अर्जुन उवाच | किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम | अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ||८-१||
arjuna uvāca . kiṃ tad brahma kimadhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama . adhibhūtaṃ ca kiṃ proktamadhidaivaṃ kimucyate ||8-1||
।।8.1।। अर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है,
Modern Reflection
यह श्लोक उस क्षण को दिखाता है जब अर्जुन टूटने के बाद जीवन के गहरे प्रश्न पूछता है। आज भारत में भी ऐसा पल किसी विद्यार्थी को परीक्षा के दबाव में, किसी प्रोफेशनल को करियर की थकान में, किसी माता-पिता को परिवार की चिंता में, या किसी वरिष्ठ नागरिक को जीवन के अंतिम चरण पर विचार करते समय आ सकता है। प्रश्न यह है कि सच में स्थायी क्या है, कर्तव्य क्या है और अंत समय में क्या याद रखना चाहिए। यह श्लोक बताता है कि सच्ची आध्यात्मिक यात्रा अक्सर तब शुरू होती है जब बाहरी सफलता मन के सवालों का जवाब नहीं दे पाती।