श्रीभगवानुवाच | ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् | छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ||१५-१||
śrībhagavānuvāca . ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam . chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit ||15-1||
।।15.1।। श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है।।
Modern Reflection
आज भारत में जीवन एक उल्टे पेड़ जैसा लगता है—जड़ें परिवार के संस्कार, धर्म और आस्था में छिपी हैं, पर शाखाएँ marks, degrees, EMI, promotions, social media image और समाज की approval में फैल गई हैं। छात्र rank को सब कुछ मानता है, professional salary को, और परिवार property को। श्रीकृष्ण कहते हैं कि दिखने वाली शाखाएँ असली स्रोत नहीं हैं। असली जड़ ऊपर है—दिव्य आधार में। यह श्लोक हर उम्र के भारतीय से कहता है कि सफलता के पत्ते सजाने में ही न लगे रहें; उस जड़ से जुड़ें जो अर्थ, स्थिरता और आध्यात्मिक पोषण देती है।