अर्जुन उवाच | संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि | यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ||५-१||
arjuna uvāca . saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punaryogaṃ ca śaṃsasi . yacchreya etayorekaṃ tanme brūhi suniścitam ||5-1||
।।5.1।। अर्जुन ने कहा हे -- कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्म के आचरण) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में एक जो निश्चय पूर्वक श्रेयस्कर है, उसको मेरे लिए कहिये।।
Modern Reflection
अर्जुन का सवाल आज के भारत में बहुत व्यावहारिक लगता है—क्या दबाव से दूर हो जाना बेहतर है या कर्म करते हुए आसक्ति छोड़ना? बेंगलुरु का कोई युवा बर्नआउट के बाद नौकरी छोड़ना चाहता है, कोटा का छात्र परीक्षा से भागना चाहता है, और परिवार संभालता व्यक्ति सोचता है कि सब छोड़कर शांति मिल जाएगी। कृष्ण यहाँ बाहरी संन्यास और आंतरिक स्वतंत्रता का अंतर समझाते हैं। काम छोड़ देना ही ज्ञान नहीं है। असली साधना है परिवार, करियर, समाज और कर्तव्य के बीच रहते हुए भी अहंकार, तुलना और चिंता से मुक्त रहना।