धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ||१-१||
dhṛtarāṣṭra uvāca . dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ . māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya ||1-1||
।।1.1।।धृतराष्ट्र ने कहा -- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए युद्ध के इच्छुक (युयुत्सव:) मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
Modern Reflection
आज के भारत में यह श्लोक हर उस स्थिति में दिखता है जहाँ हम लोगों को “मेरे” और “उनके” में बाँट देते हैं। स्कूल में माता-पिता सिर्फ अपने बच्चे का पक्ष लेते हैं, ऑफिस में मैनेजर अपनी पसंदीदा टीम को बचाता है, या परिवार में जायदाद के झगड़े में न्याय से ज़्यादा अपना पक्ष बड़ा लगने लगता है। धृतराष्ट्र की अंधता केवल आँखों की नहीं, मोह की अंधता है। जब हम यह पूछते हैं कि “मेरे लोगों ने क्या किया?” और यह नहीं पूछते कि “सही क्या है?”, तब संघर्ष हमारे भीतर शुरू हो चुका होता है।