श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ||१६-१||
śrībhagavānuvāca . abhayaṃ sattvasaṃśuddhirjñānayogavyavasthitiḥ . dānaṃ damaśca yajñaśca svādhyāyastapa ārjavam ||16-1||
।।16.1।। श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।
Modern Reflection
आज के भारत में यह श्लोक हमारे भीतर चल रहे दो स्वभावों की बात करता है—दैवी और आसुरी। एक विद्यार्थी परीक्षा के दबाव में, एक कर्मचारी ऑफिस की राजनीति में, एक युवा सोशल मीडिया की तुलना में, या एक वरिष्ठ नागरिक परिवार की अपेक्षाओं में—हर कोई रोज़ यह चुनाव करता है कि वह शांति, करुणा और अनुशासन से चलेगा या अहंकार, क्रोध और असुरक्षा से। दैवी और आसुरी गुण किसी दूसरे व्यक्ति के लिए लगाए गए लेबल नहीं हैं; ये हमारे ही भीतर की प्रवृत्तियाँ हैं।