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आदि पर्व · अध्याय 104

गंगा का शान्तनु की पत्नी बनना

वसुओं के साथ अपने समझौते और प्रतीप के वचनों को स्मरण करके गंगा शान्तनु को उत्तर देती हैं: वे उनकी पटरानी बनेंगी, पर इस शर्त पर कि शान्तनु कभी न पूछें कि वे कौन हैं, वे जो भी करें उन्हें कभी न रोकें और न उनसे कोई अप्रिय बात कहें, अन्यथा वे उन्हें छोड़ देंगी। शान्तनु मान जाते हैं और उन्हें रथ पर बिठाकर ले जाते हैं। उनसे कुछ भी न पूछते हुए वे मानव-रूप धारण करनेवाली उस देवी के साथ आनन्द से रहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.104.1)

एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च । यशस्विनी च साऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा ॥

etacchrutvā vaco rājñaḥ sasmitaṃ mṛdu valgu ca | yaśasvinī ca sā'gacchacchāntanorbhūtaye tadā

राजा के ये वचन सुनकर वह यशस्विनी मुस्कराती हुई, कोमल और मधुर भाव से, तब शान्तनु के कल्याण के लिए उनके पास गई।

श्लोक 2 (1.104.2)

सा तु दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम् । वसूनां समयं स्मृत्वाऽथाभ्यगच्छदनिन्दिता ॥

sā tu dṛṣṭvā nṛpaśreṣṭhaṃ carantaṃ tīramāśritam | vasūnāṃ samayaṃ smṛtvā'thābhyagacchadaninditā

तट पर विचरते उस श्रेष्ठ राजा को देखकर उस अनिन्दिता ने वसुओं के साथ की गई शर्त को स्मरण किया और उनके पास गई।

श्लोक 3 (1.104.3)

प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम् । प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृपम् ॥

prajārthinī rājaputraṃ śāntanuṃ pṛthivīpatim | pratīpavacanaṃ cāpi saṃsmṛtyaiva svayaṃ nṛpam

सन्तान की इच्छा रखती हुई और प्रतीप के वचनों को भी स्मरण करके वह स्वयं ही राजकुमार, पृथ्वीपति शान्तनु के पास आई।

श्लोक 4 (1.104.4)

कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता । उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा ॥

kālo'yamiti matvā sā vasūnāṃ śāpacoditā | uvāca caiva rājñaḥ sā hlādayantī mano girā

"यही समय है" ऐसा मानकर, वसुओं के शाप से प्रेरित होकर, वह अपनी वाणी से राजा के मन को आनन्दित करती हुई बोली —

गङ्गोवाच

श्लोक 5 (1.104.5)

भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा । न तु त्वं वा द्वितीयो वा ज्ञातुमिच्छेत्कथंचन ॥

bhaviṣyāmi mahīpāla mahiṣī te vaśānugā | na tu tvaṃ vā dvitīyo vā jñātumicchetkathaṃcana

हे पृथ्वीपाल, मैं आपकी आज्ञाकारिणी पटरानी बनूँगी। परन्तु न आप और न कोई दूसरा कभी मेरे विषय में जानने की इच्छा करे।

श्लोक 6 (1.104.6)

यत्तु कुर्यामहं राजञ्शुभं वा यदि वाऽशुभम् । न तद्वारयितव्याऽस्मि न वक्तव्या तथाऽप्रियम् ॥

yattu kuryāmahaṃ rājañśubhaṃ vā yadi vā'śubham | na tadvārayitavyā'smi na vaktavyā tathā'priyam

राजन्, मैं जो कुछ भी करूँ — शुभ हो या अशुभ — आप मुझे न रोकें और न मुझसे कोई अप्रिय बात कहें।

श्लोक 7 (1.104.7)

एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव । वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम् ॥

evaṃ hi vartamāne'haṃ tvayi vatsyāmi pārthiva | vāritā vipriyaṃ coktā tyajeyaṃ tvāmasaṃśayam

हे पार्थिव, जब तक आप ऐसा व्यवहार करेंगे, तब तक मैं आपके साथ रहूँगी। रोके जाने पर या अप्रिय बात कहे जाने पर मैं निःसन्देह आपको छोड़ दूँगी।

श्लोक 8 (1.104.8)

एष मे समयो राजन्भज मां त्वं यथेप्सितम् । अनुनीताऽस्मि ते पित्रा भर्ता मे त्वं भव प्रभो ॥

eṣa me samayo rājanbhaja māṃ tvaṃ yathepsitam | anunītā'smi te pitrā bhartā me tvaṃ bhava prabho

राजन्, यही मेरी शर्त है; जैसा चाहें, मुझे स्वीकार करें। आपके पिता ने मुझसे अनुनय किया था; प्रभो, आप मेरे पति बनें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (1.104.9)

तथेति सा यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम । प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ॥

tatheti sā yadā tūktā tadā bharatasattama | praharṣamatulaṃ lebhe prāpya taṃ pārthivottamam

हे भरतश्रेष्ठ, जब उसे "ऐसा ही हो" उत्तर मिला, तब उस श्रेष्ठ राजा को पाकर उसे अनुपम हर्ष हुआ।

श्लोक 10 (1.104.10)

प्रतिज्ञाय तु तत्तस्यास्तथेति मनुजाधिपः । रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह ॥

pratijñāya tu tattasyāstatheti manujādhipaḥ | rathamāropya tāṃ devīṃ jagāma sa tayā saha

"ऐसा ही हो" कहकर उससे वह प्रतिज्ञा करके नरेश ने उस देवी को रथ पर बिठाया और उसके साथ चल दिए।

श्लोक 11 (1.104.11)

सा च शान्तनुमभ्यागात्साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा । आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी ॥

sā ca śāntanumabhyāgātsākṣāllakṣmīrivāparā | āsādya śāntanustāṃ ca bubhuje kāmato vaśī

और वह साक्षात् दूसरी लक्ष्मी के समान शान्तनु के पास आई। उसे पाकर जितेन्द्रिय शान्तनु ने इच्छानुसार उसके साथ सुख भोगा।

श्लोक 12 (1.104.12)

न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान् । स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च ॥

na praṣṭavyeti manvāno na sa tāṃ kiṃcidūcivān | sa tasyāḥ śīlavṛttena rūpaudāryaguṇena ca

"इससे कुछ पूछना नहीं है" यह मानकर उन्होंने उससे कुछ भी नहीं कहा। उसके शील और आचरण से, रूप, उदारता और गुणों से,

श्लोक 13 (1.104.13)

उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः । स राजा परमप्रीतः परमस्त्रीप्रलालितः ॥

upacāreṇa ca rahastutoṣa jagatīpatiḥ | sa rājā paramaprītaḥ paramastrīpralālitaḥ

और एकान्त में उसकी सेवा से वे पृथ्वीपति सन्तुष्ट रहे। उत्तम स्त्री के लाड़-प्यार से वे राजा परम प्रसन्न थे।

श्लोक 14 (1.104.14)

दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी । मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी ॥

divyarūpā hi sā devī gaṅgā tripathagāminī | mānuṣaṃ vigrahaṃ kṛtvā śrīmantaṃ varavarṇinī

क्योंकि वह दिव्य रूपवाली देवी त्रिपथगामिनी गंगा थी; उस सुन्दरी ने तेजस्वी मानव-शरीर धारण किया था।

श्लोक 15 (1.104.15)

भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताऽभवत् । शन्तनोर्नृपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः ॥

bhāgyopanatakāmasya bhāryā copanatā'bhavat | śantanornṛpasiṃhasya devarājasamadyuteḥ

देवराज के समान तेजस्वी, राजाओं में सिंह शान्तनु की — जिनकी कामनाएँ सौभाग्य से पूरी हुई थीं — वह पत्नी बन गई।

श्लोक 16 (1.104.16)

संभोगस्नेहचातुर्यैर्हावलास्यैर्मनोहरैः । राजानं रमयामास यथा रज्येत स प्रभुः ॥

saṃbhogasnehacāturyairhāvalāsyairmanoharaiḥ | rājānaṃ ramayāmāsa yathā rajyeta sa prabhuḥ

प्रेम-क्रीड़ा, स्नेह और चतुराई से, तथा मनोहर हाव-भाव और नृत्य से उसने राजा को ऐसे रमाया कि वे प्रभु उसमें अनुरक्त हो गए।

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