आदि पर्व · अध्याय 111
विचित्रवीर्य का विवाह और मृत्यु
अम्बा के चले जाने के बाद भीष्म काशिराज की पुत्रियों अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कराते हैं। अश्विनीकुमारों जैसा रूपवान वह तरुण राजा सात वर्ष तक अपनी दोनों पत्नियों के साथ भोग-विलास में रहता है, फिर यक्ष्मा रोग से ग्रस्त होकर मित्रों और वैद्यों के प्रयत्नों के बावजूद मर जाता है। शोकाकुल भीष्म सत्यवती की इच्छा के अनुसार ऋत्विजों और प्रमुख कुरुओं के साथ उसकी अन्त्येष्टि-क्रियाएँ सम्पन्न कराते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.111.1)
अम्बायां निर्गतायां तु भीष्मः शान्तनवस्तदा । न्यायेन कारयामास राज्ञो वैवाहिकीं क्रियाम् ॥
ambāyāṃ nirgatāyāṃ tu bhīṣmaḥ śāntanavastadā | nyāyena kārayāmāsa rājño vaivāhikīṃ kriyām
अम्बा के चले जाने पर शान्तनुनन्दन भीष्म ने विधिपूर्वक राजा (विचित्रवीर्य) का विवाह-संस्कार सम्पन्न कराया।
श्लोक 2 (1.111.2)
अम्बिकाम्बालिके चैव परिणीयाग्निसंनिधौ । तयोः पाणी गृहीत्वा तु कौरव्यो रूपदर्पितः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ॥
ambikāmbālike caiva pariṇīyāgnisaṃnidhau | tayoḥ pāṇī gṛhītvā tu kauravyo rūpadarpitaḥ | vicitravīryo dharmātmā kāmātmā samapadyata
अग्नि के समक्ष अम्बिका और अम्बालिका से विवाह करके और उन दोनों का पाणिग्रहण करके, अपने रूप पर गर्व करने वाला कुरुवंशी विचित्रवीर्य, धर्मात्मा होते हुए भी, काम के वशीभूत हो गया।
श्लोक 3 (1.111.3)
ते चापि बृहतीश्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे । रक्ततुङ्गनखोपेते पीनश्रोणिपयोधरे ॥
te cāpi bṛhatīśyāme nīlakuñcitamūrdhaje | raktatuṅganakhopete pīnaśroṇipayodhare
और वे दोनों भी, जो बृहती-पुष्प के समान साँवली थीं, जिनके केश काले और घुँघराले थे, नख लाल और उभरे हुए थे, तथा नितम्ब और स्तन पुष्ट थे,
श्लोक 4 (1.111.4)
आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लब्धः पतिरिति स्थिते । विचित्रवीर्यं कल्याण्यौ पूजयामासतुः शुभे ॥
ātmanaḥ pratirūpo'sau labdhaḥ patiriti sthite | vicitravīryaṃ kalyāṇyau pūjayāmāsatuḥ śubhe
यह मानकर कि उन्हें अपने अनुरूप पति मिला है, उन दोनों कल्याणी और शुभ स्त्रियों ने विचित्रवीर्य का आदर-सत्कार किया।
श्लोक 5 (1.111.5)
अन्योन्यं प्रति सक्ते च एकभावे इव स्थिते । स चाश्विरूपसदृशो देवतुल्यपराक्रमः । सर्वासामेव नारीणां चित्तप्रमथनो रहः ॥
anyonyaṃ prati sakte ca ekabhāve iva sthite | sa cāśvirūpasadṛśo devatulyaparākramaḥ | sarvāsāmeva nārīṇāṃ cittapramathano rahaḥ
वे दोनों एक-दूसरे में अनुरक्त थीं, मानो एक ही भाव में स्थित हों। और वह राजा, जो रूप में अश्विनीकुमारों के समान और पराक्रम में देवताओं के तुल्य था, एकान्त में सभी स्त्रियों का मन मथ डालता था।
श्लोक 6 (1.111.6)
ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन्पृथिवीपतिः । विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्मणा समगृह्यत ॥
tābhyāṃ saha samāḥ sapta viharanpṛthivīpatiḥ | vicitravīryastaruṇo yakṣmaṇā samagṛhyata
उन दोनों के साथ सात वर्ष तक विहार करने के बाद तरुण राजा विचित्रवीर्य को यक्ष्मा (क्षय रोग) ने आ घेरा।
श्लोक 7 (1.111.7)
सुहृदां यतमानानामाप्तैः सह चिकित्सकैः । जगामास्तमिवादित्यः कौरव्यो यमसादनम् ॥
suhṛdāṃ yatamānānāmāptaiḥ saha cikitsakaiḥ | jagāmāstamivādityaḥ kauravyo yamasādanam
मित्रों ने विश्वस्त वैद्यों के साथ बहुत प्रयत्न किया, फिर भी वह कुरुवंशी अस्त होते सूर्य की भाँति यमलोक को चला गया।
श्लोक 8 (1.111.8)
धर्मात्मा स तु गाङ्गेयः चिन्ताशोकपरायणः । प्रेतकार्याणि सर्वाणि तस्य सम्यगकारयत् ॥
dharmātmā sa tu gāṅgeyaḥ cintāśokaparāyaṇaḥ | pretakāryāṇi sarvāṇi tasya samyagakārayat
तब चिन्ता और शोक में डूबे धर्मात्मा गंगापुत्र ने उसकी सभी प्रेत-क्रियाएँ भली-भाँति सम्पन्न कराईं।
श्लोक 9 (1.111.9)
राज्ञो विचित्रवीर्यस्य सत्यवत्या मते स्थितः । ऋत्विग्भिः सहितो भीष्मः सर्वैश्च कुरुपुङ्गवैः ॥
rājño vicitravīryasya satyavatyā mate sthitaḥ | ṛtvigbhiḥ sahito bhīṣmaḥ sarvaiśca kurupuṅgavaiḥ
राजा विचित्रवीर्य की ये क्रियाएँ भीष्म ने सत्यवती की सम्मति के अनुसार, ऋत्विजों और समस्त कुरुश्रेष्ठों के साथ मिलकर कराईं।