlaṃ paraḥ kṛṣṇaṃ tatsāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate || 5 ||

अब सूर्य की जो यह श्वेत कान्ति है, वही ऋचा है; और जो अत्यन्त गहरा नीला-श्याम (भाग) है, वह साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है।

मंत्र 52

अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ।। ६ ।।

atha yadevaitadādityasya śuklaṃ bhāḥ saiva sātha yannīlaṃ paraḥ kṛṣṇaṃ tadamastatsāmātha ya eṣo'ntarāditye hiraṇmayaḥ puruṣo dṛśyate hiraṇyaśmaśrurhiraṇyakeśa āpraṇakhātsarva eva suvarṇaḥ || 6 ||

सूर्य की यह श्वेत कान्ति ही 'सा' है, और जो गहरा नीला-श्याम है वह 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है। अब जो यह स्वर्णमय पुरुष सूर्य के भीतर दिखाई देता है, जिसकी दाढ़ी स्वर्णमय है, केश स्वर्णमय हैं, जो नखों के अग्रभाग तक सर्वथा स्वर्णमय है —

मंत्र 53

तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ।। ७ ।।

tasya yathā kapyāsaṃ puṇḍarīkamevamakṣiṇī tasyoditi nāma sa eṣa sarvebhyaḥ pāpmabhya udita udeti ha vai sarvebhyaḥ pāpmabhyo ya evaṃ veda || 7 ||

उसके दोनों नेत्र वैसे ही (अरुण) हैं जैसे लाल कमल-पुष्प। उसका नाम 'उत्' है, क्योंकि वह समस्त पापों से ऊपर उठा हुआ है। जो ऐसा जानता है, वह भी समस्त पापों से ऊपर उठ जाता है।

मंत्र 54

तस्यर्क्च साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वेवोद्गातैतस्य हि गाता स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ।। ८ ।।

tasyarkca sāma ca geṣṇau tasmādudgīthastasmāttvevodgātaitasya hi gātā sa eṣa ye cāmuṣmātparāñco lokāsteṣāṃ ceṣṭe devakāmānāṃ cetyadhidaivatam || 8 ||

ऋचा और साम उसके दो पर्व (गान के जोड़) हैं; इसीलिए वह उद्गीथ है, और इसीलिए (गाने वाला) 'उद्गाता' कहलाता है, क्योंकि वह उसी का गायक है। यह पुरुष उन लोकों का स्वामी है जो सूर्य से परे हैं, तथा देवताओं की कामनाओं का भी। यह अधिदैवत कथन हुआ।

मंत्र 55

अथाध्यात्मं वागेवर्क्प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ।। १ ।।

athādhyātmaṃ vāgevarkprāṇaḥ sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate vāgeva sā prāṇo'mastatsāma || 1 ||

अब अध्यात्म (स्वयं के सन्दर्भ में): वाणी ही ऋचा है, प्राण साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। वाणी ही 'सा' है और प्राण 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 56

चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव सात्मामस्तत्साम ।। २ ।।

cakṣurevargātmā sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate cakṣureva sātmāmastatsāma || 2 ||

नेत्र ही ऋचा है, आत्मा (नेत्र में स्थित पुरुष) साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। नेत्र ही 'सा' है और आत्मा 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 57

श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ।। ३ ।।

śrotramevarṅmanaḥ sāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate śrotrameva sā mano'mastatsāma || 3 ||

श्रोत्र (कान) ही ऋचा है, मन साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। श्रोत्र ही 'सा' है और मन 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 58

अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ।। ४ ।।

atha yadetadakṣṇaḥ śuklaṃ bhāḥ saivargatha yannīlaṃ paraḥ kṛṣṇaṃ tatsāma tadetadetasyāmṛcyadhyūḍhaṃ sāma tasmādṛcyadhyūḍhaṃ sāma gīyate atha yadevaitadakṣṇaḥ śuklaṃ bhāḥ saiva sātha yannīlaṃ paraḥ kṛṣṇaṃ tadamastatsāma || 4 ||

अब आँख का जो यह श्वेत भाग है, वही ऋचा है; और जो अत्यन्त गहरा नीला-श्याम भाग है, वह साम है। यह साम इस ऋचा पर अधिष्ठित है; इसीलिए साम को ऋचा पर अधिष्ठित रूप में गाया जाता है। आँख का श्वेत भाग ही 'सा' है, और गहरा नीला-श्याम भाग 'अम' है — इन दोनों से 'साम' बनता है।

मंत्र 59

अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क्तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ।। ५ ।।

atha ya eṣo'ntarakṣiṇi puruṣo dṛśyate saivarktatsāma tadukthaṃ tadyajustadbrahma tasyaitasya tadeva rūpaṃ yadamuṣya rūpaṃ yāvamuṣya geṣṇau tau geṣṇau yannāma tannāma || 5 ||

अब जो यह पुरुष नेत्र के भीतर दिखाई देता है, वही ऋचा है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजुः है, वही ब्रह्म है। इस (नेत्रस्थ पुरुष) का वही रूप है जो उस (सूर्यस्थ पुरुष) का है; जो उसके दो पर्व हैं वही इसके दो पर्व हैं; जो उसका नाम है वही इसका नाम है।

मंत्र 60

स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ।। ६ ।।

sa eṣa ye caitasmādarvāñco lokāsteṣāṃ ceṣṭe manuṣyakāmānāṃ ceti tadya ime vīṇāyāṃ gāyantyetaṃ te gāyanti tasmātte dhanasanayaḥ || 6 ||

यह (नेत्रस्थ पुरुष) उन लोकों का स्वामी है जो इससे इस ओर (नीचे) हैं, तथा मनुष्यों की कामनाओं का भी। इसीलिए जो लोग वीणा पर गाते हैं, वे इसी का गान करते हैं; और इसी कारण वे धन प्राप्त करने वाले होते हैं।

मंत्र 61

अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामांश्च ।। ७ ।।

atha ya etadevaṃ vidvānsāma gāyatyubhau sa gāyati so'munaiva sa eṣa ye cāmuṣmātparāñco lokāstāṃścāpnoti devakāmāṃśca || 7 ||

अब जो इस प्रकार जानकर साम गाता है, वह दोनों (नेत्रस्थ और सूर्यस्थ पुरुष) का गान करता है। उसी के द्वारा वह उन लोकों को प्राप्त करता है जो सूर्य से परे हैं, तथा देवताओं की कामनाओं को भी।

मंत्र 62

अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ।। ८ ।।

athānenaiva ye caitasmādarvāñco lokāstāṃścāpnoti manuṣyakāmāṃśca tasmādu haivaṃvidudgātā brūyāt || 8 ||

और इसी (नेत्रस्थ पुरुष) के द्वारा वह उन लोकों को भी प्राप्त करता है जो इस ओर (नीचे) हैं, तथा मनुष्यों की कामनाओं को भी। इसीलिए इस प्रकार जानने वाले उद्गाता को (यजमान से) पूछना चाहिए —

मंत्र 63

कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ।। ९ ।।

kaṃ te kāmamāgāyānītyeṣa hyeva kāmāgānasyeṣṭe ya evaṃ vidvānsāma gāyati sāma gāyati || 9 ||

'मैं तुम्हारी कौन-सी कामना का गान (पूर्ति के लिए) करूँ?' — क्योंकि वही कामनाओं के गान (पूर्ति) का सामर्थ्य रखता है जो इस प्रकार जानकर साम गाता है — हाँ, जो साम गाता है।

मंत्र 64

त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ।। १ ।।

trayo hodgīthe kuśalā babhūvuḥ śilakaḥ śālāvatyaścaikitāyano dālbhyaḥ pravāhaṇo jaivaliriti te hocurudgīthe vai kuśalāḥ smo hantodgīthe kathāṃ vadāma iti || 1 ||

उद्गीथ में निपुण तीन (विद्वान्) थे — शिलक शालावत्य, चैकितायन दाल्भ्य और प्रवाहण जैवलि। उन्होंने कहा: 'हम उद्गीथ में निपुण हैं। आओ, हम उद्गीथ पर चर्चा करें।'

मंत्र 65

तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति ।। २ ।।

tatheti ha samupaviviśuḥ sa ha pravāhaṇo jaivaliruvāca bhagavantāvagre vadatāṃ brāhmaṇayorvadatorvācaṃ śroṣyāmīti || 2 ||

'ऐसा ही हो,' कहकर वे एक साथ बैठ गए। तब प्रवाहण जैवलि ने कहा: 'आप दोनों पूज्य पहले बोलें; मैं दोनों ब्राह्मणों के वचन सुनूँगा।'

मंत्र 66

स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच ।। ३ ।।

sa ha śilakaḥ śālāvatyaścaikitāyanaṃ dālbhyamuvāca hanta tvā pṛcchānīti pṛccheti hovāca || 3 ||

तब शिलक शालावत्य ने चैकितायन दाल्भ्य से कहा: 'क्या मैं तुमसे प्रश्न करूँ?' 'पूछो,' उसने उत्तर दिया।

मंत्र 67

का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ।। ४ ।।

kā sāmno gatiriti svara iti hovāca svarasya kā gatiriti prāṇa iti hovāca prāṇasya kā gatirityannamiti hovācānnasya kā gatirityāpa iti hovāca || 4 ||

'साम की गति (आधार) क्या है?' 'स्वर,' उसने कहा। 'स्वर की गति क्या है?' 'प्राण,' उसने कहा। 'प्राण की गति क्या है?' 'अन्न,' उसने कहा। 'अन्न की गति क्या है?' 'जल,' उसने कहा।

मंत्र 68

अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गसंस्तावं हि सामेति ।। ५ ।।

apāṃ kā gatirityasau loka iti hovācāmuṣya lokasya kā gatiriti na svargaṃ lokamatinayediti hovāca svargaṃ vayaṃ lokaṃ sāmābhisaṃsthāpayāmaḥ svargasaṃstāvaṃ hi sāmeti || 5 ||

'जल की गति क्या है?' 'वह (स्वर्ग) लोक,' उसने कहा। 'उस लोक की गति क्या है?' 'साम को स्वर्गलोक से परे नहीं ले जाना चाहिए,' उसने कहा। 'हम साम को स्वर्गलोक में ही प्रतिष्ठित करते हैं, क्योंकि साम स्वर्ग की स्तुति (स्तावन) ही है।'

मंत्र 69

तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ।। ६ ।।

taṃ ha śilakaḥ śālāvatyaścaikitāyanaṃ dālbhyamuvācāpratiṣṭhitaṃ vai kila te dālbhya sāma yastvetarhi brūyānmūrdhā te vipatiṣyatīti mūrdhā te vipatediti || 6 ||

तब शिलक शालावत्य ने चैकितायन दाल्भ्य से कहा: 'हे दाल्भ्य, तुम्हारा साम तो निश्चय ही अप्रतिष्ठित (आधारहीन) है। यदि इस समय कोई कहे कि तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा, तो तुम्हारा सिर सचमुच गिर पड़ेगा।'

मंत्र 70

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।। ७ ।।

hantāhametadbhagavato vedānīti viddhīti hovācāmuṣya lokasya kā gatirityayaṃ loka iti hovācāsya lokasya kā gatiriti na pratiṣṭhāṃ lokamatinayediti hovāca pratiṣṭhāṃ vayaṃ lokaṃ sāmābhisaṃsthāpayāmaḥ pratiṣṭhāsaṃstāvaṃ hi sāmeti || 7 ||

'तो मैं यह आपसे सीखूँ।' 'सीख लो,' उसने कहा। 'उस लोक की गति क्या है?' 'यह लोक,' उसने कहा। 'इस लोक की गति क्या है?' 'साम को इस प्रतिष्ठा-लोक से परे नहीं ले जाना चाहिए,' उसने कहा। 'हम साम को इस लोक में प्रतिष्ठा के रूप में स्थापित करते हैं, क्योंकि साम प्रतिष्ठा की स्तुति ही है।'

मंत्र 71

तं ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ।। ८ ।।

taṃ ha pravāhaṇo jaivaliruvācāntavadvai kila te śālāvatya sāma yastvetarhi brūyānmūrdhā te vipatiṣyatīti mūrdhā te vipatediti hantāhametadbhagavato vedānīti viddhīti hovāca || 8 ||

तब प्रवाहण जैवलि ने उससे कहा: 'हे शालावत्य, तुम्हारा साम तो निश्चय ही अन्तवान् (सीमित) है। यदि इस समय कोई कहे कि तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा, तो तुम्हारा सिर सचमुच गिर पड़ेगा।' 'तो मैं यह आपसे सीखूँ।' 'सीख लो,' उसने कहा।

मंत्र 72

अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।। १ ।।

asya lokasya kā gatirityākāśa iti hovāca sarvāṇi ha vā imāni bhūtānyākāśādeva samutpadyanta ākāśaṃ pratyastaṃ yantyākāśo hyevaibhyo jyāyānākāśaḥ parāyaṇam || 1 ||

'इस लोक की गति क्या है?' 'आकाश,' उसने कहा। 'क्योंकि ये समस्त प्राणी आकाश से ही उत्पन्न होते हैं और आकाश में ही लौट जाते हैं। आकाश इन सबसे महान् है; आकाश ही परम आश्रय (परायण) है।'

मंत्र 73

स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ।। २ ।।

sa eṣa parovarīyānudgīthaḥ sa eṣo'nantaḥ parovarīyo hāsya bhavati parovarīyaso ha lokāñjayati ya etadevaṃ vidvānparovarīyāṃsamudgīthamupāste || 2 ||

यह उद्गीथ 'परोवरीयान्' (उत्तरोत्तर श्रेष्ठ) है; यह अनन्त है। जो इस प्रकार जानकर उद्गीथ की परोवरीयान् (सर्वोत्तम) रूप में उपासना करता है, उसका जीवन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है, और वह उत्तरोत्तर श्रेष्ठ लोकों को जीत लेता है।

मंत्र 74

तं हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति ।। ३ ।।

taṃ haitamatidhanvā śaunaka udaraśāṇḍilyāyoktvovāca yāvatta enaṃ prajāyāmudgīthaṃ vediṣyante parovarīyo haibhyastāvadasmiṃlloke jīvanaṃ bhaviṣyati || 3 ||

अतिधन्वा शौनक ने इसे उदरशाण्डिल्य को सिखाकर कहा: 'जब तक तुम्हारी सन्तान इस उद्गीथ को जानती रहेगी, तब तक इस लोक में उनका जीवन औरों से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ रहेगा —

मंत्र 75

तथामुष्मिंल्लोके लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ।। ४ ।।

tathāmuṣmiṃlloke loka iti sa ya etamevaṃ vidvānupāste parovarīya eva hāsyāsmiṃlloke jīvanaṃ bhavati tathāmuṣmiṃlloke loka iti loke loka iti || 4 ||

— और वैसे ही उस (परलोक) में भी उनकी स्थिति (श्रेष्ठ रहेगी)।' जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, उसका इस लोक में जीवन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है, और वैसे ही उस लोक में भी — हाँ, प्रत्येक लोक में।

मंत्र 76

मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ।। १ ।।

maṭacīhateṣu kuruṣvāṭikyā saha jāyayoṣastirha cākrāyaṇa ibhyagrāme pradrāṇaka uvāsa || 1 ||

जब कुरु-देश (ओलों की वर्षा से अथवा टिड्डियों के प्रकोप से) उजड़ गया था, तब उषस्ति चाक्रायण अपनी युवा पत्नी आटिकी के साथ किसी धनिक के गाँव में अत्यन्त दरिद्र अवस्था में रहता था।

मंत्र 77

स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तं होवाच । नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ।। २ ।।

sa hebhyaṃ kulmāṣānkhādantaṃ bibhikṣe taṃ hovāca | neto'nye vidyante yacca ye ma ima upanihitā iti || 2 ||

उसने कुल्माष (उड़द के दाने) खाते हुए उस धनिक से भिक्षा माँगी। उस (धनिक) ने कहा: 'मेरे पास जो ये (दाने) रखे हैं, इनके सिवा और कुछ नहीं है।'

मंत्र 78

एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच ।। ३ ।।

eteṣāṃ me dehīti hovāca tānasmai pradadau hantānupānamityucchiṣṭaṃ vai me pītaṃ syāditi hovāca || 3 ||

'इनमें से कुछ मुझे दे दो,' उसने कहा। उस (धनिक) ने वे (दाने) उसे दे दिए और कहा, 'यह पीने के लिए जल भी लो।' किन्तु (उषस्ति ने) कहा, 'यह तो मेरे लिए उच्छिष्ट (जूठा) जल पीना होगा।'

मंत्र 79

न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदपानमिति ।। ४ ।।

na svidete'pyucchiṣṭā iti na vā ajīviṣyamimānakhādanniti hovāca kāmo ma udapānamiti || 4 ||

'क्या ये (दाने) भी उच्छिष्ट (जूठे) नहीं हैं?' 'इन्हें न खाता तो मैं जीवित न रहता,' उसने कहा। 'किन्तु जल तो मैं इच्छानुसार (कहीं से भी) पा सकता हूँ।'

मंत्र 80

स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ।। ५ ।।

sa ha khāditvātiśeṣāñjāyāyā ājahāra sāgra eva subhikṣā babhūva tānpratigṛhya nidadhau || 5 ||

खाने के बाद उसने बचे हुए (दाने) अपनी पत्नी के पास ले जाकर दिए। किन्तु उसे तो पहले ही (भिक्षा में) पर्याप्त अन्न मिल चुका था; इसलिए उन्हें ग्रहण करके उसने रख दिया।

मंत्र 81

स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ।। ६ ।।

sa ha prātaḥ sañjihāna uvāca yadbatānnasya labhemahi labhemahi dhanamātrāṃ rājāsau yakṣyate sa mā sarvairārtvijyairvṛṇīteti || 6 ||

प्रातःकाल उठकर उसने कहा: 'हाय! यदि हमें कुछ अन्न मिल जाता, तो कुछ धन भी मिल जाता। वह राजा यज्ञ करने वाला है; वह मुझे समस्त ऋत्विक्-कर्मों (पुरोहिती) के लिए वरण कर ले तो अच्छा हो।'

मंत्र 82

तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ।। ७ ।।

taṃ jāyovāca hanta pata ima eva kulmāṣā iti tānkhāditvāmuṃ yajñaṃ vitatameyāya || 7 ||

उसकी पत्नी ने उससे कहा: 'हे स्वामी, ये वही (कल के) कुल्माष-दाने हैं।' उन्हें खाकर वह उस यज्ञ में गया, जो पहले से चल रहा था।

मंत्र 83

तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ।। ८ ।।

tatrodgātṝnāstāve stoṣyamāṇānupopaviveśa sa ha prastotāramuvāca || 8 ||

वहाँ वह स्तोत्र-स्थल (आस्ताव) में स्तुति करने को उद्यत उद्गाता पुरोहितों के समीप बैठ गया। उसने प्रस्तोता से कहा:

मंत्र 84

प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ।। ९ ।।

prastotaryā devatā prastāvamanvāyattā tāṃ cedavidvānprastoṣyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti || 9 ||

'हे प्रस्तोता, जो देवता प्रस्ताव (आरम्भिक गान) से सम्बद्ध है, यदि उसे जाने बिना तुम प्रस्ताव गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा।'

मंत्र 85

एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ।। १० ।।

evamevodgātāramuvācodgātaryā devatodgīthamanvāyattā tāṃ cedavidvānudgāsyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti || 10 ||

इसी प्रकार उसने उद्गाता से कहा: 'हे उद्गाता, जो देवता उद्गीथ से सम्बद्ध है, यदि उसे जाने बिना तुम उद्गीथ गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा।'

मंत्र 86

एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ।। ११ ।।

evameva pratihartāramuvāca pratihartaryā devatā pratihāramanvāyattā tāṃ cedavidvānpratihariṣyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti te ha samāratāstūṣṇīmāsāṃcakrire || 11 ||

इसी प्रकार उसने प्रतिहर्ता से कहा: 'हे प्रतिहर्ता, जो देवता प्रतिहार से सम्बद्ध है, यदि उसे जाने बिना तुम प्रतिहार करोगे, तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा।' तब वे (सब पुरोहित) रुककर चुपचाप बैठ गए।

मंत्र 87

अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ।। १ ।।

atha hainaṃ yajamāna uvāca bhagavantaṃ vā ahaṃ vividiṣāṇītyuṣastirasmi cākrāyaṇa iti hovāca || 1 ||

तब यजमान (राजा) ने उससे कहा: 'पूज्यवर, मैं आपको जानना चाहता हूँ (आप कौन हैं?)।' 'मैं उषस्ति चाक्रायण हूँ,' उसने उत्तर दिया।

मंत्र 88

स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ।। २ ।।

sa hovāca bhagavantaṃ vā ahamebhiḥ sarvairārtvijyaiḥ paryaiṣiṣaṃ bhagavato vā ahamavittyānyānavṛṣi || 2 ||

राजा ने कहा: 'पूज्यवर, इन समस्त ऋत्विक्-कर्मों के लिए मैंने आपको ही खोजा था; किन्तु आपको न पाकर, पूज्यवर, मैंने दूसरों को वरण कर लिया।'

मंत्र 89

भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ।। ३ ।।

bhagavāṃstveva me sarvairārtvijyairiti tathetyatha tarhyeta eva samatisṛṣṭāḥ stuvatāṃ yāvattvebhyo dhanaṃ dadyāstāvanmama dadyā iti tatheti ha yajamāna uvāca || 3 ||

'पूज्यवर, अब आप ही मेरे समस्त ऋत्विक्-कर्मों को सँभालें।' 'ऐसा ही हो,' उसने कहा। 'किन्तु तब ये (नियुक्त पुरोहित) ही मेरी अनुमति से स्तुति करें। और आप इन्हें जितना धन देंगे, उतना ही मुझे भी देना होगा।' 'ऐसा ही हो,' यजमान ने कहा।

मंत्र 90

अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ।। ४ ।।

atha hainaṃ prastotopasasāda prastotaryā devatā prastāvamanvāyattā tāṃ cedavidvānprastoṣyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti mā bhagavānavocatkatamā sā devateti || 4 ||

तब प्रस्तोता उसके पास आया और बोला: 'पूज्यवर, आपने मुझसे कहा था — हे प्रस्तोता, जो देवता प्रस्ताव से सम्बद्ध है, उसे जाने बिना यदि तुम प्रस्ताव गाओगे तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा। वह देवता कौन है?'

मंत्र 91

प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ।। ५ ।।

prāṇa iti hovāca sarvāṇi ha vā imāni bhūtāni prāṇamevābhisaṃviśanti prāṇamabhyujjihate saiṣā devatā prastāvamanvāyattā tāṃ cedavidvānprāstoṣyo mūrdhā te vyapatiṣyattathoktasya mayeti || 5 ||

'प्राण,' उसने कहा। 'क्योंकि ये समस्त प्राणी प्राण में ही लीन होते हैं और प्राण से ही ऊपर उठते (प्रकट होते) हैं। यही वह देवता है जो प्रस्ताव से सम्बद्ध है। मेरे चेताने पर भी यदि तुम इसे जाने बिना प्रस्ताव गाते, तो तुम्हारा सिर गिर पड़ता।'

मंत्र 92

अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ।। ६ ।।

atha hainamudgātopasasādodgātaryā devatodgīthamanvāyattā tāṃ cedavidvānudgāsyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti mā bhagavānavocatkatamā sā devateti || 6 ||

तब उद्गाता उसके पास आया और बोला: 'पूज्यवर, आपने मुझसे कहा था — हे उद्गाता, जो देवता उद्गीथ से सम्बद्ध है, उसे जाने बिना यदि तुम उद्गीथ गाओगे तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा। वह देवता कौन है?'

मंत्र 93

आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ।। ७ ।।

āditya iti hovāca sarvāṇi ha vā imāni bhūtānyādityamuccaiḥ santaṃ gāyanti saiṣā devatodgīthamanvāyattā tāṃ cedavidvānudagāsyo mūrdhā te vyapatiṣyattathoktasya mayeti || 7 ||

'आदित्य (सूर्य),' उसने कहा। 'क्योंकि ये समस्त प्राणी ऊँचे स्थित सूर्य का ही गान करते हैं। यही वह देवता है जो उद्गीथ से सम्बद्ध है। मेरे चेताने पर भी यदि तुम इसे जाने बिना उद्गीथ गाते, तो तुम्हारा सिर गिर पड़ता।'

मंत्र 94

अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ।। ८ ।।

atha hainaṃ pratihartopasasāda pratihartaryā devatā pratihāramanvāyattā tāṃ cedavidvānpratihariṣyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti mā bhagavānavocatkatamā sā devateti || 8 ||

तब प्रतिहर्ता उसके पास आया और बोला: 'पूज्यवर, आपने मुझसे कहा था — हे प्रतिहर्ता, जो देवता प्रतिहार से सम्बद्ध है, उसे जाने बिना यदि तुम प्रतिहार करोगे तो तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा। वह देवता कौन है?'

मंत्र 95

अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ।। ९ ।।

annamiti hovāca sarvāṇi ha vā imāni bhūtānyannameva pratiharamāṇāni jīvanti saiṣā devatā pratihāramanvāyattā tāṃ cedavidvānpratyahariṣyo mūrdhā te vyapatiṣyattathoktasya mayeti tathoktasya mayeti || 9 ||

'अन्न,' उसने कहा। 'क्योंकि ये समस्त प्राणी अन्न को ग्रहण करके ही जीवित रहते हैं। यही वह देवता है जो प्रतिहार से सम्बद्ध है। मेरे चेताने पर भी यदि तुम इसे जाने बिना प्रतिहार करते, तो तुम्हारा सिर गिर पड़ता — हाँ, अवश्य गिर पड़ता।'

मंत्र 96

अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज ।। १ ।।

athātaḥ śauva udgīthastaddha bako dālbhyo glāvo vā maitreyaḥ svādhyāyamudvavrāja || 1 ||

अब इसके पश्चात् शौव उद्गीथ (श्वानों का उद्गीथ) है। बक दाल्भ्य — जिसे ग्लाव मैत्रेय भी कहते हैं — स्वाध्याय (वेदाध्ययन) के लिए (एकान्त में) बाहर गया।

मंत्र 97

तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ।। २ ।।

tasmai śvā śvetaḥ prādurbabhūva tamanye śvāna upasametyocurannaṃ no bhagavānāgāyatvaśanāyāma vā iti || 2 ||

उसके सामने एक श्वेत कुत्ता प्रकट हुआ। अन्य कुत्ते उसके पास आकर बोले: 'भगवन्, हमारे लिए (गान करके) अन्न प्राप्त कीजिए; हम भूखे हैं।'

मंत्र 98

तान्होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ।। ३ ।।

tānhovācehaiva mā prātarupasamīyāteti taddha bako dālbhyo glāvo vā maitreyaḥ pratipālayāñcakāra || 3 ||

उस (श्वेत कुत्ते) ने उनसे कहा: 'कल प्रातःकाल मेरे पास यहीं आना।' बक दाल्भ्य — अथवा ग्लाव मैत्रेय — प्रतीक्षा करता रहा (देखता रहा कि क्या होता है)।

मंत्र 99

ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिं चक्रुः ।। ४ ।।

te ha yathaivedaṃ bahiṣpavamānena stoṣyamāṇāḥ saṃrabdhāḥ sarpantītyevamāsasṛpuste ha samupaviśya hiṃ cakruḥ || 4 ||

जैसे बहिष्पवमान स्तोत्र गाने को उद्यत पुरोहित एक-दूसरे को पकड़कर (शृंखलाबद्ध होकर) चलते हैं, वैसे ही वे कुत्ते (एक-दूसरे को पकड़कर) चलते हुए आए। फिर एक साथ बैठकर उन्होंने 'हिं' ध्वनि की।

मंत्र 100

ओ३मदा३मों३पिबा३मों३ देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा२हरदन्नपते३ऽन्नमिहा२हरा२हरो३मिति ।। ५ ।।

o3madā3moṃ3pibā3moṃ3 devo varuṇaḥ prajāpatiḥ savitā3nnamihā2haradannapate3'nnamihā2harā2haro3miti || 5 ||

'ओ३म्! हम खाएँ। ओ३म्! हम पिएँ। ओ३म्! देव वरुण, प्रजापति और सविता यहाँ अन्न लाएँ। हे अन्नपते, यहाँ अन्न ला, अन्न ला! ओ३म्!' (यह श्वानों का साम-गान है, जिसमें सामवेदीय स्वर-चिह्न २ और ३ मूल पाठ के अनुसार रखे गए हैं।)

मंत्र 101

अयं वाव लोको हाउकारः वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकारः ।। १ ।।

ayaṃ vāva loko hāukāraḥ vāyurhāikāraścandramā athakāra ātmehakāro'gnirīkāraḥ || 1 ||

यह पृथ्वी-लोक 'हाउ' कार है। वायु 'हाइ' कार है। चन्द्रमा 'अथ' कार है। आत्मा 'इह' कार है। अग्नि 'ई' कार है।

मंत्र 102

आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वे देवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ।। २ ।।

āditya ūkāro nihava ekāro viśve devā auhoyikāraḥ prajāpatirhiṅkāraḥ prāṇaḥ svaro'nnaṃ yā vāgvirāṭ || 2 ||

आदित्य (सूर्य) 'ऊ' कार है। निहव (आह्वान) 'ए' कार है। विश्वेदेव 'औहोयि' कार हैं। प्रजापति 'हिङ्' कार है। प्राण 'स्वर' है। अन्न 'या' है। वाणी विराट् है।

मंत्र 103

अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुङ्कारः ।। ३ ।।

aniruktastrayodaśaḥ stobhaḥ sañcaro huṅkāraḥ || 3 ||

तेरहवाँ (स्तोभ) अनिरुक्त (अपरिभाषित) है — वह गतिशील (सर्वत्र संचरण करने वाला) स्तोभ 'हुङ्' कार है।

मंत्र 104

दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेदेति ।। ४ ।।

dugdhe'smai vāgdohaṃ yo vāco doho'nnavānannādo bhavati ya etāmevaṃ sāmnāmupaniṣadaṃ vedopaniṣadaṃ vedeti || 4 ||

जो इस प्रकार सामों के इस उपनिषद् (रहस्य-ज्ञान) को जानता है, उसके लिए वाणी अपना दोहन (दूध) देती है — वही वाणी का दोह है; वह अन्नवान् और अन्न का भोक्ता बन जाता है — जो इस उपनिषद् को जानता है।

द्वितीय प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु । यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते । यदसाधु तदसामेति ।। १ ।।

samastasya khalu sāmna upāsanaṃ sādhu | yat khalu sādhu tat sāmety ācakṣate | yad asādhu tad asāmeti || 1 ||

समस्त साम की उपासना ‘साधु’ रूप में करनी चाहिए। लोक में जो कुछ साधु — शुभ और उत्तम — है, उसे ‘साम’ कहते हैं; और जो असाधु है, उसे ‘असाम’ कहते हैं।

मंत्र 2

तदुताप्याहुः । साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः । असाम्नैनमुपागादित्येव तदाहुः ।। २ ।।

tad utāpy āhuḥ | sāmnainam upāgād iti sādhunainam upāgād ity eva tad āhuḥ | asāmnainam upāgād ity eva tad āhuḥ || 2 ||

इसी विषय में लोग यह भी कहते हैं — ‘वह साम के साथ इसके पास आया’, अर्थात् ‘वह साधुता के साथ इसके पास आया’, ऐसा ही वे कहते हैं; और ‘वह असाम के साथ इसके पास आया’, अर्थात् ‘वह असाधुता के साथ इसके पास आया’, ऐसा ही वे कहते हैं।

मंत्र 3

अथोताप्याहुः । साम नो बतेति यत् साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुः । असाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ।। ३ ।।

athotāpy āhuḥ | sāma no bateti yat sādhu bhavati sādhu batety eva tad āhuḥ | asāma no bateti yad asādhu bhavaty asādhu batety eva tad āhuḥ || 3 ||

फिर इसी अर्थ में लोग यह भी कहते हैं — ‘यह तो हमारे लिए साम हुआ’, जब कोई बात साधु होती है, तो ‘यह तो भला हुआ’, ऐसा ही वे कहते हैं; और ‘यह हमारे लिए असाम हुआ’, जब कोई बात असाधु होती है, तो ‘यह तो बुरा हुआ’, ऐसा ही वे कहते हैं।

मंत्र 4

स य एतदेवं विद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ।। ४ ।।

sa ya etad evaṃ vidvān sādhu sāmety upāste 'bhyāśo ha yad enaṃ sādhavo dharmā ā ca gaccheyur upa ca nameyuḥ || 4 ||

जो इस प्रकार जानकर साम की ‘साधु’ रूप में उपासना करता है, उसके पास शीघ्र ही शुभ धर्म (गुण) आते हैं और नम्रता से उपस्थित होते हैं।

मंत्र 5

लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत । पृथिवी हिङ्कारः । अग्निः प्रस्तावः । अन्तरिक्षमुद्गीथः । आदित्यः प्रतिहारः । द्यौर् निधनम् । इत्यूर्ध्वेषु ।। १ ।।

lokeṣu pañcavidhaṃ sāmopāsīta | pṛthivī hiṅkāraḥ | agniḥ prastāvaḥ | antarikṣam udgīthaḥ | ādityaḥ pratihāraḥ | dyaur nidhanam | ity ūrdhveṣu || 1 ||

लोकों में पञ्चविध साम की उपासना करनी चाहिए। पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, आदित्य प्रतिहार है, और द्युलोक निधन है। यह ऊर्ध्व (आरोही) क्रम में है।

मंत्र 6

अथावृत्तेषु । द्यौर् हिङ्कारः । आदित्यः प्रस्तावः । अन्तरिक्षमुद्गीथः । अग्निः प्रतिहारः । पृथिवी निधनम् ।। २ ।।

athāvṛtteṣu | dyaur hiṅkāraḥ | ādityaḥ prastāvaḥ | antarikṣam udgīthaḥ | agniḥ pratihāraḥ | pṛthivī nidhanam || 2 ||

और अब अवरोही (लौटते हुए) क्रम में — द्युलोक हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है, और पृथिवी निधन है।

मंत्र 7

कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश् चावृत्तश् च य एतदेवं विद्वांल् लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ।। ३ ।।

kalpante hāsmai lokā ūrdhvāś cāvṛttaś ca ya etad evaṃ vidvāṃl lokeṣu pañcavidhaṃ sāmopāste || 3 ||

जो इस प्रकार जानकर लोकों में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसके लिए ऊर्ध्व और अवरोही — दोनों ओर के लोक अनुकूल हो जाते हैं।

मंत्र 8

वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारः । मेघो जायते स प्रस्तावः । वर्षति स उद्गीथः । विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ।। १ ।।

vṛṣṭau pañcavidhaṃ sāmopāsīta | purovāto hiṅkāraḥ | megho jāyate sa prastāvaḥ | varṣati sa udgīthaḥ | vidyotate stanayati sa pratihāraḥ || 1 ||

वृष्टि में पञ्चविध साम की उपासना करनी चाहिए। पूर्व से बहती वायु हिंकार है; मेघ उठता है, वह प्रस्ताव है; वर्षा होती है, वह उद्गीथ है; बिजली चमकती और गरजती है, वह प्रतिहार है।

मंत्र 9

उद्गृह्णाति तन् निधनं वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ।। २ ।।

udgṛhṇāti tan nidhanaṃ varṣayati ha ya etad evaṃ vidvān vṛṣṭau pañcavidhaṃ sāmopāste || 2 ||

वर्षा थम जाती है, वह निधन है। जो इस प्रकार जानकर वृष्टि में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसके लिए वर्षा होती है और वह दूसरों के लिए भी वर्षा कराने में समर्थ होता है।

मंत्र 10

सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत् संप्लवते स हिङ्कारः । यद् वर्षति स प्रस्तावः । याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथः । याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः । समुद्रो निधनम् ।। १ ।।

sarvāsv apsu pañcavidhaṃ sāmopāsīta | megho yat saṃplavate sa hiṅkāraḥ | yad varṣati sa prastāvaḥ | yāḥ prācyaḥ syandante sa udgīthaḥ | yāḥ pratīcyaḥ sa pratihāraḥ | samudro nidhanam || 1 ||

समस्त जलों में पञ्चविध साम की उपासना करनी चाहिए। मेघ जब एकत्र होता है, वह हिंकार है; जब वर्षा होती है, वह प्रस्ताव है; जो जल पूर्व की ओर बहते हैं, वह उद्गीथ है; जो पश्चिम की ओर बहते हैं, वह प्रतिहार है; और समुद्र निधन है।

मंत्र 11

न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवं विद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ।। २ ।।

na hāpsu praity apsumān bhavati ya etad evaṃ vidvān sarvāsv apsu pañcavidhaṃ sāmopāste || 2 ||

जो इस प्रकार जानकर समस्त जलों में पञ्चविध साम की उपासना करता है, वह जल में डूबकर नष्ट नहीं होता और जल से सम्पन्न (जल का स्वामी) होता है।

मंत्र 12

ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारः । ग्रीष्मः प्रस्तावः । वर्षा उद्गीथः । शरत् प्रतिहारः । हेमन्तो निधनम् ।। १ ।।

ṛtuṣu pañcavidhaṃ sāmopāsīta | vasanto hiṅkāraḥ | grīṣmaḥ prastāvaḥ | varṣā udgīthaḥ | śarat pratihāraḥ | hemanto nidhanam || 1 ||

ऋतुओं में पञ्चविध साम की उपासना करनी चाहिए। वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद् प्रतिहार है, और हेमन्त निधन है।

मंत्र 13

कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ।। २ ।।

kalpante hāsmā ṛtava ṛtumān bhavati ya etad evaṃ vidvān ṛtuṣu pañcavidhaṃ sāmopāste || 2 ||

जो इस प्रकार जानकर ऋतुओं में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसके लिए ऋतुएँ अनुकूल होती हैं और वह ऋतुओं से सम्पन्न होता है।

मंत्र 14

पशुषु पञ्चविधं सामोपासीत । अजा हिङ्कारः । अवयः प्रस्तावः । गाव उद्गीथः । अश्वः प्रतिहारः । पुरुषो निधनम् ।। १ ।।

paśuṣu pañcavidhaṃ sāmopāsīta | ajā hiṅkāraḥ | avayaḥ prastāvaḥ | gāva udgīthaḥ | aśvaḥ pratihāraḥ | puruṣo nidhanam || 1 ||

पशुओं में पञ्चविध साम की उपासना करनी चाहिए। बकरियाँ हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, अश्व प्रतिहार है, और पुरुष (मनुष्य) निधन है।

मंत्र 15

भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवं विद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ।। २ ।।

bhavanti hāsya paśavaḥ paśumān bhavati ya etad evaṃ vidvān paśuṣu pañcavidhaṃ sāmopāste || 2 ||

जो इस प्रकार जानकर पशुओं में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसके पास पशु होते हैं और वह पशुओं से सम्पन्न होता है।

मंत्र 16

प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत । प्राणो हिङ्कारः । वाक् प्रस्तावः । चक्षुरुद्गीथः । श्रोत्रं प्रतिहारः । मनो निधनम् । परोवरीयांसि वा एतानि ।। १ ।।

prāṇeṣu pañcavidhaṃ parovarīyaḥ sāmopāsīta | prāṇo hiṅkāraḥ | vāk prastāvaḥ | cakṣur udgīthaḥ | śrotraṃ pratihāraḥ | mano nidhanam | parovarīyāṃsi vā etāni || 1 ||

प्राणों में पञ्चविध — और सर्वाधिक श्रेष्ठ — साम की उपासना करनी चाहिए। प्राण हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है, और मन निधन है। ये सचमुच सबसे श्रेष्ठ हैं।

मंत्र 17

परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्ते । इति तु पञ्चविधस्य ।। २ ।।

parovarīyo hāsya bhavati parovarīyaso ha lokāñ jayati ya etad evaṃ vidvān prāṇeṣu pañcavidhaṃ parovarīyaḥ sāmopāste | iti tu pañcavidhasya || 2 ||

जो इस प्रकार जानकर प्राणों में पञ्चविध, सर्वश्रेष्ठ साम की उपासना करता है, उसे श्रेष्ठतर वस्तुएँ प्राप्त होती हैं और वह श्रेष्ठतर लोकों को जीत लेता है। — यह पञ्चविध साम का विवरण हुआ।

मंत्र 18

अथ सप्तविधस्य । वाचि सप्तविधं सामोपासीत । यत् किंच वाचो हुमिति स हिङ्कारः । यत् प्रेति स प्रस्तावः । यदेति स आदिः ।। १ ।।

atha saptavidhasya | vāci saptavidhaṃ sāmopāsīta | yat kiṃca vāco hum iti sa hiṅkāraḥ | yat preti sa prastāvaḥ | yad eti sa ādiḥ || 1 ||

अब सप्तविध साम का वर्णन है। वाणी में सप्तविध साम की उपासना करनी चाहिए। वाणी में जो कुछ ‘हुम्’ जैसा है, वह हिंकार है; जो ‘प्र’ है, वह प्रस्ताव है; जो ‘आ’ है, वह आदि है।

मंत्र 19

यदुदिति स उद्गीथः । यत् प्रतीति स प्रतिहारः । यदुपेति स उपद्रवः । यन् नीति तन् निधनम् ।। २ ।।

yad ud iti sa udgīthaḥ | yat pratīti sa pratihāraḥ | yad upeti sa upadravaḥ | yan nīti tan nidhanam || 2 ||

जो ‘उद्’ है, वह उद्गीथ है; जो ‘प्रति’ है, वह प्रतिहार है; जो ‘उप’ है, वह उपद्रव है; और जो ‘नि’ है, वह निधन है।

मंत्र 20

दुग्धेऽस्मै वाग् दोहं यो वाचो दोहः । अन्नवानन्नादो भवति । य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ।। ३ ।।

dugdhe 'smai vāg dohaṃ yo vāco dohaḥ | annavān annādo bhavati | ya etad evaṃ vidvān vāci saptavidhaṃ sāmopāste || 3 ||

जो वाणी का दोहन है, वह उपासक के लिए दुह जाता है — वह वाणी का दुग्ध पाता है, अन्नवान् और अन्न का भोक्ता होता है। यह उसके लिए होता है जो इस प्रकार जानकर वाणी में सप्तविध साम की उपासना करता है।

मंत्र 21

अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत । सर्वदा समस् तेन साम । मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस् तेन साम ।। १ ।।

atha khalv amum ādityaṃ saptavidhaṃ sāmopāsīta | sarvadā samas tena sāma | māṃ prati māṃ pratīti sarveṇa samas tena sāma || 1 ||

अब उस आदित्य (सूर्य) में सप्तविध साम की उपासना करनी चाहिए। वह सदा सम (समान) है, इसलिए वह ‘साम’ है। ‘वह मेरे सम्मुख है, मेरे सम्मुख है’ — इस भाव से वह सबके लिए समान है, इसलिए वह ‘साम’ है।

मंत्र 22

तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् । तस्य यत् पुरोदयात् स हिङ्कारः । तदस्य पशवोऽन्वायत्ताः । तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति । हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ।। २ ।।

tasminn imāni sarvāṇi bhūtāny anvāyattānīti vidyāt | tasya yat purodayāt sa hiṅkāraḥ | tad asya paśavo 'nvāyattāḥ | tasmāt te hiṅkurvanti | hiṅkārabhājino hy etasya sāmnaḥ || 2 ||

यह जान लेना चाहिए कि ये समस्त प्राणी उसी में अनुगत हैं। सूर्य के उदय से पहले का समय हिंकार है; उससे पशु सम्बद्ध हैं, इसलिए वे उस समय हुंकार (रँभाना) करते हैं — क्योंकि वे इस साम के हिंकार के भागी हैं।

मंत्र 23

अथ यत् प्रथमोदिते स प्रस्तावः । तदस्य मनुष्या अन्वायत्ताः । तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः । प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ।। ३ ।।

atha yat prathamodite sa prastāvaḥ | tad asya manuṣyā anvāyattāḥ | tasmāt te prastutikāmāḥ praśaṃsākāmāḥ | prastāvabhājino hy etasya sāmnaḥ || 3 ||

फिर, सूर्य के प्रथम उदय का समय प्रस्ताव है; उससे मनुष्य सम्बद्ध हैं, इसलिए वे प्रशंसा और स्तुति के इच्छुक रहते हैं — क्योंकि वे इस साम के प्रस्ताव के भागी हैं।

मंत्र 24

अथ यत् संगववेलायां स आदिः । तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि । तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्ति । आदिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ।। ४ ।।

atha yat saṃgavavelāyāṃ sa ādiḥ | tad asya vayāṃsy anvāyattāni | tasmāt tāny antarikṣe 'nārambhaṇāny ādāyātmānaṃ paripatanti | ādibhājīni hy etasya sāmnaḥ || 4 ||

फिर, गौओं के एकत्र होने का समय (संगव) आदि है; उससे पक्षी सम्बद्ध हैं, इसलिए वे बिना किसी आश्रय के आकाश में अपने को सँभाले हुए उड़ते रहते हैं — क्योंकि वे इस साम के आदि के भागी हैं।

मंत्र 25

अथ यत् संप्रति मध्यंदिने स उद्गीथः । तदस्य देवा अन्वायत्ताः । तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानाम् । उद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ।। ५ ।।

atha yat saṃprati madhyaṃdine sa udgīthaḥ | tad asya devā anvāyattāḥ | tasmāt te sattamāḥ prājāpatyānām | udgīthabhājino hy etasya sāmnaḥ || 5 ||

फिर, ठीक मध्याह्न का समय उद्गीथ है; उससे देव सम्बद्ध हैं, इसलिए वे प्रजापति की सन्तानों में सर्वश्रेष्ठ हैं — क्योंकि वे इस साम के उद्गीथ के भागी हैं।

मंत्र 26

अथ यदूर्ध्वं मध्यंदिनात् प्रागपराह्णात् स प्रतिहारः । तदस्य गर्भा अन्वायत्ताः । तस्मात् ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते । प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ।। ६ ।।

atha yad ūrdhvaṃ madhyaṃdināt prāg aparāhṇāt sa pratihāraḥ | tad asya garbhā anvāyattāḥ | tasmāt te pratihṛtā nāvapadyante | pratihārabhājino hy etasya sāmnaḥ || 6 ||

फिर, मध्याह्न के बाद और अपराह्न से पहले का समय प्रतिहार है; उससे गर्भ सम्बद्ध हैं, इसलिए वे धारण किए जाकर नीचे नहीं गिरते — क्योंकि वे इस साम के प्रतिहार के भागी हैं।

मंत्र 27

अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवः । तदस्यारण्या अन्वायत्ताः । तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षं श्वभ्रमित्युपद्रवन्ति । उपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ।। ७ ।।

atha yad ūrdhvam aparāhṇāt prāg astam ayāt sa upadravaḥ | tad asyāraṇyā anvāyattāḥ | tasmāt te puruṣaṃ dṛṣṭvā kakṣaṃ śvabhram ity upadravanti | upadravabhājino hy etasya sāmnaḥ || 7 ||

फिर, अपराह्न के बाद और सूर्यास्त से पहले का समय उपद्रव है; उससे वन्य पशु सम्बद्ध हैं, इसलिए वे मनुष्य को देखकर ‘झाड़ी है, गड्ढा है’ कहते हुए भागते हैं — क्योंकि वे इस साम के उपद्रव के भागी हैं।

मंत्र 28

अथ यत् प्रथमास्तमिते तन् निधनम् । तदस्य पितरोऽन्वायत्ताः । तस्मात् तान् निदधति । निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्नः । एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ।। ८ ।।

atha yat prathamāstamite tan nidhanam | tad asya pitaro 'nvāyattāḥ | tasmāt tān nidadhati | nidhanabhājino hy etasya sāmnaḥ | evaṃ khalv amum ādityaṃ saptavidhaṃ sāmopāste || 8 ||

फिर, सूर्य के अस्त होते ही जो समय है, वह निधन है; उससे पितर सम्बद्ध हैं, इसलिए लोग उन्हें (उस समय अन्न आदि) अर्पित करते हैं — क्योंकि वे इस साम के निधन के भागी हैं। इस प्रकार वह उस आदित्य की सप्तविध साम रूप में उपासना करता है।

मंत्र 29

अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत । हिङ्कार इति त्र्यक्षरम् । प्रस्ताव इति त्र्यक्षरम् । तत् समम् ।। १ ।।

atha khalv ātmasaṃmitam atimṛtyu saptavidhaṃ sāmopāsīta | hiṅkāra iti tryakṣaram | prastāva iti tryakṣaram | tat samam || 1 ||

अब आत्मा से मापे गए, मृत्यु को लाँघ जाने वाले सप्तविध साम की उपासना करनी चाहिए (इसकी गणना अक्षरों से होती है)। ‘हिंकार’ तीन अक्षरों का है, ‘प्रस्ताव’ तीन अक्षरों का है — ये समान हैं।

मंत्र 30

आदिरिति द्व्यक्षरम् । प्रतिहार इति चतुरक्षरम् । तत इहैकम् । तत् समम् ।। २ ।।

ādir iti dvyakṣaram | pratihāra iti caturakṣaram | tata ihaikam | tat samam || 2 ||

‘आदि’ दो अक्षरों का है, ‘प्रतिहार’ चार अक्षरों का है; इसमें से एक अक्षर यहाँ (आदि में) मिला दो — तब ये समान हो जाते हैं।

मंत्र 31

उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस् त्रिभिः समं भवति । अक्षरमतिशिष्यते त्र्यक्षरम् । तत् समम् ।। ३ ।।

udgītha iti tryakṣaram upadrava iti caturakṣaraṃ tribhis tribhiḥ samaṃ bhavati | akṣaram atiśiṣyate tryakṣaram | tat samam || 3 ||

‘उद्गीथ’ तीन अक्षरों का है, ‘उपद्रव’ चार अक्षरों का है; ये तीन-तीन के हिसाब से समान होते हैं, और एक अक्षर शेष रहता है — वह भी तीन अक्षरों के तुल्य (‘इति’ जोड़कर) मान लो, तब वह समान हो जाता है।

मंत्र 32

निधनमिति त्र्यक्षरम् । तत् सममेव भवति । तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ।। ४ ।।

nidhanam iti tryakṣaram | tat samam eva bhavati | tāni ha vā etāni dvāviṃśatir akṣarāṇi || 4 ||

‘निधन’ तीन अक्षरों का है — वह भी समान ही होता है। इस प्रकार ये सब मिलाकर बाईस अक्षर होते हैं।

मंत्र 33

एकविंशत्यादित्यमाप्नोति । एकविंशो वा इतोऽसावादित्यः । द्वाविंशेन परमादित्याज् जयति । तन् नाकम् । तद् विशोकम् ।। ५ ।।

ekaviṃśatyādityam āpnoti | ekaviṃśo vā ito 'sāv ādityaḥ | dvāviṃśena param ādityāj jayati | tan nākam | tad viśokam || 5 ||

इक्कीस अक्षरों से मनुष्य आदित्य को प्राप्त करता है, क्योंकि यह आदित्य यहाँ से इक्कीसवाँ है। बाईसवें अक्षर से वह आदित्य के परे को जीत लेता है — वह लोक स्वर्ग है, वह शोकरहित है।

मंत्र 34

आप्नोतीहादित्यस्य जयम् । परो हास्यादित्यजयाज् जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ।। ६ ।।

āpnotīhādityasya jayam | paro hāsyādityajayāj jayo bhavati ya etad evaṃ vidvān ātmasaṃmitam atimṛtyu saptavidhaṃ sāmopāste sāmopāste || 6 ||

वह यहीं आदित्य की विजय प्राप्त कर लेता है, और आदित्य की विजय से भी श्रेष्ठतर विजय उसकी होती है — जो इस प्रकार जानकर आत्मा से मापे गए, मृत्यु को लाँघने वाले सप्तविध साम की उपासना करता है, साम की उपासना करता है।

मंत्र 35

मनो हिङ्कारः । वाक् प्रस्तावः । चक्षुरुद्गीथः । श्रोत्रं प्रतिहारः । प्राणो निधनम् । एतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ।। १ ।।

mano hiṅkāraḥ | vāk prastāvaḥ | cakṣur udgīthaḥ | śrotraṃ pratihāraḥ | prāṇo nidhanam | etad gāyatraṃ prāṇeṣu protam || 1 ||

मन हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है, और प्राण निधन है। यह गायत्र साम है, जो प्राणों में ओतप्रोत है।

मंत्र 36

स य एवमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद । प्राणी भवति । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । महामनाः स्यात् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad gāyatraṃ prāṇeṣu protaṃ veda | prāṇī bhavati | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | mahāmanāḥ syāt | tad vratam || 2 ||

जो इस गायत्र साम को प्राणों में ओतप्रोत जानता है, वह प्राणवान् होता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है, और उदार-चित्त होता है। यही उसका व्रत है।

मंत्र 37

अभिमन्थति स हिङ्कारः । धूमो जायते स प्रस्तावः । ज्वलति स उद्गीथः । अङ्गारा भवन्ति स प्रतिहारः । उपशाम्यति तन् निधनम् । संशाम्यति तन् निधनम् । एतद् रथंतरमग्नौ प्रोतम् ।। १ ।।

abhimanthati sa hiṅkāraḥ | dhūmo jāyate sa prastāvaḥ | jvalati sa udgīthaḥ | aṅgārā bhavanti sa pratihāraḥ | upaśāmyati tan nidhanam | saṃśāmyati tan nidhanam | etad rathaṃtaram agnau protam || 1 ||

(अरणि को) मथता है, वह हिंकार है; धुआँ उठता है, वह प्रस्ताव है; आग जलती है, वह उद्गीथ है; अंगारे बनते हैं, वह प्रतिहार है; आग शान्त हो जाती है, वह निधन है; पूरी तरह बुझ जाती है, वह निधन है। यह रथन्तर साम है, जो अग्नि में ओतप्रोत है।

मंत्र 38

स य एवमेतद् रथंतरमग्नौ प्रोतं वेद । ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन् न निष्ठीवेत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad rathaṃtaram agnau protaṃ veda | brahmavarcasy annādo bhavati | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | na pratyaṅṅ agnim ācāmen na niṣṭhīvet | tad vratam || 2 ||

जो इस रथन्तर साम को अग्नि में ओतप्रोत जानता है, वह ब्रह्मतेज से युक्त और अन्न का भोक्ता होता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह अग्नि की ओर मुख करके न आचमन करे, न थूके। यही उसका व्रत है।

मंत्र 39

उपमन्त्रयते स हिङ्कारः । ज्ञपयते स प्रस्तावः । स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः । प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः । कालं गच्छति तन् निधनम् । पारं गच्छति तन् निधनम् । एतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ।। १ ।।

upamantrayate sa hiṅkāraḥ | jñapayate sa prastāvaḥ | striyā saha śete sa udgīthaḥ | prati strīṃ saha śete sa pratihāraḥ | kālaṃ gacchati tan nidhanam | pāraṃ gacchati tan nidhanam | etad vāmadevyaṃ mithune protam || 1 ||

आमन्त्रित करता है, वह हिंकार है; सहमत कराता है, वह प्रस्ताव है; स्त्री के साथ शयन करता है, वह उद्गीथ है; स्त्री के सम्मुख होकर शयन करता है, वह प्रतिहार है; समय बीत जाता है, वह निधन है; पार पहुँच जाता है, वह निधन है। यह वामदेव्य साम है, जो मिथुन (युगल) में ओतप्रोत है।

मंत्र 40

स य एवमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद । मिथुनी भवति । मिथुनान् मिथुनात् प्रजायते । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । न कांचन परिहरेत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad vāmadevyaṃ mithune protaṃ veda | mithunī bhavati | mithunān mithunāt prajāyate | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | na kāṃcana pariharet | tad vratam || 2 ||

जो इस वामदेव्य साम को मिथुन में ओतप्रोत जानता है, वह युगलधर्मी होता है, हर संगम से सन्तति उत्पन्न करता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह किसी (उचित संगम) का परिहार न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 41

उद्यन् हिङ्कारः । उदितः प्रस्तावः । मध्यंदिन उद्गीथः । अपराह्णः प्रतिहारः । अस्तं यन् निधनम् । एतद् बृहदादित्ये प्रोतम् ।। १ ।।

udyan hiṅkāraḥ | uditaḥ prastāvaḥ | madhyaṃdina udgīthaḥ | aparāhṇaḥ pratihāraḥ | astaṃ yan nidhanam | etad bṛhad āditye protam || 1 ||

उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदय हो चुका प्रस्ताव है, मध्याह्न उद्गीथ है, अपराह्न प्रतिहार है, और अस्त होता हुआ सूर्य निधन है। यह बृहत् साम है, जो आदित्य में ओतप्रोत है।

मंत्र 42

स य एवमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं वेद । तेजस्व्यन्नादो भवति । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । तपन्तं न निन्देत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad bṛhad āditye protaṃ veda | tejasvy annādo bhavati | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | tapantaṃ na nindet | tad vratam || 2 ||

जो इस बृहत् साम को आदित्य में ओतप्रोत जानता है, वह तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह तपते हुए सूर्य की निन्दा न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 43

अभ्राणि संप्लवन्ते स हिङ्कारः । मेघो जायते स प्रस्तावः । वर्षति स उद्गीथः । विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः । उद्गृह्णाति तन् निधनम् । एतद् वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ।। १ ।।

abhrāṇi saṃplavante sa hiṅkāraḥ | megho jāyate sa prastāvaḥ | varṣati sa udgīthaḥ | vidyotate stanayati sa pratihāraḥ | udgṛhṇāti tan nidhanam | etad vairūpaṃ parjanye protam || 1 ||

बादल एकत्र होते हैं, वह हिंकार है; मेघ उठता है, वह प्रस्ताव है; वर्षा होती है, वह उद्गीथ है; बिजली चमकती और गरजती है, वह प्रतिहार है; वर्षा थम जाती है, वह निधन है। यह वैरूप साम है, जो पर्जन्य (वर्षा-मेघ) में ओतप्रोत है।

मंत्र 44

स य एवमेतद् वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद । विरूपांश् च सुरूपंश् च पशूनवरुन्धे । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । वर्षन्तं न निन्देत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad vairūpaṃ parjanye protaṃ veda | virūpāṃś ca surūpaṃś ca paśūn avarundhe | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | varṣantaṃ na nindet | tad vratam || 2 ||

जो इस वैरूप साम को पर्जन्य में ओतप्रोत जानता है, वह विरूप और सुरूप — दोनों प्रकार के पशु प्राप्त करता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह वर्षा करते हुए (मेघ) की निन्दा न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 45

वसन्तो हिङ्कारः । ग्रीष्मः प्रस्तावः । वर्षा उद्गीथः । शरत् प्रतिहारः । हेमन्तो निधनम् । एतद् वैराजमृतुषु प्रोतम् ।। १ ।।

vasanto hiṅkāraḥ | grīṣmaḥ prastāvaḥ | varṣā udgīthaḥ | śarat pratihāraḥ | hemanto nidhanam | etad vairājam ṛtuṣu protam || 1 ||

वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद् प्रतिहार है, और हेमन्त निधन है। यह वैराज साम है, जो ऋतुओं में ओतप्रोत है।

मंत्र 46

स य एवमेतद् वैराजमृतुषु प्रोतं वेद । विराजति प्रजया । पशुभिर् ब्रह्मवर्चसेन । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । ऋतून् न निन्देत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad vairājam ṛtuṣu protaṃ veda | virājati prajayā | paśubhir brahmavarcasena | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | ṛtūn na nindet | tad vratam || 2 ||

जो इस वैराज साम को ऋतुओं में ओतप्रोत जानता है, वह सन्तान, पशु और ब्रह्मतेज से विराजमान होता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह ऋतुओं की निन्दा न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 47

पृथिवी हिङ्कारः । अन्तरिक्षं प्रस्तावः । द्यौरुद्गीथः । दिशः प्रतिहारः । समुद्रो निधनम् । एताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः ।। १ ।।

pṛthivī hiṅkāraḥ | antarikṣaṃ prastāvaḥ | dyaur udgīthaḥ | diśaḥ pratihāraḥ | samudro nidhanam | etāḥ śakvaryo lokeṣu protāḥ || 1 ||

पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं, और समुद्र निधन है। ये शक्वरी साम हैं, जो लोकों में ओतप्रोत हैं।

मंत्र 48

स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद । लोकी भवति सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । लोकान् न निन्देत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etāḥ śakvaryo lokeṣu protā veda | lokī bhavati sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | lokān na nindet | tad vratam || 2 ||

जो इन शक्वरी सामों को लोकों में ओतप्रोत जानता है, वह लोकवान् (लोकों का स्वामी) होता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह लोकों की निन्दा न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 49

अजा हिङ्कारः । अवयः प्रस्तावः । गाव उद्गीथः । अश्वाः प्रतिहारः । पुरुषो निधनम् । एता रेवत्यः पशुषु प्रोताः ।। १ ।।

ajā hiṅkāraḥ | avayaḥ prastāvaḥ | gāva udgīthaḥ | aśvāḥ pratihāraḥ | puruṣo nidhanam | etā revatyaḥ paśuṣu protāḥ || 1 ||

बकरियाँ हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, अश्व प्रतिहार हैं, और पुरुष निधन है। ये रेवती साम हैं, जो पशुओं में ओतप्रोत हैं।

मंत्र 50

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद । पशुमान् भवति । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । पशून् न निन्देत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etā revatyaḥ paśuṣu protā veda | paśumān bhavati | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | paśūn na nindet | tad vratam || 2 ||

जो इन रेवती सामों को पशुओं में ओतप्रोत जानता है, वह पशुवान् होता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह पशुओं की निन्दा न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 51

लोम हिङ्कारः । त्वक् प्रस्तावः । मांसमुद्गीथः । अस्थि प्रतिहारः । मज्जा निधनम् । एतद् यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ।। १ ।।

loma hiṅkāraḥ | tvak prastāvaḥ | māṃsam udgīthaḥ | asthi pratihāraḥ | majjā nidhanam | etad yajñāyajñīyam aṅgeṣu protam || 1 ||

रोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, अस्थि प्रतिहार है, और मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीय साम है, जो अंगों में ओतप्रोत है।

मंत्र 52

स य एवमेतद् यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेद । अङ्गी भवति । नाङ्गेन विहूर्छति । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् । तद् व्रतम् । मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ।। २ ।।

sa ya evam etad yajñāyajñīyam aṅgeṣu protaṃ veda | aṅgī bhavati | nāṅgena vihūrchati | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | saṃvatsaraṃ majjño nāśnīyāt | tad vratam | majjño nāśnīyād iti vā || 2 ||

जो इस यज्ञायज्ञीय साम को अंगों में ओतप्रोत जानता है, वह अंगों से पूर्ण होता है, किसी अंग से विकल नहीं होता, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह एक वर्ष तक मज्जा का सेवन न करे — यही उसका व्रत है; अथवा मज्जा का सेवन कभी न करे।

मंत्र 53

अग्निर् हिङ्कारः । वायुः प्रस्तावः । आदित्य उद्गीथः । नक्षत्राणि प्रतिहारः । चन्द्रमा निधनम् । एतद् राजनं देवतासु प्रोतम् ।। १ ।।

agnir hiṅkāraḥ | vāyuḥ prastāvaḥ | āditya udgīthaḥ | nakṣatrāṇi pratihāraḥ | candramā nidhanam | etad rājanaṃ devatāsu protam || 1 ||

अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार हैं, और चन्द्रमा निधन है। यह राजन साम है, जो देवताओं में ओतप्रोत है।

मंत्र 54

स य एवमेतद् राजनं देवतासु प्रोतं वेद । एतासामेव देवतानां सलोकतां सर्ष्टितां सायुज्यं गच्छति । सर्वमायुरेति । ज्योग् जीवति । महान् प्रजया पशुभिर् भवति । महान् कीर्त्या । ब्राह्मणान् न निन्देत् । तद् व्रतम् ।। २ ।।

sa ya evam etad rājanaṃ devatāsu protaṃ veda | etāsām eva devatānāṃ salokatāṃ sarṣṭitāṃ sāyujyaṃ gacchati | sarvam āyur eti | jyog jīvati | mahān prajayā paśubhir bhavati | mahān kīrtyā | brāhmaṇān na nindet | tad vratam || 2 ||

जो इस राजन साम को देवताओं में ओतप्रोत जानता है, वह इन्हीं देवताओं के समान लोक, समान सम्पत्ति और सायुज्य (एकता) को प्राप्त करता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घकाल तक जीता है, सन्तान और पशुओं से महान् होता है, कीर्ति से महान् होता है। वह ब्राह्मणों की निन्दा न करे। यही उसका व्रत है।

मंत्र 55

त्रयी विद्या हिङ्कारः । त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावः । अग्निर् वायुरादित्यः स उद्गीथः । नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः । सर्पा गन्धर्वाः पितरस् तन् निधनम् । एतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतम् ।। १ ।।

trayī vidyā hiṅkāraḥ | traya ime lokāḥ sa prastāvaḥ | agnir vāyur ādityaḥ sa udgīthaḥ | nakṣatrāṇi vayāṃsi marīcayaḥ sa pratihāraḥ | sarpā gandharvāḥ pitaras tan nidhanam | etat sāma sarvasmin protam || 1 ||

तीनों विद्याएँ (वेद) हिंकार हैं; ये तीन लोक प्रस्ताव हैं; अग्नि, वायु और आदित्य उद्गीथ हैं; नक्षत्र, पक्षी और किरणें प्रतिहार हैं; सर्प, गन्धर्व और पितर निधन हैं। यह वह साम है जो सबमें ओतप्रोत है।

मंत्र 56

स य एवमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ।। २ ।।

sa ya evam etat sāma sarvasmin protaṃ veda sarvaṃ ha bhavati || 2 ||

जो इस साम को सबमें ओतप्रोत जानता है, वह स्वयं सब कुछ हो जाता है।

मंत्र 57

तदेष श्लोकः । यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि । तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ।। ३ ।।

tad eṣa ślokaḥ | yāni pañcadhā trīṇi trīṇi | tebhyo na jyāyaḥ param anyad asti || 3 ||

इस विषय में यह श्लोक है — जो पञ्चधा (पाँच-पाँच रूप में) तीन-तीन हैं, उनसे बढ़कर, उनसे श्रेष्ठ, और कुछ भी नहीं है।

मंत्र 58

यस् तद् वेद स वेद सर्वम् । सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासित । तद् व्रतं तद् व्रतम् ।। ४ ।।

yas tad veda sa veda sarvam | sarvā diśo balim asmai haranti | sarvam asmīty upāsita | tad vrataṃ tad vratam || 4 ||

जो इसे जानता है, वह सब कुछ जानता है; सब दिशाएँ उसके लिए बलि (भेंट) लाती हैं। ‘मैं सब कुछ हूँ’ — इस भाव से उपासना करे। यही उसका व्रत है, यही उसका व्रत है।

मंत्र 59

विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथः । अनिरुक्तः प्रजापतेः । निरुक्तः सोमस्य । मृदु श्लक्ष्णं वायोः । श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य । क्रौञ्चं बृहस्पतेः । अपध्वान्तं वरुणस्य । तान् सर्वानेवोपसेवेत । वारुणं त्वेव वर्जयेत् ।। १ ।।

vinardi sāmno vṛṇe paśavyam ity agner udgīthaḥ | aniruktaḥ prajāpateḥ | niruktaḥ somasya | mṛdu ślakṣṇaṃ vāyoḥ | ślakṣṇaṃ balavad indrasya | krauñcaṃ bṛhaspateḥ | apadhvāntaṃ varuṇasya | tān sarvān evopaseveta | vāruṇaṃ tv eva varjayet || 1 ||

‘मैं पशुओं को देने वाले वृषभ के समान गर्जनशील (उच्च) साम का वरण करता हूँ’ — यह अग्नि का उद्गीथ (गान-शैली) है। अस्पष्ट गान प्रजापति का है, स्पष्ट गान सोम का है, मृदु-कोमल गान वायु का है, कोमल किन्तु सशक्त गान इन्द्र का है, क्रौञ्च-पक्षी जैसा गान बृहस्पति का है, और भग्न-स्वर वाला गान वरुण का है। इनमें से (वारुण को छोड़कर) सबका सेवन करे, किन्तु वारुण-शैली का सर्वथा परित्याग करे।

मंत्र 60

अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् । स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस् तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ।। २ ।।

amṛtatvaṃ devebhya āgāyānīty āgāyet | svadhāṃ pitṛbhya āśāṃ manuṣyebhyas tṛṇodakaṃ paśubhyaḥ svargaṃ lokaṃ yajamānāyānnam ātmana āgāyānīty etāni manasā dhyāyann apramattaḥ stuvīta || 2 ||

‘मैं देवों के लिए अमृतत्व का गान करूँ’ — ऐसा (सोचकर) गाए; ‘पितरों के लिए स्वधा, मनुष्यों के लिए आशा-पूर्ति, पशुओं के लिए घास और जल, यजमान के लिए स्वर्गलोक, और अपने लिए अन्न का गान करूँ’ — इन सबको मन में ध्यान करते हुए, सावधान रहकर स्तुति करे।

मंत्र 61

सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः । सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरात्मानः । सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानः । तं यदि स्वरेषूपालभेत । इन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ।। ३ ।।

sarve svarā indrasyātmānaḥ | sarva ūṣmāṇaḥ prajāpater ātmānaḥ | sarve sparśā mṛtyor ātmānaḥ | taṃ yadi svareṣūpālabheta | indraṃ śaraṇaṃ prapanno 'bhūvaṃ sa tvā prati vakṣyatīty enaṃ brūyāt || 3 ||

सभी स्वर (अच्) इन्द्र के आत्मरूप हैं; सभी ऊष्म वर्ण (श, ष, स, ह) प्रजापति के आत्मरूप हैं; सभी स्पर्श वर्ण (क् से म् तक) मृत्यु के आत्मरूप हैं। यदि कोई उसके स्वरों में दोष निकाले, तो वह कहे — ‘मैं इन्द्र की शरण में गया हूँ, वही तुझे उत्तर देगा।’

मंत्र 62

अथ यद्येनमूष्मासूपालभेत । प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत । मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ।। ४ ।।

atha yady enam ūṣmāsūpālabheta | prajāpatiṃ śaraṇaṃ prapanno 'bhūvaṃ sa tvā prati pekṣyatīty enaṃ brūyāt | atha yady enaṃ sparśeṣūpālabheta | mṛtyuṃ śaraṇaṃ prapanno 'bhūvaṃ sa tvā prati dhakṣyatīty enaṃ brūyāt || 4 ||

और यदि कोई उसके ऊष्म वर्णों में दोष निकाले, तो वह कहे — ‘मैं प्रजापति की शरण में गया हूँ, वही तुझे कुचल देगा।’ और यदि कोई उसके स्पर्श वर्णों में दोष निकाले, तो वह कहे — ‘मैं मृत्यु की शरण में गया हूँ, वही तुझे भस्म कर देगा।’

मंत्र 63

सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति । सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति । सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ।। ५ ।।

sarve svarā ghoṣavanto balavanto vaktavyā indre balaṃ dadānīti | sarva ūṣmāṇo 'grastā anirastā vivṛtā vaktavyāḥ prajāpater ātmānaṃ paridadānīti | sarve sparśā leśenānabhinihitā vaktavyā mṛtyor ātmānaṃ pariharāṇīti || 5 ||

सभी स्वर घोषयुक्त और बलपूर्वक इस भाव से बोलने चाहिए — ‘मैं इन्द्र को बल दूँ।’ सभी ऊष्म वर्ण न ग्रस्त, न निरस्त, बल्कि विवृत (खुले) रूप में इस भाव से बोलने चाहिए — ‘मैं प्रजापति को अपना आत्मा सौंपूँ।’ सभी स्पर्श वर्ण हलके स्पर्श से, बिना दूसरे वर्ण में मिलाए इस भाव से बोलने चाहिए — ‘मैं मृत्यु से अपने आत्मा को बचाऊँ।’

मंत्र 64

त्रयो धर्मस्कन्धाः । यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः । तप एव द्वितीयः । ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति । ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ।। १ ।।

trayo dharmaskandhāḥ | yajño 'dhyayanaṃ dānam iti prathamaḥ | tapa eva dvitīyaḥ | brahmacāryācāryakulavāsī tṛtīyo 'tyantam ātmānam ācāryakule 'vasādayan | sarva ete puṇyalokā bhavanti | brahmasaṃstho 'mṛtatvam eti || 1 ||

धर्म के तीन स्कन्ध (शाखाएँ) हैं। यज्ञ, अध्ययन और दान — यह पहला है। तप ही दूसरा है। आचार्य-कुल में निवास करने वाला ब्रह्मचारी, जो अपने को आजीवन आचार्य-कुल में समर्पित रखता है — यह तीसरा है। ये सब पुण्यलोकों को प्राप्त करते हैं; किन्तु जो ब्रह्म में स्थित है, वही अमृतत्व को प्राप्त करता है।

मंत्र 65

प्रजापतिर् लोकानभ्यतपत् । तेभ्योऽभितप्तेभ्यस् त्रयी विद्या संप्रास्रवत् । तामभ्यतपत् । तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर् भुवः स्वरिति ।। २ ।।

prajāpatir lokān abhyatapat | tebhyo 'bhitaptebhyas trayī vidyā saṃprāsravat | tām abhyatapat | tasyā abhitaptāyā etāny akṣarāṇi saṃprāsravanta bhūr bhuvaḥ svar iti || 2 ||

प्रजापति ने लोकों पर तप किया; उन तपे हुए लोकों से तीन विद्याएँ (तीनों वेद) प्रकट हुईं। उसने इन विद्याओं पर तप किया; उन तपी हुई विद्याओं से ये अक्षर — ‘भूः, भुवः, स्वः’ — प्रकट हुए।

मंत्र 66

तान्यभ्यतपत् । तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओंकारः संप्रास्रवत् । तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् संतृण्णा । ओंकार एवेदं सर्वमोंकार एव इदं सर्वम् ।। ३ ।।

tāny abhyatapat | tebhyo 'bhitaptebhya oṃkāraḥ saṃprāsravat | tad yathā śaṅkunā sarvāṇi parṇāni saṃtṛṇṇāny evam oṃkāreṇa sarvā vāk saṃtṛṇṇā | oṃkāra evedaṃ sarvam oṃkāra eva idaṃ sarvam || 3 ||

उसने इन (व्याहृतियों) पर तप किया; उन तपी हुई अक्षरों से ओंकार प्रकट हुआ। जैसे सारे पत्ते एक शंकु (कील) से पिरो दिए जाते हैं, वैसे ही सारी वाणी ओंकार से पिरोई हुई है। यह सब ओंकार ही है, यह सब ओंकार ही है।

मंत्र 67

ब्रह्मवादिनो वदन्ति । यद् वसूनां प्रातःसवनम् । रुद्राणां माध्यंदिनं सवनम् । आदित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ।। १ ।।

brahmavādino vadanti | yad vasūnāṃ prātaḥsavanam | rudrāṇāṃ mādhyaṃdinaṃ savanam | ādityānāṃ ca viśveṣāṃ ca devānāṃ tṛtīyasavanam || 1 ||

ब्रह्मवेत्ता कहते हैं — वसुओं का प्रातःसवन है, रुद्रों का माध्यन्दिन सवन है, और आदित्यों तथा विश्वेदेवों का तृतीय सवन है।

मंत्र 68

क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति । स यस् तं न विद्यात् कथं कुर्यात् । अथ विद्वान् कुर्यात् ।। २ ।।

kva tarhi yajamānasya loka iti | sa yas taṃ na vidyāt kathaṃ kuryāt | atha vidvān kuryāt || 2 ||

तो फिर यजमान का लोक कहाँ है? जो इसे नहीं जानता, वह (यज्ञ) कैसे करे? इसलिए जानकर ही (यज्ञ) करे।

मंत्र 69

पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज् जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति ।। ३ ।।

purā prātaranuvākasyopākaraṇāj jaghanena gārhapatyasyodaṅmukha upaviśya sa vāsavaṃ sāmābhigāyati || 3 ||

प्रातरनुवाक के आरम्भ से पहले, यजमान गार्हपत्य अग्नि के पीछे उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाता है और वासव (वसुदेवता का) साम गाता है।

मंत्र 70

लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ । पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु ३ मा ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ।। ४ ।।

lo 3 kadvāram apāvā 3 rṇū 33 | paśyema tvā vayaṃ rā 33333 hu 3 m ā 33 jyā 3 yo 3 ā 32111 iti || 4 ||

‘हे अग्नि, लोक का द्वार खोल दो, जिससे हम तुझे राज्य (पृथिवीलोक) की प्राप्ति के लिए देख सकें’ — इस प्रकार वह (प्रलम्बित स्वरों में) गाता है।

मंत्र 71

अथ जुहोति । नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते । लोकं मे यजमानाय विन्द । एष वै यजमानस्य लोकः । एता अस्मि ।। ५ ।।

atha juhoti | namo 'gnaye pṛthivīkṣite lokakṣite | lokaṃ me yajamānāya vinda | eṣa vai yajamānasya lokaḥ | etā asmi || 5 ||

फिर वह आहुति देता है — ‘पृथिवी में निवास करने वाले, लोक में निवास करने वाले अग्नि को नमस्कार। मुझ यजमान के लिए लोक प्राप्त करा दो। यही यजमान का लोक है; मैं (मरण के पश्चात्) इसी में जाऊँगा।’

मंत्र 72

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहा । अपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति । तस्मै वसवः प्रातःसवनं संप्रयच्छन्ति ।। ६ ।।

atra yajamānaḥ parastād āyuṣaḥ svāhā | apajahi parigham ity uktvottiṣṭhati | tasmai vasavaḥ prātaḥsavanaṃ saṃprayacchanti || 6 ||

‘यजमान यहाँ आयु के पार (मरण के पश्चात्) जाएगा, स्वाहा। द्वार की अर्गला हटा दो’ — ऐसा कहकर वह उठ खड़ा होता है। तब वसुगण उसे प्रातःसवन (का फल-लोक) प्रदान करते हैं।

मंत्र 73

पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज् जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति ।। ७ ।।

purā mādhyandinasya savanasyopākaraṇāj jaghanenāgnīdhrīyasyodaṅmukha upaviśya sa raudraṃ sāmābhigāyati || 7 ||

माध्यन्दिन सवन के आरम्भ से पहले, यजमान आग्नीध्रीय अग्नि के पीछे उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाता है और रौद्र (रुद्रदेवता का) साम गाता है।

मंत्र 74

लो ३ कद्वारमपावार् ३ णू ३३ । पश्येम त्वा वयं वैरा ३३३३३ हु ३ मा ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ।। ८ ।।

lo 3 kadvāramapāvār 3 ṇū 33 | paśyema tvā vayaṃ vairā 33333 hu 3 m ā 33 jyā 3 yo 3 ā 32111 iti || 8 ||

‘लोक का द्वार खोल दो, जिससे हम तुझे वैराज्य (अन्तरिक्षलोक) की प्राप्ति के लिए देख सकें’ — इस प्रकार वह (प्रलम्बित स्वरों में) गाता है।

मंत्र 75

अथ जुहोति । नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते । लोकं मे यजमानाय विन्द । एष वै यजमानस्य लोकः । एतास्मि ।। ९ ।।

atha juhoti | namo vāyave 'ntarikṣakṣite lokakṣite | lokaṃ me yajamānāya vinda | eṣa vai yajamānasya lokaḥ | etāsmi || 9 ||

फिर वह आहुति देता है — ‘अन्तरिक्ष में निवास करने वाले, लोक में निवास करने वाले वायु को नमस्कार। मुझ यजमान के लिए लोक प्राप्त करा दो। यही यजमान का लोक है; मैं इसी में जाऊँगा।’

मंत्र 76

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहा । अपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति । तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं संप्रयच्छन्ति ।। १० ।।

atra yajamānaḥ parastād āyuṣaḥ svāhā | apajahi parigham ity uktvottiṣṭhati | tasmai rudrā mādhyandinaṃ savanaṃ saṃprayacchanti || 10 ||

‘यजमान यहाँ आयु के पार जाएगा, स्वाहा। द्वार की अर्गला हटा दो’ — ऐसा कहकर वह उठ खड़ा होता है। तब रुद्रगण उसे माध्यन्दिन सवन (का फल-लोक) प्रदान करते हैं।

मंत्र 77

पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज् जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति ।। ११ ।।

purā tṛtīyasavanasyopākaraṇāj jaghanenāhavanīyasyodaṅmukha upaviśya sa ādityaṃ sa vaiśvadevaṃ sāmābhigāyati || 11 ||

तृतीय सवन के आरम्भ से पहले, यजमान आहवनीय अग्नि के पीछे उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाता है और आदित्य तथा वैश्वदेव साम गाता है।

मंत्र 78

लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू३३ । पश्येम त्वा वयं स्वारा ३३३३३ हु३मा ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इत्यादित्यम् ।। १२ ।।

lo 3 kadvāramapāvā 3 rṇū33 | paśyema tvā vayaṃ svārā 33333 hu3m ā 33 jyā 3 yo 3 ā 32111 ity ādityam || 12 ||

‘लोक का द्वार खोल दो, जिससे हम तुझे स्वाराज्य (द्युलोक) की प्राप्ति के लिए देख सकें’ — इस प्रकार वह आदित्य साम गाता है।

मंत्र 79

अथ वैश्वदेवम् । लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ । पश्येम त्वा वयं साम्रा ३३३३३ हु३मा ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ।। १३ ।।

atha vaiśvadevam | lo3kadvāramapāvā3rṇū33 | paśyema tvā vayaṃ sāmrā 33333 hu3m ā 33 jyā 3 yo 3 ā 32111 iti || 13 ||

अब वैश्वदेव साम — ‘लोक का द्वार खोल दो, जिससे हम तुझे साम्राज्य (सर्वाधिपत्य) की प्राप्ति के लिए देख सकें’ — इस प्रकार वह गाता है।

मंत्र 80

अथ जुहोति । नम आदित्येभ्यश् च विश्वेभ्यश् च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यः । लोकं मे यजमानाय विन्दत ।। १४ ।।

atha juhoti | nama ādityebhyaś ca viśvebhyaś ca devebhyo divikṣidbhyo lokakṣidbhyaḥ | lokaṃ me yajamānāya vindata || 14 ||

फिर वह आहुति देता है — ‘द्युलोक में निवास करने वाले, लोक में निवास करने वाले आदित्यों और विश्वेदेवों को नमस्कार। मुझ यजमान के लिए लोक प्राप्त करा दो।’

मंत्र 81

एष वै यजमानस्य लोकः । एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहा । अपहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ।। १५ ।।

eṣa vai yajamānasya lokaḥ | etāsmy atra yajamānaḥ parastād āyuṣaḥ svāhā | apahata parigham ity uktvottiṣṭhati || 15 ||

‘यही यजमान का लोक है; मैं इसी में जाऊँगा। यजमान यहाँ आयु के पार जाएगा, स्वाहा। द्वार की अर्गला हटा दो’ — ऐसा कहकर वह उठ खड़ा होता है।

मंत्र 82

तस्मा आदित्याश् च विश्वे च देवास् तृतीयसवनं संप्रयच्छन्ति । एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ।। १६ ।।

tasmā ādityāś ca viśve ca devās tṛtīyasavanaṃ saṃprayacchanti | eṣa ha vai yajñasya mātrāṃ veda ya evaṃ veda ya evaṃ veda || 16 ||

तब आदित्य और विश्वेदेव उसे तृतीय सवन (का फल-लोक) प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, वही यज्ञ के यथार्थ मान (स्वरूप) को जानता है — जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है।

तृतीय प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ।। १ ।।

asau vā ādityo devamadhu tasya dyaureva tiraścīnavaṃśo’ntarikṣamapūpo marīcayaḥ putrāḥ

वह सूर्य ही देवताओं का मधु है। द्युलोक उसका आड़ा टेका (छत्ते को टाँगने वाला बाँस) है, अन्तरिक्ष मधु का छत्ता है, और उसकी किरणें मानो मधुमक्खियों के बच्चे हैं।

मंत्र 2

तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः । ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ।। २ ।।

tasya ye prāñco raśmayastā evāsya prācyo madhunāḍyaḥ | ṛca eva madhukṛta ṛgveda eva puṣpaṃ tā amṛtā āpastā vā etā ṛcaḥ

उस सूर्य की जो पूर्व की ओर जाने वाली किरणें हैं, वे ही उसकी पूर्व दिशा की मधु-नाड़ियाँ (छत्ते के कोष) हैं। ऋचाएँ ही मधुमक्खियाँ हैं, ऋग्वेद ही पुष्प है, और वे (ऋचाएँ) ही अमृतमय जल हैं — ये ही वे ऋचाएँ हैं।

मंत्र 3

एतमृग्वेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ।। ३ ।।

etamṛgvedamabhyatapaṃstasyābhitaptasya yaśasteja indriyaṃ vīryamannādyaṃ raso’jāyata

उन ऋचाओं ने इस ऋग्वेद को (मानो) तपाया; और इस प्रकार तपाये गये उसमें से यश, तेज, इन्द्रियबल, वीर्य और अन्न-रूप रस प्रकट हुआ।

मंत्र 4

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितं रूपम् ।। ४ ।।

tadvyakṣarattadādityamabhito’śrayattadvā etadyadetadādityasya rohitaṃ rūpam

वह रस बह निकला और सूर्य के चारों ओर जा टिका। यही सूर्य का जो रक्तवर्ण (लाल) रूप है, वही यह है।

मंत्र 5

अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृत आपः ।। १ ।।

atha ye’sya dakṣiṇā raśmayastā evāsya dakṣiṇā madhunāḍyo yajūṃṣyeva madhukṛto yajurveda eva puṣpaṃ tā amṛta āpaḥ

फिर उसकी जो दक्षिण की ओर की किरणें हैं, वे ही उसकी दक्षिण दिशा की मधु-नाड़ियाँ हैं। यजुष् (यजुर्मन्त्र) ही मधुमक्खियाँ हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है, और वे ही अमृतमय जल हैं।

मंत्र 6

तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोजायत ।। २ ।।

tāni vā etāni yajūṃṣyetaṃ yajurvedamabhyatapaṃstasyābhitaptasya yaśasteja indriyaṃ vīryamannādyaṃ rasojāyata

उन यजुष् मन्त्रों ने इस यजुर्वेद को तपाया; और इस प्रकार तपाये गये उसमें से यश, तेज, इन्द्रियबल, वीर्य और अन्न-रूप रस प्रकट हुआ।

मंत्र 7

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ।। ३ ।।

tadvyakṣarattadādityamabhito’śrayattadvā etadyadetadādityasya śuklaṃ rūpam

वह रस बह निकला और सूर्य के चारों ओर जा टिका। यही सूर्य का जो शुक्ल (श्वेत) रूप है, वही यह है।

मंत्र 8

अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ।। १ ।।

atha ye’sya pratyañco raśmayastā evāsya pratīcyo madhunāḍyaḥ sāmānyeva madhukṛtaḥ sāmaveda eva puṣpaṃ tā amṛtā āpaḥ

फिर उसकी जो पश्चिम की ओर की किरणें हैं, वे ही उसकी पश्चिम दिशा की मधु-नाड़ियाँ हैं। सामगान ही मधुमक्खियाँ हैं, सामवेद ही पुष्प है, और वे ही अमृतमय जल हैं।

मंत्र 9

तानि वा एतानि सामान्येतं सामवेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ।। २ ।।

tāni vā etāni sāmānyetaṃ sāmavedamabhyatapaṃstasyābhitaptasya yaśasteja indriyaṃ vīryamannādyaṃ raso’jāyata

उन सामों ने इस सामवेद को तपाया; और इस प्रकार तपाये गये उसमें से यश, तेज, इन्द्रियबल, वीर्य और अन्न-रूप रस प्रकट हुआ।

मंत्र 10

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णं रूपम् ।। ३ ।।

tadvyakṣarattadādityamabhito’śrayattadvā etadyadetadādityasya kṛṣṇaṃ rūpam

वह रस बह निकला और सूर्य के चारों ओर जा टिका। यही सूर्य का जो कृष्ण (श्याम) रूप है, वही यह है।

मंत्र 11

अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ।। १ ।।

atha ye’syodañco raśmayastā evāsyodīcyo madhunāḍyo’tharvāṅgirasa eva madhukṛta itihāsapurāṇaṃ puṣpaṃ tā amṛtā āpaḥ

फिर उसकी जो उत्तर की ओर की किरणें हैं, वे ही उसकी उत्तर दिशा की मधु-नाड़ियाँ हैं। अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद के मन्त्र) ही मधुमक्खियाँ हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प है, और वे ही अमृतमय जल हैं।

मंत्र 12

ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ।। २ ।।

te vā ete’tharvāṅgirasa etaditihāsapurāṇamabhyatapaṃstasyābhitaptasya yaśasteja indriyaṃ vīryamannādyaṃ raso’jāyata

उन अथर्वाङ्गिरस मन्त्रों ने इस इतिहास-पुराण को तपाया; और इस प्रकार तपाये गये उसमें से यश, तेज, इन्द्रियबल, वीर्य और अन्न-रूप रस प्रकट हुआ।

मंत्र 13

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ।। ३ ।।

tadvyakṣarattadādityamabhito’śrayattadvā etadyadetadādityasya paraṃ kṛṣṇaṃ rūpam

वह रस बह निकला और सूर्य के चारों ओर जा टिका। यही सूर्य का जो परम कृष्ण (अत्यन्त गहरा श्याम) रूप है, वही यह है।

मंत्र 14

अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ।। १ ।।

atha ye’syordhvā raśmayastā evāsyordhvā madhunāḍyo guhyā evādeśā madhukṛto brahmaiva puṣpaṃ tā amṛtā āpaḥ

फिर उसकी जो ऊपर की ओर की किरणें हैं, वे ही उसकी ऊर्ध्व मधु-नाड़ियाँ हैं। गुप्त उपदेश (उपनिषदें) ही मधुमक्खियाँ हैं, ब्रह्म ही पुष्प है, और वे ही अमृतमय जल हैं।

मंत्र 15

ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ।। २ ।।

te vā ete guhyā ādeśā etadbrahmābhyatapaṃstasyābhitaptasya yaśasteja indriyaṃ vīryamannādyaṃ raso’jāyata

उन गुप्त उपदेशों ने इस ब्रह्म को तपाया; और इस प्रकार तपाये गये उसमें से यश, तेज, इन्द्रियबल, वीर्य और अन्न-रूप रस प्रकट हुआ।

मंत्र 16

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ।। ३ ।।

tadvyakṣarattadādityamabhito’śrayattadvā etadyadetadādityasya madhye kṣobhata iva

वह रस बह निकला और सूर्य के चारों ओर जा टिका। यही वह है जो सूर्य के मध्य में मानो कम्पित-सा (क्षुब्ध-सा) प्रतीत होता है।

मंत्र 17

ते वा एते रसानां रसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ।। ४ ।।

te vā ete rasānāṃ rasā vedā hi rasāsteṣāmete rasāstāni vā etānyamṛtānāmamṛtāni vedā hyamṛtāsteṣāmetānyamṛtāni

ये (गुह्य उपदेश) रसों के भी रस हैं; क्योंकि वेद रस हैं और ये उनके रस हैं। ये अमृतों के भी अमृत हैं; क्योंकि वेद अमृत हैं और ये उनके अमृत हैं।

मंत्र 18

तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।। १ ।।

tadyatprathamamamṛtaṃ tadvasava upajīvantyagninā mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

जो वह पहला अमृत (सूर्य का रक्त रूप) है, उसे वसुगण अग्नि को मुख बनाकर उपजीवित करते हैं। देवता न तो खाते हैं और न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।

मंत्र 19

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ।। २ ।।

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

वे इसी (रक्त) रूप में प्रवेश करते हैं और उसी रूप से पुनः बाहर उदित होते हैं।

मंत्र 20

स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ।। ३ ।।

sa ya etadevamamṛtaṃ veda vasūnāmevaiko bhūtvāgninaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa ya etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

जो इस अमृत को इस प्रकार जानता है, वह वसुओं में से एक होकर, अग्नि को ही मुख बनाकर, इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाता है; वह इसी रूप में प्रवेश करता है और उसी रूप से पुनः उदित होता है।

मंत्र 21

स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ।। ४ ।।

sa yāvadādityaḥ purastādudetā paścādastametā vasūnāmeva tāvadādhipatyaṃ svārājyaṃ paryetā

जब तक सूर्य पूर्व में उदित और पश्चिम में अस्त होता रहता है, तब तक वह वसुओं के आधिपत्य और स्वराज्य को प्राप्त करता रहता है।

मंत्र 22

अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।। १ ।।

atha yaddvitīyamamṛtaṃ tadrudrā upajīvantīndreṇa mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

फिर जो वह दूसरा अमृत (श्वेत रूप) है, उसे रुद्रगण इन्द्र को मुख बनाकर उपजीवित करते हैं। देवता न खाते हैं न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।

मंत्र 23

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ।। २ ।।

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

वे इसी रूप में प्रवेश करते हैं और उसी रूप से पुनः उदित होते हैं।

मंत्र 24

स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ।। ३ ।।

sa ya etadevamamṛtaṃ veda rudrāṇāmevaiko bhūtvendreṇaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

जो इस अमृत को इस प्रकार जानता है, वह रुद्रों में से एक होकर, इन्द्र को ही मुख बनाकर, इस अमृत को देखकर ही तृप्त होता है; वह इसी रूप में प्रवेश करता है और उसी रूप से पुनः उदित होता है।

मंत्र 25

स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ।। ४ ।।

sa yāvadādityaḥ purastādudetā paścādastametā dvistāvaddakṣiṇata udetottarato’stametā rudrāṇāmeva tāvadādhipatyaṃ svārājyaṃ paryetā

जब तक सूर्य पूर्व में उदित और पश्चिम में अस्त होता है, तथा उससे दुगने काल तक दक्षिण में उदित और उत्तर में अस्त होता है, तब तक वह रुद्रों के आधिपत्य और स्वराज्य को प्राप्त करता है।

मंत्र 26

अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।। १ ।।

atha yattṛtīyamamṛtaṃ tadādityā upajīvanti varuṇena mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

फिर जो वह तीसरा अमृत (कृष्ण रूप) है, उसे आदित्यगण वरुण को मुख बनाकर उपजीवित करते हैं। देवता न खाते हैं न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।

मंत्र 27

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ।। २ ।।

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

वे इसी रूप में प्रवेश करते हैं और उसी रूप से पुनः उदित होते हैं।

मंत्र 28

स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ।। ३ ।।

sa ya etadevamamṛtaṃ vedādityānāmevaiko bhūtvā varuṇenaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

जो इस अमृत को इस प्रकार जानता है, वह आदित्यों में से एक होकर, वरुण को ही मुख बनाकर, इस अमृत को देखकर ही तृप्त होता है; वह इसी रूप में प्रवेश करता है और उसी रूप से पुनः उदित होता है।

मंत्र 29

स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ।। ४ ।।

sa yāvadādityo dakṣiṇata udetottarato’stametā dvistāvatpaścādudetā purastādastametādityānāmeva tāvadādhipatyaṃ svārājyaṃ paryetā

जब तक सूर्य दक्षिण में उदित और उत्तर में अस्त होता है, तथा उससे दुगने काल तक पश्चिम में उदित और पूर्व में अस्त होता है, तब तक वह आदित्यों के आधिपत्य और स्वराज्य को प्राप्त करता है।

मंत्र 30

अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।। १ ।।

atha yaccaturthamamṛtaṃ tanmaruta upajīvanti somena mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

फिर जो वह चौथा अमृत (परम कृष्ण रूप) है, उसे मरुद्गण सोम को मुख बनाकर उपजीवित करते हैं। देवता न खाते हैं न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।

मंत्र 31

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ।। २ ।।

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

वे इसी रूप में प्रवेश करते हैं और उसी रूप से पुनः उदित होते हैं।

मंत्र 32

स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ।। ३ ।।

sa ya etadevamamṛtaṃ veda marutāmevaiko bhūtvā somenaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

जो इस अमृत को इस प्रकार जानता है, वह मरुतों में से एक होकर, सोम को ही मुख बनाकर, इस अमृत को देखकर ही तृप्त होता है; वह इसी रूप में प्रवेश करता है और उसी रूप से पुनः उदित होता है।

मंत्र 33

स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ।। ४ ।।

sa yāvadādityaḥ paścādudetā purastādastametā dvistāvaduttarata udetā dakṣiṇato’stametā marutāmeva tāvadādhipatyaṃ svārājyaṃ paryetā

जब तक सूर्य पश्चिम में उदित और पूर्व में अस्त होता है, तथा उससे दुगने काल तक उत्तर में उदित और दक्षिण में अस्त होता है, तब तक वह मरुतों के आधिपत्य और स्वराज्य को प्राप्त करता है।

मंत्र 34

अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।। १ ।।

atha yatpañcamamamṛtaṃ tatsādhyā upajīvanti brahmaṇā mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

फिर जो वह पाँचवाँ अमृत है, उसे साध्यगण ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ) को मुख बनाकर उपजीवित करते हैं। देवता न खाते हैं न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।

मंत्र 35

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ।। २ ।।

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

वे इसी रूप में प्रवेश करते हैं और उसी रूप से पुनः उदित होते हैं।

मंत्र 36

स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ।। ३ ।।

sa ya etadevamamṛtaṃ veda sādhyānāmevaiko bhūtvā brahmaṇaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

जो इस अमृत को इस प्रकार जानता है, वह साध्यों में से एक होकर, ब्रह्मा को ही मुख बनाकर, इस अमृत को देखकर ही तृप्त होता है; वह इसी रूप में प्रवेश करता है और उसी रूप से पुनः उदित होता है।

मंत्र 37

स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वमुदेतार्वागस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ।। ४ ।।

sa yāvadāditya uttarata udetā dakṣiṇato’stametā dvistāvadūrdhvamudetārvāgastametā sādhyānāmeva tāvadādhipatyaṃ svārājyaṃ paryetā

जब तक सूर्य उत्तर में उदित और दक्षिण में अस्त होता है, तथा उससे दुगने काल तक ऊपर उदित और नीचे अस्त होता है, तब तक वह साध्यों के आधिपत्य और स्वराज्य को प्राप्त करता है।

मंत्र 38

अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ।। १ ।।

atha tata ūrdhva udetya naivodetā nāstametaikala eva madhye sthātā tadeṣa ślokaḥ

फिर उसके पश्चात् ऊपर उदित होकर वह न तो उदित होगा और न अस्त होगा; वह अकेला ही मध्य में स्थिर रहेगा। इस विषय में यह श्लोक है —

मंत्र 39

न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ।। २ ।।

na vai tatra na nimlocha nodiyāya kadācana | devāstenāhaṃ satyena mā virādhiṣi brahmaṇeti

वहाँ (ब्रह्मलोक में) वह कभी न अस्त हुआ और न उदित हुआ। हे देवताओ, इस सत्य से मैं ब्रह्म से विच्युत न होऊँ।

मंत्र 40

न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ।। ३ ।।

na ha vā asmā udeti na nimlochati sakṛddivā haivāsmai bhavati ya etāmevaṃ brahmopaniṣadaṃ veda

जो इस प्रकार इस ब्रह्म-उपनिषद् (गुह्य ज्ञान) को जानता है, उसके लिए वह (सूर्य) न उदित होता है और न अस्त होता है; उसके लिए तो सदा एक ही दिन रहता है।

मंत्र 41

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ।। ४ ।।

taddhaitadbrahmā prajāpataya uvāca prajāpatirmanave manuḥ prajābhyastaddhaitaduddālakāyāruṇaye jyeṣṭhāya putrāya pitā brahma provāca

यह ज्ञान ब्रह्मा ने प्रजापति से कहा, प्रजापति ने मनु से, और मनु ने अपनी प्रजा से कहा। तथा यही ब्रह्म-ज्ञान पिता (आरुणि) ने अपने ज्येष्ठ पुत्र उद्दालक को कहा।

मंत्र 42

इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्प्रणाय्याय वान्तेवासिने ।। ५ ।।

idaṃ vāva tajjyeṣṭhāya putrāya pitā brahma prabrūyātpraṇāyyāya vāntevāsine

पिता को यह ब्रह्म-ज्ञान केवल अपने ज्येष्ठ पुत्र को, अथवा किसी योग्य अन्तेवासी (शिष्य) को ही बताना चाहिए।

मंत्र 43

नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ।। ६ ।।

nānyasmai kasmaicana yadyapyasmā imāmadbhiḥ parigṛhītāṃ dhanasya pūrṇāṃ dadyādetadeva tato bhūya ityetadeva tato bhūya iti

किसी अन्य को नहीं, चाहे वह उसे जल से घिरी हुई और धन से भरी यह समस्त पृथ्वी ही क्यों न दे दे; क्योंकि यह ज्ञान उस सबसे भी अधिक है — यह उससे भी अधिक है।

मंत्र 44

गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ।। १ ।।

gāyatrī vā idaṃ sarvaṃ bhūtaṃ yadidaṃ kiṃ ca vāgvai gāyatrī vāgvā idaṃ sarvaṃ bhūtaṃ gāyati ca trāyate ca

गायत्री ही यह सब कुछ है — जो कुछ भी यह प्रकट भूत (सृष्टि) है। वाणी ही गायत्री है; क्योंकि वाणी इस समस्त उत्पन्न जगत् का गान करती है और उसकी रक्षा (त्राण) करती है।

मंत्र 45

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते ।। २ ।।

yā vai sā gāyatrīyaṃ vāva sā yeyaṃ pṛthivyasyāṃ hīdaṃ sarvaṃ bhūtaṃ pratiṣṭhitametāmeva nātiśīyate

जो वह गायत्री है, वही यह पृथ्वी है; क्योंकि इसी (पृथ्वी) पर यह सब भूत प्रतिष्ठित है, और वह इससे आगे नहीं जाता।

मंत्र 46

या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ।। ३ ।।

yā vai sā pṛthivīyaṃ vāva sā yadidamasminpuruṣe śarīramasminhīme prāṇāḥ pratiṣṭhitā etadeva nātiśīyante

जो वह पृथ्वी है, वही यह पुरुष (मनुष्य) में यह शरीर है; क्योंकि इसी (शरीर) में ये प्राण प्रतिष्ठित हैं, और वे इससे आगे नहीं जाते।

मंत्र 47

यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ।। ४ ।।

yadvai tatpuruṣe śarīramidaṃ vāva tadyadidamasminnantaḥ puruṣe hṛdayamasminhīme prāṇāḥ pratiṣṭhitā etadeva nātiśīyante

जो पुरुष में यह शरीर है, वही यह पुरुष के भीतर का हृदय है; क्योंकि इसी (हृदय) में ये प्राण प्रतिष्ठित हैं, और वे इससे आगे नहीं जाते।

मंत्र 48

सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तम् ।। ५ ।।

saiṣā catuṣpadā ṣaḍvidhā gāyatrī tadetadṛcābhyanūktam

यह गायत्री चार चरणों वाली और छह प्रकार की है। यही बात एक ऋचा के द्वारा कही गई है —

मंत्र 49

तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ।। ६ ।।

tāvānasya mahimā tato jyāyāṃśca pūruṣaḥ | pādo’sya sarvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṃ divīti

इतनी ही इसकी महिमा है, और इससे भी बढ़कर वह पुरुष है। समस्त भूत इसका एक चरण मात्र हैं; इसके तीन चरण अमृतमय होकर द्युलोक में स्थित हैं।

मंत्र 50

यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ।। ७ ।।

yadvai tadbrahmetīdaṃ vāva tadyoyaṃ bahirdhā puruṣādākāśo yo vai sa bahirdhā puruṣādākāśaḥ

जिसे ब्रह्म कहा जाता है, वह यही है जो पुरुष के बाहर का आकाश है। और जो पुरुष के बाहर का आकाश है —

मंत्र 51

अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः ।। ८ ।।

ayaṃ vāva sa yo’yamantaḥ puruṣa ākāśo yo vai so’ntaḥ puruṣa ākāśaḥ

वही यह है जो पुरुष के भीतर का आकाश है। और जो पुरुष के भीतर का आकाश है —

मंत्र 52

अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णमप्रवर्तिनीं श्रियं लभते य एवं वेद ।। ९ ।।

ayaṃ vāva sa yo’yamantarhṛdaya ākāśastadetatpūrṇamapravarti pūrṇamapravartinīṃ śriyaṃ labhate ya evaṃ veda

वही यह है जो हृदय के भीतर का आकाश है। यह पूर्ण और अपरिवर्तनशील है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह पूर्ण और अविनाशी श्री (सम्पत्ति) प्राप्त करता है।

मंत्र 53

तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ।। १ ।।

tasya ha vā etasya hṛdayasya pañca devasuṣayaḥ sa yo’sya prāṅsuṣiḥ sa prāṇastaccakṣuḥ sa ādityastadetattejo’nnādyamityupāsīta tejasvyannādo bhavati ya evaṃ veda

इस हृदय के पाँच देव-छिद्र हैं। इसका जो पूर्व की ओर का छिद्र है, वह प्राण है, वह चक्षु है, वह आदित्य है। उसकी तेज और अन्न-रूप में उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होता है।

मंत्र 54

अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ।। २ ।।

atha yo’sya dakṣiṇaḥ suṣiḥ sa vyānastacchrotraṃ sa candramāstadetacchrīśca yaśaścetyupāsīta śrīmānyaśasvī bhavati ya evaṃ veda

इसका जो दक्षिण की ओर का छिद्र है, वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है। उसकी श्री और यश के रूप में उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह श्रीमान् और यशस्वी होता है।

मंत्र 55

अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक्सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ।। ३ ।।

atha yo’sya pratyaṅsuṣiḥ so’pānaḥ sā vākso’gnistadetadbrahmavarcasamannādyamityupāsīta brahmavarcasyannādo bhavati ya evaṃ veda

इसका जो पश्चिम की ओर का छिद्र है, वह अपान है, वह वाणी है, वह अग्नि है। उसकी ब्रह्मवर्चस और अन्न-रूप में उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह ब्रह्मवर्चस्वी और अन्न का भोक्ता होता है।

मंत्र 56

अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद ।। ४ ।।

atha yo’syodaṅsuṣiḥ sa samānastanmanaḥ sa parjanyastadetatkīrtiśca vyuṣṭiścetyupāsīta kīrtimānvyuṣṭimānbhavati ya evaṃ veda

इसका जो उत्तर की ओर का छिद्र है, वह समान है, वह मन है, वह पर्जन्य (मेघ) है। उसकी कीर्ति और कान्ति (व्युष्टि) के रूप में उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है।

मंत्र 57

अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ।। ५ ।।

atha yo’syordhvaḥ suṣiḥ sa udānaḥ sa vāyuḥ sa ākāśastadetadojaśca mahaścetyupāsītaujasvī mahasvānbhavati ya evaṃ veda

इसका जो ऊपर की ओर का छिद्र है, वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है। उसकी ओज और महत्त्व के रूप में उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह ओजस्वी और महान् होता है।

मंत्र 58

ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद ।। ६ ।।

te vā ete pañca brahmapuruṣāḥ svargasya lokasya dvārapāḥ sa ya etānevaṃ pañca brahmapuruṣānsvargasya lokasya dvārapānvedāsya kule vīro jāyate pratipadyate svargaṃ lokaṃ ya etānevaṃ pañca brahmapuruṣānsvargasya lokasya dvārapānveda

ये पाँच ब्रह्म-पुरुष स्वर्गलोक के द्वारपाल हैं। जो इन पाँच ब्रह्म-पुरुषों को स्वर्गलोक के द्वारपाल-रूप में इस प्रकार जानता है, उसके कुल में वीर उत्पन्न होता है; और जो इन्हें इस प्रकार जानता है, वह स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।

मंत्र 59

अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ।। ७ ।।

atha yadataḥ paro divo jyotirdīpyate viśvataḥ pṛṣṭheṣu sarvataḥ pṛṣṭheṣvanuttameṣūttameṣu lokeṣvidaṃ vāva tadyadidamasminnantaḥ puruṣe jyotiḥ

अब जो यह ज्योति द्युलोक से परे, सबके ऊपर, सर्वत्र, जिनसे उत्तम और कोई नहीं ऐसे उत्तम लोकों में प्रकाशित होती है, वही यह ज्योति है जो इस पुरुष के भीतर है।

मंत्र 60

तस्यैषा दृष्टिर्यत्रैतदस्मिञ्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ।। ८ ।।

tasyaiṣā dṛṣṭiryatraitadasmiñcharīre saṃsparśenoṣṇimānaṃ vijānāti tasyaiṣā śrutiryatraitatkarṇāvapigṛhya ninadamiva nadathurivāgneriva jvalata upaśṛṇoti tadetaddṛṣṭaṃ ca śrutaṃ cetyupāsīta cakṣuṣyaḥ śruto bhavati ya evaṃ veda ya evaṃ veda

इसका प्रत्यक्ष अनुभव यह है — जब मनुष्य इस शरीर में स्पर्श के द्वारा उष्णता का अनुभव करता है। और इसका श्रवण-अनुभव यह है — जब कोई कानों को बन्द करके भीतर से एक गूँज-सी, गर्जना-सी, जैसे जलती हुई अग्नि की-सी ध्वनि सुनता है। इसकी दृष्ट और श्रुत दोनों रूपों में उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह दर्शनीय और प्रसिद्ध होता है — जो इसे इस प्रकार जानता है।

मंत्र 61

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ।। १ ।।

sarvaṃ khalvidaṃ brahma tajjalāniti śānta upāsīta | atha khalu kratumayaḥ puruṣo yathākraturasmiṁlloke puruṣo bhavati tathetaḥ pretya bhavati sa kratuṃ kurvīta

यह सब कुछ निश्चय ही ब्रह्म है। यह उसी से उत्पन्न होता है, उसी में लीन होता है, और उसी में श्वास लेता है (तज्जलान्) — ऐसा जानकर शान्त-चित्त होकर उपासना करनी चाहिए। मनुष्य संकल्पमय है; इस लोक में जैसा उसका संकल्प होता है, यहाँ से जाने पर वह वैसा ही हो जाता है। इसलिए उसे शुभ संकल्प करना चाहिए।

मंत्र 62

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ।। २ ।।

manomayaḥ prāṇaśarīro bhārūpaḥ satyasaṃkalpa ākāśātmā sarvakarmā sarvakāmaḥ sarvagandhaḥ sarvarasaḥ sarvamidamabhyātto’vākyanādaraḥ

वह (हृदयस्थ आत्मा) मनोमय है, प्राण जिसका शरीर है, ज्योति जिसका रूप है, सत्य जिसका संकल्प है, आकाश जिसका आत्मा है; समस्त कर्म, समस्त काम, समस्त गन्ध, समस्त रस उसी में हैं; वह इस सबको व्याप्त किये हुए है, वाणीरहित और उदासीन (निःस्पृह) है।

मंत्र 63

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ।। ३ ।।

eṣa ma ātmāntarhṛdaye’ṇīyānvrīhervā yavādvā sarṣapādvā śyāmākādvā śyāmākataṇḍulādvaiṣa ma ātmāntarhṛdaye jyāyānpṛthivyā jyāyānantarikṣājjyāyāndivo jyāyānebhyo lokebhyaḥ

यह मेरा हृदय के भीतर स्थित आत्मा चावल के दाने से, जौ से, सरसों से, श्यामाक (सावाँ) से, अथवा श्यामाक के कण से भी छोटा है; और यही मेरा हृदय के भीतर स्थित आत्मा पृथ्वी से बड़ा, अन्तरिक्ष से बड़ा, द्युलोक से बड़ा, इन सब लोकों से भी बड़ा है।

मंत्र 64

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ।। ४ ।।

sarvakarmā sarvakāmaḥ sarvagandhaḥ sarvarasaḥ sarvamidamabhyātto’vākyanādara eṣa ma ātmāntarhṛdaya etadbrahmaitamitaḥ pretyābhisaṃbhavitāsmīti yasya syādaddhā na vicikitsāstīti ha smāha śāṇḍilyaḥ śāṇḍilyaḥ

समस्त कर्म, समस्त काम, समस्त गन्ध, समस्त रस उसी में हैं; वह इस सबको व्याप्त किये हुए, वाणीरहित और उदासीन है — यही मेरा हृदय के भीतर स्थित आत्मा है, यही ब्रह्म है। यहाँ से जाकर मैं इसी में मिल जाऊँगा। जिसे यह निश्चित श्रद्धा हो और कोई संशय न हो (वही इसे प्राप्त करता है) — ऐसा शाण्डिल्य ऋषि ने कहा, शाण्डिल्य ने।

मंत्र 65

अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदं श्रितम् ।। १ ।।

antarikṣodaraḥ kośo bhūmibudhno na jīryati diśo hyasya sraktayo dyaurasyottaraṃ bilaṃ sa eṣa kośo vasudhānastasminviśvamidaṃ śritam

यह (जगत्रूपी) कोश (मंजूषा) — जिसका उदर अन्तरिक्ष है, जिसका तल पृथ्वी है — कभी जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके कोने हैं, द्युलोक इसका ऊपरी मुख है। यह कोश धनों का आधार है; इसी में यह समस्त विश्व टिका हुआ है।

मंत्र 66

तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदंरुदम् ।। २ ।।

tasya prācī digjuhūrnāma sahamānā nāma dakṣiṇā rājñī nāma pratīcī subhūtā nāmodīcī tāsāṃ vāyurvatsaḥ sa ya etamevaṃ vāyuṃ diśāṃ vatsaṃ veda na putrarodaṃ roditi so’hametamevaṃ vāyuṃ diśāṃ vatsaṃ veda mā putrarodaṃrudam

इसकी पूर्व दिशा का नाम जुहू है, दक्षिण का सहमाना, पश्चिम का राज्ञी, और उत्तर का सुभूता। इन दिशाओं का वत्स (बछड़ा) वायु है। जो इस वायु को दिशाओं के वत्स-रूप में इस प्रकार जानता है, वह पुत्रशोक में नहीं रोता। मैं इस वायु को दिशाओं के वत्स-रूप में इस प्रकार जानता हूँ; मैं पुत्रशोक में न रोऊँ।

मंत्र 67

अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनामुनामुना प्राणं प्रपद्येऽमुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपद्येऽमुनामुनामुना स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ।। ३ ।।

ariṣṭaṃ kośaṃ prapadye’munāmunāmunā prāṇaṃ prapadye’munāmunāmunā bhūḥ prapadye’munāmunāmunā bhuvaḥ prapadye’munāmunāmunā svaḥ prapadye’munāmunāmunā

मैं इस अविनाशी कोश की शरण लेता हूँ — अमुक, अमुक, अमुक के साथ। मैं प्राण की शरण लेता हूँ — अमुक, अमुक, अमुक के साथ। मैं भूः की, भुवः की, स्वः की शरण लेता हूँ — अमुक, अमुक, अमुक के साथ। (जिस प्रयोजन के लिए उपासना की जाए, वहाँ उसका नाम कहा जाता है।)

मंत्र 68

स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि ।। ४ ।।

sa yadavocaṃ prāṇaṃ prapadya iti prāṇo vā idaṃ sarvaṃ bhūtaṃ yadidaṃ kiṃca tameva tatprāpatsi

मैंने जो कहा "मैं प्राण की शरण लेता हूँ" — प्राण ही यह समस्त भूत है, जो कुछ भी यह है; उसी की मैंने शरण ली।

मंत्र 69

अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ।। ५ ।।

atha yadavocaṃ bhūḥ prapadya iti pṛthivīṃ prapadye’ntarikṣaṃ prapadye divaṃ prapadya ityeva tadavocam

फिर मैंने जो कहा "मैं भूः की शरण लेता हूँ" — उसका अर्थ यही था कि मैं पृथ्वी की, अन्तरिक्ष की, और द्युलोक की शरण लेता हूँ।

मंत्र 70

अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ।। ६ ।।

atha yadavocaṃ bhuvaḥ prapadya ityagniṃ prapadye vāyuṃ prapadya ādityaṃ prapadya ityeva tadavocam

फिर मैंने जो कहा "मैं भुवः की शरण लेता हूँ" — उसका अर्थ यही था कि मैं अग्नि की, वायु की, और आदित्य की शरण लेता हूँ।

मंत्र 71

अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ।। ७ ।।

atha yadavocaṃsvaḥ prapadya ityṛgvedaṃ prapadye yajurvedaṃ prapadye sāmavedaṃ prapadya ityeva tadavocaṃ tadavocam

फिर मैंने जो कहा "मैं स्वः की शरण लेता हूँ" — उसका अर्थ यही था कि मैं ऋग्वेद की, यजुर्वेद की, और सामवेद की शरण लेता हूँ; यही मैंने कहा, यही मैंने कहा।

मंत्र 72

पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशति वर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदंसर्वं वासयन्ति ।। १ ।।

puruṣo vāva yajñastasya yāni caturviṃśati varṣāṇi tatprātaḥsavanaṃ caturviṃśatyakṣarā gāyatrī gāyatraṃ prātaḥsavanaṃ tadasya vasavo’nvāyattāḥ prāṇā vāva vasava ete hīdaṃsarvaṃ vāsayanti

पुरुष ही यज्ञ है। उसके जो पहले चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातःसवन हैं; गायत्री के चौबीस अक्षर होते हैं, और प्रातःसवन गायत्री से सम्बद्ध है। इस भाग से वसुगण जुड़े हुए हैं। प्राण ही वसु हैं; क्योंकि वे इस सबको बसाते (वासयन्ति) हैं।

मंत्र 73

तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यंदिनंसवनमनुसंतनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ।। २ ।।

taṃ cedetasminvayasi kiṃcidupatapetsa brūyātprāṇā vasava idaṃ me prātaḥsavanaṃ mādhyaṃdinaṃsavanamanusaṃtanuteti māhaṃ prāṇānāṃ vasūnāṃ madhye yajño vilopsīyetyuddhaiva tata etyagado ha bhavati

यदि इस अवस्था में उसे कोई रोग सताए तो वह कहे — "हे प्राणो, हे वसुओ, मेरे इस प्रातःसवन को माध्यन्दिन-सवन तक जोड़ दो; मैं (यज्ञरूप) प्राणों और वसुओं के बीच यज्ञ की भाँति लुप्त न हो जाऊँ।" वह उस (रोग) से उठ जाता है और नीरोग हो जाता है।

मंत्र 74

अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि तन्माध्यंदिनंसवनं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप्त्रैष्टुभं माध्यंदिनंसवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदंसर्वंरोदयन्ति ।। ३ ।।

atha yāni catuścatvāriṃśadvarṣāṇi tanmādhyaṃdinaṃsavanaṃ catuścatvāriṃśadakṣarā triṣṭuptraiṣṭubhaṃ mādhyaṃdinaṃsavanaṃ tadasya rudrā anvāyattāḥ prāṇā vāva rudrā ete hīdaṃsarvaṃrodayanti

फिर जो उसके अगले चवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिन-सवन हैं; त्रिष्टुप् के चवालीस अक्षर होते हैं, और माध्यन्दिन-सवन त्रिष्टुप् से सम्बद्ध है। इस भाग से रुद्रगण जुड़े हुए हैं। प्राण ही रुद्र हैं; क्योंकि वे इस सबको रुलाते (रोदयन्ति) हैं।

मंत्र 75

तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यंदिनंसवनं तृतीयसवनमनुसंतनुतेति माहं प्राणानांरुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ।। ४ ।।

taṃ cedetasminvayasi kiṃcidupatapetsa brūyātprāṇā rudrā idaṃ me mādhyaṃdinaṃsavanaṃ tṛtīyasavanamanusaṃtanuteti māhaṃ prāṇānāṃrudrāṇāṃ madhye yajño vilopsīyetyuddhaiva tata etyagado ha bhavati

यदि इस अवस्था में उसे कोई रोग सताए तो वह कहे — "हे प्राणो, हे रुद्रो, मेरे इस माध्यन्दिन-सवन को तृतीय-सवन तक जोड़ दो; मैं प्राणों और रुद्रों के बीच यज्ञ की भाँति लुप्त न हो जाऊँ।" वह उस (रोग) से उठ जाता है और नीरोग हो जाता है।

मंत्र 76

अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवनमष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदंसर्वमाददते ।। ५ ।।

atha yānyaṣṭācatvāriṃśadvarṣāṇi tattṛtīyasavanamaṣṭācatvāriṃśadakṣarā jagatī jāgataṃ tṛtīyasavanaṃ tadasyādityā anvāyattāḥ prāṇā vāvādityā ete hīdaṃsarvamādadate

फिर जो उसके अगले अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय-सवन हैं; जगती के अड़तालीस अक्षर होते हैं, और तृतीय-सवन जगती से सम्बद्ध है। इस भाग से आदित्यगण जुड़े हुए हैं। प्राण ही आदित्य हैं; क्योंकि वे इस सबको ग्रहण करते (आददते) हैं।

मंत्र 77

तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ।। ६ ।।

taṃ cedetasminvayasi kiṃcidupatapetsa brūyātprāṇā ādityā idaṃ me tṛtīyasavanamāyuranusaṃtanuteti māhaṃ prāṇānāmādityānāṃ madhye yajño vilopsīyetyuddhaiva tata etyagado haiva bhavati

यदि इस अवस्था में उसे कोई रोग सताए तो वह कहे — "हे प्राणो, हे आदित्यो, मेरे इस तृतीय-सवन को पूर्ण आयु तक जोड़ दो; मैं प्राणों और आदित्यों के बीच यज्ञ की भाँति लुप्त न हो जाऊँ।" वह उस (रोग) से उठ जाता है और नीरोग हो ही जाता है।

मंत्र 78

एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ।। ७ ।।

etaddha sma vai tadvidvānāha mahidāsa aitareyaḥ sa kiṃ ma etadupatapasi yo’hamanena na preṣyāmīti sa ha ṣoḍaśaṃ varṣaśatamajīvatpra ha ṣoḍaśaṃ varṣaśataṃ jīvati ya evaṃ veda

यही जानकर महिदास ऐतरेय ने (अपने रोग से) कहा — "तू मुझे क्यों सता रहा है, जबकि मैं इससे मरने वाला नहीं?" वे एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहे। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह एक सौ सोलह वर्ष जीता है।

मंत्र 79

स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ।। १ ।।

sa yadaśiśiṣati yatpipāsati yanna ramate tā asya dīkṣāḥ

मनुष्य जब भूखा रहता है, जब प्यासा रहता है, और जब आमोद-प्रमोद नहीं करता — ये उसकी दीक्षाएँ हैं।

मंत्र 80

अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ।। २ ।।

atha yadaśnāti yatpibati yadramate tadupasadaireti

फिर जब वह खाता है, पीता है और आमोद करता है — तब वह उपसद्-कर्मों को प्राप्त करता है।

मंत्र 81

अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ।। ३ ।।

atha yaddhasati yajjakṣati yanmaithunaṃ carati stutaśastraireva tadeti

फिर जब वह हँसता है, खाता-पीता है और मैथुन करता है — तब वह स्तुति और शस्त्र (स्तोत्र-पाठ) को प्राप्त करता है।

मंत्र 82

अथ यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ।। ४ ।।

atha yattapo dānamārjavamahiṃsā satyavacanamiti tā asya dakṣiṇāḥ

फिर तप, दान, आर्जव (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन — ये उसकी दक्षिणाएँ हैं।

मंत्र 83

तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवावभृथः ।। ५ ।।

tasmādāhuḥ soṣyatyasoṣṭeti punarutpādanamevāsya tanmaraṇamevāvabhṛthaḥ

इसीलिए कहते हैं "वह जनेगा", "उसने जन्म दिया" — यह (जन्म) ही उसका पुनरुत्पादन (सोमाभिषव) है। और उसकी मृत्यु ही उसका अवभृथ-स्नान (यज्ञ का अन्तिम स्नान) है।

मंत्र 84

तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ।। ६ ।।

taddhaitadghora āṅgirasaḥ kṛṣṇāya devakīputrāyoktvovācāpipāsa eva sa babhūva so’ntavelāyāmetattrayaṃ pratipadyetākṣitamasyacyutamasi prāṇasaṃśitamasīti tatraite dve ṛcau bhavataḥ

यह उपदेश घोर आङ्गिरस ने देवकी के पुत्र कृष्ण को देकर कहा — और वह (कृष्ण) निष्पृह (पिपासारहित) हो गया। "अन्त समय में इन तीन (मन्त्रों) की शरण लेनी चाहिए — तू अक्षित (अविनाशी) है, तू अच्युत (अविचल) है, तू प्राण की तीक्ष्ण धार (सार) है।" इस विषय में ये दो ऋचाएँ हैं —

मंत्र 85

आदित्प्रत्नस्य रेतसः । उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरं स्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ।। ७ ।।

āditpratnasya retasaḥ | udvayaṃ tamasaspari jyotiḥ paśyanta uttaraṃsvaḥ paśyanta uttaraṃ devaṃ devatrā sūryamaganma jyotiruttamamiti jyotiruttamamiti

"आदित्प्रत्नस्य रेतसः" (आदि सनातन तेज की ओर देखते हुए)। हम अन्धकार से परे उस ऊपर के प्रकाश को देखते हुए, देवों में देव सूर्य को, उस परम ज्योति को देखते हुए, उस उत्तम ज्योति तक पहुँच गये — उस उत्तम ज्योति तक।

मंत्र 86

मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ।। १ ।।

mano brahmetyupāsītetyadhyātmamathādhidaivatamākāśo brahmetyubhayamādiṣṭaṃ bhavatyadhyātmaṃ cādhidaivataṃ ca

"मन ब्रह्म है" — इस प्रकार उपासना करनी चाहिए; यह अध्यात्म (व्यक्ति के भीतर) की दृष्टि है। और अधिदैवत (देवताओं की दृष्टि) से — "आकाश ब्रह्म है" ऐसी उपासना करनी चाहिए। इस प्रकार यह उपदेश दोनों रूपों में — अध्यात्म और अधिदैवत — दिया गया है।

मंत्र 87

तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्ममथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पादा आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ।। २ ।।

tadetaccatuṣpādbrahma vākpādaḥ prāṇaḥ pādaścakṣuḥ pādaḥ śrotraṃ pāda ityadhyātmamathādhidaivatamagniḥ pādo vāyuḥ pādā ādityaḥ pādo diśaḥ pāda ityubhayamevādiṣṭaṃ bhavatyadhyātmaṃ caivādhidaivataṃ ca

यह ब्रह्म चार चरणों वाला है — वाणी एक चरण, प्राण एक चरण, चक्षु एक चरण, श्रोत्र एक चरण; यह अध्यात्म की दृष्टि है। और अधिदैवत से — अग्नि एक चरण, वायु एक चरण, आदित्य एक चरण, दिशाएँ एक चरण। इस प्रकार यह उपदेश दोनों रूपों में — अध्यात्म और अधिदैवत — दिया गया है।

मंत्र 88

वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ।। ३ ।।

vāgeva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ so’gninā jyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda

वाणी ब्रह्म के चार चरणों में से एक चरण है; वह अग्नि रूपी ज्योति से प्रकाशित होती और तपती है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से प्रकाशित होता और तपता है।

मंत्र 89

प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ।। ४ ।।

prāṇa eva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ sa vāyunā jyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda

प्राण ब्रह्म के चार चरणों में से एक चरण है; वह वायु रूपी ज्योति से प्रकाशित होता और तपता है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से प्रकाशित होता और तपता है।

मंत्र 90

चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ।। ५ ।।

cakṣureva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ sa ādityena jyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda

चक्षु ब्रह्म के चार चरणों में से एक चरण है; वह आदित्य रूपी ज्योति से प्रकाशित होता और तपता है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से प्रकाशित होता और तपता है।

मंत्र 91

श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ।। ६ ।।

śrotrameva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ sa digbhirjyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda ya evaṃ veda

श्रोत्र ब्रह्म के चार चरणों में से एक चरण है; वह दिशाओं रूपी ज्योति से प्रकाशित होता और तपता है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से प्रकाशित होता और तपता है — जो इसे इस प्रकार जानता है।

मंत्र 92

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् । तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ।। १ ।।

ādityo brahmetyādeśastasyopavyākhyānamasadevedamagra āsīt | tatsadāsīttatsamabhavattadāṇḍaṃ niravartata tatsaṃvatsarasya mātrāmaśayata tannirabhidyata te āṇḍakapāle rajataṃ ca suvarṇaṃ cābhavatām

"आदित्य ब्रह्म है" — यह उपदेश है। उसका व्याख्यान यह है — आरम्भ में यह असत् (अव्यक्त) ही था। वह सत् (व्यक्त) हुआ। वह बढ़ा। वह एक अण्डे के रूप में परिणत हुआ। वह एक वर्ष तक पड़ा रहा। फिर वह फूटा। उस अण्डे के दो कपाल (खोल) हुए — एक रजत (चाँदी) का और एक सुवर्ण (सोने) का।

मंत्र 93

तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं स मेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ।। २ ।।

tadyadrajataṃ seyaṃ pṛthivī yatsuvarṇaṃ sā dyauryajjarāyu te parvatā yadulbaṃ sa megho nīhāro yā dhamanayastā nadyo yadvāsteyamudakaṃ sa samudraḥ

उसमें से जो रजत का कपाल था, वह यह पृथ्वी हुई; जो सुवर्ण का था, वह द्युलोक हुआ। जो बाहरी झिल्ली (जरायु) थी, वह पर्वत बनी; जो भीतरी झिल्ली (उल्ब) थी, वह मेघ और कुहासा बनी; जो नाड़ियाँ (धमनी) थीं, वे नदियाँ बनीं; और जो मूत्राशय का जल (वास्तेय) था, वह समुद्र बना।

मंत्र 94

अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ।। ३ ।।

atha yattadajāyata so’sāvādityastaṃ jāyamānaṃ ghoṣā ulūlavo’nūdatiṣṭhantsarvāṇi ca bhūtāni sarve ca kāmāstasmāttasyodayaṃ prati pratyāyanaṃ prati ghoṣā ulūlavo’nūttiṣṭhanti sarvāṇi ca bhūtāni sarve ca kāmāḥ

और उससे जो उत्पन्न हुआ, वही यह आदित्य है। उसके जन्म लेते समय हर्षनाद और जयजयकार उठे, तथा समस्त प्राणी और समस्त कामनाएँ भी उठ खड़ी हुईं। इसीलिए उसके प्रत्येक उदय और प्रत्येक लौटने पर हर्षनाद और जयजयकार उठते हैं, तथा समस्त प्राणी और समस्त कामनाएँ भी।

मंत्र 95

स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ।। ४ ।।

sa ya etamevaṃ vidvānādityaṃ brahmetyupāste’bhyāśo ha yadenaṃ sādhavo ghoṣā ā ca gaccheyurupa ca nimreḍerannimreḍeran

जो इसे इस प्रकार जानकर आदित्य की ब्रह्म-रूप में उपासना करता है, यह सम्भावना है कि मधुर हर्षनाद उसकी ओर आयें और उसे बार-बार आनन्दित करें — आनन्दित करें।

चतुर्थ प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस स ह सर्वत आवसथान्मापयांचक्रे सर्वत एव मेऽन्नमत्स्यन्तीति ।। १ ।।

jānaśrutirha pautrāyaṇaḥ śraddhādeyo bahudāyī bahupākya āsa sa ha sarvata āvasathānmāpayāṃcakre sarvata eva me’nnamatsyantīti || 1 ||

जानश्रुति पौत्रायण श्रद्धापूर्वक दान देने वाला, बहुत दान करने वाला और बहुतों को भोजन कराने वाला था। उसने यह सोचकर कि सर्वत्र लोग मेरा ही अन्न खाएँगे, सब ओर अतिथिगृह बनवाए।

मंत्र 2

अथ हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हं सोहं समभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षी स्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ।। २ ।।

atha haṃsā niśāyāmatipetustaddhaivaṃ haṃ sohaṃ samabhyuvāda ho ho’yi bhallākṣa bhallākṣa jānaśruteḥ pautrāyaṇasya samaṃ divā jyotirātataṃ tanmā prasāṅkṣī stattvā mā pradhākṣīriti || 2 ||

तब रात में हंस उड़ते हुए वहाँ से निकले। एक हंस ने दूसरे से कहा — हो हो! अरे भल्लाक्ष, भल्लाक्ष! जानश्रुति पौत्रायण का तेज दिन के प्रकाश के समान सर्वत्र फैला हुआ है। उसे मत छूना, कहीं वह तुझे जला न दे।

मंत्र 3

तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ।। ३ ।।

tamu ha paraḥ pratyuvāca kamvara enametatsantaṃ sayugvānamiva raikvamāttheti yo nu kathaṃ sayugvā raikva iti || 3 ||

दूसरे हंस ने उत्तर दिया — यह कौन है, जिसे तू इस प्रकार बता रहा है मानो वह सयुग्वा रैक्व हो? और वह सयुग्वा रैक्व आखिर कौन और कैसा है?

मंत्र 4

यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमैति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ।। ४ ।।

yathā kṛtāyavijitāyādhareyāḥ saṃyantyevamenaṃ sarvaṃ tadabhisamaiti yatkiṃca prajāḥ sādhu kurvanti yastadveda yatsa veda sa mayaitadukta iti || 4 ||

पहले हंस ने कहा — जैसे द्यूत में जीते हुए कृत (सर्वोच्च दाँव) में निम्न दाँव समा जाते हैं, वैसे ही प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उसी रैक्व को प्राप्त होता है। और जो उसके जाने हुए को जानता है, वह भी वैसा ही हो जाता है — ऐसे पुरुष के विषय में मैंने यह कहा है।

मंत्र 5

तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ।। ५ ।।

tadu ha jānaśrutiḥ pautrāyaṇa upaśuśrāva sa ha saṃjihāna eva kṣattāramuvācāṅgāre ha sayugvānamiva raikvamāttheti yo nu kathaṃ sayugvā raikva iti || 5 ||

जानश्रुति पौत्रायण ने यह सुन लिया। प्रातः उठते ही उसने अपने सारथि (क्षत्ता) से कहा — अरे, क्या तू भी सयुग्वा रैक्व की भाँति (उसकी) चर्चा करता है? वह सयुग्वा रैक्व आखिर कौन और कैसा है?

मंत्र 6

यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमैति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ।। ६ ।।

yathā kṛtāyavijitāyādhareyāḥ saṃyantyevamenaṃ sarvaṃ tadabhisamaiti yatkiṃca prajāḥ sādhu kurvanti yastadveda yatsa veda sa mayaitadukta iti || 6 ||

(उसने पुनः वही सुनी हुई बात कही —) जैसे द्यूत में जीते हुए कृत में निम्न दाँव समा जाते हैं, वैसे ही प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उसी को प्राप्त होता है। और जो उसके जाने हुए को जानता है, वह भी वैसा ही हो जाता है — ऐसे पुरुष के विषय में मुझसे यह कहा गया है।

मंत्र 7

स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तं होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमर्च्छेति ।। ७ ।।

sa ha kṣattānviṣya nāvidamiti pratyeyāya taṃ hovāca yatrāre brāhmaṇasyānveṣaṇā tadenamarccheti || 7 ||

वह सारथि खोजकर लौट आया और बोला — मैंने उसे नहीं पाया। तब जानश्रुति ने कहा — अरे, जहाँ ब्रह्मज्ञ की खोज की जाती है, वहाँ (एकान्त स्थान में) जाकर उसे ढूँढ़।

मंत्र 8

सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताविदमिति प्रत्येयाय ।। ८ ।।

so’dhastācchakaṭasya pāmānaṃ kaṣamāṇamupopaviveśa taṃ hābhyuvāda tvaṃ nu bhagavaḥ sayugvā raikva ityahaṃ hyarā3 iti ha pratijajñe sa ha kṣattāvidamiti pratyeyāya || 8 ||

उसने गाड़ी के नीचे बैठे हुए, अपनी खुजली खुजलाते हुए एक पुरुष को देखा और उसके पास जा बैठा। उसने पूछा — भगवन्, क्या आप ही सयुग्वा रैक्व हैं? उसने उत्तर दिया — हाँ, मैं ही हूँ। तब सारथि यह जानकर कि उसे पा लिया, लौट आया।

मंत्र 9

तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट्शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तं हाभ्युवाद ।। १ ।।

tadu ha jānaśrutiḥ pautrāyaṇaḥ ṣaṭśatāni gavāṃ niṣkamaśvatarīrathaṃ tadādāya praticakrame taṃ hābhyuvāda || 1 ||

तब जानश्रुति पौत्रायण छह सौ गायें, एक स्वर्ण-हार और खच्चरियों से जुता एक रथ लेकर उसके पास गया और बोला —

मंत्र 10

रैक्वेमानि षट्शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथोऽनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्स इति ।। २ ।।

raikvemāni ṣaṭśatāni gavāmayaṃ niṣko’yamaśvatarīratho’nu ma etāṃ bhagavo devatāṃ śādhi yāṃ devatāmupāssa iti || 2 ||

रैक्व, ये छह सौ गायें हैं, यह स्वर्ण-हार है, यह खच्चरियों वाला रथ है — भगवन्, आप जिस देवता की उपासना करते हैं, वह मुझे सिखाइए।

मंत्र 11

तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ।। ३ ।।

tamu ha paraḥ pratyuvācāha hāretvā śūdra tavaiva saha gobhirastviti tadu ha punareva jānaśrutiḥ pautrāyaṇaḥ sahasraṃ gavāṃ niṣkamaśvatarīrathaṃ duhitaraṃ tadādāya praticakrame || 3 ||

उसने उत्तर दिया — अरे शूद्र, इन्हें गायों सहित अपने ही पास रहने दे, ले जा! तब जानश्रुति पौत्रायण फिर एक हजार गायें, स्वर्ण-हार, खच्चरियों वाला रथ और अपनी पुत्री लेकर उसके पास गया।

मंत्र 12

तंहाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायायं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ।। ४ ।।

taṃhābhyuvāda raikvedaṃ sahasraṃ gavāmayaṃ niṣko’yamaśvatarīratha iyaṃ jāyāyaṃ grāmo yasminnāsse’nveva mā bhagavaḥ śādhīti || 4 ||

उसने कहा — रैक्व, ये एक हजार गायें हैं, यह स्वर्ण-हार है, यह खच्चरियों वाला रथ है, यह पत्नी है, और यह वह ग्राम है जिसमें आप निवास करते हैं — भगवन्, अब तो मुझे उपदेश दीजिए।

मंत्र 13

तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास स तस्मै होवाच ।। ५ ।।

tasyā ha mukhamupodgṛhṇannuvācājahāremāḥ śūdrānenaiva mukhenālāpayiṣyathā iti te haite raikvaparṇā nāma mahāvṛṣeṣu yatrāsmā uvāsa sa tasmai hovāca || 5 ||

उस कन्या की ओर मुख उठाकर रैक्व ने कहा — अरे शूद्र, ये सब तू ले आया! पर इसी मुख (कन्या) के कारण ही तू मुझसे बुलवाना चाहता है। महावृष देश में ये जो रैक्वपर्ण नामक ग्राम हैं, वहीं राजा की इच्छा से रैक्व निवास करने लगा। तब उसने उसे यह उपदेश दिया —

मंत्र 14

वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ।। १ ।।

vāyurvāva saṃvargo yadā vā agnirudvāyati vāyumevāpyeti yadā sūryo’stameti vāyumevāpyeti yadā candro’stameti vāyumevāpyeti || 1 ||

वायु ही संवर्ग (सबको अपने में लय कर लेने वाला) है। जब अग्नि बुझती है, तब वह वायु में ही लीन हो जाती है; जब सूर्य अस्त होता है, तब वह वायु में ही लीन होता है; जब चन्द्रमा अस्त होता है, तब वह भी वायु में ही लीन हो जाता है।

मंत्र 15

यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ।। २ ।।

yadāpa ucchuṣyanti vāyumevāpiyanti vāyurhyevaitānsarvānsaṃvṛṅkta ityadhidaivatam || 2 ||

जब जल सूख जाता है, तब वह वायु में ही लीन हो जाता है। इस प्रकार वायु ही इन सबको अपने में समेट लेता है — यह अधिदैव (देवताओं की दृष्टि से) विवेचन है।

मंत्र 16

अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ।। ३ ।।

athādhyātmaṃ prāṇo vāva saṃvargaḥ sa yadā svapiti prāṇameva vāgapyeti prāṇaṃ cakṣuḥ prāṇaṃ śrotraṃ prāṇaṃ manaḥ prāṇo hyevaitānsarvānsaṃvṛṅkta iti || 3 ||

अब अध्यात्म (शरीर की दृष्टि से) — प्राण ही संवर्ग है। जब मनुष्य सोता है, तब वाणी प्राण में ही लीन हो जाती है, चक्षु प्राण में, श्रोत्र प्राण में और मन प्राण में लीन हो जाता है; क्योंकि प्राण ही इन सबको अपने में समेट लेता है।

मंत्र 17

तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ।। ४ ।।

tau vā etau dvau saṃvargau vāyureva deveṣu prāṇaḥ prāṇeṣu || 4 ||

इस प्रकार ये दो संवर्ग हैं — देवताओं में वायु और प्राणों (इन्द्रियों) में प्राण।

मंत्र 18

अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ।। ५ ।।

atha ha śaunakaṃ ca kāpeyamabhipratāriṇaṃ ca kākṣaseniṃ pariviṣyamāṇau brahmacārī bibhikṣe tasmā u ha na dadatuḥ || 5 ||

एक बार जब शौनक कापेय और अभिप्रतारी काक्षसेनि को भोजन परोसा जा रहा था, तब एक ब्रह्मचारी ने उनसे भिक्षा माँगी। उन्होंने उसे कुछ भी नहीं दिया।

मंत्र 19

स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ।। ६ ।।

sa hovāca mahātmanaścaturo deva ekaḥ kaḥ sa jagāra bhuvanasya gopāstaṃ kāpeya nābhipaśyanti martyā abhipratārinbahudhā vasantaṃ yasmai vā etadannaṃ tasmā etanna dattamiti || 6 ||

उसने कहा — एक देव ने चार महात्माओं (महान् तत्त्वों) को निगल लिया है — वह कौन है, जो भुवन का रक्षक है? हे कापेय, मर्त्य मनुष्य उसे नहीं देख पाते। हे अभिप्रतारी, वह अनेक रूपों में निवास करता है। जिसका यह अन्न है, उसी को यह अन्न नहीं दिया गया।

मंत्र 20

तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ।। ७ ।।

tadu ha śaunakaḥ kāpeyaḥ pratimanvānaḥ pratyeyāyātmā devānāṃ janitā prajānāṃ hiraṇyadaṃṣṭro babhaso’nasūrirmahāntamasya mahimānamāhuranadyamāno yadanannamattīti vai vayaṃ brahmacārinnedamupāsmahe dattāsmai bhikṣāmiti || 7 ||

तब शौनक कापेय ने इस पर विचार कर उत्तर दिया — वह देवों का आत्मा है, प्रजाओं का जनक, स्वर्ण-दन्त वाला, भक्षण करने वाला और महान् प्रज्ञावाला है; उसकी महिमा को महान् कहते हैं, क्योंकि स्वयं न खाया जाकर भी वह उसे खाता है जो अन्न नहीं है। हे ब्रह्मचारी, ऐसे उसकी हम उपासना करते हैं। इसे भिक्षा दो!

मंत्र 21

तस्म उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ।। ८ ।।

tasma u ha daduste vā ete pañcānye pañcānye daśa santastatkṛtaṃ tasmātsarvāsu dikṣvannameva daśa kṛtaṃ saiṣā virāḍannādī tayedaṃ sarvaṃ dṛṣṭaṃ sarvamasyedaṃ dṛṣṭaṃ bhavatyannādo bhavati ya evaṃ veda ya evaṃ veda || 8 ||

तब उन्होंने उसे भिक्षा दी। ये पाँच (अधिदैव) और वे दूसरे पाँच (अध्यात्म) मिलकर दस होते हैं, और यही कृत (दस की विजयी संख्या) है। इसलिए सब दिशाओं में यही दस अन्न है, यही कृत है। यही विराट् है, अन्न को खाने वाली। इसी के द्वारा यह सब कुछ देखा जाता है, और जो ऐसा जानता है उसका यह सब कुछ अधिकृत (देखा हुआ) हो जाता है, वह अन्न का भोक्ता हो जाता है — जो यह जानता है, जो यह जानता है।

मंत्र 22

सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयांचक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति ।। १ ।।

satyakāmo ha jābālo jabālāṃ mātaramāmantrayāṃcakre brahmacaryaṃ bhavati vivatsyāmi kiṃgotro nvahamasmīti || 1 ||

सत्यकाम जाबाल ने अपनी माता जबाला से कहा — माता, मैं ब्रह्मचर्य का पालन करने (गुरुकुल में निवास करने) जाना चाहता हूँ। मैं किस गोत्र का हूँ?

मंत्र 23

सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति ।। २ ।।

sā hainamuvāca nāhametadveda tāta yadgotrastvamasi bahvahaṃ carantī paricāriṇī yauvane tvāmalabhe sāhametanna veda yadgotrastvamasi jabālā tu nāmāhamasmi satyakāmo nāma tvamasi sa satyakāma eva jābālo bravīthā iti || 2 ||

उसने उससे कहा — तात, मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्र का है। युवावस्था में परिचारिका के रूप में मैं बहुत घूमती-फिरती थी, उसी समय मैंने तुझे प्राप्त किया। इसलिए मैं नहीं जानती कि तू किस गोत्र का है। पर मेरा नाम जबाला है और तेरा नाम सत्यकाम है। अतः तू अपने को सत्यकाम जाबाल ही कहना।

मंत्र 24

स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ।। ३ ।।

sa ha hāridrumataṃ gautamametyovāca brahmacaryaṃ bhagavati vatsyāmyupeyāṃ bhagavantamiti || 3 ||

तब वह हारिद्रुमत गौतम के पास गया और बोला — भगवन्, मैं आपके पास रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहता हूँ; मैं आपकी शरण में आऊँ?

मंत्र 25

तं होवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरं सा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचरिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ।। ४ ।।

taṃ hovāca kiṃgotro nu somyāsīti sa hovāca nāhametadveda bho yadgotro’hamasmyapṛcchaṃ mātaraṃ sā mā pratyabravīdbahvahaṃ carantī paricariṇī yauvane tvāmalabhe sāhametanna veda yadgotrastvamasi jabālā tu nāmāhamasmi satyakāmo nāma tvamasīti so’haṃ satyakāmo jābālo’smi bho iti || 4 ||

गौतम ने उससे कहा — सोम्य, तू किस गोत्र का है? उसने उत्तर दिया — भगवन्, मैं नहीं जानता कि मैं किस गोत्र का हूँ। मैंने माता से पूछा था, तो उसने मुझे बताया — युवावस्था में परिचारिका के रूप में बहुत घूमते हुए मैंने तुझे प्राप्त किया, इसलिए मैं नहीं जानती कि तू किस गोत्र का है; पर मेरा नाम जबाला है और तेरा नाम सत्यकाम है। इसलिए भगवन्, मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।

मंत्र 26

तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तेयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रं सम्पेदुः ।। ५ ।।

taṃ hovāca naitadabrāhmaṇo vivaktumarhati samidhaṃ somyāharopa tvā neṣye na satyādagā iti tamupanīya kṛśānāmabalānāṃ catuḥśatā gā nirākṛtyovācemāḥ somyānusaṃvrajeti tā abhiprasthāpayannuvāca nāsahasreṇāvarteyeti sa ha varṣagaṇaṃ provāsa tā yadā sahasraṃ sampeduḥ || 5 ||

गौतम ने कहा — जो ब्राह्मण नहीं है, वह इस प्रकार (सत्य) स्पष्ट नहीं कह सकता। सोम्य, समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन करूँगा, क्योंकि तू सत्य से विचलित नहीं हुआ। उसका उपनयन करके उन्होंने चार सौ दुर्बल-कृश गायें अलग कीं और कहा — सोम्य, इनके पीछे-पीछे जा। उन्हें हाँकते हुए सत्यकाम ने कहा — जब तक ये हजार न हो जाएँ, मैं लौटूँगा नहीं। वह कई वर्षों तक बाहर रहा, यहाँ तक कि वे गायें हजार हो गईं।

मंत्र 27

अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रं स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ।। १ ।।

atha hainamṛṣabho’bhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva prāptāḥ somya sahasraṃ smaḥ prāpaya na ācāryakulam || 1 ||

तब बैल ने उससे कहा — सत्यकाम! उसने उत्तर दिया — भगवन्! (बैल बोला) — सोम्य, अब हम हजार हो गए हैं; हमें आचार्य के घर पहुँचा दे।

मंत्र 28

ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ।। २ ।।

brahmaṇaśca te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca prācī dikkalā pratīcī dikkalā dakṣiṇā dikkalodīcī dikkalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇaḥ prakāśavānnāma || 2 ||

और मैं तुझे ब्रह्म का एक पाद (चरण) बताता हूँ। (सत्यकाम बोला) — भगवन्, बताइए। बैल ने कहा — पूर्व दिशा एक कला है, पश्चिम एक कला, दक्षिण एक कला और उत्तर एक कला — हे सोम्य, यही चार कलाओं वाला ब्रह्म का पाद है, जिसका नाम प्रकाशवान् है।

मंत्र 29

स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिंल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ।। ३ ।।

sa ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇaḥ prakāśavānityupāste prakāśavānasmiṃlloke bhavati prakāśavato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇaḥ prakāśavānityupāste || 3 ||

जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद की प्रकाशवान् रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में प्रकाशवान् (यशस्वी) हो जाता है, और प्रकाशवान् लोकों को जीत लेता है — जो ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की प्रकाशवान् रूप में उपासना करता है।

मंत्र 30

अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते ग आभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ।। १ ।।

agniṣṭe pādaṃ vakteti sa ha śvobhūte ga ābhiprasthāpayāṃcakāra tā yatrābhi sāyaṃ babhūvustatrāgnimupasamādhāya gā uparudhya samidhamādhāya paścādagneḥ prāṅupopaviveśa || 1 ||

(बैल ने कहा —) अग्नि तुझे एक पाद बताएगी। दूसरे दिन सत्यकाम ने गायों को आगे हाँका। संध्या के समय जहाँ वे पहुँचीं, वहाँ उसने अग्नि प्रज्वलित की, गायों को बाड़े में बन्द किया, समिधा डाली और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया।

मंत्र 31

तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ।। २ ।।

tamagnirabhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva || 2 ||

अग्नि ने उससे कहा — सत्यकाम! उसने उत्तर दिया — भगवन्!

मंत्र 32

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ।। ३ ।।

brahmaṇaḥ somya te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca pṛthivī kalāntarikṣaṃ kalā dyauḥ kalā samudraḥ kalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇo’nantavānnāma || 3 ||

सोम्य, मैं तुझे ब्रह्म का एक पाद बताती हूँ। (सत्यकाम बोला) — भगवन्, बताइए। अग्नि ने कहा — पृथ्वी एक कला है, अन्तरिक्ष एक कला, द्युलोक एक कला और समुद्र एक कला — हे सोम्य, यही चार कलाओं वाला ब्रह्म का पाद है, जिसका नाम अनन्तवान् है।

मंत्र 33

स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिंल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ।। ४ ।।

sa ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇo’nantavānityupāste’nantavānasmiṃlloke bhavatyanantavato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇo’nantavānityupāste || 4 ||

जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की अनन्तवान् रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में अनन्तवान् हो जाता है, और अनन्त लोकों को जीत लेता है — जो ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की अनन्तवान् रूप में उपासना करता है।

मंत्र 34

हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ।। १ ।।

haṃsaste pādaṃ vakteti sa ha śvobhūte gā abhiprasthāpayāṃcakāra tā yatrābhi sāyaṃ babhūvustatrāgnimupasamādhāya gā uparudhya samidhamādhāya paścādagneḥ prāṅupopaviveśa || 1 ||

(अग्नि ने कहा —) हंस तुझे एक पाद बताएगा। दूसरे दिन उसने गायों को आगे हाँका। संध्या के समय जहाँ वे पहुँचीं, वहाँ उसने अग्नि प्रज्वलित की, गायों को बाड़े में बन्द किया, समिधा डाली और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया।

मंत्र 35

तंहंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ।। २ ।।

taṃhaṃsa upanipatyābhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva || 2 ||

एक हंस उसके पास उतरकर बोला — सत्यकाम! उसने उत्तर दिया — भगवन्!

मंत्र 36

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ।। ३ ।।

brahmaṇaḥ somya te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovācāgniḥ kalā sūryaḥ kalā candraḥ kalā vidyutkalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇo jyotiṣmānnāma || 3 ||

सोम्य, मैं तुझे ब्रह्म का एक पाद बताता हूँ। (सत्यकाम बोला) — भगवन्, बताइए। हंस ने कहा — अग्नि एक कला है, सूर्य एक कला, चन्द्रमा एक कला और विद्युत् एक कला — हे सोम्य, यही चतुष्कल ब्रह्म का पाद है, जिसका नाम ज्योतिष्मान् है।

मंत्र 37

स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ।। ४ ।।

sa ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇo jyotiṣmānityupāste jyotiṣmānasmiṃlloke bhavati jyotiṣmato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇo jyotiṣmānityupāste || 4 ||

जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की ज्योतिष्मान् रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में ज्योतिष्मान् हो जाता है, और ज्योतिष्मान् लोकों को जीत लेता है — जो ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की ज्योतिष्मान् रूप में उपासना करता है।

मंत्र 38

मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ।। १ ।।

madguṣṭe pādaṃ vakteti sa ha śvobhūte gā abhiprasthāpayāṃcakāra tā yatrābhi sāyaṃ babhūvustatrāgnimupasamādhāya gā uparudhya samidhamādhāya paścādagneḥ prāṅupopaviveśa || 1 ||

(हंस ने कहा —) मद्गु (जलपक्षी) तुझे एक पाद बताएगा। दूसरे दिन उसने गायों को आगे हाँका। संध्या के समय जहाँ वे पहुँचीं, वहाँ उसने अग्नि प्रज्वलित की, गायों को बाड़े में बन्द किया, समिधा डाली और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया।

मंत्र 39

तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ।। २ ।।

taṃ madgurupanipatyābhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva || 2 ||

वह मद्गु उसके पास उतरकर बोला — सत्यकाम! उसने उत्तर दिया — भगवन्!

मंत्र 40

ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ।। ३ ।।

brahmaṇaḥ somya te pādaṃ bravāṇīti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca prāṇaḥ kalā cakṣuḥ kalā śrotraṃ kalā manaḥ kalaiṣa vai somya catuṣkalaḥ pādo brahmaṇa āyatanavānnāma || 3 ||

सोम्य, मैं तुझे ब्रह्म का एक पाद बताता हूँ। (सत्यकाम बोला) — भगवन्, बताइए। मद्गु ने कहा — प्राण एक कला है, चक्षु एक कला, श्रोत्र एक कला और मन एक कला — हे सोम्य, यही चतुष्कल ब्रह्म का पाद है, जिसका नाम आयतनवान् है।

मंत्र 41

स यै एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिंल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ।। ४ ।।

sa yai etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇa āyatanavānityupāsta āyatanavānasmiṃlloke bhavatyāyatanavato ha lokāñjayati ya etamevaṃ vidvāṃścatuṣkalaṃ pādaṃ brahmaṇa āyatanavānityupāste || 4 ||

जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की आयतनवान् रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में आयतनवान् (आश्रययुक्त) हो जाता है, और आयतनयुक्त लोकों को जीत लेता है — जो ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की आयतनवान् रूप में उपासना करता है।

मंत्र 42

प्राप हाचर्यकुलं तमाचर्योऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ।। १ ।।

prāpa hācaryakulaṃ tamācaryo’bhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva || 1 ||

वह आचार्य के घर पहुँचा। आचार्य ने उससे कहा — सत्यकाम! उसने उत्तर दिया — भगवन्!

मंत्र 43

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ।। २ ।।

brahmavidiva vai somya bhāsi ko nu tvānuśaśāsetyanye manuṣyebhya iti ha pratijajñe bhagavāṃstveva me kāme brūyāt || 2 ||

सोम्य, तू ब्रह्मवेत्ता के समान दीप्त हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया? उसने उत्तर दिया — मनुष्यों से भिन्न (देव आदि) ने; परन्तु मेरी इच्छा है कि भगवन् आप ही मुझे उपदेश करें।

मंत्र 44

श्रुतंह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किंचन वीयायेति वीयायेति ।। ३ ।।

śrutaṃhyeva me bhagavaddṛśebhya ācāryāddhaiva vidyā viditā sādhiṣṭhaṃ prāpatīti tasmai haitadevovācātra ha na kiṃcana vīyāyeti vīyāyeti || 3 ||

क्योंकि आप जैसे गुरुजनों से मैंने सुना है कि आचार्य से प्राप्त विद्या ही सर्वोत्तम रूप से (लक्ष्य तक) पहुँचाती है। तब आचार्य ने उसे वही उपदेश दिया, और उसमें कुछ भी नहीं छूटा — कुछ भी नहीं छूटा।

मंत्र 45

उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचार्यमुवास तस्य ह द्वादश वार्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तं ह स्मैव न समावर्तयति ।। १ ।।

upakosalo ha vai kāmalāyanaḥ satyakāme jābāle brahmacāryamuvāsa tasya ha dvādaśa vārṣāṇyagnīnparicacāra sa ha smānyānantevāsinaḥ samāvartayaṃstaṃ ha smaiva na samāvartayati || 1 ||

उपकोसल कामलायन सत्यकाम जाबाल के पास ब्रह्मचारी होकर रहा। उसने बारह वर्षों तक उनकी अग्नियों की सेवा की। सत्यकाम अन्य शिष्यों को तो समावर्तन कराकर (शिक्षा पूरी कर) घर भेज देते थे, पर उपकोसल को नहीं भेजते थे।

मंत्र 46

तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासांचक्रे ।। २ ।।

taṃ jāyovāca tapto brahmacārī kuśalamagnīnparicacārīnmā tvāgnayaḥ paripravocanprabrūhyasmā iti tasmai hāprocyaiva pravāsāṃcakre || 2 ||

आचार्य की पत्नी ने उनसे कहा — इस ब्रह्मचारी ने तप किया है और अग्नियों की भली प्रकार सेवा की है; कहीं ये अग्नियाँ (उपेक्षा का) दोष तुम पर न लगा दें, इसे उपदेश दे दो। पर वे उसे बिना उपदेश दिए ही प्रवास पर चले गए।

मंत्र 47

स ह व्याधिनानशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधीभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ।। ३ ।।

sa ha vyādhinānaśituṃ dadhre tamācāryajāyovāca brahmacārinnaśāna kiṃ nu nāśnāsīti sa hovāca bahava ime’sminpuruṣe kāmā nānātyayā vyādhībhiḥ pratipūrṇo’smi nāśiṣyāmīti || 3 ||

दुःख (मानसिक व्यथा) के कारण उपकोसल ने भोजन न करने का निश्चय किया। आचार्य की पत्नी ने उससे कहा — ब्रह्मचारी, भोजन कर; तू क्यों नहीं खाता? उसने कहा — इस पुरुष (मुझ) में नाना प्रकार की अनेक कामनाएँ भरी हैं; मैं व्याधियों (दुःखों) से परिपूर्ण हूँ; मैं भोजन नहीं करूँगा।

मंत्र 48

अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ।। ४ ।।

atha hāgnayaḥ samūdire tapto brahmacārī kuśalaṃ naḥ paryacārīddhantāsmai prabravāmeti tasmai hocuḥ prāṇo brahma kaṃ brahma khaṃ brahmeti || 4 ||

तब अग्नियों ने आपस में कहा — इस ब्रह्मचारी ने तप किया है और हमारी भली प्रकार सेवा की है; आओ, हम इसे उपदेश दें। उन्होंने उससे कहा — प्राण ब्रह्म है, कं (सुख) ब्रह्म है, खं (आकाश) ब्रह्म है।

मंत्र 49

स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ।। ५ ।।

sa hovāca vijānāmyahaṃ yatprāṇo brahma kaṃ ca tu khaṃ ca na vijānāmīti te hocuryadvāva kaṃ tadeva khaṃ yadeva khaṃ tadeva kamiti prāṇaṃ ca hāsmai tadākāśaṃ cocuḥ || 5 ||

उसने कहा — मैं यह तो जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है, पर कं और खं को नहीं समझता। उन्होंने कहा — जो कं (सुख) है, वही खं (आकाश) है; और जो खं है, वही कं है। इस प्रकार उन्होंने उसे प्राण और वह आकाश (एक रूप में) बताया।

मंत्र 50

अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ।। १ ।।

atha hainaṃ gārhapatyo’nuśaśāsa pṛthivyagnirannamāditya iti ya eṣa āditye puruṣo dṛśyate so’hamasmi sa evāhamasmīti || 1 ||

तब गार्हपत्य अग्नि ने उसे उपदेश दिया — पृथ्वी, अग्नि, अन्न और आदित्य (मेरे रूप हैं)। जो पुरुष सूर्य में दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मैं हूँ।

मंत्र 51

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ।। २ ।।

sa ya etamevaṃ vidvānupāste’pahate pāpakṛtyāṃ lokī bhavati sarvamāyureti jyogjīvati nāsyāvarapuruṣāḥ kṣīyanta upa vayaṃ taṃ bhuñjāmo’smiṃśca loke’muṣmiṃśca ya etamevaṃ vidvānupāste || 2 ||

जो इसे इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पापकर्म को नष्ट कर देता है, (उस अग्नि के) लोक को प्राप्त करता है, पूर्ण आयु को प्राप्त करता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, और उसकी सन्तति क्षीण नहीं होती; इस लोक में और परलोक में हम उसकी सेवा करते हैं — जो इसे इस प्रकार जानकर उपासना करता है।

मंत्र 52

अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ।। १ ।।

atha hainamanvāhāryapacano’nuśaśāsāpo diśo nakṣatrāṇi candramā iti ya eṣa candramasi puruṣo dṛśyate so’hamasmi sa evāhamasmīti || 1 ||

तब अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) ने उसे उपदेश दिया — जल, दिशाएँ, नक्षत्र और चन्द्रमा (मेरे रूप हैं)। जो पुरुष चन्द्रमा में दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मैं हूँ।

मंत्र 53

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ।। २ ।।

sa ya etamevaṃ vidvānupāste’pahate pāpakṛtyāṃ lokī bhavati sarvamāyureti jyogjīvati nāsyāvarapuruṣāḥ kṣīyanta upa vayaṃ taṃ bhuñjāmo’smiṃśca loke’muṣmiṃśca ya etamevaṃ vidvānupāste || 2 ||

जो इसे इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पापकर्म को नष्ट कर देता है, (उस अग्नि के) लोक को प्राप्त करता है, पूर्ण आयु को प्राप्त करता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, और उसकी सन्तति क्षीण नहीं होती; इस लोक में और परलोक में हम उसकी सेवा करते हैं — जो इसे इस प्रकार जानकर उपासना करता है।

मंत्र 54

अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ।। १ ।।

atha hainamāhavanīyo’nuśaśāsa prāṇa ākāśo dyaurvidyuditi ya eṣa vidyuti puruṣo dṛśyate so’hamasmi sa evāhamasmīti || 1 ||

तब आहवनीय अग्नि ने उसे उपदेश दिया — प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् (मेरे रूप हैं)। जो पुरुष विद्युत् में दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मैं हूँ।

मंत्र 55

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमयुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ।। २ ।।

sa ya etamevaṃ vidvānupāste’pahate pāpakṛtyāṃ lokī bhavati sarvamayureti jyogjīvati nāsyāvarapuruṣāḥ kṣīyanta upa vayaṃ taṃ bhuñjāmo’smiṃśca loke’muṣmiṃśca ya etamevaṃ vidvānupāste || 2 ||

जो इसे इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पापकर्म को नष्ट कर देता है, (उस अग्नि के) लोक को प्राप्त करता है, पूर्ण आयु को प्राप्त करता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, और उसकी सन्तति क्षीण नहीं होती; इस लोक में और परलोक में हम उसकी सेवा करते हैं — जो इसे इस प्रकार जानकर उपासना करता है।

मंत्र 56

ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल३ इति ।। १ ।।

te hocurupakosalaiṣā somya te’smadvidyātmavidyā cācāryastu te gatiṃ vaktetyājagāma hāsyācāryastamācāryo’bhyuvādopakosala3 iti || 1 ||

तब अग्नियों ने कहा — उपकोसल, सोम्य, यह हमारी विद्या और आत्मविद्या तुझे प्राप्त हुई; पर तेरा आचार्य तुझे (आगे की) गति बताएगा। इसके पश्चात् उसका आचार्य घर लौट आया। आचार्य ने उससे कहा — उपकोसल!

मंत्र 57

भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ।। २ ।।

bhagava iti ha pratiśuśrāva brahmavida iva somya te mukhaṃ bhāti ko nu tvānuśaśāseti ko nu mānuśiṣyādbho itīhāpeva nihnuta ime nūnamīdṛśā anyādṛśā itīhāgnīnabhyūde kiṃ nu somya kila te’vocanniti || 2 ||

उसने उत्तर दिया — भगवन्! (आचार्य ने कहा —) सोम्य, तेरा मुख ब्रह्मवेत्ता के समान दीप्त हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया? (उपकोसल ने मानो छिपाते हुए कहा —) भला मुझे कौन उपदेश देगा, भगवन्? — इस प्रकार वह मानो छिपाता है; और अग्नियों की ओर संकेत करते हुए बोला — ये अग्नियाँ तो अब पहले जैसी न रहकर कुछ और ही (बदली हुई) प्रतीत होती हैं। (आचार्य ने पूछा —) सोम्य, इन्होंने तुझसे क्या कहा?

मंत्र 58

इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ।। ३ ।।

idamiti ha pratijajñe lokānvāva kila somya te’vocannahaṃ tu te tadvakṣyāmi yathā puṣkarapalāśa āpo na śliṣyanta evamevaṃvidi pāpaṃ karma na śliṣyata iti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca || 3 ||

उसने स्वीकार किया — हाँ, यह (उन्होंने कहा)। (आचार्य ने कहा —) सोम्य, उन्होंने तो तुझे केवल लोकों के विषय में बताया; परन्तु मैं तुझे वह बताऊँगा, जिसे जान लेने पर जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता, वैसे ही ऐसे ज्ञानी में पापकर्म नहीं ठहरता। (उपकोसल बोला —) भगवन्, मुझे बताइए। तब आचार्य ने उससे कहा —

मंत्र 59

य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ।। १ ।।

ya eṣo’kṣiṇi puruṣo dṛśyata eṣa ātmeti hovācaitadamṛtamabhayametadbrahmeti tadyadyapyasminsarpirvodakaṃ vā siñcati vartmanī eva gacchati || 1 ||

उसने कहा — जो पुरुष नेत्र में दिखाई देता है, वही आत्मा है; यही अमृत है, यही अभय है, यही ब्रह्म है। इसलिए इस नेत्र में यदि घी या जल भी डाला जाए, तो वह केवल पलकों के किनारों तक ही जाकर बह जाता है (उस पुरुष को स्पर्श नहीं करता)।

मंत्र 60

एतं संयद्वाम इत्याचक्षत एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ।। २ ।।

etaṃ saṃyadvāma ityācakṣata etaṃ hi sarvāṇi vāmānyabhisaṃyanti sarvāṇyenaṃ vāmānyabhisaṃyanti ya evaṃ veda || 2 ||

इसे संयद्वाम कहते हैं, क्योंकि समस्त कल्याण (वाम = इष्ट वस्तुएँ) इसी की ओर संगत होकर आते हैं। जो यह जानता है, उसकी ओर भी समस्त कल्याण संगत होकर आते हैं।

मंत्र 61

एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ।। ३ ।।

eṣa u eva vāmanīreṣa hi sarvāṇi vāmāni nayati sarvāṇi vāmāni nayati ya evaṃ veda || 3 ||

यही वामनी भी है, क्योंकि यही समस्त कल्याण को (जीवों तक) ले जाता है। जो यह जानता है, उसके लिए यह समस्त कल्याण ले जाता है।

मंत्र 62

एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ।। ४ ।।

eṣa u eva bhāmanīreṣa hi sarveṣu lokeṣu bhāti sarveṣu lokeṣu bhāti ya evaṃ veda || 4 ||

यही भामनी भी है, क्योंकि यही समस्त लोकों में देदीप्यमान होता है। जो यह जानता है, वह भी समस्त लोकों में देदीप्यमान होता है।

मंत्र 63

अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ।। ५ ।।

atha yadu caivāsmiñchavyaṃ kurvanti yadi ca nārciṣamevābhisaṃbhavantyarciṣo’harahna āpūryamāṇapakṣamāpūryamāṇapakṣādyānṣaḍudaṅṅeti māsāṃstāna māsebhyaḥ saṃvatsaraṃ saṃvatsarādādityamādityāccandramasaṃ candramaso vidyutaṃ tata puruṣo’mānavaḥ sa enānbrahma gamayatyeṣa devapatho brahmapatha etena pratipadyamānā imaṃ mānavamāvartaṃ nāvartante nāvartante || 5 ||

अब, चाहे ऐसे (ज्ञानी) के लिए अन्त्येष्टि-संस्कार किया जाए या न किया जाए, वे अर्चि (ज्योति) को प्राप्त होते हैं; अर्चि से दिन को, दिन से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उन छह महीनों को जिनमें सूर्य उत्तर की ओर जाता है, महीनों से संवत्सर को, संवत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्द्रमा को, और चन्द्रमा से विद्युत् को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव पुरुष उन्हें ब्रह्म तक पहुँचा देता है। यही देवपथ है, ब्रह्मपथ है। इस मार्ग से जाने वाले इस मानव-आवर्त (जन्म-मरण के चक्र) में लौटकर नहीं आते — लौटकर नहीं आते।

मंत्र 64

एष ह वै यज्ञो योऽयं पवते एष ह यन्निदं सर्वं पुनाति यदेष यन्निदं सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ।। १ ।।

eṣa ha vai yajño yo’yaṃ pavate eṣa ha yannidaṃ sarvaṃ punāti yadeṣa yannidaṃ sarvaṃ punāti tasmādeṣa eva yajñastasya manaśca vākca vartanī || 1 ||

जो यह (वायु) पवित्र करता हुआ बहता है, वही यज्ञ है; क्योंकि यह चलता हुआ इस सबको पवित्र करता है। इस प्रकार यह सबको पवित्र करता है, इसीलिए यही यज्ञ है। उस यज्ञ के मन और वाणी — ये दो मार्ग (वर्तनी) हैं।

मंत्र 65

तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्युरुद्गातान्यतरांस यत्रौपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदति ।। २ ।।

tayoranyatarāṃ manasā saṃskaroti brahmā vācā hotādhvaryurudgātānyatarāṃsa yatraupākṛte prātaranuvāke purā paridhānīyāyā brahmā vyavadati || 2 ||

इन दोनों में से एक मार्ग को ब्रह्मा नामक ऋत्विक् मन से संस्कृत करता है, और दूसरे को होता, अध्वर्यु तथा उद्गाता वाणी से संस्कृत करते हैं। जब प्रातरनुवाक आरम्भ हो जाने पर, परिधानीया ऋचा से पूर्व ही ब्रह्मा बीच में बोल पड़ता है —

मंत्र 66

अन्यतरामेव वर्तनीं संस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद्व्रजन्रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञोरिष्यति यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान्भवति ।। ३ ।।

anyatarāmeva vartanīṃ saṃskaroti hīyate’nyatarā sa yathaikapādvrajanratho vaikena cakreṇa vartamāno riṣyatyevamasya yajñoriṣyati yajñaṃ riṣyantaṃ yajamāno’nuriṣyati sa iṣṭvā pāpīyānbhavati || 3 ||

तो वह केवल एक ही मार्ग को संस्कृत करता है और दूसरा छूट जाता है। जैसे एक पैर से चलता हुआ मनुष्य, अथवा एक ही पहिये से चलता हुआ रथ क्षतिग्रस्त हो जाता है, वैसे ही उसका यज्ञ क्षतिग्रस्त हो जाता है; और यज्ञ के क्षतिग्रस्त होने पर उसके पीछे यजमान भी क्षति को प्राप्त होता है — वह यज्ञ करके भी हीन (पापी) हो जाता है।

मंत्र 67

अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ।। ४ ।।

atha yatropākṛte prātaranuvāke na purā paridhānīyāyā brahmā vyavadatyubhe eva vartanī saṃskurvanti na hīyate’nyatarā || 4 ||

परन्तु जब प्रातरनुवाक आरम्भ हो जाने पर, परिधानीया ऋचा से पूर्व ब्रह्मा बीच में नहीं बोलता, तब वे दोनों मार्गों को संस्कृत करते हैं और कोई भी नहीं छूटता।

मंत्र 68

स यथोभयपाद्व्रजन्रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान्भवति ।। ५ ।।

sa yathobhayapādvrajanratho vobhābhyāṃ cakrābhyāṃ vartamānaḥ pratitiṣṭhatyevamasya yajñaḥ pratitiṣṭhati yajñaṃ pratitiṣṭhantaṃ yajamāno’nupratitiṣṭhati sa iṣṭvā śreyānbhavati || 5 ||

जैसे दोनों पैरों से चलता हुआ मनुष्य, अथवा दोनों पहियों से चलता हुआ रथ स्थिर (प्रतिष्ठित) रहता है, वैसे ही उसका यज्ञ प्रतिष्ठित होता है; और यज्ञ के प्रतिष्ठित होने पर उसके पीछे यजमान भी प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है — वह यज्ञ करके श्रेयस्कर (उन्नत) हो जाता है।

मंत्र 69

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानां रसान्प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षातादित्यं दिवः ।। १ ।।

prajāpatirlokānabhyatapatteṣāṃ tapyamānānāṃ rasānprāvṛhadagniṃ pṛthivyā vāyumantarikṣātādityaṃ divaḥ || 1 ||

प्रजापति ने लोकों पर तप (ध्यान) किया। उन तप्त किए हुए लोकों से उन्होंने उनके सार खींच लिए — पृथ्वी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और द्युलोक से आदित्य।

मंत्र 70

स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानां रसान्प्रावृहदग्नेरृचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ।। २ ।।

sa etāstisro devatā abhyatapattāsāṃ tapyamānānāṃ rasānprāvṛhadagnerṛco vāyoryajūṃṣi sāmānyādityāt || 2 ||

उन्होंने इन तीन देवताओं पर तप किया। उन तप्त किए हुए देवताओं से उन्होंने उनके सार खींच लिए — अग्नि से ऋचाएँ, वायु से यजुष् और आदित्य से सामगान।

मंत्र 71

स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ।। ३ ।।

sa etāṃ trayīṃ vidyāmabhyatapattasyāstapyamānāyā rasānprāvṛhadbhūrityṛgbhyo bhuvariti yajurbhyaḥ svariti sāmabhyaḥ || 3 ||

उन्होंने इस त्रयी विद्या (तीनों वेदों) पर तप किया। उस तप्त की हुई विद्या से उन्होंने उसके सार खींच लिए — ऋचाओं से भूः, यजुष् से भुवः और सामों से स्वः।

मंत्र 72

तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति ।। ४ ।।

tadyadṛkto riṣyedbhūḥ svāheti gārhapatye juhuyādṛcāmeva tadrasenarcāṃ vīryeṇarcāṃ yajñasya viriṣṭaṃ saṃdadhāti || 4 ||

इसलिए यदि यज्ञ ऋचा की ओर से क्षतिग्रस्त हो जाए, तो वह गार्हपत्य अग्नि में भूः स्वाहा कहकर आहुति दे। इस प्रकार ऋचाओं के उसी सार से, ऋचाओं के वीर्य से, वह ऋचाओं की ओर से हुई यज्ञ की क्षति को जोड़ देता है (पूर्ण कर देता है)।

मंत्र 73

स यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति ।। ५ ।।

sa yadi yajuṣṭo riṣyedbhuvaḥ svāheti dakṣiṇāgnau juhuyādyajuṣāmeva tadrasena yajuṣāṃ vīryeṇa yajuṣāṃ yajñasya viriṣṭaṃ saṃdadhāti || 5 ||

और यदि यज्ञ यजुष् की ओर से क्षतिग्रस्त हो, तो वह दक्षिणाग्नि में भुवः स्वाहा कहकर आहुति दे। इस प्रकार यजुष् के सार से, यजुष् के वीर्य से, वह यजुष् की ओर से हुई यज्ञ की क्षति को जोड़ देता है।

मंत्र 74

अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति ।। ६ ।।

atha yadi sāmato riṣyetsvaḥ svāhetyāhavanīye juhuyātsāmnāmeva tadrasena sāmnāṃ vīryeṇa sāmnāṃ yajñasya viriṣṭaṃ saṃdadhāti || 6 ||

और यदि यज्ञ साम की ओर से क्षतिग्रस्त हो, तो वह आहवनीय अग्नि में स्वः स्वाहा कहकर आहुति दे। इस प्रकार सामों के सार से, सामों के वीर्य से, वह सामों की ओर से हुई यज्ञ की क्षति को जोड़ देता है।

मंत्र 75

तद्यथा लवणेन सुवर्णं संदध्यात्सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसं सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ।। ७ ।।

tadyathā lavaṇena suvarṇaṃ saṃdadhyātsuvarṇena rajataṃ rajatena trapu trapuṇā sīsaṃ sīsena lohaṃ lohena dāru dāru carmaṇā || 7 ||

जैसे कोई सुहागे (क्षार) से सोने को जोड़ता है, सोने से चाँदी को, चाँदी से राँगे को, राँगे से सीसे को, सीसे से लोहे को, लोहे से लकड़ी को, और लकड़ी को चमड़े से जोड़ता है —

मंत्र 76

एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टं संदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति ।। ८ ।।

evameṣāṃ lokānāmāsāṃ devatānāmasyāstrayyā vidyāyā vīryeṇa yajñasya viriṣṭaṃ saṃdadhāti bheṣajakṛto ha vā eṣa yajño yatraivaṃvidbrahmā bhavati || 8 ||

उसी प्रकार इन लोकों के, इन देवताओं के और इस त्रयी विद्या के वीर्य (सामर्थ्य) से मनुष्य यज्ञ की क्षति को जोड़ देता है। वह यज्ञ भेषज (औषधि) से युक्त — रोगमुक्त — होता है, जिसमें इस प्रकार का जानने वाला ब्रह्मा (ऋत्विक्) होता है।

मंत्र 77

एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ।। ९ ।।

eṣa ha vā udakpravaṇo yajño yatraivaṃvidbrahmā bhavatyevaṃvidaṃ ha vā eṣā brahmāṇamanugāthā yato yata āvartate tattadgacchati || 9 ||

यह यज्ञ उत्तराभिमुख (उन्नति की ओर प्रवण) होता है, जिसमें ऐसा जानने वाला ब्रह्मा होता है। और ऐसे जानने वाले ब्रह्मा के विषय में यह अनुगाथा (प्रशंसा-श्लोक) है — जहाँ-जहाँ यज्ञ में क्षति होती है, वहाँ-वहाँ यह जानने वाला ब्रह्मा पहुँच जाता है (और उसे पूर्ण कर देता है)।

मंत्र 78

मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ।। १० ।।

mānavo brahmaivaika ṛtvikkurūnaśvābhirakṣatyevaṃviddha vai brahmā yajñaṃ yajamānaṃ sarvāṃścartvijo’bhirakṣati tasmādevaṃvidameva brahmāṇaṃ kurvīta nānevaṃvidaṃ nānevaṃvidam || 10 ||

ब्रह्मा ही एकमात्र (श्रेष्ठ) मानव ऋत्विक् है; जैसे घोड़ी (अपने बच्चों की भाँति) रक्षा करती है, वैसे वह कुरुओं (उपस्थित यज्ञकर्ताओं) की रक्षा करता है। इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा यज्ञ की, यजमान की और समस्त ऋत्विजों की रक्षा करता है। इसलिए ऐसे ही जानने वाले को ब्रह्मा (के पद पर) नियुक्त करना चाहिए, कभी न जानने वाले को नहीं — न जानने वाले को नहीं।

पञ्चम प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ।। १ ।।

yo ha vai jyeṣṭhaṃ ca śreṣṭhaṃ ca veda jyeṣṭhaśca ha vai śreṣṭhaśca bhavati prāṇo vāva jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca || 1 ||

जो श्रेष्ठ और ज्येष्ठ को जानता है, वह स्वयं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। प्राण ही तो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।

मंत्र 2

यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ।। २ ।।

yo ha vai vasiṣṭhaṃ veda vasiṣṭho ha svānāṃ bhavati vāgvāva vasiṣṭhaḥ || 2 ||

जो वसिष्ठ को जानता है, वह अपने बन्धुओं में वसिष्ठ (सर्वाधिक समृद्ध) हो जाता है। वाणी ही वसिष्ठ है।

मंत्र 3

यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ।। ३ ।।

yo ha vai pratiṣṭhāṃ veda prati ha tiṣṭhatyasmiṃśca loke'muṣmiṃśca cakṣurvāva pratiṣṭhā || 3 ||

जो प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस लोक और परलोक — दोनों में प्रतिष्ठित रहता है। नेत्र ही प्रतिष्ठा है।

मंत्र 4

यो ह वै सम्पदं वेद संहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ।। ४ ।।

yo ha vai sampadaṃ veda saṃhāsmai kāmāḥ padyante daivāśca mānuṣāśca śrotraṃ vāva sampat || 4 ||

जो सम्पद् को जानता है, उसके लिए दैव और मानुष — सभी कामनाएँ सिद्ध होती हैं। श्रोत्र ही सम्पद् है।

मंत्र 5

यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ।। ५ ।।

yo ha vā āyatanaṃ vedāyatanaṃ ha svānāṃ bhavati mano ha vā āyatanam || 5 ||

जो आयतन (आश्रय) को जानता है, वह अपने बन्धुओं का आयतन बन जाता है। मन ही आयतन है।

मंत्र 6

अथ ह प्राणा अहंश्रेयसि व्यूदिरेऽहंश्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ।। ६ ।।

atha ha prāṇā ahaṃśreyasi vyūdire'haṃśreyānasmyahaṃ śreyānasmīti || 6 ||

तब प्राण (इन्द्रियाँ) श्रेष्ठता के विषय में परस्पर विवाद करने लगे — 'मैं श्रेष्ठ हूँ', 'मैं श्रेष्ठ हूँ'।

मंत्र 7

ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ।। ७ ।।

te ha prāṇāḥ prajāpatiṃ pitarametyocurbhagavanko naḥ śreṣṭha iti tānhovāca yasminva utkrānte śarīraṃ pāpiṣṭhataramiva dṛśyeta sa vaḥ śreṣṭha iti || 7 ||

वे प्राण अपने पिता प्रजापति के पास जाकर बोले — 'भगवन्, हममें कौन श्रेष्ठ है?' उन्होंने कहा — 'जिसके निकल जाने पर शरीर अधिक हीन-सा दिखाई दे, वही तुममें श्रेष्ठ है।'

मंत्र 8

सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ।। ८ ।।

sā ha vāguccakrāma sā saṃvatsaraṃ proṣya paryetyovāca kathamaśakatarte majjīvitumiti yathā kalā avadantaḥ prāṇantaḥ prāṇena paśyantaścakṣuṣā śṛṇvantaḥ śrotreṇa dhyāyanto manasaivamiti praviveśa ha vāk || 8 ||

वाणी निकल गई। एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटी और बोली — 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' उन्होंने कहा — 'जैसे गूँगे बिना बोले, पर प्राण से साँस लेते, नेत्र से देखते, कान से सुनते, मन से सोचते हुए जीते हैं — वैसे ही।' तब वाणी पुनः प्रवेश कर गई।

मंत्र 9

चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ।। ९ ।।

cakṣurhoccakrāma tatsaṃvatsaraṃ proṣya paryetyovāca kathamaśakatarte majjīvitumiti yathāndhā apaśyantaḥ prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā śṛṇvantaḥ śrotreṇa dhyāyanto manasaivamiti praviveśa ha cakṣuḥ || 9 ||

नेत्र निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटा और बोला — 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' उन्होंने कहा — 'जैसे अन्धे बिना देखे, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, कान से सुनते, मन से सोचते हुए जीते हैं — वैसे ही।' तब नेत्र पुनः प्रवेश कर गया।

मंत्र 10

श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ।। १० ।।

śrotraṃ hoccakrāma tatsaṃvatsaraṃ proṣya paryetyovāca kathamaśakatarte majjīvitumiti yathā badhirā aśṛṇvantaḥ prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā paśyantaścakṣuṣā dhyāyanto manasaivamiti praviveśa ha śrotram || 10 ||

श्रोत्र निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटा और बोला — 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' उन्होंने कहा — 'जैसे बहरे बिना सुने, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, नेत्र से देखते, मन से सोचते हुए जीते हैं — वैसे ही।' तब श्रोत्र पुनः प्रवेश कर गया।

मंत्र 11

मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ।। ११ ।।

mano hoccakrāma tatsaṃvatsaraṃ proṣya paryetyovāca kathamaśakatarte majjīvitumiti yathā bālā amanasaḥ prāṇantaḥ prāṇena vadanto vācā paśyantaścakṣuṣā śṛṇvantaḥ śrotreṇaivamiti praviveśa ha manaḥ || 11 ||

मन निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटा और बोला — 'मेरे बिना तुम कैसे जी सके?' उन्होंने कहा — 'जैसे बालक बिना विकसित मन के, पर प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, नेत्र से देखते, कान से सुनते हुए जीते हैं — वैसे ही।' तब मन पुनः प्रवेश कर गया।

मंत्र 12

अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तं हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ।। १२ ।।

atha ha prāṇa uccikramiṣansa yathā suhayaḥ paḍvīśaśaṅkūnsaṃkhidedevamitarānprāṇānsamakhidattaṃ hābhisametyocurbhagavannedhi tvaṃ naḥ śreṣṭho'si motkramīriti || 12 ||

तब जब प्राण निकलने को हुआ, तो जैसे कोई उत्तम घोड़ा अपने पैरों की खूँटियों को उखाड़ देता है, वैसे ही उसने अन्य प्राणों को उखाड़ना आरम्भ किया। वे उसके पास आकर बोले — 'भगवन्, आप ठहरिए, आप ही हममें श्रेष्ठ हैं, मत जाइए।'

मंत्र 13

अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ।। १३ ।।

atha hainaṃ vāguvāca yadahaṃ vasiṣṭho'smi tvaṃ tadvasiṣṭho'sītyatha hainaṃ cakṣuruvāca yadahaṃ pratiṣṭhāsmi tvaṃ tatpratiṣṭhāsīti || 13 ||

तब वाणी ने उससे कहा — 'जिस अर्थ में मैं वसिष्ठ हूँ, उस अर्थ में तुम ही वसिष्ठ हो।' फिर नेत्र ने कहा — 'जिस अर्थ में मैं प्रतिष्ठा हूँ, उस अर्थ में तुम ही प्रतिष्ठा हो।'

मंत्र 14

अथ हैनंश्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ।। १४ ।।

atha hainaṃśrotramuvāca yadahaṃ sampadasmi tvaṃ tatsampadasītyatha hainaṃ mana uvāca yadahamāyatanamasmi tvaṃ tadāyatanamasīti || 14 ||

फिर श्रोत्र ने कहा — 'जिस अर्थ में मैं सम्पद् हूँ, उस अर्थ में तुम ही सम्पद् हो।' फिर मन ने कहा — 'जिस अर्थ में मैं आयतन हूँ, उस अर्थ में तुम ही आयतन हो।'

मंत्र 15

न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ।। १५ ।।

na vai vāco na cakṣūṃṣi na śrotrāṇi na manāṃsītyācakṣate prāṇā ityevācakṣate prāṇo hyevaitāni sarvāṇi bhavati || 15 ||

लोग इन्हें न वाणियाँ कहते हैं, न नेत्र, न श्रोत्र, न मन — वे इन्हें प्राण ही कहते हैं। क्योंकि प्राण ही ये सब बन जाता है।

मंत्र 16

स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किंचिदिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवतीति ।। १ ।।

sa hovāca kiṃ me'nnaṃ bhaviṣyatīti yatkiṃcididamā śvabhya ā śakunibhya iti hocustadvā etadanasyānnamano ha vai nāma pratyakṣaṃ na ha vā evaṃvidi kiṃcanānannaṃ bhavatīti || 1 ||

उस (प्राण) ने पूछा — 'मेरा अन्न क्या होगा?' उन्होंने कहा — 'जो कुछ भी है, कुत्तों और पक्षियों तक का, वह सब।' यही 'अन' (प्राण) का अन्न है। 'अन' उसका प्रत्यक्ष नाम है। जो ऐसा जानता है, उसके लिए कुछ भी अनन्न (अखाद्य) नहीं रहता।

मंत्र 17

स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ।। २ ।।

sa hovāca kiṃ me vāso bhaviṣyatītyāpa iti hocustasmādvā etadaśiṣyantaḥ purastāccopariṣṭāccādbhiḥ paridadhati lambhuko ha vāso bhavatyanagno ha bhavati || 2 ||

उसने पूछा — 'मेरा वस्त्र क्या होगा?' उन्होंने कहा — 'जल।' इसीलिए भोजन करने वाले पहले और पीछे जल से (प्राण को) आच्छादित करते हैं। इस प्रकार वह वस्त्र पा लेता है, नग्न नहीं रहता।

मंत्र 18

तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येनच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ।। ३ ।।

taddhaitatsatyakāmo jābālo gośrutaye vaiyāghrapadyāyoktvovāca yadyapyenacchuṣkāya sthāṇave brūyājjāyerannevāsmiñchākhāḥ praroheyuḥ palāśānīti || 3 ||

यही बात सत्यकाम जाबाल ने गोश्रुति वैयाघ्रपद्य से कहकर आगे कहा — 'यदि इसे सूखे ठूँठ से भी कहा जाए, तो उसमें भी शाखाएँ फूट पड़ें और पत्ते उग आएँ।'

मंत्र 19

अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ।। ४ ।।

atha yadi mahajjigamiṣedamāvāsyāyāṃ dīkṣitvā paurṇamāsyāṃ rātrau sarvauṣadhasya manthaṃ dadhimadhunorupamathya jyeṣṭhāya śreṣṭhāya svāhetyagnāvājyasya hutvā manthe sampātamavanayet || 4 ||

अब यदि कोई महत्ता प्राप्त करना चाहे, तो अमावस्या के दिन दीक्षा लेकर, पूर्णिमा की रात्रि में सब ओषधियों का मन्थ दही और मधु मिलाकर तैयार करे, और 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' कहकर अग्नि में घृत की आहुति देकर बचा हुआ भाग मन्थ में डाल दे।

मंत्र 20

वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत्प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत्सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ।। ५ ।।

vasiṣṭhāya svāhetyagnāvājyasya hutvā manthe sampātamavanayetpratiṣṭhāyai svāhetyagnāvājyasya hutvā manthe sampātamavanayetsampade svāhetyagnāvājyasya hutvā manthe sampātamavanayedāyatanāya svāhetyagnāvājyasya hutvā manthe sampātamavanayet || 5 ||

'वसिष्ठाय स्वाहा' कहकर अग्नि में घृत की आहुति देकर बचा भाग मन्थ में डाले; 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' कहकर वैसे ही करे; 'सम्पदे स्वाहा' कहकर वैसे ही; 'आयतनाय स्वाहा' कहकर वैसे ही, प्रत्येक बार बचा हुआ भाग मन्थ में डालता जाए।

मंत्र 21

अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रैष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदं सर्वमसानीति ।। ६ ।।

atha pratisṛpyāñjalau manthamādhāya japatyamo nāmāsyamā hi te sarvamidaṃ sa hi jyeṣṭhaḥ śreṣṭho rājādhipatiḥ sa mā jyaiṣṭhyaṃ śraiṣṭhyaṃ rājyamādhipatyaṃ gamayatvahamevedaṃ sarvamasānīti || 6 ||

फिर पीछे हटकर, अंजलि में मन्थ रखकर जप करे — 'तू अम नाम वाला है, क्योंकि यह सब तुझमें ही है; तू ही ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा और अधिपति है। वह मुझे ज्येष्ठता, श्रेष्ठता, राज्य और आधिपत्य तक पहुँचाए; मैं ही यह सब हो जाऊँ।'

मंत्र 22

अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत्समृद्धं कर्मेति विद्यात् ।। ७ ।।

atha khalvetayarcā paccha ācāmati tatsaviturvṛṇīmaha ityācāmati vayaṃ devasya bhojanamityācāmati śreṣṭhaṃ sarvadhātamamityācāmati turaṃ bhagasya dhīmahīti sarvaṃ pibati nirṇijya kaṃsaṃ camasaṃ vā paścādagneḥ saṃviśati carmaṇi vā sthaṇḍile vā vācaṃyamo'prasāhaḥ sa yadi striyaṃ paśyetsamṛddhaṃ karmeti vidyāt || 7 ||

फिर इस ऋचा के एक-एक पद से आचमन करे — 'तत्सवितुर्वृणीमहे' कहकर आचमन करे, 'वयं देवस्य भोजनम्' कहकर, 'श्रेष्ठं सर्वधातमम्' कहकर, 'तुरं भगस्य धीमहि' कहकर सब पी जाए। पात्र या चमस को धोकर वह अग्नि के पीछे चर्म या भूमि पर मौन और अप्रतिरोधी होकर लेट जाए। यदि वह स्त्री देखे, तो जाने कि कर्म सफल हुआ।

मंत्र 23

तदेष श्लोको यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यन्ति समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने ।। ८ ।।

tadeṣa śloko yadā karmasu kāmyeṣu striyaṃ svapneṣu paśyanti samṛddhiṃ tatra jānīyāttasminsvapnanidarśane tasminsvapnanidarśane || 8 ||

इस विषय में यह श्लोक है — जब कोई सकाम कर्मों के करते समय स्वप्न में स्त्री देखे, तो उस स्वप्न-दर्शन में सफलता जाने, उस स्वप्न-दर्शन में।

मंत्र 24

श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ।। १ ।।

śvetaketurhāruṇeyaḥ pañcālānāṃ samitimeyāya taṃ ha pravāhaṇo jaivaliruvāca kumārānu tvāśiṣatpitetyanu hi bhagava iti || 1 ||

आरुणि के पौत्र श्वेतकेतु पञ्चालों की समिति (सभा) में गए। वहाँ प्रवाहण जैवलि ने उनसे कहा — 'हे कुमार, क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें शिक्षा दी है?' 'हाँ भगवन्,' उन्होंने कहा।

मंत्र 25

वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना३ इति न भगव इति ।। २ ।।

vettha yadito'dhi prajāḥ prayantīti na bhagava iti vettha yathā punarāvartanta3 iti na bhagava iti vettha pathordevayānasya pitṛyāṇasya ca vyāvartanā3 iti na bhagava iti || 2 ||

'क्या तुम जानते हो कि प्राणी यहाँ से कहाँ जाते हैं?' 'नहीं भगवन्।' 'क्या जानते हो कि वे कैसे लौटते हैं?' 'नहीं भगवन्।' 'क्या जानते हो कि देवयान और पितृयाण मार्ग कहाँ पृथक् होते हैं?' 'नहीं भगवन्।'

मंत्र 26

वेत्थ यथासौ लोको न सम्पूर्यत३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ।। ३ ।।

vettha yathāsau loko na sampūryata3 iti na bhagava iti vettha yathā pañcamyāmāhutāvāpaḥ puruṣavacaso bhavantīti naiva bhagava iti || 3 ||

'क्या तुम जानते हो कि वह लोक कैसे नहीं भरता?' 'नहीं भगवन्।' 'क्या जानते हो कि पाँचवीं आहुति में जल 'पुरुष' नाम से क्यों पुकारा जाता है?' 'नहीं ही भगवन्।'

मंत्र 27

अथानु किमनुशिष्ठोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथं सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति स हायस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ।। ४ ।।

athānu kimanuśiṣṭho'vocathā yo hīmāni na vidyātkathaṃ so'nuśiṣṭo bruvīteti sa hāyastaḥ piturardhameyāya taṃ hovācānanuśiṣya vāva kila mā bhagavānabravīdanu tvāśiṣamiti || 4 ||

'तो फिर तुमने क्यों कहा कि तुम शिक्षित हो? जो इन बातों को नहीं जानता, वह कैसे कह सकता है कि उसे शिक्षा मिली है?' दुखी होकर वह पिता के पास गया और बोला — 'बिना ठीक से शिक्षा दिए ही, भगवन्, आपने कहा कि आपने मुझे पढ़ा दिया है।'

मंत्र 28

पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकंचनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकंचन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ।। ५ ।।

pañca mā rājanyabandhuḥ praśnānaprākṣītteṣāṃ naikaṃcanāśakaṃ vivaktumiti sa hovāca yathā mā tvaṃ tadaitānavado yathāhameṣāṃ naikaṃcana veda yadyahamimānavediṣyaṃ kathaṃ te nāvakṣyamiti || 5 ||

'उस राजन्यबन्धु ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे; उनमें से एक का भी मैं उत्तर न दे सका।' पिता ने कहा — 'जैसे तुमने ये मुझे बताए, वैसे ही मैं भी इनमें से एक को नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता, तो तुम्हें क्यों न बताता?'

मंत्र 29

स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हां चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन्मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव ।। ६ ।।

sa ha gautamo rājño'rdhameyāya tasmai ha prāptāyārhāṃ cakāra sa ha prātaḥ sabhāga udeyāya taṃ hovāca mānuṣasya bhagavangautama vittasya varaṃ vṛṇīthā iti sa hovāca tavaiva rājanmānuṣaṃ vittaṃ yāmeva kumārasyānte vācamabhāṣathāstāmeva me brūhīti sa ha kṛcchrī babhūva || 6 ||

तब गौतम राजा के पास गए। आने पर राजा ने उनका यथोचित सत्कार किया। प्रातःकाल जब राजा सभा में आया तब गौतम ने कहा। राजा बोला — 'भगवन् गौतम, मानुष सम्पत्ति का कोई वर माँगिए।' गौतम ने कहा — 'हे राजन्, मानुष सम्पत्ति तुम्हारे ही पास रहे; जो वाणी तुमने कुमार से कही, वही मुझे बताओ।' राजा संकट में पड़ गया।

मंत्र 30

तं ह चिरं वसेत्याज्ञापयांचकार तं होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक्त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ।। ७ ।।

taṃ ha ciraṃ vasetyājñāpayāṃcakāra taṃ hovāca yathā mā tvaṃ gautamāvado yatheyaṃ na prāktvattaḥ purā vidyā brāhmaṇāngacchati tasmādu sarveṣu lokeṣu kṣatrasyaiva praśāsanamabhūditi tasmai hovāca || 7 ||

राजा ने उसे बहुत काल ठहरने की आज्ञा दी और फिर कहा — 'हे गौतम, जैसा तुमने मुझसे कहा — क्योंकि तुमसे पहले यह विद्या किसी ब्राह्मण के पास नहीं गई, इसीलिए सब लोकों में इसका उपदेश क्षत्रिय के ही अधिकार में रहा।' और तब उसने उसे बताया।

मंत्र 31

असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ।। १ ।।

asau vāva loko gautamāgnistasyāditya eva samidraśmayo dhūmo'hararciścandramā aṅgārā nakṣatrāṇi visphuliṅgāḥ || 1 ||

हे गौतम, वह (द्यु) लोक ही अग्नि है। सूर्य उसकी समिधा है, किरणें धूम, दिन ज्वाला, चन्द्रमा अंगार, और नक्षत्र चिनगारियाँ हैं।

मंत्र 32

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या अहुतेः सोमो राजा संभवति ।। २ ।।

tasminnetasminnagnau devāḥ śraddhāṃ juhvati tasyā ahuteḥ somo rājā saṃbhavati || 2 ||

उस इस अग्नि में देवगण श्रद्धा की आहुति देते हैं। उस आहुति से सोम राजा उत्पन्न होते हैं।

मंत्र 33

पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गाराह्रादनयो विस्फुलिङ्गाः ।। १ ।।

parjanyo vāva gautamāgnistasya vāyureva samidabhraṃ dhūmo vidyudarciraśaniraṅgārāhrādanayo visphuliṅgāḥ || 1 ||

हे गौतम, पर्जन्य (वर्षा का मेघ) ही अग्नि है। वायु उसकी समिधा है, मेघ धूम, विद्युत् ज्वाला, वज्र अंगार, और गर्जन चिनगारियाँ हैं।

मंत्र 34

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्षं संभवति ।। २ ।।

tasminnetasminnagnau devāḥ somaṃ rājānaṃ juhvati tasyā āhutervarṣaṃ saṃbhavati || 2 ||

उस इस अग्नि में देवगण सोम राजा की आहुति देते हैं। उस आहुति से वर्षा उत्पन्न होती है।

मंत्र 35

पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ।। १ ।।

pṛthivī vāva gautamāgnistasyāḥ saṃvatsara eva samidākāśo dhūmo rātrirarcirdiśo'ṅgārā avāntaradiśo visphuliṅgāḥ || 1 ||

हे गौतम, पृथ्वी ही अग्नि है। संवत्सर (वर्ष) उसकी समिधा है, आकाश धूम, रात्रि ज्वाला, दिशाएँ अंगार, और अवान्तर दिशाएँ चिनगारियाँ हैं।

मंत्र 36

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नं संभवति ।। २ ।।

tasminnetasminnagnau devā varṣaṃ juhvati tasyā āhuterannaṃ saṃbhavati || 2 ||

उस इस अग्नि में देवगण वर्षा की आहुति देते हैं। उस आहुति से अन्न उत्पन्न होता है।

मंत्र 37

पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ।। १ ।।

puruṣo vāva gautamāgnistasya vāgeva samitprāṇo dhūmo jihvārciścakṣuraṅgārāḥ śrotraṃ visphuliṅgāḥ || 1 ||

हे गौतम, पुरुष ही अग्नि है। वाणी उसकी समिधा है, प्राण धूम, जिह्वा ज्वाला, नेत्र अंगार, और श्रोत्र चिनगारियाँ हैं।

मंत्र 38

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः सम्भवति ।। २ ।।

tasminnetasminnagnau devā annaṃ juhvati tasyā āhute retaḥ sambhavati || 2 ||

उस इस अग्नि में देवगण अन्न की आहुति देते हैं। उस आहुति से रेतस् (वीर्य) उत्पन्न होता है।

मंत्र 39

योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ।। १ ।।

yoṣā vāva gautamāgnistasyā upastha eva samidyadupamantrayate sa dhūmo yonirarciryadantaḥ karoti te'ṅgārā abhinandā visphuliṅgāḥ || 1 ||

हे गौतम, स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ समिधा है, आमन्त्रण धूम, योनि ज्वाला, भीतर का व्यापार अंगार, और आनन्द चिनगारियाँ हैं।

मंत्र 40

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति ।। २ ।।

tasminnetasminnagnau devā reto juhvati tasyā āhutergarbhaḥ saṃbhavati || 2 ||

उस इस अग्नि में देवगण रेतस् की आहुति देते हैं। उस आहुति से गर्भ उत्पन्न होता है।

मंत्र 41

इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ।। १ ।।

iti tu pañcamyāmāhutāvāpaḥ puruṣavacaso bhavantīti sa ulbāvṛto garbho daśa vā nava vā māsānantaḥ śayitvā yāvadvātha jāyate || 1 ||

इस प्रकार पाँचवीं आहुति में जल 'पुरुष' नाम से पुकारे जाते हैं। वह गर्भ उल्ब (झिल्ली) से ढका हुआ, दस या नौ मास, या जितने काल तक भीतर रहकर, फिर जन्म लेता है।

मंत्र 42

स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ।। २ ।।

sa jāto yāvadāyuṣaṃ jīvati taṃ pretaṃ diṣṭamito'gnaya eva haranti yata eveto yataḥ saṃbhūto bhavati || 2 ||

जन्म लेकर वह अपनी आयु पर्यन्त जीता है। मृत्यु के बाद, दिवंगत होने पर, उसे उसी अग्नि तक ले जाते हैं — जिससे वह आया, जिससे उत्पन्न हुआ था।

मंत्र 43

तद्य इत्थं विदुः। ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेऽर्चिषमभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान् ।। १ ।।

tadya itthaṃ viduḥ| ye ceme'raṇye śraddhā tapa ityupāsate te'rciṣamabhisaṃbhavantyarciṣo'harahna āpūryamāṇapakṣamāpūryamāṇapakṣādyānṣaḍudaṅṅeti māsāṃstān || 1 ||

जो इस प्रकार जानते हैं, और जो वन में श्रद्धा को ही तप मानकर उपासना करते हैं — वे अर्चि (ज्वाला) को प्राप्त होते हैं; अर्चि से दिन को, दिन से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उन छह मासों को जिनमें सूर्य उत्तर की ओर जाता है।

मंत्र 44

मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ।। २ ।।

māsebhyaḥ saṃvatsaraṃ saṃvatsarādādityamādityāccandramasaṃ candramaso vidyutaṃ tatpuruṣo'mānavaḥ sa enānbrahma gamayatyeṣa devayānaḥ panthā iti || 2 ||

मासों से संवत्सर को, संवत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्द्रमा को, चन्द्रमा से विद्युत् को। वहाँ एक अमानव (मनुष्य नहीं) पुरुष उन्हें ब्रह्म तक पहुँचाता है। यही देवयान मार्ग है।

मंत्र 45

अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड्दक्षिणैति मासांस्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ।। ३ ।।

atha ya ime grāma iṣṭāpūrte dattamityupāsate te dhūmamabhisaṃbhavanti dhūmādrātriṃ rātreraparapakṣamaparapakṣādyānṣaḍdakṣiṇaiti māsāṃstānnaite saṃvatsaramabhiprāpnuvanti || 3 ||

किन्तु जो गाँव में यज्ञ, इष्टापूर्त और दान को ही उपासना मानते हैं — वे धूम को प्राप्त होते हैं; धूम से रात्रि को, रात्रि से कृष्ण पक्ष को, कृष्ण पक्ष से उन छह मासों को जिनमें सूर्य दक्षिण की ओर जाता है। ये संवत्सर तक नहीं पहुँचते।

मंत्र 46

मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ।। ४ ।।

māsebhyaḥ pitṛlokaṃ pitṛlokādākāśamākāśāccandramasameṣa somo rājā taddevānāmannaṃ taṃ devā bhakṣayanti || 4 ||

मासों से पितृलोक को, पितृलोक से आकाश को, आकाश से चन्द्रमा को। यही सोम राजा है। वही देवों का अन्न है; उसे देव भक्षण करते हैं।

मंत्र 47

तस्मिन्यवात्सम्पातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ।। ५ ।।

tasminyavātsampātamuṣitvāthaitamevādhvānaṃ punarnivartante yathetamākāśamākāśādvāyuṃ vāyurbhūtvā dhūmo bhavati dhūmo bhūtvābhraṃ bhavati || 5 ||

वहाँ जब तक कर्म का शेष रहता है, उतना काल रहकर वे फिर उसी मार्ग से लौटते हैं — जैसे आए थे, वैसे आकाश को; आकाश से वायु को; वायु होकर धूम बनते हैं; धूम होकर अभ्र (कुहासा) बनते हैं।

मंत्र 48

अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ।। ६ ।।

abhraṃ bhūtvā megho bhavati megho bhūtvā pravarṣati ta iha vrīhiyavā oṣadhivanaspatayastilamāṣā iti jāyante'to vai khalu durniṣprapataraṃ yo yo hyannamatti yo retaḥ siñcati tadbhūya eva bhavati || 6 ||

अभ्र होकर मेघ बनते हैं; मेघ होकर बरसते हैं। वे यहाँ चावल, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द के रूप में उत्पन्न होते हैं। इससे निकलना अत्यन्त कठिन है; क्योंकि जो-जो उस अन्न को खाता है और रेतस् सींचता है, वह उसी रूप में फिर हो जाता है।

मंत्र 49

तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ।। ७ ।।

tadya iha ramaṇīyacaraṇā abhyāśo ha yatte ramaṇīyāṃ yonimāpadyeranbrāhmaṇayoniṃ vā kṣatriyayoniṃ vā vaiśyayoniṃ vātha ya iha kapūyacaraṇā abhyāśo ha yatte kapūyāṃ yonimāpadyerañśvayoniṃ vā sūkarayoniṃ vā caṇḍālayoniṃ vā || 7 ||

यहाँ जिनका आचरण रमणीय (शुभ) रहा हो, उनके लिए सम्भावना है कि वे रमणीय योनि — ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य की योनि — प्राप्त करें। किन्तु जिनका आचरण यहाँ निन्दनीय रहा हो, वे निन्दनीय योनि — कुत्ते, सूअर या चण्डाल की योनि — प्राप्त कर सकते हैं।

मंत्र 50

अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयंस्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेष श्लोकः ।। ८ ।।

athaitayoḥ pathorna katareṇacana tānīmāni kṣudrāṇyasakṛdāvartīni bhūtāni bhavanti jāyasva mriyasvetyetattṛtīyaṃsthānaṃ tenāsau loko na sampūryate tasmājjugupseta tadeṣa ślokaḥ || 8 ||

किन्तु इन दोनों मार्गों में से किसी से भी वे क्षुद्र प्राणी नहीं जाते, जो बार-बार आवर्तित होते रहते हैं — 'जन्म लो और मरो' — यही तीसरा स्थान है। इसी से वह लोक नहीं भरता। इसलिए मनुष्य को (इस गति से) बचना चाहिए। इस विषय में यह श्लोक है —

मंत्र 51

स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तैरिति ।। ९ ।।

steno hiraṇyasya surāṃ pibaṃśca gurostalpamāvasanbrahmahā caite patanti catvāraḥ pañcamaścācaraṃstairiti || 9 ||

सोना चुराने वाला, मदिरा पीने वाला, गुरु की शय्या को दूषित करने वाला, और ब्रह्महत्या करने वाला — ये चारों पतित होते हैं, और पाँचवाँ वह जो इनका संग करता है।

मंत्र 52

अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न सह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ।। १० ।।

atha ha ya etānevaṃ pañcāgnīnveda na saha tairapyācaranpāpmanā lipyate śuddhaḥ pūtaḥ puṇyaloko bhavati ya evaṃ veda ya evaṃ veda || 10 ||

किन्तु जो इन पाँच अग्नियों को इस प्रकार जानता है, वह उनके साथ रहकर भी पाप से लिप्त नहीं होता। जो ऐसा जानता है, वह शुद्ध, पवित्र और पुण्यलोक वाला होता है — जो ऐसा जानता है, जो ऐसा जानता है।

मंत्र 53

प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसां चक्रुः को न आत्मा किं ब्रह्मेति ।। १ ।।

prācīnaśāla aupamanyavaḥ satyayajñaḥ pauluṣirindradyumno bhāllaveyo janaḥ śārkarākṣyo buḍila āśvatarāśviste haite mahāśālā mahāśrotriyāḥ sametya mīmāṃsāṃ cakruḥ ko na ātmā kiṃ brahmeti || 1 ||

प्राचीनशाल औपमन्यव, सत्ययज्ञ पौलुषि, इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय, जन शार्कराक्ष्य और बुडिल आश्वतराश्वि — ये बड़े गृहस्थ और महान् श्रोत्रिय एकत्र होकर विचार करने लगे — 'हमारा आत्मा कौन है? ब्रह्म क्या है?'

मंत्र 54

ते ह सम्पादयांचक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ।। २ ।।

te ha sampādayāṃcakruruddālako vai bhagavanto'yamāruṇiḥ sampratīmamātmānaṃ vaiśvānaramadhyeti taṃ hantābhyāgacchāmeti taṃ hābhyājagmuḥ || 2 ||

उन्होंने निश्चय किया — 'हे महानुभावो, यह जो आरुणि उद्दालक हैं, वे इस समय इसी आत्मा वैश्वानर का अध्ययन कर रहे हैं। आओ, हम उनके पास चलें।' और वे उनके पास गए।

मंत्र 55

स ह सम्पादयांचकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ।। ३ ।।

sa ha sampādayāṃcakāra prakṣyanti māmime mahāśālā mahāśrotriyāstebhyo na sarvamiva pratipatsye hantāhamanyamabhyanuśāsānīti || 3 ||

उद्दालक ने विचार किया — 'ये महान् श्रोत्रिय गृहस्थ मुझसे प्रश्न करेंगे; मैं शायद उन्हें सब कुछ न बता सकूँ। अच्छा, मैं इन्हें किसी और के पास भेज दूँ।'

मंत्र 56

तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तंहन्ताभ्यागच्छामेति तंहाभ्याजग्मुः ।। ४ ।।

tānhovācāśvapatirvai bhagavanto'yaṃ kaikeyaḥ sampratīmamātmānaṃ vaiśvānaramadhyeti taṃhantābhyāgacchāmeti taṃhābhyājagmuḥ || 4 ||

उसने उनसे कहा — 'हे महानुभावो, यह जो अश्वपति कैकेय हैं, वे इस समय इसी आत्मा वैश्वानर का अध्ययन कर रहे हैं। आओ, हम उनके पास चलें।' और वे उनके पास गए।

मंत्र 57

तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयांचकार स ह प्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कर्दर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ।। ५ ।।

tebhyo ha prāptebhyaḥ pṛthagarhāṇi kārayāṃcakāra sa ha prātaḥ saṃjihāna uvāca na me steno janapade na kardaryo na madyapo nānāhitāgnirnāvidvānna svairī svairiṇī kuto yakṣyamāṇo vai bhagavanto'hamasmi yāvadekaikasmā ṛtvije dhanaṃ dāsyāmi tāvadbhagavadbhyo dāsyāmi vasantu bhagavanta iti || 5 ||

उनके पहुँचने पर राजा ने प्रत्येक के लिए अलग-अलग सत्कार करवाया। प्रातःकाल उठकर उसने कहा — 'मेरे राज्य में न कोई चोर है, न कंजूस, न मद्यप, न अग्निहीन, न अविद्वान, न व्यभिचारी — व्यभिचारिणी तो कहाँ। हे महानुभावो, मैं यज्ञ करने वाला हूँ; प्रत्येक ऋत्विज को जितना धन दूँगा, उतना ही आप लोगों को भी दूँगा। आप ठहरिए।'

मंत्र 58

ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तंहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ।। ६ ।।

te hocuryena haivārthena puruṣaścarettaṃhaiva vadedātmānamevemaṃ vaiśvānaraṃ sampratyadhyeṣi tameva no brūhīti || 6 ||

उन्होंने कहा — 'जिस प्रयोजन से मनुष्य किसी के पास जाए, उसी विषय में उससे कहना चाहिए। आप इस समय इसी आत्मा वैश्वानर को जानते हैं; वही हमें बताइए।'

मंत्र 59

तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्णे प्रतिचक्रमिरे तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ।। ७ ।।

tānhovāca prātarvaḥ prativaktāsmīti te ha samitpāṇayaḥ pūrvāhṇe praticakramire tānhānupanīyaivaitaduvāca || 7 ||

उसने उनसे कहा — 'कल प्रातः मैं तुम्हें उत्तर दूँगा।' तब वे हाथ में समिधा लेकर (शिष्यभाव से) प्रातःकाल उसके पास आए। बिना विधिवत् उपनयन किए ही उसने यह कहा —

मंत्र 60

औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ।। १ ।।

aupamanyava kaṃ tvamātmānamupāssa iti divameva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai sutejā ātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttava sutaṃ prasutamāsutaṃ kule dṛśyate || 1 ||

'हे औपमन्यव, तुम किसे आत्मा मानकर उपासना करते हो?' 'हे भगवन् राजन्, द्यु (स्वर्ग) को ही,' उसने कहा। राजा बोला — 'जिसे तुम आत्मा मानकर उपासते हो, वह सुतेजा (देदीप्यमान) वैश्वानर आत्मा है। इसीलिए तुम्हारे कुल में सोम अभिषुत, प्रसुत और आसुत — तीनों रूपों में दिखाई देता है।'

मंत्र 61

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूधा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ।। २ ।।

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste mūdhā tveṣa ātmana iti hovāca mūrdhā te vyapatiṣyadyanmāṃ nāgamiṣya iti || 2 ||

'तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो; जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है, वह अन्न खाता है, प्रिय देखता है, और उसके कुल में ब्रह्मतेज रहता है। किन्तु यह तो आत्मा का केवल मस्तक है,' राजा ने कहा; 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता।'

मंत्र 62

अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ।। १ ।।

atha hovāca satyayajñaṃ pauluṣiṃ prācīnayogya kaṃ tvamātmānamupāssa ityādityameva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai viśvarūpa ātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttava bahu viśvarūpaṃ kule dṛśyate || 1 ||

फिर उसने सत्ययज्ञ पौलुषि से कहा — 'हे प्राचीनयोग्य, तुम किसे आत्मा मानकर उपासते हो?' 'हे भगवन् राजन्, आदित्य को ही,' उसने कहा। राजा बोला — 'जिसे तुम आत्मा मानकर उपासते हो, वह विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है। इसीलिए तुम्हारे कुल में बहुत-सा विश्वरूप (नाना प्रकार का धन) दिखाई देता है।'

मंत्र 63

प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुषेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ।। २ ।।

pravṛtto'śvatarīratho dāsīniṣko'tsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste cakṣuṣetadātmana iti hovācāndho'bhaviṣyo yanmāṃ nāgamiṣya iti || 2 ||

'तुम्हारे यहाँ खच्चरों का रथ चलता है, दासियाँ और स्वर्ण-आभूषण हैं; तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो; जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज रहता है। किन्तु यह तो आत्मा का नेत्र है,' राजा ने कहा; 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम अन्धे हो जाते।'

मंत्र 64

अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ।। १ ।।

atha hovācendradyumnaṃ bhāllaveyaṃ vaiyāghrapadya kaṃ tvamātmānamupāssa iti vāyumeva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai pṛthagvartmātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttvāṃ pṛthagbalaya āyanti pṛthagrathaśreṇayo'nuyanti || 1 ||

फिर उसने इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय से कहा — 'हे वैयाघ्रपद्य, तुम किसे आत्मा मानकर उपासते हो?' 'हे भगवन् राजन्, वायु को ही,' उसने कहा। राजा बोला — 'वह पृथग्वर्त्म (नाना मार्गों वाला) वैश्वानर आत्मा है। इसीलिए तुम्हारे पास पृथक्-पृथक् बलि (भेंटें) आती हैं और पृथक्-पृथक् रथ-श्रेणियाँ अनुगमन करती हैं।'

मंत्र 65

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ।। २ ।।

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste prāṇastveṣa ātmana iti hovāca prāṇasta udakramiṣyadyanmāṃ nāgamiṣya iti || 2 ||

'तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो; जो इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज रहता है। किन्तु यह तो आत्मा का प्राण है,' राजा ने कहा; 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण निकल जाता।'

मंत्र 66

अथ होवाच जनंशार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपस्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ।। १ ।।

atha hovāca janaṃśārkarākṣya kaṃ tvamātmānamupāssa ityākāśameva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai bahula ātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupasse tasmāttvaṃ bahulo'si prajayā ca dhanena ca || 1 ||

फिर उसने जन शार्कराक्ष्य से कहा — 'तुम किसे आत्मा मानकर उपासते हो?' 'हे भगवन् राजन्, आकाश को ही,' उसने कहा। राजा बोला — 'वह बहुल वैश्वानर आत्मा है। इसीलिए तुम सन्तान और धन से बहुल (सम्पन्न) हो।'

मंत्र 67

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ।। २ ।।

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste saṃdehastveṣa ātmana iti hovāca saṃdehaste vyaśīryadyanmāṃ nāgamiṣya iti || 2 ||

'तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो; जो इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज रहता है। किन्तु यह तो आत्मा का सन्देह (मध्यभाग) है,' राजा ने कहा; 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मध्यभाग नष्ट हो जाता।'

मंत्र 68

अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वंरयिमान्पुष्टिमानसि ।। १ ।।

atha hovāca buḍilamāśvatarāśviṃ vaiyāghrapadya kaṃ tvamātmānamupāssa ityapa eva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai rayirātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttvaṃrayimānpuṣṭimānasi || 1 ||

फिर उसने बुडिल आश्वतराश्वि से कहा — 'हे वैयाघ्रपद्य, तुम किसे आत्मा मानकर उपासते हो?' 'हे भगवन् राजन्, जल को ही,' उसने कहा। राजा बोला — 'वह रयि (धन) वैश्वानर आत्मा है। इसीलिए तुम धनवान और पुष्टिमान हो।'

मंत्र 69

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ।। २ ।।

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste bastistveṣa ātmana iti hovāca bastiste vyabhetsyadyanmāṃ nāgamiṣya iti || 2 ||

'तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो; जो इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज रहता है। किन्तु यह तो आत्मा का बस्ति (मूत्राशय) है,' राजा ने कहा; 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा बस्ति फट जाता।'

मंत्र 70

अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपस्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ।। १ ।।

atha hovācoddālakamāruṇiṃ gautama kaṃ tvamātmānamupassa iti pṛthivīmeva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai pratiṣṭhātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttvaṃ pratiṣṭhito'si prajayā ca paśubhiśca || 1 ||

फिर उसने आरुणि उद्दालक से कहा — 'हे गौतम, तुम किसे आत्मा मानकर उपासते हो?' 'हे भगवन् राजन्, पृथ्वी को ही,' उसने कहा। राजा बोला — 'वह प्रतिष्ठा वैश्वानर आत्मा है। इसीलिए तुम सन्तान और पशुओं से प्रतिष्ठित हो।'

मंत्र 71

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ।। २ ।।

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste pādau tvetāvātmana iti hovāca pādau te vyamlāsyetāṃ yanmāṃ nāgamiṣya iti || 2 ||

'तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो; जो इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज रहता है। किन्तु ये तो आत्मा के दोनों पाद हैं,' राजा ने कहा; 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे पाद सूख जाते।'

मंत्र 72

तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ।। १ ।।

tānhovācaite vai khalu yūyaṃ pṛthagivemamātmānaṃ vaiśvānaraṃ vidvāṃso'nnamattha yastvetamevaṃ prādeśamātramabhivimānamātmānaṃ vaiśvānaramupāste sa sarveṣu lokeṣu sarveṣu bhūteṣu sarveṣvātmasvannamatti || 1 ||

तब उसने उन सबसे कहा — 'तुम लोग इस वैश्वानर आत्मा को मानो अलग-अलग (खण्ड-खण्ड) जानकर अन्न खाते हो। किन्तु जो इस वैश्वानर आत्मा को — जो प्रादेशमात्र (एक बित्ते-भर) होकर भी अभिविमान (अपरिमेय) है — इस प्रकार उपासता है, वह सब लोकों में, सब भूतों में, सब आत्माओं में अन्न खाता है।'

मंत्र 73

तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ।। २ ।।

tasya ha vā etasyātmano vaiśvānarasya mūrdhaiva sutejāścakṣurviśvarūpaḥ prāṇaḥ pṛthagvartmātmā saṃdeho bahulo bastireva rayiḥ pṛthivyeva pādāvura eva vedirlomāni barhirhṛdayaṃ gārhapatyo mano'nvāhāryapacana āsyamāhavanīyaḥ || 2 ||

इस वैश्वानर आत्मा का सुतेजा ही मस्तक है, विश्वरूप नेत्र, पृथग्वर्त्म प्राण, बहुल सन्देह (मध्यभाग), रयि ही बस्ति, पृथ्वी ही दोनों पाद, वक्षःस्थल ही वेदी, रोम ही बर्हि (कुश), हृदय ही गार्हपत्य अग्नि, मन ही अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि), और मुख ही आहवनीय अग्नि है।

मंत्र 74

तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ।। १ ।।

tadyadbhaktaṃ prathamamāgacchettaddhomīyaṃ sa yāṃ prathamāmāhutiṃ juhuyāttāṃ juhuyātprāṇāya svāheti prāṇastṛpyati || 1 ||

इसलिए जो भोजन पहले सामने आए, वह होम के योग्य है। वह जो पहली आहुति दे, उसे 'प्राणाय स्वाहा' कहकर दे। तब प्राण तृप्त होता है।

मंत्र 75

प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किंच द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ।। २ ।।

prāṇe tṛpyati cakṣustṛpyati cakṣuṣi tṛpyatyādityastṛpyatyāditye tṛpyati dyaustṛpyati divi tṛpyantyāṃ yatkiṃca dyauścādityaścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānutṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti || 2 ||

प्राण के तृप्त होने पर नेत्र तृप्त होता है, नेत्र के तृप्त होने पर आदित्य, आदित्य के तृप्त होने पर द्यु (स्वर्ग), और द्यु के तृप्त होने पर जो कुछ द्यु और आदित्य के अधीन है, वह सब तृप्त होता है। उस तृप्ति के अनुसार वह स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।

मंत्र 76

अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ।। १ ।।

atha yāṃ dvitīyāṃ juhuyāttāṃ juhuyādvyānāya svāheti vyānastṛpyati || 1 ||

फिर जो दूसरी आहुति दे, उसे 'व्यानाय स्वाहा' कहकर दे। तब व्यान तृप्त होता है।

मंत्र 77

व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ।। २ ।।

vyāne tṛpyati śrotraṃ tṛpyati śrotre tṛpyati candramāstṛpyati candramasi tṛpyati diśastṛpyanti dikṣu tṛpyantīṣu yatkiṃca diśaśca candramāścādhitiṣṭhanti tattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti || 2 ||

व्यान के तृप्त होने पर श्रोत्र तृप्त होता है, श्रोत्र के तृप्त होने पर चन्द्रमा, चन्द्रमा के तृप्त होने पर दिशाएँ, और दिशाओं के तृप्त होने पर जो कुछ दिशाओं और चन्द्रमा के अधीन है, वह सब तृप्त होता है। उस तृप्ति के अनुसार वह स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।

मंत्र 78

अथ यां तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ।। १ ।।

atha yāṃ tṛtīyāṃ juhuyāttāṃ juhuyādapānāya svāhetyapānastṛpyati || 1 ||

फिर जो तीसरी आहुति दे, उसे 'अपानाय स्वाहा' कहकर दे। तब अपान तृप्त होता है।

मंत्र 79

अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किंच पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ।। २ ।।

apāne tṛpyati vāktṛpyati vāci tṛpyantyāmagnistṛpyatyagnau tṛpyati pṛthivī tṛpyati pṛthivyāṃ tṛpyantyāṃ yatkiṃca pṛthivī cāgniścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti || 2 ||

अपान के तृप्त होने पर वाणी तृप्त होती है, वाणी के तृप्त होने पर अग्नि, अग्नि के तृप्त होने पर पृथ्वी, और पृथ्वी के तृप्त होने पर जो कुछ पृथ्वी और अग्नि के अधीन है, वह सब तृप्त होता है। उस तृप्ति के अनुसार वह स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।

मंत्र 80

अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ।। १ ।।

atha yāṃ caturthīṃ juhuyāttāṃ juhuyātsamānāya svāheti samānastṛpyati || 1 ||

फिर जो चौथी आहुति दे, उसे 'समानाय स्वाहा' कहकर दे। तब समान तृप्त होता है।

मंत्र 81

समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ।। २ ।।

samāne tṛpyati manastṛpyati manasi tṛpyati parjanyastṛpyati parjanye tṛpyati vidyuttṛpyati vidyuti tṛpyantyāṃ yatkiṃca vidyucca parjanyaścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcaseneti || 2 ||

समान के तृप्त होने पर मन तृप्त होता है, मन के तृप्त होने पर पर्जन्य, पर्जन्य के तृप्त होने पर विद्युत्, और विद्युत् के तृप्त होने पर जो कुछ विद्युत् और पर्जन्य के अधीन है, वह सब तृप्त होता है। उस तृप्ति के अनुसार वह स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।

मंत्र 82

अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ।। १ ।।

atha yāṃ pañcamīṃ juhuyāttāṃ juhuyādudānāya svāhetyudānastṛpyati || 1 ||

फिर जो पाँचवीं आहुति दे, उसे 'उदानाय स्वाहा' कहकर दे। तब उदान तृप्त होता है।

मंत्र 83

उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन ।। २ ।।

udāne tṛpyati tvaktṛpyati tvaci tṛpyantyāṃ vāyustṛpyati vāyau tṛpyatyākāśastṛpyatyākāśe tṛpyati yatkiṃca vāyuścākāśaścādhitiṣṭhatastattṛpyati tasyānu tṛptiṃ tṛpyati prajayā paśubhirannādyena tejasā brahmavarcasena || 2 ||

उदान के तृप्त होने पर त्वचा तृप्त होती है, त्वचा के तृप्त होने पर वायु, वायु के तृप्त होने पर आकाश, और आकाश के तृप्त होने पर जो कुछ वायु और आकाश के अधीन है, वह सब तृप्त होता है। उस तृप्ति के अनुसार वह स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।

मंत्र 84

स य इदमविद्वाग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ।। १ ।।

sa ya idamavidvāgnihotraṃ juhoti yathāṅgārānapohya bhasmani juhuyāttādṛktatsyāt || 1 ||

जो इसे न जानकर अग्निहोत्र का होम करता है, वह मानो अंगारों को हटाकर राख पर आहुति देता है — वैसा ही उसका फल होता है।

मंत्र 85

अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ।। २ ।।

atha ya etadevaṃ vidvānagnihotraṃ juhoti tasya sarveṣu lokeṣu sarveṣu bhūteṣu sarveṣvātmasu hutaṃ bhavati || 2 ||

किन्तु जो इसे इस प्रकार जानकर अग्निहोत्र का होम करता है, उसकी आहुति सब लोकों में, सब भूतों में, सब आत्माओं में हुत (अर्पित) होती है।

मंत्र 86

तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवंहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ।। ३ ।।

tadyatheṣīkātūlamagnau protaṃ pradūyetaivaṃhāsya sarve pāpmānaḥ pradūyante ya etadevaṃ vidvānagnihotraṃ juhoti || 3 ||

जैसे अग्नि में डाली गई ईषीका (सरकंडे) की रूई जलकर भस्म हो जाती है, वैसे ही उसके सब पाप जल जाते हैं, जो इसे इस प्रकार जानकर अग्निहोत्र का होम करता है।

मंत्र 87

तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतं स्यादिति तदेष श्लोकः ।। ४ ।।

tasmādu haivaṃvidyadyapi caṇḍālāyocchiṣṭaṃ prayacchedātmani haivāsya tadvaiśvānare hutaṃ syāditi tadeṣa ślokaḥ || 4 ||

इसलिए ऐसा जानने वाला यदि अपना उच्छिष्ट चण्डाल को भी दे दे, तो वह भी उसके इसी वैश्वानर आत्मा में हुत हो जाता है। इस विषय में यह श्लोक है —

मंत्र 88

यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ।। ५ ।।

yatheha kṣudhitā bālā mātaraṃ paryupāsata evaṃ sarvāṇi bhūtānyagnihotramupāsata ityagnihotramupāsata iti || 5 ||

जैसे यहाँ भूखे बालक अपनी माता के चारों ओर बैठ जाते हैं, वैसे ही सब भूत अग्निहोत्र की उपासना में बैठे रहते हैं — अग्निहोत्र की उपासना में।

षष्ठ प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ।। १ ।।

śvetaketurhāruṇeya āsa taṃ ha pitovāca śvetaketo vasa brahmacaryaṃ na vai somyāsmatkulīno'nanūcya brahmabandhuriva bhavatīti || 1 ||

आरुणि के पौत्र श्वेतकेतु थे। एक दिन उनके पिता ने उनसे कहा: हे श्वेतकेतु, तुम जाकर ब्रह्मचर्य का पालन करो। हे सौम्य, हमारे कुल में ऐसा कोई नहीं जो वेद न पढ़कर केवल जन्म से ही ब्राह्मण कहलाता हो।

मंत्र 2

स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तंह पितोवाच ।। २ ।।

sa ha dvādaśavarṣa upetya caturviṃśativarṣaḥ sarvānvedānadhītya mahāmanā anūcānamānī stabdha eyāya taṃha pitovāca || 2 ||

वह बारह वर्ष की आयु में गुरुकुल गया और चौबीस वर्ष की आयु में सारे वेद पढ़कर लौटा — अपने को महान पण्डित मानता हुआ, अभिमानी और अकड़ा हुआ। उसे देखकर पिता ने कहा:

मंत्र 3

श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ।। ३ ।।

śvetaketo yannu somyedaṃ mahāmanā anūcānamānī stabdho'syuta tamādeśamaprākṣyaḥ yenāśrutaṃ śrutaṃ bhavatyamataṃ matamavijñātaṃ vijñātamiti kathaṃ nu bhagavaḥ sa ādeśo bhavatīti || 3 ||

हे श्वेतकेतु, तुम जो इतने अभिमानी हो, अपने को विद्वान मानते हो और अकड़े हुए हो — क्या तुमने वह आदेश (उपदेश) भी माँगा, जिससे अनसुना सुना जाता है, अनसोचा सोचा जाता है और अनजाना जाना जाता है? हे भगवन्, वह आदेश कैसा है?

मंत्र 4

यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ।। ४ ।।

yathā somyaikena mṛtpiṇḍena sarvaṃ mṛnmayaṃ vijñātaṃ syādvācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ mṛttiketyeva satyam || 4 ||

हे सौम्य, जैसे मिट्टी के एक ढेले को जान लेने से मिट्टी से बना सब कुछ जान लिया जाता है — विकार तो केवल वाणी का आश्रय लेने वाला नाममात्र है, सत्य तो यही है कि वह मिट्टी ही है —

मंत्र 5

यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ।। ५ ।।

yathā somyaikena lohamaṇinā sarvaṃ lohamayaṃ vijñātaṃ syādvācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ lohamityeva satyam || 5 ||

हे सौम्य, जैसे सोने के एक कण को जान लेने से सोने से बना सब कुछ जान लिया जाता है — विकार तो केवल वाणी-आश्रित नाममात्र है, सत्य तो यही है कि वह सोना ही है —

मंत्र 6

यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवंसोम्य स आदेशो भवतीति ।। ६ ।।

yathā somyaikena nakhanikṛntanena sarvaṃ kārṣṇāyasaṃ vijñātaṃ syādvācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ kṛṣṇāyasamityeva satyamevaṃsomya sa ādeśo bhavatīti || 6 ||

हे सौम्य, जैसे एक नखकतरनी (लोहे के औज़ार) को जान लेने से लोहे से बना सब कुछ जान लिया जाता है — विकार तो केवल नाममात्र है, सत्य तो यही है कि वह लोहा ही है — हे सौम्य, वह आदेश ऐसा ही है।

मंत्र 7

न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्ध्येतदवेदिष्यन्कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ७ ।।

na vai nūnaṃ bhagavantasta etadavediṣuryaddhyetadavediṣyankathaṃ me nāvakṣyanniti bhagavāṃstveva me tadbravītviti tathā somyeti hovāca || 7 ||

निश्चय ही मेरे पूज्य गुरुजनों ने यह नहीं जाना; यदि वे इसे जानते तो मुझे क्यों न बताते? अतः हे भगवन्, आप ही मुझे वह बताइए। 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' पिता ने कहा।

मंत्र 8

सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत ।। १ ।।

sadeva somyedamagra āsīdekamevādvitīyam | taddhaika āhurasadevedamagra āsīdekamevādvitīyaṃ tasmādasataḥ sajjāyata || 1 ||

हे सौम्य, आरम्भ में यह सत् ही था — एक ही, अद्वितीय। कुछ लोग कहते हैं कि आरम्भ में यह असत् ही था — एक ही, अद्वितीय; और उस असत् से सत् उत्पन्न हुआ।

मंत्र 9

कुतस्तु खलु सोम्यैवंस्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति। सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।। २ ।।

kutastu khalu somyaivaṃsyāditi hovāca kathamasataḥ sajjāyeteti| sattveva somyedamagra āsīdekamevādvitīyam || 2 ||

किन्तु हे सौम्य, यह कैसे हो सकता है? — उन्होंने कहा — असत् से सत् कैसे उत्पन्न हो? इसके विपरीत, हे सौम्य, आरम्भ में यह सत् ही था — एक ही, अद्वितीय।

मंत्र 10

तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ।। ३ ।।

tadaikṣata bahu syāṃ prajāyeyeti tattejo'sṛjata tatteja aikṣata bahu syāṃ prajāyeyeti tadapo'sṛjata | tasmādyatra kvaca śocati svedate vā puruṣastejasa eva tadadhyāpo jāyante || 3 ||

उसने विचार किया: 'मैं बहुत हो जाऊँ, प्रजा रूप में विस्तृत हो जाऊँ।' उसने तेज (अग्नि) उत्पन्न किया। उस तेज ने विचार किया: 'मैं बहुत हो जाऊँ, प्रजा रूप में विस्तृत हो जाऊँ।' उसने जल उत्पन्न किया। इसीलिए जहाँ कहीं मनुष्य शोक करता या पसीना बहाता है, वहाँ तेज (ऊष्मा) से ही जल उत्पन्न होता है।

मंत्र 11

ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ।। ४ ।।

tā āpa aikṣanta bahvyaḥ syāma prajāyemahīti tā annamasṛjanta tasmādyatra kva ca varṣati tadeva bhūyiṣṭhamannaṃ bhavatyadbhya eva tadadhyannādyaṃ jāyate || 4 ||

उन जलों ने विचार किया: 'हम बहुत हो जाएँ, प्रजा रूप में विस्तृत हो जाएँ।' उन्होंने अन्न उत्पन्न किया। इसीलिए जहाँ वर्षा होती है, वहाँ प्रचुर अन्न होता है; जल से ही खाने योग्य अन्न उत्पन्न होता है।

मंत्र 12

तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति ।। १ ।।

teṣāṃ khalveṣāṃ bhūtānāṃ trīṇyeva bījāni bhavantyāṇḍajaṃ jīvajamudbhijjamiti || 1 ||

इन प्राणियों के केवल तीन ही बीज (उत्पत्ति-स्रोत) हैं: अण्डज (अण्डे से जन्मे), जीवज (गर्भ से जन्मे) और उद्भिज्ज (अंकुर से जन्मे)।

मंत्र 13

सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ।। २ ।।

seyaṃ devataikṣata hantāhamimāstisro devatā anena jīvenātmanānupraviśya nāmarūpe vyākaravāṇīti || 2 ||

उस देवता (सत्) ने विचार किया: 'अब मैं इस जीव-आत्मा के रूप में इन तीनों देवताओं (तेज, जल, अन्न) में प्रवेश करके नाम और रूप को प्रकट करूँ।'

मंत्र 14

तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ।। ३ ।।

tāsāṃ trivṛtaṃ trivṛtamekaikāṃ karavāṇīti seyaṃ devatemāstisro devatā anenaiva jīvenātmanānupraviśya nāmarūpe vyākarot || 3 ||

'मैं इनमें से प्रत्येक को त्रिवृत् (तीन-तीन रूप वाला) बना दूँ' — ऐसा विचार कर उस देवता ने जीव-आत्मा के रूप में उन्हीं तीनों देवताओं में प्रवेश करके नाम और रूप प्रकट किए।

मंत्र 15

तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ।। ४ ।।

tāsāṃ trivṛtaṃ trivṛtamekaikāmakarodyathā tu khalu somyemāstisro devatāstrivṛttrivṛdekaikā bhavati tanme vijānīhīti || 4 ||

उसने उनमें से प्रत्येक को त्रिवृत् बना दिया। हे सौम्य, अब मुझसे यह जानो कि ये तीनों देवता किस प्रकार त्रिवृत् बनते हैं।

मंत्र 16

यदग्ने रोहितंरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ।। १ ।।

yadagne rohitaṃrūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgādagneragnitvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam || 1 ||

अग्नि का जो लाल रूप है वह तेज का रूप है, जो श्वेत है वह जल का, और जो कृष्ण (काला) है वह अन्न (पृथ्वी) का। इस प्रकार अग्नि का 'अग्नित्व' चला जाता है — विकार तो वाणी-आश्रित नाममात्र है, सत्य तो यही तीन रूप हैं।

मंत्र 17

यदादित्यस्य रोहितंरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ।। २ ।।

yadādityasya rohitaṃrūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgādādityādādityatvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam || 2 ||

सूर्य का जो लाल रूप है वह तेज का है, जो श्वेत है वह जल का, और जो कृष्ण है वह अन्न का। इस प्रकार सूर्य का 'सूर्यत्व' चला जाता है — विकार नाममात्र है, सत्य तो यही तीन रूप हैं।

मंत्र 18

यच्चन्द्रमसो रोहितंरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ।। ३ ।।

yaccandramaso rohitaṃrūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgāccandrāccandratvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam || 3 ||

चन्द्रमा का जो लाल रूप है वह तेज का है, जो श्वेत है वह जल का, और जो कृष्ण है वह अन्न का। इस प्रकार चन्द्रमा का 'चन्द्रत्व' चला जाता है — विकार नाममात्र है, सत्य तो यही तीन रूप हैं।

मंत्र 19

यद्विद्युतो रोहितंरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ।। ४ ।।

yadvidyuto rohitaṃrūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgādvidyuto vidyuttvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam || 4 ||

बिजली का जो लाल रूप है वह तेज का है, जो श्वेत है वह जल का, और जो कृष्ण है वह अन्न का। इस प्रकार बिजली का 'विद्युत्त्व' चला जाता है — विकार नाममात्र है, सत्य तो यही तीन रूप हैं।

मंत्र 20

एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदांचक्रुः ।। ५ ।।

etaddha sma vai tadvidvāṃsa āhuḥ pūrve mahāśālā mahāśrotriyā na no'dya kaścanāśrutamamatamavijñātamudāhariṣyatīti hyebhyo vidāṃcakruḥ || 5 ||

इसी को जानकर प्राचीन काल के बड़े गृहस्थ और महान श्रोत्रिय (वेदज्ञ) कहा करते थे: 'अब कोई हमें कोई ऐसी बात नहीं बता सकता जो अनसुनी, अनसोची या अनजानी हो' — क्योंकि इन तीन रूपों से ही उन्होंने सब कुछ जान लिया था।

मंत्र 21

यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदांचक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपांरूपमिति तद्विदांचक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदांचक्रुः ।। ६ ।।

yadu rohitamivābhūditi tejasastadrūpamiti tadvidāṃcakruryadu śuklamivābhūdityapāṃrūpamiti tadvidāṃcakruryadu kṛṣṇamivābhūdityannasya rūpamiti tadvidāṃcakruḥ || 6 ||

जो कुछ लाल-सा दिखाई देता, उसे वे तेज का रूप जानते; जो श्वेत-सा दिखता, उसे जल का रूप; और जो कृष्ण-सा दिखता, उसे अन्न का रूप जानते।

मंत्र 22

यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानांसमास इति तद्विदांचक्रुर्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ।। ७ ।।

yadvavijñātamivābhūdityetāsāmeva devatānāṃsamāsa iti tadvidāṃcakruryathā tu khalu somyemāstisro devatāḥ puruṣaṃ prāpya trivṛttrivṛdekaikā bhavati tanme vijānīhīti || 7 ||

और जो कुछ अज्ञात-सा प्रतीत होता, उसे वे इन्हीं देवताओं का संयोग मात्र जानते। हे सौम्य, अब मुझसे यह जानो कि ये तीनों देवता पुरुष (शरीर) में पहुँचकर किस प्रकार त्रिवृत् बनते हैं।

मंत्र 23

अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ।। १ ।।

annamaśitaṃ tredhā vidhīyate tasya yaḥ sthaviṣṭho dhātustatpurīṣaṃ bhavati yo madhyamastanmāṃsaṃ yo'ṇiṣṭhastanmanaḥ || 1 ||

खाया हुआ अन्न तीन भागों में विभक्त होता है। उसका जो स्थूलतम भाग है वह मल बनता है, जो मध्यम है वह मांस, और जो सूक्ष्मतम है वह मन बनता है।

मंत्र 24

आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ।। २ ।।

āpaḥ pītāstredhā vidhīyante tāsāṃ yaḥ sthaviṣṭho dhātustanmūtraṃ bhavati yo madhyamastallohitaṃ yo'ṇiṣṭhaḥ sa prāṇaḥ || 2 ||

पिया हुआ जल तीन भागों में विभक्त होता है। उसका जो स्थूलतम भाग है वह मूत्र बनता है, जो मध्यम है वह रक्त, और जो सूक्ष्मतम है वह प्राण बनता है।

मंत्र 25

तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ।। ३ ।।

tejo'śitaṃ tredhā vidhīyate tasya yaḥ sthaviṣṭho dhātustadasthi bhavati yo madhyamaḥ sa majjā yo'ṇiṣṭhaḥ sā vāk || 3 ||

ग्रहण किया हुआ तेज (ऊष्मा, स्नेह) तीन भागों में विभक्त होता है। उसका जो स्थूलतम भाग है वह अस्थि बनता है, जो मध्यम है वह मज्जा, और जो सूक्ष्मतम है वह वाणी बनती है।

मंत्र 26

अन्नमयंहि सोम्य मनः आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ४ ।।

annamayaṃhi somya manaḥ āpomayaḥ prāṇastejomayī vāgiti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 4 ||

हे सौम्य, इस प्रकार मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमय है। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 27

दध्नः सोम्य मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ।। १ ।।

dadhnaḥ somya mathyamānasya yo'ṇimā sa ūrdhvaḥ samudīṣati tatsarpirbhavati || 1 ||

हे सौम्य, दही को मथने पर उसका जो सूक्ष्मतम अंश है वह ऊपर उठकर मक्खन बन जाता है।

मंत्र 28

एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ।। २ ।।

evameva khalu somyānnasyāśyamānasya yo'ṇimā sa ūrdhvaḥ samudīṣati tanmano bhavati || 2 ||

इसी प्रकार हे सौम्य, खाए हुए अन्न का जो सूक्ष्मतम अंश है वह ऊपर उठकर मन बन जाता है।

मंत्र 29

अपांसोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा प्राणो भवति ।। ३ ।।

apāṃsomya pīyamānānāṃ yo'ṇimā sa ūrdhvaḥ samudīṣati sā prāṇo bhavati || 3 ||

हे सौम्य, पिए हुए जल का जो सूक्ष्मतम अंश है वह ऊपर उठकर प्राण बन जाता है।

मंत्र 30

तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ।। ४ ।।

tejasaḥ somyāśyamānasya yo'ṇimā sa ūrdhvaḥ samudīṣati sā vāgbhavati || 4 ||

हे सौम्य, ग्रहण किए हुए तेज का जो सूक्ष्मतम अंश है वह ऊपर उठकर वाणी बन जाती है।

मंत्र 31

अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ५ ।।

annamayaṃ hi somya mana āpomayaḥ prāṇastejomayī vāgiti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 5 ||

हे सौम्य, इस प्रकार मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमय है। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 32

षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो नपिबतो विच्छेत्स्यत इति ।। १ ।।

ṣoḍaśakalaḥ somya puruṣaḥ pañcadaśāhāni māśīḥ kāmamapaḥ pibāpomayaḥ prāṇo napibato vicchetsyata iti || 1 ||

हे सौम्य, पुरुष सोलह कलाओं (अंशों) वाला है। तुम पन्द्रह दिन तक अन्न मत खाओ, किन्तु इच्छानुसार जल पीते रहो; क्योंकि प्राण जलमय है और जल पीते रहने वाले का प्राण नहीं टूटता।

मंत्र 33

स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ।। २ ।।

sa ha pañcadaśāhāni nāśātha hainamupasasāda kiṃ bravīmi bho ityṛcaḥ somya yajūṃṣi sāmānīti sa hovāca na vai mā pratibhānti bho iti || 2 ||

उसने पन्द्रह दिन तक कुछ नहीं खाया। फिर उसने पिता के पास आकर कहा: 'हे भगवन्, मैं क्या पाठ करूँ?' 'हे सौम्य, ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों का पाठ करो।' उसने कहा: 'हे भगवन्, वे मुझे स्मरण ही नहीं आ रहे।'

मंत्र 34

तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्या हितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवंसोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ।। ३ ।।

taṃ hovāca yathā somya mahato'bhyā hitasyaiko'ṅgāraḥ khadyotamātraḥ pariśiṣṭaḥ syāttena tato'pi na bahu dahedevaṃsomya te ṣoḍaśānāṃ kalānāmekā kalātiśiṣṭā syāttayaitarhi vedānnānubhavasyaśānātha me vijñāsyasīti || 3 ||

पिता ने कहा: 'हे सौम्य, जैसे किसी बड़ी धधकती अग्नि में से जुगनू के बराबर बचा हुआ एक अंगारा उससे अधिक कुछ नहीं जला सकता — वैसे ही हे सौम्य, तुम्हारी सोलह कलाओं में से अब केवल एक कला शेष है, और उसी से तुम इस समय वेदों को समझ नहीं पा रहे। अन्न ग्रहण करो, तब तुम मुझे समझ सकोगे।'

मंत्र 35

स हाशाथ हैनमुपससाद तं ह यत्किंच पप्रच्छ सर्वंह प्रतिपेदे ।। ४ ।।

sa hāśātha hainamupasasāda taṃ ha yatkiṃca papraccha sarvaṃha pratipede || 4 ||

तब उसने अन्न ग्रहण किया और उसके बाद पिता के पास आया। फिर पिता ने जो कुछ पूछा, उस सबका उसने उत्तर दिया।

मंत्र 36

तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ।। ५ ।।

taṃ hovāca yathā somya mahato'bhyāhitasyaikamaṅgāraṃ khadyotamātraṃ pariśiṣṭaṃ taṃ tṛṇairupasamādhāya prājvalayettena tato'pi bahu dahet || 5 ||

पिता ने कहा: 'हे सौम्य, जैसे किसी बड़ी अग्नि में से जुगनू के बराबर बचे हुए एक अंगारे को तिनके डालकर फिर से प्रज्वलित किया जा सकता है, और तब वह उससे कहीं अधिक जला सकता है —

मंत्र 37

एवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता प्राज्वाली तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयंहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ।। ६ ।।

evaṃ somya te ṣoḍaśānāṃ kalānāmekā kalātiśiṣṭābhūtsānnenopasamāhitā prājvālī tayaitarhi vedānanubhavasyannamayaṃhi somya mana āpomayaḥ prāṇastejomayī vāgiti taddhāsya vijajñāviti vijajñāviti || 6 ||

'वैसे ही हे सौम्य, तुम्हारी सोलह कलाओं में से एक ही कला शेष रह गई थी; वह अन्न से पुनः पुष्ट होकर प्रज्वलित हो उठी, और उसी से अब तुम वेदों को समझ रहे हो। क्योंकि हे सौम्य, मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमय है।' और यह उसने पिता से भली-भाँति समझ लिया, हाँ, समझ लिया।

मंत्र 38

उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वंह्यपीतो भवति ।। १ ।।

uddālako hāruṇiḥ śvetaketuṃ putramuvāca svapnāntaṃ me somya vijānīhīti yatraitatpuruṣaḥ svapiti nāma satā somya tadā sampanno bhavati svamapīto bhavati tasmādenaṃ svapitītyācakṣate svaṃhyapīto bhavati || 1 ||

उद्दालक आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा: हे सौम्य, मुझसे सुषुप्ति (गहरी नींद) का तत्त्व जानो। इस लोक में जब पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है, तब हे सौम्य, वह सत् से एकाकार हो जाता है, अपने स्वरूप में लौट जाता है। इसीलिए उसके विषय में कहते हैं 'स्वपिति' (वह सोता है) — क्योंकि वह 'स्व' (अपने स्वरूप) में लीन हो जाता है।

मंत्र 39

स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ।। २ ।।

sa yathā śakuniḥ sūtreṇa prabaddho diśaṃ diśaṃ patitvānyatrāyatanamalabdhvā bandhanamevopaśrayata evameva khalu somya tanmano diśaṃ diśaṃ patitvānyatrāyatanamalabdhvā prāṇamevopaśrayate prāṇabandhanaṃ hi somya mana iti || 2 ||

जैसे डोरी से बँधा हुआ पक्षी इधर-उधर हर दिशा में उड़कर, अन्यत्र कोई ठिकाना न पाकर, अन्त में उसी डोरी पर आ बैठता है जिससे वह बँधा है — वैसे ही हे सौम्य, मन हर दिशा में दौड़कर, अन्यत्र आश्रय न पाकर, प्राण पर ही आ टिकता है; क्योंकि हे सौम्य, मन प्राण से बँधा हुआ है।

मंत्र 40

अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ।। ३ ।।

aśanāpipāse me somya vijānīhīti yatraitatpuruṣo'śiśiṣati nāmāpa eva tadaśitaṃ nayante tadyathā gonāyo'śvanāyaḥ puruṣanāya ityevaṃ tadapa ācakṣate'śanāyeti tatraitacchuṅgamutpatitaṃ somya vijānīhi nedamamūlaṃ bhaviṣyatīti || 3 ||

हे सौम्य, अब मुझसे भूख और प्यास के विषय में जानो। इस लोक में जब पुरुष 'भूखा है' ऐसा कहा जाता है, तब जल ही उसके खाए हुए अन्न को ले जाता (पचाता) है। जैसे 'गोनाय' (गायों को ले जाने वाला), 'अश्वनाय' और 'पुरुषनाय' कहते हैं, वैसे ही जल को 'अशनाया' (भूख) कहते हैं। हे सौम्य, यहाँ यह जान लो कि अंकुर फूटा है; यह बिना मूल के नहीं हो सकता।

मंत्र 41

तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ।। ४ ।।

tasya kva mūlaṃ syādanyatrānnādevameva khalu somyānnena śuṅgenāpo mūlamanvicchādbhiḥ somya śuṅgena tejo mūlamanviccha tejasā somya śuṅgena sanmūlamanviccha sanmūlāḥ somyemāḥ sarvāḥ prajāḥ sadāyatanāḥ satpratiṣṭhāḥ || 4 ||

और उसका मूल अन्न के अतिरिक्त और कहाँ हो सकता है? इसी प्रकार हे सौम्य, अन्न रूपी अंकुर के द्वारा जल को मूल जानो; हे सौम्य, जल रूपी अंकुर के द्वारा तेज को मूल जानो; हे सौम्य, तेज रूपी अंकुर के द्वारा सत् को मूल जानो। हे सौम्य, ये सभी प्रजाएँ सत् को ही मूल रखती हैं, सत् ही उनका आश्रय है, सत् ही उनकी प्रतिष्ठा है।

मंत्र 42

अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ।। ५ ।।

atha yatraitatpuruṣaḥ pipāsati nāma teja eva tatpītaṃ nayate tadyathā gonāyo'śvanāyaḥ puruṣanāya ityevaṃ tatteja ācaṣṭa udanyeti tatraitadeva śuṅgamutpatitaṃ somya vijānīhi nedamamūlaṃ bhaviṣyatīti || 5 ||

और इस लोक में जब पुरुष 'प्यासा है' ऐसा कहा जाता है, तब तेज (ऊष्मा) ही उसके पिए हुए जल को ले जाता है। जैसे 'गोनाय', 'अश्वनाय' और 'पुरुषनाय' कहते हैं, वैसे ही तेज को 'उदन्या' (प्यास) कहते हैं। हे सौम्य, यहाँ भी यह जान लो कि अंकुर फूटा है; यह बिना मूल के नहीं हो सकता।

मंत्र 43

तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ।। ६ ।।

tasya kva mūlaṃ syādanyatrādbhyo'dbhiḥ somya śuṅgena tejo mūlamanviccha tejasā somya śuṅgena sanmūlamanviccha sanmūlāḥ somyemāḥ sarvāḥ prajāḥ sadāyatanāḥ satpratiṣṭhā yathā tu khalu somyemāstisro devatāḥ puruṣaṃ prāpya trivṛttrivṛdekaikā bhavati taduktaṃ purastādeva bhavatyasya somya puruṣasya prayato vāṅmanasi sampadyate manaḥ prāṇe prāṇastejasi tejaḥ parasyāṃ devatāyām || 6 ||

और उसका मूल जल के अतिरिक्त और कहाँ हो सकता है? हे सौम्य, जल रूपी अंकुर के द्वारा तेज को मूल जानो; तेज रूपी अंकुर के द्वारा सत् को मूल जानो। हे सौम्य, ये सभी प्रजाएँ सत् को ही मूल रखती हैं, सत् ही उनका आश्रय, सत् ही उनकी प्रतिष्ठा है। ये तीनों देवता पुरुष में पहुँचकर किस प्रकार त्रिवृत् होते हैं, यह पहले ही कहा जा चुका है। हे सौम्य, जब यह पुरुष देह त्यागता (मरता) है, तब उसकी वाणी मन में लीन होती है, मन प्राण में, प्राण तेज में, और तेज परम देवता (सत्) में लीन हो जाता है।

मंत्र 44

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ७ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 7 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 45

यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणांरसान्समवहारमेकतांरसं गमयन्ति ।। १ ।।

yathā somya madhu madhukṛto nistiṣṭhanti nānātyayānāṃ vṛkṣāṇāṃrasānsamavahāramekatāṃrasaṃ gamayanti || 1 ||

हे सौम्य, जैसे मधुमक्खियाँ भाँति-भाँति के वृक्षों के रसों को एकत्र करके उन्हें एक ही रस (मधु) में परिणत कर देती हैं,

मंत्र 46

ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ।। २ ।।

te yathā tatra na vivekaṃ labhante'muṣyāhaṃ vṛkṣasya raso'smyamuṣyāhaṃ vṛkṣasya raso'smītyevameva khalu somyemāḥ sarvāḥ prajāḥ sati sampadya na viduḥ sati sampadyāmaha iti || 2 ||

और जैसे वे रस वहाँ (मधु में) यह भेद नहीं रख पाते कि 'मैं अमुक वृक्ष का रस हूँ', 'मैं अमुक वृक्ष का रस हूँ' — वैसे ही हे सौम्य, ये सभी प्राणी सत् में लीन होकर भी यह नहीं जानते कि 'हम सत् में लीन हुए हैं।'

मंत्र 47

त इह व्यघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ।। ३ ।।

ta iha vyaghro vā siṃho vā vṛko vā varāho vā kīṭo vā pataṅgo vā daṃśo vā maśako vā yadyadbhavanti tadābhavanti || 3 ||

इस लोक में वे जो भी हों — बाघ, सिंह, भेड़िया, सूअर, कीड़ा, पतंगा, डाँस या मच्छर — वे फिर वही बन जाते हैं।

मंत्र 48

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ४ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 4 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 49

इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ।। १ ।।

imāḥ somya nadyaḥ purastātprācyaḥ syandante paścātpratīcyastāḥ samudrātsamudramevāpiyanti sa samudra eva bhavati tā yathā tatra na viduriyamahamasmīyamahamasmīti || 1 ||

हे सौम्य, ये नदियाँ बहती हैं — पूर्व की ओर की पूर्व को, पश्चिम की ओर की पश्चिम को। वे समुद्र से निकलकर समुद्र में ही जा मिलती हैं और समुद्र ही बन जाती हैं। और जैसे वहाँ वे यह नहीं जानतीं कि 'मैं यह नदी हूँ', 'मैं वह नदी हूँ' —

मंत्र 50

एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ।। २ ।।

evameva khalu somyemāḥ sarvāḥ prajāḥ sata āgamya na viduḥ sata āgacchāmaha iti ta iha vyāghro vā siṃho vā vṛko vā varāho vā kīṭo vā pataṅgo vā daṃśo vā maśako vā yadyadbhavanti tadābhavanti || 2 ||

वैसे ही हे सौम्य, ये सभी प्राणी सत् से आकर भी यह नहीं जानते कि 'हम सत् से आए हैं।' इस लोक में वे जो भी हों — बाघ, सिंह, भेड़िया, सूअर, कीड़ा, पतंगा, डाँस या मच्छर — वे फिर वही बन जाते हैं।

मंत्र 51

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ३ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 3 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 52

अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ।। १ ।।

asya somya mahato vṛkṣasya yo mūle'bhyāhanyājjīvansravedyo madhye'bhyāhanyājjīvansravedyo'gre'bhyāhanyājjīvansravetsa eṣa jīvenātmanānuprabhūtaḥ pepīyamāno modamānastiṣṭhati || 1 ||

हे सौम्य, यदि कोई इस बड़े वृक्ष की जड़ पर आघात करे तो वह रस बहाता हुआ भी जीवित रहता है; यदि बीच में आघात करे तो भी रस बहाता हुआ जीवित रहता है; यदि शिखर पर आघात करे तो भी जीवित रहता है। जीव-आत्मा से व्याप्त होकर वह वृक्ष खड़ा रहता है, बार-बार रस पीता और आनन्दित होता हुआ।

मंत्र 53

अस्य यदेकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति ।। २ ।।

asya yadekāṃ śākhāṃ jīvo jahātyatha sā śuṣyati dvitīyāṃ jahātyatha sā śuṣyati tṛtīyāṃ jahātyatha sā śuṣyati sarvaṃ jahāti sarvaḥ śuṣyati || 2 ||

किन्तु जब जीव उसकी एक शाखा को छोड़ देता है, तब वह शाखा सूख जाती है; दूसरी को छोड़ता है तो वह भी सूख जाती है; तीसरी को छोड़ता है तो वह भी सूख जाती है। और जब वह पूरे वृक्ष को छोड़ देता है, तब सारा वृक्ष सूख जाता है।

मंत्र 54

एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ३ ।।

evameva khalu somya viddhīti hovāca jīvāpetaṃ vāva kiledaṃ mriyate na jīvo mriyate iti sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 3 ||

'हे सौम्य, इसे इस प्रकार जानो,' उन्होंने कहा, 'जीव के निकल जाने पर यह शरीर ही मरता है, जीव नहीं मरता।' जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 55

न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किंचन भगव इति ।। १ ।।

nyagrodhaphalamata āharetīdaṃ bhagava iti bhinddhīti bhinnaṃ bhagava iti kimatra paśyasītyaṇvya ivemā dhānā bhagava ityāsāmaṅgaikāṃ bhinddhīti bhinnā bhagava iti kimatra paśyasīti na kiṃcana bhagava iti || 1 ||

'उस बरगद (न्यग्रोध) का एक फल ले आओ।' 'हे भगवन्, यह रहा।' 'इसे तोड़ो।' 'हे भगवन्, तोड़ दिया।' 'इसमें क्या देखते हो?' 'हे भगवन्, ये अत्यन्त छोटे-छोटे बीज।' 'इनमें से एक बीज को तोड़ो।' 'हे भगवन्, तोड़ दिया।' 'अब इसमें क्या देखते हो?' 'हे भगवन्, कुछ भी नहीं।'

मंत्र 56

तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ।। २ ।।

taṃ hovāca yaṃ vai somyaitamaṇimānaṃ na nibhālayasa etasya vai somyaiṣo'ṇimna evaṃ mahānyagrodhastiṣṭhati śraddhatsva somyeti || 2 ||

पिता ने उससे कहा: 'हे सौम्य, जिस सूक्ष्म तत्त्व को तुम देख नहीं पाते, उसी सूक्ष्म तत्त्व से यह इतना बड़ा बरगद खड़ा है। हे सौम्य, श्रद्धा रखो।'

मंत्र 57

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ३ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 3 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 58

लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ।। १ ।।

lavaṇametadudake'vadhāyātha mā prātarupasīdathā iti sa ha tathā cakāra taṃ hovāca yaddoṣā lavaṇamudake'vādhā aṅga tadāhareti taddhāvamṛśya na viveda || 1 ||

'इस नमक को जल में डाल दो और प्रातःकाल मेरे पास आना।' उसने वैसा ही किया। तब पिता ने उससे कहा: 'कल रात जो नमक तुमने जल में डाला था, उसे ले आओ।' उसने ढूँढ़ा किन्तु वह न मिला, क्योंकि वह घुल चुका था।

मंत्र 59

यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तं होवाचात्र वाव किल तत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ।। २ ।।

yathā vilīnamevāṅgāsyāntādācāmeti kathamiti lavaṇamiti madhyādācāmeti kathamiti lavaṇamityantādācāmeti kathamiti lavaṇamityabhiprāsyaitadatha mopasīdathā iti taddha tathā cakāra tacchaśvatsaṃvartate taṃ hovācātra vāva kila tatsomya na nibhālayase'traiva kileti || 2 ||

'इसके एक छोर से एक घूँट लो। कैसा है?' 'नमकीन।' 'बीच से लो। कैसा है?' 'नमकीन।' 'दूसरे छोर से लो। कैसा है?' 'नमकीन।' 'इसे फेंक दो और मेरे पास आओ।' उसने वैसा ही किया, किन्तु नमक तो सदा वहीं विद्यमान रहा। पिता ने कहा: 'हे सौम्य, यहाँ भी इस शरीर में तुम सत् को देख नहीं पाते, फिर भी वह यहीं विद्यमान है।'

मंत्र 60

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ३ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 3 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 61

यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ।। १ ।।

yathā somya puruṣaṃ gandhārebhyo'bhinaddhākṣamānīya taṃ tato'tijane visṛjetsa yathā tatra prāṅvodaṅvādharāṅvā pratyaṅvā pradhmāyītābhinaddhākṣa ānīto'bhinaddhākṣo visṛṣṭaḥ || 1 ||

हे सौम्य, जैसे कोई किसी पुरुष को आँखों पर पट्टी बाँधकर गन्धार देश से हर ले जाए और किसी निर्जन स्थान में छोड़ दे — और वहाँ वह पुरुष कभी पूर्व, कभी उत्तर, कभी दक्षिण, कभी पश्चिम की ओर मुँह करके चिल्लाए: 'मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया, मुझे आँखें बाँधकर यहाँ छोड़ा गया' —

मंत्र 62

तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ।। २ ।।

tasya yathābhinahanaṃ pramucya prabrūyādetāṃ diśaṃ gandhārā etāṃ diśaṃ vrajeti sa grāmādgrāmaṃ pṛcchanpaṇḍito medhāvī gandhārānevopasampadyetaivamevehācāryavānpuruṣo veda tasya tāvadeva ciraṃ yāvanna vimokṣye'tha sampatsya iti || 2 ||

और जैसे कोई उसकी आँखों की पट्टी खोलकर कह दे: 'गन्धार इस दिशा में है, इस ओर जाओ' — तब वह गाँव-गाँव पूछता हुआ, बुद्धिमान और विवेकी होकर, अन्ततः गन्धार पहुँच जाता है — वैसे ही जिस पुरुष को (आत्मज्ञ) आचार्य मिल जाता है, वह जान लेता है: 'मैं तभी तक यहाँ (संसार में) हूँ जब तक मुक्त नहीं हो जाता; फिर मैं अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाऊँगा।'

मंत्र 63

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ३ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 3 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 64

पुरुषं सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ।। १ ।।

puruṣaṃ somyotopatāpinaṃ jñātayaḥ paryupāsate jānāsi māṃ jānāsi māmiti tasya yāvanna vāṅmanasi sampadyate manaḥ prāṇe prāṇastejasi tejaḥ parasyāṃ devatāyāṃ tāvajjānāti || 1 ||

हे सौम्य, इस लोक में जब कोई पुरुष अत्यन्त रुग्ण होता है, तब उसके सम्बन्धी उसे घेरकर पूछते हैं: 'क्या तुम मुझे पहचानते हो? क्या तुम मुझे पहचानते हो?' जब तक उसकी वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज परम देवता में लीन नहीं हो जाता, तब तक वह उन्हें पहचानता रहता है।

मंत्र 65

अथ यदास्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ।। २ ।।

atha yadāsya vāṅmanasi sampadyate manaḥ prāṇe prāṇastejasi tejaḥ parasyāṃ devatāyāmatha na jānāti || 2 ||

किन्तु जब उसकी वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज परम देवता में लीन हो जाता है, तब वह उन्हें नहीं पहचानता।

मंत्र 66

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ।। ३ ।।

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tat satyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca || 3 ||

जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वही इस सम्पूर्ण जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। 'हे भगवन्, मुझे और समझाइए।' 'हे सौम्य, ऐसा ही हो,' उन्होंने कहा।

मंत्र 67

पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसंधोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ।। १ ।।

puruṣaṃ somyota hastagṛhītamānayantyapahārṣītsteyamakārṣītparaśumasmai tapateti sa yadi tasya kartā bhavati tata evānṛtamātmānaṃ kurute so'nṛtābhisaṃdho'nṛtenātmānamantardhāya paraśuṃ taptaṃ pratigṛhṇāti sa dahyate'tha hanyate || 1 ||

हे सौम्य, लोग किसी पुरुष को हाथ पकड़कर लाते हैं और कहते हैं: 'इसने चोरी की है, इसने चोरी की है — इसके लिए कुल्हाड़ी तपाओ।' यदि वह उस कर्म का करने वाला है, तो वह अपने को झूठा सिद्ध कर लेता है; असत्य के स्वभाव वाला होकर, असत्य से अपने को ढककर, वह तपी हुई कुल्हाड़ी को पकड़ता है — और वह जल जाता है; तब उसे दण्ड (वध) दिया जाता है।

मंत्र 68

अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति सन दह्यतेऽथ मुच्यते ।। २ ।।

atha yadi tasyākartā bhavati tata eva satyamātmānaṃ kurute sa satyābhisandhaḥ satyenātmānamantardhāya paraśuṃ taptaṃ pratigṛhṇāti sana dahyate'tha mucyate || 2 ||

किन्तु यदि वह उस कर्म का करने वाला नहीं है, तो वह अपने को सत्य सिद्ध कर लेता है; सत्य के स्वभाव वाला होकर, सत्य से अपने को ढककर, वह तपी हुई कुल्हाड़ी को पकड़ता है — और वह जलता नहीं; तब वह मुक्त कर दिया जाता है।

मंत्र 69

स यथा तत्र नादाह्येतैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ।। ३ ।।

sa yathā tatra nādāhyetaitadātmyamidaṃ sarvaṃ tatsatyaṃ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti taddhāsya vijajñāviti vijajñāviti || 3 ||

जैसे वह सत्यवादी पुरुष वहाँ नहीं जलता, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत् उस सूक्ष्म तत्त्व को ही अपनी आत्मा रखता है। वही सत्य है। वही आत्मा है। हे श्वेतकेतु, वह तू ही है (तत्त्वमसि)। और यह उसने पिता से भली-भाँति समझ लिया, हाँ, समझ लिया।

सप्तम प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तँ होवाच यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ।। १ ।।

adhīhi bhagava iti hopasasāda sanatkumāraṃ nāradastaṃ hovāca yadvettha tena mopasīda tatasta ūrdhvaṃ vakṣyāmīti sa hovāca || 1 ||

'भगवन्, मुझे उपदेश दीजिए' — यह कहकर नारद सनत्कुमार के पास पहुँचे। सनत्कुमार ने उनसे कहा — 'जो तुम जानते हो, उसे लेकर मेरे पास आओ; उसके आगे मैं तुम्हें बताऊँगा।' तब नारद बोले।

मंत्र 2

ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदँ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यँ राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याँ सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ।। २ ।।

ṛgvedaṃ bhagavo'dhyemi yajurvedaṃ sāmavedamātharvaṇaṃ caturthamitihāsapurāṇaṃ pañcamaṃ vedānāṃ vedaṃ pitryaṃ rāśiṃ daivaṃ nidhiṃ vākovākyamekāyanaṃ devavidyāṃ brahmavidyāṃ bhūtavidyāṃ kṣatravidyāṃ nakṣatravidyāṃ sarpadevajanavidyāmetadbhagavo'dhyemi || 2 ||

'भगवन्, मैं ऋग्वेद पढ़ता हूँ, यजुर्वेद, सामवेद, चौथे अथर्ववेद, पाँचवें इतिहास-पुराण को — जो वेदों का वेद है —, तथा पितृ-विद्या, गणित, दैव-विद्या, निधि-विद्या, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या तथा सर्प एवं देवजन-विद्या — यह सब, भगवन्, मैंने पढ़ा है।'

मंत्र 3

सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतँ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयत्विति तँ होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ।। ३ ।।

so'haṃ bhagavo mantravidevāsmi nātmavicchrutaṃ hyeva me bhagavaddṛśebhyastarati śokamātmaviditi so'haṃ bhagavaḥ śocāmi taṃ mā bhagavāñchokasya pāraṃ tārayatviti taṃ hovāca yadvai kiñcaitadadhyagīṣṭhā nāmaivaitat || 3 ||

'इतना होने पर भी, भगवन्, मैं केवल मन्त्रों को जानने वाला हूँ, आत्मा को नहीं जानता। मैंने आप जैसे महापुरुषों से सुना है कि आत्मज्ञानी शोक के पार हो जाता है। भगवन्, मैं शोकग्रस्त हूँ; आप मुझे शोक के उस पार पहुँचा दीजिए।' सनत्कुमार ने उनसे कहा — 'तुमने जो कुछ पढ़ा है, वह केवल नाम है।'

मंत्र 4

नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्दैवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्स्वेति ।। ४ ।।

nāma vā ṛgvedo yajurvedaḥ sāmaveda ātharvaṇaścaturtha itihāsapurāṇaḥ pañcamo vedānāṃ vedaḥ pitryo rāśirdaivo nidhirvākovākyamekāyanaṃ devavidyā brahmavidyā bhūtavidyā kṣatravidyā nakṣatravidyā sarpadevajanavidyā nāmaivaitannāmopāssveti || 4 ||

'ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद, पाँचवाँ इतिहास-पुराण, वेदों का वेद, पितृ-विद्या, गणित, दैव-विद्या, निधि-विद्या, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या तथा सर्प एवं देवजन-विद्या — यह सब नाम मात्र है। नाम की उपासना करो।'

मंत्र 5

स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। ५ ।।

sa yo nāma brahmetyupāste yāvannāmno gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo nāma brahmetyupāste'sti bhagavo nāmno bhūya iti nāmno vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 5 ||

'जो नाम को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह नाम की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण की स्वतन्त्रता पा लेता है — जो नाम को ब्रह्म मानकर उपासना करता है।' 'भगवन्, क्या नाम से भी कुछ बड़ा है?' 'नाम से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 6

वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदँ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यँराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्याँ सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाँश्च मनुष्याँश्च पशूँश्च वयाँसि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ।। १ ।।

vāgvāva nāmno bhūyasī vāgvā ṛgvedaṃ vijñāpayati yajurvedaṃ sāmavedamātharvaṇaṃ caturthamitihāsapurāṇaṃ pañcamaṃ vedānāṃ vedaṃ pitryaṃrāśiṃ daivaṃ nidhiṃ vākovākyamekāyanaṃ devavidyāṃ brahmavidyāṃ bhūtavidyāṃ kṣatravidyāṃ sarpadevajanavidyāṃ divaṃ ca pṛthivīṃ ca vāyuṃ cākāśaṃ cāpaśca tejaśca devāṃśca manuṣyāṃśca paśūṃśca vayāṃsi ca tṛṇavanaspatīñchvāpadānyākīṭapataṅgapipīlakaṃ dharmaṃ cādharmaṃ ca satyaṃ cānṛtaṃ ca sādhu cāsādhu ca hṛdayajñaṃ cāhṛdayajñaṃ ca yadvai vāṅnābhaviṣyanna dharmo nādharmo vyajñāpayiṣyanna satyaṃ nānṛtaṃ na sādhu nāsādhu na hṛdayajño nāhṛdayajño vāgevaitatsarvaṃ vijñāpayati vācamupāssveti || 1 ||

वाणी नाम से बड़ी है। वाणी ही ऋग्वेद का, यजुर्वेद, सामवेद, चौथे अथर्ववेद, पाँचवें इतिहास-पुराण, वेदों के वेद, पितृ-विद्या, गणित, दैव-विद्या, निधि-विद्या, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या तथा सर्प एवं देवजन-विद्या का बोध कराती है; और द्युलोक, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, देवताओं, मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, तृण-वनस्पतियों, हिंसक पशुओं तथा कीट-पतंग-चींटी तक का, धर्म-अधर्म का, सत्य-असत्य का, भले-बुरे का, प्रिय-अप्रिय का — इन सबका बोध वाणी ही कराती है। यदि वाणी न होती तो न धर्म-अधर्म, न सत्य-असत्य, न भला-बुरा, न प्रिय-अप्रिय — कुछ भी जाना न जाता। वाणी ही यह सब जनाती है। वाणी की उपासना करो।

मंत्र 7

स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo vācaṃ brahmetyupāste yāvadvāco gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo vācaṃ brahmetyupāste'sti bhagavo vāco bhūya iti vāco vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

'जो वाणी को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह वाणी की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है — जो वाणी को ब्रह्म मानकर उपासना करता है।' 'भगवन्, क्या वाणी से भी कुछ बड़ा है?' 'वाणी से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 8

मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्राँश्च पशूँश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ।। १ ।।

mano vāva vāco bhūyo yathā vai dve vāmalake dve vā kole dvau vākṣau muṣṭiranubhavatyevaṃ vācaṃ ca nāma ca mano'nubhavati sa yadā manasā manasyati mantrānadhīyīyetyathādhīte karmāṇi kurvīyetyatha kurute putrāṃśca paśūṃśceccheyetyathecchata imaṃ ca lokamamuṃ ceccheyetyathecchate mano hyātmā mano hi loko mano hi brahma mana upāssveti || 1 ||

मन वाणी से बड़ा है। जैसे मुट्ठी दो आँवलों को, अथवा दो बेरों को, अथवा दो अक्षों (पासों) को एक साथ समेट लेती है, वैसे ही मन वाणी और नाम दोनों को समेट लेता है। जब मनुष्य मन से संकल्प करता है कि 'मैं मन्त्रों का अध्ययन करूँ', तब वह अध्ययन करता है; 'मैं कर्म करूँ', तब कर्म करता है; 'मैं पुत्र और पशु चाहूँ', तब उनकी इच्छा करता है; 'मैं इस लोक और परलोक को चाहूँ', तब उनकी इच्छा करता है। मन ही आत्मा है, मन ही लोक है, मन ही ब्रह्म है। मन की उपासना करो।

मंत्र 9

स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo mano brahmetyupāste yāvanmanaso gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo mano brahmetyupāste'sti bhagavo manaso bhūya iti manaso vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

'जो मन को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह मन की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है — जो मन को ब्रह्म मानकर उपासना करता है।' 'भगवन्, क्या मन से भी कुछ बड़ा है?' 'मन से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 10

सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ।। १ ।।

saṅkalpo vāva manaso bhūyānyadā vai saṅkalpayate'tha manasyatyatha vācamīrayati tāmu nāmnīrayati nāmni mantrā ekaṃ bhavanti mantreṣu karmāṇi || 1 ||

संकल्प मन से बड़ा है। जब मनुष्य संकल्प करता है, तब मन में विचार करता है, फिर वाणी उच्चारित करता है, और उस वाणी को नाम में प्रकट करता है। नामों में मन्त्र एकरूप हो जाते हैं, और मन्त्रों में कर्म।

मंत्र 11

तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्मकानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समकॢपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्च तेषाँ सङ्कॢप्त्यै वर्षँ सङ्कल्पते वर्षस्य सङ्कॢप्त्या अन्नँ सङ्कल्पतेऽन्नस्य सङ्कॢप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणानाँ सङ्कॢप्त्यै मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणाँ सङ्कॢप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणां सङ्कॢप्त्यै लोकः सङ्कल्पते लोकस्य सङ्कॢप्त्यै सर्वँ सङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपास्स्वेति ।। २ ।।

tāni ha vā etāni saṅkalpaikāyanāni saṅkalpātmakāni saṅkalpe pratiṣṭhitāni samakḷpatāṃ dyāvāpṛthivī samakalpetāṃ vāyuścākāśaṃ ca samakalpantāpaśca tejaśca teṣāṃ saṅkḷptyai varṣaṃ saṅkalpate varṣasya saṅkḷptyā annaṃ saṅkalpate'nnasya saṅkḷptyai prāṇāḥ saṅkalpante prāṇānāṃ saṅkḷptyai mantrāḥ saṅkalpante mantrāṇāṃ saṅkḷptyai karmāṇi saṅkalpante karmaṇāṃ saṅkḷptyai lokaḥ saṅkalpate lokasya saṅkḷptyai sarvaṃ saṅkalpate sa eṣa saṅkalpaḥ saṅkalpamupāssveti || 2 ||

ये सब संकल्प में ही एक होकर आश्रित हैं, संकल्प ही इनका स्वरूप है, संकल्प में ही ये प्रतिष्ठित हैं। द्युलोक और पृथ्वी संकल्प से रचे गए, वायु और आकाश संकल्प से रचे गए, जल और तेज संकल्प से रचे गए। इनके संकल्पित होने से वर्षा संकल्पित होती है, वर्षा के संकल्प से अन्न, अन्न के संकल्प से प्राण, प्राणों के संकल्प से मन्त्र, मन्त्रों के संकल्प से कर्म, कर्मों के संकल्प से लोक, और लोक के संकल्प से सब कुछ संकल्पित होता है। यही वह संकल्प है। संकल्प की उपासना करो।

मंत्र 12

स यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते सङ्कॢप्तान्वै स लोकान्ध्रुवान्ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिध्यति यावत्सङ्कल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः सङ्कल्पाद्भूय इति सङ्कल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। ३ ।।

sa yaḥ saṅkalpaṃ brahmetyupāste saṅkḷptānvai sa lokāndhruvāndhruvaḥ pratiṣṭhitān pratiṣṭhito'vyathamānānavyathamāno'bhisidhyati yāvatsaṅkalpasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yaḥ saṅkalpaṃ brahmetyupāste'sti bhagavaḥ saṅkalpādbhūya iti saṅkalpādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 3 ||

जो संकल्प को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह संकल्पित लोकों को प्राप्त करता है — स्वयं ध्रुव होकर ध्रुव लोकों को, प्रतिष्ठित होकर प्रतिष्ठित लोकों को, अव्यथित होकर अव्यथित लोकों को। वह संकल्प की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या संकल्प से भी कुछ बड़ा है?' 'संकल्प से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 13

चित्तं वाव सङ्कल्पाद्भूयो यदा वै चेतयतेऽथ सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ।। १ ।।

cittaṃ vāva saṅkalpādbhūyo yadā vai cetayate'tha saṅkalpayate'tha manasyatyatha vācamīrayati tāmu nāmnīrayati nāmni mantrā ekaṃ bhavanti mantreṣu karmāṇi || 1 ||

चित्त (चेतना, विचारशक्ति) संकल्प से बड़ा है। जब मनुष्य चेतता (चित्त से जानता) है, तब संकल्प करता है, फिर मन में विचार करता है, फिर वाणी उच्चारित करता है, और उस वाणी को नाम में प्रकट करता है। नामों में मन्त्र एकरूप हो जाते हैं, और मन्त्रों में कर्म।

मंत्र 14

तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान्नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तँह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ।। २ ।।

tāni ha vā etāni cittaikāyanāni cittātmāni citte pratiṣṭhitāni tasmādyadyapi bahuvidacitto bhavati nāyamastītyevainamāhuryadayaṃ veda yadvā ayaṃ vidvānnetthamacittaḥ syādityatha yadyalpaviccittavānbhavati tasmā evota śuśrūṣante cittaṃhyevaiṣāmekāyanaṃ cittamātmā cittaṃ pratiṣṭhā cittamupāssveti || 2 ||

ये सब चित्त में ही एक होकर आश्रित हैं, चित्त ही इनका स्वरूप है, चित्त में ही ये प्रतिष्ठित हैं। इसीलिए यदि कोई बहुत जानता हो पर चित्त-रहित (एकाग्रता एवं विवेक से हीन) हो, तो लोग उसके विषय में कहते हैं — 'यह कुछ नहीं है, चाहे यह जो कुछ जानता हो; क्योंकि यदि यह सचमुच विद्वान होता तो इस प्रकार चित्त-हीन न होता।' और यदि कोई थोड़ा जानता हो पर चित्तवान (एकाग्र एवं विवेकी) हो, तो लोग उसी की सुनना चाहते हैं। चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त ही आत्मा है, चित्त ही प्रतिष्ठा है। चित्त की उपासना करो।

मंत्र 15

स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान्वै स लोकान्ध्रुवान्ध्रुवः प्रतिष्ठितान्प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। ३ ।।

sa yaścittaṃ brahmetyupāste cittānvai sa lokāndhruvāndhruvaḥ pratiṣṭhitānpratiṣṭhito'vyathamānānavyathamāno'bhisidhyati yāvaccittasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yaścittaṃ brahmetyupāste'sti bhagavaścittādbhūya iti cittādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 3 ||

जो चित्त को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह चित्त से युक्त लोकों को प्राप्त करता है — स्वयं ध्रुव होकर ध्रुव लोकों को, प्रतिष्ठित होकर प्रतिष्ठित लोकों को, अव्यथित होकर अव्यथित लोकों को। वह चित्त की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या चित्त से भी कुछ बड़ा है?' 'चित्त से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 16

ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ।। १ ।।

dhyānaṃ vāva cittādbhūyo dhyāyatīva pṛthivī dhyāyatīvāntarikṣaṃ dhyāyatīva dyaurdhyāyantīvāpo dhyāyantīva parvatā devamanuṣyāstasmādya iha manuṣyāṇāṃ mahattāṃ prāpnuvanti dhyānāpādāṃśā ivaiva te bhavantyatha ye'lpāḥ kalahinaḥ piśunā upavādinaste'tha ye prabhavo dhyānāpādāṃśā ivaiva te bhavanti dhyānamupāssveti || 1 ||

ध्यान चित्त से बड़ा है। पृथ्वी मानो ध्यान कर रही है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान कर रहा है, द्युलोक मानो ध्यान कर रहा है, जल मानो ध्यान कर रहे हैं, पर्वत मानो ध्यान कर रहे हैं, देवता और मनुष्य मानो ध्यान कर रहे हैं। इसीलिए जो मनुष्यों में महत्ता प्राप्त करते हैं, वे मानो ध्यान के फल के भागी होते हैं; और जो क्षुद्र हैं — कलहप्रिय, चुगलखोर, निन्दक — वे वैसे ही रह जाते हैं; परन्तु जो श्रेष्ठ हैं, वे मानो ध्यान के फल के भागी होते हैं। ध्यान की उपासना करो।

मंत्र 17

स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo dhyānaṃ brahmetyupāste yāvaddhyānasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo dhyānaṃ brahmetyupāste'sti bhagavo dhyānādbhūya iti dhyānādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

'जो ध्यान को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह ध्यान की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है — जो ध्यान को ब्रह्म मानकर उपासना करता है।' 'भगवन्, क्या ध्यान से भी कुछ बड़ा है?' 'ध्यान से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 18

विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयः विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदँ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यँराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याँ सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाँश्च मनुष्याँश्च पशूँश्च वयाँसि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ।। १ ।।

vijñānaṃ vāva dhyānādbhūyaḥ vijñānena vā ṛgvedaṃ vijānāti yajurvedaṃ sāmavedamātharvaṇaṃ caturthamitihāsapurāṇaṃ pañcamaṃ vedānāṃ vedaṃ pitryaṃrāśiṃ daivaṃ nidhiṃ vākovākyamekāyanaṃ devavidyāṃ brahmavidyāṃ bhūtavidyāṃ kṣatravidyāṃ nakṣatravidyāṃ sarpadevajanavidyāṃ divaṃ ca pṛthivīṃ ca vāyuṃ cākāśaṃ cāpaśca tejaśca devāṃśca manuṣyāṃśca paśūṃśca vayāṃsi ca tṛṇavanaspatīñchvāpadānyākīṭapataṅgapipīlakaṃ dharmaṃ cādharmaṃ ca satyaṃ cānṛtaṃ ca sādhu cāsādhu ca hṛdayajñaṃ cāhṛdayajñaṃ cānnaṃ ca rasaṃ cemaṃ ca lokamamuṃ ca vijñānenaiva vijānāti vijñānamupāssveti || 1 ||

विज्ञान (यथार्थ ज्ञान) ध्यान से बड़ा है। विज्ञान से ही मनुष्य ऋग्वेद को जानता है, यजुर्वेद, सामवेद, चौथे अथर्ववेद, पाँचवें इतिहास-पुराण, वेदों के वेद, पितृ-विद्या, गणित, दैव-विद्या, निधि-विद्या, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या तथा सर्प एवं देवजन-विद्या को; तथा द्युलोक, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, देवताओं, मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, तृण-वनस्पतियों, हिंसक पशुओं एवं कीट-पतंग-चींटी को, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, भला-बुरा, प्रिय-अप्रिय, तथा अन्न और रस, और इस लोक तथा परलोक को — यह सब विज्ञान से ही जानता है। विज्ञान की उपासना करो।

मंत्र 19

स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाञ्ज्ञानवतोऽभिसिध्यति यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो विज्ञानाद्भूय इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo vijñānaṃ brahmetyupāste vijñānavato vai sa lokāñjñānavato'bhisidhyati yāvadvijñānasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo vijñānaṃ brahmetyupāste'sti bhagavo vijñānādbhūya iti vijñānādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

जो विज्ञान को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह विज्ञानमय और ज्ञानमय लोकों को प्राप्त करता है। वह विज्ञान की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या विज्ञान से भी कुछ बड़ा है?' 'विज्ञान से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 20

बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते । स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन्परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन्द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति । बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयाँसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकं बलेन लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ।। १ ।।

balaṃ vāva vijñānādbhūyo'pi ha śataṃ vijñānavatāmeko balavānākampayate | sa yadā balī bhavatyathotthātā bhavatyuttiṣṭhanparicaritā bhavati paricarannupasattā bhavatyupasīdandraṣṭā bhavati śrotā bhavati mantā bhavati boddhā bhavati kartā bhavati vijñātā bhavati | balena vai pṛthivī tiṣṭhati balenāntarikṣaṃ balena dyaurbalena parvatā balena devamanuṣyā balena paśavaśca vayāṃsi ca tṛṇavanaspatayaḥ śvāpadānyākīṭapataṅgapipīlakaṃ balena lokastiṣṭhati balamupāssveti || 1 ||

बल विज्ञान से बड़ा है। एक बलवान् मनुष्य सौ विज्ञानवानों को भी कँपा देता है। जब मनुष्य बलवान् होता है, तब वह उठ खड़ा होता है; उठकर सेवा करता है, सेवा करता हुआ समीप बैठता है, समीप बैठकर देखने वाला, सुनने वाला, मनन करने वाला, बोध करने वाला, कर्ता और जानने वाला बनता है। बल से ही पृथ्वी टिकी है, बल से अन्तरिक्ष, बल से द्युलोक, बल से पर्वत, बल से देवता और मनुष्य, बल से पशु, पक्षी, तृण-वनस्पतियाँ, हिंसक पशु एवं कीट-पतंग-चींटी; बल से ही यह लोक टिका है। बल की उपासना करो।

मंत्र 21

स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo balaṃ brahmetyupāste yāvadbalasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo balaṃ brahmetyupāste'sti bhagavo balādbhūya iti balādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

'जो बल को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह बल की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है — जो बल को ब्रह्म मानकर उपासना करता है।' 'भगवन्, क्या बल से भी कुछ बड़ा है?' 'बल से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 22

अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दश रात्रीर्नाश्नीयाद्यद्यु ह जीवेदथवाद्रष्टाश्रोतामन्ताबोद्धाकर्ताविज्ञाता भवत्यथान्नस्यायै द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ।। १ ।।

annaṃ vāva balādbhūyastasmādyadyapi daśa rātrīrnāśnīyādyadyu ha jīvedathavādraṣṭāśrotāmantāboddhākartāvijñātā bhavatyathānnasyāyai draṣṭā bhavati śrotā bhavati mantā bhavati boddhā bhavati kartā bhavati vijñātā bhavatyannamupāssveti || 1 ||

अन्न बल से बड़ा है। इसीलिए यदि कोई दस रात तक न खाए, तो जीवित रहते हुए भी वह न देखने वाला, न सुनने वाला, न मनन करने वाला, न बोध करने वाला, न कर्ता और न जानने वाला रह जाता है; परन्तु अन्न ग्रहण करने पर वह फिर देखने वाला, सुनने वाला, मनन करने वाला, बोध करने वाला, कर्ता और जानने वाला बन जाता है। अन्न की उपासना करो।

मंत्र 23

स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्पानवतोऽभिसिध्यति यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भूय इत्यन्नाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo'nnaṃ brahmetyupāste'nnavato vai sa lokānpānavato'bhisidhyati yāvadannasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yo'nnaṃ brahmetyupāste'sti bhagavo'nnādbhūya ityannādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

जो अन्न को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह अन्न और पान से युक्त लोकों को प्राप्त करता है। वह अन्न की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या अन्न से भी कुछ बड़ा है?' 'अन्न से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 24

आपो वावान्नाद्भूयस्तस्माद्यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद्द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वयाँसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ।। १ ।।

āpo vāvānnādbhūyastasmādyadā suvṛṣṭirna bhavati vyādhīyante prāṇā annaṃ kanīyo bhaviṣyatītyatha yadā suvṛṣṭirbhavatyānandinaḥ prāṇā bhavantyannaṃ bahu bhaviṣyatītyāpa evemā mūrtā yeyaṃ pṛthivī yadantarikṣaṃ yaddyauryatparvatā yaddevamanuṣyā yatpaśavaśca vayāṃsi ca tṛṇavanaspatayaḥ śvāpadānyākīṭapataṅgapipīlakamāpa evemā mūrtā apa upāssveti || 1 ||

जल अन्न से बड़ा है। इसीलिए जब अच्छी वर्षा नहीं होती तब प्राणी व्याकुल हो जाते हैं यह सोचकर कि 'अन्न कम हो जाएगा'; और जब अच्छी वर्षा होती है तब प्राणी आनन्दित हो जाते हैं यह सोचकर कि 'अन्न बहुत होगा।' यह जल ही मूर्त रूप धारण किए हुए है — यह पृथ्वी, यह अन्तरिक्ष, यह द्युलोक, ये पर्वत, ये देवता और मनुष्य, ये पशु, पक्षी, तृण-वनस्पतियाँ, हिंसक पशु एवं कीट-पतंग-चींटी — यह सब मूर्तिमान् जल ही है। जल की उपासना करो।

मंत्र 25

स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामाँस्तृप्तिमान्भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽद्भ्यो भूय इत्यद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yo'po brahmetyupāsta āpnoti sarvānkāmāṃstṛptimānbhavati yāvadapāṃ gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati | yo'po brahmetyupāste'sti bhagavo'dbhyo bhūya ityadbhyo vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

जो जल को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर तृप्त हो जाता है। वह जल की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या जल से भी कुछ बड़ा है?' 'जल से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 26

तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ।। १ ।।

tejo vāvādbhyo bhūyastadvā etadvāyumāgṛhyākāśamabhitapati tadāhurniśocati nitapati varṣiṣyati vā iti teja eva tatpūrvaṃ darśayitvāthāpaḥ sṛjate tadetadūrdhvābhiśca tiraścībhiśca vidyudbhirāhrādāścaranti tasmādāhurvidyotate stanayati varṣiṣyati vā iti teja eva tatpūrvaṃ darśayitvāthāpaḥ sṛjate teja upāssveti || 1 ||

तेज (अग्नि-ऊष्मा) जल से बड़ा है। यही वायु को पकड़कर आकाश को तपाता है। तब लोग कहते हैं — 'बड़ी गरमी है, तप रहा है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज पहले अपना संकेत दिखाकर फिर जल की सृष्टि करता है। तब ऊपर की ओर और आड़ी बिजलियों के साथ गर्जनाएँ चलती हैं; इसीलिए लोग कहते हैं — 'बिजली चमक रही है, गरज रही है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज पहले अपना संकेत दिखाकर फिर जल की सृष्टि करता है। तेज की उपासना करो।

मंत्र 27

स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yastejo brahmetyupāste tejasvī vai sa tejasvato lokānbhāsvato'pahatatamaskānabhisidhyati yāvattejaso gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yastejo brahmetyupāste'sti bhagavastejaso bhūya iti tejaso vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

जो तेज को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह तेजस्वी होकर तेजोमय, प्रकाशमय और अन्धकार-रहित लोकों को प्राप्त करता है। वह तेज की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या तेज से भी कुछ बड़ा है?' 'तेज से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 28

आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ।। १ ।।

ākāśo vāva tejaso bhūyānākāśe vai sūryācandramasāvubhau vidyunnakṣatrāṇyagnirākāśenāhvayatyākāśena śṛṇotyākāśena pratiśṛṇotyākāśe ramata ākāśe na ramata ākāśe jāyata ākāśamabhijāyata ākāśamupāssveti || 1 ||

आकाश तेज से बड़ा है। आकाश में ही सूर्य और चन्द्रमा दोनों हैं, बिजली, नक्षत्र और अग्नि हैं। आकाश के द्वारा ही मनुष्य पुकारता है, आकाश के द्वारा सुनता है, आकाश के द्वारा उत्तर देता है। आकाश में ही वह आनन्दित होता है और आकाश में ही आनन्दित नहीं होता। आकाश में ही सब उत्पन्न होते हैं और आकाश की ओर ही बढ़ते हैं। आकाश की उपासना करो।

मंत्र 29

स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इति आकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa ya ākāśaṃ brahmetyupāsta ākāśavato vai sa lokānprakāśavato'sambādhānurugāyavato'bhisidhyati yāvadākāśasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati ya ākāśaṃ brahmetyupāste'sti bhagava ākāśādbhūya iti ākāśādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

जो आकाश को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह विस्तृत, प्रकाशमय, बाधा-रहित और खुले-विशाल लोकों को प्राप्त करता है। वह आकाश की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या आकाश से भी कुछ बड़ा है?' 'आकाश से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 30

स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपास्स्वेति ।। १ ।।

smaro vāvākāśādbhūyastasmādyadyapi bahava āsīranna smaranto naiva te kañcana śṛṇuyurna manvīranna vijānīranyadā vāva te smareyuratha śṛṇuyuratha manvīrannatha vijānīransmareṇa vai putrānvijānāti smareṇa paśūnsmaramupāssveti || 1 ||

स्मृति (स्मरण-शक्ति) आकाश से बड़ी है। इसीलिए यदि बहुत-से लोग एकत्र हों पर उन्हें स्मरण न हो, तो वे कुछ भी न सुन पाएँ, न मनन कर पाएँ, न जान पाएँ; परन्तु जब उन्हें स्मरण होता है, तब वे सुनते हैं, मनन करते हैं और जानते हैं। स्मृति के द्वारा ही मनुष्य पुत्रों को पहचानता है, स्मृति के द्वारा ही पशुओं को। स्मृति की उपासना करो।

मंत्र 31

स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa yaḥ smaraṃ brahmetyupāste yāvatsmarasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yaḥ smaraṃ brahmetyupāste'sti bhagavaḥ smarādbhūya iti smarādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

'जो स्मृति को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह स्मृति की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है — जो स्मृति को ब्रह्म मानकर उपासना करता है।' 'भगवन्, क्या स्मृति से भी कुछ बड़ा है?' 'स्मृति से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 32

आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्राँश्च पशूँश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ।। १ ।।

āśā vāva smarādbhūyasyāśeddho vai smaro mantrānadhīte karmāṇi kurute putrāṃśca paśūṃścecchata imaṃ ca lokamamuṃ cecchata āśāmupāssveti || 1 ||

आशा स्मृति से बड़ी है। आशा से प्रज्वलित होकर ही स्मृति मन्त्रों का अध्ययन करती है, कर्म करती है, पुत्रों और पशुओं की इच्छा करती है, तथा इस लोक और परलोक की इच्छा करती है। आशा की उपासना करो।

मंत्र 33

स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशयास्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ।। २ ।।

sa ya āśāṃ brahmetyupāsta āśayāsya sarve kāmāḥ samṛdhyantyamoghā hāsyāśiṣo bhavanti yāvadāśāyā gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati ya āśāṃ brahmetyupāste'sti bhagava āśāyā bhūya ityāśāyā vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti || 2 ||

जो आशा को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, उसकी समस्त कामनाएँ आशा के द्वारा पूर्ण होती हैं, और उसके आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होते। वह आशा की पहुँच जहाँ तक है वहाँ तक इच्छानुसार विचरण करता है। 'भगवन्, क्या आशा से भी कुछ बड़ा है?' 'आशा से बड़ा तो अवश्य है।' 'तो भगवन्, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 34

प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँ समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ।। १ ।।

prāṇo vā āśāyā bhūyānyathā vā arā nābhau samarpitā evamasminprāṇe sarvaṃ samarpitaṃ prāṇaḥ prāṇena yāti prāṇaḥ prāṇaṃ dadāti prāṇāya dadāti prāṇo ha pitā prāṇo mātā prāṇo bhrātā prāṇaḥ svasā prāṇa ācāryaḥ prāṇo brāhmaṇaḥ || 1 ||

प्राण आशा से बड़ा है। जैसे रथ के पहिये की नाभि में अरे (तीलियाँ) जड़े रहते हैं, वैसे ही इस प्राण में सब कुछ जड़ा हुआ है। प्राण प्राण से चलता है, प्राण प्राण को देता है और प्राण के लिए देता है। प्राण ही पिता है, प्राण ही माता, प्राण ही भाई, प्राण ही बहन, प्राण ही आचार्य और प्राण ही ब्राह्मण है।

मंत्र 35

स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ।। २ ।।

sa yadi pitaraṃ vā mātaraṃ vā bhrātaraṃ vā svasāraṃ vācāryaṃ vā brāhmaṇaṃ vā kiñcidbhṛśamiva pratyāha dhiktvāstvityevainamāhuḥ pitṛhā vai tvamasi mātṛhā vai tvamasi bhrātṛhā vai tvamasi svasṛhā vai tvamasyācāryahā vai tvamasi brāhmaṇahā vai tvamasīti || 2 ||

इसलिए यदि कोई अपने पिता, माता, भाई, बहन, आचार्य अथवा किसी ब्राह्मण से कुछ कठोर वचन बोल दे, तो लोग उससे कहते हैं — 'धिक्कार है तुझे! तू पितृघाती है, तू मातृघाती है, तू भ्रातृघाती है, तू स्वसृघाती है, तू आचार्यघाती है, तू ब्रह्मघाती है।'

मंत्र 36

अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ।। ३ ।।

atha yadyapyenānutkrāntaprāṇāñchūlena samāsaṃ vyatiṣaṃdahennaivainaṃ brūyuḥ pitṛhāsīti na mātṛhāsīti na bhrātṛhāsīti na svasṛhāsīti nācāryahāsīti na brāhmaṇahāsīti || 3 ||

परन्तु जब उनके प्राण निकल चुके हों, तब यदि कोई उन्हें शूल (नुकीले दण्ड) से भी बींध डाले और जलाकर भस्म कर दे, तो लोग उससे यह नहीं कहते कि 'तू पितृघाती है', न 'मातृघाती', न 'भ्रातृघाती', न 'स्वसृघाती', न 'आचार्यघाती', न 'ब्रह्मघाती' — (क्योंकि प्राण के निकल जाने पर वह केवल शव रह जाता है)।

मंत्र 37

प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ।। ४ ।।

prāṇo hyevaitāni sarvāṇi bhavati sa vā eṣa evaṃ paśyannevaṃ manvāna evaṃ vijānannativādī bhavati taṃ cedbrūyurativādyasītyativādyasmīti brūyānnāpahnuvīta || 4 ||

क्योंकि प्राण ही ये सब बन जाता है। जो इस प्रकार देखता है, इस प्रकार मनन करता है और इस प्रकार जानता है, वह अतिवादी (सबसे बढ़कर कहने वाला) बन जाता है। यदि कोई उससे कहे — 'तू अतिवादी है', तो वह कहे — 'हाँ, मैं अतिवादी हूँ'; इसे वह छिपाए नहीं।

मंत्र 38

एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

eṣa tu vā ativadati yaḥ satyenātivadati so'haṃ bhagavaḥ satyenātivadānīti satyaṃ tveva vijijñāsitavyamiti satyaṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

'किन्तु वस्तुतः वही अतिवादी है जो सत्य के द्वारा अतिवादी है।' (नारद ने कहा —) 'भगवन्, तब तो मैं सत्य के द्वारा अतिवादी बनूँ।' (सनत्कुमार बोले —) 'परन्तु सत्य को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' (नारद बोले —) 'भगवन्, मैं सत्य को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 39

यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yadā vai vijānātyatha satyaṃ vadati nāvijānansatyaṃ vadati vijānanneva satyaṃ vadati vijñānaṃ tveva vijijñāsitavyamiti vijñānaṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जब मनुष्य (यथार्थ रूप से) जानता है, तभी वह सत्य बोलता है; न जानने वाला सत्य नहीं बोलता, जानने वाला ही सत्य बोलता है। 'परन्तु विज्ञान (यथार्थ ज्ञान) को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं विज्ञान को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 40

यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yadā vai manute'tha vijānāti nāmatvā vijānāti matvaiva vijānāti matistveva vijijñāsitavyeti | matiṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जब मनुष्य विचार (मनन) करता है, तभी वह जानता है; बिना विचार किए कोई नहीं जानता, विचार करके ही जानता है। 'परन्तु मति (विचारशक्ति) को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं मति को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 41

यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yadā vai śraddadhātyatha manute nāśraddadhanmanute śraddadhadeva manute śraddhā tveva vijijñāsitavyeti śraddhāṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जब मनुष्य श्रद्धा रखता है, तभी वह विचार करता है; बिना श्रद्धा के कोई विचार नहीं करता, श्रद्धावान् ही विचार करता है। 'परन्तु श्रद्धा को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं श्रद्धा को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 42

यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्येति निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yadā vai nistiṣṭhatyatha śraddadhāti nānistiṣṭhañchraddadhāti nistiṣṭhanneva śraddadhāti niṣṭhā tveva vijijñāsitavyeti niṣṭhāṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जब मनुष्य निष्ठा (गुरु-सेवा में दृढ़ स्थिति) रखता है, तभी वह श्रद्धा रखता है; बिना निष्ठा के कोई श्रद्धा नहीं रखता, निष्ठावान् ही श्रद्धा रखता है। 'परन्तु निष्ठा को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं निष्ठा को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 43

यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yadā vai karotyatha nistiṣṭhati nākṛtvā nistiṣṭhati kṛtvaiva nistiṣṭhati kṛtistveva vijijñāsitavyeti | kṛtiṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जब मनुष्य (कर्तव्य-कर्म) करता है, तभी वह निष्ठावान् होता है; बिना कर्म किए कोई निष्ठावान् नहीं होता, कर्म करके ही निष्ठावान् होता है। 'परन्तु कृति (कर्म) को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं कृति को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 44

यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yadā vai sukhaṃ labhate'tha karoti nāsukhaṃ labdhvā karoti sukhameva labdhvā karoti sukhaṃ tveva vijijñāsitavyamiti | sukhaṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जब मनुष्य सुख पाता है, तभी वह कर्म करता है; सुख पाए बिना कोई कर्म नहीं करता, सुख पाकर ही कर्म करता है। 'परन्तु सुख को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं सुख को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 45

यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ।। १ ।।

yo vai bhūmā tatsukhaṃ nālpe sukhamasti bhūmaiva sukhaṃ bhūmā tveva vijijñāsitavya iti bhūmānaṃ bhagavo vijijñāsa iti || 1 ||

जो भूमा (अनन्त, विशाल) है, वही सुख है; अल्प (सीमित) में सुख नहीं है। भूमा ही सुख है। 'परन्तु भूमा को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए।' 'भगवन्, मैं भूमा को जानना चाहता हूँ।'

मंत्र 46

यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यँ स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ।। १ ।।

yatra nānyatpaśyati nānyacchṛṇoti nānyadvijānāti sa bhūmātha yatrānyatpaśyatyanyacchṛṇotyanyadvijānāti tadalpaṃ yo vai bhūmā tadamṛtamatha yadalpaṃ tanmartyaṃ sa bhagavaḥ kasminpratiṣṭhita iti sve mahimni yadi vā na mahimnīti || 1 ||

जहाँ मनुष्य अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता, अन्य कुछ नहीं जानता — वही भूमा है। और जहाँ वह अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है, अन्य को जानता है — वह अल्प है। जो भूमा है वही अमृत है, और जो अल्प है वही मर्त्य (नाशवान्) है। (नारद ने पूछा —) 'भगवन्, वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है?' (सनत्कुमार बोले —) 'अपनी ही महिमा में; अथवा यों कहें, महिमा में भी नहीं (क्योंकि वह किसी अन्य आश्रय पर निर्भर नहीं)।'

मंत्र 47

गवाश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यां क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्योह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ।। २ ।।

gavāśvamiha mahimetyācakṣate hastihiraṇyaṃ dāsabhāryāṃ kṣetrāṇyāyatanānīti nāhamevaṃ bravīmi bravīmīti hovācānyohyanyasminpratiṣṭhita iti || 2 ||

इस लोक में लोग गाय-घोड़े को 'महिमा' कहते हैं, हाथी-सोने को, दास-पत्नी को, खेतों और भवनों को। 'मैं ऐसा नहीं कहता, ऐसा नहीं कहता' — ऐसा उन्होंने (सनत्कुमार ने) कहा — 'क्योंकि उस अवस्था में एक वस्तु दूसरी पर आश्रित रहती है (और इसलिए वह सीमित एवं परतन्त्र है, सच्ची महिमा नहीं)।'

मंत्र 48

स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदँ सर्वमित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदँ सर्वमिति ।। १ ।।

sa evādhastātsa upariṣṭātsa paścātsa purastātsa dakṣiṇataḥ sa uttarataḥ sa evedaṃ sarvamityathāto'haṅkārādeśa evāhamevādhastādahamupariṣṭādahaṃ paścādahaṃ purastādahaṃ dakṣiṇato'hamuttarato'hamevedaṃ sarvamiti || 1 ||

वही (भूमा) नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दक्षिण में है, वही उत्तर में है — वही यह सब कुछ है। अब इसके पश्चात् अहंकार के आश्रय से यह उपदेश है — 'मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर, मैं ही पीछे, मैं ही आगे, मैं ही दक्षिण में, मैं ही उत्तर में; मैं ही यह सब कुछ हूँ।'

मंत्र 49

अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदँ सर्वमिति ।। २ ।।

athāta ātmādeśa evātmaivādhastādātmopariṣṭādātmā paścādātmā purastādātmā dakṣiṇata ātmottarata ātmaivedaṃ sarvamiti || 2 ||

अब इसके पश्चात् आत्मा के आश्रय से यह उपदेश है — 'आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर, आत्मा ही पीछे, आत्मा ही आगे, आत्मा ही दक्षिण में, आत्मा ही उत्तर में; आत्मा ही यह सब कुछ है।'

मंत्र 50

तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदँसर्वमिति ।। १ ।।

tasya ha vā etasyaivaṃ paśyata evaṃ manvānasyaivaṃ vijānata ātmataḥ prāṇa ātmata āśātmataḥ smara ātmata ākāśa ātmatasteja ātmata āpa ātmata āvirbhāvatirobhāvāvātmato'nnamātmato balamātmato vijñānamātmato dhyānamātmataścittamātmataḥ saṅkalpa ātmato mana ātmato vāgātmato nāmātmato mantrā ātmataḥ karmāṇyātmata evedaṃsarvamiti || 1 ||

जो इस प्रकार देखता है, इस प्रकार मनन करता है और इस प्रकार जानता है, उसके लिए आत्मा से ही प्राण है, आत्मा से ही आशा, आत्मा से ही स्मृति, आत्मा से ही आकाश, आत्मा से ही तेज, आत्मा से ही जल, आत्मा से ही आविर्भाव (प्रकट होना) और तिरोभाव (लुप्त होना), आत्मा से ही अन्न, आत्मा से ही बल, आत्मा से ही विज्ञान, आत्मा से ही ध्यान, आत्मा से ही चित्त, आत्मा से ही संकल्प, आत्मा से ही मन, आत्मा से ही वाणी, आत्मा से ही नाम, आत्मा से ही मन्त्र, आत्मा से ही कर्म — आत्मा से ही यह सब कुछ है।

मंत्र 51

तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताँ सर्वँ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विँशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारस्तँ स्कन्द इत्याचक्षते तँ स्कन्द इत्याचक्षते ।। २ ।।

tadeṣa śloko na paśyo mṛtyuṃ paśyati na rogaṃ nota duḥkhatāṃ sarvaṃ ha paśyaḥ paśyati sarvamāpnoti sarvaśa iti sa ekadhā bhavati tridhā bhavati pañcadhā saptadhā navadhā caiva punaścaikādaśaḥ smṛtaḥ śataṃ ca daśa caikaśca sahasrāṇi ca viṃśatirāhāraśuddhau sattvaśuddhiḥ sattvaśuddhau dhruvā smṛtiḥ smṛtilambhe sarvagranthīnāṃ vipramokṣastasmai mṛditakaṣāyāya tamasaspāraṃ darśayati bhagavānsanatkumārastaṃ skanda ityācakṣate taṃ skanda ityācakṣate || 2 ||

इस विषय में यह श्लोक है — 'जो द्रष्टा (आत्मदर्शी) है, वह न मृत्यु देखता है, न रोग, न दुःख; द्रष्टा तो सब कुछ देखता है और सर्वत्र सब कुछ प्राप्त कर लेता है।' वह (आत्मा) एक रूप होता है, तीन रूप होता है, पाँच, सात, नौ रूप होता है, और फिर ग्यारह रूप कहा जाता है; एक सौ दस भी, और एक हजार बीस भी। आहार की शुद्धि से सत्त्व (अन्तःकरण) की शुद्धि होती है, सत्त्व की शुद्धि से स्मृति दृढ़ होती है, और स्मृति के दृढ़ होने पर हृदय की समस्त ग्रन्थियों से पूर्ण मुक्ति मिल जाती है। ऐसे राग-द्वेष रूपी मल से रहित हुए (नारद) को भगवान् सनत्कुमार अन्धकार के उस पार पहुँचा देते हैं। उन्हें ही 'स्कन्द' कहते हैं — उन्हें ही 'स्कन्द' कहते हैं।

अष्टम प्रपाठक, प्रथम खण्ड

मंत्र 1

अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ।। १ ।।

atha yadidamasminbrahmapure daharaṃ puṇḍarīkaṃ veśma daharo'sminnantarākāśastasminyadantastadanveṣṭavyaṃ tadvāva vijijñāsitavyamiti

अब, इस ब्रह्मपुर (शरीर) में एक छोटा-सा कमल है, एक भवन; उसके भीतर एक छोटा-सा आकाश (दहर आकाश) है। उसके भीतर जो है, उसी को खोजना चाहिए; वही वास्तव में जानने योग्य है।

मंत्र 2

तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ।। २ ।।

taṃ cedbrūyuryadidamasminbrahmapure daharaṃ puṇḍarīkaṃ veśma daharo'sminnantarākāśaḥ kiṃ tadatra vidyate yadanveṣṭavyaṃ yadvāva vijijñāsitavyamiti sa brūyāt

यदि कोई उससे पूछे — इस ब्रह्मपुर में जो यह छोटा-सा कमल-भवन है, और उसमें जो यह छोटा-सा आकाश है, उसके भीतर ऐसा क्या है जिसे खोजा जाए, जिसे जानने की इच्छा की जाए? — तो वह कहे:

मंत्र 3

यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ।। ३ ।।

yāvānvā ayamākāśastāvāneṣo'ntarhṛdaya ākāśa ubhe asmindyāvāpṛthivī antareva samāhite ubhāvagniśca vāyuśca sūryācandramasāvubhau vidyunnakṣatrāṇi yaccāsyehāsti yacca nāsti sarvaṃ tadasminsamāhitamiti

जितना विशाल यह बाहर का आकाश है, उतना ही विशाल यह हृदय के भीतर का आकाश है। इसी में द्युलोक और पृथ्वी दोनों समाए हैं, अग्नि और वायु दोनों, सूर्य और चन्द्रमा दोनों, विद्युत और नक्षत्र; और यहाँ जो कुछ इसका है और जो कुछ नहीं है — वह सब इसी में समाया हुआ है।

मंत्र 4

तं चेद्ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैतज्जरा वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ।। ४ ।।

taṃ cedbrūyurasmiṃścedidaṃ brahmapure sarvaṃ samāhitaṃ sarvāṇi ca bhūtāni sarve ca kāmā yadaitajjarā vāpnoti pradhvaṃsate vā kiṃ tato'tiśiṣyata iti

यदि कोई उससे पूछे — इस ब्रह्मपुर में, जिसमें यह सब समाया है — समस्त प्राणी और समस्त कामनाएँ — जब इसे बुढ़ापा आ घेरता है या यह नष्ट हो जाता है, तब उससे क्या शेष रहता है? —

मंत्र 5

स ब्रूयात्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिताः एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनम् यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ।। ५ ।।

sa brūyātnāsya jarayaitajjīryati na vadhenāsya hanyata etatsatyaṃ brahmapuramasminkāmāḥ samāhitāḥ eṣa ātmāpahatapāpmā vijaro vimṛtyurviśoko vijighatso'pipāsaḥ satyakāmaḥ satyasaṃkalpo yathā hyeveha prajā anvāviśanti yathānuśāsanam yaṃ yamantamabhikāmā bhavanti yaṃ janapadaṃ yaṃ kṣetrabhāgaṃ taṃ tamevopajīvanti

तब वह कहे: इस शरीर के जीर्ण होने पर वह (भीतरी आकाश) जीर्ण नहीं होता; इसके मारे जाने पर वह नष्ट नहीं होता। यही सच्चा ब्रह्मपुर है; इसी में समस्त कामनाएँ समाई हैं। यही आत्मा है — पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, भूखरहित, प्यासरहित, जिसकी कामना सत्य है, जिसका संकल्प सत्य है। क्योंकि जैसे इस लोक में प्रजा आज्ञा के अनुसार चलती है — जिस भी वस्तु की, जिस देश की, जिस भूमि-भाग की वे कामना करते हैं, उसी के आश्रित होकर जीते हैं,

मंत्र 6

तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ।। ६ ।।

tadyatheha karmajito lokaḥ kṣīyata evamevāmutra puṇyajito lokaḥ kṣīyate tadya ihātmānamananuvidya vrajantyetāṃśca satyānkāmāṃsteṣāṃ sarveṣu lokeṣvakāmacāro bhavatyatha ya ihātmānamanuvidya vrajantyetāṃśca satyānkāmāṃsteṣāṃ sarveṣu lokeṣu kāmacāro bhavati

जैसे यहाँ कर्म से अर्जित लोक क्षीण हो जाता है, वैसे ही परलोक में पुण्य से अर्जित लोक भी क्षीण हो जाता है। इसलिए जो लोग इस आत्मा को और इन सत्य कामनाओं को बिना जाने यहाँ से जाते हैं, उनके लिए समस्त लोकों में इच्छानुसार गति नहीं होती; परन्तु जो इस आत्मा को और इन सत्य कामनाओं को जानकर यहाँ से जाते हैं, उनके लिए समस्त लोकों में इच्छानुसार गति होती है।

मंत्र 7

स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। १ ।।

sa yadi pitṛlokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya pitaraḥ samuttiṣṭhanti tena pitṛlokena sampanno mahīyate

यदि वह पितृलोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से पितर उठ खड़े होते हैं; और उस पितृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 8

अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। २ ।।

atha yadi mātṛlokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya mātaraḥ samuttiṣṭhanti tena mātṛlokena sampanno mahīyate

और यदि वह मातृलोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से माताएँ उठ खड़ी होती हैं; और उस मातृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 9

अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ३ ।।

atha yadi bhrātṛlokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya bhrātaraḥ samuttiṣṭhanti tena bhrātṛlokena sampanno mahīyate

और यदि वह भ्रातृलोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से भाई उठ खड़े होते हैं; और उस भ्रातृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 10

अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ४ ।।

atha yadi svasṛlokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya svasāraḥ samuttiṣṭhanti tena svasṛlokena sampanno mahīyate

और यदि वह स्वसृलोक (बहनों के लोक) की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से बहनें उठ खड़ी होती हैं; और उस स्वसृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 11

अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ५ ।।

atha yadi sakhilokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya sakhāyaḥ samuttiṣṭhanti tena sakhilokena sampanno mahīyate

और यदि वह सखिलोक (मित्रों के लोक) की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से मित्र उठ खड़े होते हैं; और उस सखिलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 12

अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ६ ।।

atha yadi gandhamālyalokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya gandhamālye samuttiṣṭhatastena gandhamālyalokena sampanno mahīyate

और यदि वह गन्ध-माल्य (सुगन्ध और मालाओं) के लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से गन्ध और माल्य उठ खड़े होते हैं; और उस गन्ध-माल्य लोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 13

अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति संकल्पादेवास्यान्नपाने समुत्तिष्ठतस्तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ७ ।।

atha yadyannapānalokakāmo bhavati saṃkalpādevāsyānnapāne samuttiṣṭhatastenānnapānalokena sampanno mahīyate

और यदि वह अन्न-पान (भोजन और पेय) के लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से अन्न और पान उठ खड़े होते हैं; और उस अन्न-पान लोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 14

अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन गीतवादित्रलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ८ ।।

atha yadi gītavāditralokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya gītavāditre samuttiṣṭhatastena gītavāditralokena sampanno mahīyate

और यदि वह गीत-वादित्र (गान और वाद्य) के लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से गीत और वाद्य उठ खड़े होते हैं; और उस गीत-वादित्र लोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 15

अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते ।। ९ ।।

atha yadi strīlokakāmo bhavati saṃkalpādevāsya striyaḥ samuttiṣṭhanti tena strīlokena sampanno mahīyate

और यदि वह स्त्रीलोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से स्त्रियाँ उठ खड़ी होती हैं; और उस स्त्रीलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 16

यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ।। १० ।।

yaṃ yamantamabhikāmo bhavati yaṃ kāmaṃ kāmayate so'sya saṃkalpādeva samuttiṣṭhati tena sampanno mahīyate

जिस भी वस्तु की वह कामना करता है, जिस भी भोग की इच्छा करता है, वह उसके संकल्प मात्र से उठ खड़ा होता है; और उससे सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है।

मंत्र 17

त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ।। १ ।।

ta ime satyāḥ kāmā anṛtāpidhānāsteṣāṃ satyānāṃ satāmanṛtamapidhānaṃ yo yo hyasyetaḥ praiti na tamiha darśanāya labhate

ये सत्य कामनाएँ अनृत (मिथ्या) से ढँकी हुई हैं। यद्यपि वे सत्य हैं, फिर भी अनृत उनका आवरण है। क्योंकि इसका जो-जो प्रिय यहाँ से चला जाता है, उसे यहाँ फिर देखने को नहीं मिलता।

मंत्र 18

अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ।। २ ।।

atha ye cāsyeha jīvā ye ca pretā yaccānyadicchanna labhate sarvaṃ tadatra gatvā vindate'tra hyasyaite satyāḥ kāmā anṛtāpidhānāstadyathāpi hiraṇyanidhiṃ nihitamakṣetrajñā uparyupari sañcaranto na vindeyurevamevemāḥ sarvāḥ prajā aharahargacchantya etaṃ brahmalokaṃ na vindantyanṛtena hi pratyūḍhāḥ

परन्तु यहाँ जो कुछ इसका है — जो जीवित हैं और जो चले गए हैं — और जो कुछ और वह चाहता है पर नहीं पाता, वह सब उस (हृदयाकाश) में जाकर पा लेता है; क्योंकि वहीं इसकी ये सत्य कामनाएँ हैं, जो अनृत से ढँकी हैं। जैसे जो स्थान नहीं जानते वे गड़े हुए स्वर्ण-निधि के ऊपर बार-बार चलते हुए भी उसे नहीं पाते, वैसे ही ये सब प्राणी प्रतिदिन (सुषुप्ति में) वहाँ जाकर भी इस ब्रह्मलोक को नहीं पाते, क्योंकि वे अनृत से ढके हुए हैं।

मंत्र 19

स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ।। ३ ।।

sa vā eṣa ātmā hṛdi tasyaitadeva niruktaṃ hṛdyayamiti tasmāddhṛdayamaharaharvā evaṃvitsvargaṃ lokameti

यह आत्मा हृदय में है। इसका निर्वचन यही है — 'यह हृदय में है' (हृदि अयम्), इसीलिए इसे हृदयम् कहते हैं। जो ऐसा जानता है, वह प्रतिदिन स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

मंत्र 20

अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ।। ४ ।।

atha ya eṣa samprasādo'smāccharīrātsamutthāya paraṃ jyotirupasampadya svena rūpeṇābhiniṣpadyata eṣa ātmeti hovācaitadamṛtamabhayametadbrahmeti tasya ha vā etasya brahmaṇo nāma satyamiti

अब वह प्रसन्न-आत्मा (सम्प्रसाद), इस शरीर से ऊपर उठकर परम ज्योति को प्राप्त करके, अपने वास्तविक रूप में प्रकट होता है — यही आत्मा है, ऐसा उन्होंने कहा; यही अमृत है, अभय है; यही ब्रह्म है। और इस ब्रह्म का नाम 'सत्य' है।

मंत्र 21

तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ।। ५ ।।

tāni ha vā etāni trīṇyakṣarāṇi satīyamiti tadyatsattadamṛtamatha yatti tanmartyamatha yadyaṃ tenobhe yacchati yadanenobhe yacchati tasmādyamaharaharvā evaṃvitsvargaṃ lokameti

इसके ये तीन अक्षर हैं — सत्, ति, यम्। जो 'सत्' है वह अमृत है; जो 'ति' है वह मर्त्य है; और जो 'यम्' है, उससे वह दोनों को धारण (नियन्त्रित) करता है। क्योंकि उससे दोनों को धारण करता है, इसीलिए वह 'यम्' है। जो ऐसा जानता है, वह प्रतिदिन स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

मंत्र 22

अथ य आत्मा स सेतुर्धृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतं सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतं सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ।। १ ।।

atha ya ātmā sa seturdhṛtireṣāṃ lokānāmasaṃbhedāya naitaṃ setumahorātre tarato na jarā na mṛtyurna śoko na sukṛtaṃ na duṣkṛtaṃ sarve pāpmāno'to nivartante'pahatapāpmā hyeṣa brahmalokaḥ

अब, वह आत्मा एक सेतु है, एक मर्यादा है, जो इन लोकों को परस्पर मिल जाने से रोककर पृथक् रखता है। न दिन-रात उस सेतु को लाँघते हैं, न जरा, न मृत्यु, न शोक, न सुकृत, न दुष्कृत। समस्त पाप उससे लौट जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापरहित है।

मंत्र 23

तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ।। २ ।।

tasmādvā etaṃ setuṃ tīrtvāndhaḥ sannanandho bhavati viddhaḥ sannaviddho bhavatyupatāpī sannanupatāpī bhavati tasmādvā etaṃ setuṃ tīrtvāpi naktamaharevābhiniṣpadyate sakṛdvibhāto hyevaiṣa brahmalokaḥ

इसलिए इस सेतु को पार कर लेने पर अन्धा अन्धा नहीं रहता, विद्ध विद्ध नहीं रहता, पीड़ित पीड़ित नहीं रहता। इसलिए इस सेतु को पार करके रात्रि भी दिन बन जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक एक ही बार सदा के लिए प्रकाशित है।

मंत्र 24

तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ।। ३ ।।

tadya evaitaṃ brahmalokaṃ brahmacaryeṇānuvindanti teṣāmevaiṣa brahmalokasteṣāṃ sarveṣu lokeṣu kāmacāro bhavati

इसलिए जो लोग ब्रह्मचर्य के द्वारा इस ब्रह्मलोक को पा लेते हैं, उन्हीं का यह ब्रह्मलोक है, और उनके लिए समस्त लोकों में इच्छानुसार गति होती है।

मंत्र 25

अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ।। १ ।।

atha yadyajña ityācakṣate brahmacaryameva tadbrahmacaryeṇa hyeva yo jñātā taṃ vindate'tha yadiṣṭamityācakṣate brahmacaryameva tadbrahmacaryeṇa hyeveṣṭvātmānamanuvindate

अब, जिसे 'यज्ञ' कहते हैं वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही ज्ञाता (आत्मा को) पाता है। और जिसे 'इष्ट' कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही खोजकर मनुष्य आत्मा को पा लेता है।

मंत्र 26

अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मानमनुविद्य मनुते ।। २ ।।

atha yatsattrāyaṇamityācakṣate brahmacaryameva tadbrahmacaryeṇa hyeva sata ātmanastrāṇaṃ vindate'tha yanmaunamityācakṣate brahmacaryameva tadbrahmacaryeṇa hyevātmānamanuvidya manute

और जिसे 'सत्त्रायण' कहते हैं वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य सत्स्वरूप आत्मा का त्राण (रक्षण) पाता है। और जिसे 'मौन' कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही आत्मा को जानकर मनुष्य उसका मनन करता है।

मंत्र 27

अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दतेऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरं मदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितं हिरण्मयम् ।। ३ ।।

atha yadanāśakāyanamityācakṣate brahmacaryameva tadeṣa hyātmā na naśyati yaṃ brahmacaryeṇānuvindate'tha yadaraṇyāyanamityācakṣate brahmacaryameva tadaraśca ha vai ṇyaścārṇavau brahmaloke tṛtīyasyāmito divi tadairaṃ madīyaṃ sarastadaśvatthaḥ somasavanastadaparājitā pūrbrahmaṇaḥ prabhuvimitaṃ hiraṇmayam

और जिसे 'अनाशकायन' (उपवास-व्रत) कहते हैं वह वास्तव में ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जिस आत्मा को ब्रह्मचर्य से पाया जाता है वह नष्ट नहीं होती। और जिसे 'अरण्यायन' कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य है। अर और ण्य — ये दो समुद्र ब्रह्मलोक में हैं, यहाँ से तीसरे स्वर्ग में; वहाँ ऐरम्मदीय सरोवर है, वहाँ सोम की वर्षा करने वाला अश्वत्थ वृक्ष है, वहाँ ब्रह्म की अपराजिता नामक पुरी है, और प्रभु द्वारा निर्मित स्वर्णमय भवन है।

मंत्र 28

तद्य एवैतवरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ।। ४ ।।

tadya evaitavaraṃ ca ṇyaṃ cārṇavau brahmaloke brahmacaryeṇānuvindanti teṣāmevaiṣa brahmalokasteṣāṃ sarveṣu lokeṣu kāmacāro bhavati

इसलिए जो लोग ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्मलोक में उन दोनों समुद्रों अर और ण्य को पा लेते हैं, उन्हीं का यह ब्रह्मलोक है, और उनके लिए समस्त लोकों में इच्छानुसार गति होती है।

मंत्र 29

अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ।। १ ।।

atha yā etā hṛdayasya nāḍyastāḥ piṅgalasyāṇimnastiṣṭhanti śuklasya nīlasya pītasya lohitasyetyasau vā ādityaḥ piṅgala eṣa śukla eṣa nīla eṣa pīta eṣa lohitaḥ

अब, हृदय की ये नाड़ियाँ पिंगल (कपिश) वर्ण के सूक्ष्म रस से भरी हुई स्थित हैं — शुक्ल, नील, पीत और लोहित रस से। वह जो सूर्य है, वही पिंगल है, वही शुक्ल है, वही नील है, वही पीत है, वही लोहित है।

मंत्र 30

तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ।। २ ।।

tadyathā mahāpatha ātata ubhau grāmau gacchatīmaṃ cāmuṃ caivamevaitā ādityasya raśmaya ubhau lokau gacchantīmaṃ cāmuṃ cāmuṣmādādityātpratāyante tā āsu nāḍīṣu sṛptā ābhyo nāḍībhyaḥ pratāyante te'muṣminnāditye sṛptāḥ

जैसे कोई महामार्ग फैला हुआ दोनों गाँवों को — इस और उस को — जाता है, वैसे ही सूर्य की किरणें दोनों लोकों को — इस और उस को — जाती हैं। वे उस सूर्य से फैलकर इन नाड़ियों में प्रवेश करती हैं, और इन नाड़ियों से फैलकर उस सूर्य में प्रवेश करती हैं।

मंत्र 31

तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ।। ३ ।।

tadyatraitatsuptaḥ samastaḥ samprasannaḥ svapnaṃ na vijānātyāsu tadā nāḍīṣu sṛpto bhavati taṃ na kaścana pāpmā spṛśati tejasā hi tadā sampanno bhavati

अब, जब मनुष्य इस प्रकार पूर्णतया शान्त और प्रसन्न होकर सोया रहता है और कोई स्वप्न नहीं जानता, तब वह इन नाड़ियों में प्रविष्ट हो जाता है; और उसे कोई पाप नहीं छूता, क्योंकि तब वह तेज (ज्योति) से सम्पन्न होता है।

मंत्र 32

अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ।। ४ ।।

atha yatraitadabalimānaṃ nīto bhavati tamabhita āsīnā āhurjānāsi māṃ jānāsi māmiti sa yāvadasmāccharīrādanutkrānto bhavati tāvajjānāti

अब, जब मनुष्य इस प्रकार दुर्बलता (मरणासन्न अवस्था) को प्राप्त होता है, तब उसके चारों ओर बैठे लोग कहते हैं — 'क्या तुम मुझे पहचानते हो? क्या तुम मुझे पहचानते हो?' जब तक वह इस शरीर से नहीं निकला, तब तक वह उन्हें पहचानता है।

मंत्र 33

अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ।। ५ ।।

atha yatraitadasmāccharīrādutkrāmatyathaitaireva raśmibhirūrdhvamākramate sa omiti vā hodvā mīyate sa yāvatkṣipyenmanastāvadādityaṃ gacchatyetadvai khalu lokadvāraṃ viduṣāṃ prapadanaṃ nirodho'viduṣām

परन्तु जब वह इस शरीर से निकलता है, तब वह इन्हीं किरणों के द्वारा ऊपर की ओर चढ़ता है। वह ॐ का चिन्तन करते हुए ऊपर जाता है; और मन जितनी शीघ्रता से जा सके, उतनी ही शीघ्रता में वह सूर्य को प्राप्त कर लेता है। वही निश्चय ही लोकों का द्वार है — ज्ञानियों के लिए प्रवेश, अज्ञानियों के लिए अवरोध।

मंत्र 34

तदेष श्लोकः । शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ।। ६ ।।

tadeṣa ślokaḥ | śataṃ caikā ca hṛdayasya nāḍyastāsāṃ mūrdhānamabhiniḥsṛtaikā | tayordhvamāyannamṛtatvameti viṣvaṅṅanyā utkramaṇe bhavantyutkramaṇe bhavanti

इस विषय में यह श्लोक है — 'हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमें से एक मूर्धा (सिर के शिखर) तक जाती है। उसके द्वारा ऊपर जाकर मनुष्य अमरत्व प्राप्त करता है; शेष नाड़ियाँ भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाकर (देह से) निकलने के मार्ग बन जाती हैं, निकलने के मार्ग बन जाती हैं।'

मंत्र 35

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ।। १ ।।

ya ātmāpahatapāpmā vijaro vimṛtyurviśoko vijighatso'pipāsaḥ satyakāmaḥ satyasaṃkalpaḥ so'nveṣṭavyaḥ sa vijijñāsitavyaḥ sa sarvāṃśca lokānāpnoti sarvāṃśca kāmānyastamātmānamanuvidya vijānātīti ha prajāpatiruvāca

जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, भूखरहित, प्यासरहित है, जिसकी कामना सत्य और संकल्प सत्य है — उसी को खोजना चाहिए, उसी को जानने की इच्छा करनी चाहिए। जो उस आत्मा को पाकर जान लेता है, वह समस्त लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापति ने कहा।

मंत्र 36

तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्वेच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो हैव देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ।। २ ।।

taddhobhaye devāsurā anububudhire te hocurhanta tamātmānamanvecchāmo yamātmānamanviṣya sarvāṃśca lokānāpnoti sarvāṃśca kāmānitīndro haiva devānāmabhipravavrāja virocano'surāṇāṃ tau hāsaṃvidānāveva samitpāṇī prajāpatisakāśamājagmatuḥ

इसे देवताओं और असुरों दोनों ने सुना। उन्होंने कहा — 'आओ, हम उस आत्मा को खोजें, जिसे खोजकर मनुष्य समस्त लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।' तब देवताओं में से इन्द्र और असुरों में से विरोचन चल पड़े; और परस्पर बिना कोई परामर्श किए, दोनों हाथ में समिधा लिए प्रजापति के पास आए।

मंत्र 37

तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्तावास्तमिति तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ।। ३ ।।

tau ha dvātriṃśataṃ varṣāṇi brahmacaryamūṣatustau ha prajāpatiruvāca kimicchantāvāstamiti tau hocaturya ātmāpahatapāpmā vijaro vimṛtyurviśoko vijighatso'pipāsaḥ satyakāmaḥ satyasaṃkalpaḥ so'nveṣṭavyaḥ sa vijijñāsitavyaḥ sa sarvāṃśca lokānāpnoti sarvāṃśca kāmānyastamātmānamanuvidya vijānātīti bhagavato vaco vedayante tamicchantāvavāstamiti

दोनों ने वहाँ बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया। तब प्रजापति ने उनसे पूछा — 'क्या चाहते हुए तुम यहाँ रह रहे हो?' उन्होंने उत्तर दिया — 'जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, भूखरहित, प्यासरहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, उसी को खोजना और जानना चाहिए; जो उस आत्मा को पाकर जान लेता है वह समस्त लोकों और कामनाओं को पा लेता है — ऐसा भगवान् के वचन के रूप में लोग बताते हैं। उसी की कामना से हम यहाँ रह रहे हैं।'

मंत्र 38

तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ।। ४ ।।

tau ha prajāpatiruvāca ya eṣo'kṣiṇi puruṣo dṛśyata eṣa ātmeti hovācaitadamṛtamabhayametadbrahmetyatha yo'yaṃ bhagavo'psu parikhyāyate yaścāyamādarśe katama eṣa ityeṣa u evaiṣu sarveṣvanteṣu parikhyāyata iti hovāca

तब प्रजापति ने उनसे कहा — 'जो पुरुष नेत्र में दिखाई देता है, वही आत्मा है; यही अमृत है, अभय है, यही ब्रह्म है।' (उन्होंने पूछा —) 'किन्तु भगवन्, जो जल में दिखाई देता है और जो दर्पण में — इनमें से कौन-सा वह आत्मा है?' उन्होंने कहा — 'यही तो इन सब में दिखाई देता है।'

मंत्र 39

उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्यः आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ।। १ ।।

udaśarāva ātmānamavekṣya yadātmano na vijānīthastanme prabrūtamiti tau hodaśarāve'vekṣāṃcakrāte tau ha prajāpatiruvāca kiṃ paśyatha iti tau hocatuḥ sarvamevedamāvāṃ bhagava ātmānaṃ paśyāva ā lomabhyaḥ ā nakhebhyaḥ pratirūpamiti

'जल से भरे पात्र में अपने को देखो, और आत्मा का जो कुछ तुम न समझ पाओ, वह मुझे बताओ।' दोनों ने जल-पात्र में देखा। प्रजापति ने पूछा — 'क्या देखते हो?' उन्होंने कहा — 'भगवन्, हम अपने इस सम्पूर्ण शरीर को — रोमों तक और नखों तक — ठीक वैसा ही प्रतिबिम्बित देखते हैं।'

मंत्र 40

तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ।। २ ।।

tau ha prajāpatiruvāca sādhvalaṃkṛtau suvasanau pariṣkṛtau bhūtvodaśarāve'vekṣethāmiti tau ha sādhvalaṃkṛtau suvasanau pariṣkṛtau bhūtvodaśarāve'vekṣāṃcakrāte tau ha prajāpatiruvāca kiṃ paśyatha iti

प्रजापति ने उनसे कहा — 'भली-भाँति श्रृंगार करके, सुन्दर वस्त्र पहनकर, स्वच्छ होकर जल-पात्र में देखो।' दोनों भली-भाँति श्रृंगार करके, सुन्दर वस्त्र पहनकर, स्वच्छ होकर जल-पात्र में देखने लगे। प्रजापति ने पूछा — 'क्या देखते हो?'

मंत्र 41

तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतावित्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ।। ३ ।।

tau hocaturyathaivedamāvāṃ bhagavaḥ sādhvalaṃkṛtau suvasanau pariṣkṛtau sva evamevemau bhagavaḥ sādhvalaṃkṛtau suvasanau pariṣkṛtāvityeṣa ātmeti hovācaitadamṛtamabhayametadbrahmeti tau ha śāntahṛdayau pravavrajatuḥ

उन्होंने कहा — 'भगवन्, जैसे हम स्वयं भली-भाँति श्रृंगार किए, सुन्दर वस्त्र पहने और स्वच्छ हैं, वैसे ही ये (प्रतिबिम्ब) भी भली-भाँति श्रृंगार किए, सुन्दर वस्त्र पहने और स्वच्छ हैं।' 'यही आत्मा है,' उन्होंने कहा, 'यही अमृत है, अभय है, यही ब्रह्म है।' और दोनों सन्तुष्ट हृदय से चले गए।

मंत्र 42

तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्यात्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ।। ४ ।।

tau hānvīkṣya prajāpatiruvācānupalabhyātmānamananuvidya vrajato yatara etadupaniṣado bhaviṣyanti devā vāsurā vā te parābhaviṣyantīti sa ha śāntahṛdaya eva virocano'surāñjagāma tebhyo haitāmupaniṣadaṃ provācātmaiveha mahayya ātmā paricarya ātmānameveha mahayannātmānaṃ paricarannubhau lokāvavāpnotīmaṃ cāmuṃ ceti

उनके पीछे देखते हुए प्रजापति ने कहा — 'ये आत्मा को न समझकर, न जानकर जा रहे हैं। जो कोई ऐसी उपनिषद् (गुप्त मत) को धारण करेंगे, चाहे वे देव हों या असुर, वे नष्ट हो जाएँगे।' अब विरोचन सन्तुष्ट हृदय से असुरों के पास गया और उन्हें यह मत सुनाया — कि यहाँ केवल शरीर ही उपासना के योग्य है, शरीर की ही सेवा करनी चाहिए; और यहाँ शरीर की उपासना और सेवा करके मनुष्य दोनों लोकों को — इस और उस को — प्राप्त कर लेता है।

मंत्र 43

तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालंकारेणेति संस्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ।। ५ ।।

tasmādapyadyehādadānamaśraddadhānamayajamānamāhurāsuro batetyasurāṇāṃ hyeṣopaniṣatpretasya śarīraṃ bhikṣayā vasanenālaṃkāreṇeti saṃskurvantyetena hyamuṃ lokaṃ jeṣyanto manyante

इसीलिए आज भी जो दान नहीं देता, जिसमें श्रद्धा नहीं, जो यज्ञ नहीं करता, उसके विषय में लोग कहते हैं — 'अरे, यह तो आसुर है!' — क्योंकि यही असुरों की उपनिषद् (मत) है। वे मृतक के शरीर को भिक्षा में माँगी वस्तुओं, वस्त्रों और आभूषणों से सजाते हैं; क्योंकि उनका विश्वास है कि इससे वे परलोक को जीत लेंगे।

मंत्र 44

अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ।। १ ।।

atha hendro'prāpyaiva devānetadbhayaṃ dadarśa yathaiva khalvayamasmiñcharīre sādhvalaṃkṛte sādhvalaṃkṛto bhavati suvasane suvasanaḥ pariṣkṛte pariṣkṛta evamevāyamasminnandhe'ndho bhavati srāme srāmaḥ parivṛkṇe parivṛkṇo'syaiva śarīrasya nāśamanveṣa naśyati nāhamatra bhogyaṃ paśyāmīti

किन्तु इन्द्र ने देवताओं तक पहुँचने से पहले ही यह कठिनाई देख ली — 'जैसे यह (प्रतिबिम्ब) शरीर के भली-भाँति सजने पर सज जाता है, सुन्दर वस्त्र पहनने पर सुन्दर वस्त्रयुक्त हो जाता है, स्वच्छ होने पर स्वच्छ हो जाता है, वैसे ही यह शरीर के अन्धा होने पर अन्धा, लँगड़ा होने पर लँगड़ा, अंगहीन होने पर अंगहीन हो जाता है। शरीर के नष्ट होते ही यह भी नष्ट हो जाता है। इसमें मुझे कोई हित नहीं दिखता।'

मंत्र 45

स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ।। २ ।।

sa samitpāṇiḥ punareyāya taṃ ha prajāpatiruvāca maghavanyacchāntahṛdayaḥ prāvrājīḥ sārdhaṃ virocanena kimicchanpunarāgama iti sa hovāca yathaiva khalvayaṃ bhagavo'smiñcharīre sādhvalaṃkṛte sādhvalaṃkṛto bhavati suvasane suvasanaḥ pariṣkṛte pariṣkṛta evamevāyamasminnandhe'ndho bhavati srāme srāmaḥ parivṛkṇe parivṛkṇo'syaiva śarīrasya nāśamanveṣa naśyati nāhamatra bhogyaṃ paśyāmīti

वह हाथ में समिधा लिए लौट आया। प्रजापति ने उससे कहा — 'मघवन्, तुम तो विरोचन के साथ सन्तुष्ट हृदय से गए थे; अब क्या चाहते हुए लौट आए?' उसने कहा — 'भगवन्, जैसे यह (प्रतिबिम्ब) शरीर के सजने पर सज जाता है, सुन्दर वस्त्र पहनने पर सुन्दर वस्त्रयुक्त हो जाता है, स्वच्छ होने पर स्वच्छ हो जाता है, वैसे ही शरीर के अन्धा होने पर अन्धा, लँगड़ा होने पर लँगड़ा, अंगहीन होने पर अंगहीन हो जाता है; और शरीर के नष्ट होते ही नष्ट हो जाता है। इसमें मुझे कोई हित नहीं दिखता।'

मंत्र 46

एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ।। ३ ।।

evamevaiṣa maghavanniti hovācaitaṃ tveva te bhūyo'nuvyākhyāsyāmi vasāparāṇi dvātriṃśataṃ varṣāṇīti sa hāparāṇi dvātriṃśataṃ varṣāṇyuvāsa tasmai hovāca

'मघवन्, ऐसा ही है,' उन्होंने कहा; 'किन्तु मैं तुम्हें इसे और आगे समझाऊँगा। और बत्तीस वर्ष यहाँ रहो।' वह और बत्तीस वर्ष वहाँ रहा। तब प्रजापति ने उससे कहा —

मंत्र 47

य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ।। १ ।।

ya eṣa svapne mahīyamānaścaratyeṣa ātmeti hovācaitadamṛtamabhayametadbrahmeti sa ha śāntahṛdayaḥ pravavrāja sa hāprāpyaiva devānetadbhayaṃ dadarśa tadyadyapīdaṃ śarīramandhaṃ bhavatyanandhaḥ sa bhavati yadi srāmamasrāmo naivaiṣo'sya doṣeṇa duṣyati

'जो स्वप्न में महिमान्वित होकर विचरता है, वही आत्मा है,' उन्होंने कहा; 'यही अमृत है, अभय है, यही ब्रह्म है।' इन्द्र सन्तुष्ट हृदय से चला गया। किन्तु देवताओं तक पहुँचने से पहले ही उसने यह कठिनाई देख ली — 'यद्यपि यह (स्वप्न-आत्मा) शरीर के अन्धा होने पर अन्धा नहीं होता, न शरीर के लँगड़ा होने पर लँगड़ा होता है, और शरीर के दोषों से दूषित नहीं होता,

मंत्र 48

न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ।। २ ।।

na vadhenāsya hanyate nāsya srāmyeṇa srāmo ghnanti tvevainaṃ vicchādayantīvāpriyavetteva bhavatyapi roditīva nāhamatra bhogyaṃ paśyāmīti

न शरीर के मारे जाने पर मारा जाता है, न शरीर के लँगड़े होने पर लँगड़ा होता है — फिर भी मानो उसे (स्वप्न में) मारते हैं, मानो उसका पीछा करते हैं, वह मानो अप्रिय अनुभव करता है, और मानो रोता भी है। इसमें मुझे कोई हित नहीं दिखता।'

मंत्र 49

स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ।। ३ ।।

sa samitpāṇiḥ punareyāya taṃ ha prajāpatiruvāca maghavanyacchāntahṛdayaḥ prāvrājīḥ kimicchanpunarāgama iti sa hovāca tadyadyapīdaṃ bhagavaḥ śarīramandhaṃ bhavatyanandhaḥ sa bhavati yadi srāmamasrāmo naivaiṣo'sya doṣeṇa duṣyati

वह हाथ में समिधा लिए लौट आया। प्रजापति ने उससे कहा — 'मघवन्, तुम सन्तुष्ट हृदय से गए थे; अब क्या चाहते हुए लौट आए?' उसने कहा — 'भगवन्, यद्यपि यह (स्वप्न-आत्मा) शरीर के अन्धा होने पर अन्धा नहीं होता, न शरीर के लँगड़ा होने पर लँगड़ा होता है, और शरीर के दोषों से दूषित नहीं होता,

मंत्र 50

न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ।। ४ ।।

na vadhenāsya hanyate nāsya srāmyeṇa srāmo ghnanti tvevainaṃ vicchādayantīvāpriyavetteva bhavatyapi roditīva nāhamatra bhogyaṃ paśyāmītyevamevaiṣa maghavanniti hovācaitaṃ tveva te bhūyo'nuvyākhyāsyāmi vasāparāṇi dvātriṃśataṃ varṣāṇīti sa hāparāṇi dvātriṃśataṃ varṣāṇyuvāsa tasmai hovāca

न शरीर के मारे जाने पर मारा जाता है, न लँगड़े होने पर लँगड़ा होता है — फिर भी मानो उसे मारते हैं, मानो उसका पीछा करते हैं, वह मानो अप्रिय अनुभव करता है, और मानो रोता भी है। इसमें मुझे कोई हित नहीं दिखता।' 'मघवन्, ऐसा ही है,' उन्होंने कहा; 'किन्तु मैं तुम्हें इसे और आगे समझाऊँगा। और बत्तीस वर्ष यहाँ रहो।' वह और बत्तीस वर्ष वहाँ रहा। तब प्रजापति ने उससे कहा —

मंत्र 51

तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाह खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ।। १ ।।

tadyatraitatsuptaḥ samastaḥ samprasannaḥ svapnaṃ na vijānātyeṣa ātmeti hovācaitadamṛtamabhayametadbrahmeti sa ha śāntahṛdayaḥ pravavrāja sa hāprāpyaiva devānetadbhayaṃ dadarśa nāha khalvayamevaṃ sampratyātmānaṃ jānātyayamahamasmīti no evemāni bhūtāni vināśamevāpīto bhavati nāhamatra bhogyaṃ paśyāmīti

'अब, जब मनुष्य इस प्रकार पूर्णतया शान्त और प्रसन्न होकर सोया रहता है और कोई स्वप्न नहीं जानता — वही आत्मा है,' उन्होंने कहा; 'यही अमृत है, अभय है, यही ब्रह्म है।' इन्द्र सन्तुष्ट हृदय से चला गया। किन्तु देवताओं तक पहुँचने से पहले ही उसने यह कठिनाई देख ली — 'वास्तव में यह (सुषुप्त आत्मा) इस समय अपने को "मैं यह हूँ" ऐसा नहीं जानता, न इन प्राणियों को जानता है। यह तो मानो पूर्ण विनाश को प्राप्त हो गया है। इसमें मुझे कोई हित नहीं दिखता।'

मंत्र 52

स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ।। २ ।।

sa samitpāṇiḥ punareyāya taṃ ha prajāpatiruvāca maghavanyacchāntahṛdayaḥ prāvrājīḥ kimicchanpunarāgama iti sa hovāca nāha khalvayaṃ bhagava evaṃ sampratyātmānaṃ jānātyayamahamasmīti no evemāni bhūtāni vināśamevāpīto bhavati nāhamatra bhogyaṃ paśyāmīti

वह हाथ में समिधा लिए लौट आया। प्रजापति ने उससे कहा — 'मघवन्, तुम सन्तुष्ट हृदय से गए थे; अब क्या चाहते हुए लौट आए?' उसने कहा — 'भगवन्, वास्तव में यह इस समय अपने को "मैं यह हूँ" ऐसा नहीं जानता, न इन प्राणियों को जानता है। यह तो मानो पूर्ण विनाश को प्राप्त हो गया है। इसमें मुझे कोई हित नहीं दिखता।'

मंत्र 53

एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतं सम्पेदुरेतत्तद्यदाहुरेकशतं ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै होवाच ।। ३ ।।

evamevaiṣa maghavanniti hovācaitaṃ tveva te bhūyo'nuvyākhyāsyāmi no evānyatraitasmādvasāparāṇi pañca varṣāṇīti sa hāparāṇi pañca varṣāṇyuvāsa tānyekaśataṃ sampeduretattadyadāhurekaśataṃ ha vai varṣāṇi maghavānprajāpatau brahmacaryamuvāsa tasmai hovāca

'मघवन्, ऐसा ही है,' उन्होंने कहा; 'किन्तु मैं तुम्हें इसे और आगे समझाऊँगा — और इससे परे कुछ नहीं है। और पाँच वर्ष यहाँ रहो।' वह और पाँच वर्ष वहाँ रहा; ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गए। इसीलिए लोग कहते हैं — 'एक सौ एक वर्ष तक मघवान् ने प्रजापति के पास ब्रह्मचर्य का पालन किया।' तब प्रजापति ने उससे कहा —

मंत्र 54

मघवन्मर्त्यं वा इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ।। १ ।।

maghavanmartyaṃ vā idaṃ śarīramāttaṃ mṛtyunā tadasyāmṛtasyāśarīrasyātmano'dhiṣṭhānamātto vai saśarīraḥ priyāpriyābhyāṃ na vai saśarīrasya sataḥ priyāpriyayorapahatirastyaśarīraṃ vāva santaṃ na priyāpriye spṛśataḥ

'मघवन्, यह शरीर मर्त्य है, मृत्यु के अधीन है। यह उस अमृत, अशरीर आत्मा का आवास है। जो सशरीर है वह प्रिय और अप्रिय से बँधा रहता है; सशरीर के लिए प्रिय-अप्रिय से मुक्ति नहीं है। किन्तु जो अशरीर है, उसे प्रिय और अप्रिय नहीं छूते।'

मंत्र 55

अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथैतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ।। २ ।।

aśarīro vāyurabhraṃ vidyutstanayitnuraśarīrāṇyetāni tadyathaitānyamuṣmādākāśātsamutthāya paraṃ jyotirupasampadya svena rūpeṇābhiniṣpadyante

'अशरीर हैं वायु, मेघ, विद्युत और गर्जन — ये सब अशरीर हैं। अब जैसे ये उस आकाश से उठकर, परम ज्योति को प्राप्त करके, अपने-अपने रूप में प्रकट होते हैं,

मंत्र 56

एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमपुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरं स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ।। ३ ।।

evamevaiṣa samprasādo'smāccharīrātsamutthāya paraṃ jyotirupasampadya svena rūpeṇābhiniṣpadyate sa uttamapuruṣaḥ sa tatra paryeti jakṣatkrīḍanramamāṇaḥ strībhirvā yānairvā jñātibhirvā nopajanaṃ smarannidaṃ śarīraṃ sa yathā prayogya ācaraṇe yukta evamevāyamasmiñcharīre prāṇo yuktaḥ

उसी प्रकार यह प्रसन्न-आत्मा (सम्प्रसाद), इस शरीर से ऊपर उठकर, परम ज्योति को प्राप्त करके, अपने वास्तविक रूप में प्रकट होता है। वही उत्तम पुरुष है। वहाँ वह हँसता, खेलता, आनन्द करता हुआ विचरता है — स्त्रियों के साथ, अथवा रथों के साथ, अथवा बन्धुओं के साथ — इस संलग्न शरीर का स्मरण न करते हुए। जैसे कोई पशु गाड़ी में जुता रहता है, वैसे ही यह प्राण इस शरीर में जुता हुआ है।

मंत्र 57

अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ।। ४ ।।

atha yatraitadākāśamanuviṣaṇṇaṃ cakṣuḥ sa cākṣuṣaḥ puruṣo darśanāya cakṣuratha yo vededaṃ jighrāṇīti sa ātmā gandhāya ghrāṇamatha yo vededamabhivyāharāṇīti sa ātmābhivyāhārāya vāgatha yo vededaṃ śṛṇavānīti sa ātmā śravaṇāya śrotram

अब, जहाँ यह दृष्टि आकाश (नेत्र-गोलक) में प्रविष्ट है, वहाँ नेत्र का पुरुष है; नेत्र तो केवल देखने का साधन है। और जो यह जानता है — 'मैं इसे सूँघूँ' — वही आत्मा है; नासिका सूँघने के लिए है। और जो यह जानता है — 'मैं इसे कहूँ' — वही आत्मा है; वाणी बोलने के लिए है। और जो यह जानता है — 'मैं इसे सुनूँ' — वही आत्मा है; कान सुनने के लिए है।

मंत्र 58

अथ यो वेदेदं मन्वानीति सात्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते य एते ब्रह्मलोके ।। ५ ।।

atha yo vededaṃ manvānīti sātmā mano'sya daivaṃ cakṣuḥ sa vā eṣa etena daivena cakṣuṣā manasaitānkāmānpaśyanramate ya ete brahmaloke

और जो यह जानता है — 'मैं इसका मनन करूँ' — वही आत्मा है; मन उसका दिव्य नेत्र है। इसी दिव्य नेत्र मन के द्वारा वह उन अभीष्ट भोगों को देखकर आनन्द करता है, जो ब्रह्मलोक में हैं।

मंत्र 59

तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषां सर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामाः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ।। ६ ।।

taṃ vā etaṃ devā ātmānamupāsate tasmātteṣāṃ sarve ca lokā āttāḥ sarve ca kāmāḥ sa sarvāṃśca lokānāpnoti sarvāṃśca kāmānyastamātmānamanuvidya vijānātīti ha prajāpatiruvāca prajāpatiruvāca

उस आत्मा की देवगण उपासना करते हैं; इसीलिए समस्त लोक और समस्त कामनाएँ उनके अधीन हैं। जो उस आत्मा को पाकर जान लेता है, वह समस्त लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापति ने कहा, ऐसा प्रजापति ने कहा।

मंत्र 60

श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामीत्यभिसंभवामीति ।। १ ।।

śyāmācchabalaṃ prapadye śabalācchyāmaṃ prapadye'śva iva romāṇi vidhūya pāpaṃ candra iva rāhormukhātpramucya dhūtvā śarīramakṛtaṃ kṛtātmā brahmalokamabhisaṃbhavāmītyabhisaṃbhavāmīti

श्याम (कृष्ण वर्ण) से मैं शबल (विविध वर्ण) को प्राप्त होता हूँ, शबल से श्याम को प्राप्त होता हूँ। जैसे घोड़ा अपने बालों को झाड़ देता है, वैसे पाप को झाड़कर, जैसे चन्द्रमा राहु के मुख से मुक्त होता है, वैसे मुक्त होकर, इस शरीर को त्यागकर — कृतात्मा होकर मैं अकृत (नित्य) ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ, प्राप्त होता हूँ।

मंत्र 61

आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशोविशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्येतमदत्कमदत्कं श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ।। १ ।।

ākāśo vai nāma nāmarūpayornirvahitā te yadantarā tadbrahma tadamṛtaṃ sa ātmā prajāpateḥ sabhāṃ veśma prapadye yaśo'haṃ bhavāmi brāhmaṇānāṃ yaśo rājñāṃ yaśoviśāṃ yaśo'hamanuprāpatsi sa hāhaṃ yaśasāṃ yaśaḥ śyetamadatkamadatkaṃ śyetaṃ lindu mābhigāṃ lindu mābhigām

जिसे आकाश कहते हैं वह नाम और रूप का प्रकाशक (निर्वाहक) है। जिसके भीतर ये दोनों हैं — वही ब्रह्म है, वही अमृत है, वही आत्मा है। मैं प्रजापति की सभा में, उसके भवन में प्रवेश करता हूँ। मैं ब्राह्मणों का यश हूँ, राजाओं का यश हूँ, वैश्यों का यश हूँ। मैंने यश प्राप्त कर लिया है। मैं, यशस्वियों का यश, उस श्वेत और दन्तहीन, दन्तहीन और श्वेत, लसीले (पुनर्जन्म की अवस्था) को प्राप्त न होऊँ; मैं वहाँ न जाऊँ।

मंत्र 62

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धर्मिकान्विदधदात्मनि सर्वाणीन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन्सर्व भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ।। १ ।।

taddhaitadbrahmā prajāpataya uvāca prajāpatirmanave manuḥ prajābhyaḥ ācāryakulādvedamadhītya yathāvidhānaṃ guroḥ karmātiśeṣeṇābhisamāvṛtya kuṭumbe śucau deśe svādhyāyamadhīyāno dharmikānvidadhadātmani sarvāṇīndriyāṇi sampratiṣṭhāpyāhiṃsansarva bhūtānyanyatra tīrthebhyaḥ sa khalvevaṃ vartayanyāvadāyuṣaṃ brahmalokamabhisampadyate na ca punarāvartate na ca punarāvartate

यह (विद्या) ब्रह्मा ने प्रजापति से कही, प्रजापति ने मनु से, और मनु ने अपनी प्रजा से कही। जो आचार्य के कुल में विधिपूर्वक वेद का अध्ययन करके, गुरु के कार्य से बचे हुए समय में (अध्ययन करके), और गृहस्थ में लौटकर अपने घर के किसी पवित्र स्थान में स्वाध्याय करता हुआ, धर्मात्मा सन्तान और शिष्यों को उत्पन्न करता हुआ, अपनी समस्त इन्द्रियों को आत्मा में स्थापित करके, तीर्थों (यज्ञादि) को छोड़कर किसी भी प्राणी की हिंसा न करता हुआ जीवनभर इस प्रकार आचरण करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है और फिर लौटकर नहीं आता, फिर लौटकर नहीं आता।