श्रीभगवानुवाच | अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः | स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ||६-१||
śrībhagavānuvāca . anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ . sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||6-1||
।।6.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है।।
Modern Reflection
आज के भारत में यह श्लोक उन लोगों से बात करता है जो सोचते हैं कि आध्यात्मिकता का मतलब जिम्मेदारियों से भागना है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सच्चा संन्यासी वह नहीं जो काम, परिवार, परीक्षा, नौकरी या समाज से भाग जाए, बल्कि वह है जो फल की चिंता में फँसे बिना अपना कर्तव्य करता है। ईमानदार कर्मचारी, समर्पित शिक्षक, सेवा भाव वाला डॉक्टर, परिवार संभालती गृहिणी—सब इस योग को जी सकते हैं। संन्यास बाहर नहीं, भीतर शुरू होता है।