आदि पर्व · अध्याय 106
वसिष्ठ का वसुओं को शाप
शान्तनु गंगा से पूछते हैं कि आपव कौन है और वसुओं को मनुष्य बनकर जन्म लेने का शाप क्यों मिला। गंगा बताती हैं कि वसुओं में से एक, द्यु ने अपनी पत्नी के कहने पर वसिष्ठ (आपव) के आश्रम से कामधेनु नन्दिनी को चुरा लिया, ताकि उसकी मानवी सखी जितवती उसका दूध पी सके; इस पर मुनि ने आठों वसुओं को मनुष्य-जन्म का शाप दिया, सात को एक वर्ष में मुक्ति का वचन दिया, पर द्यु को मनुष्यों में दीर्घ, संतानहीन जीवन बिताने का शाप दिया जिसमें वह स्त्री-भोग त्याग देगा। गंगा बताती हैं कि वसुओं के ही माँगने पर उन्होंने सातों को जल में डाला, फिर बालक को बड़ा करके लौटाने का वचन देकर उसे लेकर अन्तर्धान हो जाती हैं। वह पुत्र देवव्रत, जो गांगेय भी कहलाया, पिता से भी गुणों में बढ़कर था; शान्तनु शोकाकुल होकर अपने नगर लौट जाते हैं।
शान्तनुरुवाच
श्लोक 1 (1.106.1)
आपवो नाम कोन्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् । शशाप यस्मात्कल्याणि स वसूंश्चारुदर्शने । यस्याभिशापात्ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ॥
āpavo nāma konveṣa vasūnāṃ kiṃ ca duṣkṛtam | śaśāpa yasmātkalyāṇi sa vasūṃścārudarśane | yasyābhiśāpātte sarve mānuṣīṃ yonimāgatāḥ
शान्तनु ने कहा — "हे कल्याणी, हे सुदर्शना! यह आपव नाम का कौन है, और वसुओं ने कौन-सा अपराध किया था कि उसने उन्हें शाप दिया? किसके शाप से वे सब मनुष्य-योनि में आए?"
श्लोक 2 (1.106.2)
अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् । यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ॥
anena ca kumāreṇa tvayā dattena kiṃ kṛtam | yasya caiva kṛtenāyaṃ mānuṣeṣu nivatsyati
"और तुम्हारे दिए हुए इस कुमार ने ऐसा क्या किया है, जिसके कर्म के कारण यह मनुष्यों के बीच रहेगा?"
श्लोक 3 (1.106.3)
ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम् । मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ॥
īśā vai sarvalokasya vasavaste ca vai katham | mānuṣeṣūdapadyanta tanmamācakṣva jāhnavi
"वसु तो समस्त लोक के स्वामी हैं; फिर वे मनुष्यों में कैसे उत्पन्न हुए? हे जाह्नवी, यह मुझे बताओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (1.106.4)
एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् । भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ॥
evamuktā tadā gaṅgā rājānamidamabravīt | bhartāraṃ jāhnavī devī śāntanuṃ puruṣarṣabha
वैशम्पायन ने कहा — ऐसा पूछे जाने पर जाह्नवी देवी गंगा ने अपने पति, पुरुषश्रेष्ठ राजा शान्तनु से यह कहा।
गङ्गोवाच
श्लोक 5 (1.106.5)
यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम । वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ॥
yaṃ lebhe varuṇaḥ putraṃ purā bharatasattama | vasiṣṭhanāmā sa muniḥ khyāta āpava ityuta
गंगा ने कहा — "हे भरतश्रेष्ठ! प्राचीन काल में वरुण ने जो पुत्र पाया था, वे वसिष्ठ नाम के मुनि हैं, जो आपव नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 6 (1.106.6)
तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् । मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ॥
tasyāśramapadaṃ puṇyaṃ mṛgapakṣisamanvitam | meroḥ pārśve nagendrasya sarvartukusumāvṛtam
उनका पवित्र आश्रम पर्वतराज मेरु के पार्श्व में था; वह मृगों और पक्षियों से भरा था और सब ऋतुओं के फूलों से ढका रहता था।
श्लोक 7 (1.106.7)
स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन्भरतसत्तम । वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ॥
sa vāruṇistapastepe tasminbharatasattama | vane puṇyakṛtāṃ śreṣṭhaḥ svādumūlaphalodake
हे भरतश्रेष्ठ! पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ वे वरुण-पुत्र उस वन में तप करते थे, जहाँ स्वादिष्ट कन्द-मूल, फल और जल प्रचुर थे।
श्लोक 8 (1.106.8)
दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता । गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद्भरतर्षभ ॥
dakṣasya duhitā yā tu surabhītyabhiśabditā | gāṃ prajātā tu sā devī kaśyapādbharatarṣabha
हे भरतर्षभ! दक्ष की जो पुत्री सुरभि कहलाती है, उस देवी ने कश्यप से एक गौ को जन्म दिया।
श्लोक 9 (1.106.9)
अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वराम् । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ॥
anugrahārthaṃ jagataḥ sarvakāmaduhāṃ varām | tāṃ lebhe gāṃ tu dharmātmā homadhenuṃ sa vāruṇiḥ
जगत् पर अनुग्रह के लिए उत्पन्न, सब कामनाएँ पूरी करने वाली गौओं में श्रेष्ठ उस गौ को धर्मात्मा वरुण-पुत्र ने अपनी होम-धेनु के रूप में पाया।
श्लोक 10 (1.106.10)
सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ॥
sā tasmiṃstāpasāraṇye vasantī munisevite | cacāra puṇye ramye ca gaurapetabhayā tadā
मुनियों से सेवित उस तपोवन में रहती हुई वह गौ तब उस पवित्र और रमणीय वन में निर्भय होकर विचरती थी।
श्लोक 11 (1.106.11)
अथ तद्वनमाजग्मुः कदाचिद्भरतर्षभ । पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ॥
atha tadvanamājagmuḥ kadācidbharatarṣabha | pṛthvādyā vasavaḥ sarve devā devarṣisevitam
हे भरतर्षभ! फिर एक दिन पृथु आदि सभी वसु देवता देवर्षियों से सेवित उस वन में आए।
श्लोक 12 (1.106.12)
ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः । रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥
te sadārā vanaṃ tacca vyacaranta samantataḥ | remire ramaṇīyeṣu parvateṣu vaneṣu ca
वे अपनी पत्नियों के साथ उस वन में चारों ओर घूमे और वहाँ के रमणीय पर्वतों और वनों में विहार करते रहे।
श्लोक 13 (1.106.13)
तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती वने तस्मिन्गां ददर्श सुमध्यमा ॥
tatraikasyātha bhāryā tu vasorvāsavavikrama | saṃcarantī vane tasmingāṃ dadarśa sumadhyamā
हे इन्द्र-समान पराक्रमी! वहाँ एक वसु की सुन्दर कटि वाली पत्नी ने उस वन में घूमते हुए उस गौ को देखा,
श्लोक 14 (1.106.14)
नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसंपदा ॥
nandinīṃ nāma rājendra sarvakāmadhuguttamām | sā vismayasamāviṣṭā śīladraviṇasaṃpadā
हे राजेन्द्र! नन्दिनी नाम की उस गौ को, जो सब कामनाएँ पूरी करने वाली गौओं में उत्तम थी। उसके सुशील स्वभाव की सम्पदा देखकर विस्मित हुई
श्लोक 15 (1.106.15)
द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण । आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभां ॥
dyave vai darśayāmāsa tāṃ gāṃ govṛṣabhekṣaṇa | āpīnāṃ ca sudogdhrīṃ ca suvāladhikhurāṃ śubhāṃ
हे वृषभ-नयन! उसने वह गौ द्यु को दिखाई — भरे थनों वाली, भरपूर दूध देने वाली, सुन्दर पूँछ और खुरों वाली मंगलमयी गौ,
श्लोक 16 (1.106.16)
उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च । एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी ॥
upapannāṃ guṇaiḥ sarvaiḥ śīlenānuttamena ca | evaṃguṇasamāyuktāṃ vasave vasunandinī
जो सब गुणों से सम्पन्न और अनुपम सुशील थी। ऐसे गुणों से युक्त उस गौ को वसु को आनन्द देने वाली उस पत्नी ने
श्लोक 17 (1.106.17)
दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन । द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वैव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम ॥
darśayāmāsa rājendra purā pauravanandana | dyaustadā tāṃ tu dṛṣṭvaiva gāṃ gajendrendravikrama
हे राजेन्द्र, हे पौरवनन्दन! प्राचीन काल में अपने पति वसु को दिखाया। हे गजराजों के भी स्वामी-जैसे पराक्रमी! तब द्यु ने उस गौ को देखते ही
श्लोक 18 (1.106.18)
उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान्वदन् । एषा गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितेक्षणा ॥
uvāca rājaṃstāṃ devīṃ tasyā rūpaguṇānvadan | eṣā gauruttamā devī vāruṇerasitekṣaṇā
हे राजन्! उस देवी से गौ के रूप और गुणों का वर्णन करते हुए कहा — "यह श्याम नेत्रों वाली उत्तम दिव्य गौ वरुण-पुत्र
श्लोक 19 (1.106.19)
ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम् । अस्याः क्षीरं पिबेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे ॥
ṛṣestasya varārohe yasyedaṃ vanamuttamam | asyāḥ kṣīraṃ pibenmartyaḥ svādu yo vai sumadhyame
उन ऋषि की है, हे सुन्दरी, जिनका यह उत्तम वन है। हे सुमध्यमे! जो मनुष्य इसका मधुर दूध पीएगा,
श्लोक 20 (1.106.20)
दशवर्षसहस्राणि स जीवेत्स्थिरयौवनः । एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा ॥
daśavarṣasahasrāṇi sa jīvetsthirayauvanaḥ | etacchrutvā tu sā devī nṛpottama sumadhyamā
वह दस हज़ार वर्ष तक अक्षय यौवन के साथ जीवित रहेगा।" हे नृपश्रेष्ठ! यह सुनकर वह सुमध्यमा देवी
श्लोक 21 (1.106.21)
तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम् । अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी ॥
tamuvācānavadyāṅgī bhartāraṃ dīptatejasam | asti me mānuṣe loke naradevātmajā sakhī
निर्दोष अंगों वाली ने अपने तेजस्वी पति से कहा — "मनुष्य-लोक में मेरी एक सखी है, जो एक राजा की पुत्री है;
श्लोक 22 (1.106.22)
नाम्नाजितवती नाम रूपयौवनशालिनी । उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसन्धस्य धीमतः ॥
nāmnājitavatī nāma rūpayauvanaśālinī | uśīnarasya rājarṣeḥ satyasandhasya dhīmataḥ
उसका नाम जितवती है और वह रूप-यौवन से सम्पन्न है। वह सत्यप्रतिज्ञ, बुद्धिमान राजर्षि उशीनर की
श्लोक 23 (1.106.23)
दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसंपदा । तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् ॥
duhitā prathitā loke mānuṣe rūpasaṃpadā | tasyā hetormahābhāga savatsāṃ gāṃ mamepsitām
पुत्री है, जो मनुष्य-लोक में अपने रूप-वैभव के लिए प्रसिद्ध है। हे महाभाग! उसी के लिए बछड़े सहित वह गौ, जिसे मैं चाहती हूँ,
श्लोक 24 (1.106.24)
आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन । यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ॥
ānayasvāmaraśreṣṭha tvaritaṃ puṇyavardhana | yāvadasyāḥ payaḥ pītvā sā sakhī mama mānada
हे देवश्रेष्ठ, हे पुण्य बढ़ाने वाले! शीघ्र ले आओ, जिससे हे मानद, उसका दूध पीकर मेरी वह सखी
श्लोक 25 (1.106.25)
मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता । एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित ॥
mānuṣeṣu bhavatvekā jarārogavivarjitā | etanmama mahābhāga kartumarhasyanindita
मनुष्यों में अकेली ऐसी हो जाए जो बुढ़ापे और रोग से मुक्त हो। हे महाभाग, हे अनिन्दित! मेरा यह काम तुम्हें करना ही चाहिए;
श्लोक 26 (1.106.26)
प्रियात्प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत्कथंचन । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया ॥
priyātpriyataraṃ hyasmānnāsti me'nyatkathaṃcana | etacchrutvā vacastasyā devyāḥ priyacikīrṣayā
मेरे लिए इससे बढ़कर प्रिय और कुछ भी नहीं है।" देवी के ये वचन सुनकर उसे प्रसन्न करने की इच्छा से
श्लोक 27 (1.106.27)
पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम् । तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ॥
pṛthvādyairbhrātṛbhiḥ sārdhaṃ dyaustadā tāṃ jahāra gām | tayā kamalapatrākṣyā niyukto dyaustadā nṛpa
द्यु ने तब पृथु आदि अपने भाइयों के साथ मिलकर उस गौ को हर लिया। हे राजन्! उस कमल-नयनी के कहने पर द्यु
श्लोक 28 (1.106.28)
ऋषेस्तस्य तपस्तीव्रं न शशाक निरीक्षितुम् । हृता गौः सा तदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः ॥
ṛṣestasya tapastīvraṃ na śaśāka nirīkṣitum | hṛtā gauḥ sā tadā tena prapātastu na tarkitaḥ
उन ऋषि के तीव्र तप को न देख सका। इस प्रकार उसने तब वह गौ चुरा ली, और अपने पतन का विचार नहीं किया।
श्लोक 29 (1.106.29)
अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः । न चापश्यत्स गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे ॥
athāśramapadaṃ prāptaḥ phalānyādāya vāruṇiḥ | na cāpaśyatsa gāṃ tatra savatsāṃ kānanottame
फिर वरुण-पुत्र फल लेकर अपने आश्रम लौटे, पर उस उत्तम वन में उन्हें बछड़े सहित वह गौ दिखाई नहीं दी।
श्लोक 30 (1.106.30)
ततः स मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः । नाध्यागमच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः ॥
tataḥ sa mṛgayāmāsa vane tasmiṃstapodhanaḥ | nādhyāgamacca mṛgayaṃstāṃ gāṃ munirudāradhīḥ
तब उन तपस्वी ने उस वन में उसे खोजा, पर खोजते रहने पर भी उदार-बुद्धि मुनि को वह गौ नहीं मिली।
श्लोक 31 (1.106.31)
ज्ञात्वा तथाऽपनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः । ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ॥
jñātvā tathā'panītāṃ tāṃ vasubhirdivyadarśanaḥ | yayau krodhavaśaṃ sadyaḥ śaśāpa ca vasūṃstadā
दिव्य दृष्टि वाले मुनि ने जान लिया कि वसु उसे इस प्रकार ले गए हैं; वे तत्काल क्रोध के वश हो गए और उन्होंने तब वसुओं को शाप दिया —
श्लोक 32 (1.106.32)
यस्मान्मे वसवो जह्रुर्गां वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् । तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ॥
yasmānme vasavo jahrurgāṃ vai dogdhrīṃ suvāladhim | tasmātsarve janiṣyanti mānuṣeṣu na saṃśayaḥ
"क्योंकि वसुओं ने मेरी सुन्दर पूँछ वाली, दूध देने वाली गौ को हर लिया है, इसलिए वे सब मनुष्यों में जन्म लेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।"
श्लोक 33 (1.106.33)
एवं शशाप भगवान्वसूंस्तान्भरतर्षभ । वशं क्रोधस्य संप्राप्त आपवो मुनिसत्तमः ॥
evaṃ śaśāpa bhagavānvasūṃstānbharatarṣabha | vaśaṃ krodhasya saṃprāpta āpavo munisattamaḥ
हे भरतर्षभ! इस प्रकार क्रोध के वश में आकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् आपव ने उन वसुओं को शाप दिया।
श्लोक 34 (1.106.34)
शप्त्वा च तान्महाभागस्तपस्येव मनो दधे । एवं स शप्तवान्राजन्वसूनष्टौ तपोधनः ॥
śaptvā ca tānmahābhāgastapasyeva mano dadhe | evaṃ sa śaptavānrājanvasūnaṣṭau tapodhanaḥ
उन्हें शाप देकर उन महाभाग ने फिर तप में ही मन लगा दिया। हे राजन्! इस प्रकार उन तपोधन ने आठों वसुओं को शाप दिया;
श्लोक 35 (1.106.35)
महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान्क्रोधसमन्वितः । एवं शप्तास्ततस्तेन मुनिना यामुनेन वै ॥
mahāprabhāvo brahmarṣirdevānkrodhasamanvitaḥ | evaṃ śaptāstatastena muninā yāmunena vai
उन महाप्रभावशाली ब्रह्मर्षि ने क्रोध से भरकर देवताओं को शाप दिया। इस प्रकार उन यामुन मुनि के शाप से
श्लोक 36 (1.106.36)
अष्टौ समस्ता वसवो दिवो दोषेण सत्तम । अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः ॥
aṣṭau samastā vasavo divo doṣeṇa sattama | athāśramapadaṃ prāptāste vai bhūyo mahātmanaḥ
हे सत्तम! द्यु के दोष से आठों वसु एक साथ शापित हुए। तब वे फिर उन महात्मा के आश्रम पहुँचे
श्लोक 37 (1.106.37)
शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः । प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ ॥
śaptāḥ sma iti jānanta ṛṣiṃ tamupacakramuḥ | prasādayantastamṛṣiṃ vasavaḥ pārthivarṣabha
और यह जानकर कि वे शापित हो चुके हैं, उन ऋषि के पास गए। हे राजश्रेष्ठ! वसुओं ने उन ऋषि को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया,
श्लोक 38 (1.106.38)
लेभिरे न च तस्मात्ते प्रसादमृषिसत्तमात् । आपवात्पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात् ॥
lebhire na ca tasmātte prasādamṛṣisattamāt | āpavātpuruṣavyāghra sarvadharmaviśāradāt
पर हे पुरुषसिंह! सब धर्मों के ज्ञाता उन ऋषिश्रेष्ठ आपव से उन्हें कृपा प्राप्त नहीं हुई।
श्लोक 39 (1.106.39)
उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः । अनुसंवत्सरात्सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ॥
uvāca ca sa dharmātmā śaptā yūyaṃ dharādayaḥ | anusaṃvatsarātsarve śāpamokṣamavāpsyatha
फिर भी उन धर्मात्मा ने कहा — "धर आदि तुम सब शापित वसु एक वर्ष के भीतर शाप से मुक्ति पा लोगे।
श्लोक 40 (1.106.40)
अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति । द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणः ॥
ayaṃ tu yatkṛte yūyaṃ mayā śaptāḥ sa vatsyati | dyaustadā mānuṣe loke dīrghakālaṃ svakarmaṇaḥ
परन्तु जिसके कारण मैंने तुम्हें शाप दिया, वह द्यु अपने कर्म के कारण दीर्घ काल तक मनुष्य-लोक में रहेगा।
श्लोक 41 (1.106.41)
नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान्यदब्रुवम् । न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ॥
nānṛtaṃ taccikīrṣāmi kruddho yuṣmānyadabruvam | na prajāsyati cāpyeṣa mānuṣeṣu mahāmanāḥ
क्रोध में मैंने तुमसे जो कहा, उसे मैं असत्य नहीं करना चाहता। यह महामना मनुष्यों में संतान उत्पन्न नहीं करेगा।
श्लोक 42 (1.106.42)
भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः । पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान्वर्जयिष्यति ॥
bhaviṣyati ca dharmātmā sarvaśāstraviśāradaḥ | pituḥ priyahite yuktaḥ strībhogānvarjayiṣyati
वह धर्मात्मा और सब शास्त्रों का ज्ञाता होगा; पिता के प्रिय और हित में लगा रहकर वह स्त्री-भोग का त्याग करेगा।"
श्लोक 43 (1.106.43)
एवमुक्त्वा वसून्सर्वान्स जगाम महानृषिः । ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा ॥
evamuktvā vasūnsarvānsa jagāma mahānṛṣiḥ | tato māmupajagmuste sametā vasavastadā
सब वसुओं से ऐसा कहकर वे महर्षि चले गए। तब वे वसु मिलकर मेरे पास आए
श्लोक 44 (1.106.44)
अयाचन्त च मां राजन्वरं तच्च मया कृतम् । जाताञ्जातान्प्रक्षिपास्मान्स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि ॥
ayācanta ca māṃ rājanvaraṃ tacca mayā kṛtam | jātāñjātānprakṣipāsmānsvayaṃ gaṅge tvamambhasi
और हे राजन्! उन्होंने मुझसे एक वर माँगा, जिसे मैंने पूरा किया — "हे गंगे! हम जैसे-जैसे जन्म लें, तुम स्वयं हमें जल में डाल देना।"
श्लोक 45 (1.106.45)
एवं तेषामहं सम्यक् शप्तानां राजसत्तम । मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद्यथावत्कृतवत्यहम् ॥
evaṃ teṣāmahaṃ samyak śaptānāṃ rājasattama | mokṣārthaṃ mānuṣāllokādyathāvatkṛtavatyaham
हे राजश्रेष्ठ! इस प्रकार उन शापित वसुओं को मनुष्य-लोक से मुक्त करने के लिए मैंने यथोचित रूप से सब कुछ किया।
श्लोक 46 (1.106.46)
अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम । द्यौ राजन्मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ॥
ayaṃ śāpādṛṣestasya eka eva nṛpottama | dyau rājanmānuṣe loke ciraṃ vatsyati bhārata
हे नृपश्रेष्ठ, हे भारत! उन ऋषि के शाप के कारण केवल यह एक, द्यु, दीर्घ काल तक मनुष्य-लोक में रहेगा।
श्लोक 47 (1.106.47)
अयं कुमारः पुत्रस्ते विवृद्धः पुनरेष्यति । अहं च ते भविष्यामि आह्वानोपगता नृप ॥
ayaṃ kumāraḥ putraste vivṛddhaḥ punareṣyati | ahaṃ ca te bhaviṣyāmi āhvānopagatā nṛpa
हे राजन्! तुम्हारा यह पुत्र, यह कुमार, बड़ा होकर तुम्हारे पास लौट आएगा; और तुम्हारे बुलाने पर मैं भी तुम्हारे पास आ जाऊँगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (1.106.48)
एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ॥
etadākhyāya sā devī tatraivāntaradhīyata | ādāya ca kumāraṃ taṃ jagāmātha yathepsitam
वैशम्पायन ने कहा — यह कहकर वह देवी वहीं अन्तर्धान हो गई, और उस कुमार को साथ लेकर जहाँ चाहती थी वहाँ चली गई।
श्लोक 49 (1.106.49)
स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् । द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ॥
sa tu devavrato nāma gāṅgeya iti cābhavat | dyunāmā śāntanoḥ putraḥ śāntanoradhiko guṇaiḥ
शान्तनु का वह द्यु नाम वाला पुत्र देवव्रत और गांगेय कहलाया, और गुणों में शान्तनु से भी बढ़कर था।
श्लोक 50 (1.106.50)
शान्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः । तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान्गुणान् ॥
śāntanuścāpi śokārto jagāma svapuraṃ tataḥ | tasyāhaṃ kīrtayiṣyāmi śāntanoradhikānguṇān
शान्तनु भी शोक से व्याकुल होकर अपने नगर लौट गए। अब मैं उन शान्तनु के श्रेष्ठ गुणों का वर्णन करूँगा
श्लोक 51 (1.106.51)
महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः । यस्येतिहासो द्युतिमान्महाभारतमुच्यते ॥
mahābhāgyaṃ ca nṛpaterbhāratasya mahātmanaḥ | yasyetihāso dyutimānmahābhāratamucyate
और भरतवंशी उन महात्मा राजा के महान् सौभाग्य का, जिनका तेजस्वी इतिहास "महाभारत" कहलाता है।