Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 11

सहस्रपात् का शाप और अहिंसा का उपदेश

सहस्रपात् रुरु को बताता है कि बचपन में उसने अग्निहोत्र के समय अपने मित्र खगम को घास के बने साँप से डरा दिया था, और उसे शाप मिला कि वह निर्बल सर्प बनेगा और प्रमति के पुत्र रुरु को देखकर ही मुक्त होगा। शाप से छूटकर वह अपना तेजस्वी रूप फिर पा लेता है और रुरु को उपदेश देता है कि अहिंसा ब्राह्मण का परम धर्म है, जबकि दण्ड देना और प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का कर्म है। वह राजा जनमेजय के यज्ञ में सर्पों के संहार और ब्राह्मण आस्तीक द्वारा उनकी रक्षा का उल्लेख करता है।

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

डुण्डुभ उवाच

श्लोक 1 (1.11.1)

सखा बभूव मे पूर्वं खगमो नाम वै द्विजः । भृशं संशितवाक्तात तपोबलसमन्वितः ॥

sakhā babhūva me pūrvaṃ khagamo nāma vai dvijaḥ | bhṛśaṃ saṃśitavāktāta tapobalasamanvitaḥ

हे तात, पहले खगम नाम का एक ब्राह्मण मेरा मित्र था; उसकी वाणी बड़ी प्रखर थी और वह तपोबल से सम्पन्न था।

श्लोक 2 (1.11.2)

स मया क्रीडता बाल्ये कृत्वा तार्णं भुजंगमम् । अग्निहोत्रे प्रसक्तस्तु भीषितः प्रमुमोह वै ॥

sa mayā krīḍatā bālye kṛtvā tārṇaṃ bhujaṃgamam | agnihotre prasaktastu bhīṣitaḥ pramumoha vai

बचपन में खेलते हुए मैंने घास का एक साँप बनाया, और जब वह अग्निहोत्र में लगा हुआ था, तब उससे उसे डरा दिया; वह मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 3 (1.11.3)

लब्ध्वा स च पुनः संज्ञां मामुवाच तपोधनः । निर्दहन्निव कोपेन सत्यवाक्संशितव्रतः ॥

labdhvā sa ca punaḥ saṃjñāṃ māmuvāca tapodhanaḥ | nirdahanniva kopena satyavāksaṃśitavrataḥ

जब उसे फिर होश आया, तब वह सत्यवादी और कठोर व्रतवाला तपस्वी मानो क्रोध से मुझे जलाता हुआ बोला —

श्लोक 4 (1.11.4)

यथावीर्यस्त्वया सर्पः कृतोऽयं मद्बिभीषया । तथावीर्यो भुजंगस्त्वं मम शापाद्भविष्यसि ॥

yathāvīryastvayā sarpaḥ kṛto'yaṃ madbibhīṣayā | tathāvīryo bhujaṃgastvaṃ mama śāpādbhaviṣyasi

"मुझे डराने के लिए तुमने जैसा शक्तिहीन साँप बनाया है, मेरे शाप से तुम वैसे ही शक्तिहीन सर्प बन जाओगे।"

श्लोक 5 (1.11.5)

तस्याहं तपसो वीर्यं जानन्नासं तपोधन । भृशमुद्विग्नहृदयस्तमवोचमहं तदा ॥

tasyāhaṃ tapaso vīryaṃ jānannāsaṃ tapodhana | bhṛśamudvignahṛdayastamavocamahaṃ tadā

हे तपोधन, उसके तप की शक्ति को जानते हुए मेरा हृदय अत्यन्त व्याकुल हो उठा, और तब मैंने उससे कहा —

श्लोक 6 (1.11.6)

प्रणतः संभ्रमाच्चैव प्राञ्जलिः पुरतः स्थितः । सखेति हसतेदं ते नर्मार्थं वै कृतं मया ॥

praṇataḥ saṃbhramāccaiva prāñjaliḥ purataḥ sthitaḥ | sakheti hasatedaṃ te narmārthaṃ vai kṛtaṃ mayā

घबराहट में झुककर, हाथ जोड़कर उसके सामने खड़े होकर मैंने कहा — "मित्र, यह मैंने हँसी में, केवल विनोद के लिए किया था।

श्लोक 7 (1.11.7)

क्षन्तुमर्हसि मे ब्रह्मञ्शापोऽयं विनिवर्त्यताम् । सोऽथ मामब्रवीद्दृष्ट्वा भृशमुद्विग्नचेतसम् ॥

kṣantumarhasi me brahmañśāpo'yaṃ vinivartyatām | so'tha māmabravīddṛṣṭvā bhṛśamudvignacetasam

हे ब्रह्मन्, मुझे क्षमा करो; यह शाप लौटा लो।" तब मुझे अत्यन्त व्याकुल देखकर वह तपस्वी —

श्लोक 8 (1.11.8)

मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य सुसंभ्रान्तस्तपोधनः । नानृतं वै मया प्रोक्तं भवितेदं कथंचन ॥

muhuruṣṇaṃ viniḥśvasya susaṃbhrāntastapodhanaḥ | nānṛtaṃ vai mayā proktaṃ bhavitedaṃ kathaṃcana

बार-बार गरम साँसें लेता हुआ, अत्यन्त घबराकर मुझसे बोला — "मैंने जो कहा है वह झूठा नहीं हो सकता; यह किसी भी प्रकार होकर ही रहेगा।

श्लोक 9 (1.11.9)

यत्तु वक्ष्यामि ते वाक्यं शृणु तन्मे तपोधन । श्रुत्वा च हृदि ते वाक्यमिदमस्तु सदाऽनघ ॥

yattu vakṣyāmi te vākyaṃ śṛṇu tanme tapodhana | śrutvā ca hṛdi te vākyamidamastu sadā'nagha

परन्तु हे तपोधन, अब मैं तुमसे जो बात कहता हूँ उसे सुनो, और हे निष्पाप, सुनकर इसे सदा अपने हृदय में रखना।

श्लोक 10 (1.11.10)

उत्पत्स्यति रुरुर्नाम प्रमतेरात्मजः शुचिः । तं दृष्ट्वा शापमोक्षस्ते भविता नचिरादिव । एवमुक्तस्तु तेनाहमुरगत्वमवाप्तवान् ॥

utpatsyati rururnāma pramaterātmajaḥ śuciḥ | taṃ dṛṣṭvā śāpamokṣaste bhavitā nacirādiva | evamuktastu tenāhamuragatvamavāptavān

प्रमति का पवित्र पुत्र रुरु नाम से जन्म लेगा। उसे देखकर शीघ्र ही तुम शाप से मुक्त हो जाओगे।" उसके ऐसा कहने पर मैं सर्प बन गया।

श्लोक 11 (1.11.11)

स त्वं रुरुरिति ख्यातः प्रमतेरात्मजोऽपि च । स्वरूपं प्रतिपद्याहमद्य वक्ष्यामि ते हितम् ॥

sa tvaṃ rururiti khyātaḥ pramaterātmajo'pi ca | svarūpaṃ pratipadyāhamadya vakṣyāmi te hitam

तुम वही रुरु नाम से विख्यात प्रमति के पुत्र हो। अब अपना स्वरूप फिर से पाकर मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात बताऊँगा।

सौतिरुवाच

श्लोक 12 (1.11.12)

स डौण्डुभं परित्यज्य रूपं विप्रर्षभस्तदा । स्वरूपं भास्वरं भूयः प्रतिपेदे महायशाः ॥

sa ḍauṇḍubhaṃ parityajya rūpaṃ viprarṣabhastadā | svarūpaṃ bhāsvaraṃ bhūyaḥ pratipede mahāyaśāḥ

तब उस महायशस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मण ने डुण्डुभ का रूप त्यागकर फिर से अपना तेजस्वी स्वरूप धारण कर लिया।

श्लोक 13 (1.11.13)

इदं चोवाच वचनं रुरुमप्रतिमौजसम् । अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वर ॥

idaṃ covāca vacanaṃ rurumapratimaujasam | ahiṃsā paramo dharmaḥ sarvaprāṇabhṛtāṃ vara

और उसने अतुलनीय तेजवाले रुरु से यह वचन कहा — "हे समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ, अहिंसा ही परम धर्म है।

डुण्डुभ उवाच

श्लोक 14 (1.11.14)

तस्मात्प्राणभृतः सर्वान्न हिंस्याद्ब्राह्मणः क्वचित् । ब्राह्मणः सौम्य एवेह भवतीति परा श्रुतिः ॥

tasmātprāṇabhṛtaḥ sarvānna hiṃsyādbrāhmaṇaḥ kvacit | brāhmaṇaḥ saumya eveha bhavatīti parā śrutiḥ

इसलिए ब्राह्मण को कभी किसी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए। इस संसार में ब्राह्मण सौम्य ही जन्म लेता है — ऐसी श्रेष्ठ श्रुति है।

श्लोक 15 (1.11.15)

वेदवेदाङ्गविन्नाम सर्वभूताभयप्रदः । अहिंसा सत्यवचनं क्षमा चेति विनिश्चितम् ॥

vedavedāṅgavinnāma sarvabhūtābhayapradaḥ | ahiṃsā satyavacanaṃ kṣamā ceti viniścitam

वह वेद और वेदांगों का ज्ञाता होता है और सब प्राणियों को अभय देता है। अहिंसा, सत्य वचन और क्षमा — यह निश्चित है कि

श्लोक 16 (1.11.16)

ब्राह्मणस्य परो धर्मो वेदानां धारणापि च । क्षत्रियस्य हि यो धर्मः स नेहेष्येत वै तव ॥

brāhmaṇasya paro dharmo vedānāṃ dhāraṇāpi ca | kṣatriyasya hi yo dharmaḥ sa neheṣyeta vai tava

ये ही ब्राह्मण का परम धर्म हैं, और साथ ही वेदों को स्मृति में धारण करना भी। जो क्षत्रिय का धर्म है, वह तुम्हारे लिए अभीष्ट नहीं है।

श्लोक 17 (1.11.17)

दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् । तदिदं क्षत्रियस्यासीत्कर्म वै शृणु मे रुरो ॥

daṇḍadhāraṇamugratvaṃ prajānāṃ paripālanam | tadidaṃ kṣatriyasyāsītkarma vai śṛṇu me ruro

दण्ड धारण करना, कठोरता और प्रजा का पालन — यही क्षत्रिय का कर्म था। हे रुरु, मेरी बात सुनो।

श्लोक 18 (1.11.18)

जनमेजयस्य यज्ञेऽस्मिन्सर्पाणां हिंसनं पुरा । परित्राणं च भीतानां सर्पाणां ब्राह्मणादपि ॥

janamejayasya yajñe'sminsarpāṇāṃ hiṃsanaṃ purā | paritrāṇaṃ ca bhītānāṃ sarpāṇāṃ brāhmaṇādapi

पूर्वकाल में जनमेजय के उस यज्ञ में सर्पों का संहार हुआ था, और एक ब्राह्मण के द्वारा भयभीत सर्पों की रक्षा भी हुई थी —

श्लोक 19 (1.11.19)

तपोवीर्यबलोपेताद्वेदवेदाङ्गपारगात् । आस्तीकाद्द्विजमुख्याद्वै सर्पसत्रे द्विजोत्तम ॥

tapovīryabalopetādvedavedāṅgapāragāt | āstīkāddvijamukhyādvai sarpasatre dvijottama

हे द्विजश्रेष्ठ, उस सर्पसत्र में तप, पराक्रम और बल से सम्पन्न, वेद-वेदांगों के पारंगत, ब्राह्मणों में प्रमुख आस्तीक के द्वारा।"

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12