आदि पर्व · अध्याय 105
गंगा द्वारा पुत्रों को जल में बहाना
गंगा के साथ जीवन में डूबे शान्तनु को वर्षों के बीतने का पता नहीं चलता। गंगा उन्हें आठ पुत्र देती हैं और प्रत्येक को जन्म लेते ही गंगा में डुबो देती हैं; अपनी प्रतिज्ञा और पिता के वचनों से बँधे शान्तनु सात पुत्रों तक कुछ नहीं कहते। जब वे आठवें को भी डुबोने लगती हैं, तो शान्तनु पुकार उठते हैं और पूछते हैं कि वे कौन हैं। वे स्वयं को जह्नु की पुत्री गंगा बताती हैं और समझाती हैं कि वे बालक आठ वसु थे, जो वसिष्ठ के शाप से मनुष्य बने थे और जिन्हें उन्होंने मनुष्य-जन्म से मुक्त करने का वचन दिया था; आठवें पुत्र को वे शान्तनु के संरक्षण में छोड़ देती हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.105.1)
संवत्सरानृतून्मासान्बुबुधे न बहून्गतान् । रममाणस्तया सार्धं यथाकामं नरेश्वरः ॥
saṃvatsarānṛtūnmāsānbubudhe na bahūngatān | ramamāṇastayā sārdhaṃ yathākāmaṃ nareśvaraḥ
उसके साथ इच्छानुसार रमण करते हुए नरेश्वर को पता ही न चला कि कितने वर्ष, ऋतुएँ और महीने बीत गए।
श्लोक 2 (1.105.2)
दिविष्ठान्मानुषांश्चैव भोगान्भुङ्क्ते स वै नृपः । आसाद्य शान्तनुः श्रीमान्मुमुदे योषितां वराम् ॥
diviṣṭhānmānuṣāṃścaiva bhogānbhuṅkte sa vai nṛpaḥ | āsādya śāntanuḥ śrīmānmumude yoṣitāṃ varām
वह राजा स्वर्गीय और मानवीय दोनों प्रकार के भोग भोगते रहे। स्त्रियों में श्रेष्ठ उस नारी को पाकर श्रीमान् शान्तनु आनन्दित रहे।
श्लोक 3 (1.105.3)
ऋतुकाले तु सा देवी दिव्यं गर्भमधारयत् । अष्टावजनयत्पुत्रांस्तस्मादमरसन्निभान् ॥
ṛtukāle tu sā devī divyaṃ garbhamadhārayat | aṣṭāvajanayatputrāṃstasmādamarasannibhān
ऋतुकाल में उस देवी ने दिव्य गर्भ धारण किया, और उनसे देवताओं के समान आठ पुत्रों को जन्म दिया।
श्लोक 4 (1.105.4)
जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत । सूतके कण्ठमाक्रम्य तान्निनाय यमक्षयम् ॥
jātaṃ jātaṃ ca sā putraṃ kṣipatyambhasi bhārata | sūtake kaṇṭhamākramya tānnināya yamakṣayam
हे भारत, जैसे ही कोई पुत्र जन्म लेता, वह उसे जल में फेंक देती; सूतक के दिनों में ही उनका कण्ठ दबाकर उसने उन्हें यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 5 (1.105.5)
प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गास्रोतस्यमज्जयत् । तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत्तदा ॥
prīṇāmyahaṃ tvāmityuktvā gaṅgāsrotasyamajjayat | tasya tanna priyaṃ rājñaḥ śāntanorabhavattadā
"मैं तुम्हें प्रसन्न करती हूँ" कहकर वह उन्हें गंगा की धारा में डुबो देती। राजा शान्तनु को यह प्रिय नहीं लगा,
श्लोक 6 (1.105.6)
न च तां किंचनोवाच त्यागाद्भीतो महीपतिः । अमीमांस्या कर्मयोनिरागमश्चेति शान्तनुः ॥
na ca tāṃ kiṃcanovāca tyāgādbhīto mahīpatiḥ | amīmāṃsyā karmayonirāgamaśceti śāntanuḥ
परन्तु उसके छोड़ जाने के भय से पृथ्वीपति ने उससे कुछ भी नहीं कहा। "उसके कर्म, उसके मूल और उसके आगमन पर विचार नहीं करना है" — यह सोचकर शान्तनु ने
श्लोक 7 (1.105.7)
स्मरन्पितृवचश्चैव नापृच्छत्पुत्रकिल्बिषम् । जाताञ्जातांश्च वै हन्ति सा स्त्री सप्त वरान्सुतान् ॥
smaranpitṛvacaścaiva nāpṛcchatputrakilbiṣam | jātāñjātāṃśca vai hanti sā strī sapta varānsutān
और पिता के वचनों को स्मरण करके पुत्रों के प्रति किए गए उस पाप के विषय में कुछ नहीं पूछा। जन्म लेते ही वह स्त्री एक-एक करके सात श्रेष्ठ पुत्रों को मारती गई,
श्लोक 8 (1.105.8)
शान्तनुर्धर्मभङ्गाच्च नापृच्छत्तां कथंचन । अष्टमं तु जिघांसन्त्यां चुक्षुभे शान्तनोर्धृतिः ॥
śāntanurdharmabhaṅgācca nāpṛcchattāṃ kathaṃcana | aṣṭamaṃ tu jighāṃsantyāṃ cukṣubhe śāntanordhṛtiḥ
और वचन-भंग के भय से शान्तनु ने उससे कभी कुछ नहीं पूछा। परन्तु जब वह आठवें को भी मारने लगी, तब शान्तनु का धैर्य डोल गया।
श्लोक 9 (1.105.9)
अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव । उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन्पुत्रमात्मनः ॥
athaināmaṣṭame putre jāte prahasatīmiva | uvāca rājā duḥkhārtaḥ parīpsanputramātmanaḥ
तब आठवें पुत्र के जन्म लेने पर, जब वह मानो हँस रही थी, दुःख से व्याकुल राजा ने अपने पुत्र को बचाने की इच्छा से उससे कहा।
श्लोक 10 (1.105.10)
आलभन्तीं तदा दृष्ट्वा तां स कौरवनन्दनः । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठो वाक्यं परमदुःखितः ॥
ālabhantīṃ tadā dṛṣṭvā tāṃ sa kauravanandanaḥ | abravīdbharataśreṣṭho vākyaṃ paramaduḥkhitaḥ
उसे तब बालक को पकड़ते देखकर वे कौरवनन्दन, भरतश्रेष्ठ अत्यन्त दुःखी होकर ये वचन बोले —
श्लोक 11 (1.105.11)
मावधीः कस्य काऽसीति किं हिनत्सि सुतानिति । पुत्रघ्नि सुमहत्पापं संप्राप्तं ते सुगर्हितम् ॥
māvadhīḥ kasya kā'sīti kiṃ hinatsi sutāniti | putraghni sumahatpāpaṃ saṃprāptaṃ te sugarhitam
"इसे मत मारो! तुम कौन हो, किसकी हो? मेरे पुत्रों को क्यों मार रही हो? हे पुत्रघातिनी, तुम पर अत्यन्त निन्दनीय और महान् पाप आ पड़ा है।"
गङ्गोवाच
श्लोक 12 (1.105.12)
पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर । जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ॥
putrakāma na te hanmi putraṃ putravatāṃ vara | jīrṇastu mama vāso'yaṃ yathā sa samayaḥ kṛtaḥ
हे पुत्र चाहनेवाले, पुत्रवानों में श्रेष्ठ, मैं तुम्हारे इस पुत्र को नहीं मारूँगी। किन्तु जैसी शर्त की गई थी, उसके अनुसार यहाँ मेरा निवास अब पूरा हो गया।
श्लोक 13 (1.105.13)
अहं गङ्गा जह्नुसुता महर्षिगणसेविता । देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमुषिताऽहं त्वया सह ॥
ahaṃ gaṅgā jahnusutā maharṣigaṇasevitā | devakāryārthasiddhyarthamuṣitā'haṃ tvayā saha
मैं जह्नु की पुत्री गंगा हूँ, जिसकी सेवा महर्षियों के समूह करते हैं। देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए मैं तुम्हारे साथ रही।
श्लोक 14 (1.105.14)
इमेऽष्टौ वसवो देवा महाभागा महौजसः । वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ॥
ime'ṣṭau vasavo devā mahābhāgā mahaujasaḥ | vasiṣṭhaśāpadoṣeṇa mānuṣatvamupāgatāḥ
ये आठों महाभाग और महातेजस्वी वसु देवता हैं, जो वसिष्ठ के शाप के कारण मनुष्य-योनि में आए।
श्लोक 15 (1.105.15)
तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते । मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन ॥
teṣāṃ janayitā nānyastvadṛte bhuvi vidyate | madvidhā mānuṣī dhātrī loke nāstīha kācana
पृथ्वी पर तुम्हारे सिवा उनका कोई दूसरा जनक नहीं हो सकता था, और इस लोक में मेरे जैसी कोई मानवी माता भी नहीं है।
श्लोक 16 (1.105.16)
तस्मात्तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता । जनयित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वयाऽक्षयाः ॥
tasmāttajjananīhetormānuṣatvamupāgatā | janayitvā vasūnaṣṭau jitā lokāstvayā'kṣayāḥ
इसलिए उनकी माता बनने के लिए मैंने मनुष्य-रूप धारण किया। आठ वसुओं को जन्म देकर तुमने अक्षय लोक जीत लिए हैं।
श्लोक 17 (1.105.17)
देवानां समयस्त्वेष वसूनां संश्रुतो मया । जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति ॥
devānāṃ samayastveṣa vasūnāṃ saṃśruto mayā | jātaṃ jātaṃ mokṣayiṣye janmato mānuṣāditi
और देवताओं — वसुओं — के साथ मेरी यही प्रतिज्ञा हुई थी कि "जैसे-जैसे वे जन्म लेंगे, मैं उन्हें मनुष्य-जन्म से मुक्त कर दूँगी।"
श्लोक 18 (1.105.18)
तत्ते शापाद्विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ॥
tatte śāpādvinirmuktā āpavasya mahātmanaḥ | svasti te'stu gamiṣyāmi putraṃ pāhi mahāvratam
इस प्रकार वे महात्मा आपव (वसिष्ठ) के शाप से मुक्त हो गए। तुम्हारा कल्याण हो; मैं जाऊँगी। महान् व्रतवाले इस पुत्र की रक्षा करना।
श्लोक 19 (1.105.19)
अयं तव सुतस्तेषां वीर्येण कुलनन्दनः । संभूतोऽतिजनं कर्म करिष्यति न संशयः ॥
ayaṃ tava sutasteṣāṃ vīryeṇa kulanandanaḥ | saṃbhūto'tijanaṃ karma kariṣyati na saṃśayaḥ
तुम्हारा यह पुत्र, जो उन (वसुओं) के तेज से उत्पन्न हुआ है और कुल को आनन्द देने वाला है, निःसंदेह ऐसे कर्म करेगा जो साधारण मनुष्यों से परे हैं।