श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ||७-१||
śrībhagavānuvāca . mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ . asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu ||7-1||
।।7.1।। हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।
Modern Reflection
आज के भारत में बहुत लोगों के पास डिग्री, नौकरी, EMI, इंश्योरेंस और बैकअप प्लान हैं, फिर भी अनिश्चितता आते ही मन डर जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब मन मुझमें लगकर मेरी शरण लेता है, तब सच्ची स्पष्टता आती है। परीक्षा से डरता विद्यार्थी, नौकरी के दबाव में काम करता युवा, परिवार की चिंता संभालता माता-पिता, या स्वास्थ्य को लेकर चिंतित वरिष्ठ नागरिक—सबके लिए यह श्लोक कहता है कि शांति केवल बाहरी व्यवस्था से नहीं आती। भीतर एक दिव्य आधार चाहिए। जब मन ईश्वर में टिकता है, भविष्य का डर थोड़ा हल्का हो जाता है।