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महालक्ष्मीअनाहतखुली साधनाप्रारंभिक

श्रीं

Śrīṃ

SHREEM

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महालक्ष्मी · Mahalakshmi

अर्थ

"'श्रीं' माँ लक्ष्मी की समस्त ऐश्वर्य-शक्ति का एकाक्षर रूप — श्री का बीज"

'श्रीं' में वह दिव्य आकर्षण-शक्ति है जो सौंदर्य, समृद्धि, अनुग्रह और सम्पूर्ण ऐश्वर्य को आमंत्रित करती है

अक्षर

श + र + ई + ं (अनुस्वार) + बिन्दु; प्रत्येक अक्षर श्री-शक्ति के एक आयाम का प्रतीक

Śa (श्)1

श — माँ लक्ष्मी का प्रथम अक्षर; श्री-तत्त्व का बीज

Ra (र्)2

र — धन और समृद्धि का अक्षर; अग्नि-तत्त्व जो जड़ता को जलाता है

Ī (ी)3

ई — संतुष्टि, परिपूर्णता और शक्ति का दीर्घ स्वर; माया-शक्ति

Anusvāra (ं)4

ं (अनुस्वार) — आकाश-तत्त्व; नाद का ब्रह्माण्ड में विसर्जन

पहला पाठीय संदर्भ: Sri Sukta (Rig Veda khila); the Sri beej crystallises in the Pañcarātra Āgamas and the Sri Vidya Tantric tradition
One of the three principal feminine beejas, alongside Hrīṃ (Maya beej) and Aiṃ (Vagbhava beej). The Sri Vidya tradition uses Śrīṃ as one of its core syllables.

उच्चारण कैसे करें

उच्चारण विधि

'श्रीं' — 'श्री' जैसे 'श्रीमान' में (स्पष्ट संयुक्त व्यंजन), फिर दीर्घ 'ई' और अनुस्वार 'ं' — नाक से गूँजती, मधुर हुंकार

सामान्य गलती

'शरीं' या 'श्रि' की तरह नहीं — 'श्र' संयुक्त व्यंजन है जो एकसाथ बोला जाता है; 'ई' को दीर्घ रखें; 'ं' को पूर्ण 'म' में नहीं बदलते

अवधि

3 सेकंड प्रति दोहराव

चक्र संबंध

अनाहत

Anahata (Heart chakra)

अनाहत चक्र (हृदय) — आधुनिक मानचित्रण

आधुनिक तांत्रिक मानचित्रण 'श्रीं' को अनाहत चक्र में रखता है क्योंकि लक्ष्मी दिव्य अनुग्रह और प्रेम की देवी हैं। श्री यंत्र का शास्त्रीय पाठ इसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ज्यामितीय मानचित्र के रूप में पढ़ता है, न कि एकल चक्र के रूप में।

में पाया गया

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः — सर्वाधिक प्रचलित लक्ष्मी-मंत्र

श्रीं ह्रीं क्लीं — त्रिपुरा-सुन्दरी का त्रिबीज

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद — लक्ष्मी का विस्तृत मंत्र

'श्रीं' श्री विद्या की पंचदशी में भी प्रयुक्त होता है। दैनिक लक्ष्मी-उपासना में इसका मुक्त प्रयोग होता है। पंचदशी में विशेष प्रयोग के लिए गुरु-दीक्षा आवश्यक है।

जप कैसे करें

सर्वोत्तम समय

  • दीपावली — महालक्ष्मी पूजा का सर्वोच्च पर्व
  • शुक्रवार — देवी का पावन दिन
  • शरद पूर्णिमा — कोजागरी पूजा की रात्रि
  • नवरात्रि में — विशेषतः महालक्ष्मी नवरात्रि

माला

Sphatika (crystal)

संख्या

१०८; कमल-बीज या स्फटिक माला सर्वोत्तम

आसन

पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन या सुखासन में

तैयारी

स्नान करके पीले या लाल वस्त्र धारण करें। लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सामने कमल-पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें। नैवेद्य में खीर या मिठाई रखें।

Vaikhari

वाचिक

मधुर, मध्यम स्वर में — दीपावली पूजा और समूह-अनुष्ठान में

Upamsu

उपांशु

अत्यंत मृदु, होठों की हलचल के साथ — व्यक्तिगत ध्यान में

Manasika

मानसिक

पूर्णतः मन में — माँ के कमल-चरणों का ध्यान करते हुए

१०८ जप में लगभग 5 मिनट लगते हैं

इस अक्षर के बारे में

'श्रीं' माँ लक्ष्मी की समग्र शक्ति का एकाक्षर रूप है। 'श्री' शब्द केवल धन का नहीं, अपितु ऐश्वर्य के छः रूपों का — धन, शौर्य, यश, सौंदर्य, ज्ञान और वैराग्य — का द्योतक है। श्री सूक्त (ऋग्वेद का खिल-भाग) में माँ लक्ष्मी की इस समग्र शक्ति का वर्णन है।

श्री विद्या की परम्परा में श्री यंत्र माँ की ज्यामितीय अभिव्यक्ति है — ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण मानचित्र एक यंत्र में। 'श्रीं' उस यंत्र की जीवात्मा है।

परम्परा यह भी कहती है कि माँ लक्ष्मी 'चंचला' हैं — वे वहीं टिकती हैं जहाँ परिश्रम, ईमानदारी, दान और कृतज्ञता हो। 'श्रीं' का जप इन गुणों को जगाने का एक आध्यात्मिक उपकरण है।

पारंपरिक उपयोग

धन, समृद्धि और भौतिक ऐश्वर्य के लिए लक्ष्मी-उपासना

दीपावली पूजा और शुक्रवार-व्रत में

व्यापार में शुभारम्भ और नई परियोजनाओं से पहले

आन्तरिक सौंदर्य, करुणा और आकर्षण-शक्ति के विकास के लिए

आधुनिक भारत में

आर्थिक अनिश्चितता के इस युग में 'श्रीं' लाखों लोगों के लिए आस्था का केन्द्र है। परंतु परम्परा यह स्पष्ट करती है कि मंत्र-जप के साथ-साथ परिश्रम, सत्यनिष्ठा और दान भी उतने ही आवश्यक हैं। माँ लक्ष्मी का वास वहाँ है जहाँ ये तीनों हों।
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खुली साधना

दैनिक लक्ष्मी-भक्ति के लिए 'श्रीं' मुक्त है — कोई दीक्षा आवश्यक नहीं। श्री विद्या में इसके विशिष्ट तांत्रिक प्रयोग के लिए गुरु-दीक्षा अनिवार्य है।

प्रश्न

स्रोत

  • · Sri Sukta (Rig Veda khila section)
  • · Lakshmi Tantra (Pañcarātra)
  • · Lakshmi Sahasranama
  • · Kanakadhara Stotra, Adi Shankaracharya
  • · Sri Vidya Tantric texts (Tripura Rahasya, Saundarya Lahari)

आधुनिक तांत्रिक मानचित्रण 'श्रीं' को अनाहत चक्र में रखता है क्योंकि लक्ष्मी दिव्य अनुग्रह और प्रेम की देवी हैं। श्री यंत्र का शास्त्रीय पाठ इसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ज्यामितीय मानचित्र के रूप में पढ़ता है, न कि एकल चक्र के रूप में।

किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।