अर्जुन उवाच | एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते | ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ||१२-१||
arjuna uvāca . evaṃ satatayuktā ye bhaktāstvāṃ paryupāsate . ye cāpyakṣaramavyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥ ||12-1||
।।12.1।। अर्जुन ने कहा -- जो भक्त, सतत युक्त होकर इस (पूर्वोक्त) प्रकार से आपकी उपासना करते हैं और जो भक्त अक्षर, और अव्यक्त की उपासना करते हैं, उन दोनों में कौन उत्तम योगवित् है।।
Modern Reflection
अर्जुन का प्रश्न आज के भारत के बहुत से साधकों का प्रश्न है: क्या भगवान को साकार रूप में, जैसे कृष्ण, शिव, देवी, राम, मंदिर, मूर्ति, मंत्र और पूजा के माध्यम से मानना श्रेष्ठ है, या निराकार चेतना और सार्वभौमिक ऊर्जा के रूप में ध्यान करना? शहरी युवाओं, Gen Z और कामकाजी लोगों में यह दुविधा बहुत सामान्य है। एक तरफ हृदय को प्रेम और भक्ति चाहिए, दूसरी तरफ बुद्धि दर्शन और निराकार सत्य चाहती है। यह श्लोक बताता है कि ऐसा प्रश्न कमजोरी नहीं है। सच्ची आध्यात्मिक यात्रा अक्सर ऐसे ईमानदार प्रश्न से ही शुरू होती है।