आदि पर्व · अध्याय 103
प्रतीप के पास गंगा का आगमन और शान्तनु का जन्म
राजा प्रतीप जब गंगाद्वार में जप कर रहे होते हैं, तब गंगा स्त्री का रूप धारण करके नदी से निकलती हैं, उनकी दाहिनी जाँघ पर बैठ जाती हैं और उनसे स्वयं को स्वीकार करने को कहती हैं। दाहिनी जाँघ सन्तान और पुत्रवधू का आसन है, इसलिए प्रतीप मना कर देते हैं और उन्हें अपने भावी पुत्र की पत्नी के रूप में चुनते हैं; वे इस शर्त पर मान जाती हैं कि पुत्र उनके कर्मों के विषय में कभी प्रश्न नहीं करेगा। प्रतीप और उनकी रानी के तप से पूर्वजन्म के महाभिष शान्तनु के रूप में जन्म लेते हैं और शिक्षा पाते हैं। प्रतीप उन्हें उस दिव्य स्त्री को बिना प्रश्न किए स्वीकार करने का आदेश देकर राज्याभिषेक करते हैं और वन चले जाते हैं; शान्तनु आदर्श राजा बनकर राज करते हैं, और गंगा-तट पर शिकार करते हुए एक तेजस्विनी स्त्री से मिलकर उससे पत्नी बनने की याचना करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.103.1)
ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत्सर्वभूतहितः सदा । निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ॥
tataḥ pratīpo rājā''sītsarvabhūtahitaḥ sadā | niṣasāda samā bahvīrgaṅgādvāragato japan
तत्पश्चात् राजा प्रतीप हुए, जो सदा सब प्राणियों के हित में लगे रहते थे। वे गंगाद्वार जाकर बहुत वर्षों तक जप करते हुए बैठे रहे।
श्लोक 2 (1.103.2)
तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी । उत्तीर्य सलिलात्तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ॥
tasya rūpaguṇopetā gaṅgā strīrūpadhāriṇī | uttīrya salilāttasmāllobhanīyatamākṛtiḥ
रूप और गुणों से सम्पन्न गंगा स्त्री का रूप धारण करके उस जल से बाहर निकलीं; उनकी आकृति अत्यन्त लुभावनी थी।
श्लोक 3 (1.103.3)
अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी । दक्षिणं शालसङ्काशमूरुं भेजे शुभानना ॥
adhīyānasya rājarṣerdivyarūpā manasvinī | dakṣiṇaṃ śālasaṅkāśamūruṃ bheje śubhānanā
दिव्य रूपवाली, मनस्विनी और सुन्दर मुखवाली वह स्त्री स्वाध्याय में लगे उस राजर्षि की शाल-वृक्ष जैसी पुष्ट दाहिनी जाँघ पर जा बैठी।
श्लोक 4 (1.103.4)
प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् । वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो धर्मनिश्चयतत्त्ववित् । करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत्तेऽभिकाङ्क्षितम् ॥
pratīpastu mahīpālastāmuvāca yaśasvinīm | vākyaṃ vākyavidāṃ śreṣṭho dharmaniścayatattvavit | karomi kiṃ te kalyāṇi priyaṃ yatte'bhikāṅkṣitam
तब वाणी के मर्मज्ञों में श्रेष्ठ और धर्म के निर्णयों का तत्त्व जाननेवाले राजा प्रतीप ने उस यशस्विनी से कहा — "कल्याणी, तुम्हारा कौन-सा अभीष्ट प्रिय कार्य मैं करूँ?"
स्त्र्युवाच
श्लोक 5 (1.103.5)
त्वामहं कामये राजन्भजमानां भजस्व माम् । त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः ॥
tvāmahaṃ kāmaye rājanbhajamānāṃ bhajasva mām | tyāgaḥ kāmavatīnāṃ hi strīṇāṃ sadbhirvigarhitaḥ
राजन्, मैं तुम्हें चाहती हूँ। मैं स्वयं तुम्हें वर रही हूँ, मुझे स्वीकार करो। कामना लेकर आई स्त्रियों को ठुकराना सज्जनों ने निन्दनीय बताया है।
प्रतीप उवाच
श्लोक 6 (1.103.6)
नाहं परस्त्रियं कामाद्गच्छेयं वरवर्णिनि । न चासवर्णां कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ॥
nāhaṃ parastriyaṃ kāmādgaccheyaṃ varavarṇini | na cāsavarṇāṃ kalyāṇi dharmyametaddhi me vratam
सुन्दरी, मैं कामवश न परस्त्री के पास जाऊँगा, न ही अपने वर्ण से भिन्न स्त्री के पास, कल्याणी। यही मेरा धर्मसम्मत व्रत है।
श्लोक 7 (1.103.7)
यः स्वदारान्परित्यज्य पारक्यां सेवते स्त्रियम् । निरयान्नैव मुच्यते यावदाभूतसंप्लवम् ॥
yaḥ svadārānparityajya pārakyāṃ sevate striyam | nirayānnaiva mucyate yāvadābhūtasaṃplavam
जो अपनी पत्नी को छोड़कर पराई स्त्री का सेवन करता है, वह प्रलय-काल तक नरक से छूट नहीं पाता।
स्त्र्युवाच
श्लोक 8 (1.103.8)
नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कर्हिचित् । भजन्तीं भज मां राजन्दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ॥
nāśreyasyasmi nāgamyā na vaktavyā ca karhicit | bhajantīṃ bhaja māṃ rājandivyāṃ kanyāṃ varastriyam
मैं न अमंगलकारी हूँ, न अगम्य, और न कभी निन्दा के योग्य। राजन्, मैं स्वयं तुम्हें भज रही हूँ, मुझे स्वीकार करो — मैं दिव्य कन्या हूँ, उत्तम स्त्री हूँ।
प्रतीप उवाच
श्लोक 9 (1.103.9)
त्वया निवृत्तमेतत्तु यन्मां चोदयसि प्रियम् । अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद्धर्मविप्लवः ॥
tvayā nivṛttametattu yanmāṃ codayasi priyam | anyathā pratipannaṃ māṃ nāśayeddharmaviplavaḥ
किन्तु जिस प्रिय कार्य के लिए तुम मुझे प्रेरित कर रही हो, उसे तुमने स्वयं ही रोक दिया है। यदि मैं इसके विपरीत स्वीकार कर लूँ, तो धर्म का यह उल्लंघन मुझे नष्ट कर देगा।
श्लोक 10 (1.103.10)
प्राप्य दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने । अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्ध्येतदासनम् ॥
prāpya dakṣiṇamūruṃ me tvamāśliṣṭā varāṅgane | apatyānāṃ snuṣāṇāṃ ca bhīru viddhyetadāsanam
सुन्दरी, तुम आकर मेरी दाहिनी जाँघ पर बैठी हो। भीरु, जान लो कि यह आसन सन्तानों और पुत्रवधुओं का होता है।
श्लोक 11 (1.103.11)
सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः । तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने ॥
savyoruḥ kāminībhogyastvayā sa ca vivarjitaḥ | tasmādahaṃ nācariṣye tvayi kāmaṃ varāṅgane
बायीं जाँघ प्रेयसी के भोग के लिए होती है, और उसे तुमने छोड़ दिया है। इसलिए, सुन्दरी, मैं तुम्हारे प्रति काम-भाव से आचरण नहीं करूँगा।
श्लोक 12 (1.103.12)
स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् । स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ॥
snuṣā me bhava suśroṇi putrārthaṃ tvāṃ vṛṇomyaham | snuṣāpakṣaṃ hi vāmoru tvamāgamya samāśritā
सुन्दरी, तुम मेरी पुत्रवधू बनो; मैं अपने पुत्र के लिए तुम्हारा वरण करता हूँ। तुमने आकर पुत्रवधू का ही स्थान ग्रहण किया है।
स्त्र्युवाच
श्लोक 13 (1.103.13)
एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते । त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ॥
evamapyastu dharmajña saṃyujyeyaṃ sutena te | tvadbhaktyā tu bhajiṣyāmi prakhyātaṃ bhārataṃ kulam
धर्मज्ञ, ऐसा ही हो; मैं आपके पुत्र से संयुक्त होऊँगी। आपके प्रति भक्ति के कारण मैं प्रसिद्ध भरत-कुल को अपनाऊँगी।
श्लोक 14 (1.103.14)
पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम् । गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि ॥
pṛthivyāṃ pārthivā ye ca teṣāṃ yūyaṃ parāyaṇam | guṇā na hi mayā śakyā vaktuṃ varṣaśatairapi
पृथ्वी पर जितने भी राजा हैं, आप सबके आश्रय हैं। आपके गुणों का वर्णन मैं सौ वर्षों में भी नहीं कर सकती।
श्लोक 15 (1.103.15)
कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम् । समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद्विभो ॥
kulasya ye vaḥ prathitāstatsādhutvamathottamam | samayeneha dharmajña ācareyaṃ ca yadvibho
आपके कुल के जो लोग प्रसिद्ध हुए हैं, उनकी साधुता सर्वोत्तम है। किन्तु धर्मज्ञ प्रभो, यहाँ एक शर्त है — मैं जो कुछ भी करूँ,
श्लोक 16 (1.103.16)
तत्सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित् । एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् । पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्गं प्राप्स्यति ते सुतः ॥
tatsarvameva putraste na mīmāṃseta karhicit | evaṃ vasantī putre te vardhayiṣyāmyahaṃ ratim | putraiḥ puṇyaiḥ priyaiścaiva svargaṃ prāpsyati te sutaḥ
उस सबके विषय में आपका पुत्र कभी कोई प्रश्न न करे। इस प्रकार आपके पुत्र के साथ रहकर मैं उसका आनन्द बढ़ाऊँगी, और पवित्र तथा प्रिय पुत्रों के द्वारा आपका पुत्र स्वर्ग प्राप्त करेगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (1.103.17)
तथेत्युक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत । अदृश्या राजसिंहस्य पश्यतः साऽभवत्तदा ॥
tathetyuktvā tu sā rājaṃstatraivāntaradhīyata | adṛśyā rājasiṃhasya paśyataḥ sā'bhavattadā
राजन्, "ऐसा ही हो" कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गई; सिंह-समान राजा के देखते-देखते वह अदृश्य हो गई।
श्लोक 18 (1.103.18)
पुत्रजन्म प्रतीक्षन्वै स राजा तदधारयत् । एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः ॥
putrajanma pratīkṣanvai sa rājā tadadhārayat | etasminneva kāle tu pratīpaḥ kṣatriyarṣabhaḥ
पुत्र-जन्म की प्रतीक्षा करते हुए राजा ने वह वचन मन में धारण किए रखा। उसी समय क्षत्रियों में श्रेष्ठ प्रतीप ने
श्लोक 19 (1.103.19)
तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन । प्रतीपस्य तु भार्यायां गर्भः श्रीमानवर्धत ॥
tapastepe sutasyārthe sabhāryaḥ kurunandana | pratīpasya tu bhāryāyāṃ garbhaḥ śrīmānavardhata
हे कुरुनन्दन, पत्नी के साथ पुत्र के लिए तप किया। और प्रतीप की पत्नी के गर्भ में एक तेजस्वी शिशु बढ़ने लगा,
श्लोक 20 (1.103.20)
श्रिया परमया युक्तः शरच्छुक्ले यथा शशी । ततस्तु दशमे मासि प्राजायत रविप्रभम् ॥
śriyā paramayā yuktaḥ śaracchukle yathā śaśī | tatastu daśame māsi prājāyata raviprabham
जो शरद् ऋतु के शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान परम शोभा से युक्त था। फिर दसवें महीने में
श्लोक 21 (1.103.21)
कुमारं देवगर्भाभं प्रतीपमहिषी तदा । तयोः समभवत्पुत्रो वृद्धयोः स महाभिषक् ॥
kumāraṃ devagarbhābhaṃ pratīpamahiṣī tadā | tayoḥ samabhavatputro vṛddhayoḥ sa mahābhiṣak
प्रतीप की पटरानी ने सूर्य के समान प्रभावाले, देवताओं की सन्तान जैसे कुमार को जन्म दिया। इस प्रकार उन वृद्ध दम्पती के यहाँ वही महाभिष पुत्र रूप में उत्पन्न हुए।
श्लोक 22 (1.103.22)
शान्तस्य जज्ञे सन्तानस्तस्मादासीत्स शान्तनुः । तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत्प्रभुः ॥
śāntasya jajñe santānastasmādāsītsa śāntanuḥ | tasya jātasya kṛtyāni pratīpo'kārayatprabhuḥ
वे शान्त (संयमी) पिता की सन्तान के रूप में जन्मे, इसलिए शान्तनु कहलाए। प्रभु प्रतीप ने उस नवजात के सब संस्कार करवाए —
श्लोक 23 (1.103.23)
जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा । नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम् ॥
jātakarmādi vipreṇa vedoktaiḥ karmabhistadā | nāmakarma ca viprāstu cakruḥ paramasatkṛtam
ब्राह्मण द्वारा वेदोक्त विधियों से जातकर्म आदि; और ब्राह्मणों ने बड़े सम्मान के साथ
श्लोक 24 (1.103.24)
शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा । ततः संवर्धितो राजा शान्तनुर्लोकधार्मिकः ॥
śāntanoravanīpāla vedoktaiḥ karmabhistadā | tataḥ saṃvardhito rājā śāntanurlokadhārmikaḥ
हे पृथ्वीपालक, वेदोक्त कर्मों से शान्तनु का नामकरण-संस्कार किया। तब लोक में धर्मात्मा माने जानेवाले राजा शान्तनु का पालन-पोषण हुआ,
श्लोक 25 (1.103.25)
स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मभृतां वरः । धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमां गतः ॥
sa tu lebhe parāṃ niṣṭhāṃ prāpya dharmabhṛtāṃ varaḥ | dhanurvede ca vede ca gatiṃ sa paramāṃ gataḥ
और धर्मधारियों में श्रेष्ठ उस राजकुमार ने परम निष्ठा प्राप्त की; धनुर्वेद और वेद दोनों में उन्होंने परम गति पाई।
श्लोक 26 (1.103.26)
यौवनं चापि संप्राप्तः कुमारो वदतां वरः । संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान्विजितान्स्वेन कर्मणा ॥
yauvanaṃ cāpi saṃprāptaḥ kumāro vadatāṃ varaḥ | saṃsmaraṃścākṣayām̐llokānvijitānsvena karmaṇā
वक्ताओं में श्रेष्ठ वह कुमार युवावस्था को प्राप्त हुआ। अपने कर्मों से जीते हुए अक्षय लोकों का स्मरण करते हुए
श्लोक 27 (1.103.27)
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः । प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ॥
puṇyakarmakṛdevāsīcchāntanuḥ kurusattamaḥ | pratīpaḥ śāntanuṃ putraṃ yauvanasthaṃ tato'nvaśāt
कुरुश्रेष्ठ शान्तनु केवल पुण्य कर्म ही करते थे। तब प्रतीप ने युवावस्था में पहुँचे अपने पुत्र शान्तनु को यह उपदेश दिया —
श्लोक 28 (1.103.28)
पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव । त्वामाव्रजेद्यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ॥
purā strī māṃ samabhyāgācchāntano bhūtaye tava | tvāmāvrajedyadi rahaḥ sā putra varavarṇinī
"शान्तनु, बहुत पहले तुम्हारे कल्याण के लिए एक स्त्री मेरे पास आई थी। पुत्र, यदि वह सुन्दरी एकान्त में तुम्हारे पास आए,
श्लोक 29 (1.103.29)
कामयानाऽभिरूपाढ्या दिव्यस्त्री पुत्रकाम्यया । सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ॥
kāmayānā'bhirūpāḍhyā divyastrī putrakāmyayā | sā tvayā nānuyoktavyā kāsi kasyāsi cāṅgane
रूप से सम्पन्न वह दिव्य स्त्री, तुम्हें चाहती हुई, पुत्र की कामना से — तो तुम उससे यह न पूछना कि 'हे सुन्दरी, तुम कौन हो और किसकी हो?'
श्लोक 30 (1.103.30)
यच्च कुर्यान्न तत्कर्म सा प्रष्टव्या त्वयाऽनघ । सन्नियोगाद्भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ॥
yacca kuryānna tatkarma sā praṣṭavyā tvayā'nagha | sanniyogādbhajantīṃ tāṃ bhajethā ityuvāca tam
और निष्पाप पुत्र, वह जो भी कर्म करे, उसके विषय में उससे न पूछना। इस आदेश के अनुसार, स्वयं तुम्हें चाहनेवाली उस स्त्री को स्वीकार करना।" — ऐसा उन्होंने उससे कहा।
श्लोक 31 (1.103.31)
एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा । स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ॥
evaṃ saṃdiśya tanayaṃ pratīpaḥ śāntanuṃ tadā | sve ca rājye'bhiṣicyainaṃ vanaṃ rājā viveśa ha
अपने पुत्र शान्तनु को इस प्रकार आदेश देकर राजा प्रतीप ने उन्हें अपने राज्य पर अभिषिक्त किया और वन में प्रवेश किया।
श्लोक 32 (1.103.32)
स राजा शान्तनुर्धीमान्देवराजसमद्युतिः । बभूव सर्वलोकस्य सत्यवागिति संमतः ॥
sa rājā śāntanurdhīmāndevarājasamadyutiḥ | babhūva sarvalokasya satyavāgiti saṃmataḥ
देवराज के समान कान्तिवाले वे बुद्धिमान राजा शान्तनु समस्त लोक में सत्यवादी के रूप में सम्मानित हुए।
श्लोक 33 (1.103.33)
पीनस्कन्धो महाबाहुर्मत्तवारणविक्रमः । अन्वितः परिपूर्णार्थैः सर्वैर्नृपतिलक्षणैः ॥
pīnaskandho mahābāhurmattavāraṇavikramaḥ | anvitaḥ paripūrṇārthaiḥ sarvairnṛpatilakṣaṇaiḥ
उनके कन्धे पुष्ट थे, भुजाएँ विशाल थीं और चाल मतवाले हाथी जैसी थी; वे राजा के सभी लक्षणों से पूर्ण रूप से युक्त थे।
श्लोक 34 (1.103.34)
अमात्यलक्षणोपेतः क्षत्रधर्मविशेषवित् । वशे चक्रे महीमेको विजित्य वसुधाधिपान् ॥
amātyalakṣaṇopetaḥ kṣatradharmaviśeṣavit | vaśe cakre mahīmeko vijitya vasudhādhipān
उत्तम गुणोंवाले मन्त्रियों से सम्पन्न और क्षत्रिय-धर्म की सूक्ष्मताओं के ज्ञाता उन्होंने अकेले ही राजाओं को जीतकर पृथ्वी को अपने वश में किया।
श्लोक 35 (1.103.35)
वेदानागमयत्कृत्स्नान्राजधर्मांश्च सर्वशः । ईजे च बहुभिः सत्रैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥
vedānāgamayatkṛtsnānrājadharmāṃśca sarvaśaḥ | īje ca bahubhiḥ satraiḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ
उन्होंने सम्पूर्ण वेदों और राजधर्मों को सब प्रकार से आत्मसात् किया, और अनेक सत्रों तथा प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञों से यजन किया।
श्लोक 36 (1.103.36)
तर्पयामास विप्रांश्च वेदाध्ययनकोविदान् । रत्नैरुच्चावचैर्गोभिर्ग्रामैरश्वैर्धनैरपि ॥
tarpayāmāsa viprāṃśca vedādhyayanakovidān | ratnairuccāvacairgobhirgrāmairaśvairdhanairapi
वेदाध्ययन में निपुण ब्राह्मणों को उन्होंने छोटे-बड़े अनेक रत्नों, गौओं, ग्रामों, घोड़ों और धन से तृप्त किया।
श्लोक 37 (1.103.37)
वयोरूपेण संपन्नः पौरुषेण बलेन च । ऐश्वर्येण प्रतापेन विक्रमेण धनेन च ॥
vayorūpeṇa saṃpannaḥ pauruṣeṇa balena ca | aiśvaryeṇa pratāpena vikrameṇa dhanena ca
वे आयु और रूप, पौरुष और बल, ऐश्वर्य, प्रताप, पराक्रम और धन से सम्पन्न थे;
श्लोक 38 (1.103.38)
वर्तमानश्च सत्येन सर्वधर्मविशारदः । तं महीपं महीपाला राजराजमकुर्वत ॥
vartamānaśca satyena sarvadharmaviśāradaḥ | taṃ mahīpaṃ mahīpālā rājarājamakurvata
वे सत्य पर चलते थे और सब धर्मों में निपुण थे; इसलिए पृथ्वी के राजाओं ने उस महीपति को राजराज (राजाओं का राजा) बनाया।
श्लोक 39 (1.103.39)
वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्नप्रबोधनाः । श्रिया भरतशार्दूल समपद्यन्त भूमिपाः ॥
vītaśokabhayābādhāḥ sukhasvapnaprabodhanāḥ | śriyā bharataśārdūla samapadyanta bhūmipāḥ
हे भरतश्रेष्ठ, शोक, भय और बाधा से मुक्त होकर, सुख से सोते और जागते हुए वे राजा समृद्धि से सम्पन्न हो गए।
श्लोक 40 (1.103.40)
नियमैः सर्ववर्णानां ब्रह्मोत्तरमवर्तत । ब्राह्मणाभिमुखं क्षत्रं क्षत्रियाभिमुखा विशः ॥
niyamaiḥ sarvavarṇānāṃ brahmottaramavartata | brāhmaṇābhimukhaṃ kṣatraṃ kṣatriyābhimukhā viśaḥ
सब वर्णों के नियमों के अनुसार ब्राह्मणों की प्रधानता से व्यवस्था चलती रही: क्षत्रिय ब्राह्मणों की ओर उन्मुख रहते थे, वैश्य क्षत्रियों की ओर,
श्लोक 41 (1.103.41)
ब्रह्मक्षत्रानुकूलांश्च शूद्राः पर्यचरन्विशः । एवं पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् ॥
brahmakṣatrānukūlāṃśca śūdrāḥ paryacaranviśaḥ | evaṃ paśuvarāhāṇāṃ tathaiva mṛgapakṣiṇām
और शूद्र ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के अनुकूल रहनेवाले वैश्यों की सेवा करते थे। इसी प्रकार पशुओं और सूअरों की, मृगों और पक्षियों की
श्लोक 42 (1.103.42)
शान्तनावथ राज्यस्थे नावर्तत वृथा वधः । असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम् ॥
śāntanāvatha rājyasthe nāvartata vṛthā vadhaḥ | asukhānāmanāthānāṃ tiryagyoniṣu vartatām
शान्तनु के राज्य करते समय व्यर्थ हत्या नहीं होती थी। दुःखी और अनाथों के, पशु-योनियों में पड़े जीवों के —
श्लोक 43 (1.103.43)
स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत्पिता । स हस्तिनाम्नि धर्मात्मा विहरन्कुरुनन्दनः ॥
sa eva rājā sarveṣāṃ bhūtānāmabhavatpitā | sa hastināmni dharmātmā viharankurunandanaḥ
सब प्राणियों के वे राजा स्वयं पिता बन गए। हस्तिनापुर में विहार करनेवाले वे धर्मात्मा कुरुनन्दन
श्लोक 44 (1.103.44)
तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद्वायुना च समो बले । अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः ॥
tejasā sūryakalpo'bhūdvāyunā ca samo bale | antakapratimaḥ kope kṣamayā pṛthivīsamaḥ
तेज में सूर्य के समान थे और बल में वायु के बराबर; क्रोध में यमराज के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान।
श्लोक 45 (1.103.45)
बभूव राजा सुमतिः प्रजानां सत्यविक्रमः । स वनेषु च रम्येषु शैलप्रस्रवणेषु च ॥
babhūva rājā sumatiḥ prajānāṃ satyavikramaḥ | sa vaneṣu ca ramyeṣu śailaprasravaṇeṣu ca
वे राजा बुद्धिमान थे और प्रजा के लिए सच्चे पराक्रमी थे। रमणीय वनों में और पर्वतीय झरनों के बीच
श्लोक 46 (1.103.46)
चचार मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः । स मृगान्महिषांश्चैव विनिघ्नन्राजसत्तमः ॥
cacāra mṛgayāśīlaḥ śāntanurvanagocaraḥ | sa mṛgānmahiṣāṃścaiva vinighnanrājasattamaḥ
शिकार के प्रेमी शान्तनु वनों में विचरण करते थे। मृगों और भैंसों का वध करते हुए वे श्रेष्ठ राजा
श्लोक 47 (1.103.47)
गङ्गामनु चचारैकः सिद्धचारणसेविताम् । स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् ॥
gaṅgāmanu cacāraikaḥ siddhacāraṇasevitām | sa kadācinmahārāja dadarśa paramāṃ striyam
सिद्धों और चारणों से सेवित गंगा के किनारे-किनारे अकेले घूमते थे। महाराज, एक बार उन्होंने एक परम सुन्दरी स्त्री को देखा,
श्लोक 48 (1.103.48)
जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् । सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् ॥
jājvalyamānāṃ vapuṣā sākṣācchriyamivāparām | sarvānavadyāṃ sudatīṃ divyābharaṇabhūṣitām
जो अपने शरीर की कान्ति से दमक रही थी, मानो साक्षात् दूसरी लक्ष्मी हो; सर्वांग निर्दोष, सुन्दर दाँतोंवाली, दिव्य आभूषणों से विभूषित,
श्लोक 49 (1.103.49)
सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् । स्नातगात्रां धौतवस्त्रां गङ्गातीररुहे वने ॥
sūkṣmāmbaradharāmekāṃ padmodarasamaprabhām | snātagātrāṃ dhautavastrāṃ gaṅgātīraruhe vane
महीन वस्त्र पहने, अकेली, कमल के भीतरी भाग जैसी आभावाली। गंगा-तट पर उगे वन में, स्नान से निर्मल देहवाली और धुले वस्त्र पहने,
श्लोक 50 (1.103.50)
प्रकीर्णकेशीं पाणिभ्यां संस्पृशन्तीं शिरोरुहान् । रूपेण वयसा कान्त्या शरीरावयवैस्तथा ॥
prakīrṇakeśīṃ pāṇibhyāṃ saṃspṛśantīṃ śiroruhān | rūpeṇa vayasā kāntyā śarīrāvayavaistathā
खुले केशोंवाली, दोनों हाथों से अपने बालों को छूती हुई; अपने रूप, यौवन, कान्ति और अंगों से,
श्लोक 51 (1.103.51)
हावभावविलासैश्च लोचनाञ्चलविक्रियैः । श्रोणीभारेण मध्येन स्तनाभ्यामुरसा दृशा ॥
hāvabhāvavilāsaiśca locanāñcalavikriyaiḥ | śroṇībhāreṇa madhyena stanābhyāmurasā dṛśā
हाव-भाव और विलास से, नेत्रों के कोनों की चंचलता से, नितम्बों के भार, कमर, स्तनों, वक्ष और दृष्टि से,
श्लोक 52 (1.103.52)
कवरीभरेण पादाभ्यामिङ्गितेन स्मितेन च । कोकिलालापसंलापैर्न्यक्कुर्वन्तीं त्रिलोकगाम् ॥
kavarībhareṇa pādābhyāmiṅgitena smitena ca | kokilālāpasaṃlāpairnyakkurvantīṃ trilokagām
अपनी वेणी के भार, चरणों, संकेतों और मुस्कान से, तथा कोयल की कूक जैसी मधुर बातचीत से वह तीनों लोकों में विचरनेवाली
श्लोक 53 (1.103.53)
वाणीं च गिरिजां लक्ष्मीं योषितोऽन्याः सुराङ्गनाः । सा च शान्तनुमभ्यागादलक्ष्मीमपकर्षती ॥
vāṇīṃ ca girijāṃ lakṣmīṃ yoṣito'nyāḥ surāṅganāḥ | sā ca śāntanumabhyāgādalakṣmīmapakarṣatī
सरस्वती, पार्वती, लक्ष्मी, अन्य स्त्रियों और देवांगनाओं को भी नीचा दिखा रही थी। और वह अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) को दूर करती हुई शान्तनु के पास आई।
श्लोक 54 (1.103.54)
तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाऽभूद्विस्मितो रूपसंपदा । पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ॥
tāṃ dṛṣṭvā hṛṣṭaromā'bhūdvismito rūpasaṃpadā | pibanniva ca netrābhyāṃ nātṛpyata narādhipaḥ
उसे देखकर राजा रोमांचित हो उठे। उसकी रूप-सम्पदा पर विस्मित होकर वे मानो नेत्रों से उसे पीते रहे, फिर भी तृप्त नहीं हुए।
श्लोक 55 (1.103.55)
सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम् । स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ॥
sā ca dṛṣṭvaiva rājānaṃ vicarantaṃ mahādyutim | snehādāgatasauhārdā nātṛpyata vilāsinī
और वह विलासिनी भी वहाँ विचरते उस महातेजस्वी राजा को देखते ही स्नेह से उमड़े सौहार्द के कारण उन्हें देखते-देखते तृप्त नहीं हुई।
श्लोक 56 (1.103.56)
गङ्गा कामेन राजानं प्रेक्षमाणा विलासिनी । चञ्चूर्यताग्रतस्तस्य किन्नरीवाप्सरोपमा ॥
gaṅgā kāmena rājānaṃ prekṣamāṇā vilāsinī | cañcūryatāgratastasya kinnarīvāpsaropamā
कामभाव से राजा को निहारती हुई विलासिनी गंगा किन्नरी के समान, अप्सरा जैसी, उनके सामने इधर-उधर घूमने लगी।
श्लोक 57 (1.103.57)
दृष्ट्वा प्रहृष्टरूपोऽभूद्दर्शनादेव शान्तनुः । रूपेणातीत्य तिष्ठन्तीं सर्वा राजन्ययोषितः ॥
dṛṣṭvā prahṛṣṭarūpo'bhūddarśanādeva śāntanuḥ | rūpeṇātītya tiṣṭhantīṃ sarvā rājanyayoṣitaḥ
राजकुलों की सभी स्त्रियों को रूप में पीछे छोड़कर खड़ी उस स्त्री को देखते ही शान्तनु अत्यन्त हर्षित हो उठे।
श्लोक 58 (1.103.58)
तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा । देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथवाऽप्सराः ॥
tāmuvāca tato rājā sāntvayañślakṣṇayā girā | devī vā dānavī vā tvaṃ gandharvī cāthavā'psarāḥ
तब राजा ने मधुर वाणी से उसे सान्त्वना देते हुए कहा — "तुम देवी हो या दानवी, गन्धर्वी हो अथवा अप्सरा,
श्लोक 59 (1.103.59)
यक्षी वा पन्नगी वाऽपि मानुषी वा सुमध्यमे । याऽसि काऽसि सुरप्रख्ये महिषी मे भवानघे ॥
yakṣī vā pannagī vā'pi mānuṣī vā sumadhyame | yā'si kā'si suraprakhye mahiṣī me bhavānaghe
यक्षी हो, नागकन्या हो या मानवी, हे सुन्दर कटिवाली? देवताओं जैसी दीखनेवाली, तुम जो भी हो, जैसी भी हो, हे निष्पाप, मेरी पटरानी बनो,
श्लोक 60 (1.103.60)
त्वां गता हि मम प्राणा वसु यन्मेऽस्ति किंचन । याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ॥
tvāṃ gatā hi mama prāṇā vasu yanme'sti kiṃcana | yāce tvāṃ suragarbhābhe bhāryā me bhava śobhane
क्योंकि मेरे प्राण और मेरा जो कुछ भी धन है, सब तुम्हारा हो चुका है। देवकन्या जैसी आभावाली शोभने, मैं तुमसे याचना करता हूँ — मेरी पत्नी बनो।"