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माण्डूक्योपनिषद्

Māṇḍūkyopaniṣad

Mandukyopanishad

माण्डूक्योपनिषद् बारह गद्य-वाक्यों में लिखा हुआ सबसे छोटा मुख्य उपनिषद है। मुक्तिका परम्परा के अनुसार केवल यही एक उपनिषद् मोक्ष के लिए पर्याप्त है। इसका विषय ॐकार है: पहले मंत्र में ही यह घोषित किया जाता है कि यह सम्पूर्ण सृष्टि ॐ है। फिर ॐ के तीन मात्रा-स्वर (अ, उ, म) को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं से जोड़ा जाता है, और एक मौन चतुर्थ तत्त्व की ओर संकेत किया जाता है जो इन सबसे परे साक्षी-चेतना है।

शांतिपाठ (अथर्ववेद)

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।। भद्रं नो अपि वातय मनः ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

oṃ bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devāḥ bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ | sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhirvyaśema devahitaṃ yadāyuḥ || bhadraṃ no api vātaya manaḥ || oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

हे देवो, हम अपने कानों से शुभ सुनें। हे यजत्र देवो, हम अपनी आँखों से शुभ देखें। स्थिर अंगों से, स्वस्थ शरीर से, आपकी स्तुति करते हुए, हम वह आयु पूर्ण करें जो देवों के लिए हितकर है। हमारे मन में शुभ विचार आने दो। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।

मंत्र 1

ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ।। १ ।।

oṃ ityetadakṣaramidaṃ sarvaṃ tasyopavyākhyānaṃ bhūtaṃ bhavad bhaviṣyaditi sarvamoṅkāra eva yaccānyat trikālātītaṃ tadapyoṅkāra eva || 1 ||

ॐ यह अक्षर (अविनाशी) ही यह सब कुछ है। इसकी व्याख्या यह है: जो कुछ भूत, भविष्य और वर्तमान है, वह सब ओंकार ही है। और जो कुछ तीनों कालों से परे है, वह भी ओंकार ही है।

मंत्र 2

सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।। २ ।।

sarvaṃ hyetad brahmāyamātmā brahma so'yamātmā catuṣpāt || 2 ||

यह सब कुछ निश्चित रूप से ब्रह्म है। यह आत्मा ब्रह्म है। यही आत्मा चार पाद (चतुष्पाद) वाली है।

मंत्र 3

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ।। ३ ।।

jāgaritasthāno bahiṣprajñaḥ saptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ sthūlabhugvaiśvānaraḥ prathamaḥ pādaḥ || 3 ||

जागृत-अवस्था में रहने वाला, बाहर की ओर चेतन, सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, स्थूल विषयों का भोक्ता: यह वैश्वानर पहला पाद है।

मंत्र 4

स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ।। ४ ।।

svapnasthāno'ntaḥprajñaḥ saptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ praviviktabhuktaijaso dvitīyaḥ pādaḥ || 4 ||

स्वप्नावस्था में रहने वाला, भीतर की ओर चेतन, सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, सूक्ष्म विषयों का भोक्ता: यह तैजस दूसरा पाद है।

मंत्र 5

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ।। ५ ।।

yatra supto na kañcana kāmaṃ kāmayate na kañcana svapnaṃ paśyati tatsuṣuptam | suṣuptasthāna ekībhūtaḥ prajñānaghana evānandamayo hyānandabhuk cetomukhaḥ prājñastṛtīyaḥ pādaḥ || 5 ||

जहाँ सोया हुआ व्यक्ति न किसी वस्तु की कामना करता है, न कोई स्वप्न देखता है, वह सुषुप्ति है। सुषुप्तावस्था में जो एकीभूत, प्रज्ञानघन, आनन्दमय, आनन्द का भोक्ता और चेतना का द्वार है: यह प्राज्ञ तीसरा पाद है।

मंत्र 6

एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्यामी एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ।। ६ ।।

eṣa sarveśvaraḥ eṣa sarvajña eṣo'ntaryāmī eṣa yoniḥ sarvasya prabhavāpyayau hi bhūtānām || 6 ||

यही (प्राज्ञ) सबका ईश्वर है, यही सर्वज्ञ है, यही अन्तर्यामी है, यही सबका उद्गम है। यही सब प्राणियों की उत्पत्ति और विलय का स्थान है।

मंत्र 7

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ।। ७ ।।

nāntaḥprajñaṃ na bahiṣprajñaṃ nobhayataḥprajñaṃ na prajñānaghanaṃ na prajñaṃ nāprajñam | adṛṣṭamavyavahāryamagrāhyamalakṣaṇamacintyamavyapadeśyamekātmapratyayasāraṃ prapañcopaśamaṃ śāntaṃ śivamadvaitaṃ caturthaṃ manyante sa ātmā sa vijñeyaḥ || 7 ||

न वह अन्दर की ओर जानने वाला है, न बाहर की ओर, न दोनों ओर, न प्रज्ञानघन, न प्रज्ञ और न अप्रज्ञ। वह अदृश्य है, व्यवहार से परे है, अग्राह्य है, अलक्षण है, अचिन्त्य है, अव्यपदेश्य है। वह एकात्म-प्रत्यय का सार है, प्रपञ्च का उपशम है, शान्त है, शिव है, अद्वैत है। उसे लोग चतुर्थ मानते हैं। वही आत्मा है, वही जानने योग्य है।

मंत्र 8

सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्काराऽधिमात्रं पादा मात्राः मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ।। ८ ।।

so'yamātmādhyakṣaramoṅkārā'dhimātraṃ pādā mātrāḥ mātrāśca pādā akāra ukāro makāra iti || 8 ||

यही आत्मा अक्षर (ओंकार) के आधार पर है, और ओंकार मात्राओं के आधार पर। पाद ही मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद: अकार, उकार और मकार।

मंत्र 9

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद् वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ।। ९ ।।

jāgaritasthāno vaiśvānaro'kāraḥ prathamā mātrā''pterādimattvād vā''pnoti ha vai sarvān kāmānādiśca bhavati ya evaṃ veda || 9 ||

जागृत-अवस्था में रहने वाला वैश्वानर 'अ' (अकार) है, पहली मात्रा। आप्ति (व्यापकता) के कारण अथवा आदि (सर्वप्रथम) होने के कारण। जो इस प्रकार जानता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और सबका आदि बन जाता है।

मंत्र 10

स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षाद् उभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्तति समानश्च भवति नास्याब्रह्मविच्चुले भवति य एवं वेद ।। १० ।।

svapnasthānastaijasa ukāro dvitīyā mātrotkarṣād ubhayatvādvotkarṣati ha vai jñānasantati samānaśca bhavati nāsyābrahmaviccule bhavati ya evaṃ veda || 10 ||

स्वप्नावस्था में रहने वाला तैजस 'उ' (उकार) है, दूसरी मात्रा। उत्कर्ष के कारण अथवा दोनों के बीच होने के कारण। जो इस प्रकार जानता है, वह ज्ञान की सन्तान को उन्नत करता है, समान (सबके प्रिय) हो जाता है, और उसके कुल में कोई ब्रह्म को न जानने वाला नहीं रहता।

मंत्र 11

सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ।। ११ ।।

suṣuptasthānaḥ prājño makārastṛtīyā mātrā miterapītervā minoti ha vā idaṃ sarvamapītiśca bhavati ya evaṃ veda || 11 ||

सुषुप्ति-अवस्था में रहने वाला प्राज्ञ 'म' (मकार) है, तीसरी मात्रा। मिति (मान) के कारण अथवा अपीति (विलय) के कारण। जो इस प्रकार जानता है, वह इस सब को जानता है और सब उसमें लीन हो जाता है।

मंत्र 12

अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ।। १२ ।।

amātraścaturtho'vyavahāryaḥ prapañcopaśamaḥ śivo'dvaita evamoṅkāra ātmaiva saṃviśatyātmanā''tmānaṃ ya evaṃ veda || 12 ||

चौथा अमात्र (मात्रा-रहित) है, व्यवहार से परे है, प्रपञ्च का उपशम है, शिव है, अद्वैत है। इस प्रकार ओंकार ही आत्मा है। जो इस प्रकार जानता है, वह आत्मा के द्वारा आत्मा में प्रवेश करता है।