न्यायसूत्राणि
Nyāyasūtra
इस अनुवाद के विषय में
Nyaya Sutras are the founding text of Indian formal logic and epistemology: terse, systematic aphorisms building a technical apparatus for valid reasoning and debate, not devotional or narrative verse. Translations aim to render the actual logical or epistemological claim being made -- including, across adhyayas 2-4, an extended sequence of purva-paksha (opponent's objection) and siddhanta (settled reply) exchanges that many individual sutras are terse fragments of -- using standard Nyaya technical vocabulary (pramana, pratyaksha, anumana, upamana, shabda, prameya, hetu, drishtanta, siddhanta, avayava, tarka, nirnaya, vada, jalpa, vitanda, hetvabhasa, chala, jati, nigrahasthana, atman, manas, etc.), glossed briefly in English at first occurrence within each section. Adhyayas 5.1 and 5.2 are formal enumerative-definitional catalogues (the 24 jatis and the 22 nigrahasthanas respectively); these are translated as precise taxonomic definitions rather than loosened into paraphrase. Editorial structural labels appearing in the Wikisource source in braces (e.g. {पदार्थोद्देशसूत्रम्}, 'sutra enumerating the categories') are Wikisource's own annotations, not part of the sutra text; they were used only as orientation for translation and kept out of the sanskrit field.
60 श्लोकों पर टिप्पणी दी गई है, जहाँ पाठ विवादित है।
श्लोक 1.1
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम् तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥
pramāṇaprameyasaṁśayaprayojanadṛṣṭāntasiddhāntāvayavatarkanirṇayavādajalpavitaṇḍāhetvābhāsacchalajātinigrahasthānānām tattvajñānāt niḥśreyasādhigamaḥ || 1 ||
प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान — इन सोलह पदार्थों (तत्त्वों) के यथार्थ ज्ञान से निःश्रेयस (परम कल्याण, अर्थात् मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
श्लोक 1.2
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ॥ २ ॥
duḥkhajanmapravṛttidoṣamithyājñānānām uttarottarāpāye tadanantarāpāyādapavargaḥ || 2 ||
दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञान — ये परस्पर कार्य-कारण की शृंखला में बँधे हैं। इनमें से प्रत्येक की, ठीक पहले वाले की निवृत्ति होने पर, उत्तरोत्तर (क्रमशः) निवृत्ति होने से — अर्थात् प्रत्येक के तुरन्त बाद वाले की निवृत्ति से — अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
टिप्पणी: The compound orders the five as duḥkha-janma-pravṛtti-doṣa-mithyājñāna, but the forward causal sequence runs the other way (mithyājñāna → doṣa → pravṛtti → janma → duḥkha); 'uttarottarāpāye' is read, per the standard Vātsyāyana-based interpretation, as cessation proceeding in reverse of that causal order, starting from the removal of false knowledge. Rendered accordingly rather than literally in listed order.
श्लोक 1.3
प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥ ३ ॥
pratyakṣānumānopamānaśabdāḥ pramāṇāni || 3 ||
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — ये (चार) प्रमाण हैं।
श्लोक 1.4
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥ ४ ॥
indriyārthasannikarṣotpannaṁ jñānam avyapadeśyam avyabhicāri vyavasāyātmakaṁ pratyakṣam || 4 ||
इन्द्रिय और अर्थ (विषय) के सन्निकर्ष (संयोग) से उत्पन्न, अव्यपदेश्य (शब्द-सम्बन्ध से रहित), अव्यभिचारी (भ्रान्तिरहित) तथा व्यवसायात्मक (निश्चयात्मक) ज्ञान प्रत्यक्ष है।
टिप्पणी: 'avyapadeśya' is the most debated word in this sutra across the whole Nyaya-Vaiśeṣika tradition: Vātsyāyana glosses it as meaning perception is not constituted by a name/word (ruling out naming as its defining feature), while some later readers take it to restrict pratyakṣa proper to the nonverbal/indeterminate (nirvikalpaka) stage. The translation keeps the plain sense ('not dependent on verbal designation') without adopting either later school's gloss.
श्लोक 1.5
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधम् अनुमानं पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च ॥ ५ ॥
atha tatpūrvakaṁ trividham anumānaṁ pūrvavat śeṣavat sāmānyatodṛṣṭaṁ ca || 5 ||
अब, उस (प्रत्यक्ष)-पूर्वक होने वाला अनुमान तीन प्रकार का है — पूर्ववत् (कारण से कार्य का अनुमान), शेषवत् (कार्य से कारण का अनुमान) और सामान्यतोदृष्ट (सामान्य साहचर्य के आधार पर होने वाला अनुमान)।
श्लोक 1.6
प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनम् उपमानम् ॥ ६ ॥
prasiddhasādharmyātsādhyasādhanam upamānam || 6 ||
प्रसिद्ध (सुविख्यात) वस्तु के साधर्म्य (समानता) से साध्य (नाम और उसके अर्थ के सम्बन्ध) की सिद्धि करना उपमान है।
श्लोक 1.7
आप्तोपदेशः शब्दः ॥ ७ ॥
āptopadeśaḥ śabdaḥ || 7 ||
आप्त (विश्वसनीय, यथार्थवक्ता) पुरुष का उपदेश (कथन) शब्द (प्रमाण) है।
श्लोक 1.8
स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥ ८ ॥
sa dvividho dṛṣṭādṛṣṭārthatvāt || 8 ||
वह (शब्द) दो प्रकार का है — दृष्टार्थ (लौकिक, इस लोक से सम्बद्ध) और अदृष्टार्थ (वैदिक, अतीन्द्रिय विषयक), क्योंकि इसका विषय इन दो प्रकार का होता है।
श्लोक 1.9
आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ॥ ९ ॥
ātmaśarīrendriyārthabuddhimanaḥpravṛttidoṣapretyabhāvaphaladuḥkhāpavargāḥ tu prameyam || 9 ||
आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ (विषय), बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव (पुनर्जन्म), फल, दुःख और अपवर्ग (मोक्ष) — ये (बारह) ही प्रमेय हैं।
श्लोक 1.10
इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गम् इति ॥ १० ॥
icchādveṣaprayatnasukhaduḥkhajñānāni ātmanaḥ liṅgam iti || 10 ||
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान — ये आत्मा के लिङ्ग (अनुमान कराने वाले चिह्न) हैं।
श्लोक 1.11
चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ॥ ११ ॥
ceṣṭendriyārthāśrayaḥ śarīram || 11 ||
चेष्टा (क्रिया), इन्द्रिय और अर्थ (विषय) का आश्रय (आधार) शरीर है।
श्लोक 1.12
घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ॥ १२ ॥
ghrāṇarasanacakṣustvakśrotrāṇi indriyāṇi bhūtebhyaḥ || 12 ||
घ्राण (नाक), रसना (जिह्वा), चक्षु (आँख), त्वचा और श्रोत्र (कान) — ये इन्द्रियाँ भूतों (पंचमहाभूतों) से उत्पन्न होती हैं।
श्लोक 1.13
पृथिवी आपः तेजः वायुः आकाशं इति भूतानि ॥ १३ ॥
pṛthivī āpaḥ tejaḥ vāyuḥ ākāśaṁ iti bhūtāni || 13 ||
पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि), वायु और आकाश — ये भूत (पंचमहाभूत) हैं।
श्लोक 1.14
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणाः तदर्थाः ॥ १४ ॥
gandharasarūpasparśaśabdāḥ pṛthivyādiguṇāḥ tadarthāḥ || 14 ||
गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द — ये क्रमशः पृथ्वी आदि (पंचमहाभूतों) के गुण हैं, और ये ही (इन्द्रियों के) अर्थ (विषय) भी हैं।
श्लोक 1.15
बुद्धिः उपलब्धिः ज्ञानं इति अनर्थान्तरम् ॥ १५ ॥
buddhiḥ upalabdhiḥ jñānaṁ iti anarthāntaram || 15 ||
बुद्धि, उपलब्धि और ज्ञान — इनमें कोई अर्थभेद नहीं है, अर्थात् ये पर्यायवाची हैं।
श्लोक 1.16
युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ॥ १६ ॥
yugapajjñānānutpattiḥ manasaḥ liṅgam || 16 ||
एक साथ (युगपत्) अनेक ज्ञानों की अनुत्पत्ति (न होना) मन का लिङ्ग (अनुमापक चिह्न) है।
श्लोक 1.17
प्रवृत्तिः वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ॥ १७ ॥
pravṛttiḥ vāgbuddhiśarīrārambhaḥ || 17 ||
वाणी, बुद्धि (मन) और शरीर का आरम्भ (व्यापार) प्रवृत्ति है।
श्लोक 1.18
प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ॥ १८ ॥
pravarttanālakṣaṇāḥ doṣāḥ || 18 ||
प्रवर्तना (प्रवृत्ति को उत्पन्न करना) जिनका लक्षण है, वे दोष (राग, द्वेष, मोह आदि) हैं।
श्लोक 1.19
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ॥ १९ ॥
punarutpattiḥ pretyabhāvaḥ || 19 ||
पुनः उत्पत्ति (फिर से जन्म लेना) प्रेत्यभाव है।
श्लोक 1.20
प्रवृत्तिदोषजनितः अर्थः फलम् ॥ २० ॥
pravṛttidoṣajanitaḥ arthaḥ phalam || 20 ||
प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न पदार्थ (परिणाम) फल है।
श्लोक 1.21
बाधनालक्षणं दुःखम् ॥ २१ ॥
bādhanālakṣaṇaṁ duḥkham || 21 ||
बाधना (पीड़ा, सन्ताप) जिसका लक्षण है, वह दुःख है।
श्लोक 1.22
तदत्यन्तविमोक्षः अपवर्गः ॥ २२ ॥
tadatyantavimokṣaḥ apavargaḥ || 22 ||
उस (दुःख) से अत्यन्त (सम्पूर्ण) विमोक्ष (मुक्ति) अपवर्ग है।
श्लोक 1.23
समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातः च विशेषापेक्षः विमर्शः संशयः ॥ २३ ॥
samānānekadharmopapatteḥ vipratipatteḥ upalabdhyanupalabdhyavyavasthātaḥ ca viśeṣāpekṣaḥ vimarśaḥ saṁśayaḥ || 23 ||
समान अनेक धर्मों की उपलब्धि से, विप्रतिपत्ति (परस्पर विरोधी मत) से, तथा उपलब्धि और अनुपलब्धि की अव्यवस्था (अनियमितता) से उत्पन्न, विशेष की अपेक्षा रखने वाला डाँवाडोल ज्ञान (विमर्श) संशय है।
श्लोक 1.24
यं अर्थं अधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ॥ २४ ॥
yaṁ arthaṁ adhikṛtya pravartate tatprayojanam || 24 ||
जिस अर्थ (प्रयोजन) को लक्ष्य करके मनुष्य प्रवृत्त होता है, वह प्रयोजन है।
श्लोक 1.25
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ॥ २५ ॥
laukikaparīkṣakāṇāṁ yasminarthe buddhisāmyaṁ saḥ dṛṣṭāntaḥ || 25 ||
जिस विषय में लौकिक (सामान्य) जन और परीक्षक (विद्वान), दोनों की बुद्धि (समझ) समान होती है, वह दृष्टान्त है।
श्लोक 1.26
तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः ॥ २६ ॥
tantrādhikaraṇābhyupagamasaṁsthitiḥ siddhāntaḥ || 26 ||
तन्त्र (शास्त्र-सिद्धान्त), अधिकरण (प्रकरण-विशेष) और अभ्युपगम (मान्यता) की अपेक्षा से स्थिर हुई संस्थिति (निश्चित स्थिति) सिद्धान्त है।
टिप्पणी: This opening definition compresses the four types elaborated in sutras 27-31 (tantra later splits into sarvatantra and pratitantra) into three heads. Rendered as the standard reading — a settled position with respect to a system, a topic, or an assumption — rather than expanding it here.
श्लोक 1.27
सः चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात् ॥ २७ ॥
saḥ caturvidhaḥ sarvatantrapratitantrādhikaraṇābhyupagamasaṁsthityarthāntarabhāvāt || 27 ||
सर्वतन्त्र, प्रतितन्त्र, अधिकरण और अभ्युपगम — इन संस्थितियों (स्थितियों) के परस्पर भिन्न (अर्थान्तरभूत) होने के कारण वह (सिद्धान्त) चार प्रकार का है।
श्लोक 1.28
सर्वतन्त्राविरुद्धः तन्त्रे अधिकृतः अर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः ॥ २८ ॥
sarvatantrāviruddhaḥ tantre adhikṛtaḥ arthaḥ sarvatantrasiddhāntaḥ || 28 ||
जो अर्थ (तत्त्व) किसी तन्त्र (शास्त्र) में प्रतिपादित हो और समस्त तन्त्रों से अविरुद्ध (सबको मान्य) हो, वह सर्वतन्त्रसिद्धान्त है।
श्लोक 1.29
समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः ॥ २९ ॥
samānatantrasiddhaḥ paratantrāsiddhaḥ pratitantrasiddhāntaḥ || 29 ||
जो अपने (समान) तन्त्र में सिद्ध हो, किन्तु दूसरे (पर) तन्त्र में असिद्ध हो, वह प्रतितन्त्रसिद्धान्त है।
श्लोक 1.30
यत्सिद्धौ अन्यप्रकरणसिद्धिः सः अधिकरणसिद्धान्तः ॥ ३० ॥
yatsiddhau anyaprakaraṇasiddhiḥ saḥ adhikaraṇasiddhāntaḥ || 30 ||
जिसकी सिद्धि होने पर अन्य प्रकरण (विषय) की भी सिद्धि हो जाती है, वह अधिकरणसिद्धान्त है।
श्लोक 1.31
अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेषपरीक्षणं अभ्युपगमसिद्धान्तः ॥ ३१ ॥
aparīkṣitābhyupagamāttadviśeṣaparīkṣaṇaṁ abhyupagamasiddhāntaḥ || 31 ||
जिस विषय को बिना परीक्षा किये ही (अपरीक्षित) स्वीकार कर लिया जाता है, फिर उसके विशेष (विवरण) की परीक्षा की जाती है, वह अभ्युपगमसिद्धान्त है।
श्लोक 1.32
प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि अवयवाः ॥ ३२ ॥
pratijñāhetūdāharaṇopanayanigamanāni avayavāḥ || 32 ||
प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन — ये (पाँच) अवयव हैं।
श्लोक 1.33
साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ॥ ३३ ॥
sādhyanirdeśaḥ pratijñā || 33 ||
साध्य का निर्देश (कथन) प्रतिज्ञा है।
श्लोक 1.34
उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः ॥ ३४ ॥
udāharaṇasādharmyātsādhyasādhanaṁ hetuḥ || 34 ||
उदाहरण के साधर्म्य (समानता) से साध्य की सिद्धि करने वाला हेतु है।
श्लोक 1.35
तथा वैधर्म्यात् ॥ ३५ ॥
tathā vaidharmyāt || 35 ||
उसी प्रकार वैधर्म्य (असमानता) से भी साध्य की सिद्धि होती है।
श्लोक 1.36
साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्तः उदाहरणम् ॥ ३६ ॥
sādhyasādharmyāttaddharmabhāvī dṛṣṭāntaḥ udāharaṇam || 36 ||
साध्य के साधर्म्य से उसके धर्म (गुण) से युक्त दृष्टान्त उदाहरण कहलाता है।
श्लोक 1.37
तद्विपर्ययात्वा विपरीतम् ॥ ३७ ॥
tadviparyayātvā viparītam || 37 ||
अथवा उसके विपर्यय (उलटे क्रम) से विपरीत (नकारात्मक) उदाहरण भी होता है।
श्लोक 1.38
उदाहरणापेक्षः तथा इति उपसंहारः न तथा इति वा साध्यस्य उपनयः ॥ ३८ ॥
udāharaṇāpekṣaḥ tathā iti upasaṁhāraḥ na tathā iti vā sādhyasya upanayaḥ || 38 ||
उदाहरण की अपेक्षा रखते हुए 'ऐसा ही है' अथवा 'ऐसा नहीं है' — इस रूप में साध्य का उपसंहार (समीपन) उपनय है।
श्लोक 1.39
हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् ॥ ३९ ॥
hetvapadeśātpratijñāyāḥ punarvacanaṁ nigamanam || 39 ||
हेतु का उल्लेख करते हुए प्रतिज्ञा का पुनः कथन निगमन है।
श्लोक 1.40
अविज्ञाततत्वे अर्थे कारणोपपत्तितः तत्त्वज्ञानार्थं उहः तर्कः ॥ ४० ॥
avijñātatatve arthe kāraṇopapattitaḥ tattvajñānārthaṁ uhaḥ tarkaḥ || 40 ||
जिस विषय (अर्थ) का तत्त्व (यथार्थ स्वरूप) ज्ञात नहीं है, उसके सम्बन्ध में सम्भावित कारण की उपपत्ति के आधार पर, तत्त्वज्ञान के लिए किया जाने वाला ऊह (विचार) तर्क है।
श्लोक 1.41
विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यां अर्थावधारणं निर्णयः ॥ ४१ ॥
vimṛśya pakṣapratipakṣābhyāṁ arthāvadhāraṇaṁ nirṇayaḥ || 41 ||
पक्ष और प्रतिपक्ष के द्वारा विचार करके अर्थ का निश्चय (अवधारण) करना निर्णय है।
श्लोक 1.42
प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः वादः ॥ १ ॥
pramāṇatarkasādhanopālambhaḥ siddhāntāviruddhaḥ pañcāvayavopapannaḥ pakṣapratipakṣaparigrahaḥ vādaḥ || 1 ||
प्रमाण और तर्क को साधन बनाकर स्थापन और खण्डन करना, जो सिद्धान्त (स्वीकृत मत) के विरुद्ध न हो, पाँच अवयवों (पंचावयव न्याय-वाक्य) से युक्त हो, तथा पक्ष और प्रतिपक्ष का ग्रहण करना — यह वाद (सम्यक् शास्त्रार्थ) है।
श्लोक 1.43
यथोक्तोपपन्नः छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भः जल्पः ॥ २ ॥
yathoktopapannaḥ chalajātinigrahasthānasādhanopālambhaḥ jalpaḥ || 2 ||
जो पूर्वोक्त (वाद में कहे गये) साधनों से युक्त होते हुए भी छल, जाति और निग्रहस्थान के द्वारा भी स्थापन और खण्डन करता हो — वह जल्प (विजय-प्रधान वाद) है।
श्लोक 1.44
सः प्रतिपक्षस्थापनाहीनः वितण्डा ॥ ३ ॥
saḥ pratipakṣasthāpanāhīnaḥ vitaṇḍā || 3 ||
वही (जल्प) जब प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित हो, तब वह वितण्डा (केवल खण्डनमूलक वाद) कहलाती है।
श्लोक 1.45
सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीताः हेत्वाभासाः ॥ ४ ॥
savyabhicāraviruddhaprakaraṇasamasādhyasamakālātītāḥ hetvābhāsāḥ || 4 ||
सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम और कालातीत — ये पाँच हेत्वाभास (हेतु के आभासमात्र, अर्थात् दोषयुक्त हेतु) हैं।
श्लोक 1.46
अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ॥ ५ ॥
anaikāntikaḥ savyabhicāraḥ || 5 ||
जो हेतु अनैकान्तिक हो, अर्थात् जिससे एक ही निश्चित सिद्धि न होकर व्यभिचार (विपरीत सिद्धि की भी सम्भावना) बना रहे, वह सव्यभिचार (हेत्वाभास) है।
श्लोक 1.47
सिद्धान्तं अभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः ॥ ६ ॥
siddhāntaṁ abhyupetya tadvirodhī viruddhaḥ || 6 ||
सिद्धान्त को स्वीकार करके भी जो हेतु उसी सिद्धान्त का विरोधी हो, वह विरुद्ध (हेत्वाभास) है।
श्लोक 1.48
यस्मात्प्रकरणचिन्ता सः निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः ॥ ७ ॥
yasmātprakaraṇacintā saḥ nirṇayārthamapadiṣṭaḥ prakaraṇasamaḥ || 7 ||
जिस हेतु से प्रकरण (विचाराधीन विषय) की चिन्ता (संशय) बनी ही रहे, तथापि जिसे निर्णय के लिए प्रस्तुत किया जाए — अर्थात् जो हेतु स्वयं भी उतना ही विवादास्पद हो जितना साध्य — वह प्रकरणसम (हेत्वाभास) है।
श्लोक 1.49
साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः ॥ ८ ॥
sādhyāviśiṣṭaḥ sādhyatvātsādhyasamaḥ || 8 ||
जो हेतु साध्य से अविशिष्ट (भिन्न नहीं) हो, क्योंकि वह स्वयं भी साध्य के समान असिद्ध/अप्रसिद्ध हो — अर्थात् जिसे स्वयं भी सिद्ध करना शेष हो — वह साध्यसम (हेत्वाभास) है।
श्लोक 1.50
कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ॥ ९ ॥
kālātyayāpadiṣṭaḥ kālātītaḥ || 9 ||
जो हेतु काल के अतिक्रमण (उचित समय बीत जाने) के पश्चात् प्रस्तुत किया जाए — अर्थात् जिसका प्रयोग-अवसर ही व्यतीत हो चुका हो — वह कालातीत (हेत्वाभास) है।
श्लोक 1.51
वचनविघातः अर्थविकल्पोपपत्त्या छलम् ॥ १० ॥
vacanavighātaḥ arthavikalpopapattyā chalam || 10 ||
वक्ता के अभिप्रेत अर्थ से भिन्न किसी अन्य अर्थ की कल्पना करके उसके वचन का खण्डन करना — यह छल है।
श्लोक 1.52
तत्त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलं उपचारच्छलं च इति ॥ ११ ॥
tattrividhaṁ vākchalaṁ sāmānyacchalaṁ upacāracchalaṁ ca iti || 11 ||
वह छल तीन प्रकार का है — वाक्छल, सामान्यच्छल और उपचारच्छल।
श्लोक 1.53
अविशेषाभिहिते अर्थे वक्तुः अभिप्रायातर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ॥ १२ ॥
aviśeṣābhihite arthe vaktuḥ abhiprāyātarthāntarakalpanā vākchalam || 12 ||
जब कोई अर्थ बिना विशेष निर्देश (स्पष्टीकरण) के कहा गया हो, तब वक्ता के अभिप्राय से भिन्न किसी दूसरे अर्थ की कल्पना करना — वह वाक्छल है।
श्लोक 1.54
सम्भवतः अर्थस्य अतिसामान्ययोगातसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम् ॥ १३ ॥
sambhavataḥ arthasya atisāmānyayogātasambhūtārthakalpanā sāmānyacchalam || 13 ||
जो शब्द वस्तुतः किसी विशेष सम्भावित वस्तु का वाचक हो, उसमें अत्यधिक सामान्यता (व्यापकता) जोड़कर किसी असम्भव/अनभिप्रेत अर्थ की कल्पना करना — वह सामान्यच्छल है।
श्लोक 1.55
धर्मविकल्पनिर्देशे अर्थसद्भावप्रतिषेधः उपचारच्छलम् ॥ १४ ॥
dharmavikalpanirdeśe arthasadbhāvapratiṣedhaḥ upacāracchalam || 14 ||
जब किसी धर्म (गुण) का कथन उपचार (लाक्षणिक/गौण प्रयोग) से किया गया हो, तब उसके वाच्यार्थ (शब्दार्थ) के अस्तित्व का निषेध करना — वह उपचारच्छल है।
श्लोक 1.56
वाक्छलं एव उपचारच्छलं ततविशेषात् ॥ १५ ॥
vākchalaṁ eva upacāracchalaṁ tataviśeṣāt || 15 ||
[पूर्वपक्ष:] उपचारच्छल वाक्छल ही है, क्योंकि वह उसी का कोई विशेष भेद मात्र है, पृथक् प्रकार नहीं।
टिप्पणी: Sutra 15 states a prima facie objection (pūrvapakṣa): that upacāracchala is not a genuinely distinct category of chala but merely a sub-case of vākchala differing only in some minor particular (tad-viśeṣāt). This view is rejected in sutra 16.
श्लोक 1.57
न ततर्थान्तरभावात् ॥ १६ ॥
na tatarthāntarabhāvāt || 16 ||
[सिद्धान्त/उत्तर:] नहीं, क्योंकि उन दोनों में अर्थ-भेद (विषय की भिन्नता) है, अतः उपचारच्छल वाक्छल से पृथक् ही है।
टिप्पणी: Sutra 16 is the author's reply to the pūrvapakṣa of sutra 15: upacāracchala and vākchala are held to differ in kind because they turn on different sorts of semantic shift — vākchala exploits a word's plain lexical ambiguity, while upacāracchala denies the literal referent of a figurative/secondary (upacāra) usage — so the two remain distinct sub-types of chala despite the objector's claim.
श्लोक 1.58
अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यातेकच्छलप्रसङ्गः ॥ १७ ॥
aviśeṣe vā kiñcitsādharmyātekacchalaprasaṅgaḥ || 17 ||
अथवा यदि (दोनों में) कोई भेद न भी माना जाए, तो केवल कुछ साधर्म्य (आंशिक समानता) के आधार पर तो समस्त छल के एक ही छल में समा जाने का अनिष्ट प्रसंग (अवांछित परिणाम) उपस्थित होगा।
टिप्पणी: Sutra 17 adds a further dialectical safeguard: even setting aside the reply in sutra 16, using mere partial similarity (kiñcit sādharmya) as grounds for collapsing categories is untenable, since by the same logic all types of chala would reduce to one (an unwanted over-generalization, prasaṅga). This reinforces that real difference of content, not surface similarity, is the correct criterion for distinguishing upacāracchala from vākchala.
श्लोक 1.59
साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः ॥ १८ ॥
sādharmyavaidharmyābhyāṁ pratyavasthānaṁ jātiḥ || 18 ||
साधर्म्य (समानता) या वैधर्म्य (असमानता) के आधार पर [तर्कसंगत सम्बन्ध के बिना] की गई प्रत्यवस्थान (आपत्ति) — वह जाति (असत् उत्तर) है।
श्लोक 1.60
विप्रतिपत्तिः अप्रतिपत्तिः च निग्रहस्थानम् ॥ १९ ॥
vipratipattiḥ apratipattiḥ ca nigrahasthānam || 19 ||
विप्रतिपत्ति (विपरीत/भ्रान्त प्रतिपत्ति, अर्थात् आत्म-विरोध या गलत समझ) और अप्रतिपत्ति (विषय को बिल्कुल न समझ पाना) — ये निग्रहस्थान (वाद में पराजय के स्थान) हैं।
श्लोक 1.61
तद्विकल्पात्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम् ॥ २० ॥
tadvikalpātjātinigrahasthānabahutvam || 20 ||
उन्हीं (विप्रतिपत्ति और अप्रतिपत्ति) के भेदों से जाति और निग्रहस्थान की बहुलता (अनेक प्रकार) सिद्ध होती है।
टिप्पणी: Sutra 20 is a brief transitional/summary remark: it notes only that jāti and nigrahasthāna admit of many further subdivisions. The full catalogue of those subtypes belongs to adhyāyas 5.1–5.2 of the text and has deliberately not been invented or anticipated here.
श्लोक 2.1
समानानेकधर्माध्यवसायातन्यतरधर्माध्यवसायात्वा न संशयः ॥ १ ॥
samānānekadharmādhyavasāyātanyataradharmādhyavasāyātvā na saṁśayaḥ || 1 ||
अनेक वस्तुओं में समानरूप से पाए जाने वाले धर्म के निश्चित अध्यवसाय से, अथवा दोनों विकल्पों में से किसी एक के विशिष्ट धर्म के निश्चित अध्यवसाय से, संशय उत्पन्न नहीं होता।
टिप्पणी: Opens a fine-grained continuation of the saṃśaya (doubt) analysis begun at 1.1.23; adhyavasāya ('definite ascertainment') is here distinguished from mere upalabdhi ('awareness') — doubt requires the latter, not the former.
श्लोक 2.2
विप्रत्तिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायात्च ॥ २ ॥
viprattipattyavyavasthādhyavasāyātca || 2 ||
तथा परस्पर विरोधी मतों (विप्रतिपत्ति) से उत्पन्न अव्यवस्था के निश्चित ज्ञान से भी संशय नहीं होता।
श्लोक 2.3
विप्रत्तिपत्तौ च संप्रत्तिपत्तेः ॥ ३ ॥
viprattipattau ca saṁprattipatteḥ || 3 ||
और विप्रतिपत्ति (परस्पर-विरोधी मत) की स्थिति में भी वस्तुतः संशय नहीं है, क्योंकि प्रत्येक पक्ष को अपने-अपने मत के विषय में सम्यक् प्रतिपत्ति (दृढ़ निश्चय) होती है।
टिप्पणी: Reading saṃprattipatti as each disputant's own firm conviction, continuing 2's point that mere external disagreement does not by itself constitute doubt in the cognizer; the compound admits other readings.
श्लोक 2.4
अव्यवस्था आत्मनि व्यवस्थितत्वात्च अव्यवस्थायाः ॥ ४ ॥
avyavasthā ātmani vyavasthitatvātca avyavasthāyāḥ || 4 ||
[तथापि वास्तविक संशय बना रहता है,] क्योंकि यह अव्यवस्था स्वयं आत्मा में सुनिश्चित रूप से विद्यमान रहती है, और उस प्रतीत व्यवस्था में भी अव्यवस्था विद्यमान है।
टिप्पणी: This line is textually dense; its function here (guarding sutras 1-3 against being read as denying doubt altogether) is an interpretive reconstruction, since the compound avyavasthāyāḥ avyavasthā admits alternative parsings.
श्लोक 2.5
तथा अत्यन्तसंशयः तद्धर्मसातत्योपपत्तेः ॥ ५ ॥
tathā atyantasaṁśayaḥ taddharmasātatyopapatteḥ || 5 ||
इसी प्रकार, संशयजनक धर्म की निरन्तरता (सातत्य) के कारण अनन्त संशय (अत्यन्त संशय) भी सम्भव है।
श्लोक 2.6
यथोक्ताध्यवसायातेव तद्विशेषापेक्षात्संशये न असंशयः न अत्यन्तसंशयः वा ॥ ६ ॥
yathoktādhyavasāyāteva tadviśeṣāpekṣātsaṁśaye na asaṁśayaḥ na atyantasaṁśayaḥ vā || 6 ||
पूर्वोक्त रूप में निर्दिष्ट अध्यवसाय से उत्पन्न संशय उसी विशेष (अभीष्ट विशिष्ट धर्म) की अपेक्षा से होता है, अतः वह न तो असंशय है और न ही अत्यन्त (अनन्त) संशय।
टिप्पणी: Resolves the tension raised in 2-5 by tying doubt strictly to the outstanding need for a distinguishing feature; read here as the siddhānta closing the sub-argument.
श्लोक 2.7
यत्र संशयः तत्र एवं उत्तरोत्तरप्रसङ्गः ॥ ७ ॥
yatra saṁśayaḥ tatra evaṁ uttarottaraprasaṅgaḥ || 7 ||
जहाँ-जहाँ यह संशय-विश्लेषण लागू होता है, वहाँ अन्यथा उत्तरोत्तर (क्रमशः आगे बढ़ने वाले) प्रसंगों की अनवरत शृंखला चल पड़ती — जिसे सूत्र ६ रोक देता है।
श्लोक 2.8
प्रत्यक्षादीनां अप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः ॥ ८ ॥
pratyakṣādīnāṁ aprāmāṇyaṁ traikālyāsiddheḥ || 8 ||
[पूर्वपक्ष —] प्रत्यक्ष (इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष ज्ञान) आदि प्रमाणों (प्रमाण अर्थात् यथार्थ ज्ञान का साधन) में अप्रामाण्य है, क्योंकि त्रैकाल्य (पूर्व, पश्चात् अथवा युगपत् — तीनों कालों में से किसी में भी) उनकी सिद्धि सम्भव नहीं है।
टिप्पणी: Opens the pūrvapakṣa (opponent's prima facie objection) — a global skeptic's 'three-time' regress argument against the validity of any pramāṇa — which is answered only from sutra 19 onward.
श्लोक 2.9
पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ न इन्द्रियार्थसन्निकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः ॥ ९ ॥
pūrvaṁ hi pramāṇasiddhau na indriyārthasannikarṣātpratyakṣotpattiḥ || 9 ||
क्योंकि यदि प्रमाण की सिद्धि वस्तु से पूर्व मानी जाए, तो इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष (संयोग) से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति ही सम्भव नहीं होगी।
श्लोक 2.10
पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः ॥ १० ॥
paścātsiddhau na pramāṇebhyaḥ prameyasiddhiḥ || 10 ||
यदि प्रमाण की सिद्धि पश्चात् (वस्तु-ज्ञान के बाद) मानी जाए, तो प्रमेय की सिद्धि प्रमाणों से नहीं हो सकेगी।
श्लोक 2.11
युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात्क्रमवृत्तित्वाभावः बुद्धीनाम् ॥ ११ ॥
yugapatsiddhau pratyarthaniyatatvātkramavṛttitvābhāvaḥ buddhīnām || 11 ||
यदि युगपत् (एक साथ) सिद्धि मानी जाए, तो प्रत्येक ज्ञान (बुद्धि) का किसी एक ही अर्थ में नियत होना अनिवार्य होने से, ज्ञानों की क्रमिक उत्पत्ति ही असम्भव हो जाएगी।
श्लोक 2.12
त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १२ ॥
traikālyāsiddheḥ pratiṣedhānupapattiḥ || 12 ||
[संशयवादी आगे कहता है —] त्रैकाल्य में सिद्धि असम्भव होने से, प्रतिषेध (खण्डन) भी सम्भव नहीं है, स्वयं यह तर्क भी।
टिप्पणी: The skeptic here turns the trikālya-regress on his own refutation, anticipating the self-referential charge pressed further in 13-14, before Nyāya's reply begins at 19.
श्लोक 2.13
सर्वप्रमाणप्रतिषेधात्च प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १३ ॥
sarvapramāṇapratiṣedhātca pratiṣedhānupapattiḥ || 13 ||
और सभी प्रमाणों का प्रतिषेध हो जाने से, यह प्रतिषेध भी स्वयं असिद्ध (अनुपपन्न) हो जाता है।
श्लोक 2.14
तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः ॥ १४ ॥
tatprāmāṇye vā na sarvapramāṇavipratiṣedhaḥ || 14 ||
अथवा यदि वह प्रतिषेध स्वयं प्रमाण-रूप माना जाए, तो सभी प्रमाणों का सर्वथा प्रतिषेध सिद्ध नहीं होता — इस प्रकार उभयथा संशयवादी का पक्ष स्वयं खण्डित हो जाता है।
टिप्पणी: States the self-refutation dilemma facing the global skeptic: either the denial of all pramāṇas is itself unestablished, or, if valid, it disproves its own universal claim. Whether Gautama voices this as the skeptic's own anticipated escape or as an early Naiyāyika interjection is not fully settled by the terse wording and the TAG placement.
श्लोक 2.15
त्रैकाल्याप्रतिषेधः च शब्दातातोद्यसिद्धिवत्तत्सिद्धेः ॥ १५ ॥
traikālyāpratiṣedhaḥ ca śabdātātodyasiddhivattatsiddheḥ || 15 ||
और त्रैकाल्य-सम्बन्धी यह प्रतिषेध वास्तव में सिद्ध नहीं होता, क्योंकि प्रमाण की सिद्धि उसी प्रकार तत्क्षण, स्वतःसिद्ध होती है जैसे किसी वाद्य-यन्त्र (आतोद्य) की सिद्धि उसकी ध्वनि (शब्द) मात्र से हो जाती है, उसका पूर्वकालिक अस्तित्व अलग से सिद्ध किए बिना।
टिप्पणी: The drum-from-its-sound analogy anticipates the lamp analogy given as Nyāya's formal reply in sutra 19; it is unclear whether this line belongs to the pūrvapakṣa's self-anticipated rejoinder (per its transmitted TAG) or is an early statement of the Naiyāyika's own position.
श्लोक 2.16
प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवत् ॥ १६ ॥
prameyā ca tulāprāmāṇyavat || 16 ||
और प्रमेय की सिद्धि भी उसी प्रकार अपेक्षित है जैसे तराजू (तुला) की प्रामाणिकता किसी अन्य मानदण्ड की अपेक्षा रखती है।
श्लोक 2.17
प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः ॥ १७ ॥
pramāṇataḥ siddheḥ pramāṇānāṁ pramāṇāntarasiddhiprasaṅgaḥ || 17 ||
यदि प्रमाणों की सिद्धि किसी अन्य प्रमाण से मानी जाए, तो प्रमाणों की सिद्धि के लिए पुनः अन्य प्रमाण की अपेक्षा का अनवस्था-प्रसंग खड़ा हो जाता है।
श्लोक 2.18
तद्विनिवृत्तेः वा प्रमाणसिद्धिवत्प्रमेयसिद्धिः ॥ १८ ॥
tadvinivṛtteḥ vā pramāṇasiddhivatprameyasiddhiḥ || 18 ||
अथवा यदि उस अनवस्था की निवृत्ति मान ली जाए, तो प्रमेय की सिद्धि भी उसी प्रकार स्वतः, बिना प्रमाण की सिद्धि के, सम्भव माननी होगी, जिससे प्रमाण की अवधारणा ही निरर्थक हो जाती है।
श्लोक 2.19
न प्रदीपप्रकाशसिद्धिवत्तत्सिद्धेः ॥ १९ ॥
na pradīpaprakāśasiddhivattatsiddheḥ || 19 ||
[सिद्धान्त — न्याय का उत्तर —] नहीं, क्योंकि प्रमाण की स्वतःसिद्धि दीपक के प्रकाश की सिद्धि के समान है, जो स्वयं को और अन्य वस्तुओं को, बिना किसी और प्रकाश की अपेक्षा किए, प्रकाशित करता है, अतः अनवस्था-दोष नहीं होता।
श्लोक 2.20
क्वचित्निवृत्तिदर्शनातनिवृत्तिदर्शनात्च क्वचितनेकान्तः ॥ २० ॥
kvacitnivṛttidarśanātanivṛttidarśanātca kvacitanekāntaḥ || 20 ||
क्योंकि कहीं तो (दर्शन होते ही सन्देह अथवा प्रवृत्ति की) निवृत्ति देखी जाती है, और कहीं अनिवृत्ति — अतः इस विषय में सर्वत्र लागू होने वाला कोई एक ही (एकान्तिक) नियम नहीं है, अपितु अनेकान्त (बहुविधता) है।
श्लोक 2.21
प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिः असमग्रवचनात् ॥ २१ ॥
pratyakṣalakṣaṇānupapattiḥ asamagravacanāt || 21 ||
[पूर्वपक्ष —] प्रत्यक्ष का लक्षण (१.१.४ में दिया गया) असंगत है, क्योंकि उसका कथन अपूर्ण (असमग्र) है, प्रत्यक्ष-उत्पत्ति की सभी आवश्यक शर्तें उसमें नहीं गिनाई गई हैं।
श्लोक 2.22
न आत्ममनसोः सन्निकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः ॥ २२ ॥
na ātmamanasoḥ sannikarṣābhāve pratyakṣotpattiḥ || 22 ||
उदाहरणार्थ, आत्मा और मन के सन्निकर्ष (संयोग) के अभाव में प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती, और लक्षण में इस आवश्यक सन्निकर्ष का उल्लेख नहीं है।
श्लोक 2.23
दिग्देशकालाकाशेषु अपि एवं प्रसङ्गः ॥ २३ ॥
digdeśakālākāśeṣu api evaṁ prasaṅgaḥ || 23 ||
दिशा, देश, काल तथा आकाश के विषय में भी यही प्रसंग (दोष) उपस्थित होता है, जिनका उल्लेख भी लक्षण में नहीं है।
श्लोक 2.24
ज्ञानलिङ्गत्वातात्मनः न अनवरोधः ॥ २४ ॥
jñānaliṅgatvātātmanaḥ na anavarodhaḥ || 24 ||
[सिद्धान्त — उत्तर आरम्भ —] आत्मा ज्ञान के लिंग (चिह्न) से ही सिद्ध हो जाती है, अर्थात् उसका सम्बन्ध अनुमान से स्थापित होता है, अतः लक्षण में उसका पृथक् उल्लेख आवश्यक नहीं, और यह कोई दोष नहीं है।
श्लोक 2.25
तदयौगपद्यलिङ्गत्वात्च न मनसः ॥ २५ ॥
tadayaugapadyaliṅgatvātca na manasaḥ || 25 ||
और ज्ञानों की अयौगपद्यता (एक साथ न होना) ही मन की सिद्धि का लिंग है, अतः मन का भी पृथक् उल्लेख आवश्यक नहीं है।
श्लोक 2.26
प्रत्यक्षनिमित्तत्वात्च इन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य स्वशब्देन वचनम् ॥ २६ ॥
pratyakṣanimittatvātca indriyārthayoḥ sannikarṣasya svaśabdena vacanam || 26 ||
और चूँकि इन्द्रिय-अर्थ का सन्निकर्ष ही प्रत्यक्ष का साक्षात् निमित्त है, अतः लक्षण में उसी का अपने विशिष्ट शब्द द्वारा उल्लेख किया गया है, शेष अधिक दूरस्थ कारणों का नहीं।
श्लोक 2.27
सुप्तव्यासक्तमनसां च इन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षनिमित्तत्वात् ॥ २७ ॥
suptavyāsaktamanasāṁ ca indriyārthayoḥ sannikarṣanimittatvāt || 27 ||
और सोए हुए अथवा अन्यत्र व्यासक्त (व्यग्र) मनवाले व्यक्तियों में इन्द्रिय-अर्थ-सन्निकर्ष रहते हुए भी प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि मन का सन्निकर्ष भी इन्द्रिय-अर्थ-सन्निकर्ष के साथ प्रत्यक्ष का निमित्त है।
श्लोक 2.28
तैः च अपदेशः ज्ञानविशेषाणाम् ॥ २८ ॥
taiḥ ca apadeśaḥ jñānaviśeṣāṇām || 28 ||
और उन्हीं विभिन्न कारणों के आधार पर ज्ञान के विशेष भेदों का निर्देश (व्याख्या) किया जाता है।
श्लोक 2.29
व्याहतत्वातहेतुः ॥ २९ ॥
vyāhatatvātahetuḥ || 29 ||
यह आक्षेप व्याघात (स्ववैरोध्य) के कारण उचित हेतु नहीं है, क्योंकि इस तर्क से समस्त दूरस्थ कारणों की अनन्त सूची देनी होगी, जो स्वयं आक्षेपकर्ता के लिए भी असम्भव है।
श्लोक 2.30
न अर्थविशेषप्राबल्यात् ॥ ३० ॥
na arthaviśeṣaprābalyāt || 30 ||
नहीं, कोई भी अपवाद, जैसे व्यग्र मन में भी किसी वस्तु का बोध हो जाना, किसी विशिष्ट, अत्यन्त प्रबल वस्तु की प्रबलता (अर्थविशेष-प्राबल्य) के कारण होता है, न कि उपर्युक्त कारण-व्यवस्था में कोई त्रुटि है।
श्लोक 2.31
प्रत्यक्षं अनुमानं एकदेशग्रहणातुपलब्धेः ॥ ३१ ॥
pratyakṣaṁ anumānaṁ ekadeśagrahaṇātupalabdheḥ || 31 ||
[पूर्वपक्ष —] प्रत्यक्ष वस्तुतः अनुमान (चिह्न से ज्ञेय वस्तु का अनुमान करने वाला प्रमाण) ही है, क्योंकि उपलब्धि सदैव वस्तु के एक देश (अंश) की ही होती है, समूचे रूप की कभी नहीं, जैसे घट का केवल एक ही पार्श्व दीखता है।
श्लोक 2.32
न प्रत्यक्षेण यावत्तावतपि उपलम्भात् ॥ ३२ ॥
na pratyakṣeṇa yāvattāvatapi upalambhāt || 32 ||
[सिद्धान्त —] नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष से ही वस्तु का उतना भाग उपलब्ध हो जाता है जितना अपेक्षित है, अर्थात् सम्पूर्ण वस्तु का वास्तविक प्रत्यक्ष होता है, न कि केवल अनुमान।
श्लोक 2.33
न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात् ॥ ३३ ॥
na caikadeśopalabdhiravayavisadbhāvāt || 33 ||
और यह केवल एकदेश (अंश) की उपलब्धि नहीं है, क्योंकि अवयवी (अवयवों से बना हुआ, अवयवों से भिन्न एक स्वतन्त्र सत्, जैसे घट स्वयं अपने अंशों से पृथक् एक वस्तु) वास्तव में विद्यमान है।
श्लोक 2.34
साध्यत्वातवयविनि सन्देहः ॥ ३४ ॥
sādhyatvātavayavini sandehaḥ || 34 ||
[पूर्वपक्ष जारी —] चूँकि अवयवी का अस्तित्व ही साध्य (सिद्ध किया जाने वाला विषय) है, अतः अवयवी के विषय में सन्देह ही बना रहता है, उसे प्रमाण मानकर प्रयुक्त करना असिद्ध-हेतु दोष है।
श्लोक 2.35
सर्वाग्रहणं अवयव्यसिद्धेः ॥ ३५ ॥
sarvāgrahaṇaṁ avayavyasiddheḥ || 35 ||
[सिद्धान्त —] वस्तु का सम्पूर्ण रूप से (सभी ओर से एक साथ) ग्रहण न हो पाना अवयवी की असिद्धि के कारण नहीं है, इसका अन्य कारण है, यह अवयवी के अस्तित्व-निषेध का प्रमाण नहीं बनता।
टिप्पणी: The compound sarvāgrahaṇaṁ avayavyasiddheḥ is elliptical; following its siddhānta TAG, it is read here as denying that non-simultaneous apprehension of a whole proves the whole's non-existence, though a reading closer to the opponent's own inference is also grammatically possible.
श्लोक 2.36
धारणाकर्षणोपपत्तेः च ॥ ३६ ॥
dhāraṇākarṣaṇopapatteḥ ca || 36 ||
और वस्तु को एक अंश से पकड़कर धारण करना या खींचना (धारण-आकर्षण) तभी सुसंगत होता है जब अवयवी एक वास्तविक सत्ता हो।
श्लोक 2.37
सेनावनवत्ग्रहणं इति चेत्न अतीन्द्रियत्वातणूनाम् ॥ ३७ ॥
senāvanavatgrahaṇaṁ iti cetna atīndriyatvātaṇūnām || 37 ||
यदि कहा जाए कि समूचे वस्तु का यह ग्रहण सेना या वन के सामूहिक ग्रहण के समान है, अर्थात् केवल अनेक पृथक् वस्तुओं का सामूहिक नाम मात्र, कोई पृथक् वास्तविक सत्ता नहीं — तो यह उचित नहीं, क्योंकि उस स्थिति के विपरीत, जहाँ प्रत्येक वृक्ष अथवा सैनिक प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परमाणु स्वयं अतीन्द्रिय (इन्द्रियों की पहुँच से परे) हैं।
श्लोक 2.38
रोधोपघातसादृश्येभ्यः व्यभिचारातनुमानं अप्रमाणम् ॥ ३८ ॥
rodhopaghātasādṛśyebhyaḥ vyabhicārātanumānaṁ apramāṇam || 38 ||
[अनुमान पर संशयवादी का एक नया पूर्वपक्ष —] अवरोध (रोध), इन्द्रिय-उपघात (क्षति), तथा सादृश्य — इन कारणों से उत्पन्न व्यभिचार (हेतु की अनियमितता) के कारण अनुमान भी अप्रमाण है।
टिप्पणी: Opens a new sub-debate defending anumāna, distinct from the preceding avayavin discussion. The precise technical sense of rodha/upaghāta/sādṛśya as stock examples of misleading inference is not fully recoverable from the sutra text alone.
श्लोक 2.39
न एकदेशत्राससादृश्येभ्यः अर्थान्तरभावात् ॥ ३९ ॥
na ekadeśatrāsasādṛśyebhyaḥ arthāntarabhāvāt || 39 ||
[सिद्धान्त —] नहीं — क्योंकि एकदेश-दर्शन, त्रास (भय-जनित भ्रम), अथवा सादृश्य से उत्पन्न प्रतीत त्रुटियों में वस्तुतः कोई अन्य ही वास्तविक वस्तु (अर्थान्तर) का ज्ञान होता है, अनुमान के हेतु में वास्तविक व्यभिचार नहीं होता।
टिप्पणी: The precise referent of ekadeśatrāsa is uncertain; rendered here as 'seeing only a part' together with 'alarm/fright', following the compound's most natural split, but the intended stock example is not fully certain from the sutra alone.
श्लोक 2.40
वर्तमानाभावः पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः ॥ ४० ॥
vartamānābhāvaḥ patataḥ patitapatitavyakālopapatteḥ || 40 ||
[काल-सम्बन्धी एक और आक्षेप —] वर्तमान काल का अस्तित्व नहीं है, क्योंकि गिरती हुई वस्तु के लिए केवल 'गिर चुका' (भूत) और 'गिरने वाला है' (भविष्य) — ये ही दो काल संगत होते हैं, किसी सुनिश्चित वर्तमान क्षण का निर्धारण सम्भव नहीं।
श्लोक 2.41
तयोः अपि अभावः वर्तमानाभावे तदपेक्षत्वात् ॥ ४१ ॥
tayoḥ api abhāvaḥ vartamānābhāve tadapekṣatvāt || 41 ||
[सिद्धान्त —] तो उन दोनों (भूत और भविष्य) का भी अभाव हो जाएगा, क्योंकि वर्तमान के अभाव में वे दोनों भी उसी की अपेक्षा रखते हैं, वर्तमान के निषेध से भूत-भविष्य दोनों भी अनिर्वचनीय हो जाते हैं।
श्लोक 2.42
न अतीतानागतयोः इतरेतरापेक्षा सिद्धिः ॥ ४२ ॥
na atītānāgatayoḥ itaretarāpekṣā siddhiḥ || 42 ||
और भूत तथा भविष्य की सिद्धि परस्पर की अपेक्षा (इतरेतर-अपेक्षा) मात्र से, वर्तमान के बिना, सम्भव नहीं है।
श्लोक 2.43
वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणं प्रत्यक्षानुपपत्तेः ॥ ४३ ॥
vartamānābhāve sarvāgrahaṇaṁ pratyakṣānupapatteḥ || 43 ||
यदि वर्तमान का अस्तित्व न हो, तो किसी भी वस्तु का ग्रहण सम्भव नहीं होगा, क्योंकि तब प्रत्यक्ष ही असम्भव हो जाएगा।
श्लोक 2.44
कृतताकर्त्तव्यतोपपत्तेः तु उभयथा ग्रहणम् ॥ ४४ ॥
kṛtatākarttavyatopapatteḥ tu ubhayathā grahaṇam || 44 ||
अपितु 'कृतता' (हो चुका) और 'कर्तव्यता' (करना शेष है) — दोनों की संगति होने से, उपलब्धि उभय प्रकार से (दोनों को साथ-साथ ग्रहण करते हुए) होती है, जिससे वर्तमान की वास्तविकता सिद्ध होती है।
श्लोक 2.45
अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यातुपमानासिद्धिः ॥ ४५ ॥
atyantaprāyaikadeśasādharmyātupamānāsiddhiḥ || 45 ||
[उपमान — अर्थात् किसी अपरिचित वस्तु की, परिचित वस्तु से बताए गए सादृश्य के आधार पर, पहचान कराने वाला प्रमाण — के विषय में —] सादृश्य चाहे अत्यन्त (पूर्ण), प्रायः (लगभग पूर्ण), अथवा एकदेश (आंशिक) हो, इनमें से किसी भी आधार पर उपमान की स्वतन्त्र प्रमाण के रूप में सिद्धि नहीं होती।
टिप्पणी: Content reads as an objection to upamāna's status as an independent pramāṇa, though the transmitted TAG marks this sutra 'siddhānta' and the next (46) 'pūrvapakṣa' — the reverse of what the argument's flow suggests; translation follows the logical content over the TAG.
श्लोक 2.46
प्रसिद्धसाधर्म्यातुपमानसिद्धेः यथोक्तदोषानुपपत्तिः ॥ ४६ ॥
prasiddhasādharmyātupamānasiddheḥ yathoktadoṣānupapattiḥ || 46 ||
[उत्तर —] चूँकि उपमान की सिद्धि सुप्रसिद्ध (सर्वमान्य) सादृश्य से होती है, जिसे पूर्ण अथवा ठीक-ठीक समान होना आवश्यक नहीं, अतः पूर्वोक्त दोष उपमान में लागू नहीं होते।
श्लोक 2.47
प्रत्यक्षेण अप्रत्यक्षसिद्धेः ॥ ४७ ॥
pratyakṣeṇa apratyakṣasiddheḥ || 47 ||
यह इससे सिद्ध होता है कि अप्रत्यक्ष वस्तु की सिद्धि प्रत्यक्ष वस्तु के द्वारा हो जाती है।
श्लोक 2.48
न अप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थं उपमानस्य पश्यामः ॥ ४८ ॥
na apratyakṣe gavaye pramāṇārthaṁ upamānasya paśyāmaḥ || 48 ||
अप्रत्यक्ष गवय (जंगली बैल-विशेष — प्रसिद्ध दृष्टान्त: 'गवय गाय के समान होता है' — यह सुनकर यात्री वन में उसे पहचान लेता है) के सम्बन्ध में उपमान के प्रामाणिक प्रयोजन के रूप में हमें इसके अतिरिक्त और कोई प्रयोजन दिखाई नहीं देता।
श्लोक 2.49
तथा इति उपसंहारातुपमानसिद्धेः न अविशेषः ॥ ४९ ॥
tathā iti upasaṁhārātupamānasiddheḥ na aviśeṣaḥ || 49 ||
'यह वैसा ही है' — इस प्रकार के समापन-ज्ञान (उपसंहार) के कारण उपमान की सिद्धि होती है — यह अन्य प्रमाणों से अभिन्न (उनमें समाविष्ट) नहीं है, अपितु एक स्वतन्त्र प्रमाण है।
श्लोक 2.50
शब्दः अनुमानं अर्थस्य अनुपलब्धेः अनुमेयत्वात् ॥ ५० ॥
śabdaḥ anumānaṁ arthasya anupalabdheḥ anumeyatvāt || 50 ||
[पूर्वपक्ष —] शब्द (शब्द-प्रमाण, अर्थात् वचन अथवा शास्त्र-वचन, जिसे यहाँ एक स्वतन्त्र प्रमाण के रूप में विचारित किया जा रहा है) वस्तुतः अनुमान ही है, क्योंकि इसका अर्थ प्रत्यक्ष नहीं होता, अपितु अनुमेय (अनुमान द्वारा जानने योग्य) होता है।
श्लोक 2.51
उपलब्धेः अद्विप्रवृत्तित्वात् ॥ ५१ ॥
upalabdheḥ advipravṛttitvāt || 51 ||
यह इससे भी पुष्ट होता है, क्योंकि शब्दार्थ की उपलब्धि किसी दूसरी, पृथक् प्रक्रिया से नहीं होती, वह उसी एक प्रक्रिया से होती है जिससे अनुमान-जन्य ज्ञान होता है।
टिप्पणी: The compound advipravṛttitva ('not operating in two ways') is terse; rendered here as denying any procedural difference between grasping word-meaning and grasping an inferential mark, in support of the śabda = anumāna thesis argued in 50 and 52.
श्लोक 2.52
सम्बन्धात्च ॥ ५२ ॥
sambandhātca || 52 ||
और सम्बन्ध (चिह्न और चिह्नित वस्तु का सम्बन्ध — जैसे धूम का अग्नि से, वैसे ही शब्द का अर्थ से सम्बन्ध) होने के कारण भी शब्द अनुमान ही है।
श्लोक 2.53
आप्तोपदेशसामर्थ्यात्शब्दातर्थसम्प्रत्ययः ॥ ५३ ॥
āptopadeśasāmarthyātśabdātarthasampratyayaḥ || 53 ||
[सिद्धान्त —] शब्द से अर्थ का ज्ञान आप्त-पुरुष (विश्वसनीय, ज्ञानवान् और सत्यनिष्ठ वक्ता, जिसका वचन प्रामाणिक होता है) के उपदेश के सामर्थ्य से होता है, न कि हेतु की व्याप्ति के समान किसी सम्बन्ध से।
श्लोक 2.54
पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेः च सम्बन्धाभावः ॥ ५४ ॥
pūraṇapradāhapāṭanānupalabdheḥ ca sambandhābhāvaḥ || 54 ||
और चूँकि केवल 'जल', 'अग्नि' अथवा 'शस्त्र' शब्द सुनने मात्र से भरना, जलाना अथवा काटना घटित होते हुए नहीं देखा जाता, अतः शब्द और अर्थ के बीच हेतु और साध्य के समान कोई स्वाभाविक अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है।
श्लोक 2.55
शब्दार्थव्यवस्थानातप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥
śabdārthavyavasthānātapratiṣedhaḥ || 55 ||
शब्द और अर्थ की व्यवस्था (सम्बन्ध) के सांकेतिक (परम्परागत) होने के कारण, शब्द को अनुमान मानने का यह मत खण्डित हो जाता है।
श्लोक 2.56
न सामयिकत्वात्शब्दार्थसम्प्रत्ययस्य ॥ ५६ ॥
na sāmayikatvātśabdārthasampratyayasya || 56 ||
नहीं, क्योंकि शब्द और अर्थ का ज्ञान सांकेतिकता (सामयिकत्व, अर्थात् परम्परा या संकेत) पर ही आधारित है, और यही तथ्य शब्द को अनुमान से पृथक् सिद्ध करता है।
टिप्पणी: The bare 'na' opening this siddhānta sutra is read as reinforcing 54-55 (denying that the word-meaning relation works like an inferential invariable connection) rather than as reopening the objection; the terse phrasing allows some ambiguity.
श्लोक 2.57
जातिविशेषे च अनियमात् ॥ ५७ ॥
jātiviśeṣe ca aniyamāt || 57 ||
और किसी विशेष जाति के प्रत्येक व्यक्ति (सदस्य) पर शब्द के प्रयोग का भी कोई नियत (अनिवार्य) नियम नहीं है, जैसा हेतु और साध्य के बीच होता है।
श्लोक 2.58
तदप्रामाण्यं अनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ॥ ५८ ॥
tadaprāmāṇyaṁ anṛtavyāghātapunaruktadoṣebhyaḥ || 58 ||
[शब्द-प्रमाण की विश्वसनीयता पर एक नया आक्षेप —] असत्य (अनृत), स्ववैरोध्य (व्याघात), तथा पुनरुक्ति (निरर्थक पुनरावृत्ति) — इन दोषों के कारण शब्द का अप्रामाण्य सिद्ध होता है।
टिप्पणी: Though transmitted with a 'siddhānta' TAG, the content states a fresh objection against śabda's reliability, which sutras 59-68 then answer point by point; translation follows the content.
श्लोक 2.59
न कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् ॥ ५९ ॥
na karmakartṛsādhanavaiguṇyāt || 59 ||
नहीं — ऐसे दोष कर्म, कर्ता, अथवा साधन की वैगुण्यता (त्रुटि) से उत्पन्न होते हैं, शब्द-प्रमाण में स्वयं कोई दोष नहीं है।
श्लोक 2.60
अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ॥ ६० ॥
abhyupetya kālabhede doṣavacanāt || 60 ||
विवाद के लिए स्ववैरोध्य का आक्षेप स्वीकार कर भी लिया जाए, तो भी यह दोष काल-भेद (भिन्न समयों में भिन्न विधान) के कथन से दूर हो जाता है।
श्लोक 2.61
अनुवादोपपत्तेः च ॥ ६१ ॥
anuvādopapatteḥ ca || 61 ||
और पुनरुक्ति का आक्षेप इसलिए दूर हो जाता है क्योंकि वह अनुवाद (पूर्व-विहित बात की, किसी प्रयोजनवश, पुनः कथन) के रूप में संगत हो जाता है।
श्लोक 2.62
वाक्यविभागस्य च अर्थग्रहणात् ॥ ६२ ॥
vākyavibhāgasya ca arthagrahaṇāt || 62 ||
और वाक्य के अवयवों में विभाजन (वाक्य-विभाग) द्वारा भी अर्थ का यथार्थ ग्रहण हो जाता है।
श्लोक 2.63
विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ॥ ६३ ॥
vidhyarthavādānuvādavacanaviniyogāt || 63 ||
यह सब विधि (आज्ञापक वचन), अर्थवाद (स्तुति-निन्दात्मक व्याख्यान), तथा अनुवाद (पुनःकथन) — इन तीन प्रकार के वचनों के यथोचित विनियोग (प्रयोग) पर निर्भर करता है।
श्लोक 2.64
विधिः विधायकः ॥ ६४ ॥
vidhiḥ vidhāyakaḥ || 64 ||
विधि वह है जो किसी कर्म के करने का विधान (आदेश) करती है।
श्लोक 2.65
स्तुतिः निन्दा परकृतिः पुराकल्पः इति अर्थवादः ॥ ६५ ॥
stutiḥ nindā parakṛtiḥ purākalpaḥ iti arthavādaḥ || 65 ||
स्तुति (प्रशंसा), निन्दा, परकृति (किसी अन्य द्वारा किए गए कर्म का वर्णन), तथा पुराकल्प (प्राचीन आख्यान) — ये सब मिलकर अर्थवाद (व्याख्यानात्मक वचन, जो स्वयं विधान नहीं करता, अपितु विधि का समर्थन करता है) कहलाते हैं।
श्लोक 2.66
विधिविहितस्य अनुवचनं अनुवादः ॥ ६६ ॥
vidhivihitasya anuvacanaṁ anuvādaḥ || 66 ||
विधि द्वारा विहित बात का पुनः कथन अनुवाद कहलाता है।
श्लोक 2.67
न अनुवादपुनरुक्तयोः विशेषः शब्दाभ्यासोपपत्तेः ॥ ६७ ॥
na anuvādapunaruktayoḥ viśeṣaḥ śabdābhyāsopapatteḥ || 67 ||
[एक और आक्षेप —] अनुवाद और पुनरुक्ति में कोई वास्तविक भेद नहीं है, क्योंकि दोनों में ही शब्दों की पुनरावृत्ति (शब्दाभ्यास) मात्र होती है।
टिप्पणी: Content is again an objection, threatening to collapse the anuvāda/punarukta distinction just used in 61, despite the transmitted 'siddhānta' TAG; it is answered in 68.
श्लोक 2.68
शीघ्रतरगमनोपदेशवतभ्यासात्न अविशेषः ॥ ६८ ॥
śīghrataragamanopadeśavatabhyāsātna aviśeṣaḥ || 68 ||
[उत्तर —] कोई अभेद नहीं है, जैसे 'शीघ्रतर चलो, शीघ्रतर चलो' — इस प्रकार के बार-बार दिए गए उपदेश में पुनरावृत्ति निरर्थक नहीं, अपितु प्रत्येक बार अर्थ को अधिक तीव्र करने के प्रयोजन से सार्थक होती है।
श्लोक 2.69
मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत्च तत्प्रामाण्यम् आप्तप्रामाण्यात् ॥ ६९ ॥
mantrāyurvedaprāmāṇyavatca tatprāmāṇyam āptaprāmāṇyāt || 69 ||
और शास्त्र का प्रामाण्य मन्त्र (यज्ञोक्त वचन) तथा आयुर्वेद (चिकित्सा-शास्त्र) के प्रामाण्य के समान है — इन सबका प्रामाण्य आप्त (विश्वसनीय स्रोत) की विश्वसनीयता (आप्त-प्रामाण्य) पर ही अवलम्बित है।
श्लोक 2.70
न चतुष्ट्वम् ऐतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात् ॥ १ ॥
na catuṣṭvam aitihyārthāpattisambhavābhāvaprāmāṇyāt || 1 ||
[प्रमाणों की संख्या] चार नहीं है, क्योंकि ऐतिह्य (परम्परागत कथन), अर्थापत्ति, सम्भव (अन्तर्भाव) और अभाव (निषेध) भी स्वतन्त्र प्रमाण के रूप में मान्य हैं।
श्लोक 2.71
शब्दे ऐतिह्यानर्थान्तरभावातनुमाने अर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तर भावात्च अप्रतिषेधः ॥ २ ॥
śabde aitihyānarthāntarabhāvātanumāne arthāpattisambhavābhāvānarthāntara bhāvātca apratiṣedhaḥ || 2 ||
[चतुष्ट्व में] कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि ऐतिह्य शब्द-प्रमाण से भिन्न नहीं है, तथा अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव अनुमान-प्रमाण से भिन्न नहीं हैं।
श्लोक 2.72
अर्थापत्तिः अप्रमाणं अनैकान्तिकत्वात् ॥ ३ ॥
arthāpattiḥ apramāṇaṁ anaikāntikatvāt || 3 ||
अर्थापत्ति प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह अनैकान्तिक है (सर्वत्र अव्यभिचारी नहीं है)।
श्लोक 2.73
अनर्थापत्तौ अर्थापत्त्यभिमानात् ॥ ४ ॥
anarthāpattau arthāpattyabhimānāt || 4 ||
[यह दोष वास्तविक अर्थापत्ति में नहीं लगता,] यह केवल वहीं होता है जहाँ अर्थापत्ति के वस्तुतः अभाव में भी उसका अभिमान (मिथ्या आरोप) किया जाता है।
श्लोक 2.74
प्रतिषेधाप्रामाण्यं च अनैकान्तिकत्वात् ॥ ५ ॥
pratiṣedhāprāmāṇyaṁ ca anaikāntikatvāt || 5 ||
और इसी न्याय से अर्थापत्ति के इस प्रतिषेध को भी अप्रमाण मानना पड़ेगा, क्योंकि वह भी अनैकान्तिक है।
श्लोक 2.75
तत्प्रामाण्ये वा न अर्थापत्त्यप्रामाण्यम् ॥ ६ ॥
tatprāmāṇye vā na arthāpattyaprāmāṇyam || 6 ||
अथवा यदि वह प्रतिषेध प्रमाण माना जाए, तो अर्थापत्ति को भी अप्रमाण नहीं कहा जा सकता।
श्लोक 2.76
न अभावप्रामाण्यं प्रमेयासिद्धेः ॥ ७ ॥
na abhāvaprāmāṇyaṁ prameyāsiddheḥ || 7 ||
अभाव प्रमाण नहीं है, क्योंकि उसका प्रमेय (ज्ञातव्य विषय) सिद्ध नहीं है।
श्लोक 2.77
लक्षितेष्वलक्षणलक्षितत्वातलक्षितानां तत्प्रमेयसिद्धेः ॥ ८ ॥
lakṣiteṣvalakṣaṇalakṣitatvātalakṣitānāṁ tatprameyasiddheḥ || 8 ||
लक्षणयुक्त वस्तुओं में [अभाव] उस लक्षण की अनुपस्थिति से लक्षित होता है; और अलक्षित वस्तुओं का प्रमेयत्व भी उसी अनुपलब्धि से सिद्ध हो जाता है।
टिप्पणी: Highly compressed compound (lakṣiteṣv-alakṣaṇalakṣitatvāt-alakṣitānāṁ); rendered per the most common construal (abhāva as pramāṇa even for unmarked entities), but the exact syntactic split is uncertain without the bhāṣya.
श्लोक 2.78
असति अर्थे न अभावः इति चेत्न अन्यलक्षणोपपत्तेः ॥ ९ ॥
asati arthe na abhāvaḥ iti cetna anyalakṣaṇopapatteḥ || 9 ||
यदि यह कहा जाए कि 'वस्तु के असत् होने पर अभाव की प्रतीति नहीं हो सकती' — तो यह ठीक नहीं, क्योंकि वह अन्य लक्षण अर्थात् अनुपलब्धि से ही सिद्ध होती है।
श्लोक 2.79
तत्सिद्धेः अलक्षितेषु अहेतुः ॥ १० ॥
tatsiddheḥ alakṣiteṣu ahetuḥ || 10 ||
चूँकि वह अभाव-ज्ञान लक्षित वस्तुओं की अपेक्षा से ही सिद्ध होता है, अतः अलक्षित वस्तुओं के विषय में वह हेतु नहीं बनता।
श्लोक 2.80
न लक्षणावस्थितापेक्षसिद्धेः ॥ ११ ॥
na lakṣaṇāvasthitāpekṣasiddheḥ || 11 ||
नहीं, क्योंकि वह अपने-अपने लक्षण में अवस्थित वस्तुओं की अपेक्षा से सिद्ध होता है।
श्लोक 2.81
प्राकुत्पत्तेः अभावोपपत्तेः च ॥ १२ ॥
prākutpatteḥ abhāvopapatteḥ ca || 12 ||
और उत्पत्ति से पूर्व भी, प्रागभावरूप अभाव की उपपत्ति होने से [अभाव सिद्ध होता है]।
श्लोक 2.82
आदिमत्वातैन्द्रियकत्वात्कृतकवतुपचारात्च ॥ १३ ॥
ādimatvātaindriyakatvātkṛtakavatupacārātca || 13 ||
[शब्द अनित्य है] क्योंकि वह आदिमान् है, इन्द्रियग्राह्य है, और लोकव्यवहार में कृतक वस्तु के समान उसका प्रयोग होता है।
श्लोक 2.83
न घटाभावसामान्यनित्यत्वात्नित्येषु अपि अनित्यवतुपचारात्च ॥ १४ ॥
na ghaṭābhāvasāmānyanityatvātnityeṣu api anityavatupacārātca || 14 ||
[इससे पूर्वोक्त हेतु दूषित नहीं होते,] क्योंकि सामान्यरूप से किसी धर्म का होना मात्र (जैसे घटाभाव का सामान्यत्व) नित्यता सिद्ध नहीं करता, और नित्य वस्तुओं में भी कहीं-कहीं अनित्यवत् व्यवहार देखा जाता है।
टिप्पणी: The ghaṭābhāva-sāmānya-nityatva compound is terse and its exact dialectical target (which objection it answers) is not fully recoverable without Vātsyāyana's bhāṣya; rendered per the most plausible reading defending the kṛtakavad-upacāra hetu of sutra 13.
श्लोक 2.84
तत्त्वभाक्तयोः नानात्वविभागातव्यभिचारः ॥ १५ ॥
tattvabhāktayoḥ nānātvavibhāgātavyabhicāraḥ || 15 ||
[उस हेतु में] व्यभिचार नहीं है, क्योंकि तात्त्विक (मुख्य) और भाक्त (गौण) प्रयोग में स्पष्ट भेद है।
श्लोक 2.85
सन्तानानुमानविशेषणात् ॥ १६ ॥
santānānumānaviśeṣaṇāt || 16 ||
...सन्तान (प्रवाहरूप प्रतीति) सम्बन्धी अनुमान की विशेष अपेक्षा से भी [शब्द की अनित्यता सिद्ध होती है]।
श्लोक 2.86
कारणद्रव्यस्य प्रदेशशब्देनाभिधानात् ॥ १७ ॥
kāraṇadravyasya pradeśaśabdenābhidhānāt || 17 ||
...क्योंकि शब्द के कारणद्रव्य का 'प्रदेश' शब्द से अभिधान (निर्देश) किया जाता है।
श्लोक 2.87
प्राकुच्चारणातनुपलब्धेः आवरणाद्यनुपलब्धेः च ॥ १८ ॥
prākuccāraṇātanupalabdheḥ āvaraṇādyanupalabdheḥ ca || 18 ||
[शब्द अनित्य है] क्योंकि उच्चारण से पूर्व वह अनुपलब्ध रहता है, तथा आवरण आदि की भी कोई उपलब्धि नहीं होती।
श्लोक 2.88
तदनुपलब्धेः अनुपलम्भातावरणोपपत्तिः ॥ १९ ॥
tadanupalabdheḥ anupalambhātāvaraṇopapattiḥ || 19 ||
[पूर्वपक्ष:] उस आवरण की अनुपलब्धि से ही, [अदृश्य] आवरण का सद्भाव सिद्ध हो जाता है।
श्लोक 2.89
अनुपलम्भातनुपलब्धिसद्भावात्न आवरणानुपपत्तिः अनुपलम्भात् ॥ २० ॥
anupalambhātanupalabdhisadbhāvātna āvaraṇānupapattiḥ anupalambhāt || 20 ||
नहीं, ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि अनुपलब्धि मात्र से अनुपलब्धि का ही सद्भाव सिद्ध होता है [आवरण का नहीं]; उसी अनुपलब्धि से आवरण की अनुपपत्ति भी सिद्ध होती है।
श्लोक 2.90
अनुपलम्भात्मकत्वातनुपलब्धेः अहेतुः ॥ २१ ॥
anupalambhātmakatvātanupalabdheḥ ahetuḥ || 21 ||
अनुपलब्धि का स्वरूप अनुपलम्भात्मक (ज्ञानाभावरूप) होने से, वह आवरण-सिद्धि के लिए हेतु नहीं बन सकती।
श्लोक 2.91
अस्पर्शत्वात् ॥ २२ ॥
asparśatvāt || 22 ||
...क्योंकि शब्द अस्पर्श (स्पर्शरहित) है [अतः उसका आवरण सम्भव नहीं]।
श्लोक 2.92
न कर्मानित्यत्वात् ॥ २३ ॥
na karmānityatvāt || 23 ||
नहीं, क्योंकि कर्म भी अनित्य है, अतः यह दृष्टान्त शब्द की नित्यता सिद्ध नहीं करता।
श्लोक 2.93
न अणुनित्यत्वात् ॥ २४ ॥
na aṇunityatvāt || 24 ||
नहीं, क्योंकि अणु नित्य है, तथापि वह अन्य कारण से अगृहीत रहता है — अतः यह दृष्टान्त भी असंगत है।
श्लोक 2.94
सम्प्रदानात् ॥ २५ ॥
sampradānāt || 25 ||
...सम्प्रदान कारक के प्रयोग के कारण भी [शब्द का कृतकत्व सिद्ध होता है, अर्थात् उसे किसी के लिए 'दिया' अथवा 'उत्पन्न किया' गया कहा जाता है]।
टिप्पणी: Single-word sutra (sampradānāt); precise application of the grammatical dative-case argument is not fully recoverable without the bhāṣya, so the gloss is a plausible reconstruction rather than a certain reading.
श्लोक 2.95
तदन्तरालानुपलब्धेः अहेतुः ॥ २६ ॥
tadantarālānupalabdheḥ ahetuḥ || 26 ||
उन दोनों के मध्यवर्ती अन्तराल में अनुपलब्धि होने से, वह हेतु असिद्ध है।
श्लोक 2.96
अध्यापनातप्रतिषेधः ॥ २७ ॥
adhyāpanātapratiṣedhaḥ || 27 ||
अध्यापन (शिक्षण) की निरन्तरता के कारण [अनित्यत्व के विरुद्ध] कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 2.97
उभयोः पक्षयोः अन्यतरस्य अध्यापनातप्रतिषेधः ॥ २८ ॥
ubhayoḥ pakṣayoḥ anyatarasya adhyāpanātapratiṣedhaḥ || 28 ||
दोनों में से किसी भी पक्ष में, केवल अध्यापन के आधार पर दूसरे पक्ष का प्रतिषेध सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 2.98
अभ्यासात् ॥ २९ ॥
abhyāsāt || 29 ||
...अभ्यास (पुनः-पुनः उच्चारण) के कारण भी [शब्द की अनित्यता सिद्ध होती है]।
श्लोक 2.99
न अन्यत्वे अपि अभ्यासस्य उपचारात् ॥ ३० ॥
na anyatve api abhyāsasya upacārāt || 30 ||
नहीं, क्योंकि प्रत्येक उच्चारण भिन्न होते हुए भी, उनमें 'अभ्यास' शब्द का प्रयोग औपचारिक (गौण) रूप से किया जाता है।
श्लोक 2.100
अन्यतन्यस्मातनन्यत्वातनन्यतिति अन्यताभावः ॥ ३१ ॥
anyatanyasmātananyatvātananyatiti anyatābhāvaḥ || 31 ||
['यह उससे अन्य नहीं है, और वह इससे अन्य नहीं है, अतः दोनों अनन्य हैं' — इस प्रकार पूर्वपक्षी] अन्यता के अभाव का प्रतिपादन करता है।
टिप्पणी: Though tagged सिद्धान्तसूत्र in the source, the content restates what reads as the eternalist's (pūrvapakṣa) claim of non-difference between recurring sound-tokens, which sutra 32 then refutes; the dialectical framing is genuinely ambiguous without the bhāṣya.
श्लोक 2.101
तदभावे न अस्ति अनन्यता तयोः इतरेतरापेक्षसिद्धेः ॥ ३२ ॥
tadabhāve na asti ananyatā tayoḥ itaretarāpekṣasiddheḥ || 32 ||
उस भिन्नता के अभाव में उन दोनों में अनन्यता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि वह परस्पर सापेक्षता से ही सिद्ध होती है।
श्लोक 2.102
विनाशकारणानुपलब्धेः ॥ ३३ ॥
vināśakāraṇānupalabdheḥ || 33 ||
[शब्द के] नाश का कोई कारण उपलब्ध नहीं होता — [इसी आधार पर यह तर्क प्रस्तुत होता है]।
टिप्पणी: Terse two-word sutra whose dialectical role is ambiguous: it may state the eternalist's ground (absence of a perceived destroyer, hence sound persists unheard) which sutra 37 then turns into a reductio, rather than standing as an independent Naiyāyika conclusion.
श्लोक 2.103
अश्रवणकारणानुपलब्धेः सततश्रवणप्रसङ्गः ॥ ३४ ॥
aśravaṇakāraṇānupalabdheḥ satataśravaṇaprasaṅgaḥ || 34 ||
अश्रवण (न सुनाई देने) का भी कोई कारण उपलब्ध न होने से, [यदि शब्द नित्य होता तो] उसका निरन्तर श्रवण होना चाहिए था — ऐसा अनिष्ट प्रसंग प्राप्त होता है।
श्लोक 2.104
उपलभ्यमाने च अनुपलब्धेः असत्त्वातनपदेशः ॥ ३५ ॥
upalabhyamāne ca anupalabdheḥ asattvātanapadeśaḥ || 35 ||
और जब अन्य वस्तु उपलब्ध होते हुए भी शब्द अनुपलब्ध रहता है, तब उसके [अदृश्य] सत्त्व का यह कथन निराधार है।
श्लोक 2.105
पाणिनिमित्तप्रश्लेषात्शब्दाभावे न अनुपलब्धिः ॥ ३६ ॥
pāṇinimittapraśleṣātśabdābhāve na anupalabdhiḥ || 36 ||
[द्रुतादि] विशिष्ट निमित्त-संयोग (जैसे हाथ के आघात) के अभाव में शब्द का न होना ही उसकी अनुपलब्धि का कारण है, न कि उसका नित्य किन्तु आवृत रहना।
टिप्पणी: 'Pāṇinimittapraśleṣāt' is opaque outside its bhāṣya context; rendered per the standard drum/hand-strike example used elsewhere in this debate, but the precise reference is not fully certain.
श्लोक 2.106
विनाशकारणानुपलब्धेः च अवस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः ॥ ३७ ॥
vināśakāraṇānupalabdheḥ ca avasthāne tannityatvaprasaṅgaḥ || 37 ||
और नाश के कारण की अनुपलब्धि होने पर भी यदि शब्द अवस्थित रहे, तो उसकी नित्यता का अनिष्ट प्रसंग प्राप्त होगा।
श्लोक 2.107
अस्पर्शत्वातप्रतिषेधः ॥ ३८ ॥
asparśatvātapratiṣedhaḥ || 38 ||
अस्पर्शत्व (स्पर्शरहित होने) के कारण इस विषय में कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 2.108
विभक्त्यन्तरोपपत्तेः च समासे ॥ ३९ ॥
vibhaktyantaropapatteḥ ca samāse || 39 ||
और समास में [शब्द की] भिन्न विभक्ति की उपपत्ति होने से भी [शब्द की अनित्यता सिद्ध होती है]।
श्लोक 2.109
विकारादेशोपदेशात्संशयः ॥ ४० ॥
vikārādeśopadeśātsaṁśayaḥ || 40 ||
विकार और आदेश के व्याकरणोक्त उपदेश से [शब्द की नित्यता-अनित्यता के विषय में] संशय उत्पन्न होता है।
श्लोक 2.110
प्रकृतिविवृद्धौ विकारविवृद्धेः ॥ ४१ ॥
prakṛtivivṛddhau vikāravivṛddheḥ || 41 ||
[पूर्वपक्ष:] प्रकृति की वृद्धि होने पर विकार की भी वृद्धि होती है, जैसा द्रव्य-परिणाम में देखा जाता है।
श्लोक 2.111
न्यूनसमाधिकोपलब्धेः विकाराणां अहेतुः ॥ ४२ ॥
nyūnasamādhikopalabdheḥ vikārāṇāṁ ahetuḥ || 42 ||
न्यून, सम अथवा अधिक प्रकृति में भी विकार की उपलब्धि होने से, वह हेतु [वर्ण-विकारों के लिए] असिद्ध है।
श्लोक 2.112
द्विविधस्य अपि हेतोः अभावातसाधनं दृष्टान्तः ॥ ४३ ॥
dvividhasya api hetoḥ abhāvātasādhanaṁ dṛṣṭāntaḥ || 43 ||
दोनों प्रकार के हेतु के अभाव के कारण, प्रस्तुत दृष्टान्त असाधक है।
श्लोक 2.113
न अतुल्यप्रकृतीनां विकारविकल्पात् ॥ ४४ ॥
na atulyaprakṛtīnāṁ vikāravikalpāt || 44 ||
नहीं, क्योंकि असदृश प्रकृतियों में विकार भी भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है।
श्लोक 2.114
द्रव्यविकारवैषम्यवत्वर्णविकारविकलः ॥ ४५ ॥
dravyavikāravaiṣamyavatvarṇavikāravikalaḥ || 45 ||
[पूर्वपक्ष:] जैसे द्रव्य-विकार में वैषम्य है, वैसे ही वर्ण-विकार में वास्तविक विकार का अभाव (विकल) है।
श्लोक 2.115
न विकारधर्मानुपपत्तेः ॥ ४६ ॥
na vikāradharmānupapatteḥ || 46 ||
नहीं, क्योंकि विकार-धर्म वर्णों में अनुपपन्न नहीं है।
श्लोक 2.116
विकारप्राप्तानां अपुनरापत्तेः ॥ ४७ ॥
vikāraprāptānāṁ apunarāpatteḥ || 47 ||
...क्योंकि जो वस्तुएँ विकार को प्राप्त हो चुकी होती हैं, वे पुनः पूर्व रूप को प्राप्त नहीं होतीं।
श्लोक 2.117
सुवर्णादीनां पुनरापत्तेः अहेतुः ॥ ४८ ॥
suvarṇādīnāṁ punarāpatteḥ ahetuḥ || 48 ||
[पूर्वपक्ष:] सुवर्ण आदि में तो पुनः पूर्व रूप की प्राप्ति देखी जाती है, अतः वह हेतु असिद्ध है।
श्लोक 2.118
न तद्विकाराणां सुवर्णभावाव्यतिरेकात् ॥ ४९ ॥
na tadvikārāṇāṁ suvarṇabhāvāvyatirekāt || 49 ||
नहीं, क्योंकि उसके विकार स्वर्णभाव से व्यतिरिक्त (भिन्न) नहीं होते।
श्लोक 2.119
वर्णत्वाव्यतिरेकात्वर्णविकाराणां अप्रतिषेधः ॥ ५० ॥
varṇatvāvyatirekātvarṇavikārāṇāṁ apratiṣedhaḥ || 50 ||
वर्णत्व से अव्यतिरेक होने के कारण वर्ण-विकारों के प्रति भी कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 2.120
सामान्यवतो धर्मयोगो न सामान्यस्य ॥ ५१ ॥
sāmānyavato dharmayogo na sāmānyasya || 51 ||
धर्म का सम्बन्ध सामान्यवान् (विशेष वस्तु) से होता है, सामान्य से नहीं।
श्लोक 2.121
नित्यत्वे अविकारातनित्यत्वे च अनवस्थानात् ॥ ५२ ॥
nityatve avikārātanityatve ca anavasthānāt || 52 ||
यदि शब्द नित्य है तो उसमें विकार सम्भव नहीं, और यदि अनित्य है तो उसमें अवस्थान (स्थिरता) नहीं रहता — इस प्रकार दोनों पक्षों में कठिनाई है।
श्लोक 2.122
नित्यानां अतीन्द्रियत्वात्तद्धर्मविकल्पात्च वर्णविकाराणां अप्रतिषेधः ॥ ५३ ॥
nityānāṁ atīndriyatvāttaddharmavikalpātca varṇavikārāṇāṁ apratiṣedhaḥ || 53 ||
[पूर्वपक्ष:] नित्य पदार्थ अतीन्द्रिय होते हैं, और उनके धर्मों की अभिव्यक्ति में विकल्प (भिन्नता) सम्भव है, अतः वर्ण-विकार के प्रति कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 2.123
अनवस्थायित्वे च वर्णोपलब्धिवत्तद्विकारोपपत्तिः ॥ ५४ ॥
anavasthāyitve ca varṇopalabdhivattadvikāropapattiḥ || 54 ||
और यदि वर्ण अनवस्थायी (क्षणिक) मानें, तो वर्ण की उपलब्धि के समान ही उसके विकार की भी उपपत्ति हो जाती है।
श्लोक 2.124
विकारधर्मित्वे नित्यत्वाभावात्कालान्तरे विकारोपपत्तेः च अप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥
vikāradharmitve nityatvābhāvātkālāntare vikāropapatteḥ ca apratiṣedhaḥ || 55 ||
[सिद्धान्त:] विकार-धर्मी होने के कारण शब्द में नित्यत्व का अभाव है, तथा कालान्तर में विकार की उपपत्ति होने से भी कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 2.125
प्रकृत्यनियमात् ॥ ५६ ॥
prakṛtyaniyamāt || 56 ||
...क्योंकि प्रकृति के विषय में कोई नियम नहीं है।
श्लोक 2.126
अनियमे नियमात्न अनियमः ॥ ५७ ॥
aniyame niyamātna aniyamaḥ || 57 ||
[पूर्वपक्ष:] अनियम में भी नियम होने के कारण वह वस्तुतः अनियम नहीं है।
श्लोक 2.127
नियमानियमविरोधातनियमे नियमात्च अप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥
niyamāniyamavirodhātaniyame niyamātca apratiṣedhaḥ || 58 ||
नियम और अनियम में परस्पर विरोध होने से, तथा अनियम में जो नियम है वह भी सीमित होने से, कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 2.128
गुणान्तरापत्त्युपमर्दह्रासवृद्धिश्लेषेभ्यः तु विकारोपपत्तेः वर्णविकाराः ॥ ५९ ॥
guṇāntarāpattyupamardahrāsavṛddhiśleṣebhyaḥ tu vikāropapatteḥ varṇavikārāḥ || 59 ||
अपितु गुणान्तरापत्ति (नये गुण की प्राप्ति), उपमर्द (दबना), ह्रास (घटना), वृद्धि (बढ़ना) और श्लेष (संयोग) — इन्हीं प्रक्रियाओं से वर्ण-विकारों की उपपत्ति होती है।
श्लोक 2.129
ते विभक्त्यन्ताः पदम् ॥ ६० ॥
te vibhaktyantāḥ padam || 60 ||
जो विभक्ति-अन्त (सुप् अथवा तिङ् प्रत्ययान्त) होते हैं, वे पद कहलाते हैं।
श्लोक 2.130
व्यक्त्याकृतिजातिसन्निधौ उपचारात्संशयः ॥ ६१ ॥
vyaktyākṛtijātisannidhau upacārātsaṁśayaḥ || 61 ||
व्यक्ति, आकृति और जाति — तीनों की समवर्ती उपस्थिति में औपचारिक प्रयोग होने से [शब्द के वाच्यार्थ के विषय में] संशय उत्पन्न होता है।
श्लोक 2.131
याशब्दसमूहत्यागपरिग्रहसङ्ख्यावृद्ध्यपचयवर्णसमासानुबन्धानां व्यक्तौ उपचारात्व्यक्तिः ॥ ६२ ॥
yāśabdasamūhatyāgaparigrahasaṅkhyāvṛddhyapacayavarṇasamāsānubandhānāṁ vyaktau upacārātvyaktiḥ || 62 ||
['या' आदि सार्वनामिक प्रयोग, समूह, त्याग-परिग्रह, संख्या, वृद्धि-अपचय, वर्ण, समास और अनुबन्ध — इन सबका प्रयोग व्यक्ति की अपेक्षा से होता है, अतः व्यक्ति ही शब्द का वाच्यार्थ है।
श्लोक 2.132
न ततनवस्थानात् ॥ ६३ ॥
na tatanavasthānāt || 63 ||
नहीं, क्योंकि उस व्यक्ति का कोई स्थिर अवस्थान नहीं है।
श्लोक 2.133
सहचरणस्थानतादर्थ्यवृत्तमानधारणसामीप्ययोगसाधनाधिपत्येभ्यः ब्राह्मणमञ्चकटराजसक्तुचन्दनगङ्गाशाटकान्नपुरुषेष्वतद्भावे अपि तदुपचारः ॥ ६४ ॥
sahacaraṇasthānatādarthyavṛttamānadhāraṇasāmīpyayogasādhanādhipatyebhyaḥ brāhmaṇamañcakaṭarājasaktucandanagaṅgāśāṭakānnapuruṣeṣvatadbhāve api tadupacāraḥ || 64 ||
सहचरण (साथ रहना), स्थान, तादर्थ्य (प्रयोजन), वृत्त (आचरण), मान, धारण, सामीप्य, योग, साधन और आधिपत्य — इन सम्बन्धों के आधार पर, मुख्य वस्तु के वस्तुतः अभाव में भी औपचारिक प्रयोग होता है — जैसे 'मञ्च का ब्राह्मण', 'राजा का रथ', 'साक्तु', 'चन्दन', 'गङ्गा', 'शाटक', 'अन्न' आदि शब्दों का प्रयोग उनसे सम्बद्ध व्यक्तियों के लिए किया जाना।
टिप्पणी: The dvandva list of examples (brāhmaṇa-mañca-kaṭa-rāja-saktu-candana-gaṅgā-śāṭaka-anna-puruṣa) is a well-known interpretive crux with more than one traditional segmentation; the pairing of terms here follows the most commonly cited construal but is not the only one attested.
श्लोक 2.134
आकृतिः तदपेक्षत्वात्सत्त्वव्यवस्थानसिद्धेः ॥ ६५ ॥
ākṛtiḥ tadapekṣatvātsattvavyavasthānasiddheḥ || 65 ||
[पूर्वपक्ष:] आकृति ही शब्द का वाच्यार्थ है, क्योंकि व्यक्ति उसी की अपेक्षा रखती है, और उसी से सत्त्व की व्यवस्था सिद्ध होती है।
श्लोक 2.135
व्यक्त्याकृतियुक्ते अपि अप्रसङ्गात्प्रोक्षणादिनां मृद्गवके जातिः ॥ ६६ ॥
vyaktyākṛtiyukte api aprasaṅgātprokṣaṇādināṁ mṛdgavake jātiḥ || 66 ||
[पूर्वपक्ष:] व्यक्ति और आकृति से युक्त होने पर भी, 'प्रोक्षण' आदि विधियाँ मिट्टी की गाय में प्रवृत्त नहीं होतीं, अतः जाति ही शब्द का वाच्यार्थ है।
श्लोक 2.136
न आकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वात्जात्यभिव्यक्तेः ॥ ६७ ॥
na ākṛtivyaktyapekṣatvātjātyabhivyakteḥ || 67 ||
नहीं, क्योंकि जाति की अभिव्यक्ति भी आकृति और व्यक्ति की अपेक्षा रखती है।
श्लोक 2.137
व्यक्त्याकृतिजातयः तु पदार्थः ॥ ६८ ॥
vyaktyākṛtijātayaḥ tu padārthaḥ || 68 ||
अपितु व्यक्ति, आकृति और जाति — तीनों मिलकर ही पदार्थ अर्थात् शब्द का वाच्यार्थ हैं।
श्लोक 2.138
व्यक्तिः गुणविशेषाश्रयः मूर्तिः ॥ ६९ ॥
vyaktiḥ guṇaviśeṣāśrayaḥ mūrtiḥ || 69 ||
व्यक्ति वह मूर्ति (साकार रूप) है जो विशिष्ट गुणों का आश्रय है।
श्लोक 2.139
आकृतिः जातिलिङ्गाख्या ॥ ७० ॥
ākṛtiḥ jātiliṅgākhyā || 70 ||
आकृति वह है जो जाति के लिङ्ग (चिह्न) के रूप में कही जाती है।
श्लोक 2.140
समानप्रसवात्मिका जातिः ॥ ७१ ॥
samānaprasavātmikā jātiḥ || 71 ||
जाति वह है जिसका स्वरूप भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में समान प्रतीति उत्पन्न करना है।
श्लोक 3.1
दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ १ ॥
darśanasparśanābhyāmekārthagrahaṇāt || 1 ||
क्योंकि दर्शन (देखना) और स्पर्शन (छूना) — दोनों के द्वारा एक ही वस्तु का ग्रहण होता है [जिससे इन्द्रियों से पृथक् एक अद्वितीय आत्मा सिद्ध होती है]।
श्लोक 3.2
न विषयव्यवस्थानात् ॥ २ ॥
na viṣayavyavasthānāt || 2 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि प्रत्येक इन्द्रिय का विषय सुनिश्चित रूप से पृथक्-पृथक् व्यवस्थित है, अतः वह वास्तव में एक ही समान वस्तु नहीं है।
श्लोक 3.3
तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥
tadvyavasthānādevātmasadbhāvādapratiṣedhaḥ || 3 ||
[सिद्धान्त:] इसका प्रतिषेध नहीं होता — क्योंकि उसी विषय-व्यवस्था से ही आत्मा का सद्भाव सिद्ध होता है।
श्लोक 3.4
शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥
śarīradāhe pātakābhāvāt || 4 ||
[पूर्वपक्ष:] क्योंकि शरीर के दाह में कोई पातक (पाप) नहीं होता [जिससे प्रतीत होता है कि शरीर आत्मा से सर्वथा भिन्न और असम्बद्ध है]।
श्लोक 3.5
तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात् ॥ ५ ॥
tadabhāvaḥ sātmakapradāhe'pi tannityatvāt || 5 ||
वह अभाव (पाप का अभाव) तो आत्मा-सहित दाह में भी होना चाहिए, क्योंकि आत्मा नित्य है।
श्लोक 3.6
न कार्याश्रयकर्तृवधात् ॥ ६ ॥
na kāryāśrayakartṛvadhāt || 6 ||
[सिद्धान्त:] ऐसा नहीं है — क्योंकि यह कार्य के आश्रयभूत कर्ता का वध है [अतः हिंसा पाप ही है, यद्यपि आत्मा स्वयं नित्य है]।
श्लोक 3.7
सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥
savyadṛṣṭasyetareṇa pratyabhijñānāt || 7 ||
सव्य (बाएँ) नेत्र से देखी गई वस्तु का दूसरे (दाएँ) नेत्र द्वारा प्रत्यभिज्ञान होता है [अतः एक ही ज्ञाता दोनों नेत्रों में विद्यमान सिद्ध होता है]।
श्लोक 3.8
नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ॥ ८ ॥
naikasminnāsāsthivyavahite dvitvābhimānāt || 8 ||
वह एक ही [नेत्र] में सीमित नहीं है — क्योंकि नासास्थि (नासिका की हड्डी) से व्यवहित होने पर भी दोनों नेत्रों में पृथक्-पृथक् द्वित्व की प्रतीति भ्रामक सिद्ध होती है [अतः एक ही आत्मा दोनों का अधिष्ठान है]।
टिप्पणी: Terse compound naikasminnāsāsthivyavahite dvitvābhimānāt parsed as na+ekasmin+nāsāsthi ('nasal bone')+vyavahite+dvitva-abhimānāt; the precise dialectical force (rebutting an inference of two perceivers from the eyes' physical separation) is an interpretive reconstruction, not fully explicit in the sutra itself.
श्लोक 3.9
एकविनाशे द्वितीयाविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥
ekavināśe dvitīyāvināśānnaikatvam || 9 ||
[पूर्वपक्ष:] एक के नष्ट होने पर दूसरे का नाश नहीं होता, अतः दोनों में एकत्व सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 3.10
अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ॥ १० ॥
avayavanāśe'pyavayavyupalabdherahetuḥ || 10 ||
[सिद्धान्त:] यह हेतु उचित नहीं है — क्योंकि अवयव का नाश होने पर भी अवयवी (समग्र वस्तु) की उपलब्धि होती रहती है।
श्लोक 3.11
दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥
dṛṣṭāntavirodhādapratiṣedhaḥ || 11 ||
इस दृष्टान्त से विरोध होने के कारण उस [पूर्वपक्ष] का प्रतिषेध सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 3.12
इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥
indriyāntaravikārāt || 12 ||
क्योंकि नष्ट होने पर इन्द्रिय-विशेष में ही विकार होता है, आत्मा में नहीं।
श्लोक 3.13
न स्मृतेः स्मर्तव्यविषयत्वात् ॥ १३ ॥
na smṛteḥ smartavyaviṣayatvāt || 13 ||
[पूर्वपक्ष:] स्मृति आत्मा को सिद्ध नहीं करती, क्योंकि स्मृति का विषय केवल स्मर्तव्य (स्मरण किए जाने योग्य वस्तु) तक ही सीमित है।
श्लोक 3.14
तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥
tadātmaguṇasadbhāvādapratiṣedhaḥ || 14 ||
[सिद्धान्त:] प्रतिषेध नहीं होता, क्योंकि स्मृति आत्मा का ही गुण होने से उसका सद्भाव सिद्ध हो जाता है।
श्लोक 3.15
नात्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात् ॥ १५ ॥
nātmapratipattihetūnāṁ manasi sambhavāt || 15 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि आत्मा की प्रतिपत्ति के हेतु मन में भी सम्भव हो सकते हैं।
श्लोक 3.16
ज्ञातुर्ज्ञानसाधनोपपत्तेः संज्ञाभेदमात्रम् ॥ १६ ॥
jñāturjñānasādhanopapatteḥ saṁjñābhedamātram || 16 ||
[सिद्धान्त:] मन तो ज्ञाता के ज्ञान का साधनमात्र सिद्ध होता है, अतः उसे ज्ञाता मान लेना केवल संज्ञा-भेद ही है [वास्तविक ज्ञाता आत्मा ही है]।
श्लोक 3.17
नियमश्च निरनुमानः ॥ १७ ॥
niyamaśca niranumānaḥ || 17 ||
और यह नियम अन्य किसी अनुमान से सिद्ध नहीं हो सकता [अतः आत्मा को ही मानना आवश्यक है]।
श्लोक 3.18
पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः ॥ १८ ॥
pūrvābhyastasmṛtyanubandhājjātasya harṣabhayaśokasampratipatteḥ || 18 ||
क्योंकि नवजात शिशु में पूर्वजन्म में अभ्यस्त स्मृति-संस्कारों के अनुबन्ध से ही हर्ष, भय और शोक की सम्प्रतिपत्ति (अनुभूति) होती है [जिससे पूर्वजन्म तथा आत्मा की नित्यता सिद्ध होती है]।
श्लोक 3.19
पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवत्तद्विकारः ॥ १९ ॥
padmādiṣu prabodhasammīlanavikāravattadvikāraḥ || 19 ||
पद्म आदि में जैसे प्रबोध (खिलना) और सम्मीलन (मुँदना) का स्वाभाविक विकार होता है, वैसे ही उस [शिशु] का भी विकार है।
श्लोक 3.20
नोष्णशीतवर्षाकालनिमित्तत्वात्पञ्चात्मकविकाराणाम् ॥ २० ॥
noṣṇaśītavarṣākālanimittatvātpañcātmakavikārāṇām || 20 ||
क्योंकि वे पाञ्चभौतिक विकार उष्ण, शीत अथवा वर्षा-काल के निमित्त से उत्पन्न नहीं होते [अतः केवल ऋतु-कारण से उनकी व्याख्या नहीं की जा सकती]।
टिप्पणी: 'pañcātmaka' (fivefold) is terse and could refer either to the set of affective changes just listed or to the five elements/senses generally; rendered as the former, in line with the surrounding argument, but the referent is not fully explicit.
श्लोक 3.21
प्रेत्याहाराभ्यासकृतात्स्तन्याभिलाषात् ॥ २१ ॥
pretyāhārābhyāsakṛtātstanyābhilāṣāt || 21 ||
क्योंकि प्रेत्य (पूर्वजन्म) में किए गए आहार के अभ्यास से उत्पन्न स्तन्य (स्तनपान) की अभिलाषा शिशु में होती है।
श्लोक 3.22
अयसोऽयस्कान्ताभिगमनवत्तदुपसर्पणम् ॥ २२ ॥
ayaso'yaskāntābhigamanavattadupasarpaṇam || 22 ||
जैसे लोहा अयस्कान्त (चुम्बक) की ओर आकृष्ट होकर चलता है, वैसे ही उस [शिशु] का स्तन की ओर उपसर्पण (रेंगकर बढ़ना) होता है।
श्लोक 3.23
नान्यत्र प्रवृत्त्यभावात् ॥ २३ ॥
nānyatra pravṛttyabhāvāt || 23 ||
क्योंकि अन्यत्र [किसी अन्य वस्तु की ओर] ऐसी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती।
श्लोक 3.24
वीतरागजन्मादर्शनात् ॥ २४ ॥
vītarāgajanmādarśanāt || 24 ||
क्योंकि वीतराग (आसक्ति-रहित) जन्म कभी दृष्ट नहीं होता।
श्लोक 3.25
सगुणद्रव्योत्पत्तिवत्तदुत्पत्तिः ॥ २५ ॥
saguṇadravyotpattivattadutpattiḥ || 25 ||
जैसे गुण-सहित द्रव्य की उत्पत्ति होती है, वैसे ही उस [इच्छा आदि] की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 3.26
न संकल्पनिमित्तत्वाद्रागादीनाम् ॥ २६ ॥
na saṁkalpanimittatvādrāgādīnām || 26 ||
क्योंकि राग आदि संकल्प के निमित्त से उत्पन्न नहीं होते [शिशु में तो संकल्प सम्भव ही नहीं है]।
श्लोक 3.27
पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः ॥ २७ ॥
pārthivaṁ guṇāntaropalabdheḥ || 27 ||
शरीर पार्थिव (पृथ्वी-प्रधान) है — यद्यपि उसमें अन्य गुण भी उपलब्ध होते हैं।
टिप्पणी: The ablative hetu (guṇāntaropalabdheḥ, 'because other qualities are perceived') sits oddly as direct support for 'earthy'; read here as a concessive point that opens the following examination of the body's other, non-earth qualities (sutras 28-30).
श्लोक 3.28
पार्थिवाप्यतैजसं तद्गुणोपलब्धेः ॥ २८ ॥
pārthivāpyataijasaṁ tadguṇopalabdheḥ || 28 ||
[पूर्वपक्ष:] शरीर पार्थिव-आप्य (पृथ्वी और जल से निर्मित) है, तैजस नहीं, क्योंकि उसमें जल का गुण उपलब्ध होता है।
श्लोक 3.29
निःश्वासोच्छ्वासोपलब्धेश्चातुर्भौतिकम् ॥ २९ ॥
niḥśvāsocchvāsopalabdheścāturbhautikam || 29 ||
और निःश्वास-उच्छ्वास (श्वास लेना-छोड़ना) की उपलब्धि होने से शरीर चातुर्भौतिक (चार भूतों से बना) है।
श्लोक 3.30
गन्धक्लेदपाकव्यूहावकाशदानेभ्यः पाञ्चभौतिकम् ॥ ३० ॥
gandhakledapākavyūhāvakāśadānebhyaḥ pāñcabhautikam || 30 ||
[सिद्धान्त:] गन्ध, क्लेद (आर्द्रता), पाक (पाचन), व्यूह (संरचना) और अवकाश-दान (रिक्त स्थान देना) — इनसे शरीर पाञ्चभौतिक (पाँचों भूतों से निर्मित) सिद्ध होता है।
श्लोक 3.31
श्रुतिप्रामाण्याच्च ॥ ३१ ॥
śrutiprāmāṇyācca || 31 ||
और श्रुति के प्रामाण्य से भी [यही सिद्ध होता है]।
श्लोक 3.32
कृष्णसारे सत्युपलम्भाद्व्यतिरिच्य चोपलम्भात्संशयः ॥ ३२ ॥
kṛṣṇasāre satyupalambhādvyatiricya copalambhātsaṁśayaḥ || 32 ||
कृष्णसार (काले मृग) के विषय में कभी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है और कभी उससे भिन्न [अस्पष्ट] उपलब्धि होती है — इससे संशय उत्पन्न होता है कि क्या वही इन्द्रिय कार्य करती है या अन्य।
टिप्पणी: 'vyatiricya' (having excluded/set apart) is read as marking a second, distinguishable mode of perceiving the distant antelope (e.g. indistinct vs. clear); the exact perceptual contrast intended is not fully recoverable from the sutra alone.
श्लोक 3.33
महदणुग्रहणात् ॥ ३३ ॥
mahadaṇugrahaṇāt || 33 ||
क्योंकि वही [इन्द्रिय] महत् (बड़ी) और अणु (सूक्ष्म) — दोनों प्रकार की वस्तुओं का ग्रहण करती है।
श्लोक 3.34
रश्म्यर्थसंनिकर्षविशेषात्तद्ग्रहणम् ॥ ३४ ॥
raśmyarthasaṁnikarṣaviśeṣāttadgrahaṇam || 34 ||
[सिद्धान्त:] किरण और वस्तु के विशिष्ट संनिकर्ष (सम्पर्क) से ही वह ग्रहण होता है।
श्लोक 3.35
तदनुपलब्धेरहेतुः ॥ ३५ ॥
tadanupalabdherahetuḥ || 35 ||
[पूर्वपक्ष:] वह किरण उपलब्ध नहीं होती — अतः यह हेतु उचित नहीं है।
श्लोक 3.36
नानुमीयमानस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिरभावहेतुः ॥ ३६ ॥
nānumīyamānasya pratyakṣato'nupalabdhirabhāvahetuḥ || 36 ||
[सिद्धान्त:] ऐसा नहीं है — जो वस्तु अनुमान से सिद्ध होती है, उसकी प्रत्यक्ष से अनुपलब्धि उसके अभाव का हेतु नहीं बन सकती।
श्लोक 3.37
द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोपलब्धिनियमः ॥ ३७ ॥
dravyaguṇadharmabhedāccopalabdhiniyamaḥ || 37 ||
और द्रव्य, गुण तथा धर्म के भेद से उपलब्धि का नियम भी सिद्ध होता है।
श्लोक 3.38
अनेकद्रव्यसमवायाद्रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ॥ ३८ ॥
anekadravyasamavāyādrūpaviśeṣācca rūpopalabdhiḥ || 38 ||
अनेक द्रव्यों के समवाय तथा विशिष्ट रूप के कारण ही रूप की उपलब्धि होती है।
श्लोक 3.39
कर्मकारितश्चेन्द्रियाणां व्यूहः पुरुषार्थतन्त्रः ॥ ३९ ॥
karmakāritaścendriyāṇāṁ vyūhaḥ puruṣārthatantraḥ || 39 ||
और इन्द्रियों का व्यूह (संचालन) कर्म (गति) द्वारा किया जाता है, जो पुरुषार्थ के अधीन है।
श्लोक 3.40
मध्यन्दिनोल्काप्रकाशानुपलब्धिवत्तदनुपलब्धिः ॥ ४० ॥
madhyandinolkāprakāśānupalabdhivattadanupalabdhiḥ || 40 ||
जैसे मध्याह्न में उल्का (अग्नि-शिखा) का प्रकाश उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही उस [किरण] की अनुपलब्धि है।
श्लोक 3.41
न रात्रावप्यनुपलब्धेः ॥ ४१ ॥
na rātrāvapyanupalabdheḥ || 41 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है, क्योंकि रात्रि में भी उसकी अनुपलब्धि होती है।
श्लोक 3.42
वाह्यप्रकाशानुग्रहाद्विषयोपलब्धेरनभिव्यक्तितोऽनुपलब्धिः ॥ ४२ ॥
vāhyaprakāśānugrahādviṣayopalabdheranabhivyaktito'nupalabdhiḥ || 42 ||
[सिद्धान्त:] बाह्य प्रकाश की सहायता से ही विषय की उपलब्धि होती है, अतः रात्रि में सहायक प्रकाश के अभाव में किरण के अनभिव्यक्त रहने से उसकी अनुपलब्धि होती है।
श्लोक 3.43
अभिव्यक्तौ चाभिभवात् ॥ ४३ ॥
abhivyaktau cābhibhavāt || 43 ||
और अभिव्यक्ति होने पर भी वह तीव्रतर प्रकाश द्वारा अभिभूत हो जाती है [अतः दृष्ट नहीं होती]।
श्लोक 3.44
नक्तञ्चरनयनरश्मिदर्शनाच्च ॥ ४४ ॥
naktañcaranayanaraśmidarśanācca || 44 ||
और नक्तंचर (रात्रिचर) प्राणियों के नेत्रों की किरण प्रत्यक्ष देखी जाती है।
श्लोक 3.45
अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ॥ ४५ ॥
aprāpyagrahaṇaṁ kācābhrapaṭalasphaṭikāntaritopalabdheḥ || 45 ||
काच, अभ्रपटल (अभ्रक की पर्त) और स्फटिक से व्यवहित वस्तुओं की भी उपलब्धि होती है — अतः ग्रहण अप्राप्य (सम्पर्क के बिना) भी सम्भव है।
श्लोक 3.46
कुड्यान्तरितानुपलब्धेरप्रतिषेधः ॥ ४६ ॥
kuḍyāntaritānupalabdherapratiṣedhaḥ || 46 ||
[सिद्धान्त:] इसका प्रतिषेध नहीं होता, क्योंकि कुड्य (दीवार) से व्यवहित वस्तु की अनुपलब्धि होती है [अतः सम्पर्क आवश्यक है; काच आदि पारदर्शी होने से अपवाद हैं]।
श्लोक 3.47
अप्रतिघातात्संनिकर्षोपपत्तिः ॥ ४७ ॥
apratighātātsaṁnikarṣopapattiḥ || 47 ||
अप्रतिघात (अवरोध का अभाव) होने से काच आदि पारदर्शी पदार्थों में भी संनिकर्ष उपपन्न (सिद्ध) होता है।
श्लोक 3.48
आदित्यरश्मेः स्फटिकान्तरेऽपि दाह्येऽविघातात् ॥ ४८ ॥
ādityaraśmeḥ sphaṭikāntare'pi dāhye'vighātāt || 48 ||
क्योंकि आदित्य (सूर्य) की किरण स्फटिक के व्यवधान में भी दाह्य वस्तु को जलाने में अविघातित रहती है।
श्लोक 3.49
नेतरेतरधर्मप्रसङ्गात् ॥ ४९ ॥
netaretaradharmaprasaṅgāt || 49 ||
[आक्षेप:] ऐसा नहीं है — क्योंकि अन्यथा इतरेतर (परस्पर) धर्मों के अनुचित प्रसंग की आपत्ति होगी।
टिप्पणी: 'itaretaradharmaprasaṅgāt' does not name which two things' properties would wrongly cross over; most plausibly this anticipates the mirror/water reflection case of sutra 50 (object and reflecting surface), but the referent is left implicit in the sutra.
श्लोक 3.50
आदर्शोदकयोः प्रसादस्वाभाव्याद्रूपोपलब्धिवत्तदुपलब्धिः ॥ ५० ॥
ādarśodakayoḥ prasādasvābhāvyādrūpopalabdhivattadupalabdhiḥ || 50 ||
दर्पण और जल में स्वाभाविक प्रसाद (स्वच्छता) होने से, सामान्य रूप-उपलब्धि के समान ही उस प्रतिबिम्ब की उपलब्धि होती है।
श्लोक 3.51
दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ ५१ ॥
dṛṣṭānumitānāṁ niyogapratiṣedhānupapattiḥ || 51 ||
दृष्ट और अनुमित पदार्थों के विषय में किसी एक ही व्याख्या का सर्वथा नियोग अथवा प्रतिषेध उपपन्न नहीं होता।
श्लोक 3.52
स्थानान्यत्वे नानात्वादवयविनानास्थानत्वाच्च संशयः ॥ ५२ ॥
sthānānyatve nānātvādavayavinānāsthānatvācca saṁśayaḥ || 52 ||
स्थान भिन्न-भिन्न होने से नानात्व (बहुत्व) की आशंका होती है, तथा अवयवी (समग्र शरीर) के भी नाना स्थानों में होने से संशय उत्पन्न होता है कि स्पर्शेन्द्रिय एक है या अनेक।
टिप्पणी: The compound sthānānyatve nānātvādavayavinānāsthānatvāt is dense and admits more than one parsing; rendered as presenting two grounds for doubt (multiplicity of touch-loci vs. the single composite body spanning those loci), following the section's overall question of whether touch is one organ or several.
श्लोक 3.53
त्वगव्यतिरेकात् ॥ ५३ ॥
tvagavyatirekāt || 53 ||
[स्पर्शेन्द्रिय एक ही है,] क्योंकि वह त्वचा से अव्यतिरिक्त (अभिन्न) है।
श्लोक 3.54
न युगपदर्थानुपलब्धेः ॥ ५४ ॥
na yugapadarthānupalabdheḥ || 54 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि युगपत् (एक साथ) भिन्न-भिन्न स्थानों की वस्तुओं की उपलब्धि नहीं होती।
टिप्पणी: The direction of this objection against sutra 53's 'one organ' view is inferred from context (a single organ should register simultaneous, spatially separate contacts, but does not); the sutra itself gives only the bare hetu.
श्लोक 3.55
विप्रतिषेधाच्च न त्वगेका ॥ ५५ ॥
vipratiṣedhācca na tvagekā || 55 ||
और इस विप्रतिषेध (विरोध) के कारण त्वचा (स्पर्शेन्द्रिय) एक नहीं है।
श्लोक 3.56
इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् ॥ ५६ ॥
indriyārthapañcatvāt || 56 ||
[सिद्धान्त:] इन्द्रिय और उनके विषय पाँच-पाँच होने से [स्पर्श भी पाँच इन्द्रियों में से एक ही है]।
श्लोक 3.57
न तदर्थबहुत्वात् ॥ ५७ ॥
na tadarthabahutvāt || 57 ||
यह एक ही इन्द्रिय-मात्र नहीं हो सकती, क्योंकि उसके विषयों की बहुलता है।
श्लोक 3.58
गन्धत्वाद्यव्यतिरेकाद्गन्धादीनामप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥
gandhatvādyavyatirekādgandhādīnāmapratiṣedhaḥ || 58 ||
गन्धत्व आदि के अव्यतिरेक (अविभाज्य सम्बन्ध) से ही गन्ध आदि पृथक्-पृथक् गुणों का प्रतिषेध नहीं हो सकता।
श्लोक 3.59
विषयत्वाव्यतिरेकादेकत्वम् ॥ ५९ ॥
viṣayatvāvyatirekādekatvam || 59 ||
विषयत्व के अव्यतिरेक से ही प्रत्येक इन्द्रिय की अपने विषय में एकत्व सिद्ध होती है।
श्लोक 3.60
न बुद्धिलक्षणाधिष्ठानगत्याकृतिजातिपञ्चत्वेभ्यः ॥ ६० ॥
na buddhilakṣaṇādhiṣṭhānagatyākṛtijātipañcatvebhyaḥ || 60 ||
[पूर्वपक्ष:] बुद्धि, लक्षण, अधिष्ठान, गति, आकृति और जाति के पाञ्चत्व (पाँच होने) मात्र से इन्द्रियों का पाञ्चत्व सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 3.61
भूतगुणविशेषोपलब्धेस्तादात्म्यम् ॥ ६१ ॥
bhūtaguṇaviśeṣopalabdhestādātmyam || 61 ||
[सिद्धान्त:] भूतों के विशिष्ट गुण की उपलब्धि होने से प्रत्येक इन्द्रिय का अपने-अपने भूत से तादात्म्य (एकत्व) सिद्ध होता है।
श्लोक 3.62
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दानां स्पर्शपर्यन्ताः पृथिव्याः ॥ ६२ ॥
gandharasarūpasparśaśabdānāṁ sparśaparyantāḥ pṛthivyāḥ || 62 ||
गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द — इनमें स्पर्श-पर्यन्त (स्पर्श तक के) गुण पृथ्वी के हैं।
श्लोक 3.63
अप्तेजोवायूनां पूर्वं पूर्वमपोह्याकाशस्योत्तरः ॥ ६३ ॥
aptejovāyūnāṁ pūrvaṁ pūrvamapohyākāśasyottaraḥ || 63 ||
जल, तेज और वायु में क्रमशः पूर्व-पूर्व गुण का अपोहन (लोप) होता जाता है; तथा अन्तिम गुण (शब्द) आकाश का है।
श्लोक 3.64
न सर्वगुणानुपलब्धेः ॥ ६४ ॥
na sarvaguṇānupalabdheḥ || 64 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि सभी गुणों की उपलब्धि सर्वत्र नहीं होती।
श्लोक 3.65
एकैकश्येनोत्तरोत्तरगुणसद्भावादुत्तरोत्तराणां तदनुपलब्धिः ॥ ६५ ॥
ekaikaśyenottarottaraguṇasadbhāvāduttarottarāṇāṁ tadanupalabdhiḥ || 65 ||
[सिद्धान्त:] एक-एक करके उत्तरोत्तर गुणों का सद्भाव होने से ही उत्तरोत्तर भूतों में उस पूर्व गुण की पृथक् अनुपलब्धि होती है।
टिप्पणी: ekaikaśyenottarottaraguṇasadbhāvāduttarottarāṇāṁ tadanupalabdhiḥ is highly compressed; the reading offered (that qualities accumulate across elements, blurring exclusive perception of any single one) follows the immediate context but is an interpretive reconstruction.
श्लोक 3.66
विष्टं ह्यपरम्परेण ॥ ६६ ॥
viṣṭaṁ hyaparampareṇa || 66 ||
क्योंकि प्रत्येक गुण अपने-अपने भूत में परम्परा से नहीं, अपितु प्रत्यक्ष रूप से ही विष्ट (व्याप्त) है।
टिप्पणी: viṣṭaṁ hyaparampareṇa is a very terse closing remark for the 64-65 exchange; rendered as affirming that each element's quality inheres in it directly rather than via an indirect chain, but the sutra gives no further specification.
श्लोक 3.67
न पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् ॥ ६७ ॥
na pārthivāpyayoḥ pratyakṣatvāt || 67 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि पार्थिव और आप्य दोनों ही प्रत्यक्ष हैं।
श्लोक 3.68
पूर्वपूर्वगुणोत्कर्षात्तत्तत्प्रधानम् ॥ ६८ ॥
pūrvapūrvaguṇotkarṣāttattatpradhānam || 68 ||
[सिद्धान्त:] पूर्व-पूर्व गुण के उत्कर्ष (आधिक्य) से ही वह-वह भूत प्रधान कहा जाता है।
श्लोक 3.69
तद्व्यवस्थानं तु भूयस्त्वात् ॥ ६९ ॥
tadvyavasthānaṁ tu bhūyastvāt || 69 ||
किन्तु वह व्यवस्था (वर्गीकरण) भूयस्त्व (आधिक्य) के आधार पर ही है, न कि केवल-भाव के आधार पर।
श्लोक 3.70
सगुणानामिन्द्रियभावात् ॥ ७० ॥
saguṇānāmindriyabhāvāt || 70 ||
क्योंकि उन-उन गुणों वाले भूत ही इन्द्रिय-रूप में परिणत होते हैं।
श्लोक 3.71
तेनैव तस्याग्रहणाच्च ॥ ७१ ॥
tenaiva tasyāgrahaṇācca || 71 ||
और उसी [निम्नतर भूत की] इन्द्रिय द्वारा उस [उच्चतर भूत के] गुण का ग्रहण नहीं होता।
श्लोक 3.72
न शब्दगुणोपलब्धेः ॥ ७२ ॥
na śabdaguṇopalabdheḥ || 72 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि शब्द अन्य द्रव्यों के भी गुण के रूप में उपलब्ध होता है।
श्लोक 3.73
तदुपलब्धिरितरेतरद्रव्यगुणवैधर्म्यात् ॥ ७३ ॥
tadupalabdhiritaretaradravyaguṇavaidharmyāt || 73 ||
[सिद्धान्त:] वह उपलब्धि इतरेतर द्रव्यों और उनके गुणों के वैधर्म्य (भिन्न धर्म) के कारण होती है [वस्तुतः शब्द आकाश का ही असाधारण गुण है]।
श्लोक 3.74
कर्माकाशसाधर्म्यात्संशयः ॥ १ ॥
karmākāśasādharmyātsaṁśayaḥ || 1 ||
आकाश के साथ साधर्म्य (समानता) के कारण कर्म (गति) के विषय में संशय होता है — अर्थात् क्या गति भी आकाश की भाँति प्रत्यक्ष से नहीं अपितु केवल अनुमान से ही जानी जाती है।
श्लोक 3.75
विषयप्रत्यभिज्ञानात् ॥ २ ॥
viṣayapratyabhijñānāt || 2 ||
विषय के प्रत्यभिज्ञान (यह वही वस्तु है, ऐसा पुनः पहचानना) के कारण यह संशय दूर हो जाता है — गतिमान वस्तु को हम प्रत्यभिज्ञान द्वारा ही उसी वस्तु के रूप में ग्रहण करते हैं, केवल अनुमान से नहीं।
श्लोक 3.76
साध्यसमत्वादहेतुः ॥ ३ ॥
sādhyasamatvādahetuḥ || 3 ||
[आक्षेप:] यह प्रत्यभिज्ञान का आश्रय लेना युक्तियुक्त हेतु नहीं है, क्योंकि यह स्वयं साध्यसम है, अर्थात् जो सिद्ध करना है वही स्वयं अप्रमाणित रहकर हेतु बनाया जा रहा है।
श्लोक 3.77
न युगपदग्रहणात् ॥ ४ ॥
na yugapadagrahaṇāt || 4 ||
[उत्तर:] नहीं, क्योंकि गतिमान वस्तु की क्रमिक अवस्थाएँ एक साथ (युगपत्) गृहीत नहीं होतीं; अतः युगपद्-ग्रहण का अभाव मात्र वस्तु की निरंतरता को असिद्ध नहीं करता।
श्लोक 3.78
अप्रत्यभिज्ञाने च विनाशप्रसङ्गः ॥ ५ ॥
apratyabhijñāne ca vināśaprasaṅgaḥ || 5 ||
और यदि प्रत्यभिज्ञान को अप्रामाणिक मानकर अस्वीकार किया जाए, तो यह अनिष्ट प्रसंग होगा कि वस्तु को प्रत्येक क्षण नष्ट हुआ मानना पड़ेगा।
श्लोक 3.79
क्रमवृत्तित्वादयुगपद्ग्रहणम् ॥ ६ ॥
kramavṛttitvādayugapadgrahaṇam || 6 ||
वस्तु की क्रमिक अवस्थाओं का युगपत् (एक साथ) गृहीत न होना केवल इसलिए है कि गति क्रमवृत्ति (क्रमशः होने वाली) है — इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वस्तु स्वयं क्षण-क्षण भिन्न है।
श्लोक 3.80
अप्रत्यभिज्ञानञ्च विषयान्तरव्यासङ्गात् ॥ ७ ॥
apratyabhijñānañca viṣayāntaravyāsaṅgāt || 7 ||
और कहीं-कहीं प्रत्यभिज्ञान का न होना विषयान्तर में मन के व्यासक्त (उलझे) होने के कारण है, न कि इसलिए कि वस्तु वास्तव में नष्ट हो गई हो।
श्लोक 3.81
न गत्यभावात् ॥ ८ ॥
na gatyabhāvāt || 8 ||
नहीं, क्योंकि पूर्व और उत्तर अवस्थाओं के बीच गति का अभाव नहीं है, अर्थात् संगति निरंतर बनी रहती है।
श्लोक 3.82
स्फटिकान्यत्वाभिमानवत्तदन्यत्वाभिमानः ॥ ९ ॥
sphaṭikānyatvābhimānavattadanyatvābhimānaḥ || 9 ||
यह कहा जा सकता है कि प्रतीत होने वाला भेद भ्रम है — जैसे स्फटिक को 'भिन्न' मान लेने का अभिमान (भ्रम) होता है, जबकि वह वही स्फटिक रहता है और केवल उसका प्रतिबिम्ब बदलता है, वैसे ही अन्यत्र भी 'भिन्नता' का अभिमान हो सकता है।
टिप्पणी: The dialectical attribution of sutras 9-10 (whether 9 gives the Nyaya's own illusion-analogy defending persistence, or merely sets up a premise) cannot be fully fixed without the Vātsyāyana-bhāṣya; rendered here on the standard reading, with sutra 10 as the Buddhist/momentarist (kṣaṇikavādin) rejoinder that turns the crystal example against it.
श्लोक 3.83
स्फटिकेऽप्यपरापरोत्पत्तेः क्षणिकत्वाद्व्यक्तीनामहेतुः ॥ १० ॥
sphaṭike'pyaparāparotpatteḥ kṣaṇikatvādvyaktīnāmahetuḥ || 10 ||
[क्षणिकवादी का उत्तर:] स्फटिक के विषय में भी अपर-अपर (नित नए) व्यक्तियों की उत्पत्ति होती रहती है; उन व्यक्तियों के क्षणिक (क्षणिकत्व-युक्त) होने के कारण स्फटिक का यह दृष्टान्त वस्तु की स्थिरता सिद्ध करने का युक्तियुक्त हेतु नहीं है।
टिप्पणी: See note at sutra 9 — sutra 10 states the momentariness (kṣaṇikavāda) position that turns the crystal example against persistence; the reply proper follows at sutra 11.
श्लोक 3.84
नियमहेत्वभावाद्यथादर्शनमभ्यनुज्ञा ॥ ११ ॥
niyamahetvabhāvādyathādarśanamabhyanujñā || 11 ||
जब तक कोई नियामक हेतु (बाध्यकारी कारण) न हो, तब तक वस्तु को जैसी वह प्रत्यक्ष में दिखाई देती है वैसी ही मान लेना चाहिए — अर्थात् साधारण प्रत्यभिज्ञान को किसी अप्रमाणित क्षणिकत्व-सिद्धान्त के आधार पर अस्वीकार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 3.85
नोत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः ॥ १२ ॥
notpattivināśakāraṇopalabdheḥ || 12 ||
नहीं — क्योंकि वस्तु की उत्पत्ति और विनाश, दोनों के कारण वस्तुतः उपलब्ध (ज्ञात) होते हैं।
श्लोक 3.86
क्षीरविनाशे कारणानुपलब्धिवद्दध्युत्पत्तिवच्च तदुपपत्तिः ॥ १३ ॥
kṣīravināśe kāraṇānupalabdhivaddadhyutpattivacca tadupapattiḥ || 13 ||
दूध के विनाश में पृथक् कारण की जो अनुपलब्धि प्रतीत होती है, वह दही की उत्पत्ति के समान ही है — दोनों की उपपत्ति इसी एक परिणाम-प्रक्रिया से हो जाती है, पृथक् विनाश-कारण मानने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 3.87
लिङ्गतो ग्रहणान्नानुपलब्धिः ॥ १४ ॥
liṅgato grahaṇānnānupalabdhiḥ || 14 ||
चूँकि कारण लिङ्ग (अनुमान के चिह्न) द्वारा गृहीत हो जाता है, अतः उसकी अनुपलब्धि वास्तव में नहीं है।
श्लोक 3.88
न पयसः परिणामगुणान्तरप्रादुर्भावात् ॥ १५ ॥
na payasaḥ pariṇāmaguṇāntaraprādurbhāvāt || 15 ||
नहीं — दूध का सर्वथा नाश नहीं होता, अपितु परिणाम (रूपान्तरण) के द्वारा एक भिन्न गुण का ही प्रादुर्भाव होता है; द्रव्य की सातत्यता बनी रहती है, केवल गुण बदलता है।
श्लोक 3.89
व्यूहान्तराद्द्रव्यान्तरोत्पत्तिदर्शनं पूर्वद्रव्यनिवृत्तेरनुमानम् ॥ १६ ॥
vyūhāntarāddravyāntarotpattidarśanaṁ pūrvadravyanivṛtteranumānam || 16 ||
किसी भिन्न व्यूह (संरचना) से भिन्न द्रव्य की उत्पत्ति का दिखना ही पूर्व द्रव्य की निवृत्ति का अनुमान है — नए की उत्पत्ति ही पुराने के विनाश का प्रमाण एवं स्वरूप है।
श्लोक 3.90
क्वचिद्विनाशकारणानुपलब्धेः क्वचिच्चोपलब्धेरनेकान्तः ॥ १७ ॥
kvacidvināśakāraṇānupalabdheḥ kvaciccopalabdheranekāntaḥ || 17 ||
चूँकि कहीं विनाश का कारण उपलब्ध नहीं होता और कहीं उपलब्ध होता है, अतः इस विषय में कोई एकान्त (सर्वत्र लागू) नियम नहीं बनाया जा सकता — अनेकान्त ही स्थिति है।
श्लोक 3.91
नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात् ॥ १८ ॥
nendriyārthayostadvināśe'pi jñānāvasthānāt || 18 ||
इन्द्रिय और अर्थ (विषय) के लिए यह वैसा नहीं है — क्योंकि उनके संयोग के नष्ट हो जाने पर भी उत्पन्न ज्ञान कुछ काल तक अवस्थित (स्थिर) रहता है।
श्लोक 3.92
युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च न मनसः ॥ १९ ॥
yugapajjñeyānupalabdheśca na manasaḥ || 19 ||
और ज्ञेय (जानने योग्य) पदार्थ एक साथ गृहीत न होने से, इससे मात्र मनस् (अन्तःकरण, मन) की क्षणिकता सिद्ध नहीं होती।
श्लोक 3.93
तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम् ॥ २० ॥
tadātmaguṇatve'pi tulyam || 20 ||
यदि इसे (ज्ञान को) आत्मा का गुण भी मान लिया जाए, तब भी स्थिति तुल्य (समान) ही रहती है — कठिनाई दूर नहीं होती।
श्लोक 3.94
इन्द्रियैर्मनसः संनिकर्षाभावात्तदनुत्पत्तिः ॥ २१ ॥
indriyairmanasaḥ saṁnikarṣābhāvāttadanutpattiḥ || 21 ||
इन्द्रियों के साथ मनस् के संनिकर्ष (संयोग) के अभाव के कारण ज्ञान की युगपत् उत्पत्ति नहीं होती — मनस् एक समय में एक ही इन्द्रिय से संयुक्त हो सकता है।
श्लोक 3.95
नोत्पत्तिकारणानपदेशात् ॥ २२ ॥
notpattikāraṇānapadeśāt || 22 ||
नहीं — क्योंकि इसकी उत्पत्ति का कोई कारण निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता।
श्लोक 3.96
विनाशकारणानुपलब्धेश्चावस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः ॥ २३ ॥
vināśakāraṇānupalabdheścāvasthāne tannityatvaprasaṅgaḥ || 23 ||
और विनाश के कारण की अनुपलब्धि होने पर, यदि वस्तु को सदा अवस्थित मान लिया जाए, तो उसे नित्य मानने का अनिष्ट प्रसंग उपस्थित होगा।
श्लोक 3.97
अनित्यत्वग्रहाद्बुद्धेर्बुद्ध्यन्तराद्विनाशः शब्दवत् ॥ २४ ॥
anityatvagrahādbuddherbuddhyantarādvināśaḥ śabdavat || 24 ||
बुद्धि (ज्ञान) की अनित्यता प्रत्यक्षतः गृहीत होने से, उसका विनाश उत्तरवर्ती बुद्धि (अगले ज्ञान) के उत्पन्न होने से होता है — जैसे शब्द (ध्वनि) के विषय में होता है।
श्लोक 3.98
ज्ञानसमवेतात्मप्रदेशसंनिकर्षान्मनसः स्मृत्युत्पत्तेर्न युगपदुत्पत्तिः ॥ २५ ॥
jñānasamavetātmapradeśasaṁnikarṣānmanasaḥ smṛtyutpatterna yugapadutpattiḥ || 25 ||
स्मृति उस आत्म-प्रदेश के साथ मनस् के संनिकर्ष से उत्पन्न होती है जिसमें पूर्व ज्ञान समवेत (अन्तर्निहित) है; अतः एक समय में एक ही संनिकर्ष सम्भव होने से स्मृतियों की युगपत् उत्पत्ति नहीं होती।
श्लोक 3.99
नान्तःशरीरवृत्तित्वान्मनसः ॥ २६ ॥
nāntaḥśarīravṛttitvānmanasaḥ || 26 ||
नहीं — यह नियम केवल इसलिए नहीं है कि मनस् शरीर के भीतर ही वृत्ति (क्रियाशील) रहता है।
श्लोक 3.100
साध्यत्वादहेतुः ॥ २७ ॥
sādhyatvādahetuḥ || 27 ||
वह कथन स्वयं साध्यसम होने से, युक्तियुक्त हेतु नहीं बन सकता।
श्लोक 3.101
स्मरतः शरीरधारणोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २८ ॥
smarataḥ śarīradhāraṇopapatterapratiṣedhaḥ || 28 ||
इसमें कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि यह उपपन्न (सिद्ध) है कि स्मरण करने वाला उसी के द्वारा शरीर का धारण (पालन) करता है।
श्लोक 3.102
न तदाशुगतित्वान्मनसः ॥ २९ ॥
na tadāśugatitvānmanasaḥ || 29 ||
नहीं — मनस् के अत्यन्त शीघ्रगामी (आशुगामी) होने के कारण उसे स्मृति का कारण न मानने की आपत्ति उचित नहीं है।
श्लोक 3.103
न स्मरणकालानियमात् ॥ ३० ॥
na smaraṇakālāniyamāt || 30 ||
नहीं — स्मरण के काल में अनियमितता (अनियम) के आधार पर की गई आपत्ति भी उचित नहीं है।
श्लोक 3.104
आत्मप्रेरणयदृच्छाज्ञताभिश्च न संयोगविशेषः ॥ ३१ ॥
ātmapreraṇayadṛcchājñatābhiśca na saṁyogaviśeṣaḥ || 31 ||
और आत्मा की स्वेच्छा-प्रेरणा, यदृच्छा (आकस्मिकता), अथवा अज्ञता — ये कोई विशेष (नियामक) संयोग नहीं हैं जो स्मृति के होने-न-होने का यथार्थ कारण बताएँ।
श्लोक 3.105
व्यासक्तमनसः पादव्यथनेन संयोगविशेषेण समानम् ॥ ३२ ॥
vyāsaktamanasaḥ pādavyathanena saṁyogaviśeṣeṇa samānam || 32 ||
इसके विपरीत, यह उस पुरुष के समान है जिसका मन कहीं और व्यासक्त (तल्लीन) होने से पैर की चोट का भी बोध नहीं होता — वहाँ भी एक विशेष परिस्थिति, अर्थात् मन का अन्यत्र संलग्न होना, ही कारण है।
श्लोक 3.106
प्रणिधानलिङ्गादिज्ञानानामयुगपद्भावादयुगपत्स्मरणम् ॥ ३३ ॥
praṇidhānaliṅgādijñānānāmayugapadbhāvādayugapatsmaraṇam || 33 ||
प्रणिधान (एकाग्रता), लिङ्ग (चिह्न) आदि ज्ञान एक साथ न होने के कारण, स्मरण भी युगपत् नहीं अपितु क्रमशः होता है।
श्लोक 3.107
ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्तत्वादारम्भनिवृत्त्योः ॥ ३४ ॥
jñasyecchādveṣanimittatvādārambhanivṛttyoḥ || 34 ||
क्योंकि ज्ञ (जानने वाले आत्मा) के लिए इच्छा और द्वेष ही आरम्भ (प्रवृत्ति) तथा निवृत्ति के निमित्त कारण हैं।
श्लोक 3.108
तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः ॥ ३५ ॥
talliṅgatvādicchādveṣayoḥ pārthivādyeṣvapratiṣedhaḥ || 35 ||
चूँकि कर्म का आरम्भ और निवृत्ति इच्छा-द्वेष के लिङ्ग (सूचक चिह्न) हैं, अतः पार्थिव आदि (भौतिक शरीरधारी) वस्तुओं में भी इच्छा-द्वेष का अनुमान करने में कोई आपत्ति नहीं है।
टिप्पणी: 'pārthivādi' (things made of earth) most plausibly refers here to physical, embodied beings rather than literal inert matter, but the precise referent is not fully recoverable without the bhāṣya; translated conservatively with a bracketed gloss.
श्लोक 3.109
परश्वादिष्वारम्भनिवृत्तिदर्शनात् ॥ ३६ ॥
paraśvādiṣvārambhanivṛttidarśanāt || 36 ||
[आक्षेप:] क्योंकि कुठार (कुल्हाड़ी) आदि में भी कर्म का आरम्भ और निवृत्ति देखी जाती है, जिनमें इच्छा-द्वेष सम्भव ही नहीं।
श्लोक 3.110
नियमानियमौ तु तद्विशेषकौ ॥ ३७ ॥
niyamāniyamau tu tadviśeṣakau || 37 ||
[उत्तर:] अपितु नियम और अनियम ही इन दोनों (कर्ता एवं करण) में भेदक हैं — कर्ता का कर्म इच्छा-द्वेष के अनुरूप नियमित होता है, जबकि कुठार जैसे करण का कर्म केवल दूसरे के चलाने पर ही होता है, अतः अनियमित है।
श्लोक 3.111
यथोक्तहेतुत्वात्पारतन्त्र्यादकृताभ्यागमाच्च न मनसः ॥ ३८ ॥
yathoktahetutvātpāratantryādakṛtābhyāgamācca na manasaḥ || 38 ||
पूर्वोक्त हेतु (इच्छा-द्वेष) के होने से, तथा करण के पारतन्त्र्य (परायत्तता) के कारण, और अन्यथा अकृताभ्यागम — अर्थात् बिना किए हुए कर्म के फल का आगमन — नामक दोष के प्रसंग से, कर्म का आरम्भ-निवृत्ति केवल मनस् के कारण नहीं है, अपितु इच्छा-द्वेषयुक्त कर्ता के कारण है।
श्लोक 3.112
परिशेषाद्यथोक्तहेतूपपत्तेश्च ॥ ३९ ॥
pariśeṣādyathoktahetūpapatteśca || 39 ||
और परिशेष (अन्य सम्भावनाओं के निराकरण) से पूर्वोक्त हेतु, इच्छा-द्वेष, ही सिद्ध होता है।
श्लोक 3.113
स्मरणं त्वात्मनो ज्ञस्वाभाव्यात् ॥ ४० ॥
smaraṇaṁ tvātmano jñasvābhāvyāt || 40 ||
स्मरण तो आत्मा के ज्ञ-स्वभाव (जानने वाले स्वभाव) से ही होता है — उपयुक्त निमित्तों के सहयोग से स्मरण करना चेतन आत्मा का स्वाभाविक धर्म है।
श्लोक 3.114
प्रणिधाननिबन्धाभ्यासलिङ्गलक्षणसादृश्यपरिग्रहाश्रयाश्रितसम्बन्धानन्तर्यवियोगैककार्यविरोधातिशयप्राप्तिव्यवधानसुखदुःखेच्छाद्वेषभयार्थित्वक्रियारागधर्माधर्मनिमित्तेभ्यः ॥ ४१ ॥
praṇidhānanibandhābhyāsaliṅgalakṣaṇasādṛśyaparigrahāśrayāśritasambandhānantaryaviyogaikakāryavirodhātiśayaprāptivyavadhānasukhaduḥkhecchādveṣabhayārthitvakriyārāgadharmādharmanimittebhyaḥ || 41 ||
स्मृति निम्नलिखित निमित्तों (कारणों) से उत्पन्न होती है: (१) प्रणिधान (एकाग्र ध्यान), (२) निबन्ध (दृढ़ सम्बद्धता), (३) अभ्यास (बार-बार का अभ्यास), (४) लिङ्ग (अनुमान-चिह्न), (५) लक्षण (पहचान का चिह्न), (६) सादृश्य (समानता), (७) परिग्रह (स्वामित्व/ग्रहण), (८) आश्रय-आश्रित सम्बन्ध (आधार और आधेय का सम्बन्ध), (९) सम्बन्ध (अन्य प्रकार का सम्बन्ध), (१०) आनन्तर्य (तुरन्त बाद होना), (११) वियोग (बिछोह), (१२) एककार्य (समान कार्य करना), (१३) विरोध (परस्पर विरोध), (१४) अतिशय (विशेषता/आधिक्य), (१५) प्राप्ति (लाभ), (१६) व्यवधान (बीच में रुकावट), (१७) सुख-दुःख, (१८) इच्छा-द्वेष, (१९) भय, (२०) अर्थित्व (किसी वस्तु की चाह), (२१) क्रिया, (२२) राग (आसक्ति), और (२३) धर्म-अधर्म (पुण्य-पाप)।
टिप्पणी: This is a single, very long enumerative sūtra (one large compound) giving the classical Nyaya list of ~23 causes (nimitta) of smṛti (memory) — the locus later treatises draw on for their theory of memory. Rendered here as a numbered list in both languages rather than compressed, per the translation brief.
श्लोक 3.115
कर्मानवस्थायिग्रहणात् ॥ ४२ ॥
karmānavasthāyigrahaṇāt || 42 ||
क्योंकि कर्म (गति) अनवस्थायी (अस्थिर, क्षण-क्षण बदलने वाला) रूप में ही गृहीत होता है।
श्लोक 3.116
अव्यक्तग्रहणमनवस्थायित्वाद्विद्युत्सम्पाते रूपाव्यक्तग्रहणवत् ॥ ४३ ॥
avyaktagrahaṇamanavasthāyitvādvidyutsampāte rūpāvyaktagrahaṇavat || 43 ||
ऐसी क्षणभंगुर वस्तु का ग्रहण अनवस्थायित्व (अस्थिरता) के कारण अव्यक्त (अस्पष्ट) होता है — जैसे बिजली की चमक में रूप का ग्रहण अस्पष्ट होता है।
श्लोक 3.117
हेतूपादानात्प्रतिषेद्धव्याभ्यनुज्ञा ॥ ४४ ॥
hetūpādānātpratiṣeddhavyābhyanujñā || 44 ||
परन्तु इसी हेतु को अपनाने से वादी उसी बात को स्वीकार कर लेता है जिसका उसने निषेध करना चाहा था।
श्लोक 3.118
प्रदीपार्चिःसंतत्यभिव्यक्तग्रहणवत्तद्ग्रहणम् ॥ ४५ ॥
pradīpārciḥsaṁtatyabhivyaktagrahaṇavattadgrahaṇam || 45 ||
उसका ग्रहण वैसा ही है जैसा दीपक की अर्चि (शिखा) की संतति (निरंतर धारा) का स्पष्ट रूप से प्रकट होने वाला ग्रहण होता है — जो वस्तुतः क्षण-क्षण नई ज्वालाओं की शृंखला होकर भी एक अखण्ड ज्योति के रूप में सही ढंग से प्रतीत होती है।
श्लोक 3.119
द्रव्ये स्वगुणपरगुणोपलब्धेः संशयः ॥ ४६ ॥
dravye svaguṇaparaguṇopalabdheḥ saṁśayaḥ || 46 ||
किसी द्रव्य में स्वगुण (अपने गुण) और परगुण (दूसरे के गुण), दोनों की उपलब्धि होती प्रतीत होने के कारण संशय उत्पन्न होता है।
श्लोक 3.120
यावच्छरीरभावित्वाद्रूपादीनाम् ॥ ४७ ॥
yāvaccharīrabhāvitvādrūpādīnām || 47 ||
क्योंकि रूप आदि गुण शरीर के रहने तक (यावच्छरीर) बने रहते हैं।
श्लोक 3.121
न पाकजगुणान्तरोत्पत्तेः ॥ ४८ ॥
na pākajaguṇāntarotpatteḥ || 48 ||
नहीं — वे शरीर के सदा एक-से बने रहने वाले गुण मात्र नहीं हैं, क्योंकि पाक (ताप-परिणाम) से भिन्न नए गुणों की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 3.122
प्रतिद्वन्द्विसिद्धेः पाकजानामप्रतिषेधः ॥ ४९ ॥
pratidvandvisiddheḥ pākajānāmapratiṣedhaḥ || 49 ||
चूँकि प्रत्येक नया पाकज गुण अपने प्रतिद्वन्द्वी (पूर्व गुण) का निराकरण करके ही सिद्ध होता है, अतः पाकज गुणों की वास्तविकता में कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 3.123
शरीरव्यापित्वात् ॥ ५० ॥
śarīravyāpitvāt || 50 ||
क्योंकि वह सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है।
श्लोक 3.124
न केशनखादिष्वनुपलब्धेः ॥ ५१ ॥
na keśanakhādiṣvanupalabdheḥ || 51 ||
नहीं — यह सर्वत्र समान रूप से व्याप्त नहीं है, क्योंकि केश, नख आदि में इसकी उपलब्धि नहीं होती।
श्लोक 3.125
त्वक्पर्यन्तत्वाच्छरीरस्य केशनखादिष्वप्रसङ्गः ॥ ५२ ॥
tvakparyantatvāccharīrasya keśanakhādiṣvaprasaṅgaḥ || 52 ||
चूँकि सजीव, संवेदनशील शरीर त्वचा तक ही सीमित है, अतः केश-नख आदि के विषय में कोई प्रसंग-दोष नहीं है — वे शरीर के बाहर माने जाते हैं।
श्लोक 3.126
शरीरगुणवैधर्म्यात् ॥ ५३ ॥
śarīraguṇavaidharmyāt || 53 ||
शरीर के गुणों से इसकी विजातीयता (भिन्न प्रकृति) होने के कारण।
श्लोक 3.127
न रूपादीनामितरेतरवैधर्म्यात् ॥ ५४ ॥
na rūpādīnāmitaretaravaidharmyāt || 54 ||
नहीं — केवल विजातीयता से यह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि रूप आदि गुण भी परस्पर एक-दूसरे से विजातीय हैं, फिर भी वे सब एक ही वर्ग में गिने जाते हैं।
श्लोक 3.128
ऐन्द्रियकत्वाद्रूपादीनामप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥
aindriyakatvādrūpādīnāmapratiṣedhaḥ || 55 ||
चूँकि रूप आदि ऐन्द्रियक (इन्द्रियगोचर) हैं, अतः उन्हें उसी रूप में मानने में कोई आपत्ति नहीं है।
श्लोक 3.129
ज्ञानायौगपद्यादेकं मनः ॥ ५६ ॥
jñānāyaugapadyādekaṁ manaḥ || 56 ||
ज्ञानों की अयौगपद्य (असमकालीनता) के कारण मनस् एक (एकमात्र) है।
श्लोक 3.130
न युगपदनेकक्रियोपलब्धेः ॥ ५७ ॥
na yugapadanekakriyopalabdheḥ || 57 ||
[आक्षेप:] नहीं, इससे मनस् की एकता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि अनेक क्रियाएँ युगपत् (एक साथ) होती हुई देखी जाती हैं।
श्लोक 3.131
अलातचक्रदर्शनवत्तदुपलब्धिराशुसंचारात् ॥ ५८ ॥
alātacakradarśanavattadupalabdhirāśusaṁcārāt || 58 ||
[उत्तर:] वह युगपत् प्रतीत होने वाली उपलब्धि अलातचक्र (घुमाए गए अंगारे के चक्र) के दर्शन के समान है — जो आशु संचार (अत्यन्त तीव्र गति) के कारण भ्रमवश उत्पन्न होती है; वस्तुतः क्रिया क्रमिक ही रहती है।
श्लोक 3.132
यथोक्तहेतुत्वाच्चाणु ॥ ५९ ॥
yathoktahetutvāccāṇu || 59 ||
और उपर्युक्त हेतु के कारण ही मनस् अणु (परिमाण में सूक्ष्मतम, निरवयव) है।
श्लोक 3.133
पूर्वकृतफलानुबन्धात्तदुत्पत्तिः ॥ ६० ॥
pūrvakṛtaphalānubandhāttadutpattiḥ || 60 ||
इसकी (मनस् की) उत्पत्ति पूर्वकृत कर्मों के फल के अनुबन्ध (सम्बन्ध) से होती है, अर्थात् पूर्वजन्म के कर्मों (कर्माशय) के कारण।
श्लोक 3.134
भूतेभ्यो मूर्त्युपादानवत्तदुपादानम् ॥ ६१ ॥
bhūtebhyo mūrtyupādānavattadupādānam || 61 ||
[विचारणीय मत:] जैसे शरीर की मूर्ति (आकृति) भूतों (पंचमहाभूतों) से उपादित होती है, वैसे ही मनस् का भी उपादान भूतों से हो सकता है — ऐसा माना जा सकता है।
श्लोक 3.135
न साध्यसमत्वात् ॥ ६२ ॥
na sādhyasamatvāt || 62 ||
नहीं — क्योंकि यह मत स्वयं साध्यसम है, अर्थात् जो सिद्ध करना है उसे ही अप्रमाणित रूप से मान लिया गया है।
श्लोक 3.136
नोत्पत्तिनिमित्तत्वान्मातापित्रोः ॥ ६३ ॥
notpattinimittatvānmātāpitroḥ || 63 ||
नहीं — मनस् माता-पिता से उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि माता-पिता तो केवल शरीर की उत्पत्ति के निमित्त कारण हैं।
श्लोक 3.137
तथाहारस्य ॥ ६४ ॥
tathāhārasya || 64 ||
इसी प्रकार आहार (भोजन) से भी मनस् की उत्पत्ति नहीं होती।
श्लोक 3.138
प्राप्तौ चानियमात् ॥ ६५ ॥
prāptau cāniyamāt || 65 ||
और ये मत असिद्ध हैं, क्योंकि उनकी प्राप्ति (उपस्थिति) होने पर भी कोई नियत (अवश्यंभावी) सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 3.139
शरीरोत्पत्तिनिमित्तवत्संयोगोत्पत्तिनिमित्तं कर्म ॥ ६६ ॥
śarīrotpattinimittavatsaṁyogotpattinimittaṁ karma || 66 ||
जैसे शरीर की उत्पत्ति का एक निमित्त कारण होता है, वैसे ही कर्म (संचित पूर्वकर्म) आत्मा-मनस् के संयोग की उत्पत्ति का निमित्त कारण है।
श्लोक 3.140
एतेनानियमः प्रत्युक्तः ॥ ६७ ॥
etenāniyamaḥ pratyuktaḥ || 67 ||
इससे पूर्वोक्त अनियम (अनियमितता) की आपत्ति का प्रत्याख्यान (खण्डन) हो जाता है।
श्लोक 3.141
तददृष्टकारितमिति चेत्पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे ॥ ६८ ॥
tadadṛṣṭakāritamiti cetpunastatprasaṅgo'pavarge || 68 ||
यदि यह कहा जाए कि यह संयोग अदृष्ट (अदृश्य कर्मशक्ति) से ही होता है, तो अपवर्ग (मोक्ष) में भी वही अनिष्ट प्रसंग, अर्थात् संयोग का कभी न रुकना, उपस्थित होगा।
श्लोक 3.142
मनःकर्मनिमित्तत्वाच्च संयोगानुच्छेदः ॥ ६९ ॥
manaḥkarmanimittatvācca saṁyogānucchedaḥ || 69 ||
और मनस् की क्रिया के उपर्युक्त कारण (कर्म) होने के कारण, जब तक वे कारण विद्यमान हैं, तब तक आत्मा-मनस् संयोग का उच्छेद (समाप्ति) नहीं होता।
श्लोक 3.143
नित्यत्वप्रसङ्गश्च प्रायणानुपपत्तेः ॥ ७० ॥
nityatvaprasaṅgaśca prāyaṇānupapatteḥ || 70 ||
और यदि संयोग सर्वथा कभी न रुके, तो उसे नित्य मानने का अनिष्ट प्रसंग उपस्थित होगा, क्योंकि तब प्रयाण (मृत्यु/शरीर-त्याग) असंगत (अनुपपन्न) हो जाएगा।
श्लोक 3.144
अणुश्यामतानित्यत्ववदेतत्स्यात् ॥ ७१ ॥
aṇuśyāmatānityatvavadetatsyāt || 71 ||
यह अणु की श्यामता (कालिमा) की अनित्यता के समान होगा — जो न कारणरहित है और न नित्य गुण, अपितु उचित कारण, जैसे पाक, से बदल भी सकता है।
श्लोक 3.145
नाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् ॥ ७२ ॥
nākṛtābhyāgamaprasaṅgāt || 72 ||
नहीं — कोई वास्तविक कठिनाई नहीं है, क्योंकि संयोग की समाप्ति का भी समुचित कारण दिया जा सकता है; अन्यथा अकृताभ्यागम नामक दोष, अर्थात् बिना किए कर्म के फल का आना, अनिवार्य रूप से उपस्थित होगा — अतः इस विषय का विस्तृत विवेचन आवश्यक है।
श्लोक 4.1
प्रवृत्तिर्यथोक्ता ॥ १ ॥
pravṛttiryathoktā || 1 ||
प्रवृत्ति वैसी ही है जैसी पूर्व में (सूत्र १.१.१७ में) कही गई है।
श्लोक 4.2
तथा दोषाः ॥ २ ॥
tathā doṣāḥ || 2 ||
वैसे ही दोष भी पूर्वोक्त रूप में ही हैं (सूत्र १.१.१८ के अनुसार)।
श्लोक 4.3
तत्त्रैराश्यं रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् ॥ ३ ॥
tattrairāśyaṁ rāgadveṣamohārthāntarabhāvāt || 3 ||
वह दोष तीन प्रकार का है — राग, द्वेष और मोह — क्योंकि ये तीनों परस्पर भिन्न वस्तुएँ हैं।
श्लोक 4.4
नैकप्रत्यनीकभावात् ॥ ४ ॥
naikapratyanīkabhāvāt || 4 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि तीनों का निवारक (प्रतिपक्षी) एक ही है, अर्थात् तत्त्वज्ञान।
श्लोक 4.5
व्यभिचारादहेतुः ॥ ५ ॥
vyabhicārādahetuḥ || 5 ||
[उत्तर:] वह हेतु व्यभिचारी होने से असंगत है — क्योंकि भिन्न-भिन्न वस्तुएँ (जैसे विविध रंग) भी एक ही निमित्त (जैसे अग्नि) से नष्ट होती देखी जाती हैं, फिर भी परस्पर भिन्न रहती हैं।
श्लोक 4.6
तेषां मोहः पापीयान्नामूढस्येतरोत्पत्तेः ॥ ६ ॥
teṣāṁ mohaḥ pāpīyānnāmūḍhasyetarotpatteḥ || 6 ||
इन तीनों में मोह सबसे गंभीर है, क्योंकि जो मोहरहित है उसमें शेष दोनों (राग-द्वेष) उत्पन्न ही नहीं होते।
श्लोक 4.7
निमित्तनैमित्तिकभावादर्थान्तरभावो दोषेभ्यः ॥ ७ ॥
nimittanaimittikabhāvādarthāntarabhāvo doṣebhyaḥ || 7 ||
[पूर्वपक्ष:] मोह का शेष दोषों से निमित्त-नैमित्तिक (कारण-कार्य) सम्बन्ध होने से वह उनसे भिन्न वस्तु सिद्ध होता है (अतः उसे दोष नहीं माना जा सकता)।
श्लोक 4.8
न दोषलक्षणावरोधान्मोहस्य ॥ ८ ॥
na doṣalakṣaṇāvarodhānmohasya || 8 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि मोह भी (पूर्वोक्त) दोष के लक्षण के अंतर्गत ही आता है।
श्लोक 4.9
निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च तुल्यजातीयानामप्रतिषेधः ॥ ९ ॥
nimittanaimittikopapatteśca tulyajātīyānāmapratiṣedhaḥ || 9 ||
और समान जाति की वस्तुओं में भी कारण-कार्य सम्बन्ध होने में कोई बाधा नहीं है — अतः मोह स्वयं दोष होते हुए भी शेष दोषों का कारण हो सकता है।
श्लोक 4.10
आत्मनित्यत्वे प्रेत्यभावसिद्धिः ॥ १० ॥
ātmanityatve pretyabhāvasiddhiḥ || 10 ||
आत्मा के नित्य होने पर ही प्रेत्यभाव (मृत्योत्तर अस्तित्व अर्थात् पुनर्जन्म) की सिद्धि होती है।
श्लोक 4.11
व्यक्ताद्व्यक्तानां प्रत्यक्षप्रामाण्यात् ॥ ११ ॥
vyaktādvyaktānāṁ pratyakṣaprāmāṇyāt || 11 ||
[पूर्वपक्ष:] क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही व्यक्त वस्तु की उत्पत्ति किसी अन्य व्यक्त वस्तु से होती देखी जाती है (जैसे घट मिट्टी से) — अतः शरीर भी केवल भूतों से ही उत्पन्न हो सकता है, आत्मा के बिना भी।
श्लोक 4.12
न घटाद्घटानिष्पत्तेः ॥ १२ ॥
na ghaṭādghaṭāniṣpatteḥ || 12 ||
[प्रत्युत्तर आपत्ति:] किंतु यह सार्वत्रिक नियम नहीं हो सकता — क्योंकि घट, घट से उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 4.13
व्यक्ताद्घटनिष्पत्तेरप्रतिषेधः ॥ १३ ॥
vyaktādghaṭaniṣpatterapratiṣedhaḥ || 13 ||
[उत्तर:] ऐसी कोई बाधा नहीं है — घट भी किसी अन्य व्यक्त वस्तु से ही उत्पन्न होता है, अर्थात् अपने दो कपालों (अर्धभागों) से।
श्लोक 4.14
अभावाद्भावोत्पत्तिर्नानुपमृद्य प्रादुर्भावात् ॥ १४ ॥
abhāvādbhāvotpattirnānupamṛdya prādurbhāvāt || 14 ||
[पूर्वपक्ष:] भाव की उत्पत्ति अभाव से ही होती है, क्योंकि कारण के विनाश के बिना किसी वस्तु का प्रादुर्भाव नहीं होता (जैसे बीज नष्ट हुए बिना अंकुर नहीं होता)।
श्लोक 4.15
व्याघातादप्रयोगः ॥ १५ ॥
vyāghātādaprayogaḥ || 15 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — यह कथन स्ववचन-विरोधी होने से टिक नहीं सकता (जो कारण का नाश करके उसका स्थान लेता है, वह विनाश से पूर्व या तो विद्यमान था या नहीं — दोनों ही स्थितियों में विरोध है)।
श्लोक 4.16
नातीतानागतयोः कारकशब्दप्रयोगात् ॥ १६ ॥
nātītānāgatayoḥ kārakaśabdaprayogāt || 16 ||
[पूर्वपक्ष:] कोई विरोध नहीं है, क्योंकि क्रियावाचक शब्दों का प्रयोग भूत और भविष्य (अर्थात् अभी अविद्यमान वस्तु) के लिए भी गौणरूप से होता है, जैसे 'होने वाले पुत्र पर गर्व करना'।
श्लोक 4.17
न विनष्टेभ्योऽनिष्पत्तेः ॥ १७ ॥
na vinaṣṭebhyo'niṣpatteḥ || 17 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि नष्ट हो चुकी वस्तु से किसी की उत्पत्ति नहीं होती।
श्लोक 4.18
क्रमनिर्देशादप्रतिषेधः ॥ १८ ॥
kramanirdeśādapratiṣedhaḥ || 18 ||
यदि 'विनाश' केवल एक क्रम (चरण) को इंगित करे, तो कोई विरोध नहीं है (जैसे बीज की पुरानी अवस्था का अंत नई अवस्था के बनने का एक चरण मात्र है) — यह भाव के अभाव से उत्पन्न होने के समान नहीं है।
श्लोक 4.19
ईश्वरः कारणं पुरुषकर्माफल्यदर्शनात् ॥ १९ ॥
īśvaraḥ kāraṇaṁ puruṣakarmāphalyadarśanāt || 19 ||
[पूर्वपक्ष:] ईश्वर ही (कर्मफलों का) कारण है, क्योंकि पुरुष का कर्म कभी-कभी निष्फल देखा जाता है।
टिप्पणी: Sutras 4.1.19-21 form Nyaya's classical technical debate on whether Ishvara is a necessary cause of karmic fruit alongside human action — a question in causation/logic theory (the earliest locus for this argument, later greatly expanded by Udayana). It is philosophical argumentation about divine agency as a possible cause, not a devotional or liturgical statement; translated neutrally here.
श्लोक 4.20
न पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्तेः ॥ २० ॥
na puruṣakarmābhāve phalāniṣpatteḥ || 20 ||
[आपत्ति:] ऐसा नहीं है — क्योंकि मनुष्य के कर्म के अभाव में फल की उत्पत्ति कदापि नहीं होती; यदि ईश्वर ही एकमात्र कारण होता, तो कर्म के बिना भी फल मिल जाना चाहिए था।
टिप्पणी: Continues the technical causation argument begun in 4.1.19 — objecting that positing Ishvara as sole cause is unnecessary, since fruit is invariably tied to human action. A logical objection, not a devotional statement.
श्लोक 4.21
तत्कारितत्वादहेतुः ॥ २१ ॥
tatkāritatvādahetuḥ || 21 ||
[सिद्धांतपक्ष:] यह आपत्ति ठीक नहीं है — क्योंकि मनुष्य का कर्म भी उसी (ईश्वर) द्वारा प्रेरित होता है; कर्म तो केवल वह साधन है जिसके द्वारा वह फल प्रदान करता है, अतः कर्म की अनिवार्यता ईश्वर की कारणता का खंडन नहीं करती।
टिप्पणी: The Naiyayika's considered reply closing this three-sutra unit (19-21): human action operates as Ishvara's instrument for dispensing karmic fruit. This is the earliest classical locus for a theistic causal argument in the Nyaya system, cited widely in later Nyaya theology (e.g. Udayana's Nyayakusumanjali). It is a technical logical argument about causation, not devotional praise — translated neutrally.
श्लोक 4.22
अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः कण्टकतैक्ष्ण्यादिदर्शनात् ॥ २२ ॥
animittato bhāvotpattiḥ kaṇṭakataikṣṇyādidarśanāt || 22 ||
[पूर्वपक्ष:] भाव की उत्पत्ति बिना किसी निमित्त (कारण) के भी होती है — जैसे काँटों की तीक्ष्णता आदि बिना किसी कर्ता के ही उत्पन्न होती देखी जाती है।
श्लोक 4.23
अनिमित्तनिमित्तत्वान्नानिमित्ततः ॥ २३ ॥
animittanimittatvānnānimittataḥ || 23 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि 'अकारण से उत्पत्ति' कहने पर स्वयं 'अकारण' को ही कारण मान लिया जाता है, जो स्ववचन-विरोधी है।
श्लोक 4.24
निमित्तानिमित्तयोरर्थान्तरभावादप्रतिषेधः ॥ २४ ॥
nimittānimittayorarthāntarabhāvādapratiṣedhaḥ || 24 ||
इसमें कोई वास्तविक विरोध नहीं है, क्योंकि निमित्त (कारण) और अनिमित्त (अकारण) परस्पर भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं।
श्लोक 4.25
सर्वमनित्यमुत्पत्तिविनाशधर्मकत्वात् ॥ २५ ॥
sarvamanityamutpattivināśadharmakatvāt || 25 ||
[पूर्वपक्ष:] सब कुछ अनित्य है, क्योंकि सभी वस्तुओं में उत्पत्ति और विनाश का धर्म पाया जाता है।
श्लोक 4.26
नानित्यतानित्यत्वात् ॥ २६ ॥
nānityatānityatvāt || 26 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि (यदि अनित्यता को सार्वभौम माना जाए तो) अनित्यता को ही नित्य मानना पड़ेगा, जो सिद्धांत का ही खंडन है।
श्लोक 4.27
तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्यं विनाश्यानुविनाशवत् ॥ २७ ॥
tadanityatvamagnerdāhyaṁ vināśyānuvināśavat || 27 ||
[पूर्वपक्ष:] वह अनित्यता भी स्वयं अनित्य ही है — जैसे ईंधन समाप्त होने पर अग्नि बुझ जाती है, वैसे ही समस्त अनित्य वस्तुओं के नष्ट होने पर अनित्यता भी समाप्त हो जाती है।
श्लोक 4.28
नित्यस्याप्रत्याख्यानं यथोपलब्धिव्यवस्थानात् ॥ २८ ॥
nityasyāpratyākhyānaṁ yathopalabdhivyavasthānāt || 28 ||
[उत्तर:] इससे नित्य वस्तु का निषेध नहीं होता — क्योंकि नित्यता और अनित्यता की व्यवस्था प्रत्यक्ष अनुभव के अनुसार ही होती है (जैसे आकाश, काल, दिशा और आत्मा में उत्पत्ति-विनाश कभी प्रत्यक्ष नहीं होते, अतः वे नित्य हैं)।
श्लोक 4.29
सर्वं नित्यम्पञ्चभूतनित्यत्वात् ॥ २९ ॥
sarvaṁ nityampañcabhūtanityatvāt || 29 ||
[पूर्वपक्ष:] सब कुछ नित्य है, क्योंकि पाँचों भूत (मूल तत्त्व) नित्य हैं।
श्लोक 4.30
नोत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः ॥ ३० ॥
notpattivināśakāraṇopalabdheḥ || 30 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि हमें वस्तुओं की उत्पत्ति और विनाश के कारण प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं।
श्लोक 4.31
तल्लक्षणावरोधादप्रतिषेधः ॥ ३१ ॥
tallakṣaṇāvarodhādapratiṣedhaḥ || 31 ||
[पूर्वपक्ष:] यह कोई खंडन नहीं है — क्योंकि उत्पन्न या नष्ट होने वाली वस्तु भी उसी भूत (मूल तत्त्व) का धर्म रखती है, जो नित्य है।
श्लोक 4.32
नोत्पत्तितत्कारणोपलब्धेः ॥ ३२ ॥
notpattitatkāraṇopalabdheḥ || 32 ||
[उत्तर:] यह विरोध नहीं है — क्योंकि हमें उत्पत्ति और उसके कारण दोनों का पृथक्-पृथक् प्रत्यक्ष होता है; कार्य नित्य कारण से उत्पन्न होकर भी स्वयं अनित्य हो सकता है, जैसे नित्य आकाश से उत्पन्न शब्द अनित्य है।
श्लोक 4.33
न व्यवस्थानुपपत्तेः ॥ ३३ ॥
na vyavasthānupapatteḥ || 33 ||
और यह भी संभव नहीं — क्योंकि यदि सब कुछ नित्य होता, तो 'उत्पन्न हुआ' या 'नष्ट होगा' जैसे कालसूचक प्रयोग ही असंगत हो जाते।
श्लोक 4.34
सर्वं पृथग्भावलक्षणपृथक्त्वात् ॥ ३४ ॥
sarvaṁ pṛthagbhāvalakṣaṇapṛthaktvāt || 34 ||
[पूर्वपक्ष:] सब कुछ पृथक्-पृथक् (समुच्चय मात्र) है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु के लक्षण (गुण-अवयव) परस्पर भिन्न-भिन्न होते हैं।
श्लोक 4.35
नानेकलक्षणैरेकभावनिष्पत्तेः ॥ ३५ ॥
nānekalakṣaṇairekabhāvaniṣpatteḥ || 35 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — अनेक लक्षणों (गुण-अवयवों) के समुदाय से ही एक वस्तु सिद्ध होती है; घट के अनेक गुण एक ही घट नामक वस्तु के आश्रित हैं।
श्लोक 4.36
लक्षणव्यवस्थानादेवाप्रतिषेधः ॥ ३६ ॥
lakṣaṇavyavasthānādevāpratiṣedhaḥ || 36 ||
और इसमें कोई विरोध नहीं है — क्योंकि लक्षण सदैव एक ही वस्तु में स्थित पाए जाते हैं (अन्यथा 'यह वही घट है जिसे मैंने कल छुआ था' — ऐसा प्रत्यभिज्ञान संभव न होता)।
श्लोक 4.37
सर्वमभावो भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः ॥ ३७ ॥
sarvamabhāvo bhāveṣvitaretarābhāvasiddheḥ || 37 ||
[पूर्वपक्ष:] सब कुछ अभावरूप है, क्योंकि विद्यमान वस्तुओं में परस्पर एक-दूसरे का अभाव ही सिद्ध होता है (जैसे 'घोड़ा गाय नहीं है')।
श्लोक 4.38
न स्वभावसिद्धेर्भावानाम् ॥ ३८ ॥
na svabhāvasiddherbhāvānām || 38 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि वस्तुएँ अपने स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं; गाय अपने आप में गाय है, भले ही वह घोड़ा न हो।
श्लोक 4.39
न स्वभावसिद्धिरापेक्षिकत्वात् ॥ ३९ ॥
na svabhāvasiddhirāpekṣikatvāt || 39 ||
[पूर्वपक्ष:] स्वभाव से भी सिद्धि नहीं होती, क्योंकि सभी निर्धारण सापेक्ष हैं — जैसे 'लंबा' और 'छोटा' परस्पर सापेक्ष होकर ही निर्धारित होते हैं।
श्लोक 4.40
व्याहतत्वादयुक्तम् ॥ ४० ॥
vyāhatatvādayuktam || 40 ||
[उत्तर:] यह मत असंगत है, क्योंकि यह स्ववचन-विरोधी है — यदि 'लंबा' और 'छोटा' केवल परस्पर आश्रित होकर ही सिद्ध होते हैं, तो किसी की भी स्वतंत्र सिद्धि न होने पर उनका पारस्परिक सम्बन्ध भी कभी सिद्ध नहीं हो सकेगा।
श्लोक 4.41
संख्यैकान्तासिद्धिः कारणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ४१ ॥
saṁkhyaikāntāsiddhiḥ kāraṇānupapattyupapattibhyām || 41 ||
संख्या की पूर्ण निश्चितता (जैसे 'सब एक है' अथवा 'सब दो प्रकार का है' जैसे दावे) सिद्ध नहीं होती — क्योंकि उसका हेतु सिद्ध हो या असिद्ध, दोनों ही स्थितियों में वह निश्चितता स्थापित नहीं हो पाती।
श्लोक 4.42
न कारणावयवभावात् ॥ ४२ ॥
na kāraṇāvayavabhāvāt || 42 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्योंकि हेतु स्वयं उस निश्चित संख्या का ही एक अवयव (अंश) है।
श्लोक 4.43
निरवयवत्वादहेतुः ॥ ४३ ॥
niravayavatvādahetuḥ || 43 ||
[उत्तर:] यह हेतु ठीक नहीं है — क्योंकि जब तक संख्या स्वयं निश्चित न हो, तब तक उसका कोई निश्चित अवयव उपलब्ध ही नहीं होता।
श्लोक 4.44
सद्यः कालान्तरे च फलनिष्पत्तेः संशयः ॥ ४४ ॥
sadyaḥ kālāntare ca phalaniṣpatteḥ saṁśayaḥ || 44 ||
फल कभी तत्काल तो कभी कुछ काल बाद उत्पन्न होता देखा जाता है, अतः इस विषय में संशय होता है (कि यज्ञाग्नि-परिपालन जैसे कर्म का फल तुरंत मिलता है या विलंब से)।
श्लोक 4.45
न सद्यः कालान्तरोपभोग्यत्वात् ॥ ४५ ॥
na sadyaḥ kālāntaropabhogyatvāt || 45 ||
[उत्तर:] तत्काल नहीं — क्योंकि वह फल (स्वर्ग) तो कुछ काल बाद, अर्थात् मृत्यु के पश्चात् ही भोगा जाता है।
श्लोक 4.46
कालान्तरेणानिष्पत्तिर्हेतुविनाशात् ॥ ४६ ॥
kālāntareṇāniṣpattirhetuvināśāt || 46 ||
[पूर्वपक्ष:] कालांतर में भी उत्पत्ति नहीं हो सकती — क्योंकि तब तक कारण (कर्म) नष्ट हो चुका होता है।
श्लोक 4.47
प्राङ्निष्पत्तेर्वृक्षफलवत्तत्स्यात् ॥ ४७ ॥
prāṅniṣpattervṛkṣaphalavattatsyāt || 47 ||
[उत्तर:] फलोत्पत्ति से पूर्व वह फल वृक्षफल के समान सूक्ष्म (संभाव्य) रूप में विद्यमान रहता है — जैसे अभी सींची जा रही जड़ें भविष्य में फल देंगी, वैसे ही अभी किया गया कर्म भी अदृष्ट के माध्यम से समय आने पर फल देता है।
श्लोक 4.48
नासन्न सन्न सदसत्सदसतोर्वैधर्म्यात् ॥ ४८ ॥
nāsanna sanna sadasatsadasatorvaidharmyāt || 48 ||
[पूर्वपक्ष — माध्यमिक बौद्ध मत:] कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व न सत् है, न असत्, न ही उभयरूप (सदसत्) — क्योंकि सत्त्व और असत्त्व परस्पर विरोधी धर्म हैं।
टिप्पणी: States the Mādhyamika Buddhist tetralemma-style position on the ontological status of an effect prior to production (the Bhasya cites Nagarjuna and Aryadeva here); flagged since it directly restates a rival school's technical doctrine as part of the broader sat-kārya-vāda vs. asat-kārya-vāda debate spanning sutras 44-54.
श्लोक 4.49
उत्पादव्ययदर्शनात् ॥ ४९ ॥
utpādavyayadarśanāt || 49 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — कार्य उत्पत्ति से पूर्व असत् ही था, क्योंकि हमें उत्पत्ति और विनाश दोनों का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
श्लोक 4.50
बुद्धिसिद्धं तु तदसत् ॥ ५० ॥
buddhisiddhaṁ tu tadasat || 50 ||
और वह (कार्य का पूर्व-असत्त्व) बुद्धि से भी सिद्ध होता है — जुलाहा वस्त्र बुनने में इसलिए प्रवृत्त होता है क्योंकि वह उसे अभी असत् किंतु सूत से निष्पादनीय जानता है।
श्लोक 4.51
आश्रयव्यतिरेकाद्वृक्षफलोत्पत्तिवदित्यहेतुः ॥ ५१ ॥
āśrayavyatirekādvṛkṣaphalotpattivadityahetuḥ || 51 ||
[पूर्वपक्ष:] वृक्षफल की उपमा उचित नहीं है — क्योंकि यहाँ आश्रय (आधार) में निरंतरता नहीं है; जिस शरीर ने कर्म किया वह वही शरीर नहीं है जो स्वर्ग में फल भोगता है।
श्लोक 4.52
प्रीतेरात्माश्रयत्वादप्रतिषेधः ॥ ५२ ॥
prīterātmāśrayatvādapratiṣedhaḥ || 52 ||
[उत्तर:] यह आपत्ति निरस्त होती है — क्योंकि फल (प्रीति) का आश्रय शरीर नहीं, आत्मा है; और कर्म करने वाली तथा फल भोगने वाली आत्मा एक ही है।
श्लोक 4.53
न पुत्रपशुस्त्रीपरिच्छदहिरण्यान्नादिफलनिर्देशात् ॥ ५३ ॥
na putrapaśustrīparicchadahiraṇyānnādiphalanirdeśāt || 53 ||
[पूर्वपक्ष:] परंतु शास्त्रों में पुत्र, पशु, स्त्री, परिच्छद (सामग्री), स्वर्ण, अन्न आदि फलों का उल्लेख मिलता है — ये तो आत्मा में नहीं रह सकते।
श्लोक 4.54
तत्सम्बन्धात्फलनिष्पत्तेस्तेषु फलवदुपचारः ॥ ५४ ॥
tatsambandhātphalaniṣpattesteṣu phalavadupacāraḥ || 54 ||
[उत्तर:] चूँकि उनके (पुत्र, पशु आदि के) सम्बन्ध से ही वास्तविक फल अर्थात् सुख उत्पन्न होता है, अतः उन्हीं वस्तुओं को गौणरूप से 'फल' कहा जाता है।
श्लोक 4.55
विविधबाधनायोगाद्दुःखमेव जन्मोत्पत्तिः ॥ ५५ ॥
vividhabādhanāyogādduḥkhameva janmotpattiḥ || 55 ||
[पूर्वपक्ष:] विविध पीड़ाओं से युक्त होने के कारण जन्म (देहधारी अस्तित्व) मात्र दुःख ही है।
श्लोक 4.56
न सुखस्याप्यान्तरालनिष्पत्तेः ॥ ५६ ॥
na sukhasyāpyāntarālaniṣpatteḥ || 56 ||
[आपत्ति:] ऐसा नहीं है — क्योंकि सुख भी बीच-बीच में (दुःखों के मध्य) उत्पन्न होता देखा जाता है।
श्लोक 4.57
बाधनानिर्वृत्तेर्वेदयतः पर्येषणदोषादप्रतिषेधः ॥ ५७ ॥
bādhanānirvṛttervedayataḥ paryeṣaṇadoṣādapratiṣedhaḥ || 57 ||
[उत्तर:] यह आपत्ति ठीक नहीं — क्योंकि सुख का अनुभव करने वाले में भी पीड़ा समाप्त नहीं होती, क्योंकि वह निरंतर अन्य वस्तु की खोज (पर्येषण) के दोष से ग्रस्त रहता है।
श्लोक 4.58
दुःखविकल्पे सुखाभिमानाच्च ॥ ५८ ॥
duḥkhavikalpe sukhābhimānācca || 58 ||
और इसलिए भी, कि जिसे 'सुख' मानकर लोग गर्व करते हैं, वह वास्तव में दुःख का ही एक भेद है।
श्लोक 4.59
ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धादपवर्गाभावः ॥ ५९ ॥
ṛṇakleśapravṛttyanubandhādapavargābhāvaḥ || 59 ||
[पूर्वपक्ष:] ऋण (ऋणत्रय), क्लेश और प्रवृत्ति के निरंतर सम्बन्ध के कारण अपवर्ग (मोक्ष) असंभव है।
श्लोक 4.60
प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ॥ ६० ॥
pradhānaśabdānupapatterguṇaśabdenānuvādo nindāpraśaṁsopapatteḥ || 60 ||
[उत्तर:] चूँकि उस शास्त्रवचन का मुख्यार्थ असंगत है, अतः उसे गौणार्थ में ही पुनःकथित समझा जाता है, क्योंकि शास्त्र में निंदा या प्रशंसा हेतु गौण अर्थ का प्रयोग सुसंगत माना जाता है (यहाँ गृहस्थाश्रम की प्रशंसा अभिप्रेत है)।
श्लोक 4.61
समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ॥ ६१ ॥
samāropaṇādātmanyapratiṣedhaḥ || 61 ||
इसमें कोई विरोध नहीं है — क्योंकि संन्यास ग्रहण करने से पूर्व साधक अग्नियों को अपनी आत्मा में ही आरोपित (संस्थापित) कर लेता है (जैसा वैदिक विधि में कहा गया है), और ऐसा गौण कथन अपने ही प्रसंग में उचित होता है।
टिप्पणी: The compound samāropaṇād ātmani apratiṣedhaḥ is terse and admits more than one reading. Rendered here per the likely Bhasya sense: the Vedic renunciation formula in which the ascetic ritually 'deposits' his sacrificial fires within himself (ātmany agnīn samāropya sannyasyet) before renouncing, thereby figuratively discharging the three debts of 4.1.59. An alternative, more generic reading ('a figurative statement must suit its proper context') is also attested in some translations; flagged as an interpretive choice.
श्लोक 4.62
पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभावः ॥ ६२ ॥
pātracayāntānupapatteśca phalābhāvaḥ || 62 ||
[पूर्वपक्ष:] परंतु (संन्यास ग्रहण के पश्चात्) यज्ञ-सामग्री (पात्रों) के संचय को अंत तक निभाना असंभव है — अतः इस प्रकार के प्रतीकात्मक यज्ञ से फल की प्राप्ति नहीं हो सकती।
टिप्पणी: pātracaya ('accumulation of vessels/ritual materials') is a rare, difficult compound; this rendering is best-effort. The sutra appears to raise a further doubt about whether the renunciate's symbolic self-sacrifice (4.1.61) can truly substitute for an ongoing physical sacrifice — a doubt sutra 63's reply then resolves by redefining liberation itself as simply the cessation of affliction, not the accumulation of ritual fruit.
श्लोक 4.63
सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने क्लेशाभाववदपवर्गः ॥ ६३ ॥
suṣuptasya svapnādarśane kleśābhāvavadapavargaḥ || 63 ||
[उत्तर:] अपवर्ग (मोक्ष) उस व्यक्ति की अवस्था के समान है जो गाढ़ निद्रा में स्वप्नरहित सोया हो — अर्थात् वह मात्र क्लेशों का अभाव है।
श्लोक 4.64
न प्रवृत्तिः प्रतिसंधानाय हीनक्लेशस्य ॥ ६४ ॥
na pravṛttiḥ pratisaṁdhānāya hīnakleśasya || 64 ||
जिसके क्लेश नष्ट हो चुके हैं, उसकी प्रवृत्ति पुनः जन्म से जुड़ाव (प्रतिसंधान) का कारण नहीं बनती।
श्लोक 4.65
न क्लेशसंततेः स्वाभाविकत्वात् ॥ ६५ ॥
na kleśasaṁtateḥ svābhāvikatvāt || 65 ||
[पूर्वपक्ष:] ऐसा नहीं है — क्लेशों का अंत नहीं होता, क्योंकि उनकी परंपरा स्वाभाविक (अनादि) है।
श्लोक 4.66
प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत्स्वाभाविकेऽप्यनित्यत्वम् ॥ ६६ ॥
prāgutpatterabhāvānityatvavatsvābhāvike'pyanityatvam || 66 ||
[उत्तर:] जैसे किसी वस्तु का प्राग्भाव (उत्पत्ति-पूर्व अभाव) अनादि होते हुए भी अनित्य है (उत्पत्ति होते ही समाप्त हो जाता है), वैसे ही स्वाभाविक (अनादि) वस्तु भी अनित्य हो सकती है।
श्लोक 4.67
अणुश्यामतानित्यत्ववद्वा ॥ ६७ ॥
aṇuśyāmatānityatvavadvā || 67 ||
अथवा जैसे किसी परमाणु की स्वाभाविक कालिमा भी अनित्य होती है (अग्नि में तपाने पर लाल हो जाती है), वैसे ही क्लेश भी अनित्य हो सकते हैं।
श्लोक 4.68
न संकल्पनिमित्तत्वाच्च रागादीनाम् ॥ ६८ ॥
na saṁkalpanimittatvācca rāgādīnām || 68 ||
[उत्तर:] ऐसा नहीं है — क्योंकि राग आदि दोष किसी अंतर्निहित संकल्प (इच्छा) से नहीं, अपितु वस्तुओं के विषय में मिथ्या संकल्पना (गलत ज्ञान) से उत्पन्न होते हैं, अतः वे सत्य ज्ञान द्वारा दूर किए जा सकते हैं।
श्लोक 4.69
दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः ॥ १ ॥
doṣanimittānāṁ tattvajñānādahaṅkāranivṛttiḥ || 1 ||
दोषों के कारणों के तत्त्वज्ञान से अहंकार की निवृत्ति होती है।
श्लोक 4.70
दोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः संकल्पकृताः ॥ २ ॥
doṣanimittaṁ rūpādayo viṣayāḥ saṁkalpakṛtāḥ || 2 ||
दोषों का निमित्त रूप आदि विषय हैं, जो संकल्प (कल्पना) द्वारा निर्मित होते हैं।
श्लोक 4.71
तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ॥ ३ ॥
tannimittaṁ tvavayavyabhimānaḥ || 3 ||
किन्तु उस संकल्पकृत विषय-ग्रहण का निमित्त अवयवी (समुदायरूप वस्तु) का अभिमान (मिथ्या धारणा) है।
श्लोक 4.72
विद्याविद्याद्वैविध्यात्संशयः ॥ ४ ॥
vidyāvidyādvaividhyātsaṁśayaḥ || 4 ||
विद्या और अविद्या के द्वैविध्य (दो प्रकार) के कारण संशय उत्पन्न होता है।
श्लोक 4.73
तदसंशयः पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ॥ ५ ॥
tadasaṁśayaḥ pūrvahetuprasiddhatvāt || 5 ||
वह संशय नहीं है, क्योंकि पूर्व हेतुओं से वह पहले ही सिद्ध हो चुका है।
श्लोक 4.74
वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न संशयः ॥ ६ ॥
vṛttyanupapatterapi tarhi na saṁśayaḥ || 6 ||
तब तो वृत्ति (भागों में अवस्थिति) की असंगति के कारण संशय भी नहीं है।
श्लोक 4.75
कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वादवयवानामवयव्यभावः ॥ ७ ॥
kṛtsnaikadeśāvṛttitvādavayavānāmavayavyabhāvaḥ || 7 ||
अवयवों में अवयवी की समग्ररूप से अथवा एकदेशरूप से (आंशिक रूप से) अवृत्ति (न रहने) के कारण अवयवों का अवयवी सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 4.76
तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ॥ ८ ॥
teṣu cāvṛtteravayavyabhāvaḥ || 8 ||
और उन अवयवों में अवृत्ति के कारण अवयवी का अभाव है।
श्लोक 4.77
पृथक्चावयवेभ्योऽवृत्तेः ॥ ९ ॥
pṛthakcāvayavebhyo'vṛtteḥ || 9 ||
और अवयवों से पृथक् भी अवयवी का अस्तित्व नहीं है, क्योंकि वृत्ति (संबंध) सिद्ध नहीं होती।
श्लोक 4.78
न चावयव्यवयवाः ॥ १० ॥
na cāvayavyavayavāḥ || 10 ||
और अवयव भी अवयवी नहीं हैं।
श्लोक 4.79
एकस्मिन्भेदाभावाद्भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेरप्रश्नः ॥ ११ ॥
ekasminbhedābhāvādbhedaśabdaprayogānupapatterapraśnaḥ || 11 ||
एक (अखण्ड) वस्तु में भेद के अभाव से भेद-शब्द का प्रयोग असंगत है, अतः यह कोई प्रश्न ही नहीं है।
श्लोक 4.80
अवयवान्तराभावेऽप्यवृत्तेरहेतुः ॥ १२ ॥
avayavāntarābhāve'pyavṛtterahetuḥ || 12 ||
अवयवान्तर (अन्य अवयवों) के अभाव में भी अवृत्ति (न रहने का तर्क) कोई युक्तियुक्त हेतु नहीं है।
श्लोक 4.81
केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धिवत्तदुपलब्धिः ॥ १३ ॥
keśasamūhe taimirikopalabdhivattadupalabdhiḥ || 13 ||
जैसे तैमिरिक (नेत्ररोगी) को केशों के समूह का (एक वस्तु के रूप में भ्रमपूर्ण) प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही उस अवयवी का प्रत्यक्ष होता है।
श्लोक 4.82
स्वविषयानतिक्रमेणेन्द्रियस्य पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणस्य तथाभावो नाविषये प्रवृत्तिः ॥ १४ ॥
svaviṣayānatikrameṇendriyasya paṭumandabhāvādviṣayagrahaṇasya tathābhāvo nāviṣaye pravṛttiḥ || 14 ||
अपने विषय का अतिक्रमण किए बिना ही इन्द्रिय की तीक्ष्णता या मन्दता के अनुसार विषयग्रहण भी वैसा ही (तीक्ष्ण या मन्द) होता है; किन्तु अ-विषय में इन्द्रिय की प्रवृत्ति नहीं होती।
श्लोक 4.83
अवयवावयविप्रसङ्गश्चैवमाप्रलयात् ॥ १५ ॥
avayavāvayaviprasaṅgaścaivamāpralayāt || 15 ||
और इस प्रकार अवयव-अवयवी का यह क्रम प्रलय तक चलता रहेगा, यह प्रसंग (आपत्ति) उत्पन्न होगा।
श्लोक 4.84
न प्रलयोऽणुसद्भावात् ॥ १६ ॥
na pralayo'ṇusadbhāvāt || 16 ||
प्रलय तक यह क्रम नहीं चलता, क्योंकि अणु का सद्भाव है, जो वस्तुतः निरवयव है।
श्लोक 4.85
परं वा त्रुटेः ॥ १७ ॥
paraṁ vā truṭeḥ || 17 ||
अथवा त्रुटि (सूक्ष्मतम दृश्य कण) से भी परे कुछ सूक्ष्मतर है क्या?
श्लोक 4.86
आकाशव्यतिभेदात्तदनुपपत्तिः ॥ १८ ॥
ākāśavyatibhedāttadanupapattiḥ || 18 ||
आकाश के व्यतिभेद (सर्वत्र प्रवेश) के कारण वह (अणु की पूर्ण निरवयवता की बात) असंगत है।
श्लोक 4.87
आकाशासर्वगतत्वं वा ॥ १९ ॥
ākāśāsarvagatatvaṁ vā || 19 ||
अथवा इससे यह अनिष्ट प्रसंग उपस्थित होगा कि आकाश सर्वगत (सर्वव्यापी) नहीं है।
श्लोक 4.88
अन्तर्बहिश्च कार्यद्रव्यस्य कारणान्तरवचनादकार्ये तदभावः ॥ २० ॥
antarbahiśca kāryadravyasya kāraṇāntaravacanādakārye tadabhāvaḥ || 20 ||
कार्यद्रव्य (उत्पन्न वस्तु) के भीतर और बाहर आकाश रहता है; किन्तु चूंकि वह अन्य कारण (संरचना) के कारण होता है, अतः जो कार्य (उत्पन्न वस्तु) नहीं है, जैसे अणु, उसमें वह आन्तरिक आकाश नहीं होता।
श्लोक 4.89
शब्दसंयोगविभवाच्च सर्वगतम् ॥ २१ ॥
śabdasaṁyogavibhavācca sarvagatam || 21 ||
और शब्द तथा संयोग के विभव (सर्वत्र व्याप्ति) के कारण आकाश सर्वगत (सर्वव्यापी) है।
श्लोक 4.90
अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि चाकाशधर्माः ॥ २२ ॥
avyūhāviṣṭambhavibhutvāni cākāśadharmāḥ || 22 ||
अव्यूह (अरोध), अविष्टम्भ (अप्रतिघात) और विभुत्व (सर्वव्यापकत्व) — ये आकाश के धर्म (गुण) हैं।
श्लोक 4.91
मूर्तिमतां च संस्थानोपपत्तेरवयवसद्भावः ॥ २३ ॥
mūrtimatāṁ ca saṁsthānopapatteravayavasadbhāvaḥ || 23 ||
और मूर्तिमान् (सीमित आकारवाले) पदार्थों में संस्थान (आकृति) की उपपत्ति (सिद्धि) के कारण उनमें अवयवों का सद्भाव है।
श्लोक 4.92
संयोगोपपत्तेश्च ॥ २४ ॥
saṁyogopapatteśca || 24 ||
और संयोग की उपपत्ति (सिद्धि) के कारण भी अवयवों का सद्भाव मानना आवश्यक है।
श्लोक 4.93
अनवस्थाकारित्वादनवस्थानुपपत्तेश्चाप्रतिषेधः ॥ २५ ॥
anavasthākāritvādanavasthānupapatteścāpratiṣedhaḥ || 25 ||
यह कि इससे अनवस्था (अनन्त शृंखला) उत्पन्न होगी और अनवस्था असंगत है, यह कोई वैध खण्डन नहीं है।
श्लोक 4.94
बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां याथात्म्यानुपलब्धिस्तन्त्वपकर्षणे पटसद्भावानुपलब्धिवत्तदनुपलब्धिः ॥ २६ ॥
buddhyā vivecanāttu bhāvānāṁ yāthātmyānupalabdhistantvapakarṣaṇe paṭasadbhāvānupalabdhivattadanupalabdhiḥ || 26 ||
किन्तु बुद्धि द्वारा विवेचन (विश्लेषण) करने पर वस्तुओं के याथात्म्य (वास्तविक स्वरूप) की अनुपलब्धि होती है — जैसे तन्तुओं को एक-एक करके हटाने पर पट (वस्त्र) के पृथक् सद्भाव की अनुपलब्धि होती है, वैसे ही उस अवयवी की अनुपलब्धि है।
श्लोक 4.95
व्याहतत्वादहेतुः ॥ २७ ॥
vyāhatatvādahetuḥ || 27 ||
यह हेतु व्याहत (स्वविरोधी) होने के कारण अहेतु (अमान्य हेतु) है।
श्लोक 4.96
तदाश्रयत्वादपृथग्ग्रहणम् ॥ २८ ॥
tadāśrayatvādapṛthaggrahaṇam || 28 ||
उस अवयवी के आश्रयरूप होने से अवयवों तथा अवयवी का ग्रहण पृथक्-पृथक् नहीं होता।
श्लोक 4.97
प्रमाणतश्चार्थप्रतिपत्तेः ॥ २९ ॥
pramāṇataścārthapratipatteḥ || 29 ||
और प्रमाण (प्रत्यक्ष आदि) द्वारा अर्थ (वस्तु) की प्रतिपत्ति (ज्ञान-प्राप्ति) होने के कारण भी अवयवी सिद्ध होता है।
श्लोक 4.98
प्रमाणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ३० ॥
pramāṇānupapattyupapattibhyām || 30 ||
उस प्रमाण की अनुपपत्ति (असिद्धि) और उपपत्ति (सिद्धि), दोनों के द्वारा इस विषय का निर्णय होता है।
श्लोक 4.99
स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेयाभिमानः ॥ ३१ ॥
svapnaviṣayābhimānavadayaṁ pramāṇaprameyābhimānaḥ || 31 ||
प्रमाण और प्रमेय का यह अभिमान (धारणा) स्वप्न-विषय के अभिमान के समान (भ्रामक) है, ऐसी शंका हो सकती है।
श्लोक 4.100
मायागन्धर्वनगरमृगतृष्णिकावद्वा ॥ ३२ ॥
māyāgandharvanagaramṛgatṛṣṇikāvadvā || 32 ||
अथवा वह माया, गन्धर्वनगर और मृगतृष्णिका (मरीचिका) के समान भी हो सकता है।
श्लोक 4.101
हेत्वभावादसिद्धिः ॥ ३३ ॥
hetvabhāvādasiddhiḥ || 33 ||
हेतु के अभाव में वह (सब ज्ञान मायावत् होने की बात) असिद्ध है।
श्लोक 4.102
स्मृतिसंकल्पवच्च स्वप्नविषयाभिमानः ॥ ३४ ॥
smṛtisaṁkalpavacca svapnaviṣayābhimānaḥ || 34 ||
और स्वप्न-विषय का अभिमान स्मृति और संकल्प के समान, अर्थात् पूर्व संस्कार और कल्पना से उत्पन्न होने वाला है, न कि किसी वर्तमान वास्तविक विषय से।
श्लोक 4.103
मिथ्योपलब्धेर्विनाशस्तत्त्वज्ञानात्स्वप्नविषयाभिमानप्रणाशवत् प्रतिबोधे ॥ ३५ ॥
mithyopalabdhervināśastattvajñānātsvapnaviṣayābhimānapraṇāśavat pratibodhe || 35 ||
मिथ्या उपलब्धि (भ्रमज्ञान) का विनाश तत्त्वज्ञान से होता है, जैसे प्रतिबोध (जागने) पर स्वप्न-विषय के अभिमान का नाश हो जाता है।
श्लोक 4.104
बुद्धेश्चैवं निमित्तसद्भावोपलम्भात् ॥ ३६ ॥
buddheścaivaṁ nimittasadbhāvopalambhāt || 36 ||
और इसी प्रकार जाग्रत बुद्धि (जागृत ज्ञान) का वास्तविक निमित्त (कारण) उपलब्ध होने के कारण वह स्वप्नवत् नहीं है।
श्लोक 4.105
तत्त्वप्रधानभेदाच्च मिथ्याबुद्धेर्द्वैविध्योपपत्तिः ॥ ३७ ॥
tattvapradhānabhedācca mithyābuddherdvaividhyopapattiḥ || 37 ||
और तत्त्व (मूल द्रव्य) तथा प्रधान (प्रमुख तत्त्व) के भेद से मिथ्या बुद्धि (भ्रमज्ञान) के द्वैविध्य (दो प्रकार) की उपपत्ति (सिद्धि) होती है।
श्लोक 4.106
समाधिविशेषाभ्यासात् ॥ ३८ ॥
samādhiviśeṣābhyāsāt || 38 ||
समाधिविशेष (विशिष्ट योगसाधना) के अभ्यास से विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है।
श्लोक 4.107
नार्थविशेषप्राबल्यात् ॥ ३९ ॥
nārthaviśeṣaprābalyāt || 39 ||
यह अर्थविशेष (किसी विशेष विषय) की प्रबलता से उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 4.108
क्षुदादिभिः प्रवर्तनाच्च ॥ ४० ॥
kṣudādibhiḥ pravartanācca || 40 ||
और क्षुधा (भूख) आदि से प्रेरित होने के कारण सामान्य भ्रम उत्पन्न होता है।
श्लोक 4.109
पूर्वकृतफलानुबन्धात्तदुत्पत्तिः ॥ ४१ ॥
pūrvakṛtaphalānubandhāttadutpattiḥ || 41 ||
उसकी उत्पत्ति पूर्वकृत कर्मों के फल के अनुबन्ध (संबंध) से होती है।
श्लोक 4.110
अरण्यगुहापुलिनादिषु योगाभ्यासोपदेशः ॥ ४२ ॥
araṇyaguhāpulinādiṣu yogābhyāsopadeśaḥ || 42 ||
अरण्य (वन), गुहा, पुलिन (नदी-तट) आदि में योगाभ्यास का उपदेश (निर्देश) दिया गया है।
श्लोक 4.111
अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः ॥ ४३ ॥
apavarge'pyevaṁ prasaṅgaḥ || 43 ||
अपवर्ग (मोक्ष) के संबंध में भी इसी प्रकार का प्रसंग (सम्भावना/आपत्ति) उपस्थित होता है।
श्लोक 4.112
न निष्पन्नावश्यम्भावित्वात् ॥ ४४ ॥
na niṣpannāvaśyambhāvitvāt || 44 ||
ऐसा नहीं है, क्योंकि जिसका कार्य निष्पन्न (सिद्ध) हो चुका है, उसके लिए वह आवश्यम्भावी (अनिवार्य) नहीं रहता।
श्लोक 4.113
तदभावश्चापवर्गे ॥ ४५ ॥
tadabhāvaścāpavarge || 45 ||
और उस दोष (प्रसंग) का अभाव ही अपवर्ग (मोक्ष) में होता है।
श्लोक 4.114
तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः ॥ ४६ ॥
tadarthaṁ yamaniyamābhyāmātmasaṁskāro yogāccādhyātmavidhyupāyaiḥ || 46 ||
उस (मोक्ष) प्रयोजन के लिए यम और नियम के द्वारा तथा योग एवं अध्यात्मविधि (आन्तरिक साधना-विधि) के उपायों द्वारा आत्मसंस्कार (आत्मा का परिष्कार) किया जाता है।
टिप्पणी: Source (Sanskrit Wikisource) prints this sutra with the number ४६ (46), duplicating the immediately following sutra's printed number — a genuine manuscript/transcription numbering defect in the source, not a counting error introduced here. Resolved via this project's established policy of using clean sequential position-numbering as ground truth when the source's own printed numbers conflict.
श्लोक 4.115
ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च सह संवादः ॥ ४७ ॥
jñānagrahaṇābhyāsastadvidyaiśca saha saṁvādaḥ || 47 ||
ज्ञान के ग्रहण का अभ्यास तथा उसके ज्ञाताओं (विद्वानों) के साथ संवाद (चर्चा) भी आत्मसंस्कार के साधन हैं।
टिप्पणी: Source (Sanskrit Wikisource) prints this sutra with the number ४६ (46), duplicating the immediately preceding sutra's printed number — a genuine manuscript/transcription numbering defect in the source, not a counting error introduced here. Resolved via this project's established policy of using clean sequential position-numbering as ground truth when the source's own printed numbers conflict.
श्लोक 4.116
तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारिविशिष्टश्रेयोऽर्थिभिरनसूयुभिरभ्युपेयात् ॥ ४८ ॥
taṁ śiṣyagurusabrahmacāriviśiṣṭaśreyo'rthibhiranasūyubhirabhyupeyāt || 48 ||
उसके पास शिष्य, गुरु, सहपाठी (सब्रह्मचारी) अथवा विशिष्ट श्रेय (कल्याण) की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को, असूया (ईर्ष्या-द्वेष) से रहित होकर, जाना चाहिए।
श्लोक 4.117
प्रतिपक्षहीनमपि वा प्रयोजनार्थमर्थित्वे ॥ ४९ ॥
pratipakṣahīnamapi vā prayojanārthamarthitve || 49 ||
अथवा प्रतिपक्ष (विरोधी मत) से रहित व्यक्ति के पास भी, किसी प्रयोजन के लिए, जिज्ञासा (जानने की सच्ची इच्छा) होने पर जाना चाहिए।
श्लोक 4.118
तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे वीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत् ॥ ५० ॥
tattvādhyavasāyasaṁrakṣaṇārthaṁ jalpavitaṇḍe vījaprarohasaṁrakṣaṇārthaṁ kaṇṭakaśākhāvaraṇavat || 50 ||
अपने तत्त्व-निश्चय (सत्य के निर्णय) की सुरक्षा के लिए जल्प और वितण्डा का प्रयोग किया जाता है — जैसे अंकुरित बीज की रक्षा के लिए काँटेदार शाखाओं की बाड़ लगाई जाती है।
श्लोक 4.119
ताभ्यां विगृह्य कथनम् ॥ ५१ ॥
tābhyāṁ vigṛhya kathanam || 51 ||
उन दोनों (जल्प और वितण्डा) के द्वारा विग्रहपूर्वक (विवादात्मक रूप से) वाद-विवाद करना चाहिए — सत्य की निष्ठापूर्ण खोज की रक्षा के साधन के रूप में, न कि स्वयं साध्य के रूप में।
श्लोक 5.1
साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः ॥ १ ॥
sādharmyavaidharmyotkarṣāpakarṣavarṇyāvarṇyavikalpasādhyaprāptyaprāptiprasaṅgapratidṛṣṭāntānutpattisaṁśayaprakaraṇahetvarthāpattyaviśeṣopapattyupalabdhyanupalabdhinityānityakāryasamāḥ || 1 ||
[चौबीस जातियाँ ये हैं:] साधर्म्यसम (समानता-मात्र पर आधारित जाति), वैधर्म्यसम (विसदृशता-मात्र पर आधारित जाति), उत्कर्षसम (आधिक्य-आरोपण पर आधारित जाति), अपकर्षसम (न्यूनता-आरोपण पर आधारित जाति), वर्ण्यसम (विशेष्य को दृष्टान्त मानकर की गई जाति), अवर्ण्यसम (अविशेष्य को पक्ष मानकर की गई जाति), विकल्पसम (विकल्प-मात्र पर आधारित जाति), साध्यसम (दृष्टान्त को भी साध्य मानकर की गई जाति), प्राप्तिसम (हेतु के सम्पर्क पर आधारित जाति), अप्राप्तिसम (हेतु के असम्पर्क पर आधारित जाति), प्रसङ्गसम (अनवस्था-दोष पर आधारित जाति), प्रतिदृष्टान्तसम (प्रति-दृष्टान्त पर आधारित जाति), अनुत्पत्तिसम (कारण की अनुत्पत्ति पर आधारित जाति), संशयसम (उत्पन्न संशय पर आधारित जाति), प्रकरणसम (कथित विवादास्पद प्रश्न पर आधारित जाति), हेतुसम/अहेतुसम ('हेतु ही अहेतु है' इस आक्षेप पर आधारित जाति), अर्थापत्तिसम (अर्थापत्ति पर आधारित जाति), अविशेषसम (कथित अभेद पर आधारित जाति), उपपत्तिसम (समान युक्ति पर आधारित जाति), उपलब्धिसम (निर्दिष्ट कारण के अभाव में भी उपलब्धि पर आधारित जाति), अनुपलब्धिसम (अनुपलब्धि पर आधारित जाति), नित्यसम (नित्यत्व-आरोपण पर आधारित जाति), अनित्यसम (अनित्यत्व-आरोपण पर आधारित जाति), तथा कार्यसम (कार्य की विविधता पर आधारित जाति) — ये चौबीस जातियाँ हैं।
टिप्पणी: This sutra is confirmed to enumerate all 24 traditional jāti-names in the classical order (as promised at 1.1.1 / 1.2.18-20). Note: the compound gives 'hetu' (not 'ahetu') at this point via sandhi, but the defining sutras (17-19) explicitly use the term 'ahetusama' for this same jāti; both names are given here to track that variant.
श्लोक 5.2
साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ ॥ २ ॥
sādharmyavaidharmyābhyāmupasaṁhāre taddharmaviparyayopapatteḥ sādharmyavaidharmyasamau || 2 ||
जब साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा [दृष्टान्त का पक्ष पर] उपसंहार (योजन) किया जाता है, तो चूँकि उसी धर्म का विपर्यय (विपरीत रूप) भी उपपन्न (सिद्ध) हो सकता है, अतः साधर्म्यसम और वैधर्म्यसम [नामक जातियाँ उत्पन्न होती हैं]।
श्लोक 5.3
गोत्वाद्गोसिद्धिवत्तत्सिद्धिः ॥ ३ ॥
gotvādgosiddhivattatsiddhiḥ || 3 ||
जैसे गोत्व (विशिष्ट, सम्बद्ध हेतु) से गो(त्व) की सिद्धि होती है, वैसे ही [किसी भी] साध्य की सिद्धि [समानता-मात्र से नहीं, अपितु विशेष सम्बद्ध हेतु से ही] होनी चाहिए।
श्लोक 5.4
साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यसमाः ॥ ४ ॥
sādhyadṛṣṭāntayordharmavikalpādubhayasādhyatvāccotkarṣāpakarṣavarṇyāvarṇyavikalpasādhyasamāḥ || 4 ||
साध्य और दृष्टान्त के धर्मों में विकल्प (परस्पर आरोपण) सम्भव होने से, तथा दोनों को ही साध्य [अर्थात् सिद्ध किये जाने योग्य] मान लेने से, उत्कर्षसम, अपकर्षसम, वर्ण्यसम, अवर्ण्यसम, विकल्पसम और साध्यसम — ये [छहों जातियाँ उत्पन्न होती हैं]।
टिप्पणी: This sutra bundles six related jātis (jāti-types 3-8 in the master list of sutra 1) under one description, since all six arise from the same tactic of shifting properties between the example and the thesis-subject.
श्लोक 5.5
किंचित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः ॥ ५ ॥
kiṁcitsādharmyādupasaṁhārasiddhervaidharmyādapratiṣedhaḥ || 5 ||
क्योंकि उपसंहार (योजन) की सिद्धि किसी विशेष (प्रासंगिक) साधर्म्य से होती है — और इसी प्रकार सम्बद्ध वैधर्म्य से भी — अतः [किसी भी असम्बद्ध समानता या विषमता के आधार पर की गई आपत्ति वस्तुतः] प्रतिषेध (खण्डन) नहीं है।
श्लोक 5.6
साध्यातिदेशाच्च दृष्टान्तोपपत्तेः ॥ ६ ॥
sādhyātideśācca dṛṣṭāntopapatteḥ || 6 ||
और क्योंकि साध्य का अतिदेश (सीमा-निर्धारण) [अनुमान के आरम्भ में ही] हो चुका होता है, अतः दृष्टान्त [उसी सीमित, प्रासंगिक अंश में ही] उपपन्न (सुसंगत) होता है।
श्लोक 5.7
प्राप्य साध्यमप्राप्य वा हेतोः प्राप्त्याविशिष्टत्वादप्राप्त्यासाधकत्वाच्च प्राप्त्यप्राप्तिसमौ ॥ ७ ॥
prāpya sādhyamaprāpya vā hetoḥ prāptyāviśiṣṭatvādaprāptyāsādhakatvācca prāptyaprāptisamau || 7 ||
'हेतु साध्य को प्राप्त होकर या न प्राप्त होकर [उसे सिद्ध करता है] — प्राप्ति की दशा में वह [साध्य से] अभिन्न होने के कारण अविशिष्ट (व्यर्थ) है, तथा अप्राप्ति की दशा में असाधक है' — इस प्रकार प्राप्तिसम और अप्राप्तिसम [नामक जातियाँ हैं]।
श्लोक 5.8
घटादिनिष्पत्तिदर्शनात्पीडने चाव्यभिचारादप्रतिषेधः ॥ ८ ॥
ghaṭādiniṣpattidarśanātpīḍane cāvyabhicārādapratiṣedhaḥ || 8 ||
क्योंकि घट आदि की निष्पत्ति (दण्डादि साधनों द्वारा, जो साध्य से तादात्म्य नहीं रखते) देखी जाती है, तथा पीडन (तिल-पेरण आदि) में भी [कार्य-कारण-सम्बन्ध] व्यभिचार-रहित पाया जाता है, अतः [यह आपत्ति वास्तविक] प्रतिषेध नहीं है।
श्लोक 5.9
दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात्प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ प्रदीपोपादानप्रसङ्गविनिवृत्तिवत्तद्विनिवृत्तिः ॥ ९ ॥
dṛṣṭāntasya kāraṇānapadeśātpratyavasthānācca pratidṛṣṭāntena prasaṅgapratidṛṣṭāntasamau pradīpopādānaprasaṅgavinivṛttivattadvinivṛttiḥ || 9 ||
क्योंकि दृष्टान्त [में निहित धर्म] के लिए स्वयं कोई स्वतन्त्र कारण नहीं बताया गया [जिससे अनवस्था की आशंका होती है], तथा [विपक्षी] प्रति-दृष्टान्त द्वारा प्रत्यवस्थान (प्रतिवाद) करता है — इस प्रकार प्रसङ्गसम और प्रतिदृष्टान्तसम [नामक जातियाँ हैं]; किन्तु जैसे एक दीपक से दूसरा, और दूसरे से तीसरा दीपक जलाने की परम्परा में अनवस्था का अन्ततः निवर्तन (समाप्ति) हो जाता है, वैसे ही इस [अनवस्था] का भी निवर्तन हो जाता है।
टिप्पणी: The lamp-from-lamp analogy is read here as Nyaya's own point (the regress is not vicious — it terminates), consistent with the standard reading of this sutra as a reply rather than a further restatement of the objection; flagging as an interpretive choice given the sutra's terseness.
श्लोक 5.10
प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः ॥ १० ॥
pratidṛṣṭāntahetutve ca nāheturdṛṣṭāntaḥ || 10 ||
और प्रतिदृष्टान्त को [भी] हेतु का स्थान देने पर भी, [प्रस्तुत मूल] दृष्टान्त हेतु-रहित नहीं हो जाता [अर्थात् उसकी प्रामाणिकता बनी रहती है]।
श्लोक 5.11
प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः ॥ ११ ॥
prāgutpatteḥ kāraṇābhāvādanutpattisamaḥ || 11 ||
'उत्पत्ति से पूर्व कारण का [ही] अभाव होता है [अतः हेतु उस समय कार्यकारी नहीं हो सकता]' — यह अनुत्पत्तिसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.12
तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः ॥ १२ ॥
tathābhāvādutpannasya kāraṇopapatterna kāraṇapratiṣedhaḥ || 12 ||
क्योंकि उस [कारणत्व-रूप] स्वभाव के होने से ही उत्पन्न [कार्य] के लिए कारण उपपन्न (सिद्ध) होता है, अतः [उत्पत्ति-पूर्व की स्थिति दिखाकर किया गया] कारण का प्रतिषेध [युक्तिसंगत] नहीं है।
श्लोक 5.13
सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः ॥ १३ ॥
sāmānyadṛṣṭāntayoraindriyakatve samāne nityānityasādharmyāt saṁśayasamaḥ || 13 ||
'सामान्य और दृष्टान्त — दोनों की इन्द्रिय-ग्राह्यता समान होने से, तथा दोनों में नित्य और अनित्य दोनों के समान धर्म पाए जाने से, [सामान्य के नित्यत्व में] संशय होना चाहिए' — यह संशयसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.14
साधर्म्यात्संशये न संशयो वैधर्म्यादुभयथा वा संशयेऽत्यन्तसंशयप्रसङ्गो नित्यत्वानभ्युपगमाच्च सामान्यस्याप्रतिषेधः ॥ १४ ॥
sādharmyātsaṁśaye na saṁśayo vaidharmyādubhayathā vā saṁśaye'tyantasaṁśayaprasaṅgo nityatvānabhyupagamācca sāmānyasyāpratiṣedhaḥ || 14 ||
यदि [केवल] साधर्म्य से संशय माना जाए तो वह वस्तुतः संशय ही नहीं है; और यदि वैधर्म्य से, अथवा दोनों से संशय माना जाए, तो अत्यन्त (सार्वत्रिक) संशय का अनुचित प्रसंग प्राप्त होगा। तथा चूँकि [प्रतिपादक ने] नित्यत्व को इस प्रकार पुनः-सिद्ध किए जाने योग्य स्वीकार ही नहीं किया, अतः सामान्य का [कोई वैध] प्रतिषेध नहीं बनता।
श्लोक 5.15
उभयसाधर्म्यात्प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः ॥ १५ ॥
ubhayasādharmyātprakriyāsiddheḥ prakaraṇasamaḥ || 15 ||
'दोनों [पक्षों] से समान रूप से साधर्म्य होने के कारण, [इस विषय की सिद्धि की] प्रक्रिया समान रूप से दोनों ओर सिद्ध हो जाती है [अतः विषय विवादास्पद ही रह जाता है]' — यह प्रकरणसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.16
प्रतिपक्षात्प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः ॥ १६ ॥
pratipakṣātprakaraṇasiddheḥ pratiṣedhānupapattiḥ pratipakṣopapatteḥ || 16 ||
प्रतिपक्ष (प्रतिवादी सिद्धान्त) के होने पर ही 'प्रकरण' (विवाद्य प्रश्न) की सिद्धि होती है, अतः [प्रकरणसम द्वारा किया गया] प्रतिषेध [मात्र कथन से] उपपन्न नहीं होता, क्योंकि इसके लिए भी प्रतिपक्ष की स्वतः उपपत्ति (सिद्ध होना) आवश्यक है [जो विपक्षी ने नहीं दिखाई]।
श्लोक 5.17
त्रैकाल्यानुपपत्तेर्हेतोरहेतुसमः ॥ १७ ॥
traikālyānupapatterhetorahetusamaḥ || 17 ||
'हेतु तीनों कालों में से किसी में भी उपपन्न (सिद्ध) नहीं हो सकता — न पूर्व में, न साथ में, न पश्चात् में — [अतः वह हेतु ही नहीं है]' — यह अहेतुसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.18
न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः ॥ १८ ॥
na hetutaḥ sādhyasiddhestraikālyāsiddhiḥ || 18 ||
हेतु से साध्य की सिद्धि होने के लिए उस प्रकार का त्रैकाल्य-सम्बन्धी निर्णय अपेक्षित नहीं है, अतः [उक्त] त्रैकाल्य-असिद्धि [का आक्षेप] स्वयं ही असिद्ध है।
श्लोक 5.19
प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः ॥ १९ ॥
pratiṣedhānupapatteśca pratiṣeddhavyāpratiṣedhaḥ || 19 ||
और चूँकि इसी त्रैकाल्य-तर्क से [विपक्षी का अपना] प्रतिषेध भी उपपन्न नहीं हो सकता [क्योंकि उसका हेतु भी उसी दोष से ग्रस्त होगा], अतः जिसका प्रतिषेध अभीष्ट था [अर्थात् प्रतिपादक का साध्य], उसका प्रतिषेध नहीं हो पाता।
श्लोक 5.20
अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः ॥ २० ॥
arthāpattitaḥ pratipakṣasiddherarthāpattisamaḥ || 20 ||
'अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष की भी सिद्धि हो जाती है' — यह अर्थापत्तिसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.21
अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः ॥ २१ ॥
anuktasyārthāpatteḥ pakṣahānerupapattiranuktatvādanaikāntikatvāccārthāpatteḥ || 21 ||
यदि [प्रतिपादक ने स्वयं] जिस अर्थ की प्रतीति विपक्षी अर्थापत्ति द्वारा निकाल रहा है, उसे वस्तुतः कहा होता, तभी पक्ष-हानि [का आरोप] उपपन्न होता; किन्तु चूँकि वह अनुक्त (अकथित) है, तथा अर्थापत्ति स्वयं अनैकान्तिक (अनिश्चित, एकपक्षीय नहीं) है, अतः [अर्थापत्तिसम आक्षेप निरस्त हो जाता है]।
श्लोक 5.22
एकधर्मोपपत्तेरविशेषे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्सद्भावोपपत्तेरविशेषसमः ॥ २२ ॥
ekadharmopapatteraviśeṣe sarvāviśeṣaprasaṅgātsadbhāvopapatteraviśeṣasamaḥ || 22 ||
'एक [समान] धर्म के पाए जाने से यदि अभेद माना जाए, तो सम्पूर्ण जगत् में ही सार्वत्रिक अभेद का प्रसंग प्राप्त होगा [जो असंगत है], क्योंकि [प्रत्येक वस्तु का] अपना स्वतन्त्र सद्भाव (अस्तित्व) सिद्ध है' — यह अविशेषसम [नामक जाति है, जो इस प्रकार असंगत सिद्ध होती है]।
श्लोक 5.23
क्वचित्तद्धर्मोपपत्तेः क्वचिच्चानुपपत्तेः प्रतिषेधाभावः ॥ २३ ॥
kvacittaddharmopapatteḥ kvaciccānupapatteḥ pratiṣedhābhāvaḥ || 23 ||
क्योंकि वह धर्म कहीं उपपन्न (विद्यमान) होता है और कहीं अनुपपन्न (अविद्यमान) — अतः [आंशिक अभेद-मात्र से सर्वथा भेद का] प्रतिषेध नहीं बनता।
श्लोक 5.24
उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः ॥ २४ ॥
ubhayakāraṇopapatterupapattisamaḥ || 24 ||
'दोनों [परस्पर-विरोधी पक्षों] के लिए समान रूप से युक्ति (उपपत्ति) दी जा सकती है' — यह उपपत्तिसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.25
उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः ॥ २५ ॥
upapattikāraṇābhyanujñānādapratiṣedhaḥ || 25 ||
चूँकि [विपक्षी स्वयं प्रतिपक्ष के लिए] युक्ति (उपपत्ति)-रूप कारण देकर, इसी से यह स्वीकार कर लेता है कि युक्तिसंगत कारण [सामान्यतः] वैध साधन है, अतः [उपपत्तिसम द्वारा किया गया आक्षेप वैध] प्रतिषेध नहीं है।
श्लोक 5.26
निर्दिष्टकारणाभावेऽप्युपलम्भादुपलब्धिसमः ॥ २६ ॥
nirdiṣṭakāraṇābhāve'pyupalambhādupalabdhisamaḥ || 26 ||
'निर्दिष्ट कारण के अभाव में भी [कार्य की] उपलब्धि होती देखी जाती है [अतः वह निर्दिष्ट कारण वास्तविक कारण नहीं है]' — यह उपलब्धिसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.27
कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २७ ॥
kāraṇāntarādapi taddharmopapatterapratiṣedhaḥ || 27 ||
क्योंकि वही धर्म (कार्य) किसी अन्य कारण से भी उपपन्न (उत्पन्न) हो सकता है [जिससे मूल कारण का खण्डन नहीं होता], अतः [उपलब्धिसम] प्रतिषेध नहीं है।
श्लोक 5.28
तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्विपरीतोपपत्तेरनुपलब्धिसमः ॥ २८ ॥
tadanupalabdheranupalambhādabhāvasiddhau tadviparītopapatteranupalabdhisamaḥ || 28 ||
'जब [किसी वस्तु] की अनुपलब्धि (अ-दर्शन) मात्र से उसके अभाव की सिद्धि की जाती है, तो उसके विपरीत [अर्थात् भाव] की भी उतनी ही उपपत्ति (सम्भावना) है' — यह अनुपलब्धिसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.29
अनुपलम्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः ॥ २९ ॥
anupalambhātmakatvādanupalabdherahetuḥ || 29 ||
क्योंकि अनुपलब्धि स्वभावतः अनुपलम्भ (अ-ज्ञान)-मात्र रूप है, अतः वह [स्वयं में स्वतन्त्र प्रमाणभूत] हेतु नहीं है [जैसा विपक्षी मानकर चलता है]।
श्लोक 5.30
ज्ञानविकल्पानां च भावाभावसंवेदनादध्यात्मम् ॥ ३० ॥
jñānavikalpānāṁ ca bhāvābhāvasaṁvedanādadhyātmam || 30 ||
और [अनुपलब्धि इस प्रकार अप्रामाणिक सिद्ध नहीं होती], क्योंकि ज्ञान के विविध रूपों (विकल्पों) के भाव और अभाव का संवेदन (प्रत्यक्ष अनुभव) अध्यात्म-रूप से (अन्तः, आत्म-साक्षी द्वारा) होता है [अतः उस क्षेत्र में अनुपलब्धि यथार्थतः प्रमाणभूत है]।
टिप्पणी: The phrase 'adhyātmam' is terse and the exact intended scope is debated among commentators; rendered here as Nyaya affirming that non-apprehension IS a valid ground specifically for inner/cognitive states (known via introspection), closing the anupalabdhisama discussion (sutras 28-30). Flagging as an interpretive choice.
श्लोक 5.31
साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः ॥ ३१ ॥
sādharmyāttulyadharmopapatteḥ sarvānityatvaprasaṅgādanityasamaḥ || 31 ||
'साधर्म्य से समान धर्म की उपपत्ति सम्भव होने के कारण, [इसी तर्क से तो] सम्पूर्ण [वस्तुजात] के अनित्यत्व का प्रसंग प्राप्त होगा' — यह अनित्यसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.32
साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसामर्थ्यात् ॥ ३२ ॥
sādharmyādasiddheḥ pratiṣedhāsiddhiḥ pratiṣedhyasāmarthyāt || 32 ||
क्योंकि [मात्र] साधर्म्य से [निकाला गया निष्कर्ष] असिद्ध है, अतः [अनित्यसम द्वारा किया गया] प्रतिषेध [स्वयं] असिद्ध है — क्योंकि जिसका प्रतिषेध अभीष्ट है [अर्थात् प्रतिपादक का मूल हेतु], उसका अपना [विशेष, सम्बद्ध] सामर्थ्य बना रहता है।
श्लोक 5.33
दृष्टान्ते च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात्तस्य चोभयथाभावान्नाविशेषः ॥ ३३ ॥
dṛṣṭānte ca sādhyasādhanabhāvena prajñātasya dharmasya hetutvāttasya cobhayathābhāvānnāviśeṣaḥ || 33 ||
और दृष्टान्त में साध्य-साधन-भाव से (अर्थात् साध्य और साधन के विशिष्ट सम्बन्ध-रूप में) जाना गया धर्म ही [वैध रूप से] हेतु होता है; और चूँकि वह विशिष्ट साध्य-साधन-सम्बन्ध — न कि समानता-मात्र — [विपक्षी द्वारा समीकृत] दोनों स्थलों में नहीं पाया जाता, अतः [वास्तव में कोई] अविशेष (अभेद) नहीं है।
टिप्पणी: This continues the anityasama discussion (sutras 31-32) with a further, more precise reply, rather than opening a separate jāti — the term 'aviśeṣa' here is used generically ('no [real] non-distinction'), not as a reference back to the earlier aviśeṣasama jāti of sutras 22-23.
श्लोक 5.34
नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसमः ॥ ३४ ॥
nityamanityabhāvādanitye nityatvopapatternityasamaḥ || 34 ||
'नित्य [पदार्थ] में भी अनित्य के कुछ धर्म पाए जाने से, [इसी प्रकार] अनित्य में भी नित्यत्व की उपपत्ति हो सकती है' — यह नित्यसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.35
प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः ॥ ३५ ॥
pratiṣedhye nityamanityabhāvādanitye'nityatvopapatteḥ pratiṣedhābhāvaḥ || 35 ||
जिसका प्रतिषेध अभीष्ट है, उसमें नित्य के अनित्य-भाव [कुछ अंश में] मान भी लिया जाए, तो भी अनित्य में अनित्यत्व की उपपत्ति निर्बाध रूप से (बिना किसी वास्तविक विरोध के) होती है, अतः [नित्यसम द्वारा किया गया] प्रतिषेध सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 5.36
प्रयत्नकार्यानेकत्वात्कार्यसमः ॥ ३६ ॥
prayatnakāryānekatvātkāryasamaḥ || 36 ||
'प्रयत्न से अनेक प्रकार के कार्य उत्पन्न होते देखे जाते हैं [अतः प्रयत्न को किसी एक निश्चित कार्य का कारण मानना उचित नहीं]' — यह कार्यसम [नामक जाति] है।
श्लोक 5.37
कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः ॥ ३७ ॥
kāryānyatve prayatnāhetutvamanupalabdhikāraṇopapatteḥ || 37 ||
कार्य भिन्न होने की दशा में [ऐसा प्रतीत हो सकता है कि] प्रयत्न [उस भिन्न कार्य का] कारण नहीं है — किन्तु [उस स्थिति में भी] किसी अन्य, अभी तक अनुपलब्ध (अज्ञात) कारण की उपपत्ति (सम्भावना) बनी रहती है [जिससे प्रस्तुत कार्य-कारण-सम्बन्ध खण्डित नहीं होता]।
श्लोक 5.38
प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः ॥ ३८ ॥
pratiṣedhe'pi samāno doṣaḥ || 38 ||
प्रतिषेध (खण्डन) में भी वही दोष समान रूप से [विद्यमान] है [अर्थात् विपक्षी का अपना खण्डन भी उसी दोष से ग्रस्त होता है]।
श्लोक 5.39
सर्वत्रैवम् ॥ ३९ ॥
sarvatraivam || 39 ||
और यह [नियम] सर्वत्र इसी प्रकार लागू होता है।
श्लोक 5.40
प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोषः ॥ ४० ॥
pratiṣedhavipratiṣedhe pratiṣedhadoṣavaddoṣaḥ || 40 ||
प्रतिषेध के प्रतिषेध (अर्थात् खण्डन के पुनः खण्डन) में भी वही दोष होता है जो [मूल] प्रतिषेध के दोष के समान है।
श्लोक 5.41
प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात्समानो दोषः ॥ ४१ ॥
pratiṣedhaṁ sadoṣamabhyupetya pratiṣedhavipratiṣedhe samāno doṣaprasaṅgo matānujñā svapakṣalakṣaṇāpekṣopapattyupasaṁhāre hetunirdeśe parapakṣadoṣābhyupagamātsamāno doṣaḥ || 41 ||
प्रतिषेध को सदोष स्वीकार करके, [यदि उसका] प्रतिषेध-विप्रतिषेध (प्रति-खण्डन) किया जाए, तो [स्वयं में] समान दोष का प्रसंग प्राप्त होता है — इसी को 'मतानुज्ञा' (अपने ही पक्ष में विपक्षी के समान दोष की स्वीकृति) कहते हैं। इसी प्रकार, अपने पक्ष के लक्षण की अपेक्षा रखने वाली उपपत्ति और उपसंहार में, तथा हेतु के निर्देश में, जब [स्वयं] परपक्ष का दोष स्वीकार कर लिया जाता है, तो [दोनों पक्षों में] दोष समान होता है।
टिप्पणी: This closing sutra formally defines matānujñā (sutras 38-41 form its build-up: the fault-in-refutation principle stated generally in 38-39, then applied to counter-refutation in 40, then named in 41).
श्लोक 5.42
प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासो हेत्वन्तरमर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकमप्राप्तकालं न्यूनमधिकं पुनरुक्तमननुभाषणमज्ञानमप्रतिभा विक्षेपो मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं निरनुयोज्यानुयोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि ॥ १ ॥
pratijñāhāniḥ pratijñāntaraṁ pratijñāvirodhaḥ pratijñāsaṁnyāso hetvantaramarthāntaraṁ nirarthakamavijñātārthamapārthakamaprāptakālaṁ nyūnamadhikaṁ punaruktamananubhāṣaṇamajñānamapratibhā vikṣepo matānujñā paryanuyojyopekṣaṇaṁ niranuyojyānuyogo'pasiddhānto hetvābhāsāśca nigrahasthānāni || 1 ||
प्रतिज्ञाहानि (अपने पक्ष का त्याग), प्रतिज्ञान्तर (पक्ष बदलना), प्रतिज्ञाविरोध (अपने ही हेतु से पक्ष का विरोध), प्रतिज्ञासंन्यास (पक्ष का परित्याग), हेत्वन्तर (हेतु बदलना), अर्थान्तर (असंबद्ध कथन), निरर्थक (निरर्थक वर्ण-समूह), अविज्ञातार्थ (अबोधगम्य कथन), अपार्थक (असंगत कथन), अप्राप्तकाल (क्रम-भंग कथन), न्यून (अवयव-हीन कथन), अधिक (आधिक्य कथन), पुनरुक्त (पुनरावृत्ति), अननुभाषण (न दोहराने का दोष), अज्ञान (न समझ पाना), अप्रतिभा (उत्तर देने में असमर्थता), विक्षेप (वाद से पलायन), मतानुज्ञा (प्रतिपक्षी के मत को स्वीकृति), पर्यनुयोज्योपेक्षण (दोष की उपेक्षा), निरनुयोज्यानुयोग (निर्दोष पर दोषारोपण), अपसिद्धान्त (सिद्धान्त से विचलन), और हेत्वाभास (दोषपूर्ण हेतु) — ये (बाईस) निग्रहस्थान (वाद-पराजय के बिंदु) हैं।
टिप्पणी: Master enumeration of all 22 nigrahasthānas (formal points of defeat in debate) in their fixed classical order; each is individually defined in the sutras that follow (5.2.2–5.2.24).
श्लोक 5.43
प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा स्वदृष्टान्ते प्रतिज्ञाहानिः ॥ २ ॥
pratidṛṣṭāntadharmābhyanujñā svadṛṣṭānte pratijñāhāniḥ || 2 ||
अपने दृष्टान्त में प्रतिवादी के प्रतिदृष्टान्त वाले धर्म (गुण) को स्वीकार कर लेना ही प्रतिज्ञाहानि — 'अपने पक्ष का त्याग' — कहलाता है।
श्लोक 5.44
प्रतिज्ञातार्थप्रतिषेधे धर्मविकल्पात्तदर्थनिर्देशः प्रतिज्ञान्तरम् ॥ ३ ॥
pratijñātārthapratiṣedhe dharmavikalpāttadarthanirdeśaḥ pratijñāntaram || 3 ||
अपनी प्रतिज्ञा के खण्डित हो जाने पर, उसी प्रतिपाद्य अर्थ को किसी अन्य धर्म (गुण) के सहारे पुनः प्रस्तुत करना प्रतिज्ञान्तर — 'पक्ष-परिवर्तन' — कहलाता है।
श्लोक 5.45
प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः ॥ ४ ॥
pratijñāhetvorvirodhaḥ pratijñāvirodhaḥ || 4 ||
प्रतिज्ञा (पक्ष) और हेतु में परस्पर विरोध होना ही प्रतिज्ञाविरोध — 'अपनी ही प्रतिज्ञा का विरोध' — है।
श्लोक 5.46
पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः ॥ ५ ॥
pakṣapratiṣedhe pratijñātārthāpanayanaṁ pratijñāsaṁnyāsaḥ || 5 ||
अपने पक्ष के खण्डित होने पर, प्रतिज्ञा में कहे गए अर्थ को ही अस्वीकार कर देना (यह कहकर कि मैंने ऐसा कहा ही नहीं) प्रतिज्ञासंन्यास — 'पक्ष का परित्याग' — है।
श्लोक 5.47
अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ॥ ६ ॥
aviśeṣokte hetau pratiṣiddhe viśeṣamicchato hetvantaram || 6 ||
सामान्य रूप से कहे गए हेतु के खण्डित हो जाने पर, उसमें विशेषण जोड़कर उसे बचाने का प्रयास करना हेत्वन्तर — 'हेतु-परिवर्तन' — है।
श्लोक 5.48
प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् ॥ ७ ॥
prakṛtādarthādapratisambaddhārthamarthāntaram || 7 ||
प्रकृत (विचाराधीन) विषय से असंबद्ध अर्थ वाला कथन ही अर्थान्तर — 'असंबद्ध कथन' — है।
श्लोक 5.49
वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥
varṇakramanirdeśavannirarthakam || 8 ||
जो कथन वर्णों के क्रमिक उच्चारण मात्र (जैसे वर्णमाला का पाठ) के समान हो और जिसका कोई अर्थ न निकले, वह निरर्थक — 'निरर्थक कथन' — कहलाता है।
श्लोक 5.50
परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥
pariṣatprativādibhyāṁ trirabhihitamapyavijñātamavijñātārtham || 9 ||
जो कथन सभा और प्रतिवादी के समक्ष तीन बार कहे जाने पर भी समझ में न आए, वह अविज्ञातार्थ — 'अबोधगम्य कथन' — है।
श्लोक 5.51
पौर्वापर्यायोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम् ॥ १० ॥
paurvāparyāyogādapratisambaddhārthamapārthakam || 10 ||
जिसमें पूर्वापर (आगे-पीछे के पदों के) सम्बन्ध के अभाव से अर्थ असंबद्ध रह जाए, वह अपार्थक — 'असंगत कथन' — है।
श्लोक 5.52
अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम् ॥ ११ ॥
avayavaviparyāsavacanamaprāptakālam || 11 ||
न्याय-वाक्य के अवयवों (प्रतिज्ञा, हेतु आदि) को उलटे क्रम में कहना अप्राप्तकाल — 'असामयिक कथन' — है।
श्लोक 5.53
हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम् ॥ १२ ॥
hīnamanyatamenāpyavayavena nyūnam || 12 ||
पंचावयव वाक्य में से किसी एक भी अवयव के अभाव वाला कथन न्यून — 'अवयव-हीन कथन' — है।
श्लोक 5.54
हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ॥ १३ ॥
hetūdāharaṇādhikamadhikam || 13 ||
आवश्यकता से अधिक हेतुओं या उदाहरणों से युक्त कथन अधिक — 'आधिक्य कथन' — है।
श्लोक 5.55
शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात् ॥ १४ ॥
śabdārthayoḥ punarvacanaṁ punaruktamanyatrānuvādāt || 14 ||
पहले कहे गए शब्द या अर्थ को पुनः कहना — अनुवाद (प्रयोजनपूर्वक किए गए पुनरुल्लेख) को छोड़कर — पुनरुक्त — 'पुनरावृत्ति दोष' — है।
श्लोक 5.56
अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनं पुनरुक्तम् ॥ १५ ॥
arthādāpannasya svaśabdena punarvacanaṁ punaruktam || 15 ||
जो अर्थ अर्थापत्ति (कथन से स्वतः प्राप्त संकेत) द्वारा पहले ही ज्ञात हो चुका हो, उसे पुनः स्पष्ट शब्दों में कह देना भी पुनरुक्त का ही एक भेद है।
टिप्पणी: Gives the second sub-variety of punarukta (repetition), continuing directly from 5.2.14 rather than introducing a new nigrahasthāna; the master list at 5.2.1 counts punarukta as a single item among the 22, so this does not affect the overall count.
श्लोक 5.57
विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम् ॥ १६ ॥
vijñātasya pariṣadā trirabhihitasyāpyapratyuccāraṇamananubhāṣaṇam || 16 ||
जिस बात को सभा तीन बार कहे जाने पर भी समझ चुकी हो, उसे (आवश्यकता होने पर भी) पुनः दोहराकर न कहना अननुभाषण — 'न दोहराने का दोष' — है।
श्लोक 5.58
अविज्ञातं चाज्ञानम् ॥ १७ ॥
avijñātaṁ cājñānam || 17 ||
और जो बात समझ में ही न आए, वह अज्ञान — 'न समझ पाने का दोष' — है।
श्लोक 5.59
उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ॥ १८ ॥
uttarasyāpratipattirapratibhā || 18 ||
उत्तर देने में असमर्थ होना अर्थात कोई प्रत्युत्तर न दे पाना अप्रतिभा — 'उत्तर देने में असमर्थता' — है।
श्लोक 5.60
कार्यव्यासङ्गात्कथाविच्छेदो विक्षेपः ॥ १९ ॥
kāryavyāsaṅgātkathāvicchedo vikṣepaḥ || 19 ||
किसी अन्य कार्य में व्यस्तता का बहाना बनाकर वाद-विवाद को बीच में ही छोड़ देना विक्षेप — 'वाद से पलायन' — है।
श्लोक 5.61
स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात्परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥ २० ॥
svapakṣe doṣābhyupagamātparapakṣe doṣaprasaṅgo matānujñā || 20 ||
अपने पक्ष में दोष स्वीकार कर लेने से वही दोष प्रतिवादी के पक्ष में भी लागू हो जाना (और उसे भी स्वीकार करना पड़ना) मतानुज्ञा — 'प्रतिपक्षी के मत को स्वीकृति' — है।
श्लोक 5.62
निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम् ॥ २१ ॥
nigrahasthānaprāptasyānigrahaḥ paryanuyojyopekṣaṇam || 21 ||
निग्रहस्थान (पराजय-बिंदु) वास्तव में घटित हो जाने पर भी उसे इंगित न करना अर्थात प्रतिवादी को न टोकना पर्यनुयोज्योपेक्षण — 'दोष की उपेक्षा' — है।
श्लोक 5.63
अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः ॥ २२ ॥
anigrahasthāne nigrahasthānābhiyogo niranuyojyānuyogaḥ || 22 ||
जहाँ वास्तव में कोई निग्रहस्थान (दोष) घटित ही न हुआ हो, वहाँ भी दोष का आरोप लगाना निरनुयोज्यानुयोग — 'निर्दोष पर दोषारोपण' — है।
श्लोक 5.64
सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात्कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः ॥ २३ ॥
siddhāntamabhyupetyāniyamātkathāprasaṅgo'pasiddhāntaḥ || 23 ||
अपने सिद्धान्त को स्वीकार करने के पश्चात भी उसका पालन किए बिना वाद-विवाद में प्रवृत्त होना, अर्थात अपने ही सिद्धान्त के विरुद्ध तर्क करना, अपसिद्धान्त — 'सिद्धान्त से विचलन' — है।
श्लोक 5.65
हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः ॥ २४ ॥
hetvābhāsāśca yathoktāḥ || 24 ||
और हेत्वाभास (दोषपूर्ण हेतु) भी, जैसा कि पूर्व में (प्रथम अध्याय, द्वितीय आह्निक, सूत्र ४–९ में) कहा जा चुका है, वैसे ही निग्रहस्थान के रूप में समझे जाने चाहिए।
टिप्पणी: This is the final sutra of the entire Nyaya Sutras. It closes the text with a cross-reference back to the hetvābhāsa (pseudo-probans) definitions given at 1.2.4–9, completing the enumeration of the 22 nigrahasthānas begun at 5.2.1.