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कृष्णअनाहतप्रारंभिक

क्लीं

Klīṃ

KLEEM

साझा

कृष्ण · Krishna

अर्थ

"'क्लीं' भगवान कृष्ण का बीज — दिव्य आकर्षण और काम-शक्ति का एकाक्षर रूप"

'क्लीं' में वह दिव्य आकर्षण-शक्ति है जो प्रेम को साधना में बदलती है — भक्त का हृदय कृष्ण की ओर खिंचता है जैसे लोहा चुम्बक की ओर

अक्षर

क + ल + ई + ं (अनुस्वार); शास्त्रीय विश्लेषण: क = कामदेव/कृष्ण, ल = इन्द्र/आनंद, ई = शक्ति, ं = बिन्दु

Ka (क्)1

क — कृष्ण का बीज-स्वर; काम-शक्ति का मूल (यहाँ दिव्य अर्थ में — परमात्मा की ओर आकर्षण)

La (ल्)2

ल — पृथ्वी-तत्त्व और आनंद; वृन्दावन की धरती का संकेत

Ī (ी)3

ई — शक्ति और माया; राधा-शक्ति का बीज

Anusvāra (ं)4

ं (बिन्दु) — नाद-बिन्दु; रास-लीला का केन्द्र-बिन्दु

पहला पाठीय संदर्भ: Tantric Vaishnava texts; the Gopala Tapani Upanishad and the Krishna Yamala Tantra; central also to Sri Vidya as part of the Pañcadaśī
One of the three principal feminine beejas in Sri Vidya, alongside Hrīṃ (Maya beej) and Śrīṃ (Lakshmi beej). Also the principal beej of Krishna in Gaudiya and other Vaishnava Tantric traditions.

उच्चारण कैसे करें

उच्चारण विधि

'क्लीं' — 'क्ली' जैसे 'क्लीन' में (क + ल संयुक्त, फिर दीर्घ ई), अन्त में अनुस्वार 'ं' — मधुर, खिंचती ध्वनि

सामान्य गलती

'कलीं' या 'क्लिं' की तरह नहीं — 'क्ल' संयुक्त व्यंजन है जो एकसाथ बोला जाता है; 'ई' दीर्घ है; 'ं' सूक्ष्म अनुनासिक है

अवधि

3 सेकंड प्रति दोहराव

चक्र संबंध

अनाहत

Anahata (Heart chakra)

अनाहत चक्र (हृदय) — आधुनिक वैष्णव-तांत्रिक मानचित्रण

अधिकांश तांत्रिक 'क्लीं' को अनाहत चक्र से जोड़ते हैं क्योंकि यह दिव्य प्रेम और आकर्षण का बीज है। शास्त्रीय वैष्णव स्रोत इसे भक्ति-रस के ढाँचे में पढ़ते हैं, न कि चक्र-शरीर-रचना में।

में पाया गया

क्लीं कृष्णाय नमः — सरल कृष्ण-उपासना

ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा — गोपाल तापनी उपनिषद का मंत्र

ऐं क्लीं सौः — श्री विद्या का त्रिबीज (दीक्षा-अपेक्षित)

'क्लीं' वैष्णव भक्ति के लिए खुला है। श्री विद्या में 'काम-कला' के ढाँचे में इसका विशिष्ट तांत्रिक प्रयोग गुरु-दीक्षा के बाद होता है। परम्परा यह स्पष्ट करती है कि 'क्लीं' को भौतिक कामनाओं के लिए जादुई सूत्र की तरह प्रयोग करना गलत है।

जप कैसे करें

सर्वोत्तम समय

  • जन्माष्टमी — कृष्ण-जन्म का महापर्व
  • राधाष्टमी — राधा-कृष्ण की युगल-उपासना
  • एकादशी — विष्णु/कृष्ण का पावन दिन
  • कार्तिक मास — गोवर्धन पूजा और दीपावली

माला

Sphatika (crystal)

संख्या

१०८; तुलसी माला सर्वोत्तम — कृष्ण को तुलसी अत्यंत प्रिय है

आसन

पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके सुखासन या पद्मासन में

तैयारी

स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें। कृष्ण-राधा की मूर्ति के सामने तुलसी-दल और पीले पुष्प अर्पित करें।

Vaikhari

वाचिक

मधुर, धीमे स्वर में — भजन-कीर्तन और कृष्ण-पूजा में

Upamsu

उपांशु

मृदु, होठों की हलचल के साथ — एकांत ध्यान में

Manasika

मानसिक

पूर्णतः मन में — रास-लीला में कृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए

१०८ जप में लगभग 5 मिनट लगते हैं

इस अक्षर के बारे में

'क्लीं' गोपाल तापनी उपनिषद में कृष्ण के बीज के रूप में वर्णित है। परम्परा में 'काम' शब्द के दो अर्थ हैं — निम्न काम (विषय-वासना) और उच्च काम (परमात्मा के प्रति प्रेम)। भगवद्-गीता में कृष्ण स्वयं कहते हैं: 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि' — जो काम धर्म के विरुद्ध नहीं वह मैं हूँ।

गौड़ीय वैष्णव परम्परा में 'क्लीं' राधा-कृष्ण की युगल-शक्ति का बीज है। रागानुगा भक्ति में भक्त अपने हृदय के स्वाभाविक प्रेम को कृष्ण की ओर मोड़ता है — 'क्लीं' उस मोड़ने की प्रक्रिया का बीज है।

परम्परा यह भी चेताती है: 'क्लीं' को भौतिक आकर्षण के लिए जादुई मंत्र की तरह प्रयोग करना उसके उद्देश्य का विकृतीकरण है।

पारंपरिक उपयोग

कृष्ण-भक्ति में हृदय का आकर्षण कृष्ण की ओर केन्द्रित करना

भक्ति-रस की साधना — रागानुगा भक्ति में

दिव्य प्रेम और आनंद का जागरण

आत्मा के परमात्मा की ओर स्वाभाविक आकर्षण को समझना

आधुनिक भारत में

प्रेम और आकर्षण की तलाश में भटकते आधुनिक मनुष्य के लिए 'क्लीं' की परम्परागत शिक्षा गहरी है: सच्चा आकर्षण परमात्मा की ओर है — बाकी सब उसका प्रतिबिम्ब। भक्ति-योग में इस बीज का उपयोग आत्मा को उसके परम प्रेमी कृष्ण की ओर मोड़ने के लिए है।
!

दीक्षा आवश्यक

वैष्णव भक्ति-साधना में 'क्लीं' खुला है। श्री विद्या के काम-कला तांत्रिक ढाँचे में इसके प्रयोग के लिए योग्य गुरु की दीक्षा आवश्यक है।

प्रश्न

स्रोत

  • · Gopala Tapani Upanishad (Krishna Yajurveda)
  • · Krishna Yamala Tantra
  • · Saundarya Lahari, verses on Klīṃ and Kama-kala
  • · Pañcadaśī mantra of Sri Vidya
  • · Srimad Bhagavatam

अधिकांश तांत्रिक 'क्लीं' को अनाहत चक्र से जोड़ते हैं क्योंकि यह दिव्य प्रेम और आकर्षण का बीज है। शास्त्रीय वैष्णव स्रोत इसे भक्ति-रस के ढाँचे में पढ़ते हैं, न कि चक्र-शरीर-रचना में।

किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।