ब्रह्मसूत्रम्
Brahmasūtra
इस अनुवाद के विषय में
Brahma Sutra sutras are extremely terse -- often 2-6 words, mnemonic pointers meant to be expounded by a teacher rather than read standalone -- so each translation was composed after consulting the interleaved Shankara Bhashya (or standard Vedanta scholarship) to recover the sutra's actual claim, then rendered as concisely as the Sanskrit itself, not as a restatement of the full Bhashya argument. Many stretches, especially across adhyayas 2-3, are terse fragments of an extended purva-paksha/siddhanta (objection/reply) exchange; translations mark whose position is being stated where this is not otherwise recoverable from an isolated sutra. Standard Vedanta technical vocabulary (Brahman, atman, jiva, maya, avidya, upasana, moksha, adhyasa, jnana, karma, shruti, smriti, sukshma/sthula sharira, pradhana, prakriti, guna, etc.) is glossed briefly in English at first occurrence within each adhyaya. Where a sutra opens a new adhikarana (topic-grouping), the adhikarana's subject is named in the translation to orient the reader, since the bare sutra alone is often unintelligible without it. Adhyaya 2's engagement with Samkhya's pradhana/prakriti/guna and with Vaisheshika atomism keeps terminology consistent with this project's already-built Sankhya Karika and Vaisheshika Sutras.
4 श्लोकों पर टिप्पणी दी गई है, जहाँ पाठ विवादित है।
श्लोक 1.1
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥
athāto brahmajijñāsā || 1 ||
अब, इसलिए ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा (इच्छा) करनी चाहिए। 'अब' शब्द यह सूचित करता है कि यह जिज्ञासा वेदाध्ययन तथा साधन-चतुष्टय (नित्यानित्य-वस्तु-विवेक, वैराग्य, शम-दमादि षट्क-सम्पत्ति, और मुमुक्षुत्व) की प्राप्ति के बाद आरम्भ होती है; और 'इसलिए' शब्द कारण बताता है — क्योंकि कर्म से केवल नाशवान फल मिलता है, जबकि ब्रह्मज्ञान से परम श्रेय अर्थात् मोक्ष प्राप्त होता है।
श्लोक 1.2
जन्माद्यस्य यतः ॥ २ ॥
janmādyasya yataḥ || 2 ||
[ब्रह्म वह है] जिससे इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। यही ब्रह्म का लक्षण है — वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् कारण जिससे सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती, टिकती और अन्त में उसी में लीन हो जाती है।
श्लोक 1.3
शास्त्रयोनित्वात् ॥ ३ ॥
śāstrayonitvāt || 3 ||
[ब्रह्म की सत्ता का प्रमाण] शास्त्र (वेद) के मूल/स्रोत होने से है — अर्थात् जगत्-कारण रूप ब्रह्म का ज्ञान प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं, केवल शास्त्र से ही होता है, क्योंकि वेद स्वयं उसी सर्वज्ञ ब्रह्म से प्रकट हुए हैं।
श्लोक 1.4
तत् तु समन्वयात् ॥ ४ ॥
tat tu samanvayāt || 4 ||
वह ब्रह्म ही वेदान्त-वाक्यों का प्रतिपाद्य है, क्योंकि उपनिषदों के सभी वाक्य — चाहे भिन्न-भिन्न प्रकरणों में हों — अन्ततः एक ही ब्रह्म में समन्वित (सामंजस्यपूर्ण रूप से मिलित) हो जाते हैं। इसी समन्वय के आधार पर यह सम्पूर्ण अध्याय 'समन्वय' कहलाता है।
श्लोक 1.5
ईक्षतेर् नाशब्दम् ॥ ५ ॥
īkṣater nāśabdam || 5 ||
[छान्दोग्य उपनिषद् में सत् के विषय में] 'ईक्षण' (देखने/सोचने) की बात कही गई है, इसलिए जगत् का कारण वह अचेतन [सांख्य का प्रधान, अर्थात् मूल जड़ प्रकृति] नहीं, बल्कि एक चेतन सत्ता है — क्योंकि सोचना/देखना केवल चेतन तत्त्व का ही धर्म हो सकता है।
श्लोक 1.6
गौणश् चेन् नात्मशब्दात् ॥ ६ ॥
gauṇaś cen nātmaśabdāt || 6 ||
यदि यह कहा जाए कि यह 'ईक्षण' शब्द गौण (लाक्षणिक) प्रयोग है, तो यह ठीक नहीं — क्योंकि उसी प्रसंग में सत् को 'आत्मा' (स्वयं का सत्य स्वरूप) भी कहा गया है, और आत्मा शब्द किसी अचेतन वस्तु के लिए प्रयुक्त नहीं होता।
श्लोक 1.7
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ ७ ॥
tanniṣṭhasya mokṣopadeśāt || 7 ||
और यह सत्/ब्रह्म ही है, प्रधान नहीं, क्योंकि उसी में स्थित (निष्ठ) रहने वाले के लिए मोक्ष का उपदेश दिया गया है — किसी अचेतन तत्त्व में स्थिर होने से मुक्ति की बात करना निरर्थक होगा।
श्लोक 1.8
हेयत्वावचनाच् च ॥ ८ ॥
heyatvāvacanāc ca || 8 ||
और इसलिए भी कि उस सत् को कहीं भी 'त्याज्य' (छोड़ने योग्य) नहीं कहा गया — जबकि सांख्य-दर्शन में प्रधान से विवेकपूर्वक अलग होना ही मुक्ति का साधन है; यहाँ सत् को प्राप्तव्य (पाने योग्य लक्ष्य) के रूप में दिखाया गया है, त्याज्य के रूप में नहीं।
श्लोक 1.9
प्रतिज्ञाविरोधात् ॥ ९ ॥
pratijñāvirodhāt || 9 ||
और इसलिए भी कि अन्यथा आरम्भ की गई प्रतिज्ञा का विरोध होगा — छान्दोग्य ने प्रतिज्ञा की थी कि 'एक को जानने से सब कुछ जाना जाता है'; यदि सत् केवल अचेतन प्रधान होता, जो बुद्धि जैसे चेतन कार्यों की व्याख्या नहीं कर सकता, तो यह प्रतिज्ञा पूरी न हो पाती।
श्लोक 1.10
स्वाप्ययात् ॥ १० ॥
svāpyayāt || 10 ||
और इसलिए भी कि छान्दोग्य में कहा गया है कि सुषुप्ति (गहरी नींद) में जीव अपने ही सत्-स्वरूप में लीन हो जाता है ('स्वम् अपीतो भवति') — यह दिखाता है कि सत् जीव का अपना ही आन्तरिक आत्मा है, कोई बाह्य अचेतन तत्त्व नहीं।
श्लोक 1.11
गतिसामान्यात् ॥ ११ ॥
gatisāmānyāt || 11 ||
और गति (मृत्यु के बाद की गति) के विषय में उपनिषदों का कथन समान रूप से एक ही सर्वव्यापी सत्ता की ओर संकेत करता है — विभिन्न श्रुति-वाक्यों में यह एकरूपता भी सत् के ब्रह्म होने की पुष्टि करती है।
श्लोक 1.12
श्रुतत्वाच् च ॥ १२ ॥
śrutatvāc ca || 12 ||
और इसलिए भी कि यह बात अन्यत्र भी प्रत्यक्ष रूप से श्रुति (वेद-वाक्य) में सुनी/कही गई है — अतः सत् के चेतन-कारण होने का निष्कर्ष केवल अनुमान पर नहीं, प्रत्यक्ष श्रुति-वचन पर भी आधारित है। इस प्रकार ईक्षत्यधिकरण समाप्त होता है, जिसमें सांख्य के प्रधान-वाद का खण्डन करते हुए जगत्-कारण को चेतन ब्रह्म सिद्ध किया गया है।
श्लोक 1.13
आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १३ ॥
ānandamayo'bhyāsāt || 13 ||
[विषय: तैत्तिरीय उपनिषद् का 'आनन्दमय' कोश क्या स्वयं परमात्मा है?] 'आनन्दमय' कोश वस्तुतः परमात्मा ही है, क्योंकि 'आनन्द' शब्द का वहाँ बार-बार (अभ्यास से) प्रयोग हुआ है — यह पुनरावृत्ति दिखाती है कि यह शब्द ब्रह्म के स्वरूप, जो स्वयं आनन्द-स्वरूप है, का बोधक है, न कि केवल एक अस्थायी कोश का।
श्लोक 1.14
विकारशब्दान् नेति चेन् न प्राचुर्यात् ॥ १४ ॥
vikāraśabdān neti cen na prācuryāt || 14 ||
यदि कहा जाए कि 'आनन्दमय' शब्द में 'मय' प्रत्यय विकार (परिणाम) का द्योतक है (जैसे अन्नमय आदि में), इसलिए यह ब्रह्म नहीं हो सकता — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि 'मय' प्रत्यय प्राचुर्य (बहुलता/पूर्णता) का भी सूचक होता है; अतः 'आनन्दमय' का अर्थ है 'आनन्द से परिपूर्ण', अर्थात् स्वयं ब्रह्म।
श्लोक 1.15
तद्धेतुव्यपदेशाच् च ॥ १५ ॥
taddhetuvyapadeśāc ca || 15 ||
और इसलिए भी कि ब्रह्म को उस आनन्दमय के आनन्द का हेतु (कारण) बताया गया है — अर्थात् आनन्दमय का आनन्द स्वयं ब्रह्म से ही उद्भूत है, जो यह दर्शाता है कि दोनों का प्रसंग एक ही तत्त्व, ब्रह्म, की ओर सतत संकेत करता है।
श्लोक 1.16
मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १६ ॥
māntravarṇikameva ca gīyate || 16 ||
और जो 'सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म' इस मन्त्र-भाग में वर्णित है, वही ब्रह्म यहाँ (ब्राह्मण-भाग में, 'अन्यः अन्तर आत्मा आनन्दमयः' इस वाक्य में) भी गाया/वर्णित हो रहा है — दोनों भागों का प्रतिपाद्य एक ही ब्रह्म है।
श्लोक 1.17
नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १७ ॥
netaro'nupapatteḥ || 17 ||
आनन्दमय कोई अन्य [अर्थात् जीव] नहीं है, क्योंकि जीव मानने पर वर्णित गुण असंगत हो जाएंगे — जैसे सबका कारण होना, समस्त प्राणियों को आधार देना आदि गुण जीव में घटित नहीं हो सकते।
श्लोक 1.18
भेदव्यपदेशाच् च ॥ १८ ॥
bhedavyapadeśāc ca || 18 ||
और इसलिए भी कि उस अनुच्छेद में आनन्दमय के भेद (भिन्नता) का कथन है — प्रिय, मोद, प्रमोद आदि को उसके अवयव (सिर, दाहिनी-बायीं भुजा आदि) कहा गया है, जो उसे खोजने वाले जीव से पृथक् एक तत्त्व की ओर संकेत करता है, अर्थात् परमात्मा।
श्लोक 1.19
कामाच् च नानुमानापेक्षा ॥ १९ ॥
kāmāc ca nānumānāpekṣā || 19 ||
और इसलिए भी कि उसमें 'कामना' का वर्णन है ('सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' — उसने चाहा, मैं बहुत हो जाऊँ) — यह ठीक वैसी ही कामना है जो सृष्टि-प्रसंग में सत्/ब्रह्म की बताई गई है; इसलिए अचेतन प्रधान की कल्पना के अनुमान पर निर्भर होने की कोई आवश्यकता नहीं है, प्रत्यक्ष शब्द ही निर्णायक है।
श्लोक 1.20
अस्मिन्न् अस्य च तद्योगं शास्ति ॥ २० ॥
asminn asya ca tadyogaṁ śāsti || 20 ||
और उपनिषद् इसी आनन्दमय में स्थित जीव का उसके (ब्रह्म के) साथ योग (एकत्व) सिखाती है — इसी प्रसंग के भीतर जीव को अपने वास्तविक आनन्द-स्वरूप ब्रह्म के साथ एकत्व प्राप्त होने की शिक्षा दी गई है, जो यह पुष्ट करता है कि आनन्दमय स्वयं ब्रह्म ही है। इस प्रकार आनन्दमयाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.21
अन्तस् तद्धर्मोपदेशात् ॥ २१ ॥
antas taddharmopadeśāt || 21 ||
[विषय: सूर्य के भीतर और नेत्र के भीतर देखा जाने वाला 'अन्तर' पुरुष] यह भीतर का सुनहला पुरुष ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें ब्रह्म के धर्मों (जैसे पापरहितता) का उपदेश दिया गया है।
श्लोक 1.22
भेदव्यपदेशाच् चान्यः ॥ २२ ॥
bhedavyapadeśāc cānyaḥ || 22 ||
और वह अन्य [सामान्य जीव या देवता] से भिन्न है, क्योंकि शास्त्र में उसके भेद का स्पष्ट कथन है — उसे साधारण प्राणियों से पृथक्, सर्वव्यापी और पापरहित बताया गया है। इस प्रकार अन्तरधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.23
आकाशस् तल्लिङ्गात् ॥ २३ ॥
ākāśas talliṅgāt || 23 ||
[छान्दोग्य में वर्णित] 'आकाश' — जिससे 'ये सब भूत उत्पन्न होते हैं' — वह भी ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें ब्रह्म के लिंग (चिह्न, अर्थात् सृष्टि का उद्गम-स्थान होने का लक्षण) पाए जाते हैं।
श्लोक 1.24
अत एव प्राणः ॥ २४ ॥
ata eva prāṇaḥ || 24 ||
इसी कारण से 'प्राण' (जीवनी शक्ति) भी ब्रह्म ही है — क्योंकि प्राण के विषय में भी वही सृष्टि-कारणत्व आदि लक्षण पाए जाते हैं जो आकाश के प्रसंग में देखे गए।
श्लोक 1.25
ज्योतिश् चरणाभिधानात् ॥ २५ ॥
jyotiś caraṇābhidhānāt || 25 ||
[विषय: 'ज्योति' शब्द ब्रह्म का वाचक कैसे है] छान्दोग्य में वर्णित, स्वर्ग से भी ऊपर चमकने वाला 'ज्योति' (प्रकाश) ब्रह्म ही है, क्योंकि 'चरण' (पाद) के उल्लेख से यह गायत्री के पूर्व-प्रसंग से सम्बद्ध होकर ब्रह्म की ओर संकेत करता है।
श्लोक 1.26
छन्दोऽभिधानान् नेति चेन् न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् ॥ २६ ॥
chando'bhidhānān neti cen na tathā ceto'rpaṇanigadāt tathā hi darśanam || 26 ||
यदि कहा जाए कि 'छन्द' (गायत्री छन्द) के उल्लेख से यह ब्रह्म नहीं, केवल छन्द-विषयक कथन है — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि छन्द का उल्लेख चित्त को एकाग्र करने (उपासना के सहारे के रूप में) के लिए किया गया है; ऐसा प्रयोग अन्यत्र भी शास्त्र में देखा जाता है।
श्लोक 1.27
भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश् चैवम् ॥ २७ ॥
bhūtādipādavyapadeśopapatteś caivam || 27 ||
और इस प्रकार गायत्री के 'चरणों' को भूत आदि (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, और चतुर्थ चरण) के रूप में वर्णित करना तभी संगत होता है जब अन्तिम प्रतिपाद्य ब्रह्म हो — साधारण गायत्री छन्द में ऐसे विश्व-व्यापी चरण नहीं हो सकते।
श्लोक 1.28
उपदेशभेदान् नेति चेन् नोभयस्मिन्न् अप्य् अविरोधात् ॥ २८ ॥
upadeśabhedān neti cen nobhayasminn apy avirodhāt || 28 ||
यदि कहा जाए कि विभिन्न शाखाओं में उपदेश-भेद के कारण यह ब्रह्म नहीं — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि दोनों ही पाठों में कोई वास्तविक विरोध नहीं है, दोनों अन्ततः एक ही ब्रह्म की ओर संकेत करते हैं। इस प्रकार ज्योतिश्चरणाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.29
प्राणस् तथानुगमात् ॥ २९ ॥
prāṇas tathānugamāt || 29 ||
[विषय: कौषीतकि उपनिषद् की प्रतर्दन-विद्या में इन्द्र द्वारा वर्णित 'प्राण'] यह प्राण भी उसी प्रकार ब्रह्म ही है, क्योंकि सम्पूर्ण प्रसंग में ब्रह्म के गुणों का निरन्तर अनुगमन (सामंजस्य) पाया जाता है।
श्लोक 1.30
न वक्तुर् आत्मोपदेशाद् इति चेद् अध्यात्मसंबन्धभूमा ह्य् अस्मिन् ॥ ३० ॥
na vaktur ātmopadeśād iti ced adhyātmasaṁbandhabhūmā hy asmin || 30 ||
यदि कहा जाए कि यह उपदेश वक्ता (इन्द्र) के अपने ही विषय में है (अर्थात् इन्द्र स्वयं की महिमा बता रहा है, कोई परब्रह्म नहीं) — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि इस प्रसंग में अध्यात्म (आन्तरिक आत्मा) से सम्बन्धित बातों की प्रचुरता है, अर्थात् उपदेश किसी बाह्य देवता का नहीं, आन्तरिक आत्म-तत्त्व का ही है।
श्लोक 1.31
शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ ३१ ॥
śāstradṛṣṭyā tūpadeśo vāmadevavat || 31 ||
किन्तु यह प्रथम-पुरुष में उपदेश ('मुझे जानो') शास्त्रीय दृष्टि से है, अर्थात् तत्त्व-ज्ञान से प्राप्त सत्य की घोषणा है, जैसे वामदेव ऋषि ने अनुभूति-ज्ञान से कहा था 'मैं मनु था, मैं सूर्य था' — यह अहंकार नहीं, आत्म-साक्षात्कार का कथन है।
श्लोक 1.32
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान् नेति चेन् नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वाद् इह तद्योगात् ॥ ३२ ॥
jīvamukhyaprāṇaliṅgān neti cen nopāsātraividhyādāśritatvād iha tadyogāt || 32 ||
यदि कहा जाए कि इस प्रसंग में जीव (व्यष्टि आत्मा) और मुख्य प्राण के चिह्न पाए जाने से यह ब्रह्म नहीं — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि एक ही वाक्य में तीन प्रकार की उपासना (जीव, मुख्य प्राण और ब्रह्म) मानना असंगत होगा; बल्कि उपक्रम और उपसंहार दोनों जिस ब्रह्म के साथ योग (सम्बन्ध) दिखाते हैं, यहाँ उसी का आश्रय (अर्थ) लिया जाना चाहिए। इस प्रकार पाद १ समाप्त होता है।
श्लोक 1.33
सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १ ॥
sarvatra prasiddhopadeśāt || 1 ||
[विषय: छान्दोग्य में वर्णित, हृदय के भीतर स्थित 'सत्यकाम, सत्यसंकल्प' आत्मा क्या ब्रह्म है?] वह आत्मा ब्रह्म ही है, क्योंकि उसे वही गुण दिए गए हैं जो सर्वत्र उपनिषदों में ब्रह्म के रूप में प्रसिद्ध (सुविख्यात) हैं।
श्लोक 1.34
विवक्षितगुणोपपत्तेश् च ॥ २ ॥
vivakṣitaguṇopapatteś ca || 2 ||
और इसलिए भी कि यहाँ अभीष्ट (वर्णित होने योग्य) गुण — सत्यसंकल्पत्व, पापरहितता आदि — केवल ब्रह्म में ही सम्भव हैं, किसी सामान्य तत्त्व में नहीं।
श्लोक 1.35
अनुपपत्तेस् तु न शारीरः ॥ ३ ॥
anupapattes tu na śārīraḥ || 3 ||
किन्तु ऐसे गुणों की असंगति के कारण, वह शारीर (देहधारी जीव) नहीं है — जीव में सर्वज्ञता, सर्वसत्ता-नियन्तृत्व जैसे गुण घटित नहीं हो सकते।
श्लोक 1.36
कर्मकर्तृव्यपदेशाच् च ॥ ४ ॥
karmakartṛvyapadeśāc ca || 4 ||
और इसलिए भी कि उसे उसी प्रसंग में कर्म (खोजे जाने योग्य लक्ष्य) और कर्ता (खोजने वाला/निर्देशक) दोनों रूपों में कहा गया है — यह दोहरी भूमिका केवल सर्वात्मा ब्रह्म में ही सम्भव है।
श्लोक 1.37
शब्दविशेषात् ॥ ५ ॥
śabdaviśeṣāt || 5 ||
और शब्द-विशेष (उस प्रसंग में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दावली) से भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ ब्रह्म ही अभिप्रेत है, जीव नहीं।
श्लोक 1.38
स्मृतेश् च ॥ ६ ॥
smṛteś ca || 6 ||
और स्मृति (परम्परा-ग्रन्थों, जैसे गीता आदि) के वचनों से भी यह पुष्ट होता है कि हृदय में निवास करने वाला वह तत्त्व परमेश्वर ही है।
श्लोक 1.39
अर्भकौस्त्वात् तद्व्यपदेशाच् च नेति चेन् न निचाय्यत्वाद् एवं व्योमवच् च ॥ ७ ॥
arbhakaustvāt tadvyapadeśāc ca neti cen na nicāyyatvād evaṁ vyomavac ca || 7 ||
यदि कहा जाए कि 'चावल अथवा जौ के दाने से भी छोटा' कहकर उसे अत्यन्त छोटा (अर्भक) बताया गया है, इसलिए वह ब्रह्म नहीं हो सकता — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि यह लघुता उसकी सूक्ष्मता (विवेकपूर्वक अनुभव किए जाने योग्य होने) की ओर संकेत करती है; और उसी वाक्य में उसे आकाश के समान अत्यन्त विशाल भी कहा गया है।
श्लोक 1.40
संभोगप्राप्तिर् इति चेन् न वैशेष्यात् ॥ ८ ॥
saṁbhogaprāptir iti cen na vaiśeṣyāt || 8 ||
यदि कहा जाए कि स्वप्नावस्था में इच्छा-भोग आदि के वर्णन से यह केवल भोग-प्राप्ति (भोक्ता जीव) का वर्णन है — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि उसे पापरहितता जैसे विशिष्ट (सामान्य भोक्ता से पृथक्) गुणों से भी युक्त बताया गया है। इस प्रकार सर्वत्रप्रसिद्ध्यधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.41
अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ ९ ॥
attā carācaragrahaṇāt || 9 ||
[विषय: कठोपनिषद् में वर्णित 'भक्षक'] यह भक्षक (अत्ता, जो सब प्राणियों को खा जाता है) ब्रह्म ही है, क्योंकि वह चर और अचर — सभी प्राणियों को अपने भीतर समेटता है, जो केवल सर्वव्यापी ब्रह्म का ही धर्म है।
श्लोक 1.42
प्रकरणाच् च ॥ १० ॥
prakaraṇāc ca || 10 ||
और उस अनुच्छेद के प्रकरण (प्रसंग-विषय) से भी यही सिद्ध होता है, क्योंकि आस-पास का सम्पूर्ण प्रसंग ब्रह्म-विषयक ही है। इस प्रकार अत्ताधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.43
गुहां प्रविष्टाव् आत्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ ११ ॥
guhāṁ praviṣṭāv ātmānau hi taddarśanāt || 11 ||
'गुहा (हृदय-बुद्धि) में प्रविष्ट दो तत्त्व' निश्चय ही जीव और परमात्मा हैं, क्योंकि ऐसा ही (छाया-प्रकाश के रूप में दो साथियों का) वर्णन अन्यत्र भी — जैसे 'दो पक्षी एक ही वृक्ष पर' इस श्रुति में — देखा जाता है।
श्लोक 1.44
विशेषणाच् च ॥ १२ ॥
viśeṣaṇāc ca || 12 ||
और उन दोनों को दिए गए विशेषणों से भी यह पुष्ट होता है — एक को कर्मफल-भोक्ता और दूसरे को केवल साक्षी (भोगरहित द्रष्टा) बताया गया है, जो जीव और ईश्वर के भेद को स्पष्ट करता है। इस प्रकार गुहाप्रविष्टाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.45
अन्तर उपपत्तेः ॥ १३ ॥
antara upapatteḥ || 13 ||
[विषय: नेत्र के भीतर दिखाई देने वाला 'पुरुष'] यह पुरुष ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें ब्रह्म के गुणों का औचित्य (संगति) पाया जाता है।
श्लोक 1.46
स्थानादिव्यपदेशाच् च ॥ १४ ॥
sthānādivyapadeśāc ca || 14 ||
और इसलिए भी कि उसके स्थान आदि का वर्णन — ब्रह्मलोक तक उसकी गति, सभी लोकों में स्वच्छन्द विचरण आदि — केवल ब्रह्म के लिए ही उपयुक्त है।
श्लोक 1.47
सुखविशिष्टाभिधानाद् एव च ॥ १५ ॥
sukhaviśiṣṭābhidhānād eva ca || 15 ||
और इसीलिए भी कि उसे विशिष्ट (अनुपम, सर्वोत्कृष्ट) सुख से युक्त बताया गया है — ऐसा असीम आनन्द केवल ब्रह्म का ही लक्षण है।
श्लोक 1.48
अत एव च स ब्रह्म ॥ १६ ॥
ata eva ca sa brahma || 16 ||
और इन्हीं सब कारणों से वह नेत्र-स्थित पुरुष ब्रह्म ही है।
श्लोक 1.49
श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच् च ॥ १७ ॥
śrutopaniṣatkagatyabhidhānāc ca || 17 ||
और इसलिए भी कि जिसने इस उपनिषद् (गुह्य ज्ञान) को सुन लिया है, उसकी असीमित गति (फल) का वर्णन किया गया है — ऐसा फल केवल ब्रह्मज्ञान से ही सम्भव है।
श्लोक 1.50
अनवस्थितेर् असंभवाच् च नेतरः ॥ १८ ॥
anavasthiter asaṁbhavāc ca netaraḥ || 18 ||
और वह अन्य (अर्थात् नेत्र में पड़ने वाला केवल प्रतिबिम्ब) नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब अस्थिर होता है और वर्णित महिमापूर्ण गुणों का उसमें होना असम्भव है। इस प्रकार यह दूसरा अन्तराधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.51
अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १९ ॥
antaryāmyadhidaivādhilokādiṣu taddharmavyapadeśāt || 19 ||
[विषय: बृहदारण्यक में वर्णित 'अन्तर्यामी'] भीतर से नियमन करने वाला यह अन्तर्यामी — जो देवताओं, लोकों आदि सभी में विद्यमान है — ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें ब्रह्म के धर्मों का कथन है।
श्लोक 1.52
न च स्मार्तम् अतद्धर्माभिलापाच् छारीरश् च ॥ २० ॥
na ca smārtam ataddharmābhilāpāc chārīraś ca || 20 ||
और वह न तो स्मृति-प्रसिद्ध (सांख्य का) प्रधान है — क्योंकि उसके (प्रधान के) गुणों का वहाँ वर्णन नहीं है — और न ही शारीर (देहधारी जीव) है।
श्लोक 1.53
शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ २१ ॥
śārīraścobhaye'pi hi bhedenainamadhīyate || 21 ||
और शारीर (जीव) को दोनों शाखाओं (माध्यन्दिन और काण्व) में भी अन्तर्यामी से भिन्न रूप में ही पढ़ा जाता है — यह भेद इस बात की पुष्टि करता है कि अन्तर्यामी स्वयं परमात्मा है, जीव नहीं। इस प्रकार अन्तर्याम्यधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.54
अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ २२ ॥
adṛśyatvādiguṇako dharmokteḥ || 22 ||
[विषय: बृहदारण्यक में वर्णित अदृश्यता आदि गुणों वाला 'अक्षर'] यह अक्षर (अविनाशी तत्त्व) ब्रह्म ही है, क्योंकि उसमें ब्रह्म के अन्य धर्मों — जैसे सूर्य-चन्द्र आदि को नियन्त्रित करना — का भी कथन है।
श्लोक 1.55
विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ २३ ॥
viśeṣaṇabhedavyapadeśābhyāṁ ca netarau || 23 ||
और वह अन्य दोनों (न प्रधान और न जीव) नहीं है, क्योंकि उसके विशेषणों और भेद-कथन दोनों से यह स्पष्ट होता है कि वह इन दोनों से पृथक् है।
श्लोक 1.56
रूपोपन्यासाच् च ॥ २४ ॥
rūpopanyāsāc ca || 24 ||
और इसलिए भी कि उसके स्वरूप का वर्णन (सर्वनियन्ता के रूप में) इसी निष्कर्ष के अनुरूप है। इस प्रकार अदृश्यत्वाद्यधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.57
वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ २५ ॥
vaiśvānaraḥ sādhāraṇaśabdaviśeṣāt || 25 ||
[विषय: छान्दोग्य में वर्णित 'वैश्वानर'] वैश्वानर — जो साधारणतः केवल अग्नि/जठराग्नि का वाचक शब्द है — यहाँ विशेष अर्थ में प्रयुक्त होकर ब्रह्म का ही वाचक है, क्योंकि इस प्रसंग की विशिष्ट शब्दावली उसे साधारण अग्नि से आगे ले जाती है।
श्लोक 1.58
स्मर्यमाणम् अनुमानं स्याद् इति ॥ २६ ॥
smaryamāṇam anumānaṁ syād iti || 26 ||
(पूर्वपक्ष): यह तो स्मृति में वर्णित साधारण अग्नि है, इसलिए यह अनुमान (परोक्ष निष्कर्ष) मात्र होगा — ऐसा कहा जा सकता है।
श्लोक 1.59
शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच् च नेति चेन् न तथा दृष्ट्युपदेशाद् असम्भवात् पुरुषमपि चैनम् अधीयते ॥ २७ ॥
śabdādibhyo'ntaḥpratiṣṭhānāc ca neti cen na tathā dṛṣṭyupadeśād asambhavāt puruṣamapi cainam adhīyate || 27 ||
यदि कहा जाए कि 'वैश्वानर' शब्द तथा उसके शरीर के भीतर स्थित होने के वर्णन से वह ब्रह्म नहीं है — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्र में उसे उसी प्रकार (विश्व-व्यापी रूप में) देखे जाने का उपदेश है, और सामान्य अग्नि में ऐसा वर्णन असम्भव है; साथ ही उसे 'पुरुष' के रूप में भी पढ़ा जाता है।
श्लोक 1.60
अत एव न देवता भूतं च ॥ २८ ॥
ata eva na devatā bhūtaṁ ca || 28 ||
इसी कारण से वैश्वानर न तो मात्र कोई देवता है और न ही मात्र कोई भौतिक तत्त्व (अग्नि) है — उसके वर्णित गुण इन दोनों से आगे जाते हैं।
श्लोक 1.61
साक्षाद् अप्य् अविरोधं जैमिनिः ॥ २९ ॥
sākṣād apy avirodhaṁ jaiminiḥ || 29 ||
जैमिनि आचार्य के मत में, वैश्वानर के अंगों (सिर, नेत्र आदि) के साथ स्वर्ग, सूर्य आदि की पहचान प्रत्यक्ष रूप से भी असंगत नहीं है — अर्थात् यह पहचान लाक्षणिक नहीं, सीधी भी हो सकती है।
श्लोक 1.62
अभिव्यक्तेर् इत्य् आश्मरथ्यः ॥ ३० ॥
abhivyakter ity āśmarathyaḥ || 30 ||
आश्मरथ्य आचार्य के मत में यह अभिव्यक्ति (प्रकटीकरण) के कारण है — अर्थात् ब्रह्म उन कॉस्मिक रूपों (स्वर्ग, सूर्य आदि) में विशेष रूप से प्रकट/व्यक्त होता है।
श्लोक 1.63
अनुस्मृतेर् बादरिः ॥ ३१ ॥
anusmṛter bādariḥ || 31 ||
बादरि आचार्य के मत में यह अनुस्मृति (बार-बार स्मरण/ध्यान) के लिए है — अर्थात् इन अंग-पहचानों का उद्देश्य ब्रह्म का बारम्बार ध्यान कराना है।
श्लोक 1.64
संपत्तेर् इति जैमिनिस् तथा हि दर्शयति ॥ ३२ ॥
saṁpatter iti jaiminis tathā hi darśayati || 32 ||
जैमिनि आचार्य के मत में (पुनः) यह सम्पत्ति (उन-उन तत्त्वों का ब्रह्म में समाहित/लीन होना) के कारण है — शास्त्र स्वयं इसी प्रकार दिखाता है।
श्लोक 1.65
आमनन्ति चैनम् अस्मिन् ॥ ३३ ॥
āmananti cainam asmin || 33 ||
और शास्त्र इस वैश्वानर/ब्रह्म को इसी शरीर (व्यष्टि पुरुष) में भी उपास्य रूप से वर्णित करते हैं — 'यह अग्नि वैश्वानर जो भीतर पुरुष में है' इत्यादि। इस प्रकार वैश्वानराधिकरण और पाद २ समाप्त होता है।
श्लोक 1.66
द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ ॥
dyubhvādyāyatanaṁ svaśabdāt || 1 ||
[विषय: मुण्डक उपनिषद् में वर्णित स्वर्ग, पृथ्वी आदि का आधार] यह आधार (आयतन) ब्रह्म ही है, क्योंकि शास्त्र स्वयं अपने ही शब्दों में उसे 'ब्रह्म' कहता है — अनुमान की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 1.67
मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच् च ॥ २ ॥
muktopasṛpyavyapadeśāc ca || 2 ||
और इसलिए भी कि उसे मुक्त (जीवन्मुक्त) पुरुषों द्वारा 'प्राप्तव्य' (जिसके पास पहुँचा जाता है) कहा गया है — यह गुण केवल ब्रह्म का ही है, मुक्त आत्माओं का अन्तिम लक्ष्य वही है।
श्लोक 1.68
नानुमानम् अतच्छब्दात् प्राणभृच् च ॥ ३ ॥
nānumānam atacchabdāt prāṇabhṛc ca || 3 ||
यह समझ अनुमान (परोक्ष तर्क द्वारा सांख्य के प्रधान आदि के रूप में) से सिद्ध नहीं होती, क्योंकि वहाँ प्रधान-वाचक शब्द नहीं है; और वह आधार प्राणभृत् (प्राणयुक्त, अर्थात् सजीव/चेतन) भी है — जो अचेतन प्रधान में असम्भव है।
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श्लोक 1.69
भेदव्यपदेशात् ॥ ४ ॥
bhedavyapadeśāt || 4 ||
और इसलिए भी कि उस आधार और स्वर्ग-पृथ्वी आदि के बीच भेद का स्पष्ट कथन है — वह आधार उनसे पृथक्, श्रेष्ठ तत्त्व के रूप में वर्णित है।
श्लोक 1.70
प्रकरणात् ॥ ५ ॥
prakaraṇāt || 5 ||
और उस अनुच्छेद के प्रकरण (सन्दर्भ) से भी यही सिद्ध होता है, क्योंकि सम्पूर्ण प्रसंग ब्रह्म-विषयक ही है।
श्लोक 1.71
स्थित्यदनाभ्यां च ॥ ६ ॥
sthityadanābhyāṁ ca || 6 ||
और इसलिए भी कि उसे तुरन्त बाद के श्लोक में, दो पक्षियों के रूपक में, स्थिति (अविचल रहना) और अदन (फल खाना, भोग करना) के भेद से वर्णित किया गया है — जो पक्षी केवल साक्षी रूप में स्थित रहता है, न कि फल खाता है, वही ब्रह्म है। इस प्रकार द्युभ्वाद्यधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.72
भूमा संप्रसादाद् अध्युपदेशात् ॥ ७ ॥
bhūmā saṁprasādād adhyupadeśāt || 7 ||
[विषय: छान्दोग्य में सनत्कुमार द्वारा नारद को सिखाई गई 'भूमा'] यह भूमा (अनन्त/परिपूर्ण तत्त्व) उससे पहले वर्णित शान्त संप्रसाद-आत्मा से परे बताई गई है, क्योंकि उसे उससे ऊपर/श्रेष्ठ बताने का स्पष्ट उपदेश है।
श्लोक 1.73
धर्मोपपत्तेश् च ॥ ८ ॥
dharmopapatteś ca || 8 ||
और इसलिए भी कि वहाँ वर्णित गुण — असीम आनन्द, सर्वव्यापकता आदि — केवल ब्रह्म में ही घटित हो सकते हैं। इस प्रकार भूमाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.74
अक्षरम् अम्बरान्तधृतेः ॥ ९ ॥
akṣaram ambarāntadhṛteḥ || 9 ||
[विषय: बृहदारण्यक में वर्णित 'अक्षर'] यह अक्षर (अविनाशी तत्त्व) ब्रह्म ही है, क्योंकि वह आकाश तक — अर्थात् सम्पूर्ण विश्व — को धारण करता है, जो केवल सर्वाधार ब्रह्म का ही सामर्थ्य है।
श्लोक 1.75
सा च प्रशासनात् ॥ १० ॥
sā ca praśāsanāt || 10 ||
और वह अक्षर ब्रह्म ही सिद्ध होता है क्योंकि उसे सबके शासन (नियमन/नियन्त्रण) के रूप में भी वर्णित किया गया है — सूर्य, चन्द्र आदि सब उसी के शासन में स्थित हैं।
श्लोक 1.76
अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ ११ ॥
anyabhāvavyāvṛtteśca || 11 ||
और इसलिए भी कि उसके वर्णन में अन्य सब भावों (स्थूल, सूक्ष्म आदि) का व्यावर्तन (निषेध) किया गया है — यह 'न यह, न वह' पद्धति केवल ब्रह्म के वर्णन में ही प्रयुक्त होती है। इस प्रकार अक्षराधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.77
ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १२ ॥
īkṣatikarmavyapadeśāt saḥ || 12 ||
[विषय: निरन्तरता का प्रमाण] वह अक्षर, जिसकी चर्चा अभी हुई, ही गार्गी के प्रश्न वाले अगले प्रसंग में भी अभिप्रेत है, क्योंकि उसे 'ईक्षण' (द्रष्टापन/ज्ञातापन) से सम्बद्ध विषय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है — दोनों प्रसंगों का प्रतिपाद्य एक ही तत्त्व है।
श्लोक 1.78
दहर उत्तरेभ्यः ॥ १३ ॥
dahara uttarebhyaḥ || 13 ||
[विषय: छान्दोग्य की प्रसिद्ध 'दहर-विद्या'] हृदय-कमल के भीतर स्थित 'दहर' (सूक्ष्म/छोटा) आकाश ब्रह्म ही है, क्योंकि आगे के वाक्यों में उसके ब्रह्म-सुलभ गुणों — स्वर्ग-पृथ्वी को समाविष्ट करना, सब इच्छाओं का आधार होना — का वर्णन है।
श्लोक 1.79
गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ॥ १४ ॥
gatiśabdābhyāṁ tathā hi dṛṣṭaṁ liṅgaṁ ca || 14 ||
और इसलिए भी कि उसके शरीर-त्याग के समय 'गमन' के तथा (ब्रह्म-)शब्द के उल्लेख से — वैसा ही सम्बन्ध अन्यत्र भी देखा जाता है — तथा अन्य लक्षणों से भी यह सिद्ध होता है।
श्लोक 1.80
धृतेश् च महिम्नोऽस्यास्मिन्न् उपलब्धेः ॥ १५ ॥
dhṛteś ca mahimno'syāsminn upalabdheḥ || 15 ||
और इसलिए भी कि उसमें समस्त सृष्टि की महिमा को धारण करने की बात पाई जाती है — स्वर्ग, पृथ्वी, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र आदि सब उसी हृदय-आकाश में समाहित रहते हैं, जो केवल ब्रह्म का ही गुण हो सकता है।
श्लोक 1.81
प्रसिद्धेश् च ॥ १६ ॥
prasiddheś ca || 16 ||
और इसलिए भी कि यह हृदय में ब्रह्म के निवास की बात अन्यत्र भी प्रसिद्ध (सुविख्यात) है।
श्लोक 1.82
इतरपरामर्शात् स इति चेन् नासंभवात् ॥ १७ ॥
itaraparāmarśāt sa iti cen nāsaṁbhavāt || 17 ||
यदि कहा जाए कि आगे के वाक्य में 'वह' शब्द से पिछले (जीव-विषयक) प्रसंग का ही निर्देश होने से यह जीव है — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि जीव में वर्णित विशाल गुणों का होना असम्भव है।
श्लोक 1.83
उत्तराच् चेद् आविर्भूतस्वरूपस् तु ॥ १८ ॥
uttarāc ced āvirbhūtasvarūpas tu || 18 ||
यदि यह कहते हुए कि आगे के एक अन्य वाक्य के कारण यह जीव-विषयक है, तो उत्तर है कि वह उस जीव की बात करता है जिसका अपना (ब्रह्म-)स्वरूप प्रकट हो चुका है — अर्थात् मुक्त जीव, जो स्वयं ब्रह्म-रूप ही है।
श्लोक 1.84
अन्यार्थश् च परामर्शः ॥ १९ ॥
anyārthaś ca parāmarśaḥ || 19 ||
और पूर्व में उल्लिखित 'वह' शब्द का वह निर्देश किसी अन्य ही प्रयोजन के लिए है, जीव को दर्शाने के लिए नहीं।
श्लोक 1.85
अल्पश्रुतेर् इति चेत् तद् उक्तम् ॥ २० ॥
alpaśruter iti cet tad uktam || 20 ||
यदि कहा जाए कि 'अल्प' (छोटा) कहे जाने से यह जीव है — तो इसका उत्तर पहले ही (सूत्र १.२.७ में) दिया जा चुका है, कि लघुता सूक्ष्मता की द्योतक है, आकार की नहीं। इस प्रकार यह उप-विषय समाप्त होता है।
श्लोक 1.86
अनुकृतेस् तस्य च ॥ २१ ॥
anukṛtes tasya ca || 21 ||
[विषय: दहर-विद्या के प्रसंग की निरन्तरता] और उस ब्रह्म का अनुकरण/प्रतिबिम्ब (अर्थात् विश्व को धारण करने वाले सेतु आदि के रूपक) भी उसी प्रसंग में वर्णित है — जो निरन्तरता से ब्रह्म की ओर ही संकेत करता है।
श्लोक 1.87
अपि च स्मर्यते ॥ २२ ॥
api ca smaryate || 22 ||
और इसे स्मृति में भी कहा गया है — जैसे ब्रह्म को विश्वों को अलग-अलग रखने वाले सेतु (बाँध) के रूप में वर्णित किया जाता है। इस प्रकार अनुकृत्यधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.88
शब्दाद् एव प्रमितः ॥ २३ ॥
śabdād eva pramitaḥ || 23 ||
[विषय: कठोपनिषद् में वर्णित अंगुष्ठमात्र पुरुष] यह आत्मा केवल शब्द (शास्त्र-वचन) से ही ब्रह्म रूप में यथार्थतः ज्ञात होता है — इस बात के लिए अलग से अनुमान की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 1.89
हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ २४ ॥
hṛdyapekṣayā tu manuṣyādhikāratvāt || 24 ||
किन्तु उसे 'अंगुष्ठमात्र' (अंगूठे के बराबर) कहना हृदय की अपेक्षा से है (अर्थात् उपासना-स्थल हृदय के आकार के अनुरूप), क्योंकि यह उपदेश मनुष्यों के लिए है (जिनका हृदय अंगुष्ठ-परिमाण का होता है) — ब्रह्म का वास्तविक माप नहीं बताया जा रहा। इस प्रकार प्रमिताधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.90
तदुपर्य् अपि बादरायणः संभवात् ॥ २५ ॥
tadupary api bādarāyaṇaḥ saṁbhavāt || 25 ||
[विषय: क्या देवता भी इस ज्ञान-उपासना के अधिकारी हैं?] बादरायण आचार्य के मत में इस मनुष्य-विषयक अधिकार से ऊपर भी (अर्थात् देवता आदि अन्य प्राणी भी) इस उपासना के अधिकारी हो सकते हैं, क्योंकि उनके लिए भी यह सम्भव है।
श्लोक 1.91
विरोधः कर्मणीति चेन् नानेकप्रतिपत्तेर् दर्शनात् ॥ २६ ॥
virodhaḥ karmaṇīti cen nānekapratipatter darśanāt || 26 ||
यदि कहा जाए कि वैदिक कर्म में यह विरोध उत्पन्न करेगा (क्योंकि एक देवता एक साथ अपने कर्तव्य-कर्म और मुक्ति-साधन दोनों नहीं कर सकता) — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि एक ही पद/स्थिति को अनेक द्वारा (या एक ही देवता द्वारा एक साथ अनेक रूपों में) धारण किया जाना शास्त्र में देखा गया है।
श्लोक 1.92
शब्द इति चेन् नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ २७ ॥
śabda iti cen nātaḥ prabhavāt pratyakṣānumānābhyām || 27 ||
यदि कहा जाए कि यह केवल शास्त्र के शब्द मात्र से स्थापित है (इसलिए अपर्याप्त प्रमाण है) — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि उसी शास्त्र से यह प्रत्यक्ष कथन और अनुमान दोनों द्वारा सिद्ध होता है।
श्लोक 1.93
अत एव च नित्यत्वम् ॥ २८ ॥
ata eva ca nityatvam || 28 ||
और इसी कारण से देवताओं के इस पद-रूप अस्तित्व की नित्यता (शाश्वतता) भी सिद्ध होती है — देवता-पद स्वयं शाश्वत है, चाहे उसे धारण करने वाले व्यक्ति बदलते रहें।
श्लोक 1.94
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश् च ॥ २९ ॥
samānanāmarūpatvāccāvṛttāvapyavirodho darśanāt smṛteś ca || 29 ||
और नाम-रूप की समानता के कारण, सृष्टि-चक्र की पुनरावृत्ति में भी कोई विरोध नहीं है — यह तथ्य प्रत्यक्ष श्रुति और स्मृति दोनों में देखा जाता है।
श्लोक 1.95
मध्वादिष्व् असंभवाद् अनधिकारं जैमिनिः ॥ ३० ॥
madhvādiṣv asaṁbhavād anadhikāraṁ jaiminiḥ || 30 ||
जैमिनि आचार्य के मत में मधु-विद्या आदि के विशिष्ट सन्दर्भों में कुछ विशेष बातें देवताओं के लिए असम्भव होने के कारण अनधिकार (अयोग्यता) है।
श्लोक 1.96
ज्योतिषि भावाच् च ॥ ३१ ॥
jyotiṣi bhāvāc ca || 31 ||
और इसलिए भी कि उनका सम्बन्ध ज्योति (यज्ञाग्नि) में ही विशेष रूप से बताया गया है।
श्लोक 1.97
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ ३२ ॥
bhāvaṁ tu bādarāyaṇo'sti hi || 32 ||
किन्तु बादरायण आचार्य के मत में वह सम्भावना (अधिकार) वस्तुतः विद्यमान है — अर्थात् देवता यहाँ भी अपात्र नहीं ठहरते; यही अन्तिम/सिद्धान्त-मत है। इस प्रकार देवताधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.98
शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ ३३ ॥
śugasya tadanādaraśravaṇāt tadādravaṇāt sūcyate hi || 33 ||
[विषय: वेदान्त-ज्ञान का अधिकारी कौन है — छान्दोग्य की रैक्व-कथा] जनश्रुति को हंसों द्वारा 'शूद्र' कहकर सम्बोधित किए जाने पर उसे हुए शोक को सुनने से, तथा उसके रैक्व की ओर दौड़ पड़ने से ही यह संकेत मिलता है कि जनश्रुति वस्तुतः शूद्र नहीं था — एक वास्तविक शूद्र को न तो ऐसा दुःख होता, न ही वह ब्रह्मविद्या के लिए इस प्रकार व्याकुल होकर दौड़ता।
श्लोक 1.99
क्षत्रियत्वगतेश् च ॥ ३४ ॥
kṣatriyatvagateś ca || 34 ||
और इसलिए भी कि कथा में उसका क्षत्रिय (राजा) होना स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है।
श्लोक 1.100
उत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ ३५ ॥
uttaratra caitrarathena liṅgāt || 35 ||
और आगे उसी कथा में 'चैत्ररथ' के उल्लेख से भी यह लिंग (चिह्न) मिलता है, जो उसकी उच्च वर्ण-स्थिति को पुष्ट करता है।
श्लोक 1.101
संस्कारपरामर्शात् तदभावाभिलापाच् च ॥ ३६ ॥
saṁskāraparāmarśāt tadabhāvābhilāpāc ca || 36 ||
और इसलिए भी कि अन्यत्र द्विजों के लिए किए जाने वाले संस्कारों का उल्लेख है, तथा शूद्र में उनके अभाव का स्पष्ट कथन भी है — शास्त्र सामान्यतः शूद्र को ऐसी विद्या से वंचित मानता है।
श्लोक 1.102
तद्भावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ ३७ ॥
tadbhāvanirdhāraṇe ca pravṛtteḥ || 37 ||
और इसलिए भी कि शास्त्र अन्यत्र किसी की वर्ण-स्थिति के निर्धारण में सचेत रूप से प्रवृत्त होता है — यह दर्शाता है कि यह भेद सच में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
श्लोक 1.103
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् ॥ ३८ ॥
śravaṇādhyayanārthapratiṣedhāt || 38 ||
क्योंकि शूद्र को वेद सुनने और अध्ययन करने के प्रयोजन से स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया गया है।
श्लोक 1.104
स्मृतेश् च ॥ ३९ ॥
smṛteś ca || 39 ||
और इसकी पुष्टि स्मृति-ग्रन्थों से भी होती है। इस प्रकार अपशूद्राधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.105
कम्पनात् ॥ ४० ॥
kampanāt || 40 ||
[विषय: कौषीतकि-सम्बद्ध श्रुति में वर्णित, जिसके भय से 'सम्पूर्ण जगत् काँपता है', 'महान् भय, उठा हुआ वज्र' कहा गया है — वह कौन है?] यह ब्रह्म ही है — क्योंकि पूर्व और उत्तर के प्रसंग में स्पष्ट रूप से ब्रह्म का ही निर्देश है, और अन्यत्र भी ('जिसके भय से अग्नि जलता है, सूर्य तपता है' इत्यादि) यही कहा गया है कि सम्पूर्ण जगत् केवल ब्रह्म के भय से ही अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त रहता है, न कि केवल वायु के भय से।
श्लोक 1.106
ज्योतिर् दर्शनात् ॥ ४१ ॥
jyotir darśanāt || 41 ||
[विषय: एक अन्य 'ज्योति' प्रसंग] यह प्रकाश भी ब्रह्म ही है, क्योंकि उसे ब्रह्म के गुणों सहित प्रत्यक्ष रूप से देखा/वर्णित किया गया है।
श्लोक 1.107
आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ ४२ ॥
ākāśo'rthāntaratvādivyapadeśāt || 42 ||
[विषय: एक अन्य 'आकाश' प्रसंग] यह आकाश भी ब्रह्म ही है, क्योंकि उसे साधारण भौतिक आकाश से भिन्न वस्तु (अर्थान्तर) होने आदि का स्पष्ट कथन प्राप्त है।
श्लोक 1.108
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर् भेदेन ॥ ४३ ॥
suṣuptyutkrāntyor bhedena || 43 ||
[विषय: बृहदारण्यक के अजातशत्रु-बालाकि संवाद में वर्णित नियन्ता] यह तत्त्व ब्रह्म ही है, क्योंकि सुषुप्ति (गहरी नींद) और उत्क्रान्ति (मृत्यु के समय शरीर-त्याग) दोनों अवस्थाओं में जीव से भेद करके उस नियन्ता का वर्णन किया गया है — वह जीव की इन बदलती अवस्थाओं से परे, अपरिवर्तित रहता है।
श्लोक 1.109
पत्यादिशब्देभ्यः ॥ ४४ ॥
patyādiśabdebhyaḥ || 44 ||
और 'पति' (स्वामी) आदि शब्दों के कारण भी यह सिद्ध होता है — उस नियन्ता को जीव का स्वामी/नियन्ता कहा गया है, जो केवल ब्रह्म का ही धर्म है। इस प्रकार पाद ३ समाप्त होता है।
श्लोक 1.110
आनुमानिकम् अप्य् एकेषाम् इति चेन् न शरीर-रूपक-विन्यस्त-गृहीतेर् दर्शयति च ॥ १ ॥
ānumānikam apy ekeṣām iti cen na śarīra-rūpaka-vinyasta-gṛhīter darśayati ca || 1 ||
[विषय: क्या कठोपनिषद् का रथ-रूपक सांख्य के प्रधान की शिक्षा देता है?] यदि कहा जाए कि वहाँ वर्णित 'अव्यक्त' कुछ आचार्यों के मत में सांख्य के अनुमान-सिद्ध प्रधान ही है — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि वह अव्यक्त उसी प्रसंग में शरीर के रूपक (रथ की उपमा) में रखे जाने के कारण उस रूपक के अनुरूप ही ग्रहण किया गया है, और शास्त्र अन्यत्र भी इसे इसी प्रकार दर्शाता है।
श्लोक 1.111
सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ २ ॥
sūkṣmaṁ tu tadarhatvāt || 2 ||
किन्तु 'सूक्ष्म' शब्द से यहाँ उस तत्त्व का सूक्ष्म-शरीर (अथवा सूक्ष्म कारण-अवस्था) होना अभिप्रेत है, क्योंकि यह उसी रथ-रूपक की श्रेणीबद्ध संरचना के लिए उपयुक्त है।
श्लोक 1.112
तदधीनत्वाद् अर्थवत् ॥ ३ ॥
tadadhīnatvād arthavat || 3 ||
क्योंकि वह अव्यक्त, सूक्ष्म-शरीर के रूप में भी, उसी ब्रह्म के अधीन है — सांख्य के स्वतन्त्र प्रधान की भाँति स्वतन्त्र नहीं — इसलिए यह व्याख्या सार्थक (अर्थवत्) है।
श्लोक 1.113
ज्ञेयत्वावचनाच् च ॥ ४ ॥
jñeyatvāvacanāc ca || 4 ||
और इसलिए भी कि उस प्रसंग में अव्यक्त को ज्ञातव्य (जानने योग्य वस्तु, जिसका विवेकपूर्वक ज्ञान मुक्ति का साधन हो) के रूप में नहीं कहा गया है, जैसा सांख्य के प्रधान के लिए आवश्यक होता।
श्लोक 1.114
वदतीति चेन् न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ ५ ॥
vadatīti cen na prājño hi prakaraṇāt || 5 ||
यदि कहा जाए कि वहाँ 'प्राज्ञ' (बुद्धिमान्) शब्द अव्यक्त के लिए प्रयुक्त हुआ है (इसलिए यह किसी चेतन तत्त्व का बोधक है) — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि 'प्राज्ञ' शब्द प्रसंगवश साधक (जिज्ञासु) के लिए है, अव्यक्त के लिए नहीं।
श्लोक 1.115
त्रयाणाम् एव चैवम् उपन्यासः प्रश्नश् च ॥ ६ ॥
trayāṇām eva caivam upanyāsaḥ praśnaś ca || 6 ||
और इस प्रकार, नचिकेता द्वारा किए गए प्रश्न और उसके उत्तर में किया गया प्रस्तुतीकरण भी उन्हीं तीन मूल विषयों से सम्बद्ध हैं — अलग से सांख्य के प्रधान का कोई स्वतन्त्र प्रसंग नहीं है।
श्लोक 1.116
महद्वच् च ॥ ७ ॥
mahadvac ca || 7 ||
और जैसे उसी प्रसंग में प्रयुक्त 'महत्' शब्द सांख्य के तकनीकी 'महत्-तत्त्व' का नहीं, बल्कि साधारण बुद्धि का ही वाचक है, वैसे ही 'अव्यक्त' भी सांख्य के स्वतन्त्र प्रधान का वाचक नहीं है। इस प्रकार आनुमानिकाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.117
चमसवदविशेषात् ॥ ८ ॥
camasavadaviśeṣāt || 8 ||
[विषय: तकनीकी शब्द प्रसंगानुसार अर्थ बदलते हैं] जैसे स्मृति/कर्मकाण्ड में प्रयुक्त 'चमस' शब्द प्रसंगानुसार भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकता है, बिना किसी असंगति के, वैसे ही यहाँ भी वेदान्त के प्रसंग में सांख्य-शब्दावली का प्रयोग होने पर भी कोई विशेष बाधा नहीं है।
श्लोक 1.118
ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्य् अधीयत एके ॥ ९ ॥
jyotirupakramā tu tathā hy adhīyata eke || 9 ||
किन्तु इस रथ-रूपक वाले प्रसंग को कुछ शाखाओं में 'ज्योति' (प्रकाश) से आरम्भ होने वाला भी पढ़ा जाता है — ऐसा कुछ वैदिक शाखाओं के अनुयायी अध्ययन करते हैं, जो प्रारम्भ से ही ब्रह्म की ओर संकेत करता है।
श्लोक 1.119
कल्पनोपदेशाच् च मध्वादिवदविरोधः ॥ १० ॥
kalpanopadeśāc ca madhvādivadavirodhaḥ || 10 ||
और इसलिए भी कि यहाँ एक विशेष रचना (क्रमबद्ध योजना) का उपदेश है, जैसे मधु-विद्या आदि में — जैसे मधु-विद्या की क्रमबद्ध योजना में कोई विरोध नहीं, वैसे ही यहाँ भी नहीं। इस प्रकार चमसाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.120
न संख्योपसंग्रहादपि ज्ञानाभावाद् अतिरेकाच् च ॥ ११ ॥
na saṁkhyopasaṁgrahādapi jñānābhāvād atirekāc ca || 11 ||
[विषय: क्या एक अन्य उपनिषद्-सूची सांख्य के २५ तत्त्वों की गिनती स्थापित करती है?] नहीं — एक अन्य उपनिषद्-सूची में तत्त्वों की गिनती सांख्य के २५ तत्त्वों से मिलती-जुलती दिखने पर भी, वह सांख्य का प्रधान/तत्त्व-गणना नहीं है, क्योंकि उस सांख्य-प्रकार के विवेक-ज्ञान का कहीं उल्लेख नहीं, और उस सूची में सांख्य के २५ से अधिक तत्त्व भी सम्मिलित हैं।
श्लोक 1.121
प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १२ ॥
prāṇādayo vākyaśeṣāt || 12 ||
और प्राण आदि अतिरिक्त तत्त्व भी उसी सूची में वाक्य-शेष (शेष/समापन-भाग) में गिनाए गए हैं — जो सांख्य की निश्चित २५-संख्या में समाहित नहीं होते।
श्लोक 1.122
ज्योतिषैकेषाम् असत्यन्ने ॥ १३ ॥
jyotiṣaikeṣām asatyanne || 13 ||
और कुछ शाखाओं में यह गणना 'ज्योति' के सन्दर्भ में है, अन्न के उल्लेख के बिना — अर्थात् विभिन्न शाखाओं में यह गणना भिन्न-भिन्न रूप से पाई जाती है, जो इसे सांख्य की स्थिर तकनीकी गणना से पृथक् दर्शाती है। इस प्रकार यह अधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.123
कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १४ ॥
kāraṇatvena cākāśādiṣu yathāvyapadiṣṭokteḥ || 14 ||
[विषय: ब्रह्म ही समस्त तत्त्वों का एकमात्र कारण है] और इसलिए भी कि ब्रह्म का आकाश आदि तत्त्वों के प्रति कारणत्व उसी प्रकार वर्णित है जैसे अन्यत्र (तैत्तिरीय आदि में क्रमिक सृष्टि के वर्णन में) स्पष्ट रूप से कहा गया है — अर्थात् ब्रह्म ही आकाश आदि सबका एकमात्र कारण है, कोई पृथक् प्रधान नहीं।
श्लोक 1.124
समाकर्षात् ॥ १५ ॥
samākarṣāt || 15 ||
और इसलिए भी कि इस विषय का सम्बन्ध पूर्व प्रसंग से समाकर्षण (खींचकर जोड़ने) द्वारा भी जुड़ता है — जिससे यह निरन्तरता ब्रह्म ही एकमात्र कारण होने की पुष्टि करती है। इस प्रकार कारणत्वाधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.125
जगद्वाचित्वात् ॥ १६ ॥
jagadvācitvāt || 16 ||
[विषय: कौषीतकि उपनिषद् के बालाकि-अजातशत्रु संवाद में, 'जो इन पुरुषों का कर्ता है, जिसका यह कर्म है, वही जानने योग्य है'] इस वाक्य में 'यह कर्म' शब्द सम्पूर्ण जगत् का वाचक है (किसी विशिष्ट, पहले से उल्लिखित वस्तु का नहीं, बल्कि शेष-न्याय से समस्त अखण्ड जगत् का) — अतः इस अखण्ड जगत् का कर्ता केवल परमेश्वर ही हो सकता है, जीव या मुख्य प्राण नहीं।
श्लोक 1.126
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान् नेति चेत् तद्व्याख्यातम् ॥ १७ ॥
jīvamukhyaprāṇaliṅgān neti cet tadvyākhyātam || 17 ||
यदि कहा जाए कि इस प्रसंग में जीव और मुख्य प्राण के चिह्न पाए जाने से यह ब्रह्म नहीं है — तो इसका उत्तर पहले ही (सूत्र १.१.३२ में) दिया जा चुका है।
श्लोक 1.127
अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् अपि चैवम् एके ॥ १८ ॥
anyārthaṁ tu jaiminiḥ praśnavyākhyānābhyām api caivam eke || 18 ||
किन्तु जैमिनि आचार्य के मत में इस प्रसंग का अन्य ही प्रयोजन है, प्रश्न और उसके स्पष्टीकरण दोनों के आधार पर — और कुछ अन्य आचार्य भी इसी मत के हैं। इस प्रकार बालाक्यधिकरण समाप्त होता है।
श्लोक 1.128
वाक्यान्वयात् ॥ १९ ॥
vākyānvayāt || 19 ||
[विषय: बृहदारण्यक की मैत्रेयी-कथा में वर्णित आत्मा अन्ततः किसे कहता है?] वह आत्मा ब्रह्म ही है, क्योंकि वाक्य के अन्वय (सम्पूर्ण वाक्य की तार्किक संगति/एकता) की दृष्टि से यही निष्कर्ष निकलता है — सम्पूर्ण प्रसंग की सुसंगति एकमात्र ब्रह्म को ही अन्तिम प्रतिपाद्य मानने पर ही सिद्ध होती है।
श्लोक 1.129
प्रतिज्ञासिद्धेर् लिङ्गम् आश्मरथ्यः ॥ २० ॥
pratijñāsiddher liṅgam āśmarathyaḥ || 20 ||
आश्मरथ्य आचार्य के मत में यह वाक्यार्थ की संगति आरम्भ में की गई प्रतिज्ञा ('एक को जानने से सब जाना जाता है') की सिद्धि का चिह्न है।
श्लोक 1.130
उत्क्रमिष्यत एवं भावाद् इत्य् औडुलोमिः ॥ २१ ॥
utkramiṣyata evaṁ bhāvād ity auḍulomiḥ || 21 ||
औडुलोमि आचार्य के मत में यह इसलिए है क्योंकि शरीर से उत्क्रमण (प्रस्थान) करने वाले जीव की उसी ब्रह्म रूप में सत्ता वर्णित है।
श्लोक 1.131
अवस्थितेर् इति काशकृत्स्नः ॥ २२ ॥
avasthiter iti kāśakṛtsnaḥ || 22 ||
काशकृत्स्न आचार्य के मत में यह ब्रह्म की जीव में सदा-स्थिति (नित्य अवस्थिति) के कारण है — अर्थात् जीव सदा से ही, बिना किसी नई प्राप्ति के, स्वयं ब्रह्म ही है। इस प्रकार वाक्यान्वयाधिकरण समाप्त होता है, जिसमें तीन आचार्य एक ही निष्कर्ष के लिए पूरक तर्क देते हैं।
श्लोक 1.132
प्रकृतिश् च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॥ २३ ॥
prakṛtiś ca pratijñādṛṣṭāntānuparodhāt || 23 ||
[विषय: क्या ब्रह्म जगत् का उपादान-कारण भी है?] और ब्रह्म ही जगत् का उपादान-कारण (जिस वस्तु से जगत् बना है, वह मूल सामग्री, प्रकृति) भी है, क्योंकि छान्दोग्य में दी गई प्रतिज्ञा और दृष्टान्त (जैसे मिट्टी के दृष्टान्त) से यही तात्पर्य स्पष्ट होता है, इसमें कोई विरोध नहीं — अर्थात् ब्रह्म ही निमित्त (कर्ता) और उपादान (सामग्री), दोनों कारण एक साथ है।
श्लोक 1.133
अभिध्योपदेशाच् च ॥ २४ ॥
abhidhyopadeśāc ca || 24 ||
और इसलिए भी कि ब्रह्म की स्वयं इच्छा/संकल्प ('वह इच्छा करे, मैं बहुत हो जाऊँ') का उपदेश है — एक चेतन तत्त्व का स्वयं इच्छा करके अपने ही आप को जगत् के रूप में परिणत करना, किसी बाह्य सामग्री (जैसे सांख्य के स्वतन्त्र प्रधान) की आवश्यकता नहीं रखता।
श्लोक 1.134
साक्षाच् चोभयाम्नानात् ॥ २५ ॥
sākṣāc cobhayāmnānāt || 25 ||
और इसलिए भी कि ब्रह्म के निमित्त-कारण और उपादान-कारण, दोनों का प्रत्यक्ष एवं साथ-साथ उल्लेख शास्त्र में मिलता है — किसी अन्य, पृथक् उपादान की कल्पना के लिए कोई अवकाश नहीं रहता।
श्लोक 1.135
आत्मकृतेः ॥ २६ ॥
ātmakṛteḥ || 26 ||
क्योंकि जगत् अपने ही (ब्रह्म के अपने) स्वरूप से बनाया गया कहा गया है — शास्त्र वर्णन करता है कि ब्रह्म ने अपने ही आप से जगत् को रचा।
श्लोक 1.136
परिणामात् ॥ २७ ॥
pariṇāmāt || 27 ||
क्योंकि शास्त्र इस सृष्टि-प्रक्रिया को परिणाम (वास्तविक रूपान्तरण) के रूप में वर्णित करता है — ब्रह्म वस्तुतः स्वयं जगत् के रूप में परिणत होता है (यद्यपि अन्ततः यह परिणाम ब्रह्म की माया-शक्ति के स्तर पर होता है, ब्रह्म के स्वरूप में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं)।
श्लोक 1.137
योनिश् च हि गीयते ॥ २८ ॥
yoniś ca hi gīyate || 28 ||
और ब्रह्म को शास्त्र में जगत् के स्रोत/योनि (उद्गम) के रूप में भी गाया/स्तुत किया गया है। इस प्रकार प्रकृत्यधिकरण समाप्त होता है, जिसमें ब्रह्म को जगत् का निमित्त और उपादान दोनों कारण सिद्ध किया गया है।
श्लोक 1.138
एतेन सर्वे व्याख्याताः ॥ २९ ॥
etena sarve vyākhyātāḥ || 29 ||
इसी (अब तक के विवेचन) के द्वारा उपनिषदों के अन्य सभी समान, सृष्टि-कारण-विषयक वाक्यों की भी व्याख्या हो जाती है — यही सिद्धान्त शेष सभी ऐसे प्रसंगों पर भी समान रूप से लागू होता है। इस प्रकार 'समन्वय' नामक प्रथम अध्याय समाप्त होता है।
श्लोक 2.1
स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन् नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ॥ १ ॥
smṛtyanavakāśadoṣaprasaṅga iti cen nānyasmṛtyanavakāśadoṣaprasaṅgāt || 1 ||
पूर्वपक्ष: यदि ब्रह्म ही जगत् का एकमात्र कारण माना जाए तो सांख्य-स्मृति (जो प्रधान को स्वतंत्र कारण मानती है) के लिए कोई अवकाश नहीं रहेगा, यह दोष है। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि यदि इसके विपरीत प्रधान को कारण मान लिया जाए तो ईश्वर-कारणवादी अन्य स्मृतियों (जैसे मनुस्मृति) के लिए भी अवकाश न रहने का वही दोष उपस्थित होगा। अतः यह आक्षेप निर्णायक नहीं है।
श्लोक 2.2
इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ ॥
itareṣāṁ cānupalabdheḥ || 2 ||
और सांख्य के अन्य सिद्धांत (जैसे प्रधान से महत् आदि तत्त्वों की उत्पत्ति) न तो वेद में और न लोक-प्रत्यक्ष में कहीं उपलब्ध होते हैं, अतः सांख्य-स्मृति स्वयं प्रमाणहीन है।
श्लोक 2.3
एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ ३ ॥
etena yogaḥ pratyuktaḥ || 3 ||
इसी युक्ति से योग-दर्शन का भी खण्डन हो जाता है, क्योंकि वह भी ईश्वर के साथ-साथ प्रधान को स्वतंत्र उपादान कारण मानता है।
श्लोक 2.4
न विलक्षणत्वाद् अस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ ४ ॥
na vilakṣaṇatvād asya tathātvaṁ ca śabdāt || 4 ||
पूर्वपक्ष: जगत् (कार्य) ब्रह्म से सर्वथा विलक्षण (जड़, अशुद्ध) है, अतः विलक्षण कार्य विलक्षण कारण से उत्पन्न नहीं हो सकता, जैसा लोक में देखा जाता है (मिट्टी से मिट्टी के ही विकार बनते हैं)। किन्तु यह विलक्षणता श्रुति (शब्द) से भी सिद्ध होती है - श्रुति स्वयं चेतन कारण और अचेतन कार्य का भेद बताती है; अतः यह विषय शब्द-प्रमाण (आगे के सूत्रों) से ही निर्णीत होना है, तर्क से नहीं।
श्लोक 2.5
अभिमानिव्यपदेशस् तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ ५ ॥
abhimānivyapadeśas tu viśeṣānugatibhyām || 5 ||
जहाँ श्रुति में मिट्टी, जल, वाणी आदि जड़ भूतों और इन्द्रियों के लिए 'बोलना', 'ईक्षण करना' जैसे चेतन-सुलभ व्यवहार कहे गए हैं (जैसे 'मृदा ने कहा'), वे वस्तुतः उन भूतों-इन्द्रियों में अधिष्ठित चेतन अभिमानी देवताओं के कथन हैं, न कि स्वयं जड़ तत्त्वों के - क्योंकि इतिहास-पुराणादि में इसके विशेष उल्लेख हैं और यह अभिमानी-देवता-भाव अनेक स्थलों में सतत अनुगत मिलता है।
श्लोक 2.6
दृश्यते तु ॥ ६ ॥
dṛśyate tu || 6 ||
और यह भी देखा जाता है कि लोक में चेतन-प्रसिद्ध पुरुषादि से केश-नख जैसे जड़ विकार उत्पन्न होते हैं, तथा जड़-प्रसिद्ध गोबर आदि से वृश्चिक जैसे सचेतन जीव उत्पन्न होते हैं - अतः कारण और कार्य में सर्वथा सादृश्य ही होना आवश्यक नहीं; इसलिए मात्र विलक्षणता के आधार पर चेतन ब्रह्म को जगत् का कारण मानने में कोई बाधा नहीं है।
श्लोक 2.7
असद् इति चेन् न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ ७ ॥
asad iti cen na pratiṣedhamātratvāt || 7 ||
पूर्वपक्ष: श्रुति कहती है 'यह सृष्टि से पहले असत् था' - इससे प्रतीत होता है कि कार्य उत्पत्ति से पूर्व असत् (अविद्यमान) था। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि यह 'असत्' शब्द केवल निषेधमात्र है (व्याकृत नाम-रूप का निषेध), सर्वथा अभाव का वाचक नहीं; कार्य उत्पत्ति से पूर्व भी कारण-रूप से विद्यमान ही रहता है।
श्लोक 2.8
अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गाद् असमञ्जसम् ॥ ८ ॥
apītau tadvatprasaṅgād asamañjasam || 8 ||
पूर्वपक्ष: यदि कार्य (जगत्) कारण (ब्रह्म) से अभिन्न है, तो प्रलयकाल में जब कार्य कारण में लीन होगा, तब कार्य के स्थूलत्व-अशुद्धि आदि धर्म भी कारण को दूषित कर देंगे; और प्रलय में सम्पूर्ण भेद के अविभक्त हो जाने पर पुनः सृष्टि में भोक्ता-भोग्य के नियत विभाग का कोई कारण न रहेगा, तथा मुक्त जीवों के भी पुनः बंधन में पड़ने का प्रसंग आएगा - अतः यह सिद्धांत असंगत (असमञ्जस) है।
श्लोक 2.9
न तु दृष्टान्तभावात् ॥ ९ ॥
na tu dṛṣṭāntabhāvāt || 9 ||
सिद्धांत: यह दोष नहीं है, क्योंकि दृष्टांत विद्यमान हैं - जैसे मिट्टी के विकार (सकोरे आदि) प्रलय में पुनः मिट्टी में मिलकर भी मिट्टी को अपने धर्मों से दूषित नहीं करते, वैसे ही कार्य-जगत् भी प्रलय में ब्रह्म में लीन होकर भी उसे दूषित नहीं करता; कार्य और उसके धर्म अविद्या-कल्पित होने से ही यह सम्भव है, ठीक वैसे ही जैसे मायावी अपनी फैलाई माया से स्वयं लिप्त नहीं होता।
श्लोक 2.10
स्वपक्षदोषाच् च ॥ १० ॥
svapakṣadoṣāc ca || 10 ||
और यह दोष सांख्य के अपने पक्ष में भी समान रूप से उपस्थित है - प्रधान भी अपने कार्यों से अभिन्न मानते हुए प्रलय में यही दोष सांख्य को भी लगेगा; अतः यह किसी एक पक्ष का विशेष दोष नहीं, दोनों पक्षों को अनिवार्यतः स्वीकार करना पड़ता है।
श्लोक 2.11
तर्काप्रतिष्ठानाद् अपि ॥ ११ ॥
tarkāpratiṣṭhānād api || 11 ||
और इसलिए भी [ब्रह्म-कारणवाद अक्षुण्ण है] कि केवल मानवीय तर्क अप्रतिष्ठित है - निरागम, कोरी कल्पना पर आधारित तर्क कभी स्थिर निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, क्योंकि एक व्यक्ति की युक्ति को दूसरा अधिक कुशल व्यक्ति खण्डित कर देता है; अतः अतीन्द्रिय जगत्-कारण के विषय में शास्त्र (श्रुति) ही अंतिम प्रमाण है, केवल तर्क नहीं। (प्रसिद्ध सूत्र: तर्काप्रतिष्ठानात्)
श्लोक 2.12
अन्यथानुमेयम् इति चेद् एवम् अप्य् अनिर्मोक्षप्रसङ्गः ॥ १२ ॥
anyathānumeyam iti ced evam apy anirmokṣaprasaṅgaḥ || 12 ||
पूर्वपक्ष: तो हम अन्यथा अनुमान करेंगे, जिससे तर्क की अप्रतिष्ठा का दोष न आए। सिद्धांत: फिर भी अनुमान की अनिश्चितता के कारण किसी-न-किसी तर्क-विषय में अनिश्चय बना ही रहेगा और सम्यक् ज्ञान के अभाव में मोक्ष की असंभावना (अनिर्मोक्ष) का प्रसंग बना रहेगा; अतः तर्क कभी भी आत्यंतिक निश्चय व मोक्ष का साधन नहीं हो सकता।
श्लोक 2.13
एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ १३ ॥
etena śiṣṭāparigrahā api vyākhyātāḥ || 13 ||
इसी युक्ति से अणुवाद आदि वे अन्य कारण-सिद्धांत भी खण्डित समझे जाने चाहिए जिन्हें मनु-व्यास जैसे वेदानुसारी शिष्टजनों ने भी किसी अंश में स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनके खण्डन का कारण (अतिगम्भीर विषय में तर्क की अप्रतिष्ठा, आगम-विरोध आदि) प्रधान-कारणवाद के खण्डन-कारण के समान ही है।
श्लोक 2.14
भोक्त्रापत्तेर् अविभागश् चेत् स्याल् लोकवत् ॥ १४ ॥
bhoktrāpatter avibhāgaś cet syāl lokavat || 14 ||
पूर्वपक्ष: यदि ब्रह्म ही अभिन्न रूप से जगत् का कारण है तो भोक्ता (जीव) और भोग्य (विषय) का लोक-प्रसिद्ध भेद मिट जाएगा - भोक्ता भोग्य बन जाएगा या भोग्य भोक्ता, क्योंकि दोनों उसी एक ब्रह्म से अभिन्न हैं। सिद्धांत: जैसे लोक में समुद्र और उसकी तरंगों-बुलबुलों में परस्पर भेद-व्यवहार बना रहता है यद्यपि सब जल से अभिन्न हैं, वैसे ही यहाँ भी भोक्ता-भोग्य भेद उपपन्न हो सकता है।
श्लोक 2.15
तदनन्यत्वम् आरम्भणशब्दादिभ्यः ॥ १५ ॥
tadananyatvam ārambhaṇaśabdādibhyaḥ || 15 ||
यह भोक्ता-भोग्य आदि सम्पूर्ण जगत्-प्रपञ्च वस्तुतः अपने कारण ब्रह्म से सर्वथा अभिन्न ही है (लौकिक विभाग केवल व्यावहारिक है), क्योंकि छान्दोग्य की 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' जैसी 'आरम्भण' आदि श्रुतियाँ यही सिखाती हैं कि विकार केवल वाणी द्वारा कल्पित नाम है, सत्य तो एकमात्र कारण (मिट्टी/ब्रह्म) ही है।
श्लोक 2.16
भावे चोपलब्धेः ॥ १६ ॥
bhāve copalabdheḥ || 16 ||
और इसलिए भी कार्य का कारण से अभेद है कि कार्य की उपलब्धि सदा कारण के होने पर ही होती है, कारण के अभाव में नहीं - जैसे मिट्टी होने पर ही घट की उपलब्धि होती है; यह नियत सह-भाव ही कार्य-कारण के अभेद का प्रमाण है।
श्लोक 2.17
सत्वाच् चापरस्य ॥ १७ ॥
satvāc cāparasya || 17 ||
और इसलिए भी कि उत्तरकालिक कार्य का 'सत्' (अस्तित्व) उत्पत्ति से पहले भी कारण-रूप में श्रुति द्वारा कहा गया है ('सदेव सोम्येदमग्र आसीत्') - जो जिस रूप में कहीं नहीं रहता, वह उससे उत्पन्न नहीं होता; अतः उत्पत्ति के पूर्व भी कार्य का कारण से अनन्यत्व होने से, उत्पन्न होने पर भी वह कारण से अनन्य ही रहता है।
श्लोक 2.18
असद्व्यपदेशान् नेति चेन् न धर्मान्तरेण वाक्यशेषाद्युक्तेः शब्दान्तराच् च ॥ १८ ॥
asadvyapadeśān neti cen na dharmāntareṇa vākyaśeṣādyukteḥ śabdāntarāc ca || 18 ||
पूर्वपक्ष: कहीं श्रुति उत्पत्ति-पूर्व कार्य को 'असत्' भी कहती है ('असदेवेदमग्र आसीत्'), अतः कार्य का उत्पत्ति-पूर्व सत्त्व सिद्ध नहीं। सिद्धांत: नहीं, यह 'असत्' कथन धर्मान्तर (व्याकृत नाम-रूप का अभाव) की अपेक्षा से है, वाक्य-शेष से यही स्पष्ट होता है ('तत् सत् आसीत्'); तथा युक्ति से भी (दधि आदि विशिष्ट कार्य विशिष्ट कारण-द्रव्य से ही उत्पन्न होते हैं, सर्वत्र नहीं) और अन्य श्रुति-वाक्यों से भी कार्य का प्रागुत्पत्ति-सत्त्व एवं कारण से अनन्यत्व सिद्ध होता है।
श्लोक 2.19
पटवच् च ॥ १९ ॥
paṭavac ca || 19 ||
और जैसे लपेटा हुआ वस्त्र अस्पष्ट होने पर भी वही वस्त्र फैलाने पर स्पष्ट दिखता है (वह भिन्न वस्तु नहीं बनता), वैसे ही सूत्रादि कारण-अवस्था में अस्पष्ट रहने वाला कार्य बुनकर आदि के व्यापार से केवल अभिव्यक्त होता है, नया उत्पन्न नहीं होता - इस प्रकार भी कार्य का कारण से अनन्यत्व सिद्ध है।
श्लोक 2.20
यथा च प्राणादिः ॥ २० ॥
yathā ca prāṇādiḥ || 20 ||
और जैसे प्राणायाम में रुके हुए प्राण-अपानादि केवल जीवनमात्र (कारण-रूप) कार्य करते हैं और उन्हीं की पुनः प्रवृत्ति होने पर संकोच-विस्तारादि अधिक कार्य करते हैं, परन्तु वे भिन्न वायु नहीं बनते - वैसे ही कार्य सदा कारण से अभिन्न रहते हुए भी विभिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकट होता है। अतः 'जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है' यह श्रौत प्रतिज्ञा सिद्ध होती है - सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म का कार्य होने से उससे अनन्य है।
श्लोक 2.21
इतरव्यपदेशाद् धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ॥ २१ ॥
itaravyapadeśād dhitākaraṇādidoṣaprasaktiḥ || 21 ||
पूर्वपक्ष: यदि जीव और ब्रह्म एक ही (चेतन) तत्त्व हैं (जैसा 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियाँ कहती हैं), तो स्वतंत्र कर्ता होते हुए भी जीव अपने लिए अहितकर जन्म-मृत्यु-जरा-रोगादि दुःखमय सृष्टि क्यों रचता, हितकर सुखमय सृष्टि ही क्यों न रचता? कोई भी स्वतंत्र व्यक्ति स्वयं के लिए बंधन का घर नहीं बनाता - अतः चेतन कारणवाद में यह दोष प्राप्त होता है।
श्लोक 2.22
अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २२ ॥
adhikaṁ tu bhedanirdeśāt || 22 ||
सिद्धांत: यह दोष हमारे मत में नहीं लगता, क्योंकि जिसे हम जगत् का स्रष्टा कहते हैं वह नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ब्रह्म है, जो जीव से अधिक (भिन्न) है - यह श्रुति में कर्ता-कर्म आदि के भेद-निर्देश ('आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः...') से स्पष्ट है; उस ब्रह्म को न कुछ हित करना है, न अहित टालना है (नित्यमुक्त होने से), अतः उसमें हिताकरण आदि दोष का कोई प्रसंग नहीं।
श्लोक 2.23
अश्मादिवच् च तदनुपपत्तिः ॥ २३ ॥
aśmādivac ca tadanupapattiḥ || 23 ||
और जैसे एक ही पृथ्वी-जाति के पत्थरों में भी हीरा-वैडूर्य जैसे बहुमूल्य और साधारण पाषाण जैसा भेद होता है, एक ही बीज-जाति से भी चन्दन-किंपाक जैसे विचित्र वृक्ष उगते हैं, एक ही अन्न-रस से भी लोहित रक्त और केश जैसे विचित्र कार्य बनते हैं - वैसे ही एक ब्रह्म से भी जीव-ईश्वर का भेद और कार्य-वैचित्र्य उपपन्न हो सकता है; अतः विरोधियों द्वारा कल्पित दोष अनुपपन्न है।
श्लोक 2.24
उपसंहारदर्शनान् नेति चेन् न क्षीरवद् धि ॥ २४ ॥
upasaṁhāradarśanān neti cen na kṣīravad dhi || 24 ||
पूर्वपक्ष: लोक में देखा जाता है कि कुम्हार आदि कर्ता मिट्टी, चाक, डंडा, जल आदि अनेक बाह्य साधनों को एकत्र करके ही घट आदि कार्य करते हैं; किन्तु ब्रह्म तो असहाय (साधन-रहित) है, तो वह बिना किसी बाह्य साधन के जगत् कैसे रच सकता है? सिद्धांत: यह दोष नहीं, क्योंकि जैसे दूध या जल बिना किसी बाह्य साधन के अपने स्वभाव से ही दही या बर्फ के रूप में परिणत हो जाता है, वैसे ही सर्वशक्तिसम्पन्न ब्रह्म भी अपनी विचित्र स्वाभाविक शक्ति से ही, बाह्य साधन की अपेक्षा किए बिना, जगत् की रचना कर सकता है।
श्लोक 2.25
देवादिवद् अपि लोके ॥ २५ ॥
devādivad api loke || 25 ||
और लोक में भी देखा जाता है कि देव-पितृ-ऋषि आदि महाप्रभावशाली चेतन सत्ताएँ भी बिना किसी बाह्य साधन के, केवल संकल्प-मात्र से अनेक भवन-रथ आदि की रचना कर देती हैं; मकड़ी स्वयं अपने शरीर से तन्तु उत्पन्न करती है - वैसे ही चेतन ब्रह्म भी बिना बाह्य साधन के स्वतः जगत् की रचना कर सकता है।
श्लोक 2.26
कृत्स्नप्रसक्तिर् निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २६ ॥
kṛtsnaprasaktir niravayavatvaśabdakopo vā || 26 ||
पूर्वपक्ष: यदि निरवयव (अंशरहित) ब्रह्म स्वयं परिणत होकर जगत् बनता है, तो चूँकि उसका कोई अंश नहीं जो अपरिणत रह सके, इसलिए सम्पूर्ण ब्रह्म ही कार्य-रूप में परिणत हो जाने का प्रसंग (कृत्स्नप्रसक्ति) आएगा - जिससे मूल कारण का ही उच्छेद हो जाएगा और 'द्रष्टव्य' आदि उपदेश निरर्थक होंगे; अथवा इस दोष से बचने को ब्रह्म को सावयव मान लें, तो 'निरवयव, निष्कल, निष्क्रिय' आदि श्रुति-वचनों का कोपन (विरोध) होगा। दोनों ही प्रकार से यह पक्ष असंगत है।
श्लोक 2.27
श्रुतेस् तु शब्दमूलत्वात् ॥ २७ ॥
śrutes tu śabdamūlatvāt || 27 ||
सिद्धांत: यह दोष नहीं, क्योंकि श्रुति ही यह भी कहती है कि जगत्-उत्पत्ति के बावजूद ब्रह्म अपने विकार-रहित रूप में भी बना रहता है (कारण और विकार दोनों का पृथक्-पृथक् कथन मिलता है); चूँकि अतीन्द्रिय ब्रह्म का ज्ञान केवल शब्द (श्रुति) पर ही आधारित है, इसलिए जैसा शब्द कहे वैसा ही मानना चाहिए - श्रुति ब्रह्म को आंशिक रूप से परिणत और साथ ही निरवयव, दोनों ही एक साथ बताती है; यह अचिन्त्य ब्रह्म की अलौकिक शक्ति से ही, अविद्या-कल्पित नाम-रूप भेद के द्वारा, सम्भव है।
श्लोक 2.28
आत्मनि चैवं विचित्राश् च हि ॥ २८ ॥
ātmani caivaṁ vicitrāś ca hi || 28 ||
और यह आश्चर्य की बात नहीं कि एक ही ब्रह्म में स्वरूप-हानि के बिना अनेकाकार सृष्टि हो जाए, क्योंकि स्वप्न देखने वाली एक ही आत्मा में भी बिना स्वरूप-भंग के रथ, मार्ग आदि अनेक विचित्र दृश्य उत्पन्न हो जाते हैं ('न तत्र रथाः... अथ रथान् सृजते'); देव और मायावी भी अपने स्वरूप को क्षति पहुँचाए बिना अनेक हाथी-घोड़े आदि की माया-सृष्टि करते देखे जाते हैं। इसी प्रकार एक ब्रह्म में भी स्वरूप-भंग के बिना अनेकाकार सृष्टि सम्भव है।
श्लोक 2.29
स्वपक्षदोषाच् च ॥ २९ ॥
svapakṣadoṣāc ca || 29 ||
और यह कृत्स्नप्रसक्ति आदि दोष प्रधानवादी (सांख्य) के अपने पक्ष में भी समान रूप से लगता है - सत्त्व, रजस्, तमस् तीनों गुण भी अलग-अलग निरवयव माने जाते हैं, अतः उन्हें भी यही कृत्स्नप्रसक्ति या निरवयवत्व-कोप का दोष लगेगा; और अणुओं को सावयव मानने पर भी अनित्यत्व आदि दोष उन्हें घेरेंगे। अतः यह दोष किसी एक ही पक्ष का विशेष दोष नहीं, दोनों पक्षों में समान रूप से अनिवार्यतः स्वीकार्य है - किन्तु ब्रह्मवादी ने तो इसका परिहार पूर्वोक्त प्रकार से कर ही दिया है।
श्लोक 2.30
सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥ ३० ॥
sarvopetā ca taddarśanāt || 30 ||
और परा देवता (ब्रह्म) सर्व-शक्ति-सम्पन्न मानी जानी चाहिए, क्योंकि श्रुति में ऐसा ही दर्शन (वर्णन) मिलता है - 'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वरसः...', 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि वचनों से ब्रह्म की सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध होती है, जिसके बल पर ही वह विचित्र-शक्ति-योग से विचित्र सृष्टि रच सकता है।
श्लोक 2.31
विकरणत्वान् नेति चेत् तद् उक्तम् ॥ ३१ ॥
vikaraṇatvān neti cet tad uktam || 31 ||
पूर्वपक्ष: शास्त्र तो ब्रह्म को इन्द्रिय-रहित भी कहता है ('अचक्षुष्कं अश्रोत्रं...'), तो इन्द्रिय-रहित होकर वह सर्वशक्तिमान् होकर कार्य कैसे कर सकता है? सिद्धांत: यह पहले ही कहा जा चुका है - ब्रह्म अतिगम्भीर है, केवल श्रुति-गम्य है, तर्क-गम्य नहीं; और अविद्या-कल्पित रूप-भेद की व्याख्या से यह उपपन्न हो चुका है। शास्त्र स्वयं कहता है 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षुः स श्रृणोत्यकर्णः' - करण-रहित होते हुए भी ब्रह्म की सर्व-सामर्थ्य इससे सिद्ध होती है।
श्लोक 2.32
न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ ३२ ॥
na prayojanavattvāt || 32 ||
पूर्वपक्ष: चेतन परमात्मा जगत्-रूपी इतना बड़ा उद्यम बिना किसी प्रयोजन के नहीं कर सकता, क्योंकि लोक में देखा जाता है कि बुद्धिमान व्यक्ति स्वार्थ-रहित कोई भी बड़ा उद्यम नहीं करता; यदि परमात्मा भी स्व-प्रयोजन के लिए प्रवृत्त होता है तो उसकी 'आप्तकाम' (पूर्ण-काम) श्रुति बाधित होगी, और यदि प्रयोजन ही न हो तो प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती - अतः चेतन-कारणवाद असंगत है।
श्लोक 2.33
लोकवत् तु लीलाकैवल्यम् ॥ ३३ ॥
lokavat tu līlākaivalyam || 33 ||
सिद्धांत: जैसे लोक में किसी पूर्ण-काम राजा की क्रीड़ा-मात्र प्रवृत्तियाँ बिना किसी बाहरी प्रयोजन के केवल स्वभाव से ही होती हैं, अथवा श्वास-प्रश्वास जैसी क्रियाएँ बिना किसी उद्देश्य के स्वाभाविक रूप से चलती रहती हैं, वैसे ही ईश्वर की सृष्टि-प्रवृत्ति भी केवल लीलामात्र (क्रीड़ामात्र) है, अन्य किसी प्रयोजन की अपेक्षा नहीं रखती - अपरिमित शक्ति होने से यह उसके लिए भार-रूप भी नहीं है।
श्लोक 2.34
वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति ॥ ३४ ॥
vaiṣamyanairghṛṇye na sāpekṣatvāt tathā hi darśayati || 34 ||
पूर्वपक्ष: यदि ईश्वर ही जगत् का कारण है, तो वह कुछ प्राणियों को देवादि सुखी, कुछ को पशु आदि दुःखी और कुछ को मनुष्यादि मध्यम बनाकर विषम सृष्टि रचता है - इससे उसमें साधारण मनुष्य जैसे राग-द्वेष का दोष और अत्यंत निर्दयता (नैर्घृण्य) का दोष आएगा। सिद्धांत: यह दोष नहीं, क्योंकि ईश्वर की सृष्टि सापेक्ष है (जीवों के अपने पूर्व-कर्मों की अपेक्षा रखती है) - वह वर्षा के समान केवल साधारण निमित्त-कारण है, विषमता का कारण तो जीवों के अपने-अपने कर्म हैं; ऐसा श्रुति भी दिखाती है ('एष ह्येव साधु कर्म कारयति...')।
श्लोक 2.35
न कर्माविभागाद् इति चेन् नानादित्वाद् उपपद्यते चाप्य् उपलभ्यते च ॥ ३५ ॥
na karmāvibhāgād iti cen nānāditvād upapadyate cāpy upalabhyate ca || 35 ||
पूर्वपक्ष: सृष्टि से पहले तो 'सत् ही अकेला था' कहा गया है, अर्थात् कोई विभाग (भेद) नहीं था, तो उस समय ऐसा कोई कर्म भी नहीं था जिसकी अपेक्षा कर विषम सृष्टि हो सके - अतः प्रथम सृष्टि में तो समान ही होनी चाहिए (कर्म-अपेक्षा यहाँ अन्योन्याश्रय दोष से ग्रस्त है: कर्म शरीर-भेद की अपेक्षा रखता है और शरीर-भेद कर्म की)। सिद्धांत: यह दोष नहीं, क्योंकि संसार अनादि है - बीज-अंकुर की परम्परा के समान अनादि कार्य-कारण-भाव से कर्म और सृष्टि-वैषम्य की परस्पर-अपेक्षा में कोई विरोध नहीं है; यह युक्ति-संगत भी है (अन्यथा वैषम्य निर्हेतुक होगा, मुक्तों के पुनर्बन्धन का प्रसंग होगा) और श्रुति-स्मृति से भी उपलब्ध होता है।
श्लोक 2.36
सर्वधर्मोपपत्तेश् च ॥ ३६ ॥
sarvadharmopapatteś ca || 36 ||
और इसलिए भी [चेतन ब्रह्म ही जगत् का कारण है] कि इस पक्ष में जगत्-कारण के सभी अपेक्षित धर्म (सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, महामायत्व आदि) सम्यक् रूप से उपपन्न हो जाते हैं - अतः यह औपनिषद दर्शन (उपनिषदों पर आधारित वेदान्त-सिद्धांत) पूर्णतः निर्दोष और अशंकनीय है। इस प्रकार आचार्य ने प्रथम पाद में स्वपक्ष की स्थापना पूर्ण की।
श्लोक 2.37
रचनानुपपत्तेश् च नानुमानं प्रवृत्तेश् च ॥ १ ॥
racanānupapatteś ca nānumānaṁ pravṛtteś ca || 1 ||
सांख्य का प्रधान-कारणवाद युक्तिसंगत भी नहीं है: विश्व की अत्यंत सुव्यवस्थित रचना (जैसे भवन आदि बुद्धिमान शिल्पियों द्वारा ही निर्मित होते हैं) किसी जड़, चेतन-अनधिष्ठित, स्वतंत्र प्रधान (सांख्य के अचेतन मूल-प्रकृति) से सम्भव नहीं (रचनानुपपत्ति); और जड़ प्रधान की प्रवृत्ति भी बिना किसी चेतन अधिष्ठाता के उपपन्न नहीं होती, जैसे रथ आदि जड़ वस्तुएँ बिना चेतन सारथी के स्वयं नहीं चलतीं (प्रवृत्त्यनुपपत्ति) - अतः न अनुमान से, न प्रवृत्ति-दर्शन से, जड़ प्रधान जगत्-कारण सिद्ध होता है।
श्लोक 2.38
पयोऽम्बुवच् चेत् तत्रापि ॥ २ ॥
payo'mbuvac cet tatrāpi || 2 ||
पूर्वपक्ष: जैसे दूध बछड़े की वृद्धि के लिए और जल लोकोपकार के लिए स्वभाव से ही (बिना चेतन अधिष्ठाता के) प्रवृत्त होता है, वैसे ही जड़ प्रधान भी पुरुषार्थ-सिद्धि के लिए स्वतः प्रवृत्त हो सकता है। सिद्धांत: वहाँ भी दूध-जल की प्रवृत्ति वस्तुतः चेतन-अधिष्ठित ही है (गौ की स्नेह-इच्छा, बछड़े का दुहना, जल की गति में निम्न-भूमि आदि की अपेक्षा, और श्रुति में ईश्वर-अधिष्ठातृत्व का वर्णन) - अतः यह दृष्टांत प्रधान के पक्ष को सिद्ध नहीं करता, प्रत्युत वही बात मान लेता है जो सिद्ध करनी है।
श्लोक 2.39
व्यतिरेकानवस्थितेश् चानपेक्षत्वात् ॥ ३ ॥
vyatirekānavasthiteś cānapekṣatvāt || 3 ||
और सांख्य के तीनों गुण (सत्त्व-रजस्-तमस्, प्रकृति के तीन घटक) साम्यावस्था में रहते हुए किसी बाह्य प्रवर्तक या निवर्तक की अपेक्षा नहीं रखते (पुरुष तो उदासीन है), अतः यह अनिश्चित रह जाता है कि प्रधान कभी परिणत क्यों होता है और कभी नहीं - निरपेक्ष होने से उसकी प्रवृत्ति-अप्रवृत्ति में कोई नियामक व्यवस्था स्थिर नहीं हो सकती; जबकि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, महामाया-सम्पन्न ईश्वर में प्रवृत्ति-अप्रवृत्ति दोनों विरोधरहित उपपन्न हो जाती हैं।
श्लोक 2.40
अन्यत्राभावाच् च न तृणादिवत् ॥ ४ ॥
anyatrābhāvāc ca na tṛṇādivat || 4 ||
पूर्वपक्ष: जैसे तृण-पल्लव आदि बिना किसी अन्य निमित्त के स्वभाव से ही दूध के रूप में परिणत हो जाते हैं (गाय खाकर), वैसे ही प्रधान भी स्वभाव से महदादि रूप में परिणत हो सकता है। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि तृण आदि का परिणाम भी वास्तव में निमित्त-सापेक्ष ही है - यह इसी से जाना जाता है कि तृण अन्यत्र (गाय के शरीर के बिना) दूध नहीं बनता; अतः तृण का दृष्टांत भी प्रधान के निरपेक्ष-परिणाम को सिद्ध नहीं करता।
श्लोक 2.41
पुरुषाश्मवद् इति चेत् तथापि ॥ ५ ॥
puruṣāśmavad iti cet tathāpi || 5 ||
पूर्वपक्ष: जैसे लंगड़ा (द्रष्टा किन्तु गतिहीन) व्यक्ति अंधे (गतिशील किन्तु दृष्टिहीन) व्यक्ति को अधिष्ठित करके चलाता है, या जैसे चुम्बक-पाषाण स्वयं गति-रहित होते हुए भी लोहे को गतिमान् करता है, वैसे ही उदासीन पुरुष प्रधान को प्रवृत्त कर सकता है। सिद्धांत: फिर भी यह दोष-मुक्त नहीं - सांख्य स्वयं प्रधान को स्वतंत्र-प्रवृत्त मानता है, उदासीन पुरुष लंगड़े के समान वाणी आदि से प्रवृत्त नहीं कर सकता (उसमें कोई क्रिया-व्यापार ही नहीं है), और चुम्बक की तरह सन्निधिमात्र से प्रवृत्ति मानने पर नित्य-सन्निधि से नित्य-प्रवृत्ति का ही प्रसंग आएगा (प्रलय असम्भव हो जाएगा)।
श्लोक 2.42
अङ्गित्वानुपपत्तेश् च ॥ ६ ॥
aṅgitvānupapatteś ca || 6 ||
और इसलिए भी प्रधान की प्रवृत्ति उपपन्न नहीं होती कि सत्त्व-रजस्-तमस् की साम्यावस्था में, जहाँ तीनों गुण परस्पर अंग-अंगी भाव छोड़कर केवल स्वरूप-मात्र से स्थित रहते हैं, अपने स्वरूप-नाश के भय से वे परस्पर अंग-अंगी भाव में प्रवृत्त ही नहीं हो सकते, और कोई बाह्य क्षोभक भी वहाँ नहीं है जो गुण-वैषम्य उत्पन्न करके महदादि की उत्पत्ति करा सके।
श्लोक 2.43
अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ ७ ॥
anyathānumitau ca jñaśaktiviyogāt || 7 ||
पूर्वपक्ष: हम गुणों को कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) नहीं, अपितु चंचल-स्वभाव मानते हैं (कार्य के अनुसार ही उनके स्वभाव का अनुमान करते हैं), अतः साम्यावस्था में भी वे वैषम्य-योग्य ही रहते हैं, यह दोष नहीं। सिद्धांत: फिर भी ज्ञान-शक्ति से रहित होने के कारण प्रधान में रचनानुपपत्ति आदि पूर्वोक्त दोष ज्यों-के-त्यों बने रहते हैं; यदि गुणों में ज्ञान-शक्ति भी मान ली जाए तो वे चेतन ब्रह्म ही हो जाएँगे (जो प्रतिवादी के ही पक्ष का विरोध है); और निमित्त के अभाव में साम्यावस्था में वैषम्य क्यों नहीं होता, अथवा क्यों नहीं सदैव वैषम्य ही बना रहता, यह अनुत्तरित ही रहता है।
श्लोक 2.44
अभ्युपगमेऽप्य् अर्थाभावात् ॥ ८ ॥
abhyupagame'py arthābhāvāt || 8 ||
पूर्वपक्ष: मान भी लें कि प्रधान की प्रवृत्ति स्वाभाविक (निर्निमित्त) है, फिर भी। सिद्धांत: तब भी दोष बना रहता है, क्योंकि तब प्रधान की प्रवृत्ति का कोई प्रयोजन (अर्थ) ही सिद्ध नहीं होता - न भोग (निर्दोष पुरुष का भोग निरर्थक है, और अनिर्मोक्ष का प्रसंग आता है) और न अपवर्ग (यदि पुरुष पहले से ही मुक्त-स्वरूप है तो प्रवृत्ति निष्प्रयोजन है, और यदि पूर्व-प्रवृत्ति के बिना ही अपवर्ग सिद्ध है तो शब्दादि विषयों की अनुपलब्धि का प्रसंग आएगा) - इस प्रकार 'प्रधान पुरुषार्थ के लिए प्रवृत्त होता है' यह प्रतिज्ञा ही असंगत हो जाती है।
श्लोक 2.45
विप्रतिषेधाच् चासमञ्जसम् ॥ ९ ॥
vipratiṣedhāc cāsamañjasam || 9 ||
और सांख्य का सिद्धांत परस्पर-विरोधी भी है - कहीं सात इन्द्रियाँ गिनाई जाती हैं तो कहीं ग्यारह, कहीं महत् से तन्मात्राओं की उत्पत्ति बताई जाती है तो कहीं अहंकार से, कहीं तीन अन्तःकरण गिने जाते हैं तो कहीं एक - अतः सांख्य-दर्शन भी असंगत (असमञ्जस) है, ठीक जैसे यह ईश्वर-कारणवादी श्रुति और उसके अनुसारी स्मृति के भी विरुद्ध है।
श्लोक 2.46
महद्दीर्घवद् वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॥ १० ॥
mahaddīrghavad vā hrasvaparimaṇḍalābhyām || 10 ||
अब परमाणु-कारणवाद (वैशेषिक मत) की समीक्षा: वैशेषिक मानते हैं कि कारण-द्रव्य में रहने वाला गुण कार्य-द्रव्य में सजातीय गुण ही उत्पन्न करता है (जैसे श्वेत तन्तुओं से श्वेत वस्त्र) - इसी नियम से वे आक्षेप करते हैं कि चेतन ब्रह्म को जगत्-कारण मानने पर कार्य (जगत्) में भी चैतन्य समवेत होना चाहिए, जो नहीं दिखता। किन्तु वैशेषिकों की अपनी ही प्रक्रिया में यह नियम व्यभिचरित है - परमाणु के पारिमण्डल्य (गोल) और अणु (लघु) परिमाण से द्वयणुक में वही परिमाण नहीं, अपितु विपरीत महत्-दीर्घ परिमाण उत्पन्न होता है; अतः 'सजातीय गुण ही सजातीय गुण उत्पन्न करे' यह नियम स्वयं वैशेषिकों के यहाँ ही टूटता है, तो चेतन ब्रह्म से अचेतन जगत् की उत्पत्ति में क्या बाधा?
श्लोक 2.47
उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥ ११ ॥
ubhayathāpi na karmātastadabhāvaḥ || 11 ||
परमाणु-कारणवाद स्वयं भी असंगत है: सृष्टि के प्रारम्भ में परमाणुओं में संयोग उत्पन्न करने वाला आद्य कर्म (गति) किसी निमित्त के बिना सम्भव नहीं - न प्रयत्न (शरीर-अभाव में असम्भव) और न अदृष्ट (जो स्वयं जड़ होने से बिना किसी चेतन अधिष्ठाता के अणुओं में कर्म उत्पन्न नहीं कर सकता) उसका निमित्त बन सकता; इस प्रकार आद्य कर्म के अभाव में परमाणुओं का संयोग नहीं होगा, संयोग के अभाव में द्वयणुकादि कार्य-द्रव्य भी नहीं बनेंगे - इस तरह सर्ग और प्रलय दोनों ही अवस्थाओं में कर्म का अभाव होने से परमाणु-कारणवाद असिद्ध है।
श्लोक 2.48
समवायाभ्युपगमाच् च साम्याद् अनवस्थितेः ॥ १२ ॥
samavāyābhyupagamāc ca sāmyād anavasthiteḥ || 12 ||
और चूँकि वैशेषिक दो परमाणुओं से उत्पन्न द्वयणुक को अणुओं से अत्यंत भिन्न मानकर 'समवाय' नामक विशेष सम्बन्ध से जोड़ते हैं, तो समवाय भी स्वयं समवायियों से भिन्न होने के कारण उन्हें जोड़ने के लिए किसी अन्य सम्बन्ध की अपेक्षा रखेगा (क्योंकि भेद की दृष्टि से समवाय और संयोग में कोई अंतर नहीं) - इस तरह अनवस्था (अनन्त सम्बन्ध-परम्परा) का दोष आता है; एक भी सम्बन्ध सिद्ध न होने पर द्वयणुक की उत्पत्ति ही असम्भव हो जाती है।
श्लोक 2.49
नित्यम् एव च भावात् ॥ १३ ॥
nityam eva ca bhāvāt || 13 ||
और परमाणुओं को प्रवृत्ति-स्वभाव, निवृत्ति-स्वभाव, उभय-स्वभाव या अनुभय-स्वभाव - इन चार प्रकारों में से किसी भी प्रकार से मानने पर दोष अनिवार्य है: प्रवृत्ति-स्वभाव मानने पर नित्य ही प्रवृत्ति होने से प्रलय ही नहीं होगा, निवृत्ति-स्वभाव मानने पर नित्य ही निवृत्ति होने से सृष्टि ही नहीं होगी, उभय-स्वभाव विरोधपूर्ण है, और अनुभय-स्वभाव मानकर अदृष्टादि निमित्त से प्रवृत्ति-निवृत्ति मानने पर भी अदृष्ट के नित्य-सन्निहित होने से नित्य-प्रवृत्ति या नित्य-अप्रवृत्ति का ही प्रसंग आता है।
श्लोक 2.50
रूपादिमत्त्वाच् च विपर्ययो दर्शनात् ॥ १४ ॥
rūpādimattvāc ca viparyayo darśanāt || 14 ||
और चूँकि परमाणु रूप-रस-गन्ध-स्पर्शादि गुणों से युक्त माने जाते हैं, इसलिए लोक-प्रत्यक्ष के नियम के अनुसार (जहाँ जो भी रूपादिमान् वस्तु होती है वह अपने कारण की अपेक्षा से स्थूल और अनित्य ही देखी जाती है, जैसे वस्त्र अपने कारण तन्तुओं से स्थूल-अनित्य होता है) परमाणु भी अपने परम कारण (ब्रह्म) की अपेक्षा से स्थूल और अनित्य ही सिद्ध होंगे - अर्थात् वैशेषिकों का अभीष्ट 'अणुत्व और नित्यत्व' उलट (विपर्यय) जाएगा।
श्लोक 2.51
उभयथा च दोषात् ॥ १५ ॥
ubhayathā ca doṣāt || 15 ||
और चारों भूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु) में गन्ध-रस-रूप-स्पर्श गुणों का घटता-बढ़ता क्रम लोक में देखा जाता है (पृथ्वी में चारों, जल में तीन, तेज में दो, वायु में एक); यदि परमाणु भी वैसे ही घटते-बढ़ते गुणों वाले मान लिए जाएँ तो अल्प-गुण वाले परमाणु के महाभूत बनने में उपचय (वृद्धि) का प्रसंग आएगा (जो अणुत्व-नाश करेगा); और यदि सभी परमाणुओं को समान (चार-चार) गुणों वाला मान लिया जाए, तो जल में गन्ध, तेज में गन्ध-रस, वायु में गन्ध-रूप-रस भी उपलब्ध होने चाहिए, जो लोक में नहीं दिखता। इस प्रकार दोनों ही विकल्पों में दोष आता है।
श्लोक 2.52
अपरिग्रहाच् चात्यन्तम् अनपेक्षा ॥ १६ ॥
aparigrahāc cātyantam anapekṣā || 16 ||
और यह परमाणु-कारणवाद वेदज्ञ मनु आदि किसी भी शिष्टजन द्वारा किंचित् भी स्वीकृत नहीं है (जबकि सत्कार्य-अंशतः प्रधान-कारणवाद कुछ मनु-आदि स्मृतियों में भी मिलता है), अतः इसकी सर्वथा उपेक्षा ही करनी चाहिए। साथ ही, वैशेषिकों के छह अत्यंत भिन्न पदार्थों (द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय) में से गुणादि को द्रव्य पर पूर्णतः आधीन मानना भी स्वतःविरुद्ध है, क्योंकि अत्यंत भिन्न पदार्थों में परस्पर आधीनता उपपन्न नहीं होती; संयोग-समवाय के भेद की भी कोई सुसंगत व्याख्या उपलब्ध नहीं, अतः वैशेषिक-सिद्धांत सर्वथा अनादरणीय है।
श्लोक 2.53
समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ १७ ॥
samudāya ubhayahetuke'pi tadaprāptiḥ || 17 ||
अब सर्वास्तित्ववादी बौद्धों (जो बाह्य और आन्तर दोनों वस्तुओं को - भूत-भौतिक तथा पंचस्कन्ध रूप चित्त-चैत्त को - स्वीकार करते हैं) के मत की समीक्षा: उनके यहाँ परमाणु-हेतुक (भूत-भौतिक) और स्कन्ध-हेतुक (पंचस्कन्ध) - दोनों प्रकार के 'समुदाय' (संघात) माने जाते हैं, किन्तु दोनों में ही समुदाय की सिद्धि नहीं हो पाती, क्योंकि समुदायी (अवयव) स्वयं जड़ हैं, और कोई स्थिर चेतन भोक्ता या नियन्ता जो उन्हें संगठित करे, स्वीकार नहीं किया जाता - अतः 'समुदाय' नामक कोई संगठित वस्तु सिद्ध नहीं होती, और समुदाय के बिना सारा लोक-व्यवहार ही लुप्त हो जाएगा।
श्लोक 2.54
इतरेतरप्रत्ययत्वाद् उपपन्नम् इति चेन् न सङ्घातभावानिमित्तत्वात् ॥ १८ ॥
itaretarapratyayatvād upapannam iti cen na saṅghātabhāvānimittatvāt || 18 ||
पूर्वपक्ष: यद्यपि कोई स्थिर चेतन भोक्ता नहीं है, फिर भी अविद्या आदि बारह अंगों (द्वादश-निदान) के परस्पर कारण-कार्य भाव से घटीयन्त्र के समान निरन्तर चलने वाली लोक-यात्रा उपपन्न हो जाती है, इसमें और किसी की अपेक्षा नहीं। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि अविद्यादि परस्पर केवल उत्पत्ति-मात्र के निमित्त हैं, संघात (समुदाय के रूप में संगठित होने) के निमित्त नहीं - अविद्यादि की परस्पर उत्पत्ति-श्रृंखला से यह सिद्ध नहीं होता कि वे मिलकर एक 'संघात' क्यों बनें; अतः संघात-भाव अनुपपन्न ही रहता है।
श्लोक 2.55
उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ १९ ॥
uttarotpāde ca pūrvanirodhāt || 19 ||
और क्षणभंगवाद (क्षणिकत्व-सिद्धांत) के अनुसार उत्तर-क्षण की उत्पत्ति होते ही पूर्व-क्षण का निरोध (नाश) मान लेने पर पूर्व और उत्तर क्षणों में हेतु-फल भाव ही सिद्ध नहीं हो पाता - क्योंकि निरुध्यमान या निरुद्ध हो चुका पूर्व-क्षण अभाव-ग्रस्त होने से उत्तर-क्षण का हेतु कैसे बन सकता है? भावभूत (पूर्ण-सत्) मानकर भी हेतुत्व सिद्ध नहीं होता (पुनः व्यापार-कल्पना में क्षणान्तर तक ठहरने का प्रसंग), अतः बौद्ध-मत असंगत सिद्ध होता है।
श्लोक 2.56
असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ २० ॥
asati pratijñoparodho yaugapadyamanyathā || 20 ||
यदि हेतु (पूर्व-क्षण) के अभाव में ही फल (उत्तर-क्षण) की उत्पत्ति मानी जाए, तो 'चार हेतुओं से चित्त-चैत्त उत्पन्न होते हैं' यह बौद्ध की अपनी प्रतिज्ञा ही खण्डित हो जाएगी (और निर्हेतुक उत्पत्ति मानने पर सब कुछ सर्वत्र उत्पन्न होने लगेगा); और यदि उत्तर-क्षण की उत्पत्ति तक पूर्व-क्षण को ठहरा हुआ माना जाए, तो हेतु-फल की युगपदता (एक साथ रहना) हो जाएगी, जिससे 'सभी संस्कार क्षणिक हैं' यह दूसरी प्रतिज्ञा ही खण्डित हो जाएगी - इस प्रकार दोनों ही विकल्पों में बौद्ध की अपनी प्रतिज्ञा भंग होती है।
श्लोक 2.57
प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिर् अविच्छेदात् ॥ २१ ॥
pratisaṁkhyāpratisaṁkhyānirodhāprāptir avicchedāt || 21 ||
और बौद्ध जिन तीन असंस्कृत (बुद्धि-मात्र-गम्य, अवस्तु-रूप) पदार्थों को मानते हैं - प्रतिसंख्या-निरोध (विचार-पूर्वक विनाश), अप्रतिसंख्या-निरोध (आवरण-अभाव-मात्र) और आकाश - उनमें से पहले दोनों निरोध भी सिद्ध नहीं होते, क्योंकि ये या तो सन्तान-गोचर होने चाहिए (असम्भव, क्योंकि सभी सन्तानों में अविच्छिन्न हेतु-फल भाव बना रहता है, सन्तान-विच्छेद कभी नहीं होता) या भाव-गोचर (यह भी असम्भव, क्योंकि किसी भी वस्तु का सर्वथा निरन्वय-निरुपाख्य विनाश प्रत्यभिज्ञान से सिद्ध नहीं होता) - अतः दोनों प्रकार के निरोध की उपलब्धि नहीं हो सकती।
श्लोक 2.58
उभयथा च दोषात् ॥ २२ ॥
ubhayathā ca doṣāt || 22 ||
और यह अविद्यादि का निरोध, जो प्रतिसंख्या-निरोध के अंतर्गत माना जाता है, या तो सहायक-सहित सम्यग्ज्ञान से होगा या स्वयमेव (बिना किसी सहायक के) होगा - पहले विकल्प में 'निर्हेतुक विनाश नहीं होता' यह बौद्ध का ही सिद्धांत छूट जाएगा, और दूसरे विकल्प में मार्ग (मुक्ति-साधन) के उपदेश का ही कोई प्रयोजन नहीं रह जाएगा - इस प्रकार दोनों ही प्रकार से दोष आता है, अतः यह दर्शन असंगत है।
श्लोक 2.59
आकाशे चाविशेषात् ॥ २३ ॥
ākāśe cāviśeṣāt || 23 ||
और उनका यह मानना कि निरोध-द्वय की तरह आकाश भी अवस्तु (निरुपाख्य) है, उचित नहीं - क्योंकि आगम-प्रमाण ('आत्मन आकाशः संभूतः') तथा गन्धादि गुणों के आश्रय के अनुमान से आकाश की वस्तुता उतनी ही सिद्ध होती है जितनी अन्य वस्तुओं की; साथ ही 'केवल आवरण-अभाव' मानने पर भी अनेक विरोध (जैसे एक स्थान में आवरण होने पर भी दूसरे पक्षी के उड़ने में कोई बाधा न होने का प्रसंग, और स्वयं बौद्ध-सिद्धांत में ही स्वीकृत 'वायु का आकाश पर आश्रित होना') आते हैं - अतः आकाश को वस्तु ही मानना उचित है, और तीनों (निरोध-द्वय व आकाश) को एक साथ नित्य व अवस्तु कहना स्ववचन-विरोध है।
श्लोक 2.60
अनुस्मृतेश् च ॥ २४ ॥
anusmṛteś ca || 24 ||
और सर्वथा क्षणिकत्ववादी को उपलब्धा (जानने वाले) की भी क्षणिकता माननी पड़ेगी, जो अनुस्मृति (स्मरण) से असंगत सिद्ध होती है - क्योंकि 'मैंने वह देखा था, अब यह देख रहा हूँ' ऐसा प्रत्यभिज्ञान-रूप ज्ञान तभी सम्भव है जब देखने वाला और स्मरण करने वाला एक ही अन्वयी कर्ता हो, अन्यथा किसी अन्य के अनुभव की स्मृति किसी दूसरे को कैसे होगी? यह प्रत्यभिज्ञान सर्वलोक-प्रसिद्ध है, अतः क्षणभंगवाद इससे भी बाधित होता है।
श्लोक 2.61
नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ २५ ॥
nāsato'dṛṣṭatvāt || 25 ||
और इसलिए भी क्षणभंगवाद असंगत है कि 'अभाव से भाव की उत्पत्ति' (जो उन्हें 'बिना पूर्व-विनाश के प्रादुर्भाव नहीं' जैसे वचनों से अभिप्रेत है - विनष्ट बीज से अंकुर उत्पन्न होना) असिद्ध है, क्योंकि अभाव कहीं भी उत्पत्ति के हेतु के रूप में उपलब्ध (दृष्ट) नहीं होता - यदि अभाव से ही भावोत्पत्ति सम्भव होती, तो शशश्रृंग जैसे सर्वथा असत् से भी वस्तु-उत्पत्ति होनी चाहिए थी, जो नहीं होती; अतः स्थिर-स्वभाव सुवर्णादि की तरह ही, अविनष्ट अनुवर्ती द्रव्य (बीजांश) से ही अंकुरादि की उत्पत्ति माननी उचित है, अभाव से नहीं।
श्लोक 2.62
उदासीनानाम् अपि चैवं सिद्धिः ॥ २६ ॥
udāsīnānām api caivaṁ siddhiḥ || 26 ||
और यदि अभाव से ही भावोत्पत्ति मान ली जाए, तो प्रयत्न-रहित उदासीन लोगों को भी बिना परिश्रम के अभीष्ट वस्तुएँ सिद्ध हो जानी चाहिए (क्योंकि अभाव तो सर्वत्र सुलभ है) - किसान बिना खेती किए फसल पा लेगा, कुम्हार बिना मिट्टी गढ़े बर्तन पा लेगा, बुनकर बिना बुने वस्त्र पा लेगा, स्वर्ग-मोक्ष के लिए भी किसी को कुछ करने की आवश्यकता न रहेगी - यह न तो युक्तिसंगत है और न किसी को अभिमत; अतः 'अभाव से भाव की उत्पत्ति' का सिद्धांत असंगत है।
श्लोक 2.63
नाभाव उपलब्धेः ॥ २७ ॥
nābhāva upalabdheḥ || 27 ||
अब विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) के मत की समीक्षा, जो बाह्य पदार्थों के अस्तित्व का ही निषेध करता है और केवल विज्ञान-मात्र को सत्य मानता है (क्योंकि सहोपलम्भ-नियम से विषय और ज्ञान अभिन्न प्रतीत होते हैं, तथा स्वप्न-मायादि की तरह जाग्रत् प्रत्यय भी बिना बाह्य अर्थ के हो सकते हैं, इनके तर्क हैं): इसके विरुद्ध सिद्धांत यह है कि बाह्य पदार्थ का अभाव नहीं है, क्योंकि वह स्वयं उपलब्ध (प्रत्यक्ष रूप से अनुभूत) होता है - स्तम्भ, कुड्य, घट, पट आदि प्रत्येक ज्ञान में बाह्य रूप से ही उपलब्ध होते हैं; जो स्वयं उपलब्ध हो रहा है उसका अभाव कहना स्ववचन-विरोध है।
श्लोक 2.64
वैधर्म्याच् च न स्वप्नादिवत् ॥ २८ ॥
vaidharmyāc ca na svapnādivat || 28 ||
और जाग्रत् अनुभव स्वप्न-अनुभव के समान नहीं है, क्योंकि दोनों में स्पष्ट वैधर्म्य (भेद) है - स्वप्न में देखी वस्तु जागने पर बाधित हो जाती है ('मैंने भीड़ देखी' मिथ्या सिद्ध होता है), किन्तु जाग्रत् में देखी स्तम्भादि वस्तु किसी भी अवस्था में बाधित नहीं होती; साथ ही स्वप्न-दर्शन स्मृति-रूप है जबकि जाग्रत्-दर्शन उपलब्धि-रूप है, दोनों का अंतर स्वयं अनुभूत होता है - अतः स्वप्न-साधर्म्य से जाग्रत्-प्रत्ययों को निरालम्बन (बाह्य-अर्थ-रहित) नहीं कहा जा सकता।
श्लोक 2.65
न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २९ ॥
na bhāvo'nupalabdheḥ || 29 ||
पूर्वपक्ष: बाह्य अर्थ के बिना भी केवल वासना-वैचित्र्य (संस्कार-भेद) से ही ज्ञान-वैचित्र्य उपपन्न हो सकता है। सिद्धांत: यह भी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि वासना स्वयं ही अर्थ की उपलब्धि (प्रत्यक्ष अनुभव) के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती - जिस वस्तु का कभी अनुभव ही न हुआ हो, उसके निमित्त से विचित्र वासना कैसे बने? इस प्रकार बाह्य अर्थ को स्वीकार किए बिना वासना का भाव (उत्पत्ति) ही सिद्ध नहीं होता।
टिप्पणी: Wikisource labels an additional short variant sutra here as ब्रसू-२,२.29(१), text 'क्षणिकत्वाच्च।'. Treated as an alternate/variant sub-reading noted by the source rather than an independent sutra in this project's sequential numbering, so it is not assigned its own verse; recorded here for transparency. The variant's own point (per the Bhāṣya) is that even the store-consciousness (ālayavijñāna) posited by the Idealists as the seat of these impressions cannot serve that role, since it too is held to be momentary and hence has no stable, continuous nature to sustain memory and recognition across time.
श्लोक 2.66
सर्वथानुपपत्तेश् च ॥ ३० ॥
sarvathānupapatteś ca || 30 ||
संक्षेप में, वैनाशिक (क्षणभंगवादी) सिद्धांत की जितनी भी परीक्षा की जाए, वह सूखी बालू के कुएँ की तरह हर ओर से ढहता ही जाता है - इसमें कहीं भी संगति नहीं मिलती; तथा बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद और शून्यवाद - ये तीनों परस्पर-विरोधी मत एक ही सुगत (बुद्ध) द्वारा उपदिष्ट होने से यह स्वयं ही उनके असंबद्ध-प्रलाप अथवा प्राणियों के प्रति द्वेष का परिचायक है - अतः बौद्ध-मत सर्वथा अनादरणीय है।
श्लोक 2.67
नैकस्मिन्न् असम्भवात् ॥ ३१ ॥
naikasminn asambhavāt || 31 ||
अब जैन (आर्हत) मत की समीक्षा, जो स्याद्वाद (सप्तभंगी नय: 'कथंचित् है, कथंचित् नहीं है...') के अनुसार हर वस्तु में परस्पर-विरोधी सत्त्व-असत्त्व आदि धर्मों को एक साथ मानता है: यह असंगत है, क्योंकि एक ही धर्मी में एक ही समय परस्पर-विरोधी दो धर्मों (जैसे शीत और उष्ण) का समावेश सम्भव नहीं; यदि किसी वस्तु का स्वरूप निश्चित ही न हो सके तो वह ज्ञान संशय-ज्ञान के समान अप्रमाण ही होगा, और अनिश्चित अर्थ का उपदेश देने वाला तीर्थंकर स्वयं उन्मत्त के समान अविश्वसनीय हो जाएगा।
श्लोक 2.68
एवं चात्माकार्त्स्न्यम् ॥ ३२ ॥
evaṁ cātmākārtsnyam || 32 ||
और स्याद्वाद के इसी दोष के कारण जैन-मत में आत्मा के अकार्त्स्न्य (अपूर्णता) का भी दोष आता है - जैन शरीर-परिमाण वाली आत्मा मानते हैं, अतः शरीर के अनियत-परिमाण होने से (जैसे मनुष्य से हाथी बनने पर) आत्मा अपने कृत्स्न (पूरे) शरीर को व्याप्त नहीं कर पाएगी, या घटादि की तरह अनित्य सिद्ध होगी - जो जैनों को भी अभिमत नहीं।
श्लोक 2.69
न च पर्यायाद् अप्य् अविरोधो विकारादिभ्यः ॥ ३३ ॥
na ca paryāyād apy avirodho vikārādibhyaḥ || 33 ||
पूर्वपक्ष: आत्मा के अनन्त अवयव हैं, जो छोटे शरीर में संकुचित हो जाते हैं और बड़े शरीर में फैल जाते हैं (क्रम से अवयवों का आना-जाना)। सिद्धांत: इस क्रम से भी विरोध नहीं टलता - अवयवों के निरन्तर आने-जाने से आत्मा में विकारवत्ता (परिवर्तनशीलता) अनिवार्य हो जाती है, जिससे चर्म आदि की तरह अनित्यत्व का प्रसंग आएगा; साथ ही आने-जाने वाले अवयव कहाँ से आते और कहाँ जाते हैं, यह भी अनिरूपणीय है, और आत्मा का स्वरूप ही अनवधृत (अनिश्चित) हो जाएगा - अतः यह विकल्प भी असंगत है।
श्लोक 2.70
अन्त्यावस्थितेश् चोभयनित्यत्वाद् अविशेषः ॥ ३४ ॥
antyāvasthiteś cobhayanityatvād aviśeṣaḥ || 34 ||
और जैन स्वयं मोक्षावस्था में आत्मा के अंतिम परिमाण को नित्य (अपरिवर्तनशील) मानते हैं - तो इसी न्याय से आदि और मध्य अवस्थाओं में भी आत्मा के परिमाण को नित्य मानना पड़ेगा (अन्यथा प्रत्येक अवस्था में परिमाण-परिवर्तन क्यों न हो, यह अनिश्चित रहेगा) - इस प्रकार शरीर-परिमाणत्व का सिद्धांत ही अविशेष (सुसंगति-रहित) होकर छूट जाता है; अतः सौगत (बौद्ध) मत की भांति आर्हत (जैन) मत भी असंगत होकर उपेक्षणीय है।
श्लोक 2.71
पत्युर् असामञ्जस्यात् ॥ ३५ ॥
patyur asāmañjasyāt || 35 ||
अब उस मत का खण्डन जो ईश्वर को केवल निमित्त-कारण (अधिष्ठाता मात्र, उपादान-कारण नहीं) मानता है (कुछ वैशेषिक तथा पाशुपत/माहेश्वर मत: पशुपति नामक ईश्वर पशु-पाश-मोक्ष के लिए कार्य-कारण-योग-विधि-दुःखान्त इन पाँच पदार्थों का उपदेश देता है): 'पति' (ईश्वर) प्रधान-पुरुष का ऐसा केवल-अधिष्ठाता कारण उपपन्न नहीं होता, क्योंकि इसमें असामञ्जस्य (असंगति) है - जीवों को हीन-मध्यम-उत्तम बनाकर विषम सृष्टि रचने वाले ईश्वर में साधारण पुरुष की तरह राग-द्वेष का दोष आएगा; साथ ही, कोई भी प्रवृत्त होने वाला व्यक्ति बिना किसी प्रयोजन (स्वार्थ) के प्रवृत्त नहीं होता - स्वार्थ-रहित होकर पर-हित के लिए प्रवृत्त ईश्वर में भी अनीश्वरता (साधारण जीव-तुल्यता) का प्रसंग आता है।
श्लोक 2.72
सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ ३६ ॥
sambandhānupapatteśca || 36 ||
और भी असंगति है: प्रधान-पुरुष से भिन्न ऐसे ईश्वर का प्रधान-पुरुष के साथ कोई सम्बन्ध ही उपपन्न नहीं होता - न संयोग-रूप सम्बन्ध (क्योंकि तीनों को सर्वगत और निरवयव माना गया है), न समवाय-रूप (आश्रय-आश्रयी भाव अनिरूपणीय है), न ही कार्य-गम्य कोई अन्य सम्बन्ध (क्योंकि कार्य-कारण-भाव ही अभी असिद्ध है) - इस प्रकार सांख्य-योग-सम्मत ईश्वर-कल्पना असंगत सिद्ध होती है। (ब्रह्मवादी के मत में तो कारण-कार्य का तादात्म्य-सम्बन्ध ही सम्भव है, अतः यह दोष उसे नहीं लगता।)
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श्लोक 2.73
करणवच् चेन् न भोगादिभ्यः ॥ ३७ ॥
karaṇavac cen na bhogādibhyaḥ || 37 ||
पूर्वपक्ष: जैसे पुरुष अप्रत्यक्ष, रूप-रहित चक्षु आदि करणों (इन्द्रियों) को अधिष्ठित करता है, वैसे ही ईश्वर भी प्रधान को अधिष्ठित कर सकता है। सिद्धांत: फिर भी यह उपपन्न नहीं होता, क्योंकि इन्द्रिय-समूह का अधिष्ठितत्व भोग आदि के दर्शन से जाना जाता है (पुरुष उनके माध्यम से भोग करता है), किन्तु ईश्वर में प्रधान के प्रति ऐसा कोई भोगादि नहीं दिखता; और यदि इन्द्रिय-सादृश्य से प्रधान को ईश्वर का 'शरीर' मान भी लिया जाए, तो संसारी जीवों की तरह ईश्वर को भी भोगादि का प्रसंग आएगा, जिससे उसकी ईश्वरता ही नष्ट हो जाएगी।
श्लोक 2.74
अन्तवत्त्वम् असर्वज्ञता वा ॥ ३८ ॥
antavattvam asarvajñatā vā || 38 ||
और इस तार्किक-कल्पित ईश्वर में यह भी दोष है: सर्वज्ञ ईश्वर प्रधान, पुरुषों और स्वयं की इयत्ता (सीमित संख्या-परिमाण) को जानता है या नहीं - यदि जानता है, तो लोक-प्रत्यक्ष के अनुसार जो भी वस्तु इयत्ता-परिच्छिन्न होती है वह अन्तवान् (सान्त, विनाशी) ही होती है, अतः प्रधान-पुरुष-ईश्वर तीनों ही अन्तवान् सिद्ध होंगे; और यदि नहीं जानता, तो ईश्वर की सर्वज्ञता ही नष्ट हो जाएगी - इस प्रकार अन्तवत्त्व या असर्वज्ञता, इन दोनों में से किसी एक दोष का अवश्य प्रसंग आता है।
श्लोक 2.75
उत्पत्त्यसंभवात् ॥ ३९ ॥
utpattyasaṁbhavāt || 39 ||
अब उस मत की समीक्षा जो ईश्वर को प्रकृति और अधिष्ठाता दोनों रूप में मानता है (भागवत/पाञ्चरात्र मत: एक वासुदेव भगवान् चार व्यूहों में विभक्त होकर स्थित है - वासुदेव [परमात्मा], संकर्षण [जीव], प्रद्युम्न [मन], अनिरुद्ध [अहंकार], जिनमें क्रमशः एक-दूसरे से उत्पत्ति मानी जाती है): यह मत असंगत है, क्योंकि वासुदेव (परमात्मा) से संकर्षण (जीव) की उत्पत्ति मानने पर जीव में अनित्यत्व आदि दोष आएँगे (जो आगे 'नात्मा श्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः' सूत्र द्वारा निषिद्ध है), और उत्पन्न वस्तु का कारण में लय होने पर मोक्ष के समय जीव का ही विलय (नाश) हो जाने का प्रसंग आएगा - अतः जीव की उत्पत्ति ही असम्भव है।
श्लोक 2.76
न च कर्तुः करणम् ॥ ४० ॥
na ca kartuḥ karaṇam || 40 ||
और यह भी असंगत है कि कर्ता (संकर्षण/जीव) से करण (प्रद्युम्न/मन) की उत्पत्ति हो और करण से पुनः कर्ता (अनिरुद्ध/अहंकार) की उत्पत्ति हो - लोक में कहीं भी देवदत्त जैसे कर्ता से परशु जैसा करण उत्पन्न होता नहीं देखा जाता; बिना किसी दृष्टांत के इस क्रम को मानना असंगत है, और ऐसी कोई श्रुति भी उपलब्ध नहीं है।
श्लोक 2.77
विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ ४१ ॥
vijñānādibhāve vā tadapratiṣedhaḥ || 41 ||
पूर्वपक्ष: संकर्षण आदि जीवादि-रूप नहीं, अपितु स्वयं ज्ञान-ऐश्वर्य-शक्ति-बल-वीर्य-तेजोमय ईश्वर ही हैं (सभी वासुदेव-रूप, निर्दोष, अनधिष्ठान), अतः 'उत्पत्ति-असम्भव' का दोष यहाँ नहीं लगता। सिद्धांत: फिर भी यह उत्पत्ति-असम्भव दोष दूसरे प्रकार से बना ही रहता है - या तो चारों व्यूह परस्पर भिन्न ईश्वर हैं (तो अनेक-ईश्वर-कल्पना निरर्थक होगी, और 'भगवान् एक वासुदेव ही परमार्थ-तत्त्व है' यह मूल सिद्धांत भी भंग होगा), या एक ही भगवान् के चारों व्यूह हैं (तो भी वासुदेव से संकर्षण आदि की उत्पत्ति असम्भव ही रहेगी, क्योंकि कार्य-कारण में कोई अतिशय (भेद) नहीं, जैसा मिट्टी-घट में होता है)।
श्लोक 2.78
विप्रतिषेधाच् च ॥ ४२ ॥
vipratiṣedhāc ca || 42 ||
और इस शास्त्र (पाञ्चरात्र) में अनेक प्रकार का परस्पर-विरोध भी उपलब्ध होता है - कहीं ज्ञान-ऐश्वर्यादि को गुण कहा जाता है तो कहीं वासुदेव आदि को स्वयं आत्मा (गुणी) कहा जाता है; साथ ही वेद-विरोध भी है - 'चारों वेदों में परम श्रेय न पाकर शाण्डिल्य ने यह शास्त्र प्राप्त किया' ऐसा कहकर इसमें वेद की निन्दा भी पाई जाती है। अतः यह भागवत-कल्पना भी असंगत सिद्ध होती है। (यहाँ द्वितीय अध्याय का द्वितीय पाद समाप्त होता है।)
श्लोक 2.79
न वियदश्रुतेः ॥ १ ॥
na viyadaśruteḥ || 1 ||
आकाश की उत्पत्ति पर विचार: आकाश (व्योम) की उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि छान्दोग्य के सृष्टि-प्रकरण में 'सत्' (ब्रह्म) से केवल तेज-जल-अन्न तीन भूतों की ही उत्पत्ति सुनी जाती है, आकाश की उत्पत्ति का कहीं श्रवण नहीं मिलता - और अतीन्द्रिय विषय में श्रुति ही हमारा प्रमाण है।
श्लोक 2.80
अस्ति तु ॥ २ ॥
asti tu || 2 ||
किन्तु आकाश की उत्पत्ति का श्रवण अन्यत्र (तैत्तिरीय में) अवश्य मिलता है - 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' (इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ); किन्तु छान्दोग्य में तेज को प्रथम कहा गया है और तैत्तिरीय में आकाश को - एक ही वक्ता का दो सृज्यों से एक साथ सम्बन्ध सम्भव न होने से यहाँ श्रुतियों में विप्रतिषेध (विरोध) प्रतीत होता है।
श्लोक 2.81
गौण्यसंभवाच् छब्दाच् च ॥ ३ ॥
gauṇyasaṁbhavāc chabdāc ca || 3 ||
पूर्वपक्ष का समाधान-प्रयास: आकाश की वास्तविक उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि उसका कहीं (मूल) श्रवण नहीं मिलता; तैत्तिरीय की आकाश-उत्पत्ति-वाचक श्रुति गौण (लाक्षणिक) माननी चाहिए, क्योंकि आकाश की वास्तविक उत्पत्ति असम्भव है (उत्पत्ति के लिए अपेक्षित समवायि-असमवायि-निमित्त कारण आकाश के लिए उपलब्ध नहीं, न ही उसमें उत्पत्ति-पूर्व और उत्तर काल का कोई भेद दिखाया जा सकता है); लोक और वेद दोनों में 'आकाश करो', 'घटाकाश' जैसे गौण प्रयोग भी मिलते हैं, अतः वहाँ भी उत्पत्ति-श्रुति गौण ही समझनी चाहिए।
श्लोक 2.82
स्याच् चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ ४ ॥
syāc caikasya brahmaśabdavat || 4 ||
पूर्वपक्ष जारी: प्रश्न उठता है कि एक ही 'संभूत' (उत्पन्न होना) शब्द तेज-वायु-जल-पृथ्वी के लिए मुख्य अर्थ में और आकाश के लिए गौण अर्थ में कैसे प्रयुक्त हो सकता है? उत्तर: जैसे एक ही 'ब्रह्म' शब्द 'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व' में अन्न आदि के लिए गौण-रूप से और आनन्द (मुख्य ब्रह्म) के लिए मुख्य-रूप से प्रयुक्त होता है, वैसे ही 'संभूत' शब्द भी विषय-भेद से गौण और मुख्य दोनों अर्थों में प्रयुक्त हो सकता है - इस तरह आकाश की अनुत्पत्ति में भी 'एकमेवाद्वितीयम्' की प्रतिज्ञा (एक ज्ञान से सर्व-ज्ञान) उपपन्न हो जाती है, क्योंकि आकाश ब्रह्म से देश-काल में अभिन्न ही है।
श्लोक 2.83
प्रतिज्ञाहानिर् अव्यतिरेकात् ॥ ५ ॥
pratijñāhānir avyatirekāt || 5 ||
सिद्धांत (उपर्युक्त गौण-पक्ष का खण्डन): यह उचित नहीं। 'जिससे अश्रुत भी श्रुत हो जाता है' यह एक-विज्ञान से सर्व-विज्ञान की प्रतिज्ञा तभी सम्भव है जब सम्पूर्ण कार्य-जगत् एक ब्रह्म से वस्तुतः उत्पन्न (अव्यतिरिक्त) हो; यदि आकाश की उत्पत्ति न मानी जाए तो वह प्रतिज्ञा हीन (असिद्ध) हो जाएगी। अतः आकाश भी अन्य भूतों की भांति वास्तव में ब्रह्म से ही उत्पन्न है, तैत्तिरीय की श्रुति मुख्य ही है, गौण नहीं।
श्लोक 2.84
शब्देभ्यः ॥ ६ ॥
śabdebhyaḥ || 6 ||
और अनेक श्रुति-वचनों से भी आकाश का उत्पन्न होना सिद्ध होता है - जैसे 'स यथानन्तोऽयमाकाश एवमनन्त आत्मा वेदितव्यः' (आकाश की उपमा से आत्मा की अनन्तता समझाई जाती है) से भी पता चलता है कि आकाश ब्रह्म से भिन्न, उससे उत्पन्न एक कार्य है (यदि आकाश स्वयं ब्रह्म ही होता, तो उसकी उपमा देकर ब्रह्म का वर्णन करना असंगत होता); 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः' आदि वचन भी इसी अर्थ के सूचक हैं (यहाँ नित्यत्व अमृतत्व-वत् गौण-अपेक्षा से भी समझा जा सकता है)।
श्लोक 2.85
यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ ७ ॥
yāvadvikāraṁ tu vibhāgo lokavat || 7 ||
और यह भी कोई कारण नहीं कि आकाश की उत्पत्ति असम्भव मानी जाए - क्योंकि जितना भी विकार (कार्य)-रूप जगत् दिखाई देता है, उतने में ही सर्वत्र लोक-प्रसिद्ध विभाग (भेद) पाया जाता है, और आकाश भी पृथ्वी आदि से विभक्त (पृथक्) है, अतः वह भी विकार (उत्पन्न वस्तु) ही सिद्ध होता है, जैसे लोक में सभी विभक्त वस्तुएँ विकार होती हैं (इसी युक्ति से दिशा, काल, मन, परमाणु आदि का भी कार्यत्व व्याख्यात हो जाता है) - किन्तु आत्मा में यह नियम लागू नहीं होता, क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति के लिए कोई कारण-श्रुति नहीं है, और आत्मा स्वयंसिद्ध होने से उसे कार्यत्व-सिद्धि के लिए किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है।
श्लोक 2.86
एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ ८ ॥
etena mātariśvā vyākhyātaḥ || 8 ||
इसी व्याख्यान से वायु (मातरिश्वा) की भी व्याख्या हो गई समझनी चाहिए - छान्दोग्य में वायु की उत्पत्ति का कहीं उल्लेख नहीं (अतः वह अनुत्पन्न प्रतीत होता है), किन्तु तैत्तिरीय में 'आकाशाद्वायुः' (आकाश से वायु) का स्पष्ट उल्लेख है; अतः जैसे आकाश की उत्पत्ति सिद्ध की गई, वैसे ही उन्हीं युक्तियों से वायु की भी वास्तविक उत्पत्ति सिद्ध होती है, अस्तमय-निषेध और अमृतत्व-श्रवण को अपरा-विद्या की अपेक्षा से समझना चाहिए।
श्लोक 2.87
असंभवस् तु सतोऽनुपपत्तेः ॥ ९ ॥
asaṁbhavas tu sato'nupapatteḥ || 9 ||
एक सम्भावित आशंका (कि यदि आकाश-वायु जैसी 'असम्भाव्य' वस्तुएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं, तो शायद ब्रह्म भी किसी अन्य कारण से उत्पन्न होता होगा) का निराकरण: 'सत्'-स्वरूप ब्रह्म की किसी अन्य वस्तु से उत्पत्ति की आशंका करना असम्भव (असंगत) है, क्योंकि सत्-मात्र ब्रह्म की सत्-मात्र से ही उत्पत्ति नहीं हो सकती (कारण-कार्य में कोई अतिशय-भेद न होने से), विशेष से सामान्य की उत्पत्ति भी विपरीत-दृष्ट है, और असत् से भी उत्पत्ति असम्भव है; 'न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः' जैसी श्रुतियाँ भी ब्रह्म के किसी जनक (उत्पादक) का निषेध करती हैं।
श्लोक 2.88
तेजोऽतस् तथा ह्य् आह ॥ १० ॥
tejo'tas tathā hy āha || 10 ||
पूर्वपक्ष: छान्दोग्य में तेज को सीधे ब्रह्म से उत्पन्न कहा गया है ('तत्तेजोऽसृजत'), जबकि तैत्तिरीय में क्रम से 'वायोरग्निः' (वायु से अग्नि) कहा गया है - इसे केवल वर्णन-क्रम समझ लेना चाहिए, ब्रह्म से सीधे तेज की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं। सिद्धांत: नहीं, तेज मातरिश्वा (वायु) से ही उत्पन्न होता है, क्योंकि श्रुति स्पष्ट रूप से ऐसा कहती है ('वायोरग्निः') - यदि तेज सीधे ब्रह्म से (वायु के बिना) ही उत्पन्न होता, तो यह क्रम-वाची श्रुति व्यर्थ हो जाती; परन्तु 'तत्तेजोऽसृजत' में भी परम्परा-अपेक्षा से (वायु-रूप में परिणत ब्रह्म से) तेज की उत्पत्ति कहना विरुद्ध नहीं है।
श्लोक 2.89
आपः ॥ ११ ॥
āpaḥ || 11 ||
और उसी क्रम से जल (आपः) तेज से उत्पन्न होता है, क्योंकि श्रुति स्पष्ट रूप से ऐसा कहती है ('तदपोऽसृजत' - उसने जल को उत्पन्न किया, तथा 'अग्नेरापः' - अग्नि से जल), इसमें कोई संशय नहीं है; पृथ्वी की सृष्टि का वर्णन करने से पहले सूत्रकार ने संक्षेप में केवल 'आपः' पद से ही इसे सूत्रित कर दिया।
श्लोक 2.90
पृथिवी ॥ १२ ॥
pṛthivī || 12 ||
पूर्वपक्ष: श्रुति में कहा गया है 'जल ने ईक्षण किया - बहुत हो जाएँ, प्रजनन करें - उन्होंने अन्न उत्पन्न किया' - यहाँ 'अन्न' शब्द से चावल-जौ आदि खाद्य-पदार्थ अभिप्रेत हैं या पृथ्वी? लोक-प्रसिद्धि और वाक्य-शेष ('जहाँ वर्षा होती है वहीं अन्न बहुत होता है') के अनुसार यहाँ व्रीहि-यव आदि ही 'अन्न' कहा जाना उचित प्रतीत होता है। सिद्धांत: नहीं, यहाँ 'अन्न' शब्द से पृथ्वी ही अभिप्रेत है, क्योंकि प्रकरण (केवल महाभूतों का प्रकरण चल रहा है, बीच में व्रीह्यादि का अकस्मात् प्रवेश अयुक्त है), रूप ('यत्कृष्णं तदन्नस्य' - पृथ्वी का कृष्ण वर्ण ही अन्न में बहुल है), और अन्य श्रुतियाँ ('अद्भ्यः पृथिवी', 'पृथिव्या ओषधयः') भी इसी अर्थ का समर्थन करती हैं - अतः पृथ्वी ही जल से उत्पन्न 'अन्न' है।
श्लोक 2.91
अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ १३ ॥
adhikārarūpaśabdāntarebhyaḥ || 13 ||
(इस पूर्व-सूत्र का हेतु-वाक्य): प्रकरण (अधिकार), रूप और अन्य श्रुति-वचनों से भी - जैसा ऊपर बताया गया - यह सिद्ध होता है कि जल से उत्पन्न 'अन्न' शब्द से यहाँ पृथ्वी ही अभिप्रेत है।
श्लोक 2.92
तदभिध्यानाद् एव तु तल्लिङ्गात् सः ॥ १४ ॥
tadabhidhyānād eva tu talliṅgāt saḥ || 14 ||
पूर्वपक्ष: क्या आकाशादि भूत स्वयं ही अपने-अपने विकारों को उत्पन्न करते हैं, या स्वयं परमेश्वर ही उन-उन रूपों में अवस्थित होकर संकल्प (अभिध्यान) करके सृष्टि करता है? 'आकाशाद्वायुः' जैसे स्वातंत्र्य-वाची श्रवण से तो भूतों की स्वतंत्र सृष्टि प्रतीत होती है (कहीं भूतों में चेतनत्व का भी श्रवण है, जैसे 'तत्तेज ऐक्षत')। सिद्धांत: नहीं, वह परमेश्वर ही उस-उस रूप में अवस्थित होकर 'बहु स्याम्' इस संकल्प से उस-उस विकार को उत्पन्न करता है, क्योंकि इसका लिंग (सूचक चिह्न) श्रुति में मिलता है - 'यः पृथिव्यां तिष्ठन्... यस्य पृथिवी शरीरम्' आदि से भूतों में साक्षात् (चेतन) प्रवृत्ति नहीं, अपितु उनके भीतर अन्तर्यामी परमेश्वर की ही प्रवृत्ति दिखाई जाती है; जल-तेज का 'ईक्षण'-श्रवण भी परमेश्वर के ही आवेश-वश समझना चाहिए, क्योंकि 'सत्' के अतिरिक्त और कोई द्रष्टा स्वीकृत नहीं है।
श्लोक 2.93
विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ १५ ॥
viparyayeṇa tu kramo'ta upapadyate ca || 15 ||
अब प्रलय-क्रम पर विचार: क्या प्रलय अनियत क्रम से होता है, या उत्पत्ति के ही क्रम से, अथवा उसके विपरीत क्रम से? सिद्धांत: प्रलय-क्रम उत्पत्ति-क्रम से विपरीत (उल्टा) ही होता है - जैसे लोक में जिस सीढ़ी-क्रम से ऊपर चढ़ा जाता है उसी के उल्टे क्रम से नीचे उतरा जाता है, वैसे ही पृथ्वी जल में, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, और अन्ततः सब कुछ अपने सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम कारण में विलीन होकर परम-कारण ब्रह्म में लीन हो जाता है - कार्य के स्थित रहते कारण का लय उपपन्न नहीं होता, अतः कार्य ही पहले अपने कारण में लीन होता है; यही क्रम स्मृति में भी वर्णित है।
श्लोक 2.94
अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गाद् इति चेन् नाविशेषात् ॥ १६ ॥
antarā vijñānamanasī krameṇa talliṅgād iti cen nāviśeṣāt || 16 ||
पूर्वपक्ष: चूँकि श्रुति-स्मृति में मन और बुद्धि (विज्ञान) की सत्ता प्रसिद्ध है ('बुद्धिं तु सारथिं विद्धि...'), और अथर्ववेद के सृष्टि-प्रकरण में भूतों और आत्मा के बीच करणों (प्राण, मन, इन्द्रियाँ) का भी क्रमशः उल्लेख मिलता है, अतः इन्हें भी भूतों के उत्पत्ति-प्रलय-क्रम के बीच किसी स्थान में समाविष्ट करना चाहिए, जिससे पूर्वोक्त क्रम भंग होगा। सिद्धांत: नहीं, यह दोष नहीं, क्योंकि (यदि करण भौतिक हैं तो) वे भूतों की उत्पत्ति-प्रलय से ही उत्पन्न-लीन होते हैं, उनके लिए पृथक् क्रम खोजने की आवश्यकता नहीं; और यदि करण अभौतिक भी मान लिए जाएँ, तो भी अथर्ववेद का वह वर्णन केवल पाठ-क्रम है, वास्तविक उत्पत्ति-क्रम नहीं (अन्यत्र प्रजापति-वाक्य में भूत-क्रम से पृथक् करण-क्रम भी मिलता है) - अतः भूतों के उत्पत्ति-प्रलय-क्रम में कोई भंग नहीं आता।
श्लोक 2.95
चराचरव्यपाश्रयस् तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस् तद्भावभावित्वात् ॥ १७ ॥
carācaravyapāśrayas tu syāt tadvyapadeśo bhāktas tadbhāvabhāvitvāt || 17 ||
पूर्वपक्ष: 'देवदत्त जन्मा', 'देवदत्त मरा' जैसे लौकिक प्रयोगों और जातकर्मादि संस्कारों के विधान से प्रतीत होता है कि जीव का भी जन्म-मरण होता है। सिद्धांत: नहीं, जीव का जन्म-मरण नहीं है, क्योंकि 'जीव के निकल जाने पर ही यह शरीर मरता है, जीव नहीं मरता' ऐसी श्रुति है; जन्म-मरण शब्द मुख्यतः चर-अचर भूतों (शरीरों) के आश्रित हैं, और उन्हीं शरीर-स्थ जीव में यह जन्म-मरण भाक्त (गौण, उपचरित) है - क्योंकि जीव का जन्म-मरण-व्यवहार सदैव शरीर के प्रादुर्भाव-तिरोभाव के साथ ही होता है (शरीर-सम्बन्ध के बिना कहीं जीव को जन्मते-मरते नहीं देखा जाता)।
श्लोक 2.96
नात्मा श्रुतेर् नित्यत्वाच् च ताभ्यः ॥ १८ ॥
nātmā śruter nityatvāc ca tābhyaḥ || 18 ||
पूर्वपक्ष: क्या जीवात्मा भी आकाशादि की भांति परब्रह्म से उत्पन्न होती है, या ब्रह्म की तरह अनुत्पन्न ही रहती है? कुछ श्रुतियों में अग्नि-स्फुलिंग के दृष्टांत से जीव की परब्रह्म से उत्पत्ति सुनी जाती है, और 'एकस्मिन् विदिते सर्वं विदितम्' की प्रतिज्ञा भी जीव-उत्पत्ति की अपेक्षा रखती प्रतीत होती है, तथा विभाग होने से जीव को भी विकार (कार्य) मानना चाहिए। सिद्धांत: नहीं, आत्मा (जीव) उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि इसका उत्पत्ति-प्रकरण में कहीं मुख्य श्रवण नहीं है, और अनेक श्रुतियाँ स्पष्ट रूप से इसकी नित्यता कहती हैं ('न जायते म्रियते वा विपश्चित्', 'अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः') - अग्नि-स्फुलिंग-दृष्टांत और 'प्रवेश'-श्रुति को उपाधि-सम्बन्ध की अपेक्षा से (अविकृत ब्रह्म ही उपाधि के कारण जीव-रूप में प्रतिभासित होता है) समझना चाहिए, वास्तविक उत्पत्ति के रूप में नहीं।
श्लोक 2.97
ज्ञोऽत एव ॥ १९ ॥
jño'ta eva || 19 ||
पूर्वपक्ष: क्या आत्मा वैशेषिकों की तरह स्वतः अचेतन होकर मन-सम्बन्ध से आगन्तुक-चैतन्य प्राप्त करती है (सुषुप्ति-मूर्च्छा में चेतना का अभाव इसी का प्रमाण है), या सांख्य की तरह नित्य-चैतन्य-स्वरूप ही है? सिद्धांत: आत्मा ज्ञ (नित्य-चैतन्य-स्वरूप) है, इसीलिए ('अत एव', क्योंकि उसकी उत्पत्ति नहीं) - क्योंकि पर-ब्रह्म का स्वरूप ही चैतन्य कहा गया है ('विज्ञानमानन्दं ब्रह्म'), और जीव भी वही पर-ब्रह्म है; सुषुप्ति में चेतना का प्रतीत-अभाव विषय के अभाव के कारण है, स्वरूप के अभाव के कारण नहीं ('न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते')।
श्लोक 2.98
उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॥ २० ॥
utkrāntigatyāgatīnām || 20 ||
अब जीव के परिमाण (आकार) पर विचार: क्या जीव अणु-परिमाण है, मध्यम-परिमाण है, या महत् (विभु, सर्वव्यापी) परिमाण है? यद्यपि आत्मा को अनुत्पन्न और नित्य-चैतन्य कहा गया, फिर भी 'उत्क्रान्ति' (शरीर से निकलना), 'गति' (जाना) और 'आगति' (लौटना) के श्रवण से ('जब यह शरीर से उत्क्रमण करता है, इन सबके साथ उत्क्रमण करता है'; 'जो इस लोक से जाते हैं वे चन्द्रमा को ही जाते हैं'; 'वहाँ से लौटकर पुनः इस कर्म-लोक में आता है') जीव परिच्छिन्न (सीमित) प्रतीत होता है - क्योंकि विभु (सर्वव्यापी) वस्तु का गमन-आगमन उपपन्न नहीं होता, अतः जीव अणु-परिमाण ही सिद्ध होता है।
श्लोक 2.99
स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २१ ॥
svātmanā cottarayoḥ || 21 ||
और उत्क्रान्ति तो कदाचित् (बिना गति के भी) केवल देह-स्वामित्व की समाप्ति के रूप में सम्भव हो सकती है, किन्तु 'गति' और 'आगति' - इन दोनों उत्तर पदों के लिए तो स्वयं (स्वात्मना) गमन-क्रिया ही अपेक्षित है, क्योंकि 'गम्' धातु कर्ता-स्थ-क्रिया-वाचक है, और मध्यम (न अणु, न विभु) परिमाण वाली वस्तु का गमन-आगमन सम्भव नहीं; और गति-आगति सिद्ध होने पर उत्क्रान्ति भी वस्तुतः देह से अपसरण ही सिद्ध होती है - अतः इस दृष्टि से भी जीव का अणुत्व सिद्ध होता है।
श्लोक 2.100
नाणुरतच्छ्रुतेर् इति चेन् नेतराधिकारात् ॥ २२ ॥
nāṇuratacchruter iti cen netarādhikārāt || 22 ||
पूर्वपक्ष: आत्मा अणु नहीं है, क्योंकि इसके विपरीत (विभु-वाची) श्रवण भी मिलता है - 'स वा एष महानज आत्मा', 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः', 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि श्रुतियाँ आत्मा को विभु कहती हैं। सिद्धांत: यह दोष नहीं, क्योंकि यह विभु-वाची श्रुति इतर (पर, परमात्मा) के अधिकार-प्रकरण में है - 'योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' जैसे प्रसंगों में भी वस्तुतः परमात्मा ही प्रधान रूप से वर्णित है (वामदेव-वत् दृष्टि से); अतः इस परिमाणान्तर-श्रवण से, जो प्राज्ञ/परमात्मा-विषयक है, जीव के अणुत्व का कोई विरोध नहीं होता।
श्लोक 2.101
स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ॥ २३ ॥
svaśabdonmānābhyāṁ ca || 23 ||
और इसलिए भी आत्मा अणु है कि स्वयं 'अणु' शब्द से भी इसका प्रत्यक्ष वर्णन मिलता है - 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश' (यह अणु-आत्मा चित्त से जानने योग्य है, जिसमें प्राण पाँच प्रकार से प्रविष्ट है) - यहाँ प्राण-सम्बन्ध से यह स्पष्ट है कि जीव ही अणु कहा गया है; तथा 'वालाग्रशतभागस्य...भागो जीवः स विज्ञेयः' और 'आराग्रमात्रो ह्यवरोऽपि दृष्टः' जैसे उन्मान (नाप) से भी जीव की अणुता ही सूचित होती है।
श्लोक 2.102
अविरोधश् चन्दनवत् ॥ २४ ॥
avirodhaś candanavat || 24 ||
आक्षेप: यदि जीव अणु-परिमाण है तो उसे शरीर के किसी एक देश में स्थित मानने पर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त अनुभूति (जैसे गंगा-स्नान में सर्वांग-शीतलता, धूप में सर्वांग-ताप) कैसे उपपन्न होगी? समाधान: जैसे चन्दन की एक बिन्दु शरीर के एक ही देश में लगी होने पर भी सम्पूर्ण शरीर को आह्लादित कर देती है (त्वक्-सम्बन्ध के कारण, जो पूरे शरीर में व्याप्त है), वैसे ही एकदेशस्थ अणु-आत्मा भी त्वक्-सम्बन्ध के द्वारा सम्पूर्ण शरीर-व्यापी उपलब्धि करा सकती है - अतः कोई विरोध नहीं।
श्लोक 2.103
अवस्थितिवैशेष्याद् इति चेन् नाभ्युपगमाद् धृदि हि ॥ २५ ॥
avasthitivaiśeṣyād iti cen nābhyupagamād dhṛdi hi || 25 ||
आक्षेप: चन्दन-दृष्टांत और दार्ष्टांतिक (आत्मा) में साम्य नहीं है, क्योंकि चन्दन का एकदेशस्थत्व तो प्रत्यक्ष सिद्ध है, जबकि आत्मा का एकदेशस्थत्व अनुमेय ही है - यह भी संशय बना रहता है कि आत्मा की सर्वांग-वेदना त्वगिन्द्रिय की तरह सर्वांग-व्यापी होने से है, या आकाश की तरह विभुता से, या चन्दन-बिन्दु की तरह एकदेशस्थता से? समाधान: यह दोष नहीं, क्योंकि आत्मा का एकदेशस्थत्व भी स्वयं वेदान्त-श्रुतियों में स्वीकृत है - 'हृदि ह्येष आत्मा' (यह आत्मा हृदय में है) जैसी अनेक श्रुतियाँ आत्मा को हृदय-स्थित बताती हैं, अतः दृष्टांत-दार्ष्टांतिक में कोई वैषम्य नहीं।
श्लोक 2.104
गुणाद्वा लोकवत् ॥ २६ ॥
guṇādvā lokavat || 26 ||
अथवा गुण (चैतन्य) के व्याप्त होने से भी अणु-स्वरूप जीव का सर्वांग-व्यापी कार्य उपपन्न हो सकता है - जैसे लोक में मणि या दीपक कमरे के एक कोने में स्थित होते हुए भी उनकी प्रभा (गुण) पूरे कमरे में व्याप्त होकर प्रकाश-कार्य करती है, वैसे ही एकदेशस्थ अणु-जीव का चैतन्य-गुण सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर सर्वांग-वेदना उत्पन्न कर सकता है।
श्लोक 2.105
व्यतिरेको गन्धवत् तथा हि दर्शयति ॥ २७ ॥
vyatireko gandhavat tathā hi darśayati || 27 ||
जैसे गुण होते हुए भी गन्ध अपने गन्धवान् द्रव्य (आश्रय) से पृथक् (व्यतिरिक्त) होकर भी दूर-दूर तक फैल जाती है (दूर स्थित फूल की गन्ध भी उपलब्ध होती है, जबकि द्रव्य वहाँ नहीं पहुँचता), वैसे ही अणु-जीव का चैतन्य-गुण भी अपने आश्रय से व्यतिरिक्त होकर फैल सकता है - यह श्रुति में भी दिखाया गया है; अतः 'गुण अपने आश्रय से पृथक् नहीं रह सकता' यह नियम अनैकांतिक (अनिश्चित) है, गन्ध का उदाहरण इसे भंग करता है।
श्लोक 2.106
पृथगुपदेशात् ॥ २८ ॥
pṛthagupadeśāt || 28 ||
और इसलिए भी जीव का सर्वांग-व्यापी कार्य केवल चैतन्य-गुण के द्वारा ही होता है (जीव स्वयं अणु ही रहकर) - क्योंकि श्रुति में आत्मा और प्रज्ञा (बुद्धि) का 'प्रज्ञया शरीरं समारुह्य' (बुद्धि के द्वारा शरीर में प्रवेश करके) जैसे स्थलों में कर्ता-करण-भाव से पृथक्-पृथक् उल्लेख मिलता है - इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीव अणु ही है, केवल अपने चैतन्य-गुण के प्रसार से ही सर्वांग-व्याप्ति करता है।
श्लोक 2.107
तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २९ ॥
tadguṇasāratvāt tu tadvyapadeśaḥ prājñavat || 29 ||
सिद्धांत (उपर्युक्त अणुत्व-पक्ष का खण्डन): नहीं, जीव अणु नहीं, अपितु विभु (सर्वव्यापी) है - क्योंकि इसकी उत्पत्ति का श्रवण ही नहीं है (जीव नित्य है), और परब्रह्म का ही 'प्रवेश' तथा तादात्म्य-उपदेश ('तत्त्वमसि') मिलता है, अतः जीव पर-ब्रह्म ही है, और चूँकि ब्रह्म विभु कहा गया है, जीव भी विभु ही होना चाहिए - 'त्वक्-सम्बन्ध' से भी विभुता में बाधा नहीं (काँटा चुभने पर सर्वांग-वेदना नहीं होती, अतः 'त्वक्-सम्बन्ध' से सर्वांग-व्याप्ति की व्याख्या ठीक नहीं); और गुण अपने गुणी को छोड़कर नहीं रह सकता (गन्ध भी गन्धवान् द्रव्य के साथ ही रहता है, केवल सूक्ष्मत्व से अनुपलक्षित रहता है) - अतः 'अणु' आदि जो वचन मिलते हैं, वे जीव की बुद्धि-उपाधि की प्रधानता (तद्गुणसारत्व) के कारण ही हैं, जैसे उपाधि-सापेक्ष उपासना में परमात्मा को भी 'अणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा' कहा जाता है।
श्लोक 2.108
यावदात्मभावित्वाच् च न दोषस् तद्दर्शनात् ॥ ३० ॥
yāvadātmabhāvitvāc ca na doṣas taddarśanāt || 30 ||
आक्षेप: यदि जीव का 'अणुत्व' आदि व्यवहार बुद्धि-उपाधि के कारण से ही है, तो बुद्धि से जीव के भिन्न होने पर उनका सम्बन्ध कभी-न-कभी समाप्त होना चाहिए, और वियोग होने पर विभक्त जीव अलक्ष्य (अनुपलब्ध) होने से उसके अभाव या असंसारित्व का प्रसंग आएगा। समाधान: यह दोष नहीं, क्योंकि बुद्धि का यह सम्बन्ध यावदात्मभावी (जब तक जीव संसारी रहता है तब तक चलता रहने वाला) है - जब तक सम्यग्दर्शन से संसारित्व की निवृत्ति नहीं होती, तब तक यह सम्बन्ध कभी शान्त नहीं होता; यह श्रुति में भी दिखाया गया है ('स समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति' - वह बुद्धि सहित ही दोनों लोकों में विचरण करता है)।
श्लोक 2.109
पुंस्त्वादिवत् त्व् अस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ ३१ ॥
puṁstvādivat tv asya sato'bhivyaktiyogāt || 31 ||
आक्षेप: सुषुप्ति और प्रलय में तो सम्पूर्ण विकारों का लय मान लिया गया है ('सता सोम्य तदा संपन्नो भवति' - सुषुप्ति में जीव 'सत्' में लीन हो जाता है) - तब बुद्धि-सम्बन्ध यावदात्मभावी कैसे रह सकता है? समाधान: जैसे लोक में पुंस्त्व (पुरुषत्व) आदि बाल्यावस्था में बीज-रूप से विद्यमान रहते हुए भी अव्यक्त रहते हैं और यौवन में ही अभिव्यक्त (प्रकट) होते हैं - नए उत्पन्न नहीं होते - वैसे ही सुषुप्ति-प्रलय में भी बुद्धि-सम्बन्ध शक्ति-रूप में विद्यमान ही रहता है, केवल पुनः जागरण-सृष्टि के समय ही अभिव्यक्त होता है; अन्यथा (नष्ट होकर पुनः उत्पन्न मानने पर) आकस्मिक उत्पत्ति का दोष आएगा।
श्लोक 2.110
नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ ३२ ॥
nityopalabdhyanupalabdhiprasaṅgo'nyataraniyamo vānyathā || 32 ||
और इस अन्तःकरण (मन-बुद्धि-चित्त) को अवश्य स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा दो दोषों में से एक अनिवार्य होगा: यदि अन्तःकरण न माना जाए, तो आत्मा-इन्द्रिय-विषय की सन्निधि होने पर सदैव उपलब्धि (ज्ञान) होनी चाहिए (नित्य-उपलब्धि-प्रसंग) या सदैव अनुपलब्धि ही होनी चाहिए (नित्य-अनुपलब्धि-प्रसंग); अथवा आत्मा या इन्द्रिय में ही शक्ति-प्रतिबन्ध मानना होगा, जो सम्भव नहीं (आत्मा निर्विकार है, इन्द्रिय की शक्ति भी स्वतः प्रतिबद्ध नहीं हो सकती) - अतः जिसकी अवधान-अनवधान से उपलब्धि-अनुपलब्धि नियमित होती है, वही 'मन' नामक अन्तःकरण अवश्य स्वीकार्य है।
श्लोक 2.111
कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥ ३३ ॥
kartā śāstrārthavattvāt || 33 ||
अब जीव के 'कर्तृत्व' (क्रिया-कर्तापन) पर विचार: जीव कर्ता (क्रिया करने वाला) है, क्योंकि इससे ही विधि-शास्त्र सार्थक होता है - 'यजेत, जुहुयात्, दद्यात्' जैसे विधि-वाक्य तभी सार्थक हैं जब कर्ता (जीव) उन्हें करने में समर्थ हो; कर्तृत्व के अभाव में ऐसा उपदेश निरर्थक हो जाएगा। तथा 'एष हि द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः' जैसा शास्त्र भी इसी से सार्थक होता है।
श्लोक 2.112
उपादानाद् विहारोपदेशाच् च ॥ ३४ ॥
upādānād vihāropadeśāc ca || 34 ||
और इसलिए भी जीव कर्ता है कि जीव-प्रकरण में ही करणों (इन्द्रियों) के उपादान (ग्रहण) का वर्णन मिलता है ('तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय'), जो कर्ता होने पर ही सम्भव है; और इसी प्रकरण में स्वप्नावस्था में विहार (भ्रमण) का उपदेश भी मिलता है ('स ईयतेऽमृतो यत्र कामम्', 'स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते'), जो भी कर्तृत्व को सिद्ध करता है।
श्लोक 2.113
व्यपदेशाच् च क्रियायां न चेन् निर्देशविपर्ययः ॥ ३५ ॥
vyapadeśāc ca kriyāyāṁ na cen nirdeśaviparyayaḥ || 35 ||
और इसलिए भी जीव कर्ता है कि लौकिक-वैदिक क्रियाओं में शास्त्र स्पष्ट रूप से जीव के कर्तृत्व का उल्लेख करता है - 'विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च' (विज्ञान ही यज्ञ करता है, कर्म भी करता है); यहाँ 'विज्ञान' शब्द जीव का ही वाचक है, बुद्धि का नहीं - क्योंकि यह कर्ता-कारक (सामानाधिकरण्य) में प्रयुक्त है, यदि बुद्धि (करण) अभिप्रेत होती तो करण-विभक्ति ('विज्ञानेन') का प्रयोग होता, जैसा अन्यत्र देखा जाता है; अतः यह जीव के ही कर्तृत्व को दर्शाता है।
श्लोक 2.114
उपलब्धिवदनियमः ॥ ३६ ॥
upalabdhivadaniyamaḥ || 36 ||
आक्षेप: यदि जीव बुद्धि से भिन्न, स्वतंत्र कर्ता होता, तो वह सदैव अपने लिए हितकर और प्रिय ही करता, अहितकर नहीं - किन्तु ऐसा अनियमित रूप से विपरीत भी करते देखा जाता है, जो स्वतंत्र कर्ता के लिए असंगत है। समाधान: जैसे यह आत्मा स्वतंत्र होते हुए भी उपलब्धि (ज्ञान/अनुभव) में अनियमित रूप से इष्ट-अनिष्ट दोनों का अनुभव करता है, वैसे ही अनियमित रूप से ही यह इष्ट-अनिष्ट दोनों प्रकार के कर्म भी करेगा - उपलब्धि में भी आत्मा की स्वतंत्रता उपलब्धि के हेतुओं (इन्द्रियादि) की सामग्री पर निर्भर करती है, वैसे ही अर्थ-क्रिया (कर्म) में भी देश-काल-निमित्त-सहायकों की अपेक्षा से आत्मा की अनियमित प्रवृत्ति असंगत नहीं है।
श्लोक 2.115
शक्तिविपर्ययात् ॥ ३७ ॥
śaktiviparyayāt || 37 ||
और इसलिए भी जीव बुद्धि से भिन्न कर्ता है कि यदि 'विज्ञान' शब्द से बुद्धि को ही कर्ता माना जाए, तो शक्ति-विपर्यय (शक्तियों का उलटफेर) होगा - बुद्धि, जो सदा करण (साधन) रूप में प्रसिद्ध है, कर्ता बन जाएगी, और 'मैं जाता हूँ, मैं आता हूँ' जैसा अहं-प्रत्यय (जो सर्वत्र कर्तृ-भाव के साथ ही होता है) भी बुद्धि का ही विषय मानना पड़ेगा, तथा उस बुद्धि के लिए भी कोई अन्य करण कल्पित करना होगा - इस प्रकार केवल संज्ञा (नाम) का ही विवाद रह जाएगा, वस्तुतः करण से पृथक् कर्ता का अस्तित्व तो स्वीकार करना ही पड़ेगा।
श्लोक 2.116
समाध्यभावाच् च ॥ ३८ ॥
samādhyabhāvāc ca || 38 ||
और इसलिए भी जीव स्वयं कर्ता है, बुद्धि नहीं: वेदान्त में जो औपनिषद आत्म-साक्षात्कार के लिए समाधि (ध्यान) का उपदेश दिया गया है ('आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः') वह भी आत्मा के कर्तृत्व के बिना उपपन्न नहीं हो सकता (क्योंकि ध्यान भी एक क्रिया है, जिसका कोई कर्ता चाहिए) - अतः इससे भी जीव के कर्तृत्व की सिद्धि होती है।
श्लोक 2.117
यथा च तक्षोभयथा ॥ ३९ ॥
yathā ca takṣobhayathā || 39 ||
यह कर्तृत्व जीव का स्वाभाविक (सहज) नहीं, अपितु उपाधि-निमित्तक (अविद्या-कृत) है - अन्यथा (यदि कर्तृत्व स्वाभाविक होता, जैसे अग्नि का उष्णत्व) तो कर्तृत्व से कभी मुक्ति ही नहीं हो सकती, और कर्तृत्व दुःख-रूप होने से पुरुषार्थ-सिद्धि भी बाधित होगी। जैसे बढ़ई (तक्ष) हाथ में बसूला आदि लेकर काम करते समय दुःखी होता है, किन्तु अपने घर लौटकर बसूला रखकर निर्व्यापार, स्वस्थ, सुखी हो जाता है - वैसे ही अविद्या-कल्पित द्वैत-युक्त आत्मा स्वप्न-जाग्रत् में कर्ता-दुःखी रहता है, किन्तु सुषुप्ति में और अन्ततः ब्रह्म-साक्षात्कार में कार्य-करण-संघात-रहित, अकर्ता, सुखी हो जाता है - इस प्रकार बढ़ई के दोनों (कर्ता व अकर्ता) रूप ही आत्मा में उपमेय हैं।
श्लोक 2.118
परात् तु तच्छ्रुतेः ॥ ४० ॥
parāt tu tacchruteḥ || 40 ||
अब विचार: क्या जीव का यह (अविद्या-कालिक) कर्तृत्व ईश्वर-निरपेक्ष (स्वतंत्र) है, या ईश्वर-सापेक्ष? सिद्धांत: जीव का कर्तृत्व पर (ईश्वर) के अधीन है, क्योंकि श्रुति ऐसा कहती है - 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते' (यही परमात्मा जिसे ऊपर ले जाना चाहता है उससे अच्छे कर्म करवाता है) - यद्यपि जीव स्वयं राग-द्वेष-प्रयुक्त होकर साधन-सम्पन्न होकर कर्तृत्व का अनुभव करता प्रतीत होता है, फिर भी सभी प्रवृत्तियों में अध्यक्ष रूप से ईश्वर ही अन्तिम हेतु-कर्ता है।
श्लोक 2.119
कृतप्रयत्नापेक्षस् तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ॥ ४१ ॥
kṛtaprayatnāpekṣas tu vihitapratiṣiddhāvaiyarthyādibhyaḥ || 41 ||
आक्षेप: यदि ईश्वर ही जीव से (उसके कर्मों के परिणाम कराने में) कर्ता के रूप में प्रेरित करता है, तो वैषम्य-नैर्घृण्य के दोष पुनः आएँगे, और जीव में अकृताभ्यागम (बिना किए फल भोगने) का दोष भी होगा। समाधान: नहीं, ईश्वर जीव के अपने कृत प्रयत्न (पूर्व-कर्मों से उत्पन्न प्रयत्न) की अपेक्षा करके ही प्रेरित करता है (जैसे वर्षा जिस-जिस बीज में जो-जो शक्ति है, उसी के अनुसार फल देती है) - इससे वैषम्यादि दोष नहीं आते; और यह भी सिद्ध होता है क्योंकि अन्यथा विहित-निषिद्ध कर्मों ('स्वर्गकामो यजेत' आदि) का कोई प्रयोजन (अवैयर्थ्य) ही नहीं रहेगा - यदि सब कुछ ईश्वर ही स्वतंत्र रूप से करता, तो विधि-निषेध का उपदेश व्यर्थ हो जाता।
श्लोक 2.120
अंशो नानाव्यपदेशाद् अन्यथा चापि दाशकितवादित्वम् अधीयत एके ॥ ४२ ॥
aṁśo nānāvyapadeśād anyathā cāpi dāśakitavāditvam adhīyata eke || 42 ||
अब विचार: ईश्वर और जीव के उपकार्य-उपकारक-भाव (नियन्ता-नियम्य सम्बन्ध) में, ये दोनों स्वामी-सेवक की तरह सम्बद्ध हैं या अग्नि-स्फुलिंग की तरह? सिद्धांत: जीव ईश्वर का अंश (भाग) है, जैसे अग्नि से स्फुलिंग (चिनगारी) - निरवयव (अंशरहित) ब्रह्म का मुख्य अर्थ में कोई अंश सम्भव नहीं होने पर भी यह भेद-निर्देश ('सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः') उचित है; और कुछ शाखाओं की श्रुति ('ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासाः ब्रह्मैवेमे कितवाः') भी हीन-जन्तुओं (मछुआरे, दास, जुआरी) के उदाहरण से सभी जीवों के ब्रह्मत्व को दिखाकर अभेद भी सूचित करती है - इस प्रकार भेद और अभेद दोनों के सूचक वचनों से जीव के 'अंशत्व' का ही निश्चय होता है (चैतन्य भी जीव-ईश्वर में अविशिष्ट है, जैसे अग्नि-स्फुलिंग में औष्ण्य)।
श्लोक 2.121
मन्त्रवर्णात् ॥ ४३ ॥
mantravarṇāt || 43 ||
और इसलिए भी जीव अंश है कि मन्त्र-वर्ण (वेद-मन्त्र) भी यही दिखाता है - 'तावानस्य महिमा। ततो ज्याया्ंश्च पुरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि। त्रिपादस्यामृतं दिवि' (इतनी ही उसकी महिमा है, पुरुष तो इससे भी बड़ा है; सम्पूर्ण भूत उसका एक पाद (चौथाई भाग) हैं, तीन पाद अमृत रूप में दिव्य लोक में है) - यहाँ 'भूत' शब्द से जीव-प्रधान स्थावर-जंगम प्राणी ही अभिप्रेत हैं, और 'पाद' शब्द 'अंश' का ही पर्यायवाची है - अतः इससे भी जीव के अंशत्व की पुष्टि होती है।
श्लोक 2.122
अपि स्मर्यते ॥ ४४ ॥
api smaryate || 44 ||
और इसलिए भी जीव अंश है कि यह स्मृति (भगवद्गीता) में भी कहा गया है - 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' (जीव-लोक में सनातन जीव-रूप मेरा ही अंश है); पूर्व-पक्ष द्वारा उठाया गया आक्षेप (कि स्वामी-सेवक-भाव ही लोक में प्रसिद्ध है) निर्णायक नहीं, क्योंकि शास्त्र से ही यहाँ अंश-अंशी-भाव तथा ईशित्र्-ईशितव्य-भाव दोनों निश्चित होते हैं - निरतिशय उपाधि-सम्पन्न ईश्वर हीन उपाधि-सम्पन्न जीवों को शासित करता है, इसमें कोई विरोध नहीं।
श्लोक 2.123
प्रकाशादिवत् तु नैवं परः ॥ ४५ ॥
prakāśādivat tu naivaṁ paraḥ || 45 ||
आक्षेप: यदि जीव ईश्वर का अंश है, तो जीव द्वारा भोगे जाने वाले संसार-दुःख से अंशी ईश्वर को भी दुःख होना चाहिए (जैसे हाथ-पैर के दुःख से सम्पूर्ण देवदत्त दुःखी होता है) - इससे तो सम्यग्दर्शन भी निरर्थक हो जाएगा (क्योंकि इससे ईश्वर का दुःख और भी बढ़ेगा)। सिद्धांत: नहीं, जैसे सूर्य या चन्द्रमा का प्रकाश आकाश में व्याप्त रहकर अंगुली आदि उपाधियों के सीधे-टेढ़े होने पर उसी के अनुरूप प्रतीत होता हुआ भी वास्तव में सीधा-टेढ़ा नहीं होता (या जैसे जल हिलने से जल-स्थित सूर्य-प्रतिबिम्ब हिलता दिखता है, पर सूर्य नहीं हिलता), वैसे ही अविद्या-प्रतिष्ठापित बुद्ध्यादि-उपहित जीव-अंश में दुःख का आभास होने पर भी पर (ईश्वर) दुःखी नहीं होता - जीव का दुःख भी मूलतः अविद्या-निमित्त ही है, वास्तविक नहीं।
श्लोक 2.124
स्मरन्ति च ॥ ४६ ॥
smaranti ca || 46 ||
और स्मृति में (व्यासादि द्वारा) भी यही कहा गया है कि परमात्मा जीव के दुःख से दुःखी नहीं होता - 'स नित्यो निर्गुणः स्मृतः। न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा। कर्मात्मा त्वपरो योऽसौ मोक्षबन्धैः स युज्यते' (परमात्मा नित्य-निर्गुण कहा गया है, वह कमल-पत्र की तरह जल से लिप्त नहीं होता जैसे फलों से लिप्त नहीं होता; कर्मात्मा दूसरा जीव ही मोक्ष-बन्धन से युक्त होता है) - तथा 'सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः' जैसे वचन भी इसी अर्थ का समर्थन करते हैं।
श्लोक 2.125
अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज् ज्योतिरादिवत् ॥ ४७ ॥
anujñāparihārau dehasambandhāj jyotirādivat || 47 ||
आक्षेप: यदि सभी प्राणियों का एक ही परमात्मा अन्तरात्मा है, तो लौकिक-वैदिक 'अनुज्ञा' (विधान, जैसे 'ऋतौ भार्यामुपेयात्') और 'परिहार' (निषेध, जैसे 'गुर्वंगनां नोपगच्छेत्') कैसे उपपन्न हो सकते हैं? समाधान: यह देह-सम्बन्ध (देहादि-संघात में 'मैं यही हूँ' ऐसी विपरीत प्रतीति) के कारण ही उपपन्न होता है - जैसे एक ही ज्योति (अग्नि) में भी 'यह क्रव्यात् (शव-दाहक अग्नि) है' कहकर उसका परिहार किया जाता है, दूसरे अग्नि का नहीं, वैसे ही देह-सम्बन्ध के कारण ही, अद्वैत होते हुए भी, अनुज्ञा और परिहार दोनों उपपन्न हो जाते हैं (सम्यग्दर्शी के लिए तो देहाभिमान न होने से विधि-निषेध का कोई नियोग ही शेष नहीं रहता)।
श्लोक 2.126
असन्ततेश् चाव्यतिकरः ॥ ४८ ॥
asantateś cāvyatikaraḥ || 48 ||
आक्षेप: फिर भी, एक ही आत्मा के अनेक शरीरों से सम्बद्ध होने पर, कर्म-फल का व्यतिकर (मिश्रण, एक के फल का दूसरे को मिलना) हो जाना चाहिए, क्योंकि स्वामी (आत्मा) तो एक ही है। समाधान: नहीं, क्योंकि जीव का असन्तति (अ-सातत्य, निरन्तरता-रहित) होना है - कर्ता-भोक्ता आत्मा का सम्पूर्ण शरीरों के साथ कोई अटूट, निरन्तर सम्बन्ध नहीं होता, जीव उपाधि-तन्त्र (उपाधि के अधीन) है, और उपाधियों में भी कोई निरन्तरता नहीं है, अतः जीव-सन्तति भी नहीं है - इसलिए कर्म-फल का व्यतिकर नहीं होता।
श्लोक 2.127
आभास एव च ॥ ४९ ॥
ābhāsa eva ca || 49 ||
और यह जीव पर-आत्मा का केवल आभास (प्रतिबिम्ब) मात्र है, जल-सूर्य (जल में प्रतिबिम्बित सूर्य) के समान - न वह साक्षात् पर-आत्मा ही है, न कोई सर्वथा भिन्न वस्तु; अतः जैसे एक जल-सूर्य के हिलने पर दूसरा जल-सूर्य नहीं हिलता, वैसे ही एक जीव के कर्म-फल-सम्बन्ध से दूसरे जीव का कोई सम्बन्ध नहीं होता - इस प्रकार कर्म-फल का अव्यतिकर उपपन्न होता है; और यह आभास स्वयं अविद्या-कृत होने से इसके आश्रित संसार का अविद्या-कृत होना भी उपपन्न हो जाता है, जिसके निराकरण से ही पारमार्थिक ब्रह्मात्म-भाव का उपदेश सार्थक होता है।
श्लोक 2.128
अदृष्टानियमात् ॥ ५० ॥
adṛṣṭāniyamāt || 50 ||
(सांख्य और वैशेषिक के बहु-आत्मवाद पर आक्षेप जारी): यदि अनेक, सर्वगत (विभु) आत्माएँ मानी जाएँ, तो उनमें से किसी एक के सुख-दुःख-भोग में सभी का समान सुख-दुःख-भोग होने का प्रसंग आएगा (क्योंकि सभी आत्माएँ समान रूप से सर्वत्र सन्निहित हैं); 'अदृष्ट' (कर्म) के द्वारा नियम मान लेने पर भी - चूँकि सर्वगत आत्माओं में अदृष्ट भी साधारण मन-संयोग से ही उत्पन्न होता है - किस आत्मा का कौन-सा अदृष्ट है, इसका कोई नियामक-कारण नहीं मिलता; अतः अदृष्ट से भी यह अनियम दूर नहीं होता।
श्लोक 2.129
अभिसन्ध्यादिष्व् अपि चैवम् ॥ ५१ ॥
abhisandhyādiṣv api caivam || 51 ||
और यही दोष 'अभिसन्धि' (संकल्प: 'मैं यह फल पाऊँ, यह त्यागूँ, इस प्रकार यत्न करूँ, यह करूँ') आदि के विषय में भी समान रूप से लगता है - चूँकि ये भी सामान्य आत्म-मन-संयोग से ही, सभी आत्माओं की सन्निधि में, उत्पन्न होते हैं, इनके द्वारा भी अदृष्ट और आत्माओं के स्व-स्वामी-भाव का कोई नियामक कारण उपपन्न नहीं होता - अतः यही पूर्वोक्त दोष यहाँ भी बना रहता है।
श्लोक 2.130
प्रदेशभेदाद् इति चेन् नान्तर्भावात् ॥ ५२ ॥
pradeśabhedād iti cen nāntarbhāvāt || 52 ||
आक्षेप: यद्यपि आत्मा विभु (सर्वव्यापी) है, फिर भी शरीर-प्रतिष्ठित मन के साथ उसका संयोग केवल शरीर-सीमित आत्म-प्रदेश में ही होगा, अतः अभिसन्धि, अदृष्ट, सुख-दुःख आदि की व्यवस्था इसी प्रदेश-भेद से हो जाएगी। समाधान: यह भी उपपन्न नहीं होता, क्योंकि अन्तर्भाव (सब आत्माओं का सभी शरीरों में समान रूप से व्याप्त होना) के कारण - सभी आत्माएँ विभुत्व-साम्य से सभी शरीरों में समान रूप से अन्तर्निहित हैं, अतः किसी एक आत्मा के लिए कोई पृथक् 'प्रदेश' कल्पित नहीं किया जा सकता; और कल्पित प्रदेश भी वास्तविक न होने से पारमार्थिक कार्य का नियमन नहीं कर सकता - अतः बहु-आत्मवाद में सर्वगतत्व की उपपत्ति ही असम्भव है, केवल आत्मैकत्व-पक्ष में ही सभी दोषों का अभाव सिद्ध होता है। (यहाँ तृतीय पाद समाप्त होता है।)
श्लोक 2.131
तथा प्राणाः ॥ १ ॥
tathā prāṇāḥ || 1 ||
पूर्वपक्ष/सिद्धांत: जैसे आकाशादि भूत ब्रह्म से उत्पन्न सिद्ध किए गए, वैसे ही प्राण (मुख्य प्राण तथा इन्द्रिय-समूह) भी ब्रह्म से ही उत्पन्न मानने चाहिए - यद्यपि इस सूत्र में 'तथा' शब्द से उपमान स्पष्ट नहीं दिखता (जीव के साथ उपमा नहीं दी जा सकती, क्योंकि जीव अनुत्पन्न है), तथापि 'एतस्मादात्मनः सर्वे प्राणाः...व्युच्चरन्ति' और 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च' जैसी श्रुतियों से यह स्पष्ट है कि जैसे लोक-आदि परब्रह्म से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही प्राण भी उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 2.132
गौण्यसंभवात् तत्प्राक् श्रुतेश् च ॥ २ ॥
gauṇyasaṁbhavāt tatprāk śruteś ca || 2 ||
पूर्वपक्ष: प्राणों की उत्पत्ति-पूर्व सत्ता का श्रवण मिलने से ('अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः...' - बिना प्राण, मन के भी शुद्ध ब्रह्म), प्राणों की उत्पत्ति-श्रुति भी गौण (लाक्षणिक) समझनी चाहिए। सिद्धांत: नहीं, यह श्रुति गौण नहीं हो सकती, क्योंकि इससे 'एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानम्' की प्रतिज्ञा ही हानि को प्राप्त हो जाएगी; तथा जो 'अप्राणो ह्यमनाः' कहा गया है वह मूल-प्रकृति (परम कारण ब्रह्म) की अपेक्षा से है, अवान्तर-प्रकृति (जिस-जिस विकार का जो-जो निकटतम कारण है, उस अपेक्षा से) प्राणों की उत्पत्ति-पूर्व सत्ता का निषेध नहीं करता।
श्लोक 2.133
तत्पूर्वकत्वाद् वाचः ॥ ३ ॥
tatpūrvakatvād vācaḥ || 3 ||
और इसलिए भी प्राणों की उत्पत्ति मुख्य ही है कि आकाशादि में जो 'जायते' (उत्पन्न होता है) शब्द पूर्व में प्राणों के साथ श्रुत होकर मुख्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ, वही शब्द एक ही प्रकरण-वाक्य में एक बार बोला जाकर बाद में जुड़े आकाशादि के लिए भी उसी मुख्य अर्थ में लागू होना चाहिए (एक ही शब्द एक ही वाक्य में एक स्थान पर मुख्य और दूसरे में गौण नहीं हो सकता); इसी न्याय से 'सर्वे प्राणा व्युच्चरन्ति' में पश्चात्-श्रुत 'व्युच्चरन्ति' शब्द भी पूर्व-सम्बद्ध प्राणादि के साथ मुख्य अर्थ में ही समझना चाहिए।
श्लोक 2.134
सप्त गतेर् विशेषितत्वाच् च ॥ ४ ॥
sapta gater viśeṣitatvāc ca || 4 ||
अब प्राणों की संख्या पर विचार (मुख्य प्राण को छोड़कर शेष कितने प्राण हैं - कहीं सात, कहीं आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह, तेरह तक गिनाए गए हैं): पूर्वपक्ष: प्राण सात ही हैं, क्योंकि 'गति' (उत्क्रमण) से उन्हीं की विशेषतया गणना मिलती है - 'सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्' और 'सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः द्वाववाञ्चौ' (सिर में सात प्राण, दो नीचे की ओर) जैसे विशेष उल्लेखों से सात की ही गणना विशेषित होती है।
श्लोक 2.135
हस्तादयस् तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ ५ ॥
hastādayas tu sthite'to naivam || 5 ||
सिद्धांत: नहीं, प्राण ग्यारह ही हैं (मुख्य प्राण को छोड़कर शेष), क्योंकि हस्त आदि सात से अधिक प्राणों का भी श्रवण मिलता है ('हस्तो वै ग्रहः...' आदि) - जब हीन-अधिक संख्या में विरोध हो, तो अधिक संख्या ही ग्राह्य होती है, क्योंकि उसमें हीन का अन्तर्भाव हो जाता है; 'दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः' श्रुति में स्पष्ट रूप से ग्यारह की गणना मिलती है (जिसमें 'आत्मा' शब्द से अन्तःकरण अभिप्रेत है), और कार्य-भेद से भी (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, एक मन) ग्यारह ही उपयुक्त संख्या सिद्ध होती है, सप्त-गणना तो केवल उपासना अथवा प्रदर्शन-मात्र के लिए है।
श्लोक 2.136
अणवश् च ॥ ६ ॥
aṇavaś ca || 6 ||
और ये (इन्द्रिय-रूप) प्राण भी परिच्छिन्न-सूक्ष्म (अणु-परिमाण) ही समझे जाने चाहिए - न परमाणु-तुल्य, अपितु सूक्ष्म और परिच्छिन्न - क्योंकि यदि ये स्थूल होते, तो मरण-काल में शरीर से निकलते हुए बिल से सर्प की तरह पास-पड़ोसियों को दिखाई पड़ते (जो नहीं होता), और यदि इन्हें सर्वगत (विभु) माना जाए, तो उत्क्रान्ति-गति-आगति की श्रुतियों का ही विरोध होगा, तथा जीव के 'तद्गुणसारत्व' (बुद्धि-गुण-प्रधानता) की उपपत्ति भी नहीं हो पाएगी।
श्लोक 2.137
श्रेष्ठश् च ॥ ७ ॥
śreṣṭhaś ca || 7 ||
और यह भी अतिदेश (आगे बढ़ाकर लागू करना) से समझ लेना चाहिए कि मुख्य प्राण भी, अन्य प्राणों की भांति, ब्रह्म का ही विकार है - यह विशेष अतिदेश इसलिए किया गया कि 'नासदासीयसूक्त' में 'आनीदवातम्' जैसे वचन से यह भ्रम हो सकता था कि उत्पत्ति-पूर्व भी प्राण किसी रूप में विद्यमान था (अतः वह अजन्मा है), किन्तु 'अवातम्' विशेषण और 'अप्राणो ह्यमनाः' जैसी श्रुतियों से स्पष्ट होता है कि वहाँ प्राण-सत्ता का कोई संकेत नहीं है; और 'प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च' श्रुति मुख्य प्राण को ही ज्येष्ठ (शुक्र-निषेक-काल से ही वृत्ति-लाभ के कारण) और श्रेष्ठ (गुणाधिक्य के कारण, 'न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुम्' के अनुसार) बताती है।
श्लोक 2.138
न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ ८ ॥
na vāyukriye pṛthagupadeśāt || 8 ||
पूर्वपक्ष: मुख्य प्राण वायु ही है, क्योंकि श्रुति में ऐसा कहा गया है ('यः प्राणः स वायुः' - जो प्राण है वह वायु है, और वही वायु प्राण-अपान-व्यान-उदान-समान इन पाँच रूपों में विभाजित है); अथवा अन्य मत में यह करणों (इन्द्रियों) की सामान्य वृत्ति (क्रिया-शक्ति) मात्र है। सिद्धांत: नहीं, मुख्य प्राण न वायु है और न करण-वृत्ति-मात्र, क्योंकि दोनों से इसका पृथक् उपदेश मिलता है - 'प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च' में वायु से भिन्न रूप में प्राण का उल्लेख है (तृतीया-विभक्ति 'वायुना' से यह भिन्नता दिखाई गई है), तथा वाक् आदि करणों से भी प्राण का पृथक् उल्लेख मिलता है; अतः यह वायु के ही अध्यात्म-विशेष रूप में पंचव्यूह-विशिष्ट एक तत्त्व है, न वायु-मात्र, न करण-मात्र।
श्लोक 2.139
चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥ ९ ॥
cakṣurādivat tu tatsahaśiṣṭyādibhyaḥ || 9 ||
आक्षेप: यदि मुख्य प्राण भी जीव के लिए (चक्षु आदि की तरह) केवल करण (साधन) है, तो जैसे चक्षु का रूप-विषय होता है, प्राण का भी कोई पृथक् विषय होना चाहिए, किन्तु ग्यारह करणों के ही कार्य-जात (रूपालोचनादि) गिने गए हैं, प्राण के लिए कोई बारहवाँ पृथक् कार्य-क्षेत्र नहीं दिखता। इस सूत्र का समाधान: प्राण चक्षु आदि की भांति ही जीव के लिए राजा-मन्त्री-वत् उपकरण (साधन) है, स्वतंत्र नहीं, क्योंकि यह चक्षु आदि के साथ ही उसी अधिकार में शासित होता है ('प्राणसंवाद' आदि में), और सामान्य धर्मों (संहतत्व, अचेतनत्व आदि) से भी यह इनके साथ ही एक-वर्गीय है।
श्लोक 2.140
अकरणत्वाच् च न दोषस् तथा हि दर्शयति ॥ १० ॥
akaraṇatvāc ca na doṣas tathā hi darśayati || 10 ||
आक्षेप जारी: यह भी अपेक्षित है कि यदि प्राण भी करण-मात्र है, तो उसका कोई विशेष कार्य दिखना चाहिए, अन्यथा वह निष्प्रयोजन होगा। समाधान: यह कोई दोष नहीं, क्योंकि प्राण चक्षु आदि की तरह किसी विशिष्ट बाह्य विषय के लिए करण नहीं है (अकरणत्व); तथापि उसका अपना विशेष कार्य है - जैसा श्रुति दिखाती है: 'प्राणसंवाद' में वाणी आदि के उत्क्रमण के बाद भी उनकी वृत्ति-मात्र-हीन शेष जीवन दिखाया गया है, किन्तु प्राण के उत्क्रमण की इच्छा मात्र से सम्पूर्ण इन्द्रियों और शरीर के पतन का प्रसंग दिखाया गया है - इस प्रकार प्राण का विशेष कार्य समस्त शरीर-इन्द्रिय-रक्षण है।
श्लोक 2.141
पञ्चवृत्तिर् मनोवत् व्यपदिश्यते ॥ ११ ॥
pañcavṛttir manovat vyapadiśyate || 11 ||
और इसलिए भी मुख्य प्राण का विशेष कार्य है कि उसकी पाँच वृत्तियाँ (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) श्रुति में वर्णित हैं, जो मन की भांति ही (मन की भी पाँच वृत्तियाँ मानी जाती हैं - प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति) कार्य-भेद की अपेक्षा से हैं (प्राण ऊर्ध्व-वृत्ति उच्छ्वास-कर्म वाला है, अपान अधो-वृत्ति निःश्वास-कर्म वाला, व्यान इन दोनों का संधि-स्थान बल-हेतु, उदान उत्क्रान्ति-हेतु, समान सम्पूर्ण अंगों में अन्न-रस-वहन-हेतु) - इस प्रकार भी जीवोपकरणत्व और अपना विशेष कार्य दोनों सिद्ध होते हैं।
श्लोक 2.142
अणुश् च ॥ १२ ॥
aṇuś ca || 12 ||
और यह मुख्य प्राण भी, अन्य (इन्द्रिय-)प्राणों की भांति, अणु (सूक्ष्म, परिच्छिन्न) ही समझना चाहिए - पाँचों वृत्तियों से सम्पूर्ण शरीर-व्यापी होने से यह सूक्ष्म है, और उत्क्रान्ति में पास-पड़ोसियों को उपलब्ध न होने तथा उत्क्रान्ति-गति-आगति की श्रुतियों से यह परिच्छिन्न (विभु नहीं) है; प्राण की जो 'समः प्लुषिणा समो मशकेन... समोऽनेन सर्वेण' (चींटी के समान, मच्छर के समान... इस सम्पूर्ण जगत् के समान) विभुता-वाची श्रुति मिलती है, वह अधिदैविक हिरण्यगर्भ-रूप समष्टि-प्राण की अपेक्षा से है, आध्यात्मिक (प्रत्येक जीव-गत) प्राण की अपेक्षा से नहीं - अतः यह दोष नहीं।
श्लोक 2.143
ज्योतिर् आद्यधिष्ठानं तु तदामननात्प्राणवता शब्दात् ॥ १३ ॥
jyotir ādyadhiṣṭhānaṁ tu tadāmananātprāṇavatā śabdāt || 13 ||
अब विचार: क्या ये (इन्द्रिय-रूप) प्राण अपने ही सामर्थ्य से अपने-अपने कार्य के लिए प्रवृत्त होते हैं, या देवता-अधिष्ठित होकर प्रवृत्त होते हैं? सिद्धांत: वाणी आदि इन्द्रिय-समूह अग्नि आदि देवताओं से अधिष्ठित होकर ही अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होता है, क्योंकि श्रुति में ऐसा ही वर्णन मिलता है ('अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्' - अग्नि वाणी बनकर मुख में प्रविष्ट हुआ - 'प्राणवता शब्दात्' अर्थात् प्राण-सहित इस शब्द-वर्णन से) - अग्नि आदि का यह वाग्भाव और मुख-प्रवेश देवता-रूप से अधिष्ठातृत्व स्वीकार करके ही कहा गया है; अन्यथा शक्त होते हुए भी शकट आदि बैल-अधिष्ठित होकर ही प्रवृत्त होते देखे जाते हैं (केवल शक्ति-मात्र से स्वतः प्रवृत्ति नहीं)।
श्लोक 2.144
तस्य च नित्यत्वात् ॥ १४ ॥
tasya ca nityatvāt || 14 ||
और इस मत का अनुसरण करने पर भी शरीर-स्थ जीव का भोक्तृत्व नष्ट नहीं होता (यह आक्षेप कि 'यदि देवता ही अधिष्ठाता हैं तो भोक्तृत्व भी उन्हीं का होना चाहिए, शारीर जीव का नहीं' - इसका समाधान): इस शरीर में जीव का ही नित्य भोक्तृत्व है (पुण्य-पाप का उपलेप और सुख-दुःख का उपभोग जीव में ही सम्भव है, देवताओं में नहीं, क्योंकि वे परम ऐश्वर्य-पद में स्थित रहकर हीन शरीर में भोक्तृत्व ग्रहण नहीं करतीं); तथा शरीर के साथ प्राणों का नित्य सम्बन्ध ही है (उत्क्रान्ति आदि में भी उनका अनुसरण दिखाया गया है) - अतः करणों के नियामक देवता होने पर भी शरीर की भोक्तृता नष्ट नहीं होती, क्योंकि देवता केवल करण-पक्ष के अधिष्ठाता हैं, भोक्तृ-पक्ष के नहीं।
श्लोक 2.145
त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशाद् अन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ १५ ॥
ta indriyāṇi tadvyapadeśād anyatra śreṣṭhāt || 15 ||
पूर्वपक्ष: क्या वाक् आदि ग्यारह इतर-प्राण मुख्य प्राण की ही वृत्ति-भेद हैं, या स्वतंत्र भिन्न तत्त्व? श्रुति में मुख्य और इतर प्राणों को एक साथ लाकर 'त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन्' (वे सब उसी के रूप हुए) कहकर मुख्य-आत्मता का बोध कराया गया है, और 'प्राण' शब्द भी दोनों के लिए एक ही प्रयुक्त होता है - अतः वाक् आदि भी प्राण की ही वृत्तियाँ प्रतीत होती हैं। सिद्धांत: नहीं, वाक् आदि ग्यारह इन्द्रियाँ मुख्य प्राण से भिन्न, पृथक् तत्त्व हैं, क्योंकि उनके लिए 'इन्द्रिय' नाम से पृथक् व्यपदेश मिलता है (श्रेष्ठ मुख्य-प्राण को छोड़कर शेष ग्यारह को ही 'इन्द्रियाणि' कहा जाता है) - यह व्यपदेश-भेद तभी उपपन्न होता है जब तत्त्व-भेद भी वास्तविक हो, अन्यथा एक ही तत्त्व का कभी 'इन्द्रिय' कहा जाना और कभी न कहा जाना विरुद्ध होगा।
श्लोक 2.146
भेदश्रुतेर् वैलक्षण्याच् च ॥ १६ ॥
bhedaśruter vailakṣaṇyāc ca || 16 ||
और इसलिए भी वाक् आदि प्राण से पृथक् तत्त्व हैं कि श्रुति में उनका भेद-पूर्वक ('ते ह वाचमूचुः' कहकर वाक् आदि को असुर-नष्ट होने के बाद, फिर पृथक् 'अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः' कहकर मुख्य प्राण को असुर-नाशक के रूप में) वर्णन मिलता है, तथा 'मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुत' जैसे स्थलों में भी मन-वाक्-प्राण का पृथक्-पृथक् उल्लेख है - अतः वाक् आदि इन्द्रियाँ मुख्य प्राण से वैलक्षण्य (भेद-लक्षण) रखने वाला भिन्न तत्त्व ही सिद्ध होती हैं।
श्लोक 2.147
संज्ञामूर्तिकॢप्तिस् तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ १७ ॥
saṁjñāmūrtikḷptis tu trivṛtkurvata upadeśāt || 17 ||
पूर्वपक्ष: 'उस देवता (सत्) ने कहा - मैं इन तीनों देवताओं (तेज-जल-अन्न) में जीव-आत्मा से अनुप्रविष्ट होकर नाम-रूप का व्याकरण करूँगी' - यहाँ यह संशय है कि नाम-रूप का व्याकरण (त्रिवृत्करण, अर्थात् त्रि-मिश्रण) जीव करता है या परमेश्वर? 'अनेन जीवेनात्मना' विशेषण से तथा लोक में डित्थ-डवित्थ जैसे नामों और घट-शराव जैसे रूपों के व्याकरण में जीव की ही कर्तृत्व-प्रसिद्धि होने से जीव-कर्तृक ही यह व्याकरण प्रतीत होता है। सिद्धांत: नहीं, संज्ञा-मूर्ति (नाम-रूप) की क्लृप्ति (रचना) परमेश्वर की ही है, जीव की नहीं, क्योंकि 'त्रिवृत्करण' का उपदेश (उत्तम-पुरुष-प्रयोग 'व्याकरवाणि' द्वारा) परमेश्वर के ही निरपवाद कर्तृत्व का सूचक है; 'जीवेन' पद 'अनुप्रविश्य' से सम्बद्ध है, 'व्याकरवाणि' से नहीं - अतः यह परमेश्वर का ही कार्य है, जीव उसका केवल उपाधि (साधन) है, राजा के चार-पुरुष के समान।
श्लोक 2.148
मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश् च ॥ १८ ॥
māṁsādi bhaumaṁ yathāśabdamitarayoś ca || 18 ||
आचार्य अब आशंका के निराकरण हेतु यथाश्रुति (श्रुति के अनुसार) वर्णन दिखाते हैं: त्रिवृत् (त्रि-मिश्रित) पृथ्वी को पुरुष द्वारा खाए जाने पर, यथा-शब्द (शब्द के अनुसार) मांसादि कार्य निष्पन्न होता है - 'अन्नमशितं त्रेधा विधीयते' (खाया हुआ अन्न तीन प्रकार से विभाजित होता है) के अनुसार स्थूलतम भाग पुरीष (मल) बनता है, मध्यम भाग मांस, और सूक्ष्मतम भाग मन बनता है; इसी प्रकार जल और तेज के भी यथा-शब्द कार्य समझने चाहिए - जल का स्थूल भाग मूत्र, मध्यम भाग रक्त, सूक्ष्म भाग प्राण बनता है; तेज का स्थूल भाग अस्थि, मध्यम भाग मज्जा, सूक्ष्म भाग वाक् बनता है।
श्लोक 2.149
वैशेष्यात् तु तद्वादस् तद्वादः ॥ १९ ॥
vaiśeṣyāt tu tadvādas tadvādaḥ || 19 ||
आक्षेप: यदि सभी भूत-भौतिक द्रव्य समान रूप से त्रिवृत्-कृत (तीनों का मिश्रण) ही हैं, तो 'यह तेज है, यह जल है, यह अन्न है' अथवा 'यह मांसादि अन्न का कार्य है, यह रक्तादि जल का कार्य है, यह अस्थ्यादि तेज का कार्य है' - ऐसा विशेष-व्यपदेश किस आधार पर किया जाता है? समाधान: 'तु' शब्द से इस आक्षेप का निराकरण होता है - त्रिवृत्करण होने पर भी वैशेष्य (आधिक्य, प्रधानता) के कारण ही ऐसा विशेष-व्यपदेश उपपन्न है - अग्नि में तेज का, जल में जल का, पृथ्वी में अन्न का आधिक्य-अंश रहता है, और यह त्रिवृत्करण लोक-व्यवहार-सिद्धि के लिए ही है (अन्यथा त्रिवृत् रस्सी की भांति एकत्व होने पर लोक में भूत-त्रय-विषयक भेद-व्यवहार ही असम्भव हो जाता)। 'तद्वादस्तद्वादः' यह पद-द्वित्व सम्पूर्ण अध्याय (और ग्रन्थ) की समाप्ति सूचित करता है।
श्लोक 3.1
तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॥ १ ॥
tadantarapratipattau raṁhati saṁpariṣvaktaḥ praśnanirūpaṇābhyām || 1 ||
(अधिकरण: तदन्तरप्रतिपत्ति — मृत्यु के बाद दूसरे शरीर की प्राप्ति) जब जीव दूसरा शरीर धारण करने जाता है, तब वह सूक्ष्म भूतों से आवृत होकर गमन करता है, जैसा कि पञ्चाग्निविद्या के प्रश्न ("क्या तुम जानते हो कि पाँचवीं आहुति में जल कैसे पुरुष कहलाता है") और उसके उत्तर से सिद्ध होता है।
श्लोक 3.2
त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ॥ २ ॥
tryātmakatvāt tu bhūyastvāt || 2 ||
परन्तु जीव केवल जल से ही आवृत नहीं होता, क्योंकि त्रिवृत्करण के सिद्धांत के अनुसार जल भी, अन्य भूतों की भांति, त्रिगुणात्मक है (प्रत्येक भूत में अन्य दो भूतों के अंश रहते हैं); "जल" शब्द केवल उन सूक्ष्म भूतों में प्रधान भूत का सूचक है जिनसे जीव आवृत रहता है।
श्लोक 3.3
प्राणगतेश् च ॥ ३ ॥
prāṇagateś ca || 3 ||
और क्योंकि प्राण भी जीव के साथ प्रयाण करते हैं, यह श्रुति में कहा गया है — यह तभी संभव है जब उनका कोई आश्रय हो — इससे भी सिद्ध होता है कि केवल जल नहीं, अपितु समस्त सूक्ष्म भूत ही जीव के साथ जाते हैं।
श्लोक 3.4
अग्न्यादिश्रुतेर् इति चेन् न भाक्तत्वात् ॥ ४ ॥
agnyādiśruter iti cen na bhāktatvāt || 4 ||
पूर्वपक्ष: श्रुति कहती है कि मृत्यु के समय वाणी आदि इन्द्रियाँ अग्नि आदि देवताओं में लीन हो जाती हैं, अतः वे जीव के साथ नहीं अपितु देवताओं में विलीन होती प्रतीत होती हैं। सिद्धांत: नहीं, यह कथन गौण (लाक्षणिक) है — इसका अर्थ मात्र इतना है कि अग्नि आदि द्वारा वाणी आदि को जो सहायता मिलती थी वह मृत्यु के समय समाप्त हो जाती है, जैसे "रोम ओषधियों में जाते हैं" यह कथन भी लाक्षणिक ही है, वास्तविक नहीं।
श्लोक 3.5
प्रथमेऽश्रवणाद् इति चेन् न ता एव ह्य् उपपत्तेः ॥ ५ ॥
prathame'śravaṇād iti cen na tā eva hy upapatteḥ || 5 ||
पूर्वपक्ष: पञ्चाग्निविद्या में प्रथम अग्नि (स्वर्गलोक) के वर्णन में हुतद्रव्य के रूप में "जल" का उल्लेख नहीं, केवल "श्रद्धा" का उल्लेख है, तो यह कैसे निश्चित हो कि "पाँचवीं आहुति में जल ही पुरुष बनता है"? सिद्धांत: नहीं, क्योंकि युक्तिसंगत है कि वहाँ "श्रद्धा" शब्द से जल ही अभिप्रेत है — इसी से प्रश्न और उत्तर का आदि से अन्त तक सामंजस्य सिद्ध होता है।
श्लोक 3.6
अश्रुतत्वाद् इति चेन् नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ६ ॥
aśrutatvād iti cen neṣṭādikāriṇāṁ pratīteḥ || 6 ||
पूर्वपक्ष: यद्यपि जल का पाँच अग्नियों से गुजरना कहा गया है, तथापि कहीं भी यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि उन जलों से आवृत जीव ही "गमन" करते हैं। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि कौषीतकि श्रुति में यह स्पष्ट है कि यज्ञ-दान आदि करने वाले (इष्टादिकारी) ही पितृयाण मार्ग से चन्द्रलोक को प्राप्त होते हैं, इसी से यह ज्ञात हो जाता है।
श्लोक 3.7
भाक्तं वानात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ॥ ७ ॥
bhāktaṁ vānātmavittvāt tathā hi darśayati || 7 ||
अथवा, चन्द्रलोक में उन इष्टादिकारियों का देवताओं के "अन्न" (भोग्य) बनना भी लाक्षणिक ही है, क्योंकि वे आत्मज्ञानी (अनात्मवित्) नहीं होते — श्रुति स्वयं दर्शाती है कि "देवता न खाते हैं न पीते हैं, वे तो इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।"
श्लोक 3.8
कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च ॥ ८ ॥
kṛtātyaye'nuśayavān dṛṣṭasmṛtibhyāṁ yathetamanevaṁ ca || 8 ||
(अधिकरण: कृतात्यय — कृत कर्म के फल-भोग की समाप्ति पर) चन्द्रलोक में जिस कर्म के फलभोग के लिए जीव गया था, उसका क्षय होने पर, वह शेष कर्म-संस्कार (अनुशय) सहित ही नीचे उतरता है — यह श्रुति और स्मृति दोनों से सिद्ध है; वह उसी मार्ग से उतरता है जिससे गया था, और कुछ अंशों में उससे भिन्न प्रकार से भी।
श्लोक 3.9
चरणाद् इति चेन् न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ९ ॥
caraṇād iti cen na tadupalakṣaṇārtheti kārṣṇājiniḥ || 9 ||
पूर्वपक्ष: श्रुति तो कहती है कि उतरते हुए जीव की भावी योनि "आचरण" (चरण) से निश्चित होती है, न कि किसी शेष कर्म-संस्कार से। सिद्धांत (आचार्य कार्ष्णाजिनि के मत में): नहीं, क्योंकि "आचरण" शब्द वहाँ उस शेष कर्म-संस्कार का ही द्योतक है, आचरण उसका मात्र बाह्य चिह्न है।
श्लोक 3.10
आनर्थक्यम् इति चेन् न तदपेक्षत्वात् ॥ १० ॥
ānarthakyam iti cen na tadapekṣatvāt || 10 ||
पूर्वपक्ष: यदि केवल शेष कर्म ही योनि-निर्धारक है, तो सदाचार निरर्थक हो जाएगा। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि इष्टादि कर्म का फल आचार पर निर्भर करता है — कर्म तभी सुफल देता है जब उसके साथ सदाचार हो; अतः आचार निरर्थक नहीं, यद्यपि निर्णायक तत्त्व शेष कर्म ही है।
श्लोक 3.11
सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ११ ॥
sukṛtaduṣkṛte eveti tu bādariḥ || 11 ||
किन्तु आचार्य बादरि के मत में "चरण" शब्द यहाँ साक्षात् सुकृत और दुष्कृत कर्मों का ही वाचक है — "आचरण" और "कर्म" पर्यायवाची हैं, न कि आचरण किसी भिन्न वस्तु का सूचक मात्र है।
श्लोक 3.12
अनिष्टादिकारिणाम् अपि च श्रुतम् ॥ १२ ॥
aniṣṭādikāriṇām api ca śrutam || 12 ||
(अधिकरण: अनिष्टादिकारी — यज्ञादि न करने वालों की गति) श्रुति में यह भी कहा गया है कि यज्ञ-दानादि न करने वाले (अनिष्टादिकारी) भी चन्द्रलोक को जाते हैं — कौषीतकि श्रुति में निर्विशेष रूप से कहा गया है कि "जो भी इस लोक से जाते हैं, वे सब चन्द्रमा को ही प्राप्त होते हैं" — इससे प्रश्न उठता है कि क्या अकर्मी भी वहाँ जाते हैं।
श्लोक 3.13
संयमने त्व् अनुभूयेतरेषामारोहाव् अरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॥ १३ ॥
saṁyamane tv anubhūyetareṣāmārohāv arohau tadgatidarśanāt || 13 ||
सिद्धांत: नहीं — जिन्होंने ऐसे कर्म नहीं किए, वे चन्द्रलोक को जाते ही नहीं; अपितु वे यम के संयमन-स्थान में दुःख भोगकर बिना आरोहण के ही पुनः नीचे उतर आते हैं — यम के अधीन होने के वर्णन से यह सिद्ध है।
श्लोक 3.14
स्मरन्ति च ॥ १४ ॥
smaranti ca || 14 ||
और स्मृति भी इसकी पुष्टि करती है कि दुष्ट जन संयमन-स्थान में यम के अधीन रहते हैं।
श्लोक 3.15
अपि सप्त ॥ १५ ॥
api sapta || 15 ||
और स्मृति में रौरव आदि सात नरकों का भी उल्लेख है, जहाँ दुष्कर्मी अपने दुष्कर्मों का फल भोगते हैं — इससे भी सिद्ध होता है कि वे चन्द्रलोक तक नहीं पहुँचते।
श्लोक 3.16
तत्रापि तद्व्यापारादविरोधः ॥ १६ ॥
tatrāpi tadvyāpārādavirodhaḥ || 16 ||
उन सातों नरकों में चित्रगुप्त आदि अन्य अधिष्ठाता बताए गए हैं, तथापि इसमें कोई विरोध नहीं, क्योंकि वे सब यम के ही अभिकर्ता के रूप में कार्य करते हैं।
श्लोक 3.17
विद्याकर्मणोर् इति तु प्रकृतत्वात् ॥ १७ ॥
vidyākarmaṇor iti tu prakṛtatvāt || 17 ||
[छान्दोग्य के आगे के वचन "इन दोनों मार्गों में से किसी से भी नहीं..." के विषय में] "दोनों" से अभिप्राय विद्या और कर्म (अर्थात् देवयान और पितृयाण मार्ग) से है, क्योंकि प्रकरण में यही दोनों प्रस्तुत हैं; जो इन दोनों में से किसी का भी आश्रय नहीं लेते, वे बारम्बार जन्म-मरण करने वाले क्षुद्र जन्तुओं की तीसरी गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 3.18
न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ १८ ॥
na tṛtīye tathopalabdheḥ || 18 ||
उस तृतीय स्थिति (क्षुद्र जन्तु-योनि) में "पाँचवीं आहुति" का वह नियम (जो मनुष्य-शरीर के लिए आवश्यक है) लागू नहीं होता, क्योंकि श्रुति दर्शाती है कि वहाँ पाँच आहुतियों के क्रम के बिना भी जन्म हो जाता है।
श्लोक 3.19
स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ १९ ॥
smaryate'pi ca loke || 19 ||
इसके अतिरिक्त लोक में तथा इतिहास में भी प्रसिद्ध है कि द्रोण, धृष्टद्युम्न, सीता, द्रौपदी आदि कई प्राणी बिना सामान्य मैथुन-प्रक्रिया के ही उत्पन्न हुए (अयोनिज) — इससे भी सिद्ध होता है कि पाँच आहुतियों का नियम सार्वत्रिक नहीं है।
श्लोक 3.20
दर्शनाच् च ॥ २० ॥
darśanāc ca || 20 ||
और यह भी देखा जाता है कि स्वेदज तथा उद्भिज्ज प्राणी उस सामान्य प्रक्रिया के बिना ही उत्पन्न होते हैं — इससे भी यही सिद्ध होता है।
श्लोक 3.21
तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ २१ ॥
tṛtīyaśabdāvarodhaḥ saṁśokajasya || 21 ||
छान्दोग्य की "तीन योनियों" की सूची (अण्डज, जीवज, उद्भिज्ज) में स्वेदज प्राणी को तीसरे "उद्भिज्ज" शब्द के अन्तर्गत ही सम्मिलित समझना चाहिए — इस प्रकार अन्यत्र वर्णित चतुर्विध वर्गीकरण के साथ इसका सामंजस्य हो जाता है।
श्लोक 3.22
तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ २२ ॥
tatsvābhāvyāpattirupapatteḥ || 22 ||
(अधिकरण: स्वाभाव्यापत्ति — तत्सदृशता की प्राप्ति) अवरोहण के वर्णन ("वह आकाश बनता है, आकाश से वायु, वायु से धूम...") में जीव आकाश, वायु, धूम आदि का रूप साक्षात् धारण नहीं करता, अपितु केवल उनके सदृश हो जाता है, क्योंकि यही युक्तिसंगत है — आकाश तो एक, सर्वव्यापी और नित्य है, उसमें क्रमशः प्रवेश संभव नहीं।
श्लोक 3.23
नातिचिरेण विशेषात् ॥ २३ ॥
nāticireṇa viśeṣāt || 23 ||
(अधिकरण: नातिचिर — अधिक काल तक नहीं) जीव मेघ-वर्षा जैसी अवस्था में अधिक काल तक नहीं, अपितु अल्प काल तक ही रहकर वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरता है, क्योंकि श्रुति इस अवस्था को "अत्यन्त दुष्कर निष्क्रमण" कहकर उसे दुःखमय और अल्पकालिक दर्शाती है।
श्लोक 3.24
अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ॥ २४ ॥
anyādhiṣṭhite pūrvavadabhilāpāt || 24 ||
(अधिकरण: अन्याधिष्ठित — अन्य जीव द्वारा अधिष्ठित वस्तु में प्रवेश) उतरता हुआ जीव जब अन्य जीवों द्वारा अधिष्ठित धान्य-वनस्पति में प्रवेश करता है, तब भी वह पूर्ववत् (वायु-धूमादि की भांति) उनसे केवल संसर्गमात्र प्राप्त करता है, वास्तविक तादात्म्य नहीं — क्योंकि श्रुति के वचन में इस अवस्था के लिए किसी स्वतन्त्र कर्म का वर्णन नहीं है।
श्लोक 3.25
अशुद्धम् इति चेन् न शब्दात् ॥ २५ ॥
aśuddham iti cen na śabdāt || 25 ||
पूर्वपक्ष: पशुहिंसा से युक्त होने के कारण याज्ञिक कर्म को "अशुद्ध" मानकर, धान्यादि-जन्म को उसका उपयुक्त दुःखद फल माना जा सकता है। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि धर्म-अधर्म का निर्णय शास्त्र से ही होता है — विधिवत् किए गए वैदिक याज्ञिक कर्म अशुद्ध नहीं हैं, अतः उनका फल धान्य-जन्म नहीं हो सकता।
श्लोक 3.26
रेतःसिग्योगोऽथ ॥ २६ ॥
retaḥsigyogo'tha || 26 ||
तत्पश्चात् उतरता हुआ जीव उस अन्न को खाने वाले पुरुष के रेत के साथ संसर्ग को प्राप्त होता है ("जो अन्न खाता है और रेत सींचता है, वह उसी में पुनः हो जाता है") — यह भी संसर्गमात्र है, वास्तविक तादात्म्य नहीं, क्योंकि अभी-अभी भोजन करने वाला उसी क्षण साक्षात् रेत नहीं बन सकता।
श्लोक 3.27
योनेःशरीरम् ॥ २७ ॥
yoneḥśarīram || 27 ||
अन्त में, गर्भाशय में रेत के स्थापित होने पर, जीव के शेष कर्मानुसार [सुख-दुःख भोग योग्य] शरीर उत्पन्न होता है — इससे सिद्ध होता है कि केवल इस अन्तिम अवस्था में, वास्तविक गर्भ से जन्म लेकर ही, जीव पुनः सुख-दुःखयुक्त शरीर धारण करता है; बीच की सभी अवस्थाओं में केवल क्रमिक संसर्ग ही था, वास्तविक देहधारण नहीं।
श्लोक 3.28
सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॥ १ ॥
sandhye sṛṣṭirāha hi || 1 ||
(अधिकरण: सन्ध्य — जाग्रत और सुषुप्ति के मध्य की अवस्था) स्वप्नावस्था (सन्ध्य, अर्थात् जाग्रत और सुषुप्ति के संधिस्थल की अवस्था) में भी वास्तविक सृष्टि होती है, क्योंकि श्रुति कहती है "वह रथ से रथ-योग, मार्गों से मार्ग रचता है" और अन्त में कहती है "वही कर्ता है" — इससे सिद्ध होता है कि स्वप्न में भी वास्तविक कर्तृत्व है।
श्लोक 3.29
निर्मातारं चैके पुत्रादयश् च ॥ २ ॥
nirmātāraṁ caike putrādayaś ca || 2 ||
और कुछ वेदशाखाएँ स्वप्न में आत्मा को इच्छित वस्तुओं के निर्माता के रूप में वर्णित करती हैं — "जो सोए हुओं में जागता हुआ, कामना पर कामना रचता है" — और वहाँ पुत्र आदि को भी कामना का विषय समझा जाता है।
श्लोक 3.30
मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३ ॥
māyāmātraṁ tu kārtsnyenānabhivyaktasvarūpatvāt || 3 ||
किन्तु [सिद्धान्त पक्ष में] — नहीं, स्वप्न मात्र माया (आभास) है, क्योंकि उसका दृश्य-प्रपंच पूर्ण वास्तविक रूप में कभी प्रकट नहीं होता (वास्तविक वस्तुओं के लिए आवश्यक देश, काल और निमित्त उसमें नहीं मिलते, और जागने पर वह बाधित हो जाता है) — जबकि जाग्रत अनुभव इस प्रकार बाधित नहीं होता।
श्लोक 3.31
पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ४ ॥
parābhidhyānāt tu tirohitaṁ tato hyasya bandhaviparyayau || 4 ||
किन्तु [वह स्वप्न-माया] इसलिए उत्पन्न होती है कि जीव का ब्रह्म के साथ वास्तविक तादात्म्य अन्य वस्तु के ध्यान से (अर्थात् अविद्या से) आच्छादित हो जाता है — क्योंकि इसी से इसका बन्धन और उसका विपरीत, अर्थात् मोक्ष, दोनों होते हैं।
श्लोक 3.32
देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ५ ॥
dehayogādvā so'pi || 5 ||
अथवा [जीव के ज्ञान और ऐश्वर्य का यह आच्छादन, यद्यपि वह वस्तुतः परमात्मा से अभिन्न ही है] देह और उसके इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि उपाधियों के संयोग से होता है — यह भी उसकी अवस्था-विशेष है, परमात्मा से वास्तविक भेद नहीं।
श्लोक 3.33
सूचकश् च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ६ ॥
sūcakaś ca hi śruterācakṣate ca tadvidaḥ || 6 ||
और स्वप्न भविष्य के शुभ-अशुभ का सूचक भी है, जैसा श्रुति और स्वप्नशास्त्रविद् कहते हैं — यद्यपि स्वप्न में देखी वस्तुएँ (रथ आदि) असत्य हैं, तथापि उनका संकेत सत्य हो सकता है; अतः पूर्वोक्त "वह सृजन करता है" यह कथन लाक्षणिक ही समझना चाहिए — जैसे कहा जाता है "हल बैलों को खींचता है", वैसे ही यह भी निमित्तमात्र का कथन है।
श्लोक 3.34
तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ७ ॥
tadabhāvo nāḍīṣu tacchruterātmani ca || 7 ||
(अधिकरण: तदभाव — सुषुप्ति में स्वप्न का अभाव) सुषुप्ति में स्वप्न-ज्ञान का अभाव केवल नाड़ियों में या पुरीतत् (हृदय-आवरण) में ही नहीं होता, अपितु अन्ततः आत्मा (ब्रह्म) में ही होता है — क्योंकि नाड़ी, पुरीतत् और "सत् में लीन होना" — इन सब वर्णनों वाली श्रुतियाँ अन्ततः आत्मा को ही विश्रामस्थान बतलाती हैं।
श्लोक 3.35
अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ८ ॥
ataḥ prabodho'smāt || 8 ||
चूँकि आत्मा ही सुषुप्ति का वास्तविक विश्रामस्थान है, अतः इसी कारण जागरण भी इसी आत्मा से ही, सदा स्वाभाविक रूप से, होता है — जैसा श्रुति "यह कहाँ से आया" के उत्तर में कहती है — "जैसे अग्नि से सूक्ष्म चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से सभी प्राण निकलते हैं।"
श्लोक 3.36
स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ९ ॥
sa eva tu karmānusmṛtiśabdavidhibhyaḥ || 9 ||
(अधिकरण: कर्मानुस्मृतिशब्दविधि — कर्म, स्मृति और शब्द-विधि से सिद्धि) सुषुप्ति में लीन हुआ वही जीव पुनः जागता है, कोई अन्य नहीं — यह सिद्ध होता है: अधूरे कार्य को पुनः करने से, पूर्व अनुभव की स्मृति ("मैंने कल यह देखा था") से, श्रुति के कथनों से (कि प्राणी अपने ही रूप में पुनः उत्पन्न होते हैं), तथा कर्म-विद्या के विधानों से (जो निरर्थक हो जाते यदि प्रत्येक बार भिन्न जीव जागता)।
श्लोक 3.37
मुग्धेर्ऽधसंपत्तिः परिशेषात् ॥ १० ॥
mugdher'dhasaṁpattiḥ pariśeṣāt || 10 ||
(अधिकरण: मुग्ध — मूर्च्छा) मूर्च्छा (बेहोशी) ब्रह्म में आधे रूप से लय है — शेष तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, पूर्ण सुषुप्ति) से भिन्न होने के कारण, अवशेष-न्याय से — क्योंकि यह चेतनाशून्यता में सुषुप्ति जैसी तो है, परन्तु उससे भिन्न भी है (श्वास लयबद्ध नहीं, शरीर काँपता और भयभीत-सा रहता है, जगाना कठिन होता है), और यह मृत्यु भी नहीं (क्योंकि श्वास व उष्णता बनी रहती है) — अतः यह एक पृथक्, आंशिक अवस्था है।
श्लोक 3.38
न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ॥ ११ ॥
na sthānato'pi parasyobhayaliṅgaṁ sarvatra hi || 11 ||
(अधिकरण: उभयलिङ्ग — सगुण और निर्गुण दोनों लक्षणों वाली श्रुतियाँ) ब्रह्म में सगुण (जैसे "सर्वकर्मा, सर्वकाम") और निर्गुण (जैसे "न स्थूल, न अणु") — ये दोनों प्रकार के लक्षण एक साथ, न तो स्वतः और न उपाधि (पृथ्वी आदि) के कारण, संभव हैं — क्योंकि एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध धर्म एक साथ नहीं रह सकते, उपाधि से भी नहीं, क्योंकि उपाधि किसी वस्तु में वास्तविक गुण उत्पन्न नहीं कर सकती (जैसे लाख के संसर्ग से स्फटिक वास्तव में अशुद्ध नहीं होता)। अतः जहाँ भी कोई एक लक्षण ग्रहण किया जाए, वहाँ निर्गुण (निर्विकल्पक) ब्रह्म ही समझना चाहिए — क्योंकि ब्रह्म के स्वरूप-प्रतिपादक सभी वाक्य ("अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय") निर्विशेष ब्रह्म का ही उपदेश करते हैं।
श्लोक 3.39
भेदाद् इति चेन् न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ १२ ॥
bhedād iti cen na pratyekamatadvacanāt || 12 ||
पूर्वपक्ष: यह उचित नहीं, क्योंकि विद्या-विद्या में ब्रह्म के भिन्न-भिन्न रूप वर्णित हैं (चतुष्पाद ब्रह्म, षोडशकल ब्रह्म, वैश्वानर जिसका शरीर त्रिलोक है, इत्यादि) — अतः ब्रह्म को सगुण भी मानना पड़ेगा। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि प्रत्येक स्थान पर शास्त्र उस-उस उपाधि-भेद में ब्रह्म के अभेद (एकत्व) का ही उपदेश करता है — जैसे "यह पृथ्वी में तेजोमय-अमृतमय पुरुष और शरीर में तेजोमय-अमृतमय पुरुष — यह एक ही आत्मा है।" अतः ब्रह्म के विभिन्न रूपों की सिद्धि शास्त्र से नहीं होती; ऐसा भेद उपासना के प्रयोजन से ही है, वास्तविक अभिप्राय अभेद ही है।
श्लोक 3.40
अपि चैवम् एके ॥ १३ ॥
api caivam eke || 13 ||
और कुछ शाखाएँ भेद-दर्शन की निन्दापूर्वक अभेद-दर्शन का ही उपदेश करती हैं — "यह मन से ही प्राप्त करने योग्य है, यहाँ कुछ भी भेद नहीं है; जो यहाँ भेद देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है" — तथा "भोक्ता, भोग्य और प्रेरक को जानकर सब कुछ त्रिविध ब्रह्म कहा गया है" — अर्थात् समस्त भोक्ता-भोग्य-नियन्ता जगत् एक ब्रह्म-स्वभाव वाला ही है।
श्लोक 3.41
अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ १४ ॥
arūpavadeva hi tatpradhānatvāt || 14 ||
क्योंकि ब्रह्म को रूपादि-रहित ही समझना चाहिए, रूपादि-युक्त नहीं — क्योंकि यही उपनिषदों के प्रमुख वाक्यों का मुख्य अभिप्राय है: जैसे "न स्थूल, न अणु, न ह्रस्व, न दीर्घ", "अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय", "आकाश ही नाम-रूप का निर्वाहक है; जो उन दोनों के बीच है वही ब्रह्म है", "दिव्य पुरुष, अमूर्त, सबाह्य-अभ्यन्तर, अजन्मा" — ये वाक्य मुख्यतः निराकार ब्रह्म-तत्त्व के प्रतिपादन में ही तत्पर हैं; अतः ऐसे वाक्यों में यथाश्रुत निराकार ब्रह्म ही ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 3.42
प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ १५ ॥
prakāśavaccāvaiyarthyāt || 15 ||
वे भी निरर्थक नहीं, अपितु प्रकाश के समान उपासनार्थ हैं — जैसे सूर्य या चन्द्रमा का प्रकाश आकाश में व्याप्त रहते हुए भी अंगुली आदि उपाधि के संयोग से उसके सीधे-टेढ़े आकार को धारण करता प्रतीत होता है, यद्यपि वास्तव में वह वैसा नहीं होता — वैसे ही ब्रह्म भी पृथ्वी आदि उपाधियों के संयोग से उनका आकार धारण करता-सा प्रतीत होता है, और उस आभासी आकार के आश्रय से किया गया ब्रह्म का सगुण-वर्णन उपासनार्थ सार्थक है; क्योंकि किसी वेदवाक्य को सार्थक और किसी को निरर्थक मानना उचित नहीं, सभी वाक्य समान प्रमाणभूत हैं।
श्लोक 3.43
आह च तन्मात्रम् ॥ १६ ॥
āha ca tanmātram || 16 ||
और श्रुति स्पष्टतः ब्रह्म को शुद्ध चैतन्यमात्र, किसी भी भिन्न रूप से रहित, कहती है — "जैसे लवण का पिण्ड भीतर-बाहर रहित, पूर्णतः रसघन ही है, वैसे ही यह आत्मा भीतर-बाहर रहित, पूर्णतः प्रज्ञानघन ही है।"
श्लोक 3.44
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ १७ ॥
darśayati cātho api smaryate || 17 ||
श्रुति यह भी निषेधात्मक रूप से दर्शाती है — ब्रह्म, सर्व-विशेषरहित होने के कारण, केवल अन्य समस्त का निषेध करके ही वर्णित किया जाता है: "इसका उपदेश 'न इति, न इति' है" — "वह ज्ञात से भी अन्य है, और अज्ञात से भी परे है" — "जहाँ से वाणी मन के साथ लौट आती है, उसे पाए बिना।" और बाढ्व द्वारा पूछे जाने पर बाष्कलि ने मौन द्वारा ही ब्रह्म का उपदेश दिया — "वे मौन रहे... 'हम तुमसे कहते ही हैं — तुम समझ नहीं पा रहे। यह आत्मा उपशान्त है'।" इसी प्रकार स्मृति भी केवल अन्य सबके निषेध द्वारा ही इसका उपदेश करती है — "मैं उस ज्ञातव्य तत्त्व को कहूँगा... अनादि परम ब्रह्म, न सत् न असत् कहा जाता है।"
श्लोक 3.45
अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ १८ ॥
ata eva copamā sūryakādivat || 18 ||
और क्योंकि यह आत्मा शुद्ध चैतन्य-स्वरूप, सर्व-विशेषरहित, वाणी-मन से परे, केवल अन्य के निषेध द्वारा ही उपदिष्ट है — इसी कारण मोक्षशास्त्रों में "जल में सूर्य के प्रतिबिम्ब" जैसी उपमा दी जाती है, ताकि उपाधिकृत आभासी भेद (वास्तविक नहीं) समझाया जा सके — "जैसे यह एक ही सूर्यरूप आत्मा जल में बँटकर अनेक-सा प्रतीत होता है, वैसे ही यह अजन्मा आत्मा भी क्षेत्र-क्षेत्र में उपाधिकृत भेदरूप प्रतीत होता है।"
श्लोक 3.46
अत्र प्रत्यवस्थीयते अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ॥ १९ ॥
atra pratyavasthīyate ambuvadagrahaṇāt tu na tathātvam || 19 ||
यहाँ आपत्ति उठाई जाती है — यह जल-सूर्य का दृष्टान्त उपयुक्त नहीं, क्योंकि उपमान में वैसा ग्रहण संभव नहीं है — सूर्य से भिन्न, दूरस्थ, मूर्त जल ही प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है; परन्तु आत्मा न तो मूर्त है, न उसकी उपाधियाँ उससे भिन्न या दूरस्थ हैं, क्योंकि वह सर्वव्यापी और सबसे अभिन्न है — अतः यह दृष्टान्त असंगत है।
श्लोक 3.47
वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवं दर्शनाच् च ॥ २० ॥
vṛddhihrāsabhāktvamantarbhāvādubhayasāmañjasyādevaṁ darśanāc ca || 20 ||
यहाँ उत्तर दिया जाता है — यह दृष्टान्त सर्वथा उपयुक्त है, अभीष्ट अंश की दृष्टि से — क्योंकि कोई भी दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिक जोड़ा हर पक्ष में पूर्ण साम्य नहीं दिखा सकता। यहाँ अभिप्रेत साम्य यह है: जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब जल की वृद्धि-ह्रास-चलन-भेद के अनुसार बढ़ता-घटता-हिलता-टूटता है, यद्यपि सूर्य स्वयं वैसा नहीं होता — वैसे ही ब्रह्म भी, यद्यपि परमार्थतः अविकारी और एक है, देहादि उपाधियों में सन्निविष्ट होने से उपाधि के गुणों — वृद्धि-ह्रास आदि — का आभास-मात्र धारण करता-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार अभीष्ट अंश में दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिक का सामंजस्य होने से कोई विरोध नहीं।
श्लोक 3.48
प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥ २१ ॥
prakṛtaitāvattvaṁ hi pratiṣedhati tato bravīti ca bhūyaḥ || 21 ||
(अधिकरण: प्रकृतैतावत्त्व — प्रसंग में वर्णित "इतनी मात्रा" का निषेध) [बृहदारण्यक में "ब्रह्म के दो ही रूप हैं — मूर्त और अमूर्त" — यह कहकर फिर कहा गया है] "अब इसके पश्चात् उपदेश है: नेति नेति — क्योंकि इससे परे और कुछ नहीं है" — यह निषेध प्रसंग में वर्णित मूर्त-अमूर्त इस द्विविध प्रपंच का ही निषेध करता है, और तत्पश्चात् श्रुति ब्रह्म को ही अवशिष्ट कहकर आगे वर्णन करती है — अर्थात् यह निषेध प्रपंच-जगत् का है, ब्रह्म का नहीं, जो "सत्य का सत्य" रूप में अवशिष्ट रहता है।
श्लोक 3.49
तदव्यक्तमाह हि ॥ २२ ॥
tadavyaktamāha hi || 22 ||
वह ब्रह्म जो "सत्य का सत्य" रूप में शेष रहता है, अव्यक्त है, इन्द्रियों से अग्राह्य है, क्योंकि वह समस्त दृश्य का साक्षी है — श्रुति कहती है: "यह न तो आँख से ग्रहण होता है, न वाणी से, न अन्य देवों (इन्द्रियों) से, न तप से, न कर्म से... यह अदृश्य, अग्राह्य है", और स्मृति भी: "इसे अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य कहा जाता है।"
श्लोक 3.50
अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ २३ ॥
api saṁrādhane pratyakṣānumānābhyām || 23 ||
और योगीजन संराधन-काल में (अर्थात् भक्ति, ध्यान, एकाग्र साधना के समय) इस समस्त प्रपंच-रहित, अव्यक्त आत्मा का साक्षात्कार करते हैं — यह प्रत्यक्ष श्रुति और अनुमान (अर्थात् स्मृति) दोनों से ज्ञात है: "स्वयंभू ने इन्द्रियों के छिद्रों को बाहर की ओर बेध दिया, इसीलिए मनुष्य बाहर देखता है, अन्तरात्मा को नहीं; किसी धीर पुरुष ने अमृतत्व की इच्छा से, दृष्टि भीतर मोड़कर, अन्तरात्मा को देखा" — तथा "ज्ञान की कृपा से, विशुद्ध-सत्त्व होकर, वह तब निष्कल का ध्यान करते हुए उसे देखता है।"
श्लोक 3.51
प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश् च कर्मण्यभ्यासात् ॥ २४ ॥
prakāśādivaccāvaiśeṣyaṁ prakāśaś ca karmaṇyabhyāsāt || 24 ||
और इससे यह ध्याता-ध्येय अन्ततः भिन्न सिद्ध नहीं होते — जैसे प्रकाश, आकाश, सूर्य आदि अंगुली, हाथ या जल जैसी उपाधियों के संबंध से विशिष्ट-से प्रतीत होते हुए भी अपने स्वाभाविक निर्विशेष स्वरूप को नहीं त्यागते, वैसे ही यह ध्याता-ध्येय का भेद भी केवल उपाधिकृत है; वास्तव में एकत्व ही है — और वेदान्त बार-बार अभ्यास (पुनरावृत्ति) द्वारा जीव और परमात्मा (यहाँ प्राज्ञ भी कहा गया) के अभेद को ही सिद्ध करता है।
श्लोक 3.52
अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥ २५ ॥
ato'nantena tathā hi liṅgam || 25 ||
और इसलिए, क्योंकि अभेद स्वाभाविक है और भेद केवल अविद्या से उत्पन्न है, जीव विद्या द्वारा अविद्या को दूर कर परम, अनन्त, चैतन्य आत्मा के साथ एकत्व को प्राप्त होता है — जैसा श्रुति का संकेत है: "जो उस परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है — ब्रह्म होकर ब्रह्म को प्राप्त करता है।"
श्लोक 3.53
उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ॥ २६ ॥
ubhayavyapadeśāttvahikuṇḍalavat || 26 ||
इसी संराध्य-संराधक भाव के प्रसंग में आचार्य स्वमत की शुद्धि हेतु अन्य मत प्रस्तुत करते हैं — कहीं जीव और परमात्मा का भेद कहा गया है ("तब वह निष्कल का ध्यान करते हुए उसे देखता है" — ध्याता-ध्येय भाव से, "वह दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है" — गन्ता-गन्तव्य भाव से, "जो अन्तर से सब भूतों को नियन्त्रित करता है" — नियन्ता-नियन्त्य भाव से); जबकि अन्यत्र उन्हीं के अभेद का कथन है ("तत् त्वम् असि", "अहं ब्रह्मास्मि", "वह तेरा सर्वान्तर आत्मा है, अमृत अन्तर्यामी")। दोनों प्रकार के कथन होने पर, यदि केवल अभेद ही मान लिया जाए तो भेद-कथन निराधार हो जाएगा — अतः दोनों प्रकार के कथन देखकर यहाँ तत्त्व सर्प और कुण्डल के समान समझना चाहिए — जैसे "सर्प" कहने से अभेद और "लम्बाई, कुण्डलाकार" कहने से भेद प्रतीत होता है, वैसे ही यहाँ भी।
श्लोक 3.54
प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ २७ ॥
prakāśāśrayavadvā tejastvāt || 27 ||
अथवा इसे प्रकाश और उसके आश्रय (सूर्य) के समान समझना चाहिए — जैसे सूर्य का प्रकाश और उसका आश्रयभूत सूर्य अत्यन्त भिन्न नहीं हैं (दोनों तेजोरूप हैं), तथापि भेद से भी कहे जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी।
श्लोक 3.55
पूर्ववद्वा ॥ २८ ॥
pūrvavadvā || 28 ||
अथवा, जैसा पहले कहा गया ("प्रकाशादि के समान — कोई भेद नहीं"), उसी प्रकार समझना चाहिए — क्योंकि बन्धन केवल अविद्याकृत है, इसीलिए विद्या द्वारा मोक्ष संगत है; परन्तु यदि कोई जीव वास्तव में बद्ध हो, सर्प के कुण्डल की भांति या प्रकाश-आश्रय के अंश की भांति परमात्मा से स्थित हो, तो वास्तविक बन्धन दूर नहीं हो सकता और मोक्षशास्त्र निरर्थक हो जाएगा। श्रुति भेद और अभेद दोनों को समान रूप से अन्तिम सत्य नहीं मानती — वह अभेद को ही प्रतिपाद्य रूप से सिखाती है, भेद का उल्लेख तो पूर्वसिद्ध वस्तु के अनुवाद रूप में, अन्य प्रयोजन से ही करती है। अतः "प्रकाशादि के समान — कोई भेद नहीं" यही सिद्धान्त है।
श्लोक 3.56
प्रतिषेधाच् च ॥ २९ ॥
pratiṣedhāc ca || 29 ||
और क्योंकि श्रुति स्पष्टतः अन्य किसी चेतन का निषेध करती है — "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है" — और "अब इसके पश्चात् उपदेश है: नेति नेति", "यह ब्रह्म अपूर्व, अनपर, अनन्तर, अबाह्य है" — इस प्रकार ब्रह्म से भिन्न सबके निराकरण और केवल ब्रह्म के शेष रहने से भी यही सिद्धान्त (अभेद) सिद्ध होता है।
श्लोक 3.57
परमतस्सेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३० ॥
paramatassetūnmānasaṁbandhabhedavyapadeśebhyaḥ || 30 ||
(अधिकरण: पर — ब्रह्म से परे कोई तत्त्व?) [पूर्वपक्ष:] इस ब्रह्म से परे कोई और तत्त्व अवश्य होना चाहिए — क्योंकि श्रुति ब्रह्म को "सेतु" (बाँध) कहती है (जो उस पार कुछ होने का संकेत करता है), "उन्मित" (मापा हुआ) कहती है (जो माप से परे कुछ होने का संकेत करता है), किसी के साथ "संबंध" में होना कहती है, और "भेद" से भी कहती है — इन चार प्रकार के श्रुति-प्रयोगों से यह प्रतीत होता है कि ब्रह्म से परे कुछ है।
श्लोक 3.58
सामान्यात् तु ॥ ३१ ॥
sāmānyāt tu || 31 ||
[सिद्धान्त:] नहीं — क्योंकि सामान्य श्रुति-उपदेश के अनुसार सब कुछ केवल ब्रह्म से ही उत्पन्न और अभिन्न है — "सत् ही था, हे सौम्य, यह आरम्भ में, एक ही, अद्वितीय" — यह स्पष्ट कथन, और यह आश्वासन कि एक को जानने से सब जाना जाता है, ब्रह्म से भिन्न किसी वस्तु के अस्तित्व का निषेध करते हैं।
श्लोक 3.59
बुद्ध्यर्थः पादवत् ॥ ३२ ॥
buddhyarthaḥ pādavat || 32 ||
["उन्मित" (मापा हुआ) कथन — "यह ब्रह्म चार पाद वाला, आठ खुरों वाला, सोलह कलाओं वाला है" — के विषय में] यह बुद्धि के लिए है, अर्थात् उपासना के प्रयोजन से है [इसका अर्थ यह नहीं कि उस सीमा से परे कुछ और है] — पाद (मुद्रा के भाग) के समान: जैसे कार्षापण (मुद्रा) को व्यावहारिक सुविधा के लिए चतुर्थांशों में बाँटा जाता है (यद्यपि सम्पूर्ण मुद्रा एक अखण्ड इकाई है), वैसे ही, चूँकि विभिन्न क्षमता वाले मनों के लिए अनन्त, अविकारी ब्रह्म पर स्थिर होना असंभव है, विकार के माध्यम से यह "मापन" केवल उपासनार्थ रचा गया है।
श्लोक 3.60
स्थानविशेषात्प्रकाशादिवत् ॥ ३३ ॥
sthānaviśeṣātprakāśādivat || 33 ||
यहाँ ("संबंध" और "भेद" कथनों का) समाधान एक साथ दिया जाता है — दोनों ही केवल उपाधि (मन-बुद्धि आदि) के स्थान-विशेष के कारण उत्पन्न होते हैं — प्रकाश के समान। सुषुप्ति में वर्णित "संबंध" ("वह सत् से संपन्न हो जाता है") का अर्थ केवल इतना है: जब बुद्धि आदि उपाधि के स्थान-विशेष के संयोग से उत्पन्न विशेष ज्ञान उपाधि की शान्ति होने पर लुप्त हो जाता है, तब उस शान्ति को उपाधि की दृष्टि से "परमात्मा से संबंध" कहा जाता है, वास्तविक परिमितता के कारण नहीं। इसी प्रकार वर्णित "भेद" भी केवल भिन्न-भिन्न उपाधियों के संयोग से है, ब्रह्म के अपने स्वरूप में वास्तविक भेद के कारण नहीं — जैसे एक ही प्रकाश या एक ही आकाश भिन्न-भिन्न वस्तुओं के सापेक्ष भिन्न-सा प्रतीत होता है।
श्लोक 3.61
उपपत्तेश् च ॥ ३४ ॥
upapatteś ca || 34 ||
और यह व्याख्या ही युक्तिसंगत है, अन्य नहीं — क्योंकि श्रुति इसे सुषुप्ति में अपने ही वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति के रूप में वर्णित करती है: "वह अपने में लीन हो जाता है" — यह स्वरूप-तादात्म्य का संबंध दर्शाता है, दो पृथक् परिमित वस्तुओं (जैसे मनुष्य और नगर) के बीच के संबंध जैसा नहीं — क्योंकि आत्मा का वास्तविक स्वरूप कभी वास्तव में लुप्त नहीं होता; केवल उपाधिकृत उसका आच्छादन ही अस्थायी रूप से हटता है। इसी प्रकार भेद भी अन्य प्रकार का संभव नहीं, क्योंकि यह बहुश्रुतिप्रसिद्ध एकेश्वरत्व के विरुद्ध होगा; और श्रुति स्वयं दर्शाती है कि एक ही आकाश स्थान-भेद से भिन्न-भिन्न वर्णित होता है — "व्यक्ति के बाहर का आकाश", "व्यक्ति के भीतर का आकाश", "हृदय के भीतर का आकाश।"
श्लोक 3.62
तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३५ ॥
tathānyapratiṣedhāt || 35 ||
इस प्रकार "सेतु आदि" पूर्वपक्ष के हेतुओं का खण्डन करके, आचार्य अब एक अन्य हेतु से अपना ही सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं — इसी प्रकार, श्रुति के अन्य के निषेध से भी सिद्ध होता है कि ब्रह्म से परे कुछ नहीं है — क्योंकि "वह नीचे भी वही है", "मैं ही नीचे हूँ", "यह सब ब्रह्म ही है", "आत्मा ही यह सब है", "यहाँ कुछ भी विविधता नहीं है", "उससे परे और कुछ नहीं", "यह ब्रह्म अपूर्व, अनपर, अनन्तर, अबाह्य है" — ऐसे वाक्य, अपने-अपने प्रामाणिक प्रसंग में स्थित होने से, अन्य अर्थ में नहीं ले जाए जा सकते; ये ब्रह्म से परे किसी वस्तु का निषेध करते हैं। और "सर्वान्तर" (सबके भीतर) की श्रुति से भी यह सिद्ध होता है कि परमात्मा से भिन्न कोई अन्तरात्मा नहीं है।
श्लोक 3.63
अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३६ ॥
anena sarvagatatvamāyāmaśabdādibhyaḥ || 36 ||
इस "सेतु आदि" के खण्डन तथा अन्य के निषेध के आश्रय से आत्मा की सर्वव्यापकता भी सिद्ध होती है — अन्यथा वह सिद्ध न होती: यदि "सेतु आदि" को शब्दशः ग्रहण किया जाए तो आत्मा परिमित सिद्ध हो जाएगी, क्योंकि सेतु आदि स्वयं परिमित वस्तुएँ हैं; इसी प्रकार अन्य के निषेध के बिना भी आत्मा की परिमितता पुनः सिद्ध हो जाती। और उसकी सर्वव्यापकता "आयाम" (विस्तार) आदि शब्दों से ज्ञात होती है — "जितना यह आकाश है, उतना ही यह हृदय के भीतर का आकाश है", "आकाश के समान सर्वव्यापी और नित्य", "स्वर्ग से भी बड़ा, आकाश से भी बड़ा", "नित्य, सर्वव्यापी, स्थाणु, अचल, सनातन" — ऐसे श्रुति-स्मृति के न्याय आत्मा की सर्वव्यापकता सिद्ध करते हैं।
श्लोक 3.64
फलमत उपपत्तेः ॥ ३७ ॥
phalamata upapatteḥ || 37 ||
(अधिकरण: फल — कर्मफल का दाता) उसी ब्रह्म की व्यावहारिक ईश्वर-ईश्य विभाग वाली अवस्था में अब एक अन्य पक्ष वर्णित है। प्राणियों को संसार में भोगने योग्य इष्ट, अनिष्ट और मिश्र — यह त्रिविध कर्मफल — क्या स्वयं कर्म से उत्पन्न होता है, या ईश्वर से? पहले यह प्रस्तुत किया जाता है कि फल ईश्वर से ही उत्पन्न होना चाहिए, क्योंकि यह युक्तिसंगत है — वह सर्वाध्यक्ष, देश-काल का ज्ञाता, कर्मियों को उनके कर्मानुरूप फल प्रदान करता है; जबकि क्षणभंगुर कर्म से, जो तत्काल नष्ट हो जाता है, कालान्तर में उत्पन्न होने वाला फल युक्तिसंगत नहीं, क्योंकि असत् से सत् की उत्पत्ति नहीं होती।
श्लोक 3.65
श्रुतत्वाच् च ॥ ३८ ॥
śrutatvāc ca || 38 ||
और केवल युक्ति से ही नहीं, अपितु श्रुति से भी हम ईश्वर को ही फलदाता मानते हैं — "वह महान, अजन्मा आत्मा, अन्नाद, वसुदान है" — इत्यादि ऐसी श्रुतियों से।
श्लोक 3.66
धर्मं जैमिनिरत एव ॥ ३९ ॥
dharmaṁ jaiminirata eva || 39 ||
किन्तु आचार्य जैमिनि के मत में धर्म (अर्थात् कर्म स्वयं, यज्ञ से उत्पन्न अपूर्व-शक्ति) ही फलदाता है — इसी हेतु से: श्रुति से ("स्वर्गकामी यज्ञ करे" — जिससे यज्ञ स्वयं स्वर्ग का उत्पादक सिद्ध होता है) और युक्ति से (कि यदि कर्म स्वयं फलोत्पादक न हो, तो विधि निरर्थक हो जाएगी)।
श्लोक 3.67
पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् ॥ ४० ॥
pūrvaṁ tu bādarāyaṇo hetuvyapadeśāt || 40 ||
किन्तु आचार्य बादरायण पूर्वोक्त मत को ही मानते हैं, कि ईश्वर ही फलदाता है — क्योंकि श्रुति उसे धर्म-अधर्म दोनों के तथा उनके फल के कारणरूप में वर्णित करती है: श्रुति ईश्वर को उस कारण के रूप में वर्णित करती है जो प्राणियों से शुभ या अशुभ कर्म करवाता है, और फलदाता के रूप में "जिसे इन लोकों से ऊपर ले जाना चाहता है, उससे शुभ कर्म करवाता है; और जिसे नीचे ले जाना चाहता है, उससे अशुभ कर्म करवाता है" — और यही भाव भगवद्गीता में भी वर्णित है; और समस्त वेदान्त में सृष्टि सर्वत्र ईश्वर द्वारा कारित ही वर्णित है; और यही तथ्य — कि वह प्राणियों को उनके अपने कर्मानुसार उत्पन्न करता है — ही उसका फल-कारणत्व है। जो दोष बताए गए (अविचित्र कारण से विचित्र कार्य, वैषम्य, नैर्घृण्य) वे लागू नहीं होते, क्योंकि ईश्वर सदैव प्राणियों के पूर्वकृत प्रयत्न (कर्म) की अपेक्षा रखकर ही कार्य करता है।
श्लोक 3.68
सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ॥ १ ॥
sarvavedāntapratyayaṁ codanādyaviśeṣāt || 1 ||
(अधिकरण: सर्ववेदान्तप्रत्यय — विभिन्न शाखाओं में एक ही विद्या) विभिन्न वेदशाखाओं में समान नाम से उपदिष्ट विद्याएँ (जैसे प्राणविद्या, पञ्चाग्निविद्या, वैश्वानरविद्या, शाण्डिल्यविद्या) एक ही विद्या माननी चाहिए, क्योंकि प्रयोजन, विधि आदि में कोई भेद नहीं होता।
श्लोक 3.69
भेदान् नेति चेद् एकस्याम् अपि ॥ २ ॥
bhedān neti ced ekasyām api || 2 ||
पूर्वपक्ष: वाजसनेयी शाखा पञ्चाग्निविद्या में एक छठा अग्नि जोड़ती है, जिसे छान्दोग्य नहीं गिनता; इसी प्रकार चार प्राणों में एक पाँचवाँ भी जोड़ती है — तो यह एक विद्या कैसे हो सकती है? सिद्धांत: नहीं, क्योंकि एक ही विद्या में भी ऐसा गुण-भेद संभव है — मुख्य पाँच अग्नि दोनों शाखाओं में समान रूप से पहचाने जाते हैं, अतः विद्या का एकत्व स्थिर है और अतिरिक्त अंश एक ही विद्या में संयोजित (उपसंहृत) किए जाने चाहिए।
श्लोक 3.70
स्वाध्यायस्य तथात्वे हि समाचारेऽधिकाराच् च सववच् च तन्नियमः ॥ ३ ॥
svādhyāyasya tathātve hi samācāre'dhikārāc ca savavac ca tanniyamaḥ || 3 ||
[समर्थन में] जैसे स्वाध्याय की व्यावहारिक विधि शाखा-शाखा में भिन्न दिखती है, तथापि अधिकार और सामान्य आचार एक ही रहता है — वैसे ही यहाँ भी नियम एक ही है, जैसे सव (सोमयागों) में प्रक्रिया-भेद से यज्ञ भिन्न नहीं होता।
श्लोक 3.71
दर्शयति च ॥ ४ ॥
darśayati ca || 4 ||
और श्रुति स्वयं इस विद्या-एकत्व को दर्शाती है — "सभी वेद उसी एक पद का बखान करते हैं" यह कहकर, तथा यह भी कि ऋक्, यजुः, साम की परम्पराओं में एक ही प्राणविद्या भिन्न-भिन्न नामों से ध्यान की जाती है — इससे सिद्ध होता है कि यह एक ही विद्या है, केवल नाम भिन्न।
श्लोक 3.72
उपसंहारोर्ऽथाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ५ ॥
upasaṁhāror'thābhedādvidhiśeṣavatsamāne ca || 5 ||
(अधिकरण: उपसंहार — गुणों का संयोजन) यह इस प्रकरण का प्रयोजन-सूत्र है: चूँकि विद्या का एकत्व सिद्ध हो चुका है, अतः एक शाखा में वर्णित गुण उसी विद्या में सर्वत्र संयोजित किए जाने चाहिए, क्योंकि उनका प्रयोजन भिन्न नहीं होता — जैसे अग्निहोत्र जैसे एक ही यज्ञ के अंग-विधान सर्वत्र संयोजित किए जाते हैं, क्योंकि वह एक ही यज्ञ है।
श्लोक 3.73
अन्यथात्वं शब्दाद् इति चेन् नाविशेषात् ॥ ६ ॥
anyathātvaṁ śabdād iti cen nāviśeṣāt || 6 ||
(अधिकरण: अन्यथात्व — विद्या-भेद की आशंका) पूर्वपक्ष: वाजसनेयी शाखा में मुख्य प्राण को उद्गीथ का गायक बताया गया है ("तुम हमारे लिए उद्गीथ गाओ"), जबकि छान्दोग्य में उसे उद्गीथ के साथ अभिन्न उपास्य बताया गया है — अतः विद्या-भेद है। सिद्धांत: नहीं, कोई भेद नहीं, क्योंकि दोनों वर्णनों में समान अंश (देवासुर-कथा, अन्य इन्द्रियों की निन्दा, मुख्य प्राण का आश्रय, उद्गीथ से उसका तादात्म्य) कहीं अधिक हैं, और शब्द-प्रयोग का भेद भी समन्वित हो सकता है।
श्लोक 3.74
न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ ७ ॥
na vā prakaraṇabhedāt parovarīyastvādivat || 7 ||
अथवा नहीं — यहाँ विद्या-एकत्व उचित नहीं, प्रकरण-भेद के कारण विद्या-भेद ही उचित है — जैसे "परोवरीयस्त्व" (उत्तरोत्तर श्रेष्ठता) का गुण उद्गीथ के लिए भिन्न-भिन्न प्रसंगों में भिन्न प्रकार से वर्णित है: छान्दोग्य में उद्गीथ के केवल अंश ओंकार पर प्राण-दृष्टि उपदिष्ट है, जबकि वाजसनेयक में सम्पूर्ण उद्गीथ-कर्म उसके कर्ता (गायक ऋत्विक्) सहित ही प्राण से अभिन्न बताया गया है — यह वस्तुतः भिन्न उपासना-क्षेत्र है, जैसे "अभ्युदय" और "पशुकाम" के मन्त्र शब्द-साम्य होते हुए भी भिन्न उपक्रम के कारण भिन्न विधान करते हैं।
श्लोक 3.75
संज्ञातश् चेत् तद् उक्तम् अस्ति तु तद् अपि ॥ ८ ॥
saṁjñātaś cet tad uktam asti tu tad api || 8 ||
पूर्वपक्ष: दोनों को समान रूप से "उद्गीथविद्या" कहा जाता है, अतः नामैक्य से विद्या-एकत्व सिद्ध होता है। सिद्धांत: नहीं, यह भी सिद्ध नहीं होता, जैसा पहले ही स्पष्ट किया गया — प्रकरण-भेद का हेतु शब्द-मूलक होने से अधिक प्रामाणिक है, जबकि केवल लोकप्रचलित नामैक्य शब्द के बाहर की बात है (जैसे "काठक" नाम से भिन्न-भिन्न यज्ञ भी एक साथ कहे जाते हैं); जहाँ अन्य कोई भेद-हेतु न हो (जैसे संवर्गविद्या में), वहीं नामैक्य से विद्या-एकत्व सिद्ध होता है।
श्लोक 3.76
व्याप्तेश् च समञ्जसम् ॥ ९ ॥
vyāpteś ca samañjasam || 9 ||
(अधिकरण: व्याप्ति — सर्वव्यापकता से समाधान) "ओंकार को उद्गीथ मानकर उपासना करे" इस वाक्य में "अक्षर" और "उद्गीथ" के सामानाधिकरण्य को अध्यास, अपवाद या एकत्व के रूप में नहीं, अपितु विशेषण-विशेष्य भाव के रूप में समझना उचित है — क्योंकि व्याप्ति के कारण: ओंकार सम्पूर्ण वेद में व्याप्त है, जबकि "उद्गीथ" साम-विशेष का वाचक है, अतः "उद्गीथ" उस व्यापक अक्षर के विशिष्ट अंश का निर्धारण करता है — जैसे "नील कमल लाओ" में विशेषण विषय को सीमित करता है।
श्लोक 3.77
सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ १० ॥
sarvābhedādanyatreme || 10 ||
(अधिकरण: सर्वाभेद — सर्वत्र अभेद से गुण-संयोजन) अन्यत्र भी (जैसे कौषीतकि में) जहाँ "प्राणसंवाद" में प्राण की श्रेष्ठता तो कही गई है, परन्तु "तुम श्रेष्ठ हो" जैसे विशिष्ट गुण वहाँ पुनः नहीं दोहराए गए — फिर भी वे गुण वहाँ भी लागू होने चाहिए, क्योंकि उपास्य वस्तु का सर्वत्र अभेद है — चूँकि यह सर्वत्र एक ही प्राणविद्या पहचानी जाती है, अतः पूर्व अधिकरण के न्याय से वे गुण भी जहाँ-जहाँ वही प्राणोपासना हो, वहाँ-वहाँ संयोजित होने चाहिए।
श्लोक 3.78
आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ११ ॥
ānandādayaḥ pradhānasya || 11 ||
(अधिकरण: आनन्दादि — आनन्दादि गुणों की सार्वत्रिकता) आनन्द, विज्ञानघनत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वात्मत्व आदि गुण, जहाँ भी ब्रह्म के प्रधान रूप में कहे गए हों, वे सर्वत्र ब्रह्म में समझे जाने चाहिए, क्योंकि विशेष्य ब्रह्म सर्वत्र अभिन्न ही है — जैसे देवदत्त की वीरता (एक बार सिद्ध होने पर) उसके हर स्थान पर पहचानी जाती है।
श्लोक 3.79
प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ १२ ॥
priyaśirastvādyaprāptirupacayāpacayau hi bhede || 12 ||
किन्तु "प्रिय ही जिसका शिर है" इत्यादि गुण (तैत्तिरीय के आनन्दमय-कोश-वर्णन से) अन्यत्र लागू नहीं होते — क्योंकि प्रिय, मोद, प्रमोद, आनन्द ये परस्पर सापेक्ष और भिन्न-भिन्न भोक्ताओं की अपेक्षा से वृद्धि-ह्रासयुक्त पाए जाते हैं, जो भेद की स्थिति में ही संभव है, जबकि ब्रह्म भेदरहित ("एक ही, अद्वितीय") है; ये ब्रह्म के गुण नहीं, अपितु कोश के गुण हैं, केवल मन को ब्रह्म की ओर उन्मुख करने का साधन-मात्र हैं, स्वयं ध्येय नहीं।
श्लोक 3.80
इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ १३ ॥
itare tvarthasāmānyāt || 13 ||
किन्तु अन्य गुण (जो वास्तव में ब्रह्म के स्वरूप के ही वाचक हैं, जैसे आनन्द, विज्ञानघनत्व आदि) सर्वत्र लागू होने चाहिए, क्योंकि प्रतिपाद्य वस्तु (ब्रह्म) की एकरूपता ही आधार है — उनका एकमात्र प्रयोजन ब्रह्म-स्वरूप का बोध कराना ही है।
श्लोक 3.81
आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ १४ ॥
ādhyānāya prayojanābhāvāt || 14 ||
(अधिकरण: आध्यात्म — पुरुष तक की आरोहणिका) कठोपनिषद् की श्रृंखला में — "इन्द्रियों से परे विषय, विषयों से परे मन, मन से परे बुद्धि... बुद्धि से परे कुछ नहीं — वही चरम गति है" — केवल पुरुष (आत्मा) ही सबसे परम रूप में उपदिष्ट है, प्रत्येक क्रमिक पद बराबर महत्त्व से "परम" नहीं कहा गया, क्योंकि केवल पुरुष-ज्ञान का ही प्रयोजन (मोक्ष) कहा गया है, मध्यवर्ती पदों को अन्तिम मानने का कोई प्रयोजन नहीं बताया गया; यह सम्पूर्ण आरोहण-श्रृंखला केवल ध्यान को आत्मा तक ले जाने के लिए है।
श्लोक 3.82
आत्मशब्दाच् च ॥ १५ ॥
ātmaśabdāc ca || 15 ||
और "आत्मा" शब्द के प्रयोग से भी (यह दर्शाते हुए कि यह गूढ़ आत्मा कठिनाई से ज्ञेय है, सूक्ष्म बुद्धि की अपेक्षा रखता है, और अन्त में "विष्णु के परम पद" तक पहुँचता है) — यह सम्पूर्ण क्रम केवल आत्मा तक पहुँचने के लिए ही उन्मुख है, इससे पुष्ट होता है कि केवल पुरुष ही, सीढ़ी का हर पद नहीं, अन्तिम लक्ष्य के रूप में उपदिष्ट है।
श्लोक 3.83
आत्मगृहीतिर् इतरवद् उत्तरात् ॥ १६ ॥
ātmagṛhītir itaravad uttarāt || 16 ||
(अधिकरण: आत्मगृहीति — "आत्मा" शब्द का अभिप्राय) ऐतरेय की सृष्टि-कथा में ("आत्मा ही आरम्भ में था, और कुछ भी नहीं था; उसने सोचा, 'लोकों की सृष्टि करूँ'...") क्या यहाँ "आत्मा" से परमात्मा अभिप्रेत है, या कोई अन्य (लघु, व्यष्टि सृष्टिकर्ता)? वाक्य-प्रवाह को देखकर (जिसमें साधारण परिमित कर्ता जैसा सक्रिय, प्रयत्नशील सृजन वर्णित है) प्रथमतः ऐसा प्रतीत हो सकता है कि कोई परिमित कर्ता अभिप्रेत है — परन्तु परमात्मा ही अभिप्रेत है, जैसा अन्यत्र भी, और इसी प्रसंग के आगे के भाग के बल पर भी।
श्लोक 3.84
अन्वयाद् इति चेत् स्याद् अवधारणात् ॥ १७ ॥
anvayād iti cet syād avadhāraṇāt || 17 ||
पूर्वपक्ष: वाक्य-प्रवाह (सादृश्यपूर्ण मानवाकार वर्णन के साथ) तो विपरीत ही सुझाता है। सिद्धांत: नहीं — निश्चयवाचक कथन के बल पर परमात्मा ही ग्रहण करना उचित है — क्योंकि सृष्टि-पूर्व आत्मा के एकत्व का कथन ("सत् ही था... एक ही, अद्वितीय") केवल परमात्मा के साथ ही उचित रूप से संगत है; मानवाकार विस्तृत कथा को भी अभिप्रेत अर्थ (जीव-ब्रह्म के तादात्म्य का उपदेश) के अनुरूप ही समझना चाहिए — आगे का भाग स्पष्टतः जीव-ब्रह्म-तादात्म्य को ही दर्शाता है; अतः यहाँ "आत्मा" का अभिप्राय बिना किसी अपवाद के परमात्मा ही है।
श्लोक 3.85
कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ १८ ॥
kāryākhyānādapūrvam || 18 ||
(अधिकरण: कार्याख्यान — पूर्वसिद्ध आचार का वर्णनमात्र होने से) भोजन के पूर्व-पश्चात् आचमन के प्रसंग में ("वे जल का आचमन करते हैं... इस प्रकार इस अन्न को अनग्न नहीं करते") क्या यहाँ आचमन की क्रिया विहित है, या उसके साथ की गई "अनग्नता की भावना" (अन्न को आन्तरिक अग्नि में अर्पित मानने का भाव)? विहित तो वह भावना ही है, आचमन नहीं — क्योंकि आचमन तो केवल पूर्वसिद्ध, सुप्रसिद्ध आचार का वर्णनमात्र है; जबकि खाए हुए अन्न को आन्तरिक अग्नि (प्राण) में हवि मानना ही वास्तव में अपूर्व है और इसलिए यहाँ वास्तव में विहित है।
श्लोक 3.86
समान एवं चाभेदात् ॥ १९ ॥
samāna evaṁ cābhedāt || 19 ||
(अधिकरण: समान — एक ही शाखा में विद्या-एकत्व) वाजसनेयक के अग्निरहस्य में शाण्डिल्यविद्या कुछ गुणों सहित उपदिष्ट है ("मनोमय, प्राणशरीर, भारूप आत्मा की उपासना करे"), और उसी शाखा के बृहदारण्यक में वह पुनः अन्य गुणों सहित उपदिष्ट है ("यह मनोमय, तेजोमय, सत्यरूप पुरुष... सबका ईशान, सबका अधिपति") — क्या ये एक विद्या है, गुण-संयोजन सहित, या दो भिन्न? ये एक ही हैं, और गुण संयोजित होने चाहिए, क्योंकि उपास्य में अभेद है — "एक वाक्य विद्या-विधान के लिए, दूसरा गुण-विधान के लिए" — यह विभाजन ही पौनरुक्त्य से बचाकर पूर्ण सामंजस्य देता है।
श्लोक 3.87
सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ २० ॥
sambandhādevamanyatrāpi || 20 ||
(अधिकरण: सम्बन्ध — एक ही वाक्य के संबंध से अन्यत्र भी) बृहदारण्यक के सत्यब्रह्म-प्रसंग में एक ही तत्त्व की दो "उपनिषदें" (गुह्य नाम) दी गई हैं — एक आधिदैविक पक्ष के लिए (सूर्य और उसके मण्डल में स्थित पुरुष), एक आध्यात्मिक पक्ष के लिए (दाहिने नेत्र में स्थित पुरुष)। क्या दोनों उपनिषदें दोनों पक्षों में अविभाजित रूप से लागू होनी चाहिए, या प्रत्येक अपने-अपने पक्ष तक सीमित रहनी चाहिए? [प्रथम दृष्टि में] चूँकि एक ही सत्य-तत्त्व की विद्या दोनों पक्षों में अविच्छिन्न रूप से वर्णित है, अतः जैसे शाण्डिल्यविद्या में गुण संयोजित होते हैं, वैसे ही यहाँ भी दोनों उपनिषदें दोनों पक्षों में लागू होनी चाहिए।
श्लोक 3.88
न वा विशेषात् ॥ २१ ॥
na vā viśeṣāt || 21 ||
[सिद्धान्त:] नहीं, अपितु कोई संयोजन नहीं है, क्योंकि विशिष्ट संकेत है — स्थान-विशिष्ट शब्द-प्रयोग ही: "जो यह उस मण्डल में पुरुष है — इसका गुह्य नाम 'वह' है"; "जो यह दाहिने नेत्र में पुरुष है — इसका गुह्य नाम 'मैं' है" — यहाँ सर्वनाम प्रत्येक गुह्य नाम को अपने निकटस्थ निर्देश्य से ही बाँधता है; अतः प्रत्येक उपनिषद् अपने ही विशिष्ट स्थान से जुड़ी है, जैसे आचार्य के बैठे रहने पर दिया गया निर्देश उनके खड़े होने पर लागू नहीं होता।
श्लोक 3.89
दर्शयति च ॥ २२ ॥
darśayati ca || 22 ||
और एक संकेत (लिङ्ग) भी यही भेद दर्शाता है — "इसका रूप ही उसका रूप है; इसकी दोनों आँखें ही उसकी आँखें हैं; इसका नाम ही उसका नाम है" — सूर्य-पुरुष के गुणों का नेत्र-पुरुष में यह अतिदेश (विशेष विस्तार) यही दर्शाता है कि ये गुण मूलतः भिन्न, असंयुक्त थे; अतः दोनों उपनिषदें पृथक् ही रहती हैं।
श्लोक 3.90
संभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥ २३ ॥
saṁbhṛtidyuvyāptyapi cātaḥ || 23 ||
(अधिकरण: संभृति — "गठन" और "द्युलोक-व्याप्ति") राणायनीय शाखा के खिल भाग में ब्रह्म की लोकोत्तर विभूतियाँ वर्णित हैं — "गठन (संभृति), ब्रह्म से पहले उत्पन्न, उच्च द्युलोक में व्याप्त हुआ"। क्या ये विभूतियाँ उसी परम्परा की उपनिषद् में वर्णित ब्रह्मविद्याओं (जैसे शाण्डिल्यविद्या) में संयोजित होनी चाहिए? नहीं होनी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक विद्या अपने-अपने विशिष्ट उपासना-स्थान से बँधी है — शाण्डिल्यविद्या, दहरविद्या, उपकोसलविद्या में हृदय या नेत्र निर्दिष्ट है — जबकि ये विभूतियाँ आधिदैविक स्तर की हैं, उनका उन हृदय-आधारित विद्याओं से कोई तुल्य स्थान-सामंजस्य नहीं; अतः स्थान-असंगति के कारण संयोजन नहीं होता।
श्लोक 3.91
पुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् ॥ २४ ॥
puruṣavidyāyāmapi cetareṣāmanāmnānāt || 24 ||
(अधिकरण: पुरुषविद्या — अन्य शाखा में अनुल्लेख के कारण असंयोजन) ताण्डी और पैंगी शाखाओं में एक "पुरुषविद्या" है, जिसमें मनुष्य के जीवन को यज्ञ रूप में कल्पित किया गया है। तैत्तिरीय शाखा में भी "पुरुषयज्ञ" की समान कल्पना है। क्या एक परम्परा की पुरुषविद्या के अंग दूसरी में संयोजित होने चाहिए? नहीं, क्योंकि दूसरी परम्परा का रूप पहचान में नहीं आता — तैत्तिरीय का यज्ञ-वर्णन अंगों के सहसंबंध में स्पष्टतः भिन्न है, और वहाँ षष्ठी-प्रयोग से स्पष्ट है कि मनुष्य "यजमान" है, स्वयं "यज्ञ" नहीं — अतः दोनों पृथक् ही रहती हैं।
श्लोक 3.92
वेधाद्यर्थभेदात् ॥ २५ ॥
vedhādyarthabhedāt || 25 ||
(अधिकरण: वेधादि — वेधादि मन्त्रों के भिन्न प्रयोजन के कारण असंयोजन) कई उपनिषदों के आरम्भ में ऐसे मन्त्र या कर्मकाण्ड मिलते हैं जो आगे आने वाली विद्या से ऊपरी तौर पर असंबद्ध प्रतीत होते हैं (जैसे आथर्वणिक शाखा का "हृदय को बेधकर" वाला आरम्भिक मन्त्र, या वाजसनेयी और कौषीतकि शाखाओं के आरम्भिक प्रवर्ग्य और अग्निष्टोम-ब्राह्मण)। क्या ऐसे मन्त्र-कर्म केवल स्थान-सामीप्य के कारण आगे की विद्याओं में संयोजित माने जाने चाहिए? नहीं, क्योंकि उनका प्रयोजन भिन्न है — ऐसे मन्त्र-कर्मों का अपना स्वतन्त्र, असंबद्ध प्रयोजन है, और केवल स्थान-सामीप्य, दुर्बल प्रमाण होने से, यह सिद्ध नहीं कर सकता कि वे समीपस्थ विद्या के अंग हैं।
श्लोक 3.93
हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाच्छन्दस्स्तुत्युपगानवत्तदुक्तम् ॥ २६ ॥
hānau tūpāyanaśabdaśeṣatvāt kuśācchandasstutyupagānavattaduktam || 26 ||
(अधिकरण: हानि — शब्द-शेष से उपायन का ग्रहण) विभिन्न श्रुतियाँ ब्रह्ममार्ग में सुकृत-दुष्कृत के केवल त्याग का वर्णन करती हैं, कहीं त्याग और मित्र-शत्रुओं द्वारा उनके "ग्रहण" दोनों का, तो कहीं केवल त्याग का। जहाँ केवल "त्याग" कहा गया है, क्या वहाँ भी "अन्यों द्वारा ग्रहण" समझा जाना चाहिए? हाँ — क्योंकि यह कौषीतकि ब्राह्मण में स्पष्टतः "त्याग" शब्द का ही उपलक्षण है — जहाँ भी "त्याग" कहा गया हो, वहाँ "ग्रहण" स्वतः अनुगत होता है; यह विद्या-माहात्म्य-स्तुति का एक उपकरण है, जैसे एक स्थान पर अनिर्दिष्ट "कुश" घास को दूसरे स्थान में "औदुम्बर" कहकर निर्दिष्ट किया गया है।
श्लोक 3.94
सांपराये तर्तव्याभावात् तथा ह्य् अन्ये ॥ २७ ॥
sāṁparāye tartavyābhāvāt tathā hy anye || 27 ||
(अधिकरण: सांपराय — तरणीय कुछ न होने से प्रयाण-काल में ही) कौषीतकि की "पर्यङ्कविद्या" में देवयान मार्ग से जाते हुए जीव के सुकृत-दुष्कृत के त्याग का वर्णन मार्ग के मध्य में होता प्रतीत होता है। क्या इसे शब्दशः मार्ग के मध्य में ही समझना चाहिए, या वास्तव में देहत्याग के समय ही? यह देहत्याग (सांपराय) के समय ही होता है, क्योंकि ब्रह्म की ओर जाते हुए विद्वान् जीव को मार्ग में और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता; यह त्याग सम्यग्ज्ञान के सामर्थ्य का फल है, अतः यह ज्ञान के फलोन्मुख होते ही घटित होना चाहिए — इसलिए, यद्यपि वर्णन में यह बाद में कहा गया है, वास्तव में यह यात्रा से पूर्व ही घटित होता है; और अन्य शाखाएँ भी इसी त्याग को उसी पूर्व-अवस्था में ही वर्णित करती हैं।
श्लोक 3.95
छन्दत उभयाविरोधात् ॥ २८ ॥
chandata ubhayāvirodhāt || 28 ||
और यह भी इसलिए पुष्ट होता है कि यदि सुकृत-दुष्कृत का त्याग आरम्भ हो चुके मार्ग के मध्य में मान लिया जाए, तो देह गिर चुकने पर, उस त्याग के साधनभूत यम-नियम-अभ्यास का स्वेच्छा-अनुष्ठान (जो जीवित देह और स्वतन्त्र इच्छा की अपेक्षा रखता है) असंभव हो जाएगा; अतः ऐसा अनुष्ठान, और उससे उत्पन्न त्याग, साधक-अवस्था में ही, जीवित रहते हुए ही, होना चाहिए — इस प्रकार निमित्त और नैमित्तिक का सामंजस्य, तथा विभिन्न शाखाओं के वर्णनों का समन्वय, दोनों सुरक्षित रहते हैं।
श्लोक 3.96
गतेर् अर्थवत्त्वम् उभयथान्यथा हि विरोधः ॥ २९ ॥
gater arthavattvam ubhayathānyathā hi virodhaḥ || 29 ||
(अधिकरण: मतेरर्थवत्त्व — गति की सार्थकता का विभाग) कुछ उपासनाओं में देवयान मार्ग सुकृत-दुष्कृत के त्याग के निकट वर्णित है, कुछ में नहीं। क्या देवयान-गति सर्वत्र निर्विशेष रूप से लागू होनी चाहिए, या चुनिंदा रूप से? गति की सार्थकता विभागपूर्वक ही है — कहीं गति सार्थक है, कहीं नहीं; क्योंकि सर्वत्र लागू करने से विरोध होगा: "पुण्य-पाप त्यागकर, निरञ्जन होकर परम साम्य प्राप्त करता है" इस वर्णन में अन्यत्र जाने वाली गति असंगत होगी, क्योंकि सर्व-विशेषरहित निरञ्जन तत्त्व कहीं "जा" नहीं सकता — अतः यहाँ हम गति को निष्प्रयोजन ही मानते हैं।
श्लोक 3.97
उपपन्नस् तल्लक्षणार्थोपलब्धेर् लोकवत् ॥ ३० ॥
upapannas tallakṣaṇārthopalabdher lokavat || 30 ||
यह द्विविध स्थिति (कहीं गति सार्थक, कहीं निरर्थक) युक्तिसंगत ही है, क्योंकि गति को सार्थक बनाने वाला कारक कहीं पाया जाता है, कहीं नहीं — पर्यङ्कविद्या जैसी सगुण उपासनाओं में पर्यङ्क पर आरोहण, ब्रह्म से संवाद, विशिष्ट गन्धादि की प्राप्ति जैसे तत्त्व पाए जाते हैं, वहाँ गति सार्थक है। किन्तु सम्यग्दर्शन (निर्गुण आत्मज्ञान) में, जिसने सभी क्लेश-बीज जला दिए हैं, उसे आरब्ध-भोग-कर्माशय के क्षय के अतिरिक्त और कुछ अपेक्षित नहीं — वहाँ गति निरर्थक है। यह भेद लौकिक अनुभव जैसा ही है — गाँव पहुँचने के लिए मार्ग अपेक्षित है, आरोग्य-प्राप्ति के लिए नहीं।
श्लोक 3.98
अनियमस्सर्वेषामविरोधश्शब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३१ ॥
aniyamassarveṣāmavirodhaśśabdānumānābhyām || 31 ||
(अधिकरण: अनियम — सभी सगुण विद्याओं में गति का अविरुद्ध सार्वत्रिक अनुप्रयोग) जिन सगुण उपासनाओं में गति सार्थक है, उनमें से कुछ में देवयान का स्पष्ट उल्लेख है, कुछ में नहीं। क्या देवयान केवल उन्हीं तक सीमित माना जाए, या निर्विशेष रूप से सभी सगुण विद्याओं में लागू हो? कोई निश्चित सीमा नहीं है — यह अभ्युदयफल वाली सभी सगुण विद्याओं में निर्विशेष रूप से लागू होता है, श्रुति और स्मृति के आधार पर — श्रुति पञ्चाग्निविद्या-विदों के लिए उपदिष्ट देवयान मार्ग को अरण्य में "श्रद्धा-तप" की उपासना करने वालों तक भी विस्तृत करती है; और दो स्थानों में देवयान के दोहरे वर्णन का प्रयोजन केवल उस-उस प्रसंग में स्पष्टता के लिए है, उन्हीं दो तक सीमित करने के लिए नहीं।
श्लोक 3.99
यावदधिकारम् अवस्थितिर् आधिकारिकाणाम् ॥ ३२ ॥
yāvadadhikāram avasthitir ādhikārikāṇām || 32 ||
(अधिकरण: यावदधिकार — जब तक अधिकार (दैवी कार्यभार) रहे) क्या कुछ ब्रह्मज्ञानी वर्तमान देह के पतन के बाद भी, अपने विशेष अधिकार के कारण, अन्य देह धारण करते रहते हैं (जैसा इतिहास-पुराण में अपान्तरतमस्/कृष्णद्वैपायन, वसिष्ठ, सनत्कुमार आदि के अनेक जन्मों में देखा जाता है)? हाँ — ऐसे ज्ञानी, परमेश्वर द्वारा जगत्-व्यवस्था बनाए रखने वाले विशिष्ट पदों (जैसे वेद-प्रवर्तन) पर नियुक्त होकर, यद्यपि मोक्षकारक सम्यग्ज्ञान को प्राप्त हैं, तथापि जब तक उनका अधिकार समाप्त नहीं होता तब तक देहधारण करते रहते हैं — जैसे सूर्य सहस्र युगों तक जगत् का अधिकार संभालकर तब उदय-अस्त-रहित अवस्था को प्राप्त होता है; ज्ञान की मोक्ष-हेतुता में इससे कोई बाधा नहीं आती, क्योंकि नए जन्म के बीज का नाश ज्ञान द्वारा सुनिश्चित है, केवल उनका पूर्व अधिकार-प्रेरित कर्म ही क्षय होने तक चलता रहता है।
श्लोक 3.100
अक्षरधियां त्ववरोधस्सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् ॥ ३३ ॥
akṣaradhiyāṁ tvavarodhassāmānyatadbhāvābhyāmaupasadavattaduktam || 33 ||
(अधिकरण: अक्षरधी — अक्षर-विषयक सभी निषेधात्मक बुद्धियों का सार्वत्रिक संयोजन) विभिन्न श्रुतियाँ अक्षर (परम ब्रह्म) को विशिष्ट गुणों के निषेध द्वारा वर्णित करती हैं (कहीं "न स्थूल, न अणु" आदि, कहीं "अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण" आदि)। क्या ऐसे सभी निषेधात्मक वर्णन सर्वत्र संयोजित होने चाहिए, या प्रसंगानुसार पृथक् रहने चाहिए? सभी सर्वत्र संयोजित होने चाहिए, क्योंकि इनकी सामान्य प्रकृति और प्रतिपाद्य वस्तु एक ही है — जैसे उपसद् यज्ञों में मूलतः उद्गातृ-शाखा से संबंधित मन्त्र अध्वर्यु द्वारा भी प्रयुक्त होते हैं, क्योंकि वे एक ही प्रधान यज्ञ के अधीन हैं — वैसे ही ये सभी निषेधात्मक गुण, एक ही अक्षर के अधीन होने से, सर्वत्र उससे संयुक्त रहते हैं।
श्लोक 3.101
इयदामननात् ॥ ३४ ॥
iyadāmananāt || 34 ||
(अधिकरण: इयत् — "इतनी संख्या" (दो) के कथन के आधार पर) "दो पक्षी, परम मित्र, एक ही वृक्ष का आश्रय लिए हुए हैं; इनमें एक मधुर फल खाता है, दूसरा बिना खाए देखता रहता है" (आथर्वणिक, श्वेताश्वतर में, तथा कठ में भिन्न रूप में — "दोनों सुकृत के फल का पान करते हैं...") — क्या यह एक ही विद्या है, या भिन्न? यह एक ही विद्या है, क्योंकि दोनों मन्त्रों में वेद्य वस्तु समान, निश्चित द्विविध रूप में प्रस्तुत है — दोनों मन्त्र जीव-सहित परमात्मा का ही उपदेश करते हैं; जहाँ "अभोक्तृत्व" पर बल है, वह परमात्मा के लिए है, और "पान" उसमें जीव-सांहत्य से लाक्षणिक रूप से आरोपित है — अतः वेद्य-भेद नहीं है, इसलिए विद्या एक है, और गुण सर्वत्र संयोजित होने चाहिए।
श्लोक 3.102
अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनोऽन्यथा भेदानुपपत्तिर् इति चेन् नोपदेशवत् ॥ ३५ ॥
antarā bhūtagrāmavatsvātmano'nyathā bhedānupapattir iti cen nopadeśavat || 35 ||
(अधिकरण: अन्तरत्व — "सर्वान्तर आत्मा" का पुनरावर्तन) वाजसनेयी दो बार, क्रमिक प्रसंगों में, "सबके भीतर का आत्मा, जो साक्षात् ब्रह्म है" — यह उपदेश देते हैं। क्या यह एक विद्या है या दो? [सिद्धान्त:] यह एक ही विद्या है, क्योंकि प्रतिपाद्य वस्तु में कोई भेद नहीं — दोनों बार पूछा-बताया गया "सर्वान्तर आत्मा" बिना किसी भेद-चिह्न के समान है, क्योंकि एक ही देह में दो "सर्वान्तर आत्मा" संभव नहीं। [अथवा, "भूतग्रामवत्" पद यह दिखाता है कि जैसे एक ही देव समस्त भूतों में गूढ़, सबका अन्तरात्मा कहा जाता है, वैसे ही यहाँ भी।] अतः प्रतिपाद्य वस्तु के अभेद से विद्या का एकत्व सिद्ध है।
श्लोक 3.103
व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ ३६ ॥
vyatihāro viśiṁṣanti hītaravat || 36 ||
(अधिकरण: व्यतिहार — उपासनार्थ होने से "अहं-त्वं" के परस्पर-विनिमय की सार्थकता) ऐतरेय सूर्य-पुरुष के विषय में, और जाबाल देवता के विषय में, सर्वनामों का "विनिमय" सिखाते हैं ("वह ही मैं हूँ; मैं ही वह हूँ")। क्या एक-दिशीय बोध ही पर्याप्त है, या मन को दोनों दिशाओं में विनिमय को सक्रिय रूप से धारण करना चाहिए? यह विनिमय स्वयं सक्रिय ध्यान (आध्यान) के लिए है — क्योंकि श्रुति जानबूझकर दोनों दिशाओं को कहती है, जो यदि एक ही अभिप्रेत होता तो निरर्थक पुनरावृत्ति होती; अन्ततः फल वही एकत्व की दृढ़ स्थापना ही है, जैसे "सत्यकाम" आदि गुणों द्वारा ईश्वर का ध्यान भी उसी सिद्ध ईश्वर को प्राप्त कराता है।
श्लोक 3.104
सैव हि सत्यादयः ॥ ३७ ॥
saiva hi satyādayaḥ || 37 ||
(अधिकरण: सत्यादि — वही एक विद्या "सत्य" आदि) वाजसनेयक "सत्यविद्या" सिखाने के तुरंत बाद, सूर्य और नेत्र-पुरुष के साथ अभिन्न सत्य का वर्णन जारी रखता है। क्या ये दो पृथक् सत्यविद्याएँ हैं, या एक ही? ये एक ही हैं, क्योंकि सर्वनाम-निर्देश पूर्ववर्णित को ही खींचता है; यद्यपि प्रत्येक भाग में भिन्न फल कहा गया है, यह दो विद्याओं का संकेत नहीं — और चूँकि यह एक ही उपासना है, अतः भिन्न-भिन्न भागों में कहे गए सभी गुण एक ही समग्र साधना में संयोजित होने चाहिए।
श्लोक 3.105
कामादीतरत्र तत्र चाऽयतनादिभ्यः ॥ ३८ ॥
kāmādītaratra tatra cā'yatanādibhyaḥ || 38 ||
(अधिकरण: कामादि — स्थान-सादृश्य से अन्यत्र भी) छान्दोग्य की दहरविद्या वहाँ के आत्मा को "पापरहित... सत्यकाम, सत्यसंकल्प" कहती है, जबकि वाजसनेयक का समानान्तर वर्णन उसे "सबका शासक" आदि कहता है — क्या गुण दोनों ओर संयोजित होने चाहिए? हाँ, क्योंकि स्थान-सादृश्य, उपास्य-सादृश्य, और लोकों को मिलने से रोकने वाले "सेतु" के कार्य की समानता है — यद्यपि कुछ बल-भेद है (छान्दोग्य सगुण की ओर, वाजसनेयक निर्गुण की ओर झुका है), तथापि साझा "शासकत्व" जैसे गुण केवल ब्रह्म की महिमा दर्शाने के लिए हैं, भिन्न साधना-स्थापन के लिए नहीं।
श्लोक 3.106
आदरादलोपः ॥ ३९ ॥
ādarādalopaḥ || 39 ||
(अधिकरण: आदर — आदर के कारण अलोप) वैश्वानरविद्या पाँच प्राण-आहुतियाँ भोजन के आगमन से जुड़ी सिखाती है, जिसे आगे "अग्निहोत्र" कहा गया है। यदि भोजन ही न मिले, तो क्या यह "प्राणाग्निहोत्र" भी लुप्त हो जाता है? नहीं लुप्त होता, आदर के कारण — क्योंकि समानान्तर जाबाल श्रुति में बल दिया गया है कि "अतिथियों के बाद ही भोजन करना चाहिए" और इसकी उपेक्षा को अत्यन्त निन्दनीय बताया गया है — इससे इस अग्नि-अर्पण के प्रति इतना आदर सिद्ध होता है कि इसका पूर्ण लोप असह्य होगा; अतः भोजन के पूर्णतः अभाव में भी, जल या अन्य निर्दोष द्रव्य से यह कर्म सम्पन्न करना चाहिए।
श्लोक 3.107
उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ४० ॥
upasthite'tastadvacanāt || 40 ||
क्योंकि जब भोजन उपस्थित हो, तभी उसी से यह कर्म सम्पन्न करना चाहिए — क्योंकि श्रुति में यही कहा गया है: श्रुति भोजन के आगमन को पूर्वसिद्ध मानकर ही उसे अर्पित करने की बात करती है, इससे स्पष्ट है कि ये प्राण-आहुतियाँ विशेष रूप से भोजनार्थ प्राप्त उसी अन्न से सम्पन्न की जानी हैं — अतः सामान्यतः भोजन उपस्थित होने पर उसी का प्रयोग अनिवार्य है; केवल उसके पूर्ण अभाव में ही प्रतिनिधि द्रव्य का विचार होता है।
श्लोक 3.108
तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्घ्यप्रतिबन्धः फलम् ॥ ४१ ॥
tannirdhāraṇāniyamastaddṛṣṭeḥ pṛthagghyapratibandhaḥ phalam || 41 ||
(अधिकरण: सन्निर्धारण — फल की स्वतन्त्रता के कारण अनैत्यिकता) कर्माङ्ग-आश्रित उपासनाएँ (जैसे "ओंकार को उद्गीथ मानकर उपासना करे") — क्या ये यज्ञ के अंगों की भांति नित्य अनिवार्य हैं, या स्वतन्त्र कर्म की भांति अनित्य, पृथक् फलयुक्त? ये अनित्य ही हैं, क्योंकि श्रुति ज्ञानी और अज्ञानी दोनों को समान रूप से यज्ञकर्म करते दिखाती है, और उपासना के लिए यज्ञफल से पृथक्, अतिरिक्त फल भी दर्शाती है ("जो ज्ञान सहित किया जाता है, वह उतना ही अधिक बलवान् होता है") — यह तुलनात्मक कथन संकेत करता है कि उपासना-रहित कर्म भी वैध कर्म ही है, केवल कम बलवान्; यह तभी संगत है जब उपासना अनित्य हो।
श्लोक 3.109
प्रदानवदेव तदुक्तम् ॥ ४२ ॥
pradānavadeva taduktam || 42 ||
(अधिकरण: प्रदान — "दान" के समान, यह पहले ही कहा जा चुका) जैसे दान-संबंधी कर्मों में एक ऐच्छिक अंग स्वतन्त्र फल से जुड़ा होता है, वैसे ही यहाँ भी — यह पूर्व अधिकरण के तर्क द्वारा ही, तुल्य दृष्टान्त पर, पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है।
श्लोक 3.110
लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि ॥ ४३ ॥
liṅgabhūyastvāttaddhi balīyastadapi || 43 ||
(अधिकरण: लिङ्गभूयस्त्व — लिङ्ग-बाहुल्य के कारण मनश्चित् आदि अग्नियों की स्वतन्त्रता) अग्निरहस्य में इष्टिकाचित अग्नि के साथ-साथ मानस-निर्मित अग्नियों (मनश्चित्, वाक्चित्, प्राणचित् आदि "साम्पादिक" अग्नियाँ) का वर्णन है। क्या ये मानस अग्नियाँ यज्ञ-कर्म के अंग हैं, या स्वतन्त्र, विशुद्ध उपासनात्मक? [प्रथमतः यह प्रस्तुत किया जाता है कि] ये स्वतन्त्र हैं, क्योंकि इसी प्रसंग में विशुद्ध उपासनात्मकता का समर्थन करने वाले अनेक लिङ्ग हैं — जैसे "ये प्राणी जो कुछ मन से कल्पना करते हैं, वही उनकी वास्तविक रचना है" — ऐसे लिङ्ग प्रकरण से अधिक बलवान् हैं, जैसा पूर्वस्थापित सिद्धान्त है।
श्लोक 3.111
पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् ॥ ४४ ॥
pūrvavikalpaḥ prakaraṇātsyāt kriyāmānasavat || 44 ||
यह उचित नहीं: अपितु, यह पूर्ववर्ती यज्ञ-प्रकरण का ही एक विशेष विकल्प है, प्रकरण के कारण — "मानस" ग्रह के समान। चूँकि सम्पूर्ण प्रसंग साक्षात् यज्ञीय अग्नि के प्रकरण में स्थित है, अतः यह विशेष विकल्प का उपदेश उसी यज्ञीय विषय तक सीमित है, स्वतन्त्र नहीं; क्योंकि लिङ्ग, सामान्यतः प्रकरण से अधिक बलवान् होते हुए भी, यहाँ ऐसे हैं जिनकी अन्य (गौण) व्याख्या संभव है, और जहाँ बिना वास्तविक विरोध के अन्य व्याख्या संभव हो, वहाँ लिङ्ग प्रकरण को बाधित नहीं कर सकते — जैसे दस रात्रि के यज्ञ में मानस-ग्रहण-कर्म भी प्रकरण के कारण यज्ञ-क्रम का ही अंग रहता है।
श्लोक 3.112
अतिदेशाच् च ॥ ४५ ॥
atideśāc ca || 45 ||
और अतिदेश के कारण भी: "इनमें से (36,000 मानस-अग्नियों में) प्रत्येक उतनी ही महान् है जितनी वह पूर्व यज्ञीय अग्नि" — ऐसा अतिदेश केवल तभी होता है जब कोई अन्तर्निहित सामान्य आधार (यहाँ अग्नित्व) हो, और पूर्व यज्ञीय अग्नि की महत्ता का इन मानस अग्नियों में यह अतिदेश ही उनके यज्ञीय स्वभाव की पुष्टि करता है।
श्लोक 3.113
विद्यैव तु निर्धारणाद्दर्शनाच् च ॥ ४६ ॥
vidyaiva tu nirdhāraṇāddarśanāc ca || 46 ||
[सिद्धान्त, तर्क का उलटाव:] किन्तु ये तो विद्या-रूप ही हैं (यज्ञांग नहीं), क्योंकि निश्चयवाचक कथन और प्रत्यक्ष दर्शन से — श्रुति स्पष्ट कहती है "वे विद्याचित् ही हैं" और "विद्या से ही ये ज्ञानी के लिए चयित हैं।"
श्लोक 3.114
श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच् च न बाधः ॥ ४७ ॥
śrutyādibalīyastvāc ca na bādhaḥ || 47 ||
और यह स्वतन्त्रता बाधित नहीं होती, क्योंकि श्रुति आदि (साक्षात् श्रुति-कथन, लिङ्ग, वाक्य) प्रकरण से अधिक बलवान् हैं — "वे विद्याचित् ही हैं" यह श्रुति, "सोते समय भी सदा चयित" यह लिङ्ग, और "विद्या से ही चयित" यह वाक्य — ये सब, स्पष्ट और असंदिग्ध होने से, प्रकरण से अधिक बलवान् हैं और उससे बाधित नहीं हो सकते।
श्लोक 3.115
अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दृष्टश् च तदुक्तम् ॥ ४८ ॥
anubandhādibhyaḥ prajñāntarapṛthaktvavaddṛṣṭaś ca taduktam || 48 ||
और भी, अनुबन्ध आदि के कारण — अन्य स्वतन्त्र विद्याओं (प्रज्ञान्तर) की पार्थक्य-स्थिति के समान — यह पहले भी देखा-कहा गया है: जैसे अवेक्षा-कर्म का वर्णन राजसूय-प्रकरण में होते हुए भी, तीनों वर्णों से उसके संबंध और उसके "राजयज्ञ" होने के कारण, उस प्रकरण से ऊपर उठाया गया है।
श्लोक 3.116
न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ४९ ॥
na sāmānyādapyupalabdhermṛtyuvanna hi lokāpattiḥ || 49 ||
और केवल सामान्य-सादृश्य (जैसे मानस-ग्रहण दृष्टान्त) के आधार पर भी यह स्वतन्त्रता खण्डित नहीं होती, क्योंकि जो प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वोक्त विशिष्ट, अधिक बलवान् आधारों पर प्राप्त है, वह "मृत्यु" शब्द के समान है — जैसे सूर्यमण्डलस्थ पुरुष और अग्नि दोनों के लिए "मृत्यु" शब्द के प्रयोग से उनका पूर्ण तादात्म्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही यहाँ भी केवल सामान्य-सादृश्य पूर्वस्थापित विशिष्ट प्रमाणों को अस्वीकृत नहीं कर सकता।
श्लोक 3.117
परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात् त्व् अनुबन्धः ॥ ५० ॥
pareṇa ca śabdasya tādvidhyaṁ bhūyastvāt tv anubandhaḥ || 50 ||
और आगे भी (परवर्ती ब्राह्मण-भाग में) इसी प्रकार का शब्द-प्रयोग उसी विद्या-प्रधान प्रयोजन को दर्शाता है — "यह लोक ही वह चित अग्नि है" — वहाँ भी कर्म की अपेक्षा ज्ञान की प्रधानता पर बल है; इस प्रकार अन्यत्र भी केवल कर्म पर ज्ञान की प्रधानता सिद्ध होती है; और अनुबन्ध इसलिए है क्योंकि विद्या में अधिक अग्नि-अवयवों का संपादन अपेक्षित है, यज्ञकर्म पर निर्भरता के कारण नहीं।
श्लोक 3.118
एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ५१ ॥
eka ātmanaḥ śarīre bhāvāt || 51 ||
(अधिकरण: ऐकात्म्य — देह में सर्वत्र व्याप्त होने से आत्मा एक ही है) [इस प्रासंगिक चर्चा के बाद, अब मूल विषय पर लौटते हुए] यहाँ देह से भिन्न आत्मा का अस्तित्व सिद्ध किया जाता है [पहले पूर्वपक्ष]: चार्वाक मत है कि देह से भिन्न कोई आत्मा नहीं, क्योंकि जो देह रहने पर ही होता है, देह न रहने पर नहीं होता, वह देह का ही धर्म है — जैसे उष्णता-प्रकाश अग्नि के धर्म हैं — और प्राण, चेष्टा, चैतन्य, स्मृति आदि देह के भीतर ही पाए जाते हैं, देह से बाहर कभी नहीं; अतः चैतन्ययुक्त देह ही "आत्मा" है, स्वर्ग या मोक्ष को प्राप्त करने वाला कोई पृथक् आत्मा नहीं है।
श्लोक 3.119
व्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ५२ ॥
vyatirekastadbhāvabhāvitvānna tūpalabdhivat || 52 ||
[सिद्धान्त:] ऐसा नहीं है — देह से आत्मा का भेद अवश्य है, क्योंकि ये गुण [देह के मात्र रहने पर नहीं, अपितु] आत्मा के रहने पर ही होते हैं — यदि "देह रहने पर होना" ही देह-धर्म का मानदण्ड होता, तो चैतन्य आदि को भी देह-धर्म नहीं मानना चाहिए, क्योंकि मृत देह के रहने पर भी वे नहीं पाए जाते; और रूपादि देह-धर्म अन्यों द्वारा भी देखे जा सकते हैं, जबकि चैतन्य-स्मृति नहीं। इसके अतिरिक्त, ज्ञान स्वयं को विषय नहीं बना सकता (जैसे अग्नि स्वयं को नहीं जलाती) — अतः जैसे इस ज्ञान का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है, वैसे ही देहादि से उसका भेद भी स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार देह से भिन्न आत्मा का अस्तित्व निर्दोष रूप से सिद्ध है।
श्लोक 3.120
अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥ ५३ ॥
aṅgāvabaddhāstu na śākhāsu hi prativedam || 53 ||
(अधिकरण: अङ्गावबद्ध — प्रत्येक वेद में शाखा-निरपेक्ष अनुप्रयोग) [विद्या-संयोजन के विषय को पुनः लेते हुए] उद्गीथ आदि कर्मांगों से बँधी विभिन्न उपासना-दृष्टियाँ भिन्न-भिन्न वेदशाखाओं में विभिन्न विवरणों सहित उपदिष्ट हैं। क्या ऐसी दृष्टियाँ अपनी ही शाखा के उद्गीथ-रूप तक सीमित रहें, या सभी शाखाओं के उद्गीथ-रूपों में लागू हों? [प्रथमतः यह प्रस्तुत किया जाता है कि] ये अपनी शाखा तक सीमित रहनी चाहिए, सामीप्य के कारण — सामान्य विधि सामीप्य से स्वाभाविक रूप से अपनी शाखा के उद्गीथ-रूप तक सीमित हो जाती है।
श्लोक 3.121
मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ५४ ॥
mantrādivadvāvirodhaḥ || 54 ||
[सिद्धान्त:] नहीं, कोई विरोध नहीं — यह मन्त्रादि के समान है: जैसे एक शाखा में उत्पन्न मन्त्र, कर्म और गुण अन्य शाखाओं में भी ग्रहण किए जाते देखे जाते हैं (पाषाण-ग्रहण-मन्त्र, प्रयाज-अर्पण, ऋग्वेदीय सूक्त का यजुर्वेदीय प्रयोग) — वैसे ही, जैसे अंतर्निहित कर्मांग स्वयं सभी शाखाओं में साझा माने जाते हैं, वैसे ही उनसे संलग्न उपासना-दृष्टियाँ भी सभी शाखाओं में साझा मानी जानी चाहिए।
श्लोक 3.122
भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्वं तथा हि दर्शयति ॥ ५५ ॥
bhūmnaḥ kratuvajjyāyasvaṁ tathā hi darśayati || 55 ||
(अधिकरण: भूमज्यायस्त्व — यज्ञ के समान समग्र वैश्वानर-उपासना की प्रधानता) प्राचीनशाल आदि की कथा में वैश्वानर की खण्डशः उपासना और समग्र, एकीकृत उपासना दोनों वर्णित हैं। क्या दोनों करने चाहिए, या केवल समग्र? समग्र (भूम) उपासना ही प्रधान रूप से अभिप्रेत है, खण्डशः नहीं — जैसे यज्ञ में सम्पूर्ण अंग-प्रधानयुक्त कर्म ही एकल अभिप्रेत इकाई है; यह पुष्ट होता है कि श्रुति समग्रता की प्रधानता एकवाक्यता से दर्शाती है — छहों ऋषि खण्डित समझ में असफल होकर राजा अश्वपति के पास जाते हैं, जो पहले खण्डशः उपासना का खण्डन करते हैं, फिर समग्र उपासना ही सिखाते हैं, और अन्त में फल भी समग्रता के संदर्भ में ही कहते हैं। अतः समग्र उपासना ही श्रेष्ठ है।
श्लोक 3.123
नाना शब्दादिभेदात् ॥ ५६ ॥
nānā śabdādibhedāt || 56 ||
(अधिकरण: शब्दादिभेद — शब्दादि के भेद से विद्याओं की विविधता) "समग्रता" की प्रधानता (वैश्वानर-प्रसंग में) को देखते हुए, क्या अन्य, भिन्न-भिन्न शब्दों वाली उपासनाओं को भी एक समग्र साधना में संयोजित कर देना चाहिए, चूँकि उपास्य अन्ततः समान है? नहीं, ये विविध ही रहती हैं, शब्दादि के भेद के कारण — शब्द-भेद साधना-भेद का हेतु है, और इसी प्रकार गुण-भेद आदि भी विद्या-भेद के हेतु हैं — क्योंकि प्रत्येक प्रसंग में उपासना के लिए भिन्न-भिन्न गुण विहित हैं, और यह विशिष्ट-विधि-भेद सिद्ध करता है कि ये भिन्न-भिन्न विद्याएँ हैं, क्योंकि यहाँ (वैश्वानरविद्या के विपरीत) कोई एक व्यापक सामान्य विधि नहीं जो इन्हें एकीकृत करे।
श्लोक 3.124
विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ५७ ॥
vikalpo'viśiṣṭaphalatvāt || 57 ||
(अधिकरण: विकल्प — अविशिष्ट फल के कारण विकल्प) चूँकि ये भिन्न-भिन्न विद्याएँ हैं, क्या इन्हें इच्छानुसार संयोजित करके करना चाहिए, या विकल्प से एक-एक करके? इन्हें विकल्प से ही करना चाहिए, क्योंकि इनका फल अविशिष्ट (समान) है: सभी विद्याएँ समान रूप से उपास्य के साक्षात्कार की ओर उन्मुख हैं; किसी एक उपासना से वह साक्षात्कार प्राप्त हो जाने पर, दूसरी निरर्थक हो जाएगी; एक साथ अभ्यास से एकाग्रता भी भंग होगी — अतः इन समान-फल वाली विद्याओं में से किसी एक को लेकर, उसके फल की प्राप्ति तक, एकाग्रचित्त होकर उसी में तत्पर रहना चाहिए।
श्लोक 3.125
काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ ५८ ॥
kāmyāstu yathākāmaṁ samuccīyeranna vā pūrvahetvabhāvāt || 58 ||
(अधिकरण: काम्य — काम्य उपासनाओं का यथेच्छ संयोजन या असंयोजन) किन्तु जो उपासनाएँ किसी विशिष्ट कामना-फल के लिए की जाती हैं (जैसे "जो वायु को दिशाओं का पुत्र जानकर उपासना करता है वह पुत्र-शोक नहीं करता") — ये यज्ञकर्म की भांति अदृष्ट शक्ति द्वारा अपना विशिष्ट फल स्वयं सिद्ध करती हैं, इन्हें उपास्य के साक्षात्कार की अपेक्षा नहीं; अतः इन्हें इच्छानुसार संयोजित किया जा सकता है, या नहीं भी, क्योंकि पूर्वोक्त विकल्प-नियम का हेतु (समान फल) यहाँ लागू नहीं होता।
श्लोक 3.126
अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ५९ ॥
aṅgeṣu yathāśrayabhāvaḥ || 59 ||
(अधिकरण: यथाश्रयभाव — आश्रय के अनुरूप कर्मांग-उपासनाओं का संयोजन) उद्गीथ जैसे कर्मांगों से संलग्न, तीनों वेदों में उपदिष्ट उपासना-दृष्टियाँ — क्या इन्हें (प्रत्येक अनुष्ठान में) संयोजित करके करना चाहिए, या स्वतन्त्र उपासनाओं की भांति यथेच्छ? [प्रथमतः प्रस्तुत किया जाता है कि] ये अपने आश्रय के अनुरूप ही होनी चाहिए — जैसे कर्मांग (स्तोत्र आदि) स्वयं वास्तविक अनुष्ठान में संयोजित होकर प्रयुक्त होते हैं, वैसे ही उन पर आश्रित उपासना-दृष्टियाँ भी संयोजित की जानी चाहिए।
श्लोक 3.127
शिष्टेश् च ॥ ६० ॥
śiṣṭeś ca || 60 ||
और तीनों वेदों में साथ-साथ उपदिष्ट होने के कारण भी — जैसे कर्मांग तीनों वेदों में बिना किसी परम्परा-भेद के साझा माने जाते हैं, वैसे ही उनसे संलग्न उपासना-दृष्टियाँ भी।
श्लोक 3.128
समाहारात् ॥ ६१ ॥
samāhārāt || 61 ||
और सामूहिक-संग्रह के कथन के कारण भी — "होतृ-आसन पर संग्रह लेकर, उद्गाता हौत्र-कर्म से अपने दोष सुधारता है" — यह कथन, मूलतः भिन्न-भिन्न ऋत्विक्-कर्मों से संबद्ध अंगों के परस्पर-संबंध का, ओंकार-उद्गीथ के एकीकृत बोध की महत्ता के बल पर, संकेत करता है कि एक वेद में उपदिष्ट उपासना-दृष्टियाँ दूसरे वेद के अधीन अनुष्ठानों में भी संग्रहित होनी चाहिए।
श्लोक 3.129
गुणसाधारण्यश्रुतेश् च ॥ ६२ ॥
guṇasādhāraṇyaśruteś ca || 62 ||
और यह भी क्योंकि श्रुति तीनों वेदों में साझा गुण (अर्थात् ओंकार) दर्शाती है — "इसी त्रिविध ज्ञान से ही वह कार्य करता है: ओं से घोषणा, ओं से पाठ, ओं से गान" — इससे साझा अन्तर्निहित गुण सिद्ध होता है; अतः आश्रय साझा होने से, उस पर आश्रित दृष्टियाँ भी साझा हैं — अथवा, चूँकि कर्मांग स्वयं ही सर्वव्यापक विधि द्वारा साझा घोषित हैं, अतः उनसे संलग्न दृष्टियाँ भी हर अनुष्ठान में साथ-साथ होनी चाहिए।
श्लोक 3.130
न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ६३ ॥
na vā tatsahabhāvāśruteḥ || 63 ||
[सिद्धान्त:] नहीं — आश्रय पर निर्भर उपासनाओं को आश्रय के अनुरूप होना आवश्यक नहीं, क्योंकि उनके संयुक्त होने का कोई श्रुति-कथन नहीं — जबकि कर्मांगों के स्वयं संयुक्त होने का स्पष्ट श्रुति-कथन है, उपासनाओं के लिए ऐसा कोई कथन नहीं। पूर्वपक्ष: क्या अनुष्ठान-विधि ही उनका संयोजन सिद्ध नहीं करेगी? सिद्धांत: नहीं, क्योंकि ये उपासनाएँ पुरुषार्थ के लिए हैं, यज्ञार्थ नहीं — कुछ अंग यज्ञार्थ हैं, कुछ उपासनाएँ, यद्यपि ऐसे अंगों पर आधारित, साधक-अर्थ हैं। और यह अनुमान नहीं किया जा सकता कि आश्रय संयुक्त होता है इसलिए आश्रित उपासनाएँ भी संयुक्त होनी चाहिए, क्योंकि उनके संयुक्त होने का कोई श्रुति-कथन नहीं है।
श्लोक 3.131
दर्शनाच् च ॥ ६४ ॥
darśanāc ca || 64 ||
और श्रुति उनके असंयुक्त होने को भी दर्शाती है — "वह ज्ञानी ब्रह्मा ही यज्ञ, यजमान और सभी ऋत्विजों की रक्षा करता है" — क्योंकि यदि सभी उपासना-दृष्टियाँ हर अनुष्ठान में संयुक्त होतीं, तो सभी ऋत्विक् समान रूप से "सर्वज्ञ" होते, और एक ही ज्ञानी ब्रह्मा-ऋत्विक् को शेष का रक्षक कहना निरर्थक होता — अतः ऐसी उपासनाएँ इच्छानुसार, संयोजित या विकल्प से, की जानी चाहिए, अनिवार्य रूप से संयुक्त नहीं।
श्लोक 3.132
पुरुषार्थो ऽतः शब्दाद् इति बादरायणः ॥ १ ॥
puruṣārtho 'taḥ śabdād iti bādarāyaṇaḥ || 1 ||
(अधिकरण: पुरुषार्थ) आचार्य बादरायण के मत में, वेदान्त-उपदिष्ट इस आत्मज्ञान से ही, स्वतन्त्र रूप से, परम पुरुषार्थ (मोक्ष) सिद्ध होता है, क्योंकि श्रुति के शब्द ऐसा ही कहते हैं — "आत्मज्ञानी शोक को पार करता है", "जो उस परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है" — ऐसी श्रुतियाँ दर्शाती हैं कि ज्ञान अकेला ही पुरुषार्थ का हेतु है।
श्लोक 3.133
शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्व् इति जैमिनिः ॥ २ ॥
śeṣatvātpuruṣārthavādo yathānyeṣv iti jaiminiḥ || 2 ||
किन्तु जैमिनि के मत में: चूँकि आत्मा, कर्ता के रूप में, कर्म का ही शेषभूत (सहायक) है, अतः उसका ज्ञान भी, स्रुवा आदि की भांति, विषय-द्वार से कर्म से ही संबद्ध है; अतः इस ज्ञान के फल की प्रशंसा मात्र अर्थवाद (स्तुतिवाद) है, जैसे अन्यत्र कर्मांगों से जुड़े फल-कथन मात्र स्तुतिवाद हैं, स्वतन्त्र विधि नहीं।
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श्लोक 3.134
आचारदर्शनात् ॥ ३ ॥
ācāradarśanāt || 3 ||
[जैमिनि के मत में आगे] क्योंकि आचरण में यही देखा जाता है — जैसे "राजा जनक ने बहुदक्षिणा यज्ञ किया", और उद्दालक जैसे आचार्यों का अपने पुत्रों को गृहस्थ-कर्तव्य सिखाना — इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञानी भी कर्म से जुड़े रहते हैं; यदि केवल ज्ञान से ही पुरुषार्थ सिद्ध होता, तो वे इतने श्रमसाध्य कर्म क्यों करते?
श्लोक 3.135
तच्छ्रुतेः ॥ ४ ॥
tacchruteḥ || 4 ||
और क्योंकि श्रुति स्वयं यही कहती है: "जो ज्ञान, श्रद्धा और उपनिषद्-बोध सहित किया जाता है, वह उतना ही अधिक बलवान् होता है" — यह ज्ञान को कर्म का शेष (सहायक) ही दर्शाता है, स्वतन्त्र पुरुषार्थ-साधक नहीं।
श्लोक 3.136
समन्वारम्भणात् ॥ ५ ॥
samanvārambhaṇāt || 5 ||
और संयुक्त आरम्भ के कारण: "वह विद्या और कर्म दोनों को साथ-साथ ग्रहण करता है" — यह फल-उत्पादन में दोनों के सहयोग को दर्शाता है, अकेले ज्ञान की स्वतन्त्रता को नहीं।
श्लोक 3.137
तद्वतो विधानात् ॥ ६ ॥
tadvato vidhānāt || 6 ||
और उस [पूर्ण वेदज्ञान] से युक्त पुरुष के लिए ही कर्म विहित है — "आचार्यकुल से विधिवत् वेद पढ़कर... स्वाध्याय जारी रखते हुए..." — ऐसी श्रुतियाँ दर्शाती हैं कि वेदार्थ के पूर्ण ज्ञानी के लिए ही कर्म-कर्तव्य विहित है; अतः ज्ञान अकेला स्वतन्त्र रूप से फल उत्पन्न नहीं करता।
श्लोक 3.138
नियमात् ॥ ७ ॥
niyamāt || 7 ||
और नियम के कारण भी: "इस लोक में सौ वर्ष तक कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करे; इस प्रकार, अन्यथा नहीं, कर्म मनुष्य से लिप्त नहीं होता" — और "यह तो जरा-पर्यन्त सत्र है, अर्थात् अग्निहोत्र" — ऐसे नियम भी ज्ञान को कर्म का शेष दर्शाते हैं।
श्लोक 3.139
अधिकोपदेशात् तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ८ ॥
adhikopadeśāt tu bādarāyaṇasyaivaṁ taddarśanāt || 8 ||
[सिद्धान्त, बादरायण के मत की पुनर्स्थापना:] किन्तु "प्रशंसा मात्र अर्थवाद है" यह मत उचित नहीं, क्योंकि अधिक (उच्चतर) तत्त्व का उपदेश है — वेदान्त में ज्ञेय के रूप में केवल संसारी कर्ता-आत्मा नहीं, अपितु उससे अधिक — असंसारी, कर्तृत्वादि-रहित, "पापरहित" आदि विशेषणों वाला परमेश्वर — उपदिष्ट है; और वह ज्ञान कर्म को बढ़ावा नहीं देता, अपितु उसका उच्छेद ही करता है। अतः बादरायण का मत स्थिर रहता है, "शेषत्व" जैसे आभासी हेतुओं से डिगता नहीं।
श्लोक 3.140
तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ९ ॥
tulyaṁ tu darśanam || 9 ||
किन्तु आचरण-दर्शन [जैमिनि द्वारा उद्धृत] तुल्य रूप से विपरीत निष्कर्ष का भी समर्थन करता है — क्योंकि वही "आचरण" ब्रह्मज्ञानियों को कर्म से विरत भी दिखाता है: "काषायण ऋषियों ने कहा — हम क्यों पढ़ें, क्यों यज्ञ करें?... उस आत्मा को जानकर ब्राह्मण पुत्रैषणा-वित्तैषणा-लोकैषणा त्यागकर भिक्षाचर्य करते हैं" — और याज्ञवल्क्य भी ज्ञान प्राप्त कर संन्यासी हो गए।
श्लोक 3.141
असार्वत्रिकी ॥ १० ॥
asārvatrikī || 10 ||
और उद्धृत श्रुति-वचन ("ज्ञान सहित किया गया कर्म अधिक बलवान् होता है") सार्वत्रिक रूप से लागू नहीं होता, क्योंकि वह वहाँ के विशिष्ट प्रकरण (उद्गीथविद्या) से संबद्ध है, सामान्य ब्रह्मज्ञान से नहीं।
श्लोक 3.142
विभागः शतवत् ॥ ११ ॥
vibhāgaḥ śatavat || 11 ||
और "साथ-साथ ग्रहण" वाला कथन विभागपूर्वक समझना चाहिए — ज्ञान एक पुरुष (मुमुक्षु) से, कर्म दूसरे (कामनायुक्त) से संबद्ध है — जैसे "इन दोनों से सौ दिया जाए" कहने पर विभाजित दान समझा जाता है; और यह वचन मुमुक्षु-विषयक है ही नहीं, क्योंकि उसका प्रसंग कामनायुक्त पुरुष के संदर्भ में समाप्त होता है, जबकि अकामी का प्रसंग आगे पृथक् रूप से आरम्भ होता है।
श्लोक 3.143
अध्ययनमात्रवतः ॥ १२ ॥
adhyayanamātravataḥ || 12 ||
[आचार्यकुल से वेद पढ़ने वाले के कथन के विषय में] — उस वचन से यह सिद्ध होता है कि केवल वेद-अध्ययन करने वाले के लिए ही कर्म-कर्तव्य विहित है, आवश्यक रूप से पूर्ण अर्थ-बोध वाले के लिए नहीं; उपनिषदों में उपदिष्ट आत्मज्ञान, जो स्वयं में स्वतन्त्र रूप से सार्थक प्रतीत होता है, स्वयं कर्म-अधिकार का कारण नहीं बनता, जैसे एक यज्ञ का ज्ञान दूसरे यज्ञ के अधिकार का कारण नहीं होता।
श्लोक 3.144
नाविशेषात् ॥ १३ ॥
nāviśeṣāt || 13 ||
और उद्धृत "नियम" ("सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करे") के विषय में — वहाँ ज्ञानी-अज्ञानी का कोई भेद नहीं है; यह नियम दोनों पर समान रूप से लागू होता है, अतः इसे विशेष रूप से ज्ञान की कर्म-अधीनता सिद्ध करने वाला नहीं माना जा सकता।
श्लोक 3.145
स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ १४ ॥
stutaye'numatirvā || 14 ||
अथवा, एक अन्य दृष्टि से: यद्यपि प्रकरण-बल से "कर्म करने वाला" को "ज्ञानी कर्म करने वाला" समझा जा सकता है, तथापि वहाँ कर्म की अनुमति विद्या की स्तुति के लिए ही है — जैसा आगे कहा जाएगा, "कर्म मनुष्य से लिप्त नहीं होता" — अर्थात्, ज्ञान के सामर्थ्य से, जीवनभर कर्म करते हुए भी, ज्ञानी के लिए कर्म बन्धनकारी नहीं होता; इस प्रकार यह ज्ञान की ही प्रशंसा है, उसकी अधीनता नहीं।
श्लोक 3.146
कामकारेण चैके ॥ १५ ॥
kāmakāreṇa caike || 15 ||
और कुछ [श्रुतियाँ] कुछ ज्ञानियों को स्वेच्छा से (बिना किसी कर्म-बाध्यता के) चलते हुए दिखाती हैं — ऐसे ज्ञानी, जो ज्ञान-फल का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर चुके होने से, पुत्रादि साधनों में कोई प्रयोजन नहीं देखते: "प्राचीन ज्ञानियों ने पुत्र की कामना नहीं की, [कहा] 'हम पुत्र से क्या करें, जिनका यह लोक आत्मा है'।" और ज्ञान का फल, इसी जन्म में साक्षात् सिद्ध होने से, कालान्तर में उत्पन्न होने वाले कर्मफल जैसा नहीं है।
श्लोक 3.147
उपमर्दं च ॥ १६ ॥
upamardaṁ ca || 16 ||
और इसके अतिरिक्त, श्रुति यह भी सिखाती है कि कर्म-अधिकार का सम्पूर्ण साधन-समूह — कर्म, कारक, फल, जो सब अविद्याजनित है — ज्ञान के सामर्थ्य से विलीन हो जाता है: "जब उसके लिए सब कुछ आत्मा ही हो जाता है, तब वह किससे किसे देखे..." — जबकि वेदान्तोक्त आत्मज्ञान-पूर्वक कर्म-अधिकार की अपेक्षा करना तो कर्म-अधिकार के ही उच्छेद की ओर ले जाएगा; अतः इससे भी ज्ञान की स्वतन्त्रता सिद्ध होती है।
श्लोक 3.148
ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ॥ १७ ॥
ūrdhvaretassu ca śabde hi || 17 ||
और क्योंकि ज्ञान ऊर्ध्वरेतस् आश्रमों (नैष्ठिक ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी) के लिए भी उपदिष्ट है, जहाँ गृहस्थोचित कर्म संभव ही नहीं — और यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसे आश्रम वेद में अनुल्लिखित हैं, क्योंकि वे वैदिक शब्दों से ही ज्ञात हैं: "तीन धर्मस्कन्ध", "जो अरण्य में श्रद्धा-तप की उपासना करते हैं", "ब्रह्मचर्य से ही संन्यास ले ले" — अतः इससे भी ज्ञान की स्वतन्त्रता सिद्ध होती है।
श्लोक 3.149
परामर्शं जैमिनिरचोदनाच्चापवदति हि ॥ १८ ॥
parāmarśaṁ jaiminiracodanāccāpavadati hi || 18 ||
(अधिकरण: परामर्श — मात्र उल्लेखमात्र) आचार्य जैमिनि के मत में, उपर्युक्त शब्द ("तीन धर्मस्कन्ध" आदि) अन्य आश्रमों के केवल उल्लेखमात्र हैं, विधि नहीं, क्योंकि उनमें कोई वास्तविक विधि-शब्द नहीं है, और प्रत्येक का अपने प्रसंग में कोई अन्य, असंबद्ध मुख्य अर्थ भी संभव है; इसके अतिरिक्त, श्रुति ऐसे अन्य आश्रमों की निन्दा भी करती है — "जो अग्नि त्यागता है वह देव-हन्ता है... पुत्रहीन का कोई लोक नहीं"।
श्लोक 3.150
अनुष्ठेयं बादरायणस्साम्यश्रुतेः ॥ १९ ॥
anuṣṭheyaṁ bādarāyaṇassāmyaśruteḥ || 19 ||
आचार्य बादरायण के मत में: अन्य आश्रम भी अनुष्ठेय हैं, क्योंकि सादृश्यपूर्ण उल्लेख है — गृहस्थाश्रम का उल्लेख यहाँ अन्य आश्रमों के उल्लेख के ठीक समान है; जैसे गृहस्थाश्रम, अन्यत्र स्पष्ट विहित होने पर भी, यहाँ केवल उल्लिखित होकर भी वैध माना जाता है, वैसे ही अन्य आश्रम भी, अन्यत्र स्पष्ट विहित होने पर, यहाँ केवल दृढ़ीकरण के लिए उल्लिखित हैं — शब्द वस्तुतः संदिग्ध नहीं, क्योंकि सर्वत्र निश्चायक संकेत विद्यमान हैं।
श्लोक 3.151
विधिर् वा धारणवत् ॥ २० ॥
vidhir vā dhāraṇavat || 20 ||
अथवा, यह वास्तव में विधि ही है, मात्र उल्लेखमात्र नहीं — "धारण" (समिधा धारण) के समान: जैसे "नीचे समिधा धारण करते हुए ले जाए; देवताओं के लिए ऊपर धारण करता है" इसमें अपूर्वत्व के कारण इसे नई विधि ही माना जाता है — वैसे ही यहाँ भी, अन्य आश्रमों का वर्णन, उल्लेखमात्र प्रतीत होने पर भी, वास्तविक विधि ही मानी जानी चाहिए, क्योंकि यह भी कुछ नया प्रस्तुत करता है।
श्लोक 3.152
स्तुतिमात्रम् उपादानाद् इति चेन् नापूर्वत्वात् ॥ २१ ॥
stutimātram upādānād iti cen nāpūrvatvāt || 21 ||
(अधिकरण: स्तुतिमात्र — नहीं, केवल स्तुति नहीं) पूर्वपक्ष: "उद्गीथ" आदि कर्मांग-शब्दों का लाक्षणिक प्रयोग करने वाली श्रुतियाँ (जैसे "यह रसों में रसतम, परम, पराध्य, आठवाँ है, अर्थात् उद्गीथ") केवल उद्गीथ आदि की स्तुति हैं। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि यहाँ अपूर्वत्व है — केवल स्तुति निरर्थक होगी, क्योंकि ऐसे वचन, किसी यज्ञ-विधि के निकट-प्रसंग से पृथक् होकर, अन्यत्र विहित किसी दूरस्थ अंग की स्तुति के रूप में उपयुक्त नहीं होते; अपितु इन्हें स्वयं ही उपासना-विधि माना जाना चाहिए।
श्लोक 3.153
भावशब्दाच् च ॥ २२ ॥
bhāvaśabdāc ca || 22 ||
और स्पष्ट विधि-शब्दों के कारण भी — "उद्गीथ की उपासना करे", "साम की उपासना करे" जैसे स्पष्ट विधि-शब्द विद्यमान हैं — यदि ऐसे वचन केवल स्तुति के लिए होते, तो ये विधि-शब्द निरर्थक हो जाते; और प्रत्येक प्रसंग में विशिष्ट फल भी कहा गया है — अतः ऐसे उद्गीथ-संबंधी वचन वास्तव में उपासना-विधि के लिए हैं।
श्लोक 3.154
पारिप्लवार्था इति चेन् न विशेषितत्वात् ॥ २३ ॥
pāriplavārthā iti cen na viśeṣitatvāt || 23 ||
(अधिकरण: पारिप्लव — नहीं, आवर्तक-पाठ के लिए नहीं) पूर्वपक्ष: उपनिषदों में मिलने वाली आख्यायिकाएँ (जैसे "याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं") अश्वमेध-यज्ञ में होने वाले आवर्तक-कथा-पाठ (पारिप्लव) के लिए हैं, क्योंकि ये आख्यान-स्वरूप हैं। सिद्धांत: नहीं, क्योंकि विशेषीकरण है — पारिप्लव की विधि केवल कुछ विशिष्ट आख्यानों को ही निर्दिष्ट करती है, सामान्य आख्यान को नहीं; यदि सामान्य आख्यान-स्वरूप ही पर्याप्त होता, तो वह विशेषीकरण निरर्थक हो जाता।
श्लोक 3.155
तथा चैकवाक्योपबन्धात् ॥ २४ ॥
tathā caikavākyopabandhāt || 24 ||
और एकवाक्यता-संबंध के कारण भी: पारिप्लव में भूमिका न होने पर, यह उचित है कि ये आख्यान निकटवर्ती उपासना-विद्या के प्रवेशद्वार का कार्य करें — क्योंकि प्रत्येक स्थान पर निकटवर्ती विद्या के साथ घनिष्ठ एकता देखी जाती है: मैत्रेयी-आख्यान आगे की "आत्मा ही द्रष्टव्य है" विद्या से संबद्ध है; प्रतर्दन-आख्यान "मैं प्राण, प्रज्ञात्मा हूँ" से; जानश्रुति-आख्यान "वायु ही संवर्ग है" से।
श्लोक 3.156
अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ २५ ॥
ata eva cāgnīndhanādyanapekṣā || 25 ||
(अधिकरण: अग्नीन्धनादि-अनपेक्षा) इसी कारण से — कि पुरुषार्थ इसी ज्ञान से सिद्ध होता है — ज्ञान, अपने प्रयोजन की सिद्धि में, अग्निन्धनादि आश्रम-कर्मों की अपेक्षा नहीं रखता; यह प्रथम अधिकरण के निष्कर्ष का संक्षिप्त पुनःकथन है, आगे की चर्चा को ध्यान में रखते हुए।
श्लोक 3.157
सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेर् अश्ववत् ॥ २६ ॥
sarvāpekṣā ca yajñādiśruter aśvavat || 26 ||
(अधिकरण: सर्वापेक्षा — यज्ञादि की अपेक्षा, अश्व के समान) किन्तु ऐसा नहीं है कि ज्ञान को आश्रम-कर्मों की बिल्कुल कोई अपेक्षा ही नहीं; अपितु वह उन सभी की अपेक्षा रखता है: ज्ञान उत्पन्न हो जाने पर अपने फल की सिद्धि के लिए कुछ और अपेक्षित नहीं रखता, परन्तु उसकी उत्पत्ति के लिए वह अवश्य उन पर निर्भर है, क्योंकि श्रुति यज्ञादि का उल्लेख करती है — "ब्राह्मण वेदाध्ययन, यज्ञ, दान, तप और उपवास से उस आत्मा को जानने की इच्छा करते हैं"। "अश्व के समान" यह उपमा योग्यता-भेद को दर्शाती है — जैसे अश्व हल जोतने के योग्य नहीं, रथ खींचने के योग्य है।
श्लोक 3.158
शमदमाद्युपेतस् स्यात् तथापि तु तद्विधेस् तदङ्गतया तेषाम् अप्य् अवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ २७ ॥
śamadamādyupetas syāt tathāpi tu tadvidhes tadaṅgatayā teṣām apy avaśyānuṣṭheyatvāt || 27 ||
[पूर्वपक्ष की आशंका का समाधान:] यद्यपि यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसे वचन ज्ञान की प्रशंसा हेतु अनुवादमात्र हैं, विधि नहीं, तथापि ज्ञान का इच्छुक व्यक्ति शम-दम आदि से युक्त होना चाहिए — क्योंकि श्रुति इन्हें भी ज्ञान के साधन रूप में विहित करती है — "अतः ऐसा जानने वाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु, समाहित होकर स्वयं में आत्मा को देखता है" — और विहित होने से इनका अनुष्ठान अवश्यंभावी है; अतः यज्ञादि भी अपेक्षित हैं, क्योंकि श्रुति उन्हें ऐसा ही कहती है।
श्लोक 3.159
सर्वान् नानुमतिश् च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ २८ ॥
sarvān nānumatiś ca prāṇātyaye taddarśanāt || 28 ||
(अधिकरण: सर्वान्नानुमिति — प्राणसंकट में ही सर्वान्न-अनुज्ञा) "प्राणसंवाद" में कहा गया है "ज्ञानी के लिए कुछ भी अन्न-रहित नहीं है" — क्या यह सर्वान्न-भक्षण की अनुमति उपासना का अंग-विधि है, या मात्र स्तुति? यह प्राणसंकट (जीवन-संकट) के समय की ही अनुमति है, क्योंकि यह अन्यत्र देखा जाता है — श्रुति ऋषि चाक्रायण को घोर संकट में उच्छिष्ट भोजन खाकर प्राण बचाते दिखाती है, परन्तु चाण्डाल द्वारा दिए गए जल को पीने से इनकार करते हुए भी — इससे सिद्ध होता है कि सर्वान्न-अनुज्ञा केवल जीवन-संकट में ही है, साधारण परिस्थिति में ज्ञानी के लिए भी नहीं।
श्लोक 3.160
अबाधाच् च ॥ २९ ॥
abādhāc ca || 29 ||
और हेतु से भी: "अन्न की शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि" जैसे नियम भी इस व्याख्या से बाधित नहीं होते, अपितु अबाधित रहते हैं।
श्लोक 3.161
अपि स्मर्यते ॥ ३० ॥
api smaryate || 30 ||
और यह [संकट-मात्र अपवाद] स्मृति से भी पुष्ट होता है: "जीवन-संकट में जो भी अन्न, जहाँ से भी, खाता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्र जल से" — जबकि अन्यत्र स्मृति निषिद्ध वस्तुओं के अभ्यस्त सेवन की निन्दा करती है — इससे पुष्ट होता है कि केवल संकट में ही अन्यथा वर्जित वस्तु की अनुमति है।
श्लोक 3.162
शब्दश् चातोऽकामकारे ॥ ३१ ॥
śabdaś cāto'kāmakāre || 31 ||
और इससे भी प्रत्यक्ष निषेध-वचन है, कि यह स्वेच्छाचार का विषय नहीं — "अतः ब्राह्मण सुरा न पिए" (काठक-संहिता) — यह निषेध तभी अधिक संगत बैठता है जब पूर्वोक्त वचन को स्तुतिमात्र समझा जाए; अतः ऐसे वचन स्तुति हैं, शुद्धि-नियमों को बाधित करने वाली विधि नहीं।
श्लोक 3.163
विहितत्वाच् चाऽश्रमकर्मापि ॥ ३२ ॥
vihitatvāc cā'śramakarmāpi || 32 ||
(अधिकरण: आश्रय — कर्म भी विहित होने से आवश्यक) चूँकि आश्रम-कर्म ज्ञान के साधन हैं, क्या केवल आश्रम-निष्ठ, ज्ञान की इच्छा न रखने वाला, अन्य फलेच्छुक व्यक्ति भी नित्य कर्म करे? हाँ, अग्निहोत्रादि नित्य कर्म उसके लिए भी अनिवार्य रहते हैं, केवल इसलिए कि वे निरपवाद रूप से विहित हैं ("जीवनभर अग्निहोत्र करे") — विधि की सीमा नहीं होती।
श्लोक 3.164
सहकारित्वेन च ॥ ३३ ॥
sahakāritvena ca || 33 ||
और सहकारी होने के कारण भी — वे इसी रूप में विहित हैं ("ब्राह्मण वेदाध्ययन, यज्ञ आदि से उस आत्मा को जानने की इच्छा करते हैं"), जैसा पहले कहा गया; परन्तु यह सहकारिता प्रयाज जैसे यज्ञांगों के मॉडल पर नहीं समझनी चाहिए, क्योंकि ज्ञान स्वयं विधि-साध्य नहीं और उसका फल भी नवोत्पाद्य नहीं — अपितु ये केवल ज्ञान की उत्पत्ति में ही सहकारी हैं।
श्लोक 3.165
सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् ॥ ३४ ॥
sarvathāpi ta evobhayaliṅgāt || 34 ||
दोनों ही दृष्टियों में — चाहे स्वतन्त्र आश्रम-कर्तव्य मानें, या ज्ञान के सहकारी — वे वही अग्निहोत्रादि कर्म हैं, दोहरे संकेत (श्रुति-स्मृति) के कारण: श्रुति इन कर्मों को, जो अपने पूर्वसिद्ध रूप में ही स्थापित हैं, केवल ज्ञान-इच्छा की ओर प्रयुक्त दिखाती है; और स्मृति भी इसकी पुष्टि करती है — अतः कर्म में कोई वास्तविक भेद नहीं, केवल उसी कर्म से जुड़े "संबंध" (नित्यता बनाम सहकारिता) का भेद है।
श्लोक 3.166
अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३५ ॥
anabhibhavaṁ ca darśayati || 35 ||
और श्रुति उनकी अनभिभव-शक्ति (क्लेशों द्वारा अनभिभूत रहने) को भी दर्शाती है, जो उनकी सहकारिता का समर्थक संकेत है — "यह आत्मा नष्ट नहीं होता, जिसे ब्रह्मचर्य से प्राप्त किया जाता है..." — यह दर्शाता है कि ऐसे साधनों से युक्त व्यक्ति राग आदि क्लेशों से अभिभूत नहीं होता; अतः सिद्ध होता है कि यज्ञादि आश्रम-कर्म कर्तव्य भी हैं और ज्ञान के सहकारी भी।
श्लोक 3.167
अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३६ ॥
antarā cāpi tu taddṛṣṭeḥ || 36 ||
(अधिकरण: विधुर — मध्यवर्ती स्थिति में भी अधिकार) विधुर आदि साधन-रहित, चार आश्रमों में से किसी में स्थिर न रहने वाले मध्यवर्ती व्यक्तियों को क्या ज्ञान का अधिकार है, या नहीं? है, बिना स्थिर आश्रम के भी, क्योंकि यह श्रुति में देखा जाता है — रैक्व, वाचक्नवी जैसे इसी प्रकार के व्यक्ति श्रुति में ब्रह्मज्ञानी दिखाए गए हैं।
श्लोक 3.168
अपि स्मर्यते ॥ ३७ ॥
api smaryate || 37 ||
और इतिहास-स्मृति में भी संवर्त आदि, नग्नचर्या आदि करते हुए, आश्रम-कर्म की अपेक्षा किए बिना ही, महायोगित्व प्राप्त करते वर्णित हैं।
श्लोक 3.169
विशेषानुग्रहश् च ॥ ३८ ॥
viśeṣānugrahaś ca || 38 ||
और उन विधुरादि के लिए भी, जप, उपवास, देवाराधना जैसे निर्दोष, व्यक्ति-निरपेक्ष साधनों से ज्ञान में सहायता संभव है — स्मृति ही पुष्टि करती है कि "जप मात्र से ब्राह्मण सिद्ध होता है... वह मैत्र ब्राह्मण कहलाता है"; और पूर्वजन्मों में संचित संस्कारों से भी ज्ञान में सहायता संभव है ("अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, वह तब परम गति को प्राप्त करता है"); और ज्ञान, प्रत्यक्ष-फलयुक्त होने से, निषेध के अभाव मात्र से भी जिज्ञासु को अधिकृत कर देता है।
श्लोक 3.170
अतस् त्व् इतरज्ज्यायो लिङ्गाच् च ॥ ३९ ॥
atas tv itarajjyāyo liṅgāc ca || 39 ||
किन्तु इसी कारण से, आश्रम-पालन ही ज्ञान का श्रेष्ठतर साधन है, क्योंकि यह श्रुति-स्मृति दोनों से सुदृढ़ रूप से समर्थित है; स्मृति ही कहती है — "इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी... प्राप्त होता है; द्विज एक दिन भी आश्रम-रहित न रहे; एक वर्ष आश्रम-रहित रहकर एक कठोर प्रायश्चित्त करे" — ऐसे स्मृति-संकेत आश्रम-मार्ग की श्रेष्ठता को पुष्ट करते हैं।
श्लोक 3.171
तद्भूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेर् अपि नियमात् तद्रूपाभावेभ्यः ॥ ४० ॥
tadbhūtasya tu nātadbhāvo jaiminer api niyamāt tadrūpābhāvebhyaḥ || 40 ||
(अधिकरण: तद्भूत — प्राप्त अवस्था से पुनरावर्तन नहीं) ऊर्ध्वरेतस् आश्रमों का अस्तित्व सिद्ध हो जाने पर, क्या उस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति पूर्व-कर्तव्यों के पुनरानुष्ठान की इच्छा से, या राग-वश, उससे पुनः च्युत हो सकता है? नहीं — जो उस अवस्था में स्थिर हो चुका है, वह किसी भी प्रकार उससे पुनरावृत्त नहीं हो सकता, क्योंकि नियम है ("पुनः न लौटे"), और उस विपरीत रूप का कोई कथन नहीं — केवल आरोहण के कथन हैं, अवरोहण के नहीं। और "अपि" शब्द यह दर्शाता है कि जैमिनि भी इस विषय में बादरायण से सहमत हैं, दृढ़ता के लिए।
श्लोक 3.172
न चाधिकारिकम् अपि पतनानुमानात् तदयोगात् ॥ ४१ ॥
na cādhikārikam api patanānumānāt tadayogāt || 41 ||
(अधिकरण: आधिकारिक — विहित प्रायश्चित्त भी नहीं) यदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी प्रमादवश व्रतभंग करे, तो क्या वह सामान्य ब्रह्मचारी के लिए विहित "अवकीर्णी" प्रायश्चित्त करे? नहीं, वह प्रायश्चित्त उस पर लागू नहीं होता — क्योंकि स्मृति से यह अनुमित होता है कि ऐसा पतन असाध्य है: "नैष्ठिक धर्म पर आरूढ़ होकर जो पुनः च्युत होता है, उसके लिए मैं कोई प्रायश्चित्त नहीं देखता... वह आत्महा है" — केवल साधारण ब्रह्मचारी, जिसके लिए ऐसा वर्णन नहीं, उस लघु प्रायश्चित्त का पात्र है।
श्लोक 3.173
उपपूर्वम् अपीत्य् एके भावमशनवत् तद् उक्तम् ॥ ४२ ॥
upapūrvam apīty eke bhāvamaśanavat tad uktam || 42 ||
किन्तु कुछ आचार्यों के मत में यह मात्र उपपातक है, महापातक नहीं — अतः वे मानते हैं कि नैष्ठिक भी, साधारण ब्रह्मचारी की भांति, किसी प्रायश्चित्त का भागी है — जैसे भोजन के दृष्टान्त में (मधु-मांस-भक्षण व्रतभंग और पुनःसंस्कार कराता है, कठोर दण्ड नहीं)। जो प्रायश्चित्त-अभाव मानते हैं उनका कोई मूल आधार नहीं मिलता; अतः प्रायश्चित्त-भाव का मत ही श्रेयस्कर है; "कोई प्रायश्चित्त नहीं" वाला कथन महान् प्रयत्न उत्पन्न कराने के लिए समझना चाहिए। इसी प्रकार का विचार वानप्रस्थ और संन्यासी के व्रतभंग पर भी लागू होता है।
श्लोक 3.174
बहिस् तूभयथापि स्मृतेर् आचाराच् च ॥ ४३ ॥
bahis tūbhayathāpi smṛter ācārāc ca || 43 ||
(अधिकरण: बहिः — दोनों ही स्थितियों में बहिष्कार) चाहे नैष्ठिक/संन्यासी का पतन महापातक हो या उपपातक, दोनों ही स्थितियों में शिष्टजन उसे सामान्य समाज से बहिष्कृत करें, क्योंकि स्मृति की तीव्र निन्दा है ("नैष्ठिक धर्म पर आरूढ़ होकर पुनः च्युत... वह आत्महा है") और शिष्ट-आचार से भी, क्योंकि शिष्टजन ऐसे व्यक्तियों के साथ यज्ञ, अध्ययन, विवाह आदि नहीं करते।
श्लोक 3.175
स्वामिनः फलश्रुतेर् इत्य् आत्रेयः ॥ ४४ ॥
svāminaḥ phalaśruter ity ātreyaḥ || 44 ||
(अधिकरण: स्वाम्य — फलश्रुति के अनुसार यजमान-कर्तव्य) क्या कर्मांग-उपासनाएँ यजमान का कर्तव्य हैं, या ऋत्विक् का? आचार्य आत्रेय के मत में: ये यजमान की हैं, क्योंकि फल उसी के लिए कहा गया है — "जो ऐसा जानकर सूखे में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसके लिए वर्षा होती है" — ऐसा फल यजमान को ही उचित है, जो सांग-प्रयोग का ही अधिकारी है।
श्लोक 3.176
आर्त्विज्यम् इत्य् औडुलोमिः तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ४५ ॥
ārtvijyam ity auḍulomiḥ tasmai hi parikrīyate || 45 ||
आचार्य औडुलोमि के मत में: नहीं, ऐसा नहीं है — ये उपासनाएँ ऋत्विक्-कर्तव्य हैं, क्योंकि ऋत्विक् को ठीक उसी समग्र यज्ञ के लिए नियुक्त किया जाता है; और श्रुति भी बक दाल्भ्य नामक ऋत्विक् को नैमिषीय यजमानों के लिए उद्गातृ-रूप में ऐसा ज्ञान-कर्म करते दिखाती है; फल यजमान के लिए कहे जाने में कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि ऋत्विक् यजमान की ओर से कार्य करता है।
श्लोक 3.177
सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ४६ ॥
sahakāryantaravidhiḥ pakṣeṇa tṛtīyaṁ tadvato vidhyādivat || 46 ||
(अधिकरण: सहकार्यन्तरविधि) बृहदारण्यक के वचन में — "ब्राह्मण पाण्डित्य त्यागकर बाल्य में रहने की इच्छा करे; बाल्य और पाण्डित्य दोनों त्यागकर, तब मुनि बनता है" — क्या यहाँ "मौन" (मुनित्व) विहित है, या नहीं? [प्रथमतः अविहित प्रतीत हो सकता है, क्योंकि "मुनि" और "पण्डित" दोनों ज्ञानसूचक हैं।] यह विहित ही है, ज्ञान के तीसरे, अतिरिक्त सहकारी अंग के रूप में, क्योंकि यह अपूर्व है — "मुनि" उच्चतर ज्ञान-स्तर का वाचक है, मात्र "पाण्डित्य" से भिन्न; यह विशेष रूप से विद्यावान् संन्यासी के लिए है, अग्निस्थापनादि सहकारी विधि के मॉडल पर।
श्लोक 3.178
कृत्स्नभावात् तु गृहिणोपसंहारः ॥ ४७ ॥
kṛtsnabhāvāt tu gṛhiṇopasaṁhāraḥ || 47 ||
तो फिर छान्दोग्य का समानान्तर वचन विशेष रूप से गृहस्थ के संदर्भ में ही क्यों समाप्त होता है? क्योंकि यह कृत्स्नता (सम्पूर्णता) के कारण है — गृहस्थ के लिए विशेष रूप से अनेक श्रमसाध्य कर्तव्य विहित हैं, और अन्य आश्रमों के कर्तव्य भी, यथासंभव, उस पर लागू होते हैं — अतः छान्दोग्य का गृहस्थ पर समापन कोई विरोध नहीं।
श्लोक 3.179
मौनवद् इतरेषाम् अप्य् उपदेशात् ॥ ४८ ॥
maunavad itareṣām apy upadeśāt || 48 ||
जैसे मौन और गृहस्थाश्रम इस वचन में सीधे प्रमाणित दो आश्रम हैं, वैसे ही अन्य दो (वानप्रस्थ, ब्रह्मचर्य) भी सूचित हैं, क्योंकि उनका श्रुति-प्रमाण पहले ही दिखाया जा चुका है; अतः चारों आश्रमों के समान रूप से प्रमाणित होने पर, उनमें से चयन विकल्प या समुच्चय से समान रूप से होता है।
श्लोक 3.180
अनाविष्कुर्वन्न् अन्वयात् ॥ ४९ ॥
anāviṣkurvann anvayāt || 49 ||
(अधिकरण: अनाविष्कार — प्रसंग-संबंध से "बाल्य" का अर्थ) "पाण्डित्य त्यागकर बाल्य में रहने की इच्छा करे" — यहाँ "बाल्य" से क्या शाब्दिक बाल-सुलभ शारीरिक लक्षण अभिप्रेत हैं, या आन्तरिक निर्दम्भ भाव? दूसरा ही अभिप्रेत है — "प्रकट न करना" — प्रसंग-संबंध से: प्रधान वस्तु यहाँ ज्ञानाभ्यास है, जिसकी सेवा शाब्दिक बाल-आचरण से नहीं होती; अपितु निर्दम्भ, विनम्र भाव — अपने ज्ञान को प्रदर्शित न करना — ही उस उद्देश्य की सेवा करता है, जैसा स्मृति भी पुष्टि करती है — "विद्वान् गुप्त धर्माश्रित होकर अज्ञात-चरित्र से... विचरण करे।"
श्लोक 3.181
ऐहिकम् अप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ५० ॥
aihikam aprastutapratibandhe taddarśanāt || 50 ||
(अधिकरण: ऐहिक — बाधा-अभाव में इसी जन्म में) ज्ञान के विविध साधन स्थापित हो जाने पर, क्या उससे उत्पन्न ज्ञान सदैव इसी जन्म में होता है, या कभी अगले जन्म में भी? [प्रथमतः इसी जन्म में प्रतीत हो सकता है।] ज्ञान इसी जन्म में होता है, यदि अन्य वर्तमान-फलोन्मुख कर्म से कोई बाधा न हो; परन्तु ऐसी बाधा होने पर, यह अगले जन्म में ही होता है — जैसे देखा जाता है: वामदेव ने गर्भ में ही ब्रह्मभाव प्राप्त किया; और भगवद्गीता भी साधक के पूर्वजन्म-संचित बुद्धि-संबंध का वर्णन करती है।
श्लोक 3.182
एवं मुक्तिफलानियमस् तदवस्थावधृतेस् तदवस्थावधृतेः ॥ ५१ ॥
evaṁ muktiphalāniyamas tadavasthāvadhṛtes tadavasthāvadhṛteḥ || 51 ||
(अधिकरण: मुक्तिफल — उस अवस्था की एकरूपता के कारण मुक्तिफल में कोई भेद नहीं) जैसे ज्ञान-फल की उत्पत्ति में भेद देखा जाता है, वैसे ही मुक्तिफल में भी कोई न्यूनाधिक्य-भेद संदेहास्पद हो सकता है। परन्तु ऐसा कोई भेद नहीं है, क्योंकि उस अवस्था की एकरूपता निश्चित है — सम्पूर्ण वेदान्त में मुक्ति की अवस्था एक ही निश्चित होती है, क्योंकि ब्रह्म ही वह अवस्था है, और ब्रह्म में बहुरूपता नहीं। मुक्ति नवोत्पाद्य न होकर, अपने ही नित्यसिद्ध स्वरूप की ज्ञान द्वारा उद्घाटित होने वाली वस्तु है, अतः न्यूनाधिक्य नहीं स्वीकार कर सकती — जैसा स्मृति भी पुष्टि करती है: "किसी की कोई उच्च या निम्न गति नहीं होती; केवल गुण-भेद होने पर ही असमानता कही जाती है।" यह दोहराया गया पद अध्याय की समाप्ति को द्योतित करता है।
श्लोक 4.1
आवृत्तिर् असकृदुपदेशात् ॥ १ ॥
āvṛttir asakṛdupadeśāt || 1 ||
यहाँ से ब्रह्मसूत्र के चतुर्थ अध्याय, निदिध्यासन-प्रकरण, का आरम्भ होता है। शास्त्र द्वारा बताई गई ब्रह्म-उपासना (ध्यानपूर्वक की जाने वाली भक्ति-साधना) को एक बार नहीं, बार-बार करना चाहिए, क्योंकि शास्त्र स्वयं उसका उपदेश बार-बार देता है।
श्लोक 4.2
लिङ्गाच् च ॥ २ ॥
liṅgāc ca || 2 ||
और इसका एक और प्रमाण है शास्त्र के अन्य संकेत (लिङ्ग), जैसे 'अभ्यास' जैसे शब्दों का प्रयोग, जो भी बार-बार किए जाने वाले साधन की ओर संकेत करते हैं।
श्लोक 4.3
आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥ ३ ॥
ātmeti tūpagacchanti grāhayanti ca || 3 ||
ब्रह्म-उपासना में शास्त्र उसे 'मैं' के रूप में स्वीकार करता है और अन्यों को भी वैसा ही सिखाता है — अर्थात् साधक को ब्रह्म को अपने ही आत्मा (परम स्व) के रूप में देखना चाहिए, किसी पृथक् वस्तु के रूप में नहीं।
श्लोक 4.4
न प्रतीके न हि सः ॥ ४ ॥
na pratīke na hi saḥ || 4 ||
किन्तु यह 'मैं-भाव' प्रतीक-उपासना (जैसे मन को ब्रह्म मानकर की जाने वाली उपासना) में लागू नहीं होता, क्योंकि वह प्रतीक वस्तुतः आत्मा नहीं है।
श्लोक 4.5
ब्रह्मदृष्टिर् उत्कर्षात् ॥ ५ ॥
brahmadṛṣṭir utkarṣāt || 5 ||
इसके विपरीत, जहाँ किसी निम्न वस्तु (जैसे मन) को ब्रह्म मानकर उपासना की जाती है, वहाँ उस आधार को ब्रह्म-दृष्टि से ऊँचा उठाकर देखना चाहिए, क्योंकि इससे उस आधार का ही उत्कर्ष (उत्थान) होता है, न कि ब्रह्म का अवमूल्यन।
श्लोक 4.6
आदित्यादिमतयश् चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ६ ॥
ādityādimatayaś cāṅga upapatteḥ || 6 ||
और 'सूर्य ही उद्गीथ है' जैसी धारणाएँ यज्ञ के सहायक अंगों से सम्बन्धित हैं, क्योंकि यही व्याख्या युक्तिसंगत (उपपन्न) बैठती है।
श्लोक 4.7
आसीनः संभवात् ॥ ७ ॥
āsīnaḥ saṁbhavāt || 7 ||
उपासक को बैठकर ही ध्यान करना चाहिए, क्योंकि स्थिर एकाग्रता केवल बैठी हुई अवस्था में ही सम्भव है।
श्लोक 4.8
ध्यानाच् च ॥ ८ ॥
dhyānāc ca || 8 ||
और इसलिए भी कि इसे 'ध्यान' कहा गया है, जिसका स्वभाव ही स्थिर एवं अचल एकाग्रता है।
श्लोक 4.9
अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ९ ॥
acalatvaṁ cāpekṣya || 9 ||
और शरीर व मन की अचलता (स्थिरता) की अपेक्षा को ध्यान में रखते हुए भी यही सिद्ध होता है।
श्लोक 4.10
स्मरन्ति च ॥ १० ॥
smaranti ca || 10 ||
स्मृति-ग्रन्थ (जैसे भगवद्गीता का योगासन-वर्णन) भी इसी बात की पुष्टि करते हैं कि ध्यान बैठकर ही किया जाना चाहिए।
श्लोक 4.11
यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ११ ॥
yatraikāgratā tatrāviśeṣāt || 11 ||
ध्यान वहीं किया जा सकता है जहाँ एकाग्रता सध जाए, क्योंकि स्थान-विशेष के विषय में शास्त्र कोई भेद (नियम) नहीं करता।
श्लोक 4.12
आप्रयाणात् तत्रापि हि दृष्टम् ॥ १२ ॥
āprayāṇāt tatrāpi hi dṛṣṭam || 12 ||
ब्रह्म-उपासना को जीवनपर्यन्त, मृत्युपर्यन्त (आप्रयाण) तक निरन्तर करते रहना चाहिए, क्योंकि शास्त्र में भी यही देखा जाता है।
श्लोक 4.13
तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोर् अश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् ॥ १३ ॥
tadadhigama uttarapūrvāghayor aśleṣavināśau tadvyapadeśāt || 13 ||
उस ब्रह्म-ज्ञान (जानकारी नहीं, साक्षात् अनुभूति) की प्राप्ति होने पर ज्ञानी को भविष्य के कर्म-फल (आगामी कर्म) स्पर्श नहीं करते, और पूर्वसंचित पाप-कर्म (संचित कर्म) नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि शास्त्र (श्रुति) स्वयं ऐसा कहता है।
श्लोक 4.14
इतरस्याप्य् एवम् असंश्लेषः पाते तु ॥ १४ ॥
itarasyāpy evam asaṁśleṣaḥ pāte tu || 14 ||
इसी प्रकार पूर्व-संचित पुण्य-कर्म भी ज्ञानी को नहीं चिपकता; परन्तु इन संचित कर्मों का वास्तविक क्षय शरीर के पतन अर्थात् मृत्यु के समय ही पूर्ण होता है।
श्लोक 4.15
अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॥ १५ ॥
anārabdhakārye eva tu pūrve tadavadheḥ || 15 ||
किन्तु ज्ञान से केवल वे ही पूर्वसंचित कर्म नष्ट होते हैं जिनका फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है (अनारब्ध); क्योंकि शास्त्र ने यही सीमा (अवधि) निर्धारित की है। जिस कर्म का फल आरम्भ हो चुका है — प्रारब्ध कर्म — वह ज्ञान से नष्ट नहीं होता, उसे तो भोगकर ही समाप्त करना पड़ता है।
श्लोक 4.16
अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॥ १६ ॥
agnihotrādi tu tatkāryāyaiva taddarśanāt || 16 ||
किन्तु अग्निहोत्र आदि यज्ञ-कर्म उस ज्ञान की प्राप्ति के साधन-रूप में ही किए जाते हैं, क्योंकि शास्त्र में ऐसा ही सम्बन्ध दिखाया गया है।
श्लोक 4.17
अतोऽन्यापि ह्य् एकेषाम् उभयोः ॥ १७ ॥
ato'nyāpi hy ekeṣām ubhayoḥ || 17 ||
क्योंकि कुछ शाखाओं के अनुसार अग्निहोत्र के अतिरिक्त अन्य कर्तव्य भी हैं, जो कर्म और ज्ञान — दोनों के ही सहायक होते हैं।
श्लोक 4.18
यद् एव विद्ययेति हि ॥ १८ ॥
yad eva vidyayeti hi || 18 ||
क्योंकि शास्त्र कहता है — 'जो कुछ विद्या (ज्ञान) के साथ किया जाता है वह अधिक फलवान होता है' — इससे सिद्ध होता है कि ज्ञानसहित किया गया कर्म स्वयं ज्ञान का साधन बन जाता है।
श्लोक 4.19
भोगेन त्व् इतरे क्षपयित्वाथ संपद्यते ॥ १९ ॥
bhogena tv itare kṣapayitvātha saṁpadyate || 19 ||
किन्तु शेष कर्म — अर्थात् प्रारब्ध कर्म — को भोग (उसके फल के प्रत्यक्ष अनुभव) द्वारा ही समाप्त करना पड़ता है; तभी ज्ञानी अन्ततः मोक्ष (ब्रह्म में परम ऐक्य) को प्राप्त करता है।
श्लोक 4.20
वाङ्मनसि दर्शनाच् छब्दाच् च ॥ १ ॥
vāṅmanasi darśanāc chabdāc ca || 1 ||
यहाँ से मृत्यु की प्रक्रिया का प्रसंग आरम्भ होता है: मृत्यु के समय वाणी (वाक्) मन में विलीन हो जाती है, जैसा शास्त्र में देखा भी जाता है और स्पष्ट कहा भी गया है।
श्लोक 4.21
अत एव सर्वाण्यनु ॥ २ ॥
ata eva sarvāṇyanu || 2 ||
इसी कारण अन्य सभी इन्द्रियाँ भी क्रमशः उसी प्रकार मन में विलीन होती जाती हैं।
श्लोक 4.22
तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ ३ ॥
tanmanaḥ prāṇa uttarāt || 3 ||
वह मन तत्पश्चात् प्राण (जीवनी-शक्ति, श्वास-तत्त्व) में विलीन हो जाता है, जैसा उसी शास्त्र-वाक्य के उत्तरार्ध से स्पष्ट है।
श्लोक 4.23
सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४ ॥
so'dhyakṣe tadupagamādibhyaḥ || 4 ||
वह प्राण तदनन्तर अधिष्ठाता जीव (व्यष्टि-आत्मा) में लीन होता है, क्योंकि शास्त्र में प्राण के उसके पास 'जाने' आदि का उल्लेख मिलता है।
श्लोक 4.24
भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ५ ॥
bhūteṣu tacchruteḥ || 5 ||
तदनन्तर जीव, प्राण सहित, सूक्ष्म भूतों (तत्त्वों) में स्थित हो जाता है, क्योंकि शास्त्र में ऐसा वर्णन है।
श्लोक 4.25
नैकस्मिन् दर्शयतो हि ॥ ६ ॥
naikasmin darśayato hi || 6 ||
यह किसी एक ही भूत में लय नहीं है, क्योंकि दो शास्त्र-वाक्य इसे अनेक भूतों में होते हुए दिखाते हैं।
श्लोक 4.26
समाना चासृत्युपक्रमाद् अमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ७ ॥
samānā cāsṛtyupakramād amṛtatvaṁ cānupoṣya || 7 ||
यह प्रक्रिया ज्ञानी और अज्ञानी दोनों के लिए जीव के प्रस्थान (आसृति) के आरम्भ तक समान है; परन्तु मात्र भूतों में विलीन हो जाने से बिना वास्तविक साधना के अमरत्व प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 4.27
तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ८ ॥
tadāpīteḥ saṁsāravyapadeśāt || 8 ||
क्योंकि शास्त्र अज्ञानी के तत्त्वों को आत्मा के साथ केवल 'संयुक्त' होना बताता है (न कि उसके साथ प्रस्थान करना) और 'पुनः निकलने' का उल्लेख करता है, अतः इस स्थिति को संसार (जन्म-मरण का चक्र) ही कहा गया है, मुक्ति नहीं।
श्लोक 4.28
सूक्ष्मं प्रमाणतश् च तथोपलब्धेः ॥ ९ ॥
sūkṣmaṁ pramāṇataś ca tathopalabdheḥ || 9 ||
प्रस्थान करते हुए जीव के साथ जाने वाले सूक्ष्म भूत — जो लिङ्गशरीर (सूक्ष्म शरीर, जो जन्म-जन्मान्तर तक जीव के साथ चलता है) का निर्माण करते हैं — परिमाण में भी सूक्ष्म हैं, क्योंकि वे उसी रूप में अनुभवगम्य पाए जाते हैं।
श्लोक 4.29
नोपमर्देनातः ॥ १० ॥
nopamardenātaḥ || 10 ||
इसी सूक्ष्मता के कारण ये तत्त्व स्थूल शरीर के नाश (उपमर्द) के साथ नष्ट नहीं होते।
श्लोक 4.30
अस्यैव चोपपत्तेर् ऊष्मा ॥ ११ ॥
asyaiva copapatter ūṣmā || 11 ||
और जीवित शरीर में अनुभव होने वाली उष्णता (गर्मी) भी इसी सूक्ष्म प्राण-तत्त्व की उपस्थिति का प्रमाण है, क्योंकि यही व्याख्या युक्तिसंगत है।
श्लोक 4.31
प्रतिषेधाद् इति चेन् न शारीरात् स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ १२ ॥
pratiṣedhād iti cen na śārīrāt spaṣṭo hyekeṣām || 12 ||
यदि यह शंका की जाए कि शास्त्र में इस लिङ्गशरीर का निषेध है, तो उत्तर है — नहीं; वह निषेध स्थूल शरीर के विषय में है, क्योंकि कुछ शाखाओं में सूक्ष्म तत्त्वों के साथ जाने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
श्लोक 4.32
स्मर्यते च ॥ १३ ॥
smaryate ca || 13 ||
और स्मृति-ग्रन्थों में भी इसकी पुष्टि होती है।
श्लोक 4.33
तानि परे तथा ह्य् आह ॥ १४ ॥
tāni pare tathā hy āha || 14 ||
पूर्ण मुक्त ज्ञानी के लिए शास्त्र यह कहता है कि उसकी ये इन्द्रियाँ सीधे परब्रह्म में ही लीन हो जाती हैं, न कि केवल जीव में।
श्लोक 4.34
अविभागो वचनात् ॥ १५ ॥
avibhāgo vacanāt || 15 ||
यह लय अविभक्त (अभेदयुक्त) होता है — मुक्त इन्द्रियाँ पृथक् नहीं रहतीं, अपितु ब्रह्म में अभिन्न रूप से लीन हो जाती हैं, जैसा शास्त्र के वचन से सिद्ध है।
श्लोक 4.35
तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच् ॥ १६ ॥
tadokograjvalanaṁ tatprakāśitadvāro vidyāsāmarthyāt taccheṣagatyanusmṛtiyogāc || 16 ||
तब मृत्यु के समय हृदय का अग्रभाग (शिखा-स्थान) प्रकाशित हो उठता है, और उसी प्रकाश से प्रस्थान का द्वार (मूर्धा) आलोकित हो जाता है — यह उपासक की विद्या (साधना) के सामर्थ्य से और उस उपासना के अंगभूत मार्ग-स्मरण के योग से होता है।
श्लोक 4.36
रश्म्यनुसारी ॥ १७ ॥
raśmyanusārī || 17 ||
तत्पश्चात् प्रस्थान करने वाला जीव सूर्य की किरणों (रश्मियों) का अनुसरण करता है — यह अर्चिरादि-मार्ग (देवयान, प्रकाश से आरम्भ होने वाला मार्ग) का प्रथम चरण है।
श्लोक 4.37
निशि नेति चेन् न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वाद् दर्शयति च ॥ १८ ॥
niśi neti cen na sambandhasya yāvaddehabhāvitvād darśayati ca || 18 ||
यदि यह शंका हो कि रात्रि में (सूर्य-किरणों के अभाव में) यह सम्भव नहीं — तो उत्तर है, नहीं; क्योंकि हृदय और सूर्य के बीच का सम्बन्ध जीवनभर बना रहता है, और शास्त्र भी यही दिखाता है।
श्लोक 4.38
अतश् चायनेऽपि दक्षिणे ॥ १९ ॥
ataś cāyane'pi dakṣiṇe || 19 ||
इसी कारण दक्षिणायन (सूर्य के दक्षिण गमन के काल) में देह त्यागने पर भी ज्ञानी उसी प्रकाश-मार्ग से जा सकता है।
श्लोक 4.39
योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ॥ २० ॥
yoginaḥ prati smaryete smārte caite || 20 ||
काल-सम्बन्धी ये दोनों नियम (रात्रि-दिन, दक्षिणायन-उत्तरायण) अन्य प्रकार के योगियों के सन्दर्भ में कहे गए हैं, और ये स्मृति (जैसे भगवद्गीता) के विषय हैं — यहाँ वर्णित ब्रह्मज्ञानी के लिए श्रुति में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
श्लोक 4.40
अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ १ ॥
arcirādinā tatprathiteḥ || 1 ||
यहाँ से देवयान-प्रसंग आरम्भ होता है: सगुण ब्रह्म के उपासक की गति प्रकाश (अर्चिस्) से आरम्भ होने वाले सुप्रसिद्ध अर्चिरादि-मार्ग से होती है, क्योंकि शास्त्र में इसी का बारम्बार वर्णन मिलता है।
श्लोक 4.41
वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ २ ॥
vāyumabdādaviśeṣaviśeṣābhyām || 2 ||
मार्ग के विभिन्न सोपानों के सामान्य व विशेष शास्त्र-वचनों का समन्वय करते हुए यह सिद्ध होता है कि जीव मेघ से वायु की ओर जाता है।
श्लोक 4.42
तटितोऽधि वरुणः संबन्धात् ॥ ३ ॥
taṭito'dhi varuṇaḥ saṁbandhāt || 3 ||
विद्युत् (तड़ित्) के ऊपर वरुण का स्थान आता है, क्योंकि वरुण का विद्युत् से सम्बन्ध है।
श्लोक 4.43
आतिवाहिकास् तल्लिङ्गात् ॥ ४ ॥
ātivāhikās talliṅgāt || 4 ||
ये सोपान (प्रकाश, दिन आदि) जीव के मार्गदर्शक (आतिवाहिक) मात्र हैं, ठहरने के स्थान नहीं, क्योंकि शास्त्र के संकेत यही दर्शाते हैं।
श्लोक 4.44
वैद्युतेनैव ततस् तच्छ्रुतेः ॥ ५ ॥
vaidyutenaiva tatas tacchruteḥ || 5 ||
वहाँ (विद्युत्-वरुण के स्थान) से आगे जीव को विद्युत् में निवास करने वाला पुरुष ही आगे ले जाता है, जैसा शास्त्र में स्पष्ट कहा गया है।
श्लोक 4.45
कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ६ ॥
kāryaṁ bādarirasya gatyupapatteḥ || 6 ||
आचार्य बादरि के मत में, इस मार्ग के अन्त में जो ब्रह्म प्राप्त होता है वह कार्य-ब्रह्म (ब्रह्मलोक, सगुण-सोपाधिक ब्रह्म) है — क्योंकि 'जाना' केवल किसी स्थान-विशेष तक ही सम्भव है, असीम निर्गुण ब्रह्म तक नहीं।
श्लोक 4.46
विशेषितत्वाच् च ॥ ७ ॥
viśeṣitatvāc ca || 7 ||
और इसलिए भी कि शास्त्र उस गन्तव्य को विशेषित करता है (जैसे 'ब्रह्मलोक में'), जो एक विशिष्ट अर्थात् कार्य-ब्रह्म की ओर ही संकेत करता है।
श्लोक 4.47
सामीप्यात् तु तद्व्यपदेशः ॥ ८ ॥
sāmīpyāt tu tadvyapadeśaḥ || 8 ||
किन्तु यह गन्तव्य 'ब्रह्म' इसलिए कहलाता है क्योंकि वह सामीप्य (निकटता) के कारण वास्तविक परब्रह्म के अत्यन्त समीप है — यह कथन उपचार-मात्र है।
श्लोक 4.48
कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् अभिधानात् ॥ ९ ॥
kāryātyaye tadadhyakṣeṇa sahātaḥ param abhidhānāt || 9 ||
उस कार्य-ब्रह्मलोक के प्रलय (कल्पान्त) के समय, वहाँ के जीव उसके अधिष्ठाता देवता (हिरण्यगर्भ) के साथ परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, और अपुनरावृत्ति (पुनर्जन्म से सदा के लिए मुक्ति) को प्राप्त करते हैं, जैसा शास्त्र में कहा गया है।
श्लोक 4.49
स्मृतेश् च ॥ १० ॥
smṛteś ca || 10 ||
और स्मृति (जैसे भगवद्गीता का यह कथन कि ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं, केवल परब्रह्म-प्राप्ति ही अपुनरावर्ती है) भी इसी की पुष्टि करती है।
श्लोक 4.50
परं जैमिनिर् मुख्यत्वात् ॥ ११ ॥
paraṁ jaiminir mukhyatvāt || 11 ||
आचार्य जैमिनि के मत में, इस मार्ग से सीधे परब्रह्म ही प्राप्त होता है, क्योंकि 'ब्रह्म' शब्द का मुख्य (प्रत्यक्ष) अर्थ ही ग्रहण किया जाना चाहिए।
श्लोक 4.51
दर्शनाच् च ॥ १२ ॥
darśanāc ca || 12 ||
और इसलिए भी कि शास्त्र में इसे प्रत्यक्ष रूप से दिखाया भी गया है।
श्लोक 4.52
न च कार्ये प्रत्यभिसन्धिः ॥ १३ ॥
na ca kārye pratyabhisandhiḥ || 13 ||
और यह भी उचित नहीं कि उपासक का लक्ष्य केवल कार्य-ब्रह्मलोक हो, जबकि शास्त्र उसका फल परम मुक्ति ही बताता है।
श्लोक 4.53
अप्रतीकालम्बनान् नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात् तत्क्रतुश् च ॥ १४ ॥
apratīkālambanān nayatīti bādarāyaṇa ubhayathā ca doṣāt tatkratuś ca || 14 ||
आचार्य बादरायण (सूत्रकार का स्वयं का समन्वयकारी मत) कहते हैं कि यह मार्ग केवल उन्हीं को ले जाता है जिन्होंने बिना किसी प्रतीक के आलम्बन के, अर्थात् साक्षात् ब्रह्म की, उपासना की है — क्योंकि बादरि या जैमिनि के मत को सर्वथा मान लेने पर दोष उत्पन्न होता है — और अन्ततः जिसकी जैसी उपासना (क्रतु) होती है, वैसी ही उसकी गति होती है।
श्लोक 4.54
विशेषं च दर्शयति ॥ १५ ॥
viśeṣaṁ ca darśayati || 15 ||
और शास्त्र विभिन्न उपासकों की गति में यह भेद भी स्पष्ट रूप से दिखाता है, जो इसी समन्वयकारी मत की पुष्टि करता है।
श्लोक 4.55
संपद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ १ ॥
saṁpadyāvirbhāvaḥ svena śabdāt || 1 ||
यहाँ से मुक्ति (विदेहमुक्ति — शरीर-पतन के पश्चात् प्राप्त होने वाली मुक्ति) के स्वरूप का प्रसंग आरम्भ होता है: ब्रह्म-प्राप्ति होने पर जीव को कुछ नया प्राप्त नहीं होता, अपितु उसका अपना ही सत्य, नित्य स्वरूप प्रकट (आविर्भूत) हो जाता है — जैसा शास्त्र में कहा गया है।
श्लोक 4.56
मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ २ ॥
muktaḥ pratijñānāt || 2 ||
यह अपने स्वरूप का आविर्भाव मुक्त अवस्था को ही सूचित करता है, क्योंकि शास्त्र स्वयं इस परिणाम की प्रतिज्ञा करता है।
श्लोक 4.57
आत्मा प्रकरणात् ॥ ३ ॥
ātmā prakaraṇāt || 3 ||
जो 'स्वरूप' प्रकट होता है वह आत्मा (अर्थात् स्वयं ब्रह्म) ही है, जैसा प्रकरण (सन्दर्भ) से स्पष्ट है।
श्लोक 4.58
अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ ४ ॥
avibhāgena dṛṣṭatvāt || 4 ||
यह इसलिए भी सिद्ध है क्योंकि शास्त्र मुक्त आत्मा के स्वरूप को परब्रह्म से अविभक्त (अभिन्न) रूप में ही दर्शाता है।
श्लोक 4.59
ब्राह्मेण जैमिनिर् उपन्यासादिभ्यः ॥ ५ ॥
brāhmeṇa jaiminir upanyāsādibhyaḥ || 5 ||
आचार्य जैमिनि के मत में, मुक्त जीव ब्रह्म के ही ऐश्वर्यों (शक्तियों) के साथ प्रकट होता है, जैसा शास्त्र-वाक्यों की प्रस्तावना आदि से सिद्ध होता है।
श्लोक 4.60
चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वाद् इत्य् औडुलोमिः ॥ ६ ॥
cititanmātreṇa tadātmakatvād ity auḍulomiḥ || 6 ||
आचार्य औडुलोमि के मत में, मुक्त जीव केवल शुद्ध चैतन्य (चिति) के रूप में ही प्रकट होता है, क्योंकि यही उसका मूल स्वभाव है।
श्लोक 4.61
एवम् अप्य् उपन्यासात् पूर्वभावाद् अविरोधं बादरायणः ॥ ७ ॥
evam apy upanyāsāt pūrvabhāvād avirodhaṁ bādarāyaṇaḥ || 7 ||
आचार्य बादरायण दोनों मतों का समन्वय करते हैं: यह मानते हुए भी कि मूल स्वभाव शुद्ध चैतन्य है, इसमें कोई विरोध नहीं, क्योंकि शास्त्र-वचन ब्रह्म के पूर्ण स्वरूप की ओर भी संकेत करते हैं — अतः मुक्त आत्मा का सार चैतन्य होते हुए भी, ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण, वह इच्छानुसार ब्रह्म के सभी ऐश्वर्य भी प्रकट कर सकता है।
श्लोक 4.62
संकल्पाद् एव तच्छ्रुतेः ॥ ८ ॥
saṁkalpād eva tacchruteḥ || 8 ||
मुक्त अवस्था में जीव जो कुछ भी संकल्प करता है, वह उस संकल्पमात्र से ही सिद्ध हो जाता है, बिना किसी साधन के — जैसा शास्त्र में कहा गया है।
श्लोक 4.63
अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ९ ॥
ata eva cānanyādhipatiḥ || 9 ||
इसी कारण मुक्त जीव किसी अन्य स्वामी के अधीन नहीं रहता।
श्लोक 4.64
अभावं बादरिर् आह ह्य् एवम् ॥ १० ॥
abhāvaṁ bādarir āha hy evam || 10 ||
आचार्य बादरि के मत में, मुक्त जीव किसी शरीर या इन्द्रिय से रहित (अभाव) होता है, क्योंकि शास्त्र मुक्त अवस्था को शरीररहित बताता है।
श्लोक 4.65
भावं जैमिनिर् विकल्पामननात् ॥ ११ ॥
bhāvaṁ jaiminir vikalpāmananāt || 11 ||
आचार्य जैमिनि के मत में, मुक्त जीव के शरीर होते हैं (और वह इच्छानुसार अनेक शरीर भी धारण कर सकता है), क्योंकि शास्त्र इस विविधता (विकल्प) की शिक्षा देता है।
श्लोक 4.66
द्वादशाहवद् उभयविधं बादरायणोऽतः ॥ १२ ॥
dvādaśāhavad ubhayavidhaṁ bādarāyaṇo'taḥ || 12 ||
आचार्य बादरायण इसका भी समन्वय करते हैं: जिस प्रकार द्वादशाह-यज्ञ (दोनों प्रकार के लक्षणों के कारण) दो वर्गों में गिना जाता है, उसी प्रकार मुक्त अवस्था भी दृष्टिकोण-भेद से सशरीर या अशरीर — दोनों ही हो सकती है, दोनों मत अपने-अपने सन्दर्भ में सत्य हैं।
श्लोक 4.67
तन्वभावे सन्ध्यवद् उपपत्तेः ॥ १३ ॥
tanvabhāve sandhyavad upapatteḥ || 13 ||
शरीर के अभाव की स्थिति में मुक्त जीव का इच्छानुसार अनुभव स्वप्न-सदृश मध्यवर्ती अवस्था (सन्ध्या) के समान होता है — बिना किसी भौतिक इन्द्रिय के, केवल अनुभूतिमात्र — क्योंकि यही युक्तिसंगत बैठता है।
श्लोक 4.68
भावे जाग्रद्वत् ॥ १४ ॥
bhāve jāgradvat || 14 ||
और शरीरसहित अवस्था में मुक्त जीव का अनुभव जाग्रत अवस्था के समान होता है, अर्थात् वास्तविक साधनों द्वारा प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट।
श्लोक 4.69
प्रदीपवदावेशस् तथा हि दर्शयति ॥ १५ ॥
pradīpavadāveśas tathā hi darśayati || 15 ||
मुक्त जीव का इच्छानुसार एक साथ अनेक शरीरों में प्रवेश (आवेश) दीपक के समान है — जैसे एक ही दीपक का प्रकाश अनेक पात्रों में बिना विभाजित हुए फैल जाता है — क्योंकि शास्त्र में ऐसा ही दिखाया गया है।
श्लोक 4.70
स्वाप्ययसंपत्योर् अन्यतरापेक्षम् आविष्कृतं हि ॥ १६ ॥
svāpyayasaṁpatyor anyatarāpekṣam āviṣkṛtaṁ hi || 16 ||
(इस शंका के उत्तर में कि अद्वैत में जानने योग्य 'दूसरा' कुछ शेष नहीं रहता, तो बहुरूपता का अनुभव कैसे हो:) यह अनुभव सुषुप्ति-सदृश (स्वाप्यय) अथवा जाग्रत-सदृश (सम्पत्ति) — इन दो अवस्थाओं में से किसी एक की अपेक्षा से ही कहा गया है, जैसा स्पष्ट रूप से दिखाया गया है।
श्लोक 4.71
जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणाद् असंनिहितत्वाच् च ॥ १७ ॥
jagadvyāpāravarjaṁ prakaraṇād asaṁnihitatvāc ca || 17 ||
किन्तु मुक्त जीव के ऐश्वर्य में सृष्टि, स्थिति व प्रलय जैसे जगत्-व्यापार (विश्व-संचालन) का दायित्व सम्मिलित नहीं है — क्योंकि प्रकरण से यह शक्ति केवल ईश्वर की ही है, और मुक्त जीवों के लिए इसका उल्लेख कहीं भी निकटवर्ती (सन्निहित) रूप में नहीं मिलता।
श्लोक 4.72
प्रत्यक्षोपदेशाद् इति चेन् नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॥ १८ ॥
pratyakṣopadeśād iti cen nādhikārikamaṇḍalasthokteḥ || 18 ||
यदि यह शंका हो कि शास्त्र मुक्त जीवों के लिए स्पष्ट रूप से असीमित ऐश्वर्य ('वह स्वराज्य प्राप्त करता है') सिखाता है — तो उत्तर है, नहीं; क्योंकि यह कथन सूर्यमण्डल आदि में स्थित अधिकारी देवता (हिरण्यगर्भ) के सन्दर्भ में है, जिसके अधीन ही यह स्वराज्य-प्राप्ति होती है।
श्लोक 4.73
विकारावर्ति च तथा हि स्थितिम् आह ॥ १९ ॥
vikārāvarti ca tathā hi sthitim āha || 19 ||
क्योंकि नित्यमुक्त परमेश्वर ही सभी विकारों (परिवर्तनों) से परे है, न कि परिवर्तनशील ब्रह्मलोक तक सीमित सत्ता; शास्त्र में उसकी यह द्विरूप स्थिति (निर्गुण भी, सगुण भी) स्पष्टतः वर्णित है।
श्लोक 4.74
दर्शयतश् चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ २० ॥
darśayataś caivaṁ pratyakṣānumāne || 20 ||
श्रुति और स्मृति (अनुमान द्वारा समर्थित परम्परा) — दोनों ही परम ज्योति की इस विकाररहित (अपरिवर्तनशील) स्थिति को प्रत्यक्षतः दर्शाते हैं।
श्लोक 4.75
भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच् च ॥ २१ ॥
bhogamātrasāmyaliṅgāc ca || 21 ||
और इसलिए भी कि शास्त्र के संकेत मुक्त जीवों को ईश्वर के समान केवल भोग (आनन्द के अनुभव) में ही दर्शाते हैं, जगत्-शासन की शक्ति में नहीं।
श्लोक 4.76
अनावृत्तिः शब्दाद् अनावृत्तिः शब्दात् ॥ २२ ॥
anāvṛttiḥ śabdād anāvṛttiḥ śabdāt || 22 ||
संसार में पुनः लौटना नहीं होता — ऐसा शास्त्र कहता है; पुनः लौटना नहीं होता — ऐसा शास्त्र कहता है। इस सूत्र की पुनरावृत्ति परम्परा से यह संकेत देती है कि यह न केवल इस प्रसंग का, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्र-ग्रन्थ का ही समापन-सूत्र है: ब्रह्म से एकत्व प्राप्त होने पर मुक्त आत्मा पुनः कभी संसार-बन्धन में नहीं लौटती।