सञ्जय उवाच | तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ||२-१||
sañjaya uvāca . taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam . viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ||2-1||
।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत, अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।
Modern Reflection
आज के भारत में यह श्लोक failed entrance attempt या harsh appraisal के बाद धुंधली आँखों से बैठे छात्र या प्रोफेशनल से जुड़ता है। दुख को स्वीकार करना चाहिए, पर उसे जीवन के फैसलों का मालिक नहीं बनने देना चाहिए। छात्रों, कामकाजी लोगों, परिवारों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह याद दिलाता है कि कुरुक्षेत्र केवल रणभूमि नहीं, बल्कि classroom, office, घर, hospital, court और मन के भीतर भी है। यह श्लोक कहता है कि डर, ego, comparison या emotional panic से नहीं, बल्कि धर्म और स्पष्टता से प्रतिक्रिया देनी चाहिए।