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साङ्ख्यकारिका

Sāṅkhyakārikā

रचयिता: Ishvarakrishna72 श्लोक

इस अनुवाद के विषय में

Sankhya Karika is dense, technical philosophical verse (karika), not narrative, and each verse packs real doctrinal argument -- proofs, enumerations, and precise definitions -- rather than descriptive content. Translations aim to render the actual philosophical claim being made, in plain but accurate Hindi and English, rather than a loose paraphrase. Standard Samkhya technical vocabulary (purusha, prakriti, mahat/buddhi, ahamkara, tanmatra, guna, sattva, rajas, tamas, guna, linga, kaivalya, etc.) is retained and briefly glossed in English at first occurrence rather than flattened into generic words that would lose precision.

2 श्लोकों पर टिप्पणी दी गई है, जहाँ पाठ विवादित है।

श्लोक 1.1

दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥

duḥkhatrayābhighātājjijñāsā tadapaghātake hetau | dṛṣṭe sā'pārthā cennaikāntātyantato'bhāvāt || 1 ||

तीन प्रकार के दुःख की पीड़ा से उसे दूर करने के उपाय के विषय में जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यदि कोई कहे कि दृश्य (लौकिक) उपाय विद्यमान होने से यह जिज्ञासा व्यर्थ है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि उनसे एकांतिक और आत्यंतिक निवृत्ति नहीं होती।

श्लोक 1.2

दृष्टवदानुश्रविकः स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः । तद्विपरीतः श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ २ ॥

dṛṣṭavadānuśravikaḥ sa hyaviśuddhikṣayātiśayayuktaḥ | tadviparītaḥ śreyān vyaktāvyaktajñavijñānāt || 2 ||

दृश्य (लौकिक) उपाय आनुश्रविक (वैदिक) उपाय के समान ही है, क्योंकि दोनों अशुद्धि, क्षय और अतिशय से युक्त हैं। इनसे श्रेष्ठ है व्यक्त, अव्यक्त और ज्ञ (ज्ञाता, अर्थात् पुरुष) के विवेकपूर्ण ज्ञान से प्राप्त उपाय।

श्लोक 1.3

मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ ३ ॥

mūlaprakṛtiravikṛtirmahadādyāḥ prakṛtivikṛtayaḥ sapta | ṣoḍaśakastu vikāro na prakṛtirna vikṛtiḥ puruṣaḥ || 3 ||

मूलप्रकृति किसी की विकृति (उत्पाद) नहीं है। महत् (बुद्धि) से लेकर सात तत्त्व प्रकृति भी हैं और विकृति भी। सोलह का समूह (पंच महाभूत, मन तथा दस इंद्रियाँ) केवल विकृति है, प्रकृति नहीं। पुरुष न प्रकृति है और न विकृति।

श्लोक 1.4

दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि ॥ ४ ॥

dṛṣṭamanumānamāptavacanaṁ ca sarvapramāṇasiddhatvāt | trividhaṁ pramāṇamiṣṭaṁ prameyasiddhiḥ pramāṇāddhi || 4 ||

प्रत्यक्ष (दृष्ट), अनुमान और आप्तवचन -- ये तीन प्रमाण माने गए हैं, क्योंकि शेष सभी प्रमाण इन्हीं में समाहित हो जाते हैं। प्रमाण से ही प्रमेय (ज्ञातव्य वस्तु) की सिद्धि होती है।

श्लोक 1.5

प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं त्रिविधमनुमानमाख्यातम् । तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनं तु ॥ ५ ॥

prativiṣayādhyavasāyo dṛṣṭaṁ trividhamanumānamākhyātam | talliṅgaliṅgipūrvakamāptaśrutirāptavacanaṁ tu || 5 ||

प्रत्येक विषय के प्रति निश्चयात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष है। अनुमान, जो तीन प्रकार का कहा गया है, लिंग और लिंगी के संबंध पर आधारित है। आप्तवचन विश्वसनीय पुरुष का वचन (आप्तश्रुति) है।

टिप्पणी: Wikisource markup showed a stray extra danda (‘॥। ५ ॥’) at the verse-number mark; normalized to a single danda, no textual content affected.

श्लोक 1.6

सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् । तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥ ६ ॥

sāmānyatastu dṛṣṭādatīndriyāṇāṁ pratītiranumānāt | tasmādapi cāsiddhaṁ parokṣamāptāgamātsiddham || 6 ||

इंद्रियों से परे (अतींद्रिय) पदार्थों का ज्ञान सामान्यतः दृष्ट तथ्यों से किए गए अनुमान से होता है। किंतु जो इससे भी असिद्ध और परोक्ष रह जाता है, वह आप्त पुरुषों के आगम (आप्तागम) से सिद्ध होता है।

श्लोक 1.7

अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् । सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ ७ ॥

atidūrāt sāmīpyādindriyaghātānmano'navasthānāt | saukṣmyādvyavadhānādabhibhavāt samānābhihārācca || 7 ||

अत्यंत दूर होने से, अत्यंत निकट होने से, इंद्रिय के घात (दोष) से, मन के अस्थिर होने से, सूक्ष्मता से, व्यवधान (अवरोध) से, अभिभव (किसी तेज वस्तु से दब जाने) से, तथा समान वस्तुओं में मिल जाने से -- वस्तु विद्यमान होते हुए भी अदृष्ट रह सकती है।

श्लोक 1.8

सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात् कार्यतस्तदुपलब्धेः । महदादि तच्च कार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपं च ॥ ८ ॥

saukṣmyāttadanupalabdhirnābhāvāt kāryatastadupalabdheḥ | mahadādi tacca kāryaṁ prakṛtisarūpaṁ virūpaṁ ca || 8 ||

वह (प्रकृति) सूक्ष्मता के कारण अनुपलब्ध है, अभाव के कारण नहीं -- क्योंकि वह अपने कार्य से उपलब्ध होती है। महत् आदि उसका कार्य है, जो प्रकृति के सदृश भी है और विरूप (असदृश) भी।

श्लोक 1.9

असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥ ९ ॥

asadakaraṇādupādānagrahaṇāt sarvasambhavābhāvāt | śaktasya śakyakaraṇāt kāraṇabhāvācca satkāryam || 9 ||

कार्य कारण में पहले से विद्यमान रहता है -- क्योंकि असत् वस्तु का उत्पादन नहीं हो सकता, क्योंकि उपादान कारण का ग्रहण आवश्यक है, क्योंकि सब कुछ सर्वत्र संभव नहीं है, क्योंकि समर्थ कारण अपनी शक्ति के अनुरूप ही कार्य करता है, और क्योंकि कार्य कारण के स्वभाव का ही रूप होता है -- इसलिए कार्य सत्कार्यवाद के अनुसार कारण में सत् है।

श्लोक 1.10

हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिंङ्गम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ १० ॥

hetumadanityamavyāpi sakriyamanekamāśritaṁ liṁṅgam | sāvayavaṁ paratantraṁ vyaktaṁ viparītamavyaktam || 10 ||

व्यक्त (प्रकट जगत्) सहेतुक, अनित्य, अव्यापी, सक्रिय, अनेक, आश्रित, अपने कारण में लीन होने योग्य, सावयव और परतंत्र है। अव्यक्त (अप्रकट प्रकृति) इन सबसे विपरीत है।

श्लोक 1.11

त्रिगुणमविवेकि विषयः सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि । व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ॥ ११ ॥

triguṇamaviveki viṣayaḥ sāmānyamacetanaṁ prasavadharmi | vyaktaṁ tathā pradhānaṁ tadviparītastathā ca pumān || 11 ||

व्यक्त त्रिगुणात्मक, अविवेकी (अपने कारण से अपृथक्), विषयभूत, सामान्य, अचेतन और प्रसवधर्मी (उत्पादनशील) है। प्रधान (अव्यक्त प्रकृति) भी वैसी ही है। पुरुष इससे विपरीत है, अर्थात् चेतन और अनुत्पादक।

श्लोक 1.12

प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणाः ॥ १२ ॥

prītyaprītiviṣādātmakāḥ prakāśapravṛttiniyamārthāḥ | anyonyābhibhavāśrayajananamithunavṛttayaśca guṇāḥ || 12 ||

गुण (सत्त्व, रजस्, तमस् -- प्रकृति के तीन घटक) प्रीति, अप्रीति और विषाद स्वभाव वाले हैं, तथा प्रकाश, प्रवृत्ति और नियम (संयम) के उद्देश्य वाले हैं। वे परस्पर एक-दूसरे को दबाते हैं, एक-दूसरे का आश्रय लेते हैं, एक-दूसरे को उत्पन्न करते हैं, परस्पर मिलते हैं और साथ मिलकर कार्य करते हैं।

श्लोक 1.13

सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रजः । गुरु वरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः ॥ १३ ॥

sattvaṁ laghu prakāśakamiṣṭamupaṣṭambhakaṁ calaṁ ca rajaḥ | guru varaṇakameva tamaḥ pradīpavaccārthato vṛttiḥ || 13 ||

सत्त्व लघु और प्रकाशक माना गया है, रजस् उत्तेजक और चंचल है, तमस् गुरु और आवरणकारी (आच्छादक) है। दीपक के समान, इनकी वृत्ति (कार्य) एक ही प्रयोजन, अर्थात् पुरुष की सेवा, के लिए है।

श्लोक 1.14

अविवेक्यादेः सिद्धिस्त्रैगुण्यात् तद्विपर्ययाभावात् । कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम् ॥ १४ ॥

avivekyādeḥ siddhistraiguṇyāt tadviparyayābhāvāt | kāraṇaguṇātmakatvāt kāryasyāvyaktamapi siddham || 14 ||

व्यक्त जगत् का अविवेकित्व आदि उसके त्रिगुणात्मक होने से सिद्ध होता है; और इसी प्रकार अव्यक्त में इसके विपरीत गुणों का अभाव भी सिद्ध होता है। कार्य कारण के गुणों से युक्त होता है, इसलिए अव्यक्त भी, यद्यपि प्रत्यक्ष नहीं, अपने कार्य से सिद्ध होता है।

श्लोक 1.15

भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तितः प्रवृत्तेश्च । कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥ १५ ॥

bhedānāṁ parimāṇāt samanvayāt śaktitaḥ pravṛtteśca | kāraṇakāryavibhāgādavibhāgād vaiśvarūpyasya || 15 ||

भेदों (विशिष्ट वस्तुओं) के परिमित होने से, समन्वय (व्यापक सामंजस्य) से, शक्ति से उत्पन्न प्रवृत्ति से, कारण और कार्य के विभाग से, तथा वैश्वरूप्य (सभी रूपों) के मूल में अविभाग से -- अव्यक्त कारण की सिद्धि होती है।

श्लोक 1.16

कारणमस्त्यव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणतः समुदयाच्च । परिणामतः सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ॥ १६ ॥

kāraṇamastyavyaktaṁ pravartate triguṇataḥ samudayācca | pariṇāmataḥ salilavat pratipratiguṇāśrayaviśeṣāt || 16 ||

अव्यक्त कारण विद्यमान है। वह त्रिगुणों के समुदाय (संयोग) से तथा परिणाम (रूपांतरण) से प्रवृत्त होता है, जल के समान, प्रत्येक गुण के आश्रय-विशेष के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप धारण करते हुए।

श्लोक 1.17

संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्यादधिष्ठानात् । पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ १७ ॥

saṁghātaparārthatvāt triguṇādiviparyādadhiṣṭhānāt | puruṣo'sti bhoktṛbhāvāt kaivalyārthaṁ pravṛtteśca || 17 ||

पुरुष का अस्तित्व है -- क्योंकि प्रत्येक संघात (समुच्चय) दूसरे के लिए होता है, क्योंकि त्रिगुण आदि से विपरीत किसी तत्त्व का होना आवश्यक है, क्योंकि किसी अधिष्ठाता (नियंता) का होना आवश्यक है, क्योंकि किसी भोक्ता का होना आवश्यक है, तथा क्योंकि जगत् की प्रवृत्ति कैवल्य (मुक्ति) की ओर उन्मुख है।

श्लोक 1.18

जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च । पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥

jananamaraṇakaraṇānāṁ pratiniyamādayugapatpravṛtteśca | puruṣabahutvaṁ siddhaṁ traiguṇyaviparyayāccaiva || 18 ||

पुरुष की बहुलता सिद्ध होती है -- जन्म, मृत्यु और इंद्रियों के प्रत्येक के लिए नियत विभाजन से, सभी की प्रवृत्ति के एक साथ न होने से, तथा त्रिगुणों की भिन्न-भिन्न विषमता से।

श्लोक 1.19

तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वमकर्तृभावश्च ॥ १९ ॥

tasmācca viparyāsāt siddhaṁ sākṣitvamasya puruṣasya | kaivalyaṁ mādhyasthyaṁ draṣṭṛtvamakartṛbhāvaśca || 19 ||

उसी विपर्यास (प्रकृति से विपरीतता) से पुरुष का साक्षित्व सिद्ध होता है -- उसका कैवल्य (एकाकीपन), माध्यस्थ्य (तटस्थता), द्रष्टृत्व (केवल दृष्टा होना) और अकर्तृत्व (अकर्ता होना)।

श्लोक 1.20

तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीनः ॥ २० ॥

tasmāttatsaṁyogādacetanaṁ cetanāvadiva liṅgam | guṇakartṛtve'pi tathā karteva bhavatyudāsīnaḥ || 20 ||

इसलिए उस पुरुष के संयोग से अचेतन लिंग (सूक्ष्म शरीर) चेतनावान् के समान प्रतीत होता है। और इसी प्रकार, यद्यपि वास्तव में गुण ही कर्ता हैं, पुरुष उदासीन रहते हुए भी मानो कर्ता जैसा प्रतीत होता है।

श्लोक 1.21

पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ २१ ॥

puruṣasya darśanārthaṁ kaivalyārthaṁ tathā pradhānasya | paṅgvandhavadubhayorapi saṁyogastatkṛtaḥ sargaḥ || 21 ||

पुरुष के दर्शन (साक्षात्कार) के लिए तथा पुरुष के कैवल्य (मुक्ति) के लिए, दोनों का संयोग होता है -- जैसे लंगड़े और अंधे का संयोग। उसी संयोग से सृष्टि (सर्ग) की प्रवृत्ति होती है।

श्लोक 1.22

प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणश्च षोडशकः । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥ २२ ॥

prakṛtermahāṁstato'haṁkārastasmād gaṇaśca ṣoḍaśakaḥ | tasmādapi ṣoḍaśakāt pañcabhyaḥ pañcabhūtāni || 22 ||

प्रकृति से महत् (बुद्धि) उत्पन्न होता है, उससे अहंकार, उससे सोलह का समूह; और उस सोलह के समूह में से, पाँच तन्मात्राओं से पाँच स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 1.23

अध्यवसायो बुद्धिर्धर्मो ज्ञानं विराग ऐश्वर्यम् । सात्त्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥ २३ ॥

adhyavasāyo buddhirdharmo jñānaṁ virāga aiśvaryam | sāttvikametadrūpaṁ tāmasamasmādviparyastam || 23 ||

अध्यवसाय (निश्चय) बुद्धि है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य इसका सात्त्विक रूप है; इनसे विपरीत -- अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य -- इसका तामस रूप है।

श्लोक 1.24

अभिमानोऽहंकारः तस्माद्विविधः प्रवर्तते सर्गः । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥

abhimāno'haṁkāraḥ tasmādvividhaḥ pravartate sargaḥ | ekādaśakaśca gaṇastanmātrapañcakaścaiva || 24 ||

अहंकार अभिमान (आत्म-दृढ़ता, 'मैं' का भाव) है। उससे दो प्रकार की सृष्टि होती है -- ग्यारह का समूह (मन और दस इंद्रियाँ), तथा पाँच तन्मात्राओं (सूक्ष्म तत्त्वों) का समूह।

श्लोक 1.25

सात्त्विक एकादशकः प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्रः स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ २५ ॥

sāttvika ekādaśakaḥ pravartate vaikṛtādahaṁkārāt | bhūtādestanmātraḥ sa tāmasastaijasādubhayam || 25 ||

सात्त्विक (वैकृत) अहंकार से ग्यारह का सात्त्विक समूह उत्पन्न होता है; भूतादि (तामस) अहंकार से तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं -- वह तामस सृष्टि है; तैजस (राजस) अहंकार से दोनों उत्पन्न होते हैं, अर्थात् रजस् दोनों सृष्टियों को सक्रिय करता है।

श्लोक 1.26

बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहुः ॥ २६ ॥

buddhīndriyāṇi cakṣuḥśrotraghrāṇarasanatvagākhyāni | vākpāṇipādapāyūpasthāni karmendriyāṇyāhuḥ || 26 ||

बुद्धींद्रियाँ (ज्ञानेंद्रियाँ) चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसन और त्वक् कही जाती हैं। वाक्, पाणि (हाथ), पाद (पैर), पायु (मलद्वार) और उपस्थ (जननेंद्रिय) -- इन्हें कर्मेंद्रियाँ कहते हैं।

श्लोक 1.27

उभयात्मकमत्र मनः सङ्कल्पमिन्द्रियं च साधर्म्यात् । गुणपरिणामविशेषान्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥

ubhayātmakamatra manaḥ saṅkalpamindriyaṁ ca sādharmyāt | guṇapariṇāmaviśeṣānnānātvaṁ bāhyabhedāśca || 27 ||

यहाँ मन (मनस्) दोनों स्वभावों वाला है -- वह संकल्प करता है और स्वयं भी एक इंद्रिय है, दोनों से साधर्म्य के कारण। इंद्रियों की विविधता तथा बाह्य भेद गुणों के विशेष परिणाम से उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 1.28

रूपादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्तिः । वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥ २८ ॥

rūpādiṣu pañcānāmālocanamātramiṣyate vṛttiḥ | vacanādānaviharaṇotsargānandāśca pañcānām || 28 ||

रूप आदि विषयों के प्रति पाँच ज्ञानेंद्रियों की वृत्ति केवल आलोचन (ग्रहण मात्र) मानी गई है। वचन, आदान (ग्रहण), विहरण (गमन), उत्सर्ग (त्याग) और आनंद (जनन-सुख) -- यह पाँच कर्मेंद्रियों की वृत्ति है।

श्लोक 1.29

स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या । सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च ॥ २९ ॥

svālakṣaṇyaṁ vṛttistrayasya saiṣā bhavatyasāmānyā | sāmānyakaraṇavṛttiḥ prāṇādyā vāyavaḥ pañca || 29 ||

स्वालक्षण्य (अपना-अपना विशिष्ट कार्य) तीनों -- बुद्धि, अहंकार, मन -- की पृथक्-पृथक् वृत्ति है, जो असाधारण है; इनकी सामान्य (साझा) वृत्ति प्राण आदि पाँच वायु हैं।

श्लोक 1.30

युगपच्चतुष्टयस्य तु वृत्तिः क्रमशश्च तस्य निर्दिष्टा । दृष्टे तथाप्यदृष्टे त्रयस्य तत्पूर्विका वृत्तिः ॥ ३० ॥

yugapaccatuṣṭayasya tu vṛttiḥ kramaśaśca tasya nirdiṣṭā | dṛṣṭe tathāpyadṛṣṭe trayasya tatpūrvikā vṛttiḥ || 30 ||

चारों -- बुद्धि, अहंकार, मन और कोई बाह्य इंद्रिय -- की वृत्ति वर्तमान विषय के प्रति युगपत् (एक साथ) होती है; तथा इनकी क्रमिक वृत्ति भी बताई गई है। अदृष्ट (अनुपस्थित) विषय के संबंध में, आंतरिक तीनों की वृत्ति उस पूर्व प्रत्यक्ष से पूर्वित होती है।

टिप्पणी: Wikisource text had a stray trailing virama after त्रयस्य् (‘trayasya’, genitive ‘of the three’); corrected to the standard reading त्रयस्य, matching all other editions of this well-attested verse.

श्लोक 1.31

स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥

svāṁ svāṁ pratipadyante parasparākūtahetukāṁ vṛttim | puruṣārtha eva heturna kenacit kāryate karaṇam || 31 ||

इंद्रियाँ परस्पर स्वतःस्फूर्त प्रेरणा से अपनी-अपनी वृत्ति को ग्रहण करती हैं। पुरुष का प्रयोजन ही एकमात्र हेतु है -- कोई भी करण किसी बाह्य कर्ता के द्वारा कार्य में नहीं लगाया जाता।

श्लोक 1.32

करणं त्रयोदशविधं तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥ ३२ ॥

karaṇaṁ trayodaśavidhaṁ tadāharaṇadhāraṇaprakāśakaram | kāryaṁ ca tasya daśadhā''hāryaṁ dhāryaṁ prakāśyaṁ ca || 32 ||

करण (साधन-समूह) तेरह प्रकार का है; वह आहरण (ग्रहण), धारण और प्रकाशन करता है। उसका कार्य दसविध है -- आहार्य (ग्रहणीय), धार्य (धारणीय) और प्रकाश्य (प्रकाशनीय)।

श्लोक 1.33

अन्तःकरणं त्रिविधं दशधा बाह्यं त्रयस्य विषयाख्यम् । साम्प्रतकालं बाह्यं त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम् ॥ ३३ ॥

antaḥkaraṇaṁ trividhaṁ daśadhā bāhyaṁ trayasya viṣayākhyam | sāmpratakālaṁ bāhyaṁ trikālamābhyantaraṁ karaṇam || 33 ||

अंतःकरण (आंतरिक साधन -- बुद्धि, अहंकार, मन) तीन प्रकार का है; बाह्य साधन (दस इंद्रियाँ) दस प्रकार का है और तीनों आंतरिक साधनों के विषय-द्वार कहलाता है। बाह्य साधन केवल वर्तमान काल में कार्य करता है; आंतरिक साधन तीनों कालों -- भूत, वर्तमान, भविष्य -- में कार्य करता है।

श्लोक 1.34

बुद्धिन्द्रियाणि तेषां पञ्च विशेषाविशेषविषयाणि । वाग्भवति शब्दविषया शेषाणि तु पञ्चविषयाणि ॥ ३४ ॥

buddhindriyāṇi teṣāṁ pañca viśeṣāviśeṣaviṣayāṇi | vāgbhavati śabdaviṣayā śeṣāṇi tu pañcaviṣayāṇi || 34 ||

इनमें पाँच बुद्धींद्रियों के विषय विशेष (सूक्ष्म) और अविशेष (स्थूल) दोनों हैं। वाक् का विषय केवल शब्द है; शेष कर्मेंद्रियाँ, मन सहित, पाँचों विषयों से संबंधित हैं।

श्लोक 1.35

सान्तःकरणा बुद्धिः सर्वं विषयमवगाहते यस्मात् । तस्मात् त्रिविधं करणं द्वारि द्वाराणि शेषाणि ॥ ३५ ॥

sāntaḥkaraṇā buddhiḥ sarvaṁ viṣayamavagāhate yasmāt | tasmāt trividhaṁ karaṇaṁ dvāri dvārāṇi śeṣāṇi || 35 ||

क्योंकि बुद्धि, अंतःकरण के साथ, समस्त विषयों को ग्रहण करती है, इसलिए करण मूलतः त्रिविध है; शेष दस बाह्य इंद्रियाँ द्वार हैं, और बुद्धि स्वयं द्वारपाल (द्वारी) है।

श्लोक 1.36

एते प्रदीपकल्पाः परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः । कृत्स्नं पुरुषस्यार्थं प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥ ३६ ॥

ete pradīpakalpāḥ parasparavilakṣaṇā guṇaviśeṣāḥ | kṛtsnaṁ puruṣasyārthaṁ prakāśya buddhau prayacchanti || 36 ||

ये तेरह करण, एक-दूसरे से भिन्न गुणों वाले दीपकों के समान, पुरुष के संपूर्ण प्रयोजन को प्रकाशित करके बुद्धि को अर्पित कर देते हैं।

श्लोक 1.37

सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः । सैव च विशिनष्टि पुनः प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥ ३७ ॥

sarvaṁ pratyupabhogaṁ yasmāt puruṣasya sādhayati buddhiḥ | saiva ca viśinaṣṭi punaḥ pradhānapuruṣāntaraṁ sūkṣmam || 37 ||

क्योंकि बुद्धि पुरुष के लिए समस्त भोग को सिद्ध करती है, वही पुनः प्रकृति और पुरुष के सूक्ष्म भेद को भी विशेष रूप से जानती है।

श्लोक 1.38

तन्मात्राण्यविशेषास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चभ्यः । एते स्मृता विशेषाः शन्ता घोराश्च मूढाश्च ॥ ३८ ॥

tanmātrāṇyaviśeṣāstebhyo bhūtāni pañca pañcabhyaḥ | ete smṛtā viśeṣāḥ śantā ghorāśca mūḍhāśca || 38 ||

तन्मात्राएँ अविशेष (सामान्य, सूक्ष्म) हैं। उनसे पाँच स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं, जिन्हें विशेष (विशिष्ट, स्थूल) कहा गया है -- ये शांत, घोर (उग्र) और मूढ (जड़) स्वभाव वाले माने गए हैं, सत्त्व, रजस्, तमस् की प्रधानता के अनुसार।

श्लोक 1.39

सूक्ष्मा मातापितृजाः सह प्रभूतैस्त्रिधा विशेषाः स्युः । सूक्ष्मास्तेषां नियता मातापितृजा निवर्तन्ते ॥ ३९ ॥

sūkṣmā mātāpitṛjāḥ saha prabhūtaistridhā viśeṣāḥ syuḥ | sūkṣmāsteṣāṁ niyatā mātāpitṛjā nivartante || 39 ||

सूक्ष्म शरीर, माता-पिता से उत्पन्न शरीर, तथा स्थूल भूतों से युक्त जगत् -- ये तीन प्रकार के विशेष (स्थूल सृष्टि) हैं। इनमें सूक्ष्म शरीर नियत (स्थायी) हैं; माता-पिता से उत्पन्न शरीर नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 1.40

पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥ ४० ॥

pūrvotpannamasaktaṁ niyataṁ mahadādisūkṣmaparyantam | saṁsarati nirupabhogaṁ bhāvairadhivāsitaṁ liṅgam || 40 ||

पूर्वोत्पन्न (सबसे पहले उत्पन्न), असक्त, नियत, महत् से लेकर सूक्ष्म भूतों तक फैला हुआ सूक्ष्म शरीर (लिंग), स्वयं भोग रहित होते हुए भी, पूर्व भावों (संस्कारों) से युक्त होकर संसरण (पुनर्जन्म) करता है।

श्लोक 1.41

चित्रं यथाऽऽश्रयमृते स्थाण्वादिभ्यो विना यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ ४१ ॥

citraṁ yathā''śrayamṛte sthāṇvādibhyo vinā yathācchāyā | tadvadvinā viśeṣairna tiṣṭhati nirāśrayaṁ liṅgam || 41 ||

जैसे चित्र आश्रय के बिना नहीं रह सकता, जैसे छाया स्तंभ आदि के बिना नहीं रह सकती, वैसे ही लिंग (सूक्ष्म शरीर) विशेषों (भावों अथवा स्थूल शरीर) के बिना, आश्रय-रहित होकर, स्थिर नहीं रह सकता।

श्लोक 1.42

पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥ ४२ ॥

puruṣārthahetukamidaṁ nimittanaimittikaprasaṅgena | prakṛtervibhutvayogānnaṭavad vyavatiṣṭhate liṅgam || 42 ||

यह लिंग पुरुष के प्रयोजन के लिए, निमित्त-नैमित्तिक संबंध के कारण, तथा प्रकृति की व्यापक शक्ति से, नट (अभिनेता) के समान विभिन्न रूप धारण करता है।

श्लोक 1.43

सांसिद्धिकाश्च भावाः प्राकृतिका वैकृताश्च धर्माद्याः । दृष्टाः करणाश्रयिणः कार्याश्रयिणश्च कललाद्याः ॥ ४३ ॥

sāṁsiddhikāśca bhāvāḥ prākṛtikā vaikṛtāśca dharmādyāḥ | dṛṣṭāḥ karaṇāśrayiṇaḥ kāryāśrayiṇaśca kalalādyāḥ || 43 ||

सांसिद्धिक (जन्मजात) भाव, प्राकृतिक (स्वाभाविक) भाव, तथा वैकृत (अर्जित) भाव -- धर्म आदि, अर्थात् ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और इनके विपरीत -- ये या तो करण (बुद्धि) के आश्रित देखे जाते हैं, या कलल आदि जैसे कार्यों के आश्रित।

श्लोक 1.44

धर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद् भवत्यधर्मेण । ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्धः ॥ ४४ ॥

dharmeṇa gamanamūrdhvaṁ gamanamadhastād bhavatyadharmeṇa | jñānena cāpavargo viparyayādiṣyate bandhaḥ || 44 ||

धर्म से ऊर्ध्वगमन (उच्च लोकों की प्राप्ति) होता है, अधर्म से अधोगमन (निम्न लोकों की प्राप्ति)। ज्ञान से अपवर्ग (मुक्ति) होता है, तथा इसके विपरीत अज्ञान से बंधन होता है।

श्लोक 1.45

वैराग्यात् प्रकृतिलयः संसारो भवति राजसाद् रागात् । ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः ॥ ४५ ॥

vairāgyāt prakṛtilayaḥ saṁsāro bhavati rājasād rāgāt | aiśvaryādavighāto viparyayāttadviparyāsaḥ || 45 ||

वैराग्य से प्रकृतिलय (प्रकृति में लीन होना) होता है, राजस राग से संसार (जन्म-मरण का चक्र) होता है; ऐश्वर्य से अविघात (बाधारहितता) होती है, तथा इसके विपरीत से उसका उल्टा, विघात, होता है।

श्लोक 1.46

एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्यः । गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत् ॥ ४६ ॥

eṣa pratyayasargo viparyayāśaktituṣṭisiddhyākhyaḥ | guṇavaiṣamyavimardāt tasya ca bhedāstu pañcāśat || 46 ||

यह प्रत्यय-सर्ग (बौद्धिक/भावात्मक सृष्टि) है, जो विपर्यय (भ्रम), अशक्ति (असमर्थता), तुष्टि (संतोष) और सिद्धि (उपलब्धि) के नाम से जानी जाती है, और गुणों की विषमता (असंतुलन) से उत्पन्न होती है; इसके भेद पचास हैं।

श्लोक 1.47

पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् । अष्टाविंशतिभेदा तुष्टिर्नवधाऽष्टधा सिद्धिः ॥ ४७ ॥

pañca viparyayabhedā bhavantyaśaktiśca karaṇavaikalyāt | aṣṭāviṁśatibhedā tuṣṭirnavadhā'ṣṭadhā siddhiḥ || 47 ||

विपर्यय (भ्रम) के पाँच भेद हैं; अशक्ति (असमर्थता), इंद्रियों की विकलता से, अट्ठाईस भेदों वाली है; तुष्टि (संतोष) नौ प्रकार की है; सिद्धि (उपलब्धि) आठ प्रकार की है।

श्लोक 1.48

भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोहः । तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्रः ॥ ४८ ॥

bhedastamaso'ṣṭavidho mohasya ca daśavidho mahāmohaḥ | tāmisro'ṣṭādaśadhā tathā bhavatyandhatāmisraḥ || 48 ||

तम (अविद्या) का भेद आठ प्रकार का है, तथा मोह का भेद, जिसे महामोह कहते हैं, दस प्रकार का है; तामिस्र (अंधकार) अठारह प्रकार का है, तथा इसी प्रकार अंधतामिस्र (गहन अंधकार) भी अठारह प्रकार का है।

श्लोक 1.49

एकादशेन्द्रियवधाः सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनाम् ॥ ४९ ॥

ekādaśendriyavadhāḥ saha buddhivadhairaśaktiruddiṣṭā | saptadaśa vadhā buddherviparyayāt tuṣṭisiddhīnām || 49 ||

अशक्ति (असमर्थता) ग्यारह इंद्रियों की विकलताओं तथा बुद्धि की विकलताओं के रूप में बताई गई है; बुद्धि की सत्रह विकलताएँ तुष्टि और सिद्धियों के विपर्यय से उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 1.50

आध्यात्मिक्यश्चतस्रः प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः । बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥ ५० ॥

ādhyātmikyaścatasraḥ prakṛtyupādānakālabhāgyākhyāḥ | bāhyā viṣayoparamāt pañca ca nava tuṣṭayo'bhimatāḥ || 50 ||

नौ तुष्टियाँ मानी गई हैं -- चार आध्यात्मिक (आंतरिक), जिन्हें प्रकृति, उपादान (साधन), काल और भाग्य के आश्रय कहते हैं, तथा पाँच बाह्य, जो विषयों से उपरति (विरक्ति) से उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 1.51

ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः । दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥ ५१ ॥

ūhaḥ śabdo'dhyayanaṁ duḥkhavighātāstrayaḥ suhṛtprāptiḥ | dānaṁ ca siddhayo'ṣṭau siddheḥ pūrvo'ṅkuśastrividhaḥ || 51 ||

आठ सिद्धियाँ हैं -- ऊह (तर्क), शब्द (श्रवण/उपदेश), अध्ययन, दुःख के त्रिविध विघात (निवारण), सुहृत्प्राप्ति (मित्र-लाभ), तथा दान। सिद्धि से पूर्व दोषों के कारणों का त्रिविध अंकुश (नियंत्रण) आवश्यक है।

श्लोक 1.52

न विना भावैर्लिङ्गं न विना लिङ्गेन भावनिर्वृत्तिः । लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविधः प्रवर्तते सर्गः ॥ ५२ ॥

na vinā bhāvairliṅgaṁ na vinā liṅgena bhāvanirvṛttiḥ | liṅgākhyo bhāvākhyastasmād dvividhaḥ pravartate sargaḥ || 52 ||

भावों के बिना लिंग (सूक्ष्म शरीर) नहीं रहता, और लिंग के बिना भावों की निर्वृत्ति (पूर्णता) नहीं होती। इसलिए दो प्रकार की सृष्टि होती है -- लिंगाख्य (सूक्ष्म-शरीर संबंधी) और भावाख्य (भाव संबंधी)।

श्लोक 1.53

अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति । मानुषकश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः ॥ ५३ ॥

aṣṭavikalpo daivastairyagyonaśca pañcadhā bhavati | mānuṣakaścaikavidhaḥ samāsato bhautikaḥ sargaḥ || 53 ||

संक्षेप में भौतिक सृष्टि इस प्रकार है -- दैव (देव योनि) आठ प्रकार की है, तिर्यक्-योनि (पशु-पक्षी योनि) पाँच प्रकार की है, तथा मानुष (मनुष्य योनि) एक ही प्रकार की है।

श्लोक 1.54

उर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलतः सर्गः । मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥ ५४ ॥

urdhvaṁ sattvaviśālastamoviśālaśca mūlataḥ sargaḥ | madhye rajoviśālo brahmādistambaparyantaḥ || 54 ||

ऊपर, उच्च लोकों में, सृष्टि सत्त्व-प्रधान है, मूल में, निम्न लोकों में, तमः-प्रधान है, मध्य में रजः-प्रधान है -- यह सृष्टि ब्रह्मा से लेकर तृणस्तंब (घास के तिनके) तक फैली हुई है।

श्लोक 1.55

तत्र जरामरणकृतं दुःखं प्राप्नोति चेतनः पुरुषः । लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दुःखं स्वभावेन ॥ ५५ ॥

tatra jarāmaraṇakṛtaṁ duḥkhaṁ prāpnoti cetanaḥ puruṣaḥ | liṅgasyāvinivṛttestasmād duḥkhaṁ svabhāvena || 55 ||

उस सृष्टि में चेतन पुरुष जरा और मरण से उत्पन्न दुःख को प्राप्त करता है, क्योंकि लिंग (सूक्ष्म शरीर) की निवृत्ति नहीं हुई है। अतः दुःख वस्तुतः लिंग के स्वभाव से ही है।

श्लोक 1.56

इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भः ॥ ५६ ॥

ityeṣa prakṛtikṛto mahadādiviśeṣabhūtaparyantaḥ | pratipuruṣavimokṣārthaṁ svārtha iva parārtha ārambhaḥ || 56 ||

इस प्रकार यह प्रकृति द्वारा रचित सृष्टि, महत् से लेकर विशेष (स्थूल) भूतों तक, प्रत्येक पुरुष की मुक्ति के लिए है -- यह परार्थ (दूसरे के लिए) आरंभ है, किंतु मानो स्वार्थ, स्वयं के लिए, के समान प्रतीत होता है।

श्लोक 1.57

वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥ ५७ ॥

vatsavivṛddhinimittaṁ kṣīrasya yathā pravṛttirajñasya | puruṣavimokṣanimittaṁ tathā pravṛttiḥ pradhānasya || 57 ||

जैसे अज्ञ (अचेतन) दूध बछड़े की वृद्धि के निमित्त प्रवृत्त होता है, वैसे ही प्रकृति की प्रवृत्ति पुरुष की मुक्ति के निमित्त होती है।

श्लोक 1.58

औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्तते लोकः । पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥

autsukyavinivṛtyarthaṁ yathā kriyāsu pravartate lokaḥ | puruṣasya vimokṣārthaṁ pravartate tadvadavyaktam || 58 ||

जैसे लोग अपनी औत्सुक्य (इच्छा) की निवृत्ति के लिए कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, वैसे ही अव्यक्त (प्रकृति) पुरुष की मुक्ति के लिए प्रवृत्त होती है।

श्लोक 1.59

रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् । पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृतिः ॥ ५९ ॥

raṅgasya darśayitvā nivartate nartakī yathā nṛtyāt | puruṣasya tathā'tmānaṁ prakāśya vinivartate prakṛtiḥ || 59 ||

जैसे नर्तकी सभा को अपना नृत्य दिखाकर नृत्य से निवृत्त हो जाती है, वैसे ही प्रकृति पुरुष के समक्ष स्वयं को प्रकट करके निवृत्त हो जाती है।

श्लोक 1.60

नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिणः पुंसः । गुणवत्यगुणस्य सतः तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥ ६० ॥

nānāvidhairupāyairupakāriṇyanupakāriṇaḥ puṁsaḥ | guṇavatyaguṇasya sataḥ tasyārthamapārthakaṁ carati || 60 ||

अनुपकारी (प्रत्युपकार न करने वाले) पुरुष के प्रति नाना उपायों से उपकार करने वाली, गुणवती प्रकृति, अगुण (गुण-रहित) पुरुष के प्रयोजन के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य करती है।

श्लोक 1.61

प्रकृतेः सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति । या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥ ६१ ॥

prakṛteḥ sukumārataraṁ na kiñcidastīti me matirbhavati | yā dṛṣṭā'smīti punarna darśanamupaiti puruṣasya || 61 ||

मेरी दृष्टि में प्रकृति से अधिक सुकुमार (सुकोमल, लज्जाशील) कुछ भी नहीं है, जो 'मैं देखी जा चुकी हूँ' यह जानकर पुनः पुरुष के दर्शन में नहीं आती।

श्लोक 1.62

तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यते नापि संसरति कञ्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः ॥ ६२ ॥

tasmānna badhyate'ddhā na mucyate nāpi saṁsarati kañcit | saṁsarati badhyate mucyate ca nānāśrayā prakṛtiḥ || 62 ||

इसलिए वास्तव में न कोई बंधता है, न मुक्त होता है, और न ही कोई संसरण (पुनर्जन्म) करता है। नानाश्रया (अनेक आश्रयों वाली) प्रकृति ही संसरण करती है, बंधती है और मुक्त होती है।

श्लोक 1.63

रूपैः सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः । सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥

rūpaiḥ saptabhireva tu badhnātyātmānamātmanā prakṛtiḥ | saiva ca puruṣārthaṁ prati vimocayatyekarūpeṇa || 63 ||

प्रकृति सात रूपों (ज्ञान को छोड़कर शेष भावों) से स्वयं अपने आप को बांधती है, और वही एक रूप (ज्ञान) के द्वारा पुरुष के प्रयोजन हेतु स्वयं को मुक्त भी करती है।

श्लोक 1.64

एवं तत्वाभ्यास्यान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ ६४ ॥

evaṁ tatvābhyāsyānnāsmi na me nāhamityapariśeṣam | aviparyayādviśuddhaṁ kevalamutpadyate jñānam || 64 ||

इस प्रकार तत्त्वों (पच्चीस तत्त्वों) के अभ्यास से 'मैं नहीं हूँ, मेरा कुछ नहीं है, कोई मैं नहीं है' -- यह अपरिशेष (पूर्ण, निःशेष) ज्ञान उत्पन्न होता है। यह विशुद्ध, अविपर्यय (भ्रांतिरहित) और केवल (पूर्ण) ज्ञान है।

श्लोक 1.65

तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् । प्रकृतिं पश्यति पुरुषः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्थः ॥ ६५ ॥

tena nivṛttaprasavāmarthavaśāt saptarūpavinivṛttām | prakṛtiṁ paśyati puruṣaḥ prekṣakavadavasthitaḥ svasthaḥ || 65 ||

उस ज्ञान से पुरुष, दर्शक के समान स्वस्थ (स्वयं में स्थित) होकर, प्रकृति को देखता है -- जो अपना प्रयोजन सिद्ध हो जाने से प्रसव (उत्पादन) से निवृत्त हो चुकी है तथा सप्तरूप (सात रूपों) से भी निवृत्त हो चुकी है।

श्लोक 1.66

रङ्गस्थ इत्युपेक्षक एको दृष्टाहमित्युपरमत्यन्या । सति संयोगेऽपि तयोः प्रयोजनं नास्ति सर्गस्य ॥ ६६ ॥

raṅgastha ityupekṣaka eko dṛṣṭāhamityuparamatyanyā | sati saṁyoge'pi tayoḥ prayojanaṁ nāsti sargasya || 66 ||

'मैं सभा में बैठे दर्शक के समान हूँ' -- इस प्रकार एक, पुरुष, उपेक्षक (उदासीन) बना रहता है। 'मैं देखी जा चुकी' -- इस प्रकार दूसरी, प्रकृति, निवृत्त हो जाती है। दोनों के संयोग में रहते हुए भी अब सृष्टि का कोई प्रयोजन शेष नहीं रहता।

श्लोक 1.67

सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ । तिष्ठति संस्कारवशाच् चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः ॥ ६७ ॥

samyagjñānādhigamād dharmādīnāmakāraṇaprāptau | tiṣṭhati saṁskāravaśāc cakrabhramivad dhṛtaśarīraḥ || 67 ||

सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति से धर्म आदि के अकारण (निष्फल) हो जाने पर भी, संस्कार-वश शरीर धारण किए हुए व्यक्ति चक्र-भ्रमि (कुम्हार के चाक) के समान कुछ समय तक स्थित रहता है।

श्लोक 1.68

प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृतौ । ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ६८ ॥

prāpte śarīrabhede caritārthatvāt pradhānavinivṛtau | aikāntikamātyantikamubhayaṁ kaivalyamāpnoti || 68 ||

शरीर का भेद (वियोग) होने पर, प्रधान (प्रकृति) के चरितार्थ (कृतकृत्य) होकर निवृत्त हो जाने पर, पुरुष ऐकांतिक और आत्यंतिक -- दोनों प्रकार का कैवल्य (मुक्ति) प्राप्त करता है।

श्लोक 1.69

पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् । स्थित्युत्पत्तिप्रलयाश्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥ ६९ ॥

puruṣārthajñānamidaṁ guhyaṁ paramarṣiṇā samākhyātam | sthityutpattipralayāścintyante yatra bhūtānām || 69 ||

पुरुष के प्रयोजन हेतु यह गुह्य (गूढ़) ज्ञान परम ऋषि कपिल द्वारा कहा गया है, जिसमें भूतों (सभी तत्त्वों) की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय का चिंतन किया गया है।

श्लोक 1.70

एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ । आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम् ॥ ७० ॥

etatpavitramagryaṁ munirāsuraye'nukampayā pradadau | āsurirapi pañcaśikhāya tena ca bahudhā kṛtaṁ tantram || 70 ||

इस पवित्र और अग्रगण्य ज्ञान को मुनि कपिल ने अनुकंपावश आसुरि को प्रदान किया; आसुरि ने भी पंचशिख को दिया; और उसके द्वारा यह तंत्र (शास्त्र) बहुविध रूप से विस्तारित किया गया।

श्लोक 1.71

शिष्यपरम्परयाऽऽगतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्यादिभिः । संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥ ७१ ॥

śiṣyaparamparayā''gatamīśvarakṛṣṇena caitadāryādibhiḥ | saṁkṣiptamāryamatinā samyagvijñāya siddhāntam || 71 ||

शिष्य-परंपरा से आए इस ज्ञान को, आर्य बुद्धि वाले ईश्वरकृष्ण ने, सिद्धांत को सम्यक् रूप से जानकर, आर्या छंदों में संक्षिप्त किया।

श्लोक 1.72

सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्थाः कृत्स्नस्य षष्टितन्त्रस्य । आख्यायिकाविरहिताः परवादविवर्जिताश्चापि ॥ ७२ ॥

saptatyāṁ kila ye'rthāste'rthāḥ kṛtsnasya ṣaṣṭitantrasya | ākhyāyikāvirahitāḥ paravādavivarjitāścāpi || 72 ||

निश्चय ही जो अर्थ (विषय) इन सत्तर कारिकाओं में हैं, वे संपूर्ण षष्टितंत्र (साठ विषयों वाले प्राचीन ग्रंथ) के ही अर्थ हैं -- किंतु यहाँ वे आख्यायिकाओं (कथाओं) से रहित तथा परवाद (विरोधी मतों के खंडन) से भी रहित हैं।

स्रोत

Sanskrit Wikisource, साङ्ख्यकारिका (72 karikas) — https://sa.wikisource.org/wiki/साङ्ख्यकारिका · CC BY-SA 4.0