अत्रैवोदाहरन्तीमं बोध्यस्य पदसञ्चयम् । निर्वेदं प्रति विन्यस्तं प्रतिबोध युधिष्ठिर ॥१७७-५७॥
atraivodāharantīmaṁ bodhyasya pada-sañcayam | nirvedaṁ prati vinyastaṁ pratibodha yudhiṣṭhira ||177-57||
।।१।। हे युधिष्ठिर, परम्परा यहाँ बोध्य के संगृहीत वचनों को उद्धृत करती है, जो एक ही लक्ष्य से रचे गए हैं: निर्वेद, झूठी आशा से मुख मोड़ना। जो कहा जा रहा है उसे जाग कर सुनो।
Modern Reflection
।।१।। निर्वेद इस गीता का केन्द्रीय शब्द है और इसका अनुवाद सबसे कठिन है। यह अवसाद नहीं है। यह विद्वेष भी नहीं है। यह वह क्षण है जब वर्षों से ढोई गई कोई आशा चुपचाप वज़न उठाना बंद कर देती है। पकड़ छूट जाती है। भीष्म इस उपदेश की भूमिका में चेतावनी देते हैं कि इसे सुनने के लिए जागना ज़रूरी है। अधूरा ध्यान इसे चूक जाएगा। श्लोक का संकेत है कि अधिकांश सुनने वाले अब भी आशा में लगे हैं।