अर्जुन उवाच | प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च | एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ||१३-१||
arjuna uvāca . prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñameva ca . etadveditumicchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ||13-1||
।।13.1।। अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।
Modern Reflection
अर्जुन का प्रश्न दार्शनिक लगता है, पर आज के भारत के लिए बहुत व्यावहारिक है: मैं अपने शरीर, नौकरी, परिवार, मार्कशीट, बैंक बैलेंस या सोशल मीडिया प्रोफाइल से परे कौन हूँ? कोटा का छात्र, बेंगलुरु का प्रोफेशनल, घर संभालती गृहिणी या कोलकाता का रिटायर्ड व्यक्ति—हर कोई कभी न कभी अपनी परिस्थिति में फँसा महसूस करता है। यह श्लोक प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की खोज शुरू करता है। यह पूछता है: क्या मैं केवल शरीर-मन की मशीन हूँ, या वह चेतना हूँ जो इस पूरी मशीन को देख रही है?