अर्जुन उवाच | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ||३-१||
arjuna uvāca . jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana . tatkiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava ||3-1||
।।3.1।। हे जनार्दन यदि आपको यह मान्य है कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर हे केशव आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों प्रवृत्त करते हैं
Modern Reflection
आज के भारत में यह उस छात्र, कर्मचारी, उद्यमी या माता-पिता की उलझन है जिसने आध्यात्मिक बातें तो बहुत पढ़ ली हैं, पर फिर भी परीक्षा, डेडलाइन, EMI, परिवार और समाज की जिम्मेदारियों से गुजरना पड़ता है। अर्जुन पूछता है कि अगर ज्ञान श्रेष्ठ है, तो फिर कठिन कर्म क्यों? कई युवा भी यही सोचते हैं—अगर शांति ही लक्ष्य है, तो कोचिंग, कॉर्पोरेट टारगेट और घरेलू जिम्मेदारियों की दौड़ क्यों? यह श्लोक बताता है कि ज्ञान जीवन से भागने का पास नहीं, जीवन में सही कर्म करने की दिशा है।