कठोपनिषद्
Kaṭhopaniṣad
कठोपनिषद् एक कथा से आरंभ होता है। वाजश्रवस यज्ञ करता है और अपनी गायें दान करता है। उसका पुत्र नचिकेता इस दान की अपर्याप्तता से विचलित होकर तीन बार पूछता है: तात, मुझे किसे देंगे? क्रोध में वाजश्रवस कहता है: मृत्यु को। नचिकेता यम के द्वार पर तीन दिन भूखा प्रतीक्षा करता है। यम लौटते हैं और इस बालक की निष्ठा देखकर तीन वर देते हैं। तीसरे वर में नचिकेता पूछता है: मृत्यु के बाद क्या? यम धन, भोग और साम्राज्य से टालने की कोशिश करते हैं। नचिकेता अडिग रहता है। तब यम की शिक्षा आती है: श्रेयस बनाम प्रेयस, शरीर-रथ का रूपक, अजन्मा-अमर आत्मा, और वह आह्वान जो स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारत को दिया: उत्तिष्ठत जाग्रत।
शांतिपाठ (कृष्ण यजुर्वेद)
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
oṃ saha nāvavatu | saha nau bhunaktu | saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu | mā vidviṣāvahai || oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
हम दोनों साथ रक्षित हों। हम दोनों साथ पोषित हों। हम दोनों साथ वीर्य (शक्ति और सामर्थ्य) का कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।
मंत्र 1
ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ।। १.१.१ ।।
oṃ uśanha vai vājaśravasaḥ sarvavedasaṃ dadau | tasya ha naciketā nāma putra āsa || 1.1.1 ||
एक बार वाजश्रवस ने सर्वस्व-यज्ञ में सारी सम्पत्ति दान की। उनके नचिकेता नाम का एक पुत्र था।
मंत्र 2
तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ।। १.१.२ ।।
taṃ ha kumāraṃ santaṃ dakṣiṇāsu nīyamānāsu śraddhāviveśa so'manyata || 1.1.2 ||
जब दक्षिणाएँ दी जा रही थीं, उस बालक के मन में श्रद्धा जागी और उसने सोचा:
मंत्र 3
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । आनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ।। १.१.३ ।।
pītodakā jagdhatṛṇā dugdhadohā nirindriyāḥ | ānandā nāma te lokāstānsa gacchati tā dadat || 1.1.3 ||
जिन गायों का पानी पिया जा चुका है, चारा खाया जा चुका है, दूध निकाला जा चुका है और जो शक्तिहीन हैं: इन्हें देने वाला आनन्दहीन लोकों को जाता है।
मंत्र 4
स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ।। १.१.४ ।।
sa hovāca pitaraṃ tāta kasmai māṃ dāsyasīti | dvitīyaṃ tṛtīyaṃ taṃ hovāca mṛtyave tvā dadāmīti || 1.1.4 ||
नचिकेता ने पिता से कहा: तात, आप मुझे किसे देंगे? दूसरी और तीसरी बार भी पूछा। पिता ने कहा: मैं तुझे मृत्यु को देता हूँ।
मंत्र 5
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किं स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ।। १.१.५ ।।
bahūnāmemi prathamo bahūnāmemi madhyamaḥ | kiṃ svidyamasya kartavyaṃ yanmayā'dya kariṣyati || 1.1.5 ||
नचिकेता ने मन में सोचा: मैं अपने साथियों में अग्रणी हूँ या मध्यम। आज यम मुझसे क्या काम लेंगे?
मंत्र 6
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ।। १.१.६ ।।
anupaśya yathā pūrve pratipaśya tathā'pare | sasyamiva martyaḥ pacyate sasyamivājāyate punaḥ || 1.1.6 ||
देखो पहले कैसे गए; देखो वैसे ही बाद वाले भी जाते हैं। मनुष्य अनाज की तरह पकता है और अनाज की तरह फिर उगता है।
मंत्र 7
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ।। १.१.७ ।।
vaiśvānaraḥ praviśatyatithirbrāhmaṇo gṛhān | tasyaitāṃ śāntiṃ kurvanti hara vaivasvatodakam || 1.1.7 ||
ब्राह्मण अतिथि वैश्वानर के रूप में घर में प्रवेश करता है। हे वैवस्वत, उसकी शान्ति के लिए जल लाओ।
मंत्र 8
आशाप्रतीक्षे संगतं सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूँश्च सर्वान् । एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्यालपमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ।। १.१.८ ।।
āśāpratīkṣe saṃgataṃ sūnṛtāṃ ceṣṭāpūrte putrapaśūṃśca sarvān | etadvṛṅkte puruṣasyālapamedhaso yasyānaśnanvasati brāhmaṇo gṛhe || 1.1.8 ||
आशा और प्रतीक्षा, मित्रता और शुभ वाणी, यज्ञ-दान, पुत्र और पशु: ये सब उस अल्पबुद्धि पुरुष के नष्ट हो जाते हैं जिसके घर में ब्राह्मण बिना भोजन किए रहता है।
मंत्र 9
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनशन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ।। १.१.९ ।।
tisro rātrīryadavātsīrgṛhe me'naśan brahmannatithirnamasyaḥ | namaste'stu brahman svasti me'stu tasmātprati trīnvarānvṛṇīṣva || 1.1.9 ||
हे ब्रह्मन, पूजनीय अतिथि होते हुए तुम मेरे घर तीन रातें बिना भोजन किए रहे। हे ब्रह्मन, तुम्हें नमस्कार। मुझे मंगल हो। तीन वर माँगो।
मंत्र 10
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो मा अभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ।। १.१.१० ।।
śāntasaṃkalpaḥ sumanā yathā syādvītamanyurgautamo mā abhi mṛtyo | tvatprasṛṣṭaṃ mā'bhivadetpratīta etattrayāṇāṃ prathamaṃ varaṃ vṛṇe || 1.1.10 ||
हे मृत्यो, मेरे पिता गौतम शान्त-संकल्प और प्रसन्नमना हों, क्रोधरहित हों। आपके भेज देने पर वे मुझसे प्रसन्न होकर मिलें: यह पहला वर माँगता हूँ।
मंत्र 11
यथा पुरस्ताद्भवितां प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ।। १.१.११ ।।
yathā purastādbhavitāṃ pratīta auddālakirāruṇirmatprasṛṣṭaḥ | sukhaṃ rātrīḥ śayitā vītamanyustvāṃ dadṛśivānmṛtyumukhātpramuktam || 1.1.11 ||
यम ने कहा: आरुणि-पुत्र औद्दालकि, जो मेरे द्वारा छोड़ा जाएगा, पहले जैसा प्रसन्न रहेगा, रातें सुखपूर्वक सोएगा, क्रोधरहित होगा और तुझे मृत्युमुख से मुक्त देखकर आनन्दित होगा।
मंत्र 12
स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।। १.१.१२ ।।
svarge loke na bhayaṃ kiñcanāsti na tatra tvaṃ na jarayā bibheti | ubhe tīrtvā'śanāyāpipāse śokātigo modate svargaloke || 1.1.12 ||
स्वर्गलोक में कोई भय नहीं है; वहाँ तुम नहीं हो और बुढ़ापे का डर नहीं है। भूख-प्यास दोनों पार करके, शोकरहित होकर मनुष्य आनन्दित होता है।
मंत्र 13
स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ।। १.१.१३ ।।
sa tvamagniṃ svargyamadhyeṣi mṛtyo prabrūhi tvaṃ śraddadhānāya mahyam | svargalokā amṛtatvaṃ bhajanta etaddvitīyena vṛṇe vareṇa || 1.1.13 ||
हे मृत्यो, तुम उस स्वर्गीय अग्नि को जानते हो। श्रद्धा रखने वाले मुझे बताओ। स्वर्गलोक अमृतत्व को प्राप्त करते हैं: यह दूसरे वर के रूप में माँगता हूँ।
मंत्र 14
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ।। १.१.१४ ।।
pra te bravīmi tadu me nibodha svargyamagniṃ naciketaḥ prajānan | anantalokāptimatho pratiṣṭhāṃ viddhi tvametaṃ nihitaṃ guhāyām || 1.1.14 ||
यम ने कहा: हे नचिकेता, मैं तुम्हें बताता हूँ, इसे सुनो। यह स्वर्गीय अग्नि अनंत लोकों की प्राप्ति और प्रतिष्ठा देती है; इसे हृदय-गुहा में निहित जानो।
मंत्र 15
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवददयथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ।। १.१.१५ ।।
lokādimagniṃ tamuvāca tasmai yā iṣṭakā yāvatīrvā yathā vā | sa cāpi tatpratyavadadayathoktaṃ athāsya mṛtyuḥ punarevāha tuṣṭaḥ || 1.1.15 ||
यम ने उसे वह प्राथमिक अग्नि बताई: कितनी ईंटें, कितनी और किस प्रकार। नचिकेता ने वैसा ही दोहराया जैसा कहा गया। तब यम ने प्रसन्न होकर फिर कहा:
मंत्र 16
तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः । तवैव नाम्ना भवितायमग्निः श्रृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ।। १.१.१६ ।।
tamabravītprīyamāṇo mahātmā varaṃ tavehādya dadāmi bhūyaḥ | tavaiva nāmnā bhavitāyamagniḥ śrṛṅkāṃ cemāmanekarūpāṃ gṛhāṇa || 1.1.16 ||
महात्मा यम ने प्रसन्न होकर कहा: आज यहाँ एक और वर देता हूँ। यह अग्नि तुम्हारे ही नाम से जानी जाएगी। इस अनेकरूपी माला को भी ले लो।
मंत्र 17
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ।। १.१.१७ ।।
triṇāciketastribhiretya sandhiṃ trikarmakṛttarati janmamṛtyū | brahmajajñaṃ devamīḍyaṃ viditvā nicāyyemāṃ śāntimatyantameti || 1.1.17 ||
जो तीन बार नाचिकेत-अग्नि को चुनता है, तीन कर्मों को करता है और तीनों संधियों को जानता है, वह जन्म-मृत्यु को पार करता है। ब्रह्म से उत्पन्न पूज्य देव को जानकर पूर्ण शान्ति को प्राप्त करता है।
मंत्र 18
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाञ्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।। १.१.१८ ।।
triṇāciketastrayametadviditvā ya evaṃ vidvāñcinute nāciketam | sa mṛtyupāśānpurataḥ praṇodya śokātigo modate svargaloke || 1.1.18 ||
जो इस प्रकार तीनों को जानते हुए नाचिकेत-अग्नि को स्थापित करता है, वह मृत्यु के पाशों को पहले ही हटाकर, शोकरहित होकर स्वर्गलोक में आनन्दित होता है।
मंत्र 19
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ।। १.१.१९ ।।
eṣa te'gnirnaciketaḥ svargyo yamavṛṇīthā dvitīyena vareṇa | etamagniṃ tavaiva pravakṣyanti janāsaḥ tṛtīyaṃ varaṃ naciketo vṛṇīṣva || 1.1.19 ||
यम ने कहा: हे नचिकेता, यह स्वर्गीय अग्नि है जो तुमने दूसरे वर में माँगी। इसे लोग तुम्हारे ही नाम से जानेंगे। अब तीसरा वर माँगो।
मंत्र 20
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ।। १.१.२० ।।
yeyaṃ prete vicikitsā manuṣye'stītyeke nāyamastīti caike | etadvidyāmanuśiṣṭastvayā'haṃ varāṇāmeṣa varastṛtīyaḥ || 1.1.20 ||
नचिकेता ने कहा: मनुष्य के मरने के बाद कुछ कहते हैं 'वह है', कुछ 'वह नहीं है': इस संशय को आपके शिक्षण से जानना चाहता हूँ। यह तीसरा वर है।
मंत्र 21
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः । अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ।। १.१.२१ ।।
devairatrāpi vicikitsitaṃ purā na hi suvijñeyamaṇureṣa dharmaḥ | anyaṃ varaṃ naciketo vṛṇīṣva mā moparotsīrati mā sṛjainam || 1.1.21 ||
यम ने कहा: इस विषय में पहले देवताओं को भी संशय था; यह सूक्ष्म धर्म सरलता से नहीं जाना जाता। कोई दूसरा वर माँगो, नचिकेता। मुझ पर दबाव मत डालो।
मंत्र 22
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ।। १.१.२२ ।।
devairatrāpi vicikitsitaṃ kila tvaṃ ca mṛtyo yanna sujñeyamāttha | vaktā cāsya tvādṛganyo na labhyo nānyo varastulya etasya kaścit || 1.1.22 ||
नचिकेता ने कहा: हे मृत्यो, तुम स्वयं कहते हो कि देवताओं को भी इसमें संशय था और यह सरलता से नहीं जाना जाता। तुम्हारे जैसा बताने वाला दूसरा नहीं मिल सकता। इस वर के बराबर कोई दूसरा वर नहीं है।
मंत्र 23
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्वा बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ।। १.१.२३ ।।
śatāyuṣaḥ putrapautrānvṛṇīṣvā bahūnpaśūnhastihiraṇyamaśvān | bhūmermahadāyatanaṃ vṛṇīṣva svayaṃ ca jīva śarado yāvadicchasi || 1.1.23 ||
यम ने कहा: सौ वर्ष जीने वाले पुत्र-पौत्र माँगो, अनेक पशु, हाथी, सोना, घोड़े माँगो। पृथ्वी का विशाल राज्य माँगो। स्वयं जितने वर्ष चाहो जीओ।
मंत्र 24
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ।। १.१.२४ ।।
etattulyaṃ yadi manyase varaṃ vṛṇīṣva vittaṃ cirajīvikāṃ ca | mahābhūmau naciketastvamedhi kāmānāṃ tvā kāmabhājaṃ karomi || 1.1.24 ||
यदि तुम इसके बराबर कोई वर मानते हो, तो धन और दीर्घजीवन माँगो। हे नचिकेता, इस महापृथ्वी पर वैभवशाली हो। मैं तुम्हें सभी इच्छाओं का भोक्ता बनाता हूँ।
मंत्र 25
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ।। १.१.२५ ।।
ye ye kāmā durlabhā martyaloke sarvānkāmāṃśchandataḥ prārthayasva | imā rāmāḥ sarathāḥ satūryā na hīdṛśā lambhanīyā manuṣyaiḥ | ābhirmatprattābhiḥ paricārayasva naciketo maraṇaṃ mā'nuprākṣīḥ || 1.1.25 ||
मर्त्यलोक में जो भी दुर्लभ कामनाएँ हैं, इच्छानुसार माँगो। ये रथ-सहित, वाद्य-सहित सुंदरियाँ हैं जो मनुष्यों को नहीं मिलतीं। इनसे सेवा लो, हे नचिकेता। मृत्यु के बारे में मत पूछो।
मंत्र 26
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ।। १.१.२६ ।।
śvobhāvā martyasya yadantakaitatsarvendriyāṇāṃ jarayanti tejaḥ | api sarvaṃ jīvitamalpameva tavaiva vāhāstava nṛtyagīte || 1.1.26 ||
नचिकेता ने कहा: हे अन्तक, ये सब कल तक ही टिकने वाले हैं। ये सभी इन्द्रियों का तेज नष्ट कर देते हैं। सारा जीवन ही अल्प है। ये वाहन, नृत्य और संगीत तुम्हारे ही हों।
मंत्र 27
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ।। १.१.२७ ।।
na vittena tarpaṇīyo manuṣyo lapsyāmahe vittamadrākṣma cettvā | jīviṣyāmo yāvadīśiṣyasi tvaṃ varastu me varaṇīyaḥ sa eva || 1.1.27 ||
मनुष्य धन से तृप्त नहीं होता। यदि तुम्हारे दर्शन हो गए तो हम धन प्राप्त करेंगे। जब तक तुम जीवों पर अधिकार रखते हो तब तक हम जीते रहेंगे। वही वर मुझे चाहिए।
मंत्र 28
अजीर्यतामप्तानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ।। १.१.२८ ।।
ajīryatāmaptānāmupetya jīryanmartyaḥ kvadhaḥsthaḥ prajānan | abhidhyāyanvarṇaratipramodānatidīrghe jīvite ko rameta || 1.1.28 ||
मर्त्य मनुष्य, अजर-अमर लोगों के पास आकर, स्वयं बूढ़ा हो रहा है, इस नीचे स्थान में जानते हुए भी: रूप, रति और आनन्द का चिंतन करते हुए, अत्यंत दीर्घ जीवन में कौन रमेगा?
मंत्र 29
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ।। १.१.२९ ।।
yasminnidaṃ vicikitsanti mṛtyo yatsāmparāye mahati brūhi nastat | yo'yaṃ varo gūḍhamanupraviṣṭo nānyaṃ tasmānnaciketā vṛṇīte || 1.1.29 ||
हे मृत्यो, इस विषय में जो संशय है, जो परलोक के महान रहस्य को लेकर है: वह हमें बताओ। नचिकेता इस गूढ़ वर के अतिरिक्त कोई दूसरा वर नहीं माँगेगा।
मंत्र 1
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ।। १.२.१ ।।
anyacchreyo'nyadutaiva preyaste ubhe nānārthe puruṣaṃ sinītaḥ | tayoḥ śreya ādadānasya sādhu bhavati hīyate'rthādya u preyo vṛṇīte || 1.2.1 ||
श्रेयस् और प्रेयस् अलग हैं और भिन्न उद्देश्यों से मनुष्य को बाँधते हैं। जो श्रेयस् को चुनता है, उसका कल्याण होता है; जो प्रेयस् को चुनता है, वह अपने वास्तविक प्रयोजन से च्युत हो जाता है।
मंत्र 2
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ।। १.२.२ ।।
śreyaśca preyaśca manuṣyametaḥ tau samparītya vivinakti dhīraḥ | śreyo hi dhīro'bhi preyaso vṛṇīte preyo mando yogakṣemādvṛṇīte || 1.2.2 ||
श्रेयस् और प्रेयस् दोनों मनुष्य के पास आते हैं। धीर उन्हें परखकर अलग करता है। धीर प्रेयस् के ऊपर श्रेयस् को चुनता है; मंद व्यक्ति योगक्षेम के लिए प्रेयस् को चुनता है।
मंत्र 3
स त्वं प्रियान्प्रियरूपाँश्च कामान् अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यसराक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ।। १.२.३ ।।
sa tvaṃ priyānpriyarūpāṃśca kāmān abhidhyāyannaciketo'tyasarākṣīḥ | naitāṃ sṛṅkāṃ vittamayīmavāpto yasyāṃ majjanti bahavo manuṣyāḥ || 1.2.3 ||
हे नचिकेता, तुमने प्रिय और प्रिय-रूपी कामनाओं का चिंतन करते हुए उन्हें ठुकरा दिया। तुम उस धन-निर्मित जंजीर में नहीं फँसे जिसमें बहुत से मनुष्य डूबे रहते हैं।
मंत्र 4
दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ।। १.२.४ ।।
dūramete viparīte viṣūcī avidyā yā ca vidyeti jñātā | vidyābhīpsinaṃ naciketasaṃ manye na tvā kāmā bahavo'lolupanta || 1.2.4 ||
अविद्या और विद्या परस्पर विपरीत दिशाओं में जाने वाले हैं। मैं नचिकेता को विद्या का अभिलाषी समझता हूँ; अनेक कामनाओं ने तुम्हें विचलित नहीं किया।
मंत्र 5
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ।। १.२.५ ।।
avidyāyāmantare vartamānāḥ svayaṃ dhīrāḥ paṇḍitaṃmanyamānāḥ | dandramyamāṇāḥ pariyanti mūḍhā andhenaiva nīyamānā yathāndhāḥ || 1.2.5 ||
अविद्या के भीतर रहते हुए, अपने-आप को धीर और पंडित समझते हुए, वे मूढ़ भटकते रहते हैं, जैसे अंधे के द्वारा अंधे ले जाए जाते हैं।
मंत्र 6
न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ।। १.२.६ ।।
na sāmparāyaḥ pratibhāti bālaṃ pramādyantaṃ vittamohena mūḍham | ayaṃ loko nāsti para iti mānī punaḥ punarvaśamāpadyate me || 1.2.6 ||
प्रमाद में रहने वाले और धन के मोह से मूढ़ हुए बालक को परलोक नहीं दिखता। 'यह लोक है, परलोक नहीं' ऐसा मानने वाला बार-बार मेरे वश में आता है।
मंत्र 7
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ।। १.२.७ ।।
śravaṇāyāpi bahubhiryo na labhyaḥ śṛṇvanto'pi bahavo yaṃ na vidyuḥ | āścaryo vaktā kuśalo'sya labdhā āścaryo jñātā kuśalānuśiṣṭaḥ || 1.2.7 ||
यह सुनने को भी बहुतों को नहीं मिलता; सुनते हुए भी बहुत इसे नहीं जानते। इसका बताने वाला आश्चर्यमय है, इसे पाने वाला कुशल है; कुशल द्वारा सिखाया हुआ ज्ञाता आश्चर्यमय है।
मंत्र 8
न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ।। १.२.८ ।।
na nareṇāvareṇa prokta eṣa suvijñeyo bahudhā cintyamānaḥ | ananyaprokte gatiratra nāsti aṇīyānhyatarkyamaṇupramāṇāt || 1.2.8 ||
यह किसी साधारण मनुष्य द्वारा सिखाए जाने पर अनेक प्रकार से सोचने पर भी सुगमता से नहीं जाना जाता। जब तक दूसरे (ब्रह्मज्ञानी) द्वारा न बताया जाए, इसमें प्रवेश नहीं है। यह अणु से भी सूक्ष्म और तर्कातीत है।
मंत्र 9
नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ।। १.२.९ ।।
naiṣā tarkeṇa matirāpaneyā proktānyenaiva sujñānāya preṣṭha | yāṃ tvamāpaḥ satyadhṛtirbatāsi tvādṛṅno bhūyānnaciketaḥ praṣṭā || 1.2.9 ||
यह बोध तर्क से प्राप्त नहीं होता। हे प्रिय, किसी ज्ञानी द्वारा सिखाए जाने पर ही यह भली-भाँति जाना जाता है। तुम सत्यनिष्ठ हो; तुम जैसे जिज्ञासु हमें मिलते रहें।
मंत्र 10
जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निः अनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ।। १.२.१० ।।
jānāmyahaṃ śevadhirityanityaṃ na hyadhruvaiḥ prāpyate hi dhruvaṃ tat | tato mayā nāciketaścito'gniḥ anityairdravyaiḥ prāptavānasmi nityam || 1.2.10 ||
यम ने कहा: मैं जानता हूँ कि यह धन-राशि अनित्य है; अनित्य से नित्य वस्तु प्राप्त नहीं होती। इसलिए मैंने नाचिकेत-अग्नि की स्थापना की और अनित्य साधनों से नित्य को प्राप्त किया।
मंत्र 11
कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यसराक्षीः ।। १.२.११ ।।
kāmasyāptiṃ jagataḥ pratiṣṭhāṃ kratorānantyamabhayasya pāram | stomamahadurugāyaṃ pratiṣṭhāṃ dṛṣṭvā dhṛtyā dhīro naciketo'tyasarākṣīḥ || 1.2.11 ||
कामनाओं की पूर्ति, जगत की प्रतिष्ठा, यज्ञ की अनन्तता, भय के पार का तट, महान और सुविख्यात स्तोत्र की प्रतिष्ठा: इन सबको देखते हुए भी, हे नचिकेता, तुमने धैर्य से इन्हें ठुकरा दिया।
मंत्र 12
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ।। १.२.१२ ।।
taṃ durdarśaṃ gūḍhamanupraviṣṭaṃ guhāhitaṃ gahvareṣṭhaṃ purāṇam | adhyātmayogādhigamena devaṃ matvā dhīro harṣaśokau jahāti || 1.2.12 ||
जो कठिनाई से दिखने वाला, गुप्त, हृदय-गुहा में प्रवेश किया हुआ, दुर्गम और पुरातन है: अध्यात्म-योग से उस देव को जानकर धीर हर्ष और शोक दोनों को छोड़ देता है।
मंत्र 13
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ।। १.२.१३ ।।
etacchrutvā samparigṛhya martyaḥ pravṛhya dharmyamaṇumetamāpya | sa modate modanīyaṃ hi labdhvā vivṛtaṃ sadma naciketasaṃ manye || 1.2.13 ||
इसे सुनकर, अच्छी तरह ग्रहण करके, इस सूक्ष्म धर्मयुक्त तत्त्व को निकालकर और प्राप्त करके, मर्त्य आनन्दित होता है। मैं नचिकेता का घर खुला हुआ पाता हूँ।
मंत्र 14
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ।। १.२.१४ ।।
anyatra dharmādanyatrādharmādanyatrāsmātkṛtākṛtāt | anyatra bhūtācca bhavyācca yattatpaśyasi tadvada || 1.2.14 ||
जो धर्म से भी परे है, अधर्म से भी परे है, कृत और अकृत दोनों से परे है, भूत और भविष्य दोनों से परे है: वह जो तुम देखते हो, वह बताओ।
मंत्र 15
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ।। १.२.१५ ।।
sarve vedā yatpadamāmananti tapāṃsi sarvāṇi ca yadvadanti | yadicchanto brahmacaryaṃ caranti tatte padaṃ saṃgraheṇa bravīmyomityetat || 1.2.15 ||
सभी वेद जिस पद का उपदेश करते हैं, सभी तप जिसकी बात करते हैं, जिसकी कामना करके लोग ब्रह्मचर्य पालन करते हैं: वह पद संक्षेप में बताता हूँ : वह है 'ओम्'।
मंत्र 16
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ।। १.२.१६ ।।
etaddhyevākṣaraṃ brahma etaddhyevākṣaraṃ param | etaddhyevākṣaraṃ jñātvā yo yadicchati tasya tat || 1.2.16 ||
यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही परम है। इस अक्षर को जानकर जो जो चाहता है, वह-वह उसे मिलता है।
मंत्र 17
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ।। १.२.१७ ।।
etadālambanaṃ śreṣṭhametadālambanaṃ param | etadālambanaṃ jñātvā brahmaloke mahīyate || 1.2.17 ||
यह आलम्बन श्रेष्ठ है, यह आलम्बन परम है। इस आलम्बन को जानकर व्यक्ति ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है।
मंत्र 18
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।। १.२.१८ ।।
na jāyate mriyate vā vipaścinnāyaṃ kutaścinna babhūva kaścit | ajo nityaḥ śāśvato'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre || 1.2.18 ||
यह ज्ञानमय न जन्म लेता है, न मरता है। यह किसी से नहीं आया और न किसी ने इसे बनाया। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
मंत्र 19
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।। १.२.१९ ।।
hantā cenmanyate hantuṃ hataścenmanyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate || 1.2.19 ||
यदि हत्यारा सोचता है कि मैं मारता हूँ, और मारा हुआ सोचता है कि मैं मारा गया, तो दोनों नहीं जानते। यह न मारता है और न मारा जाता है।
मंत्र 20
अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ।। १.२.२० ।।
aṇoraṇīyānmahato mahīyānātmā'sya jantornihito guhāyām | tamakratuḥ paśyati vītaśoko dhātuprasādānmahimānamātmanaḥ || 1.2.20 ||
यह आत्मा अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है, इस जीव की हृदय-गुहा में निहित है। इच्छा-रहित होकर, इन्द्रियों की प्रसन्नता से शोकरहित व्यक्ति आत्मा की महिमा देखता है।
मंत्र 21
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ।। १.२.२१ ।।
āsīno dūraṃ vrajati śayāno yāti sarvataḥ | kastaṃ madāmadaṃ devaṃ madanyo jñātumarhati || 1.2.21 ||
यह बैठे-बैठे दूर जाता है, सोते-सोते सब दिशाओं में जाता है। उस आनन्दमय देव को मेरे अतिरिक्त कौन जान सकता है?
मंत्र 22
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।। १.२.२२ ।।
aśarīraṃ śarīreṣvanavastheṣvavasthitam | mahāntaṃ vibhumātmānaṃ matvā dhīro na śocati || 1.2.22 ||
अशरीर होते हुए भी शरीरों में, अस्थिर में भी स्थित, महान और विभु आत्मा को जानकर धीर शोक नहीं करता।
मंत्र 23
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।। १.२.२३ ।।
nāyamātmā pravacanena labhyo na medhayā na bahunā śrutena | yamevaiṣa vṛṇute tena labhyaḥ tasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanūṃ svām || 1.2.23 ||
यह आत्मा प्रवचन से, मेधा से और बहुत सुनने से प्राप्त नहीं होता। यह उसी के द्वारा प्राप्य है जिसे यह स्वयं चुनता है। उसके सामने यह आत्मा अपना स्वरूप प्रकट करता है।
मंत्र 24
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।। १.२.२४ ।।
nāvirato duścaritānnāśānto nāsamāhitaḥ | nāśāntamānaso vā'pi prajñānenainamāpnuyāt || 1.2.24 ||
जो दुराचार से निवृत्त नहीं है, जो शांत नहीं है, जो समाधिस्थ नहीं है, जिसका मन शांत नहीं है: वह ज्ञान से इसे नहीं पाता।
मंत्र 25
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ।। १.२.२५ ।।
yasya brahma ca kṣatraṃ ca ubhe bhavata odanaḥ | mṛtyuryasyopasecanaṃ ka itthā veda yatra saḥ || 1.2.25 ||
जिसके लिए ब्रह्म और क्षत्र दोनों भोजन हैं और मृत्यु जिसका व्यंजन है: कौन वास्तव में जानता है कि वह कहाँ है?
मंत्र 1
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ।। १.३.१ ।।
ṛtaṃ pibantau sukṛtasya loke guhāṃ praviṣṭau parame parārdhe | chāyātapau brahmavido vadanti pañcāgnayo ye ca triṇāciketāḥ || 1.3.1 ||
दोनों सत्य का पान करते हुए, पुण्यकर्म के लोक में, परम उत्कर्ष में, हृदय-गुहा में प्रवेश किए हुए हैं। ब्रह्मवेत्ता और पञ्चाग्नि साधक तथा त्रिणाचिकेत साधक इन्हें छाया और धूप कहते हैं।
मंत्र 2
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि ।। १.३.२ ।।
yaḥ seturījānānāmakṣaraṃ brahma yatparam | abhayaṃ titīrṣatāṃ pāraṃ nāciketaṃ śakemahi || 1.3.2 ||
जो यज्ञकर्ताओं का सेतु है, जो परम अक्षर ब्रह्म है, जो भय से पार जाना चाहने वालों का दूसरा तट है: उस नाचिकेत अग्नि को हम स्थापित कर सकें।
मंत्र 3
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। १.३.३ ।।
ātmānaṃ rathinaṃ viddhi śarīraṃ rathameva tu | buddhiṃ tu sārathiṃ viddhi manaḥ pragrahameva ca || 1.3.3 ||
आत्मा को रथी जानो और शरीर को रथ। बुद्धि को सारथि जानो और मन को लगाम।
मंत्र 4
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।। १.३.४ ।।
indriyāṇi hayānāhurviṣayāṃsteṣu gocarān | ātmendriyamanoyuktaṃ bhoktetyāhurmanīṣiṇaḥ || 1.3.4 ||
ज्ञानीजन इन्द्रियों को घोड़े कहते हैं और उनके विषयों को उनके मार्ग। आत्मा, इन्द्रिय और मन से युक्त होकर भोक्ता है: ऐसा मनीषी कहते हैं।
मंत्र 5
यस्त्ववज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ।। १.३.५ ।।
yastvavajñānavānbhavatyayuktena manasā sadā | tasyendriyāṇyavaśyāni duṣṭāśvā iva sāratheḥ || 1.3.5 ||
जो अविवेकी है और सदा अनियंत्रित मन वाला है, उसकी इन्द्रियाँ अवश्य ही अवश रहती हैं जैसे सारथि के लिए दुष्ट घोड़े।
मंत्र 6
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ।। १.३.६ ।।
yastu vijñānavānbhavati yuktena manasā sadā | tasyendriyāṇi vaśyāni sadaśvā iva sāratheḥ || 1.3.6 ||
जो विवेकी है और सदा नियंत्रित मन वाला है, उसकी इन्द्रियाँ वश में रहती हैं जैसे सारथि के लिए अच्छे घोड़े।
मंत्र 7
यस्त्ववज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ।। १.३.७ ।।
yastvavajñānavānbhavatyamanaskaḥ sadā'śuciḥ | na sa tatpadamāpnoti saṃsāraṃ cādhigacchati || 1.3.7 ||
जो अविवेकी है, जिसका मन अनुशासित नहीं है और जो सदा अशुचि है: वह उस पद को नहीं पाता और संसार में भटकता है।
मंत्र 8
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ।। १.३.८ ।।
yastu vijñānavānbhavati samanaskaḥ sadā śuciḥ | sa tu tatpadamāpnoti yasmādbhūyo na jāyate || 1.3.8 ||
जो विवेकी है, जिसका मन अनुशासित है और जो सदा शुचि है: वह उस पद को पाता है जहाँ से फिर जन्म नहीं होता।
मंत्र 9
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ।। १.३.९ ।।
vijñānasārathiryastu manaḥ pragrahavānnaraḥ | so'dhvanaḥ pāramāpnoti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam || 1.3.9 ||
जिसका सारथि विज्ञान है और जो मन-रूपी लगाम को पकड़े रखता है: वह मार्ग के दूसरे छोर को पाता है, जो विष्णु का परम पद है।
मंत्र 10
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ।। १.३.१० ।।
indriyebhyaḥ parā hyarthā arthebhyaśca paraṃ manaḥ | manasastu parā buddhirbuddherātmā mahānparaḥ || 1.3.10 ||
इन्द्रियों से ऊपर विषय हैं, विषयों से ऊपर मन है, मन से ऊपर बुद्धि है और बुद्धि से ऊपर महान आत्मा है।
मंत्र 11
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ।। १.३.११ ।।
mahataḥ paramavyaktamavyaktātpuruṣaḥ paraḥ | puruṣānna paraṃ kiñcitsā kāṣṭhā sā parā gatiḥ || 1.3.11 ||
महान आत्मा से ऊपर अव्यक्त है, अव्यक्त से ऊपर पुरुष है। पुरुष से ऊपर कुछ नहीं है; वही काष्ठा है, वही परम गति है।
मंत्र 12
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ।। १.३.१२ ।।
eṣa sarveṣu bhūteṣu gūḍho'tmā na prakāśate | dṛśyate tvagryayā buddhyā sūkṣmayā sūkṣmadarśibhiḥ || 1.3.12 ||
यह आत्मा सभी प्राणियों में गूढ़ है और प्रकाशित नहीं होता। किंतु सूक्ष्मदर्शी पुरुष इसे सूक्ष्म और तीव्र बुद्धि से देखते हैं।
मंत्र 13
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ।। १.३.१३ ।।
yacchedvāṅmanasī prājñastadyacchejjñāna ātmani | jñānamātmani mahati niyacchettadyacchecchānta ātmani || 1.3.13 ||
प्राज्ञ पुरुष वाणी को मन में समेटे, मन को ज्ञान-आत्मा में समेटे, ज्ञान को महान आत्मा में समेटे और उसे शांत आत्मा में समेटे।
मंत्र 14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।। १.३.१४ ।।
uttiṣṭhata jāgrata prāpya varānnibodhata | kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṃ pathastatkavayo vadanti || 1.3.14 ||
उठो, जागो और श्रेष्ठ गुरुओं को पाकर जानो। कवि कहते हैं कि यह मार्ग उस तेज धार वाले छुरे जैसा है जिसे पार करना कठिन है।
मंत्र 15
असब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ।। १.३.१५ ।।
asabdamasparśamarūpamavyayaṃ tathā'rasaṃ nityamagandhavacca yat | anādyanantaṃ mahataḥ paraṃ dhruvaṃ nicāyya tanmṛtyumukhātpramucyate || 1.3.15 ||
जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, नित्य, अगंध है; जो अनादि, अनन्त, महान से परे और ध्रुव है: उसे जानकर मृत्युमुख से मुक्त हो जाता है।
मंत्र 16
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ।। १.३.१६ ।।
nāciketamupākhyānaṃ mṛtyuproktaṃ sanātanam | uktvā śrutvā ca medhāvī brahmaloke mahīyate || 1.3.16 ||
मृत्यु द्वारा कही गई इस सनातन नाचिकेत-उपाख्यान को कहने और सुनने वाला मेधावी ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है।
मंत्र 17
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते । तदानन्त्याय कल्पत इति ।। १.३.१७ ।।
ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ śrāvayedbrahmasaṃsadi | prayataḥ śrāddhakāle vā tadānantyāya kalpate | tadānantyāya kalpata iti || 1.3.17 ||
जो इस परम गुह्य को ब्रह्म-सभा में सुनाए, या श्राद्ध के समय नियमपूर्वक सुनाए: वह अनंत के लिए कल्पित हो जाता है। वह अनंत के लिए कल्पित हो जाता है।
मंत्र 1
पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नाऽन्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ।। २.१.१ ।।
parāñci khāni vyatṛṇatsvayambhūstasmātparāṅpaśyati nā'ntarātman | kaściddhīraḥ pratyagātmānamaikṣadāvṛttacakṣuramṛtatvamicchan || 2.1.1 ||
स्वयंभू ने इन्द्रियों को बाहर की ओर खोला, इसलिए व्यक्ति बाहर देखता है, भीतर के आत्मा को नहीं। कोई धीर पुरुष अमृतत्व की इच्छा रखते हुए चक्षु को भीतर की ओर मोड़कर प्रत्यगात्मा को देखता है।
मंत्र 2
पराचः कामाननुयन्ति बाला ते मृत्योर्यन्ति वितस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ।। २.१.२ ।।
parācaḥ kāmānanuyanti bālā te mṛtyoryanti vitasya pāśam | atha dhīrā amṛtatvaṃ viditvā dhruvamadhuveṣviha na prārthayante || 2.1.2 ||
बालक-बुद्धि लोग बाहरी कामनाओं के पीछे जाते हैं और फैले हुए मृत्यु के पाश में पड़ते हैं। धीर पुरुष अमृतत्व को जानकर अनित्य वस्तुओं में ध्रुव की कामना नहीं करते।
मंत्र 3
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ।। २.१.३ ।।
yena rūpaṃ rasaṃ gandhaṃ śabdānsparśāṃśca maithunān | etenaiva vijānāti kimatra pariśiṣyate | etadvai tat || 2.1.3 ||
जिसके द्वारा रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और संभोग जाना जाता है, उसी से सब जाना जाता है। यहाँ और क्या बाकी रहता है? यही वह है।
मंत्र 4
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।। २.१.४ ।।
svapnāntaṃ jāgaritāntaṃ cobhau yenānupaśyati | mahāntaṃ vibhumātmānaṃ matvā dhīro na śocati || 2.1.4 ||
जिसके द्वारा स्वप्न-अवस्था और जागृत-अवस्था दोनों देखी जाती हैं: महान और विभु आत्मा को जानकर धीर शोक नहीं करता।
मंत्र 5
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ।। २.१.५ ।।
ya imaṃ madhvadaṃ veda ātmānaṃ jīvamantikāt | īśānaṃ bhūtabhavyasya na tato vijugupsate | etadvai tat || 2.1.5 ||
जो इस मधु-भक्षक आत्मा को निकट से रहने वाले जीव के रूप में, भूत और भविष्य के स्वामी के रूप में जानता है: वह उससे घृणा नहीं करता। यही वह है।
मंत्र 6
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ।। २.१.६ ।।
yaḥ pūrvaṃ tapaso jātamadbhyaḥ pūrvamajāyata | guhāṃ praviśya tiṣṭhantaṃ yo bhūtebhirvyapaśyata | etadvai tat || 2.1.6 ||
जो तप से पहले उत्पन्न हुआ, जो जल से भी पहले जन्मा, जो हृदय-गुहा में प्रवेश करके प्राणियों में स्थित है: उसे जो देखता है। यही वह है।
मंत्र 7
या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ।। २.१.७ ।।
yā prāṇena saṃbhavatyaditirdevatāmayī | guhāṃ praviśya tiṣṭhantīṃ yā bhūtebhirvyajāyata | etadvai tat || 2.1.7 ||
जो प्राण से उत्पन्न होती है, देवतामयी अदिति है, जो हृदय-गुहा में प्रवेश करके प्राणियों के साथ उत्पन्न हुई: यही वह है।
मंत्र 8
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ।। २.१.८ ।।
araṇyornihito jātavedā garbha iva subhṛto garbhiṇībhiḥ | dive diva īḍyo jāgṛvadbhirhaviṣmadbhirmanuṣyebhiragniḥ | etadvai tat || 2.1.8 ||
जातवेदा अग्नि दो अरणियों में छुपा है जैसे गर्भिणियों द्वारा गर्भ सुरक्षित रखा जाता है। प्रतिदिन जागरूक और हविष्मान् मनुष्यों द्वारा वंदनीय अग्नि: यही वह है।
मंत्र 9
यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ।। २.१.९ ।।
yataścodeti sūryo'staṃ yatra ca gacchati | taṃ devāḥ sarve'rpitāstadu nātyeti kaścana | etadvai tat || 2.1.9 ||
जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ वह अस्त होता है: उसी में सभी देव प्रतिष्ठित हैं और कोई उसे लाँघ नहीं सकता। यही वह है।
मंत्र 10
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।। २.१.१० ।।
yadeveha tadamutra yadamutra tadanviha | mṛtyoḥ sa mṛtyumāpnoti ya iha nāneva paśyati || 2.1.10 ||
जो यहाँ है, वही वहाँ है; जो वहाँ है, वही यहाँ भी है। जो यहाँ अनेकता देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है।
मंत्र 11
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किञ्चन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ।। २.१.११ ।।
manasaivedamāptavyaṃ neha nānā'sti kiñcana | mṛtyoḥ sa mṛtyuṃ gacchati ya iha nāneva paśyati || 2.1.11 ||
यह मन से ही जानना है; यहाँ कोई अनेकता नहीं है। जो यहाँ अनेकता देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को जाता है।
मंत्र 12
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ।। २.१.१२ ।।
aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo madhya ātmani tiṣṭhati | īśāno bhūtabhavyasya na tato vijugupsate | etadvai tat || 2.1.12 ||
अँगूठे के बराबर पुरुष हृदय के मध्य में स्थित है। वह भूत और भविष्य का स्वामी है। उससे घृणा नहीं करते। यही वह है।
मंत्र 13
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ।। २.१.१३ ।।
aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo jyotirivādhūmakaḥ | īśāno bhūtabhavyasya sa evādya sa u śvaḥ | etadvai tat || 2.1.13 ||
अँगूठे के बराबर पुरुष धुआँ-रहित ज्योति के समान है। वह भूत और भविष्य का स्वामी है। वह आज भी वही है और कल भी वही। यही वह है।
मंत्र 14
यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान्पृथक्पश्यन्स्तानेवानुविधावति ।। २.१.१४ ।।
yathodakaṃ durge vṛṣṭaṃ parvateṣu vidhāvati | evaṃ dharmānpṛthakpaśyanstānevānuvidhāvati || 2.1.14 ||
जैसे दुर्गम स्थान पर और पर्वतों पर बरसा पानी बह जाता है, उसी प्रकार धर्मों को अलग-अलग देखने वाला उनके पीछे भटकता है।
मंत्र 15
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ।। २.१.१५ ।।
yathodakaṃ śuddhe śuddhamāsiktaṃ tādṛgeva bhavati | evaṃ munervijānata ātmā bhavati gautama || 2.1.15 ||
जैसे शुद्ध जल में शुद्ध जल डाला जाए तो वह वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार, हे गौतम, जानने वाले मुनि की आत्मा भी वैसी ही हो जाती है।
मंत्र 1
पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ।। २.२.१ ।।
puramekādaśadvāramajasyāvakracetasaḥ | anuṣṭhāya na śocati vimuktaśca vimucyate | etadvai tat || 2.2.1 ||
एकादश द्वारों वाले इस नगर (शरीर) में अजन्मा, वक्र-चेतना-रहित ब्रह्म निवास करता है। उसका अनुसरण करने वाला शोक नहीं करता और मुक्त होकर मुक्ति पाता है। यही वह है।
मंत्र 2
हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ।। २.२.२ ।।
haṃsaḥ śuciṣadvasurantarikṣasadhotā vediṣadatithirduroṇasat | nṛṣadvarasadṛtasadvyomasadabjā gojā ṛtajā adrijā ṛtaṃ bṛhat || 2.2.2 ||
वह हंस है जो शुद्ध में बैठता है, वायु है जो अंतरिक्ष में रहता है, होता जो वेदी पर बैठता है, अतिथि जो गृह में रहता है। वह मनुष्यों में, श्रेष्ठों में, सत्य में, आकाश में बसता है। जल, गो, ऋत और पर्वत से जन्मा। वह ऋत और महान है।
मंत्र 3
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ।। २.२.३ ।।
ūrdhvaṃ prāṇamunnayatyapānaṃ pratyagasyati | madhye vāmanamāsīnaṃ viśve devā upāsate || 2.2.3 ||
वह प्राण को ऊपर उठाता है, अपान को नीचे भेजता है। हृदय के मध्य में बैठे उस वामन (बौने) की सभी देव उपासना करते हैं।
मंत्र 4
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ।। २.२.४ ।।
asya visraṃsamānasya śarīrasthasya dehinaḥ | dehādvimucyamānasya kimatra pariśiṣyate | etadvai tat || 2.2.4 ||
इस शरीर में रहते हुए, शरीर से विमुक्त हो रहे देही के बिखरने के समय, यहाँ क्या बाकी रहता है? यही वह है।
मंत्र 5
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ।। २.२.५ ।।
na prāṇena nāpānena martyo jīvati kaścana | itareṇa tu jīvanti yasminnetāvupāśritau || 2.2.5 ||
कोई भी मर्त्य प्राण से या अपान से नहीं जीता। इन दोनों जिस पर आश्रित हैं, उसी से सभी जीते हैं।
मंत्र 6
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ।। २.२.६ ।।
hanta ta idaṃ pravakṣyāmi guhyaṃ brahma sanātanam | yathā ca maraṇaṃ prāpya ātmā bhavati gautama || 2.2.6 ||
हे गौतम, मैं तुम्हें यह सनातन गुह्य ब्रह्म बताऊँगा और यह भी कि मृत्यु को प्राप्त होने पर आत्मा क्या होती है।
मंत्र 7
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ।। २.२.७ ।।
yonimanye prapadyante śarīratvāya dehinaḥ | sthāṇumanye'nusaṃyanti yathākarma yathāśrutam || 2.2.7 ||
कुछ देही पुनः शरीर पाने के लिए योनि में जाते हैं; कुछ अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार स्थावर बनते हैं।
मंत्र 8
य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ।। २.२.८ ।।
ya eṣa supteṣu jāgarti kāmaṃ kāmaṃ puruṣo nirmimāṇaḥ | tadeva śukraṃ tadbrahma tadevāmṛtamucyate | tasmiṃllokāḥ śritāḥ sarve tadu nātyeti kaścana | etadvai tat || 2.2.8 ||
जो सबके सोने पर जागता है और एक-एक कामना को आकार देता है: वही शुक्र है, वही ब्रह्म है, वही अमृत कहा जाता है। उसी में सभी लोक स्थित हैं और कोई उसे लाँघ नहीं सकता। यही वह है।
मंत्र 9
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। २.२.९ ।।
agniryathaiko bhuvanaṃ praviṣṭo rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo babhūva | ekastathā sarvabhūtāntarātmā rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo bahiśca || 2.2.9 ||
जैसे एक ही अग्नि जगत में प्रवेश करके प्रत्येक रूप का प्रतिरूप बन गई: उसी प्रकार सभी प्राणियों का एक अन्तरात्मा प्रत्येक रूप का प्रतिरूप बनते हुए बाहर भी है।
मंत्र 10
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। २.२.१० ।।
vāyuryathaiko bhuvanaṃ praviṣṭo rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo babhūva | ekastathā sarvabhūtāntarātmā rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo bahiśca || 2.2.10 ||
जैसे एक ही वायु जगत में प्रवेश करके प्रत्येक रूप का प्रतिरूप बन गई: उसी प्रकार सभी प्राणियों का एक अन्तरात्मा प्रत्येक रूप का प्रतिरूप बनते हुए बाहर भी है।
मंत्र 11
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ।। २.२.११ ।।
sūryo yathā sarvalokasya cakṣuḥ na lipyate cākṣuṣairbāhyadoṣaiḥ | ekastathā sarvabhūtāntarātmā na lipyate lokaduḥkhena bāhyaḥ || 2.2.11 ||
जैसे सूर्य समस्त जगत का चक्षु होते हुए भी बाहरी दोषों से लिप्त नहीं होता: उसी प्रकार सभी प्राणियों का एक अन्तरात्मा, बाह्य होते हुए भी, जगत के दुःख से लिप्त नहीं होता।
मंत्र 12
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ।। २.२.१२ ।।
eko vaśī sarvabhūtāntarātmā ekaṃ rūpaṃ bahudhā yaḥ karoti | tamātmasthaṃ ye'nupaśyanti dhīrāsteṣāṃ sukhaṃ śāśvataṃ netareṣām || 2.2.12 ||
एक नियंता, सभी प्राणियों का अन्तरात्मा, जो एक रूप को बहुविध बनाता है: जो धीर उसे आत्मा में देखते हैं, उन्हें शाश्वत सुख मिलता है, दूसरों को नहीं।
मंत्र 13
नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ।। २.२.१३ ।।
nityo'nityānāṃ cetanaścetanānāmeko bahūnāṃ yo vidadhāti kāmān | tamātmasthaṃ ye'nupaśyanti dhīrāsteṣāṃ śāntiḥ śāśvatī netareṣām || 2.2.13 ||
अनित्यों में नित्य, चेतनों में चेतन, एक जो बहुतों की कामनाएँ पूरी करता है: जो धीर उसे आत्मा में देखते हैं, उन्हें शाश्वत शान्ति मिलती है, दूसरों को नहीं।
मंत्र 14
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ।। २.२.१४ ।।
tadetaditi manyante'nirdeśyaṃ paramaṃ sukham | kathaṃ nu tadvijānīyāṃ kimu bhāti vibhāti vā || 2.2.14 ||
'यही वह है' ऐसा मानते हैं कि यह परम सुख वर्णनातीत है। मैं उसे कैसे जानूँ? क्या वह स्वयं प्रकाशित होता है या बाहर से प्रकाशित किया जाता है?
मंत्र 15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।। २.२.१५ ।।
na tatra sūryo bhāti na candratārakaṃ nemā vidyuto bhānti kuto'yamagniḥ | tameva bhāntamanubhāti sarvaṃ tasya bhāsā sarvamidaṃ vibhāti || 2.2.15 ||
वहाँ सूर्य नहीं चमकता, न चन्द्र और तारे; ये विद्युत भी नहीं चमकती, फिर यह अग्नि कैसे चमकेगी? उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित होता है; उसकी भासा से यह समस्त जगत चमकता है।
मंत्र 1
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ।। २.३.१ ।।
ūrdhvamūlo'vākśākha eṣo'śvatthaḥ sanātanaḥ | tadeva śukraṃ tadbrahma tadevāmṛtamucyate | tasmiṃllokāḥ śritāḥ sarve tadu nātyeti kaścana | etadvai tat || 2.3.1 ||
यह सनातन अश्वत्थ वृक्ष है जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे हैं। वही शुक्र है, वही ब्रह्म है, वही अमृत कहा जाता है। उसी में सभी लोक स्थित हैं और कोई उसे लाँघ नहीं सकता। यही वह है।
मंत्र 2
यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ।। २.३.२ ।।
yadidaṃ kiñca jagatsarvaṃ prāṇa ejati niḥsṛtam | mahadbhayaṃ vajramudyataṃ ya etadviduramṛtāste bhavanti || 2.3.2 ||
यह समस्त जगत जो है, प्राण से उत्पन्न होकर प्राण में कंपित है। यह उठे हुए वज्र जैसा महा-भय है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।
मंत्र 3
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ।। २.३.३ ।।
bhayādasyāgnistapati bhayāttapati sūryaḥ | bhayādindraśca vāyuśca mṛtyurdhāvati pañcamaḥ || 2.3.3 ||
उसके भय से अग्नि तपती है, भय से सूर्य तपता है। भय से इन्द्र और वायु हैं, और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है।
मंत्र 4
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ।। २.३.४ ।।
iha cedaśakadboddhuṃ prākśarīrasya visrasaḥ | tataḥ sargeṣu lokeṣu śarīratvāya kalpate || 2.3.4 ||
यदि कोई इस लोक में शरीर के विसर्जन से पहले इसे जान लेता है तो वह मुक्त हो जाता है। यदि नहीं तो वह विभिन्न सृष्टियों के लोकों में देह धारण करता है।
मंत्र 5
यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाऽप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ।। २.३.५ ।।
yathā''darśe tathā''tmani yathā svapne tathā pitṛloke | yathā'psu parīva dadṛśe tathā gandharvaloke chāyātapayoriva brahmaloke || 2.3.5 ||
जैसे दर्पण में वैसे ही आत्मा में (स्पष्ट); जैसे स्वप्न में वैसे पितृलोक में; जैसे जल में प्रतिच्छाया वैसे गन्धर्वलोक में; जैसे छाया और धूप वैसे ब्रह्मलोक में।
मंत्र 6
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ।। २.३.६ ।।
indriyāṇāṃ pṛthagbhāvamudayāstamayau ca yat | pṛthagutpadyamānānāṃ matvā dhīro na śocati || 2.3.6 ||
इन्द्रियों का पृथक्-पृथक् होना और उनका उदय और अस्त: इन्हें अलग-अलग उत्पन्न होते हुए जानकर धीर शोक नहीं करता।
मंत्र 7
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ।। २.३.७ ।।
indriyebhyaḥ paraṃ mano manasaḥ sattvamuttamam | sattvādadhi mahānātmā mahato'vyaktamuttamam || 2.3.7 ||
इन्द्रियों से ऊपर मन है, मन से उत्तम सत्त्व है। सत्त्व से ऊपर महान आत्मा है, महान से ऊपर अव्यक्त उत्तम है।
मंत्र 8
अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ।। २.३.८ ।।
avyaktāttu paraḥ puruṣo vyāpako'liṅga eva ca | yaṃ jñātvā mucyate janturamṛtatvaṃ ca gacchati || 2.3.8 ||
अव्यक्त से परे पुरुष है जो व्यापक और अलिंग (चिह्नरहित) है। उसे जानकर प्राणी मुक्त होता है और अमृतत्व को प्राप्त होता है।
मंत्र 9
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ।। २.३.९ ।।
na saṃdṛśe tiṣṭhati rūpamasya na cakṣuṣā paśyati kaścanainam | hṛdā manīṣā manasā'bhiklṛpto ya etadviduramṛtāste bhavanti || 2.3.9 ||
इसका रूप दृश्य-श्रेणी में नहीं है, इसे कोई चक्षु से नहीं देखता। हृदय से, मनीषा से और मन से ग्रहण किया जाता है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।
मंत्र 10
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ।। २.३.१० ।।
yadā pañcāvatiṣṭhante jñānāni manasā saha | buddhiśca na viceṣṭate tāmāhuḥ paramāṃ gatim || 2.3.10 ||
जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी क्रियाशील नहीं रहती: उसे परम गति कहते हैं।
मंत्र 11
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ।। २.३.११ ।।
tāṃ yogamiti manyante sthirāmindriyadhāraṇām | apramattastadā bhavati yogo hi prabhavāpyayau || 2.3.11 ||
इन्द्रियों की उस स्थिर धारणा को ही योग कहते हैं। उस समय व्यक्ति अप्रमत्त (सावधान) होता है; योग का उदय और अस्त होता है।
मंत्र 12
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ।। २.३.१२ ।।
naiva vācā na manasā prāptuṃ śakyo na cakṣuṣā | astīti bruvato'nyatra kathaṃ tadupalabhyate || 2.3.12 ||
यह वाणी से, मन से और चक्षु से प्राप्त नहीं किया जा सकता। 'वह है' कहने वाले से अलग, उसे कैसे जाना जाए?
मंत्र 13
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ।। २.३.१३ ।।
astītyevopalabdhavyastattvabhāvena cobhayoḥ | astītyevopalabdhasya tattvabhāvaḥ prasīdati || 2.3.13 ||
दोनों रूपों में 'वह है' इस प्रकार तत्त्वभाव से जाना जाना चाहिए। 'वह है' इस प्रकार जाने गए का तत्त्वभाव स्पष्ट हो जाता है।
मंत्र 14
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ।। २.३.१४ ।।
yadā sarve pramucyante kāmā ye'sya hṛdi śritāḥ | atha martyo'mṛto bhavatyatra brahma samaśnute || 2.3.14 ||
जब हृदय में स्थित सभी कामनाएँ मुक्त हो जाती हैं, तब मर्त्य अमर हो जाता है और यहीं ब्रह्म को प्राप्त करता है।
मंत्र 15
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ।। २.३.१५ ।।
yadā sarve prabhidyante hṛdayasyeha granthayaḥ | atha martyo'mṛto bhavatyetāvaddhyanuśāsanam || 2.3.15 ||
जब हृदय की सभी गाँठें टूट जाती हैं, तब मर्त्य अमर हो जाता है। यही शिक्षा का सार है।
मंत्र 16
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विश्वङ्ङन्याः उत्क्रमणे भवन्ति ।। २.३.१६ ।।
śataṃ caikā ca hṛdayasya nāḍyastāsāṃ mūrdhānamabhiniḥsṛtaikā | tayordhvamāyannamṛtatvameti viśvaṅṅanyāḥ utkramaṇe bhavanti || 2.3.16 ||
हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमें से एक सिर के ऊपर निकलती है। उससे ऊपर जाकर अमृतत्व को प्राप्त होता है। अन्य नाड़ियाँ उत्क्रमण के समय विभिन्न दिशाओं में जाती हैं।
मंत्र 17
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ।। २.३.१७ ।।
aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo'ntarātmā sadā janānāṃ hṛdaye saṃniviṣṭaḥ | taṃ svāccharīrātpravṛhenmuñjādiveṣīkāṃ dhairyeṇa | taṃ vidyācchukramamṛtaṃ taṃ vidyācchukramamṛtamiti || 2.3.17 ||
अँगूठे के बराबर पुरुष, अन्तरात्मा, सदा लोगों के हृदय में स्थित है। मुञ्ज घास से ईषीका निकालने के समान धैर्य से उसे अपने शरीर से निकालो। उसे शुद्ध और अमर जानो; उसे शुद्ध और अमर जानो।
मंत्र 18
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ।। २.३.१८ ।।
mṛtyuproktāṃ naciketo'tha labdhvā vidyāmetāṃ yogavidhiṃ ca kṛtsnam | brahmaprāpto virajo'bhūdvimṛtyuranyo'pyevaṃ yo vidadhyātmameva || 2.3.18 ||
मृत्यु द्वारा कही गई इस विद्या और सम्पूर्ण योग-विधि को प्राप्त करके नचिकेता ब्रह्म को प्राप्त हुआ, निर्मल और मृत्युरहित हो गया। दूसरे भी इसी प्रकार आत्म-ज्ञान को प्राप्त करते हैं।
मंत्र 19
सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।। २.३.१९ ।।
saha nāvavatu | saha nau bhunaktu | saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvināvadhītamastu mā vidviṣāvahai || oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ || 2.3.19 ||
हम दोनों साथ सुरक्षित रहें। हम दोनों साथ पोषित हों। हम दोनों साथ वीर्य का कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।