आदि पर्व · अध्याय 110
अम्बा की माला और शिखण्डी का पुरुषत्व
सब क्षत्रियों द्वारा ठुकराई गई अम्बा पांचालराज द्रुपद (यज्ञसेन) से सहायता माँगती है, पर वे भीष्म का विरोध करने को तैयार नहीं होते; तब वह कुमार की दी हुई माला उनके द्वार पर टाँग देती है और कहती है कि जो इसे पहनेगा वही भीष्म का वध करेगा। आगे चलकर द्रुपद की पुत्री शिखण्डिनी उस माला को पहन लेती है और भयभीत पिता उसे त्याग देते हैं। ऋषि इषीक की सलाह पर वह गंगाद्वार में गन्धर्वों की सेवा करती है, जहाँ एक गन्धर्व अपना पुरुषत्व उसके स्त्रीत्व से बदल लेता है; शिखण्डी बनकर वह दिव्य अस्त्र सिद्ध करता है और लौटकर पिता से कहता है कि उन्हें भीष्म से डरने की आवश्यकता नहीं।
अम्बोवाच
श्लोक 1 (1.110.1)
अन्यपूर्वेति मां साल्वो नाभिनन्दति बालिशः । साहं धर्माच्च कामाच्च विहीना शोकधारिणी ॥
anyapūrveti māṃ sālvo nābhinandati bāliśaḥ | sāhaṃ dharmācca kāmācca vihīnā śokadhāriṇī
"मूर्ख शाल्व 'यह पहले किसी और की हो चुकी है' कहकर मुझे स्वीकार नहीं करता। इसलिए मैं धर्म और काम दोनों से वंचित होकर केवल शोक ढो रही हूँ।
श्लोक 2 (1.110.2)
अपतिः क्षत्रियान्सर्वानाक्रन्दामि समन्ततः । इयं वः क्षत्रिया माला या भीष्मं निहनिष्यति ॥
apatiḥ kṣatriyānsarvānākrandāmi samantataḥ | iyaṃ vaḥ kṣatriyā mālā yā bhīṣmaṃ nihaniṣyati
पतिहीन होकर मैं चारों ओर सब क्षत्रियों को पुकारती हूँ — हे क्षत्रियो, यह वह माला है जो भीष्म का वध करेगी।
श्लोक 3 (1.110.3)
अहं च भार्या तस्य स्यां यो भीष्मं घातयिष्यति । तस्याश्चङ्क्रम्यमाणायाः समाः पञ्च गताः पराः ॥
ahaṃ ca bhāryā tasya syāṃ yo bhīṣmaṃ ghātayiṣyati | tasyāścaṅkramyamāṇāyāḥ samāḥ pañca gatāḥ parāḥ
और जो भीष्म का वध करेगा, मैं उसी की पत्नी बनूँगी।" इस प्रकार भटकते हुए उसके पाँच वर्ष और बीत गए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (1.110.4)
नाभवच्छरणं कश्चित्क्षत्रियो भीष्मजाद्भयात् । अगच्छत्सोमकं साऽम्बा पाञ्चालेषु यशस्विनम् ॥
nābhavaccharaṇaṃ kaścitkṣatriyo bhīṣmajādbhayāt | agacchatsomakaṃ sā'mbā pāñcāleṣu yaśasvinam
भीष्म के भय से कोई भी क्षत्रिय उसे शरण देने को तैयार न हुआ। तब अम्बा पांचाल देश में यशस्वी सोमक (द्रुपद) के पास गई,
श्लोक 5 (1.110.5)
सत्यसन्धं महेष्वासं सत्यधर्मपरायणम् । सा सभाद्वारमागम्य पाञ्चालैरभिरक्षितम् ॥
satyasandhaṃ maheṣvāsaṃ satyadharmaparāyaṇam | sā sabhādvāramāgamya pāñcālairabhirakṣitam
जो सत्यप्रतिज्ञ, महान धनुर्धर और सत्य तथा धर्म में तत्पर थे। पांचालों द्वारा रक्षित उनकी सभा के द्वार पर पहुँचकर
श्लोक 6 (1.110.6)
पाञ्चालराजमाक्रन्दत्प्रगृह्य सुभुजा भुजौ । भीष्मेण हन्यमानां मां मज्जन्तीमिव च ह्रदे ॥
pāñcālarājamākrandatpragṛhya subhujā bhujau | bhīṣmeṇa hanyamānāṃ māṃ majjantīmiva ca hrade
सुन्दर भुजाओं वाली उस स्त्री ने पांचालराज की दोनों भुजाएँ पकड़कर पुकारा — "भीष्म मुझे नष्ट कर रहे हैं; मैं मानो गहरे जल में डूब रही हूँ।
अम्बोवाच
श्लोक 7 (1.110.7)
यज्ञसेनाभिधावेह पाणिमालम्ब्य चोद्धर । तेन मे सर्वधर्माश्च रतिभोगाश्च केवलाः ॥
yajñasenābhidhāveha pāṇimālambya coddhara | tena me sarvadharmāśca ratibhogāśca kevalāḥ
हे यज्ञसेन, यहाँ दौड़कर आओ, मेरा हाथ थामकर मुझे उबारो। उन्हीं के कारण मेरे सारे धर्म और प्रेम के सब सुख,
श्लोक 8 (1.110.8)
उभौ च लोकौ कीर्तिश्च समूलौ सफलौ हृतौ । क्रोशन्त्येवं न विन्दामि राजन्यं शरणं क्वचित् ॥
ubhau ca lokau kīrtiśca samūlau saphalau hṛtau | krośantyevaṃ na vindāmi rājanyaṃ śaraṇaṃ kvacit
दोनों लोक और मेरी कीर्ति भी जड़ और फल समेत छिन गए हैं। इस प्रकार पुकारती हुई भी मुझे कहीं कोई क्षत्रिय शरण देने वाला नहीं मिलता।
श्लोक 9 (1.110.9)
किं नु निःक्षत्रियो लोको यत्रानाथोऽवसीदति । समागम्य तु राजानो मयोक्ता राजसत्तमाः ॥
kiṃ nu niḥkṣatriyo loko yatrānātho'vasīdati | samāgamya tu rājāno mayoktā rājasattamāḥ
क्या यह संसार क्षत्रियों से खाली हो गया है, जहाँ अनाथ डूबता चला जाता है? मैंने राजाओं के पास जाकर उन श्रेष्ठ नरेशों से कहा है —
श्लोक 10 (1.110.10)
शृण्वन्तु सर्वे राजानो मयोक्तं राजसत्तमाः । इक्ष्वाकूणां तु ये वृद्धाः पाञ्चालानां च ये वराः ॥
śṛṇvantu sarve rājāno mayoktaṃ rājasattamāḥ | ikṣvākūṇāṃ tu ye vṛddhāḥ pāñcālānāṃ ca ye varāḥ
"हे श्रेष्ठ राजाओ, आप सब मेरी बात सुनें" — इक्ष्वाकुओं के वृद्धों से और पांचालों के श्रेष्ठ पुरुषों से भी।
श्लोक 11 (1.110.11)
त्वत्प्रसादाद्विवाहेऽस्मिन्मा धर्मो मा पराजयेत् । प्रसीद यज्ञसेनेह गतिर्मे भव सोमक ॥
tvatprasādādvivāhe'sminmā dharmo mā parājayet | prasīda yajñaseneha gatirme bhava somaka
आपकी कृपा से मेरे इस विवाह के विषय में धर्म पराजित न हो। हे यज्ञसेन, प्रसन्न होइए; हे सोमक, मेरा सहारा बनिए।"
यज्ञसेन उवाच
श्लोक 12 (1.110.12)
जानामि त्वां बोधयामि राजपुत्रि विशेषतः । यथाशक्ति यथाधर्मं बलं संधारयाम्यहम् ॥
jānāmi tvāṃ bodhayāmi rājaputri viśeṣataḥ | yathāśakti yathādharmaṃ balaṃ saṃdhārayāmyaham
"हे राजपुत्री, मैं तुम्हें जानता हूँ और तुम्हें विशेष रूप से समझाता हूँ: मैं अपनी शक्ति और धर्म की मर्यादा के अनुसार ही बल धारण करता हूँ।
श्लोक 13 (1.110.13)
अन्यस्मात्पार्थिवाद्यत्ते भयं स्यात्पार्थिवात्मजे । तस्यापनयने हेतुं संविधातुमहं प्रभुः ॥
anyasmātpārthivādyatte bhayaṃ syātpārthivātmaje | tasyāpanayane hetuṃ saṃvidhātumahaṃ prabhuḥ
हे राजकुमारी, यदि तुम्हें किसी दूसरे राजा से भय हो, तो उसे दूर करने का उपाय करने में मैं समर्थ हूँ।
श्लोक 14 (1.110.14)
नहि शान्तनवस्याहं महास्त्रस्य प्रहारिणः । ईश्वरः क्षत्रियाणां हि बलं धर्मोऽनुवर्तते ॥
nahi śāntanavasyāhaṃ mahāstrasya prahāriṇaḥ | īśvaraḥ kṣatriyāṇāṃ hi balaṃ dharmo'nuvartate
परन्तु महान अस्त्रों से प्रहार करने वाले शान्तनुनन्दन के सामने मैं समर्थ नहीं हूँ। क्षत्रियों में धर्म बल का ही अनुसरण करता है।
श्लोक 15 (1.110.15)
सा साधु व्रज कल्याणि न मां भीष्मो दहेद्बलात् । न प्रत्यगृह्णंस्ते सर्वे किमित्येव न वेद्म्यहम् ॥
sā sādhu vraja kalyāṇi na māṃ bhīṣmo dahedbalāt | na pratyagṛhṇaṃste sarve kimityeva na vedmyaham
इसलिए, हे कल्याणी, तुम शान्ति से जाओ, कहीं भीष्म अपने बल से मुझे भस्म न कर दें। उन सबने तुम्हें क्यों स्वीकार नहीं किया, यह मैं नहीं जानता;
श्लोक 16 (1.110.16)
न हि भीष्मादहं धर्मं शक्तो दातुं कथंचन । इत्युक्ता स्रजमासज्य द्वारि राज्ञो व्यपाद्रवत् ॥
na hi bhīṣmādahaṃ dharmaṃ śakto dātuṃ kathaṃcana | ityuktā srajamāsajya dvāri rājño vyapādravat
परन्तु भीष्म के विरुद्ध मैं तुम्हें किसी भी प्रकार न्याय नहीं दिला सकता।" ऐसा कहे जाने पर वह माला को राजा के द्वार पर टाँगकर भाग गई।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (1.110.17)
व्युदस्तां सर्वलोकेषु तपसा संशितव्रताम् । तामन्वगच्छद्द्रुपदः सान्त्वं जल्पन्पुनः पुनः ॥
vyudastāṃ sarvalokeṣu tapasā saṃśitavratām | tāmanvagacchaddrupadaḥ sāntvaṃ jalpanpunaḥ punaḥ
सारे संसार द्वारा ठुकराई गई और तप से कठोर व्रत वाली उस स्त्री के पीछे द्रुपद बार-बार सान्त्वना के वचन कहते हुए गए —
श्लोक 18 (1.110.18)
स्रजं गृहाण कल्याणि न नो वैरं प्रसञ्जय ॥
srajaṃ gṛhāṇa kalyāṇi na no vairaṃ prasañjaya
"हे कल्याणी, अपनी माला ले लो; हम पर शत्रुता मत डालो।"
अम्बोवाच
श्लोक 19 (1.110.19)
एवमेव त्वया कार्यमिति स्म प्रतिकाङ्क्षते । न तु तस्यान्यथा भावो दैवमेतदमानुषम् ॥
evameva tvayā kāryamiti sma pratikāṅkṣate | na tu tasyānyathā bhāvo daivametadamānuṣam
"तुम्हें यही करना होगा — तुमसे यही अपेक्षा है। यह अन्यथा नहीं हो सकता; यह दैव का विधान है, मनुष्य के वश का नहीं।
श्लोक 20 (1.110.20)
यश्चैनां स्रजमादाय स्वयं वै प्रतिमोक्षते । स भीष्मं समरे हन्ता मम धर्मप्रणाशनम् ॥
yaścaināṃ srajamādāya svayaṃ vai pratimokṣate | sa bhīṣmaṃ samare hantā mama dharmapraṇāśanam
जो कोई इस माला को उठाकर स्वयं पहन लेगा, वह मेरे धर्म का नाश करने वाले भीष्म को युद्ध में मारेगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (1.110.21)
तां स्रजं द्रुपदो राजा कंचित्कालं ररक्ष सः । ततो विस्रम्भमास्थाय तूष्णीमेतामुपैक्षत ॥
tāṃ srajaṃ drupado rājā kaṃcitkālaṃ rarakṣa saḥ | tato visrambhamāsthāya tūṣṇīmetāmupaikṣata
राजा द्रुपद ने कुछ समय तक उस माला की रक्षा की; फिर निश्चिन्त होकर वे चुपचाप उसकी उपेक्षा करने लगे।
श्लोक 22 (1.110.22)
तां शिखण्डिन्यबध्नात्तु बाला पितुरवज्ञया । तां पिता त्वत्यजच्छीघ्रं त्रस्तो भीष्मस्य किल्बिषात् ॥
tāṃ śikhaṇḍinyabadhnāttu bālā pituravajñayā | tāṃ pitā tvatyajacchīghraṃ trasto bhīṣmasya kilbiṣāt
बालिका शिखण्डिनी ने पिता की अवज्ञा करके वह माला पहन ली; और भीष्म के प्रति अपराध से डरे हुए पिता ने उसे तुरन्त त्याग दिया।
श्लोक 23 (1.110.23)
इषीकं ब्राह्मणं भीता साभ्यगच्छत्तपस्विनम् । गङ्गाद्वारि तपस्यन्तं तुष्टिहेतोस्तपस्विनी ॥
iṣīkaṃ brāhmaṇaṃ bhītā sābhyagacchattapasvinam | gaṅgādvāri tapasyantaṃ tuṣṭihetostapasvinī
डरी हुई वह तपस्विनी उन्हें प्रसन्न करने के लिए गंगाद्वार में तप करने वाले तपस्वी ब्राह्मण इषीक के पास गई।
श्लोक 24 (1.110.24)
उपचाराभितुष्टस्तामब्रवीदृषिसत्तमः । गङ्गाद्वारे विभजनं भविता नचिरादिव ॥
upacārābhituṣṭastāmabravīdṛṣisattamaḥ | gaṅgādvāre vibhajanaṃ bhavitā nacirādiva
उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ ऋषि ने उससे कहा — "शीघ्र ही गंगाद्वार में (गन्धर्वों का) विभाजन होने वाला है।
श्लोक 25 (1.110.25)
तत्र गन्धर्वराजानं तुम्बुरुं प्रियदर्शनम् । आराधयितुमीहस्व सम्यक्परिचरस्व तम् ॥
tatra gandharvarājānaṃ tumburuṃ priyadarśanam | ārādhayitumīhasva samyakparicarasva tam
वहाँ सुन्दर गन्धर्वराज तुम्बुरु को प्रसन्न करने का प्रयत्न करना और भली-भाँति उनकी सेवा करना।
श्लोक 26 (1.110.26)
अहमप्यत्र साचिव्यं कर्तास्मि तव शोभने । तं तदाचर भद्रं ते स ते श्रेयो विधास्यति ॥
ahamapyatra sācivyaṃ kartāsmi tava śobhane | taṃ tadācara bhadraṃ te sa te śreyo vidhāsyati
हे शोभने, मैं भी इसमें तुम्हारी सहायता करूँगा। तुम वैसा ही करो, तुम्हारा कल्याण हो — वे तुम्हारा भला करेंगे।"
श्लोक 27 (1.110.27)
ततो विभजनं तत्र गन्धर्वाणामवर्तत । तत्र द्वाववशिष्येतां गन्धर्वावमितौजसौ ॥
tato vibhajanaṃ tatra gandharvāṇāmavartata | tatra dvāvavaśiṣyetāṃ gandharvāvamitaujasau
फिर वहाँ गन्धर्वों का विभाजन हुआ, और असीम तेज वाले दो गन्धर्व शेष रह गए।
श्लोक 28 (1.110.28)
तयोरेकः समीक्ष्यैनां स्त्रीबुभूषुरुवाच ह । इदं गृह्णीष्व पुंलिङ्गं वृणे स्त्रीलिङ्गमेव ते ॥
tayorekaḥ samīkṣyaināṃ strībubhūṣuruvāca ha | idaṃ gṛhṇīṣva puṃliṅgaṃ vṛṇe strīliṅgameva te
उनमें से एक ने, जो स्त्री बनना चाहता था, उसे देखकर कहा — "यह मेरा पुरुषत्व ले लो; बदले में मैं तुम्हारा स्त्रीत्व वरण करता हूँ।"
श्लोक 29 (1.110.29)
नियमं चक्रतुस्तत्र स्त्री पुमांश्चैव तावुभौ । ततः पुमान्समभवच्छिखण्डी परवीरहा ॥
niyamaṃ cakratustatra strī pumāṃścaiva tāvubhau | tataḥ pumānsamabhavacchikhaṇḍī paravīrahā
वहाँ उस स्त्री और पुरुष दोनों ने परस्पर एक नियम (अनुबन्ध) किया। इस प्रकार शत्रुवीरों का संहार करने वाला शिखण्डी पुरुष बन गया,
श्लोक 30 (1.110.30)
स्त्री भूत्वा ह्यपचक्राम स गन्धर्वो मुदान्वितः । लब्ध्वा तु महतीं प्रीतिं याज्ञसेनिर्महायशाः ॥
strī bhūtvā hyapacakrāma sa gandharvo mudānvitaḥ | labdhvā tu mahatīṃ prītiṃ yājñasenirmahāyaśāḥ
और वह गन्धर्व स्त्री बनकर प्रसन्नता से चला गया। अत्यन्त आनन्दित होकर महायशस्वी यज्ञसेनपुत्र
श्लोक 31 (1.110.31)
ततो बुद्बुदकं गत्वा पुनरस्त्राणि सोऽकरोत् । तत्र चास्त्राणि दिव्यानि कृत्वा स सुमहाद्युतिः ॥
tato budbudakaṃ gatvā punarastrāṇi so'karot | tatra cāstrāṇi divyāni kṛtvā sa sumahādyutiḥ
फिर बुद्बुदक गया और वहाँ उसने पुनः अस्त्र-विद्या का अभ्यास किया। वहाँ दिव्य अस्त्रों को सिद्ध करके वह परम तेजस्वी
श्लोक 32 (1.110.32)
स्वदेशमभिसंपेदे पाञ्चालं कुरुनन्दन । सोऽभिवाद्य पितुः पादौ महेष्वासः कृताञ्जलिः ॥
svadeśamabhisaṃpede pāñcālaṃ kurunandana | so'bhivādya pituḥ pādau maheṣvāsaḥ kṛtāñjaliḥ
हे कुरुनन्दन, अपने देश पांचाल लौट आया। हाथ जोड़कर पिता के चरणों में प्रणाम करके उस महान धनुर्धर ने
श्लोक 33 (1.110.33)
उवाच भवता भीष्मान्न भेतव्यं कथंचन ॥
uvāca bhavatā bhīṣmānna bhetavyaṃ kathaṃcana
कहा — "आपको भीष्म से किसी भी प्रकार डरने की आवश्यकता नहीं है।"