अर्जुन उवाच | ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ||१७-१||
arjuna uvāca . ye śāstravidhimutsṛjya yajante śraddhayānvitāḥ . teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāho rajastamaḥ ||17-1||
।।17.1।। अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर (केवल) श्रद्धा युक्त यज्ञ (पूजा) करते हैं, उनकी स्थिति (निष्ठा) कौन सी है ?क्या वह सात्त्विक है अथवा राजसिक या तामसिक ?
Modern Reflection
अर्जुन का प्रश्न आज के भारत में बहुत प्रासंगिक है: अगर कोई व्यक्ति श्रद्धा से कुछ करे, पर सही समझ के बिना करे, तो उसकी स्थिति क्या है? कई छात्र, कामकाजी लोग और परिवार पूजा, व्रत, दान या आध्यात्मिक ट्रेंड्स को मानते हैं, लेकिन उनके पीछे का सिद्धांत नहीं समझते। कोई इसलिए व्रत रखता है क्योंकि घर में सब रखते हैं, कोई इसलिए दान देता है क्योंकि समाज देख रहा है, और कोई सोशल मीडिया देखकर कोई साधना शुरू कर देता है। यह श्लोक कहता है कि श्रद्धा शक्तिशाली है, पर उसे सही दिशा चाहिए। आधुनिक भारत में परंपरा, परिवार, सोशल मीडिया और आध्यात्मिकता अक्सर मिल जाते हैं; इसलिए सवाल है—हमारी श्रद्धा हमें कहाँ ले जा रही है?