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आदि पर्व · अध्याय 109

भीष्म द्वारा काशिराज की कन्याओं का हरण

विचित्रवीर्य के युवा होने पर भीष्म अकेले काशिराज की तीन कन्याओं के स्वयंवर में जाते हैं। वहाँ एकत्र राजा उन्हें वृद्ध ब्रह्मचारी कहकर उनका उपहास करते हैं; भीष्म विवाह के आठ प्रकार बताकर कन्याओं को बलपूर्वक हर लेते हैं, पीछा करने वाले राजाओं को परास्त करते हैं और हारे हुए शाल्व को जीवित छोड़ देते हैं, फिर अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कर देते हैं। सबसे बड़ी अम्बा, जिसने शाल्व को चुना था, मुक्त कर दी जाती है, पर छह वर्षों तक शाल्व और भीष्म दोनों उसे बारी-बारी से लौटा देते हैं; वह हिमालय पर घोर तप करती है, और कुमार उसे एक माला देते हैं, जिसे धारण करने वाला भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगा।

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.109.1)

हते चित्राङ्गदे भीष्मो बाले भ्रातरि कौरव । पालयामास तद्राज्यं सत्यवत्या मते स्थितः ॥

hate citrāṅgade bhīṣmo bāle bhrātari kaurava | pālayāmāsa tadrājyaṃ satyavatyā mate sthitaḥ

हे कुरुवंशी! चित्रांगद के मारे जाने पर, जब उसका भाई अभी बालक ही था, भीष्म ने सत्यवती की इच्छा के अनुसार चलते हुए उस राज्य का पालन किया।

श्लोक 2 (1.109.2)

तथा विचित्रवीर्यं तु वर्तमानं सुखेऽतुले । संप्राप्तयौवनं दृष्ट्वा भ्रातरं धीमतां वरः । भीष्मो विचित्रवीर्यस्य विवाहायाकरोन्मतिम् ॥

tathā vicitravīryaṃ tu vartamānaṃ sukhe'tule | saṃprāptayauvanaṃ dṛṣṭvā bhrātaraṃ dhīmatāṃ varaḥ | bhīṣmo vicitravīryasya vivāhāyākaronmatim

फिर अनुपम सुख में रहते हुए अपने भाई विचित्रवीर्य को युवावस्था में पहुँचा देखकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भीष्म ने विचित्रवीर्य के विवाह का विचार किया।

श्लोक 3 (1.109.3)

अथ काशिपतेर्भीष्मः कन्यास्तिस्रोऽप्सरोपमाः । शुश्राव सहिता राजन्वृण्वाना वै स्वयंवरम् ॥

atha kāśipaterbhīṣmaḥ kanyāstisro'psaropamāḥ | śuśrāva sahitā rājanvṛṇvānā vai svayaṃvaram

तब, हे राजन्, भीष्म ने सुना कि काशिराज की अप्सराओं-सी सुन्दर तीनों कन्याएँ एक साथ स्वयंवर में अपने पति का वरण करने वाली हैं।

श्लोक 4 (1.109.4)

ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन शत्रुजित् । जगामानुमते मातुः पुरीं वाराणसीं प्रभुः ॥

tataḥ sa rathināṃ śreṣṭho rathenaikena śatrujit | jagāmānumate mātuḥ purīṃ vārāṇasīṃ prabhuḥ

तब माता की अनुमति लेकर रथियों में श्रेष्ठ, शत्रुविजयी वे समर्थ वीर अकेले एक रथ पर वाराणसी नगरी गए।

श्लोक 5 (1.109.5)

तत्र राज्ञः समुदितान्सर्वतः समुपागतान् । ददर्श कन्यास्ताश्चैव भीष्मः शान्तनुनन्दनः ॥

tatra rājñaḥ samuditānsarvataḥ samupāgatān | dadarśa kanyāstāścaiva bhīṣmaḥ śāntanunandanaḥ

वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्म ने सब ओर से आकर एकत्र हुए राजाओं को देखा और उन कन्याओं को भी देखा।

श्लोक 6 (1.109.6)

तासां कामेन संमत्ताः सहिताः काशिकोसलाः । वङ्गाः पुण्ड्राः कलिङ्गाश्च ते जग्मुस्तां पुरीं प्रति ॥

tāsāṃ kāmena saṃmattāḥ sahitāḥ kāśikosalāḥ | vaṅgāḥ puṇḍrāḥ kaliṅgāśca te jagmustāṃ purīṃ prati

उन कन्याओं की कामना से उन्मत्त होकर काशी और कोसल, वंग, पुण्ड्र और कलिंग के राजा एक साथ उस नगरी में आए थे।

श्लोक 7 (1.109.7)

कीर्त्यमानेषु राज्ञां तु तदा नामसु सर्वशः । एकाकिनं तदा भीष्मं वृद्धं शान्तनुनन्दनम् ॥

kīrtyamāneṣu rājñāṃ tu tadā nāmasu sarvaśaḥ | ekākinaṃ tadā bhīṣmaṃ vṛddhaṃ śāntanunandanam

जब राजाओं के नाम एक-एक करके पुकारे जा रहे थे, तब उन कन्याओं ने शान्तनुनन्दन वृद्ध भीष्म को वहाँ अकेले खड़े देखा,

श्लोक 8 (1.109.8)

सोद्वेगा इव तं दृष्ट्वा कन्याः परमशोभनाः । अपाक्रामन्त ताः सर्वा वृद्ध इत्येव चिन्तया ॥

sodvegā iva taṃ dṛṣṭvā kanyāḥ paramaśobhanāḥ | apākrāmanta tāḥ sarvā vṛddha ityeva cintayā

और उन्हें देखकर वे परम सुन्दर कन्याएँ मानो घबराकर, "यह तो वृद्ध है" — यही सोचकर सब की सब उनसे दूर हट गईं।

श्लोक 9 (1.109.9)

वृद्धः परमधर्मात्मा वलीपलितधारणः । किंकारणमिहायातो निर्लज्जो भरतर्षभः ॥

vṛddhaḥ paramadharmātmā valīpalitadhāraṇaḥ | kiṃkāraṇamihāyāto nirlajjo bharatarṣabhaḥ

"यह परम धर्मात्मा वृद्ध, जिसके शरीर पर झुर्रियाँ और सिर पर पके बाल हैं — यह निर्लज्ज भरतश्रेष्ठ यहाँ किस कारण आया है?

श्लोक 10 (1.109.10)

मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यति भारत । ब्रह्मचारीति भीष्मो हि वृथैव प्रथितो भुवि ॥

mithyāpratijño lokeṣu kiṃ vadiṣyati bhārata | brahmacārīti bhīṣmo hi vṛthaiva prathito bhuvi

हे भारत, अपनी प्रतिज्ञा झूठी करने वाला यह संसार से क्या कहेगा? भीष्म पृथ्वी पर व्यर्थ ही ब्रह्मचारी के रूप में प्रसिद्ध हुआ है!"

श्लोक 11 (1.109.11)

इत्येवं प्रब्रुवन्तस्ते हसन्ति स्म नृपाधमाः । क्षत्रियाणां वचः श्रुत्वा भीष्मश्चुक्रोध भारत ॥

ityevaṃ prabruvantaste hasanti sma nṛpādhamāḥ | kṣatriyāṇāṃ vacaḥ śrutvā bhīṣmaścukrodha bhārata

ऐसी बातें कहते हुए वे अधम राजा हँसने लगे। हे भारत, क्षत्रियों के वचन सुनकर भीष्म क्रोधित हो उठे।

श्लोक 12 (1.109.12)

भीष्मस्तदा स्वयं कन्या वरयामास ताः प्रभुः । उवाच च महीपालान्राजञ्जलदनिःस्वनः ॥

bhīṣmastadā svayaṃ kanyā varayāmāsa tāḥ prabhuḥ | uvāca ca mahīpālānrājañjaladaniḥsvanaḥ

तब समर्थ भीष्म ने स्वयं उन कन्याओं का वरण किया, और हे राजन्, मेघ के समान गम्भीर स्वर में राजाओं से कहा।

श्लोक 13 (1.109.13)

रथमारोप्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः । आहूय दानं कन्यानां गुणवद्भ्यः स्मृतं बुधैः ॥

rathamāropya tāḥ kanyā bhīṣmaḥ praharatāṃ varaḥ | āhūya dānaṃ kanyānāṃ guṇavadbhyaḥ smṛtaṃ budhaiḥ

उन कन्याओं को रथ पर बिठाकर योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म बोले — "विद्वानों ने बताया है कि गुणवान पुरुषों को बुलाकर उन्हें कन्या दी जाए;

श्लोक 14 (1.109.14)

अलङ्कृत्य यथाशक्ति प्रदाय च धनान्यपि । प्रयच्छन्त्यपरे कन्यां मिथुनेन गवामपि ॥

alaṅkṛtya yathāśakti pradāya ca dhanānyapi | prayacchantyapare kanyāṃ mithunena gavāmapi

कुछ लोग यथाशक्ति अलंकृत करके और साथ में धन भी देकर कन्या देते हैं; कुछ अन्य गायों का एक जोड़ा लेकर कन्या देते हैं;

श्लोक 15 (1.109.15)

वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ॥

vittena kathitenānye balenānye'numānya ca | pramattāmupayantyanye svayamanye ca vindate

कुछ लोग तय किया हुआ धन देकर पत्नी पाते हैं, कुछ बल से, और कुछ उसकी सहमति लेकर; कुछ असावधान स्त्री को अपना लेते हैं, और कुछ स्वयं ही पत्नी पा लेते हैं;

श्लोक 16 (1.109.16)

आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान्विन्दन्ति चापरे । अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ॥

ārṣaṃ vidhiṃ puraskṛtya dārānvindanti cāpare | aṣṭamaṃ tamatho vitta vivāhaṃ kavibhirvṛtam

और कुछ अन्य ऋषियों की (आर्ष) विधि को आगे रखकर पत्नी प्राप्त करते हैं। इसे विवाह का आठवाँ प्रकार जानो, जिसे ज्ञानियों ने स्वीकार किया है।

श्लोक 17 (1.109.17)

स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च । प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ॥

svayaṃvaraṃ tu rājanyāḥ praśaṃsantyupayānti ca | pramathya tu hṛtāmāhurjyāyasīṃ dharmavādinaḥ

क्षत्रिय स्वयंवर की प्रशंसा करते हैं और उसमें भाग लेते हैं, परन्तु धर्म के व्याख्याता बलपूर्वक हरकर लाई गई कन्या को श्रेष्ठ बताते हैं।

श्लोक 18 (1.109.18)

ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः । ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ॥

tā imāḥ pṛthivīpālā jihīrṣāmi balāditaḥ | te yatadhvaṃ paraṃ śaktyā vijayāyetarāya vā

इसलिए, हे राजाओ, मैं इन कन्याओं को यहाँ से बलपूर्वक ले जाना चाहता हूँ। तुम अपनी पूरी शक्ति से प्रयत्न करो — विजय के लिए या पराजय के लिए।

श्लोक 19 (1.109.19)

स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः । एवमुक्त्वा महीपालान्काशिराजं च वीर्यवान् ॥

sthito'haṃ pṛthivīpālā yuddhāya kṛtaniścayaḥ | evamuktvā mahīpālānkāśirājaṃ ca vīryavān

हे राजाओ, मैं युद्ध का निश्चय करके खड़ा हूँ।" राजाओं और काशिराज से ऐसा कहकर पराक्रमी

श्लोक 20 (1.109.20)

सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् । आमन्त्र्य च स तान्प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ॥

sarvāḥ kanyāḥ sa kauravyo rathamāropya ca svakam | āmantrya ca sa tānprāyācchīghraṃ kanyāḥ pragṛhya tāḥ

कुरुवंशी भीष्म ने सब कन्याओं को अपने रथ पर बिठा लिया, और राजाओं से विदा लेकर उन कन्याओं को साथ ले शीघ्रता से चल पड़े।

श्लोक 21 (1.109.21)

ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः । संस्पृशन्तः स्वकान्बाहून्दशन्तो दशनच्छदान् ॥

tataste pārthivāḥ sarve samutpeturamarṣitāḥ | saṃspṛśantaḥ svakānbāhūndaśanto daśanacchadān

तब वे सब राजा क्रोध से भरकर उठ खड़े हुए; वे अपनी भुजाएँ छूने लगे और दाँतों से होंठ चबाने लगे।

श्लोक 22 (1.109.22)

तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् । आमुञ्चतां च वर्माणि संभ्रमः सुमहानभूत् ॥

teṣāmābharaṇānyāśu tvaritānāṃ vimuñcatām | āmuñcatāṃ ca varmāṇi saṃbhramaḥ sumahānabhūt

जल्दी-जल्दी अपने आभूषण उतारते और कवच पहनते हुए उन राजाओं में बड़ी हलचल मच गई।

श्लोक 23 (1.109.23)

ताराणामिव संपातो बभूव जनमेजय । भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ॥

tārāṇāmiva saṃpāto babhūva janamejaya | bhūṣaṇānāṃ ca sarveṣāṃ kavacānāṃ ca sarvaśaḥ

हे जनमेजय, सब ओर गिरते हुए उनके सारे आभूषणों और कवचों का दृश्य टूटते तारों की झड़ी जैसा था।

श्लोक 24 (1.109.24)

सवर्मभिर्भूषणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः । सक्रोधामर्षजिह्मभ्रूकषायीकृतलोचनाः ॥

savarmabhirbhūṣaṇaiśca prakīryadbhiritastataḥ | sakrodhāmarṣajihmabhrūkaṣāyīkṛtalocanāḥ

इधर-उधर बिखरते कवचों और आभूषणों के बीच, क्रोध और अमर्ष से भौंहें टेढ़ी किए और लाल आँखों वाले

श्लोक 25 (1.109.25)

सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान्सदश्वैरुपकल्पितान् । रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ॥

sūtopaklṛptān rucirānsadaśvairupakalpitān | rathānāsthāya te vīrāḥ sarvapraharaṇānvitāḥ

वे वीर सारथियों द्वारा तैयार किए गए, उत्तम घोड़ों से जुते सुन्दर रथों पर सवार हुए और सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होकर

श्लोक 26 (1.109.26)

प्रयान्तमथ कौरव्यमनुसस्रुरुदायुधाः । ततः समभवद्युद्धं तेषां तस्य च भारत । एकस्य च बहूनां च तुमुलं रोमहर्षणम् ॥

prayāntamatha kauravyamanusasrurudāyudhāḥ | tataḥ samabhavadyuddhaṃ teṣāṃ tasya ca bhārata | ekasya ca bahūnāṃ ca tumulaṃ romaharṣaṇam

हथियार उठाए, जाते हुए कुरुवंशी के पीछे दौड़े। तब, हे भारत, उनके और भीष्म के बीच — एक के विरुद्ध अनेक का — रोंगटे खड़े कर देने वाला घमासान युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 27 (1.109.27)

ते त्विषून्दशसाहस्रांस्तस्मिन्युगपदाक्षिपन् । अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वांस्तथाऽन्तरा ॥

te tviṣūndaśasāhasrāṃstasminyugapadākṣipan | aprāptāṃścaiva tānāśu bhīṣmaḥ sarvāṃstathā'ntarā

उन्होंने एक साथ उन पर दस हज़ार बाण छोड़े, परन्तु भीष्म ने उनके पहुँचने से पहले ही बीच में ही

श्लोक 28 (1.109.28)

अच्छिनच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्य तम् ॥

acchinaccharavarṣeṇa mahatā lomavāhinā | tataste pārthivāḥ sarve sarvataḥ parivārya tam

पंखयुक्त बाणों की भारी वर्षा से उन सबको काट डाला। तब उन सब राजाओं ने चारों ओर से उन्हें घेर लिया

श्लोक 29 (1.109.29)

ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः । स तं बाणमयं वर्षं शरैरावार्य सर्वतः ॥

vavṛṣuḥ śaravarṣeṇa varṣeṇevādrimambudāḥ | sa taṃ bāṇamayaṃ varṣaṃ śarairāvārya sarvataḥ

और जैसे बादल पर्वत पर जल बरसाते हैं, वैसे ही उन पर बाणों की वर्षा की। भीष्म ने उस बाण-वर्षा को चारों ओर अपने बाणों से रोक दिया,

श्लोक 30 (1.109.30)

ततः सर्वान्महीपालान्पर्यविध्यत्त्रिभिस्त्रिभिः । एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन्विव्याध पञ्चभिः ॥

tataḥ sarvānmahīpālānparyavidhyattribhistribhiḥ | ekaikastu tato bhīṣmaṃ rājanvivyādha pañcabhiḥ

और फिर सब राजाओं को तीन-तीन बाणों से बींध डाला। हे राजन्, तब उनमें से प्रत्येक ने भीष्म को पाँच-पाँच बाणों से बींधा,

श्लोक 31 (1.109.31)

स च तान्प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन् । तद्युद्धमासीत्तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ॥

sa ca tānprativivyādha dvābhyāṃ dvābhyāṃ parākraman | tadyuddhamāsīttumulaṃ ghoraṃ devāsuropamam

और भीष्म ने आगे बढ़कर उन्हें दो-दो बाणों से प्रत्युत्तर में बींधा। वह युद्ध देवासुर-संग्राम के समान घमासान और भयंकर था,

श्लोक 32 (1.109.32)

पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् । स धनूंषि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ॥

paśyatāṃ lokavīrāṇāṃ śaraśaktisamākulam | sa dhanūṃṣi dhvajāgrāṇi varmāṇi ca śirāṃsi ca

जिसमें लोक के वीरों के देखते-देखते बाणों और शक्तियों की भरमार थी। उस युद्ध में भीष्म ने धनुष, ध्वजाओं के अग्रभाग, कवच और सिर

श्लोक 33 (1.109.33)

चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः । तस्यातिपुरुषं कर्म लाघवं रथचारिणः ॥

ciccheda samare bhīṣmaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | tasyātipuruṣaṃ karma lāghavaṃ rathacāriṇaḥ

सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में काट डाले। उस रथी के अलौकिक कर्म और उसकी फुर्ती की,

श्लोक 34 (1.109.34)

रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् । अक्षतः क्षपयित्वान्यानसङ्ख्येयपराक्रमः ॥

rakṣaṇaṃ cātmanaḥ saṃkhye śatravo'pyabhyapūjayan | akṣataḥ kṣapayitvānyānasaṅkhyeyaparākramaḥ

तथा युद्ध में अपनी रक्षा करने की कुशलता की शत्रुओं ने भी प्रशंसा की। स्वयं अक्षत रहकर, दूसरों का नाश करके, असीम पराक्रम वाले

श्लोक 35 (1.109.35)

आनिनाय स काश्यस्य सुताः सागरगासुतः । तान्विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥

ānināya sa kāśyasya sutāḥ sāgaragāsutaḥ | tānvinirjitya tu raṇe sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ

गंगापुत्र काशिराज की पुत्रियों को ले आए। रण में उन राजाओं को परास्त करके समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ

श्लोक 36 (1.109.36)

कन्याभिः सहितः प्रायाद्भारतो भारतान्प्रति । ततस्तं पृष्ठतो राजञ्शाल्वराजो महारथः ॥

kanyābhiḥ sahitaḥ prāyādbhārato bhāratānprati | tatastaṃ pṛṣṭhato rājañśālvarājo mahārathaḥ

भरतवंशी भीष्म कन्याओं के साथ भरतों के देश की ओर चल पड़े। तब, हे राजन्, पीछे से महारथी शाल्वराज

श्लोक 37 (1.109.37)

अभ्यगच्छदमेयात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे । वारणं जघने भिन्दन्दन्ताभ्यामपरो यथा ॥

abhyagacchadameyātmā bhīṣmaṃ śāntanavaṃ raṇe | vāraṇaṃ jaghane bhindandantābhyāmaparo yathā

असीम आत्मबल वाले उस राजा ने युद्ध में शान्तनुनन्दन भीष्म पर धावा बोला, जैसे कोई दूसरा हाथी अपने दाँतों से किसी हाथी की जाँघ पर प्रहार करता है,

श्लोक 38 (1.109.38)

वासितामनुसंप्राप्तो यूथपो बलिनां वरः । स्त्रीकामस्तिष्ठतिष्ठेति भीष्ममाह स पार्थिवः ॥

vāsitāmanusaṃprāpto yūthapo balināṃ varaḥ | strīkāmastiṣṭhatiṣṭheti bhīṣmamāha sa pārthivaḥ

जब बलवानों में श्रेष्ठ वह यूथपति किसी हथिनी के पीछे आया हो। कन्या की कामना से भरे उस राजा ने भीष्म से कहा — "ठहरो! ठहरो!" —

श्लोक 39 (1.109.39)

साल्वराजो महाबाहुरमर्षेण प्रचोदितः । ततः स पुरुषव्याघ्रो भीष्मः परबलार्दनः ॥

sālvarājo mahābāhuramarṣeṇa pracoditaḥ | tataḥ sa puruṣavyāghro bhīṣmaḥ parabalārdanaḥ

वह महाबाहु शाल्वराज, जो अमर्ष से प्रेरित था। तब शत्रु-सेना को कुचलने वाले पुरुषसिंह भीष्म

श्लोक 40 (1.109.40)

तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद्विधूमोग्निरिव ज्वलन् । विततेषुधनुष्पाणिर्विकुञ्चितललाटभृत् ॥

tadvākyākulitaḥ krodhādvidhūmogniriva jvalan | vitateṣudhanuṣpāṇirvikuñcitalalāṭabhṛt

उन वचनों से क्षुब्ध होकर, धूमरहित अग्नि की भाँति क्रोध से जलते हुए, हाथ में बाण चढ़ा धनुष लिए, माथे पर बल डाले,

श्लोक 41 (1.109.41)

क्षत्रधर्मं समास्थाय व्यपेतभयसंभ्रमः । निवर्तयामास रथं साल्वं प्रति महारथः ॥

kṣatradharmaṃ samāsthāya vyapetabhayasaṃbhramaḥ | nivartayāmāsa rathaṃ sālvaṃ prati mahārathaḥ

क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लेकर, भय और घबराहट से रहित उन महारथी ने अपना रथ शाल्व की ओर मोड़ दिया।

श्लोक 42 (1.109.42)

निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते । प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीष्मसाल्वसमागमे ॥

nivartamānaṃ taṃ dṛṣṭvā rājānaḥ sarva eva te | prekṣakāḥ samapadyanta bhīṣmasālvasamāgame

उन्हें लौटते देखकर वे सब राजा भीष्म और शाल्व के संग्राम के दर्शक बन गए।

श्लोक 43 (1.109.43)

तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । अन्योन्यमभिवर्तेतां बलविक्रमशालिनौ ॥

tau vṛṣāviva nardantau balinau vāsitāntare | anyonyamabhivartetāṃ balavikramaśālinau

किसी गाय के लिए गरजते हुए दो बलवान साँड़ों की भाँति, बल और पराक्रम से सम्पन्न वे दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 44 (1.109.44)

ततो भीष्मं शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः । साल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ॥

tato bhīṣmaṃ śāntanavaṃ śaraiḥ śatasahasraśaḥ | sālvarājo naraśreṣṭhaḥ samavākiradāśugaiḥ

तब नरश्रेष्ठ शाल्वराज ने शान्तनुनन्दन भीष्म को लाखों शीघ्रगामी बाणों से ढक दिया।

श्लोक 45 (1.109.45)

पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं साल्वेन ते नृपाः । विस्मिताः समपद्यन्त साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥

pūrvamabhyarditaṃ dṛṣṭvā bhīṣmaṃ sālvena te nṛpāḥ | vismitāḥ samapadyanta sādhusādhviti cābruvan

भीष्म को पहले शाल्व द्वारा पीड़ित होते देख वे राजा विस्मित हो गए और "साधु! साधु!" कहने लगे।

श्लोक 46 (1.109.46)

लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः । अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः साल्वं नराधिपम् ॥

lāghavaṃ tasya te dṛṣṭvā samare sarvapārthivāḥ | apūjayanta saṃhṛṣṭā vāgbhiḥ sālvaṃ narādhipam

युद्ध में उसकी फुर्ती देखकर सब राजा प्रसन्न हुए और वचनों से राजा शाल्व की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 47 (1.109.47)

क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरञ्जयः । क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठतिष्ठेत्यभाषत ॥

kṣatriyāṇāṃ tato vācaḥ śrutvā parapurañjayaḥ | kruddhaḥ śāntanavo bhīṣmastiṣṭhatiṣṭhetyabhāṣata

क्षत्रियों के वे वचन सुनकर शत्रुनगरों को जीतने वाले शान्तनुनन्दन भीष्म ने क्रोध में कहा — "ठहरो! ठहरो!"

श्लोक 48 (1.109.48)

सारथिं चाब्रवीत्क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः । यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ॥

sārathiṃ cābravītkruddho yāhi yatraiṣa pārthivaḥ | yāvadenaṃ nihanmyadya bhujaṅgamiva pakṣirāṭ

और क्रोध में उन्होंने सारथी से कहा — "वहाँ चलो जहाँ यह राजा है, ताकि जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्प को मारता है, वैसे ही मैं आज इसे मार डालूँ।"

श्लोक 49 (1.109.49)

ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग्योजयामास कौरवः । तेनाश्वांश्चतुरोऽमृद्नात्साल्वराजस्य भूपते ॥

tato'straṃ vāruṇaṃ samyagyojayāmāsa kauravaḥ | tenāśvāṃścaturo'mṛdnātsālvarājasya bhūpate

तब कुरुवंशी भीष्म ने विधिपूर्वक वारुणास्त्र का संधान किया, और हे पृथ्वीपति, उससे शाल्वराज के चारों घोड़ों को कुचल डाला।

श्लोक 50 (1.109.50)

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य साल्वराजस्य कौरवः । भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत्तस्य सारथिम् ॥

astrairastrāṇi saṃvārya sālvarājasya kauravaḥ | bhīṣmo nṛpatiśārdūla nyavadhīttasya sārathim

हे नृपश्रेष्ठ, अपने अस्त्रों से शाल्वराज के अस्त्रों को रोककर कुरुवंशी भीष्म ने उसके सारथी को मार डाला,

श्लोक 51 (1.109.51)

अस्त्रेण चास्याथैन्द्रेण न्यवधीत्तुरगोत्तमान् । कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥

astreṇa cāsyāthaindreṇa nyavadhītturagottamān | kanyāhetornaraśreṣṭha bhīṣmaḥ śāntanavastadā

और ऐन्द्रास्त्र से उसके उत्तम घोड़ों को मार गिराया। हे नरश्रेष्ठ, तब कन्याओं के लिए शान्तनुनन्दन भीष्म ने

श्लोक 52 (1.109.52)

जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् । ततः साल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ॥

jitvā visarjayāmāsa jīvantaṃ nṛpasattamam | tataḥ sālvaḥ svanagaraṃ prayayau bharatarṣabha

उस श्रेष्ठ राजा को परास्त करके जीवित छोड़ दिया। तब, हे भरतश्रेष्ठ, शाल्व अपने नगर को लौट गया

श्लोक 53 (1.109.53)

स्वराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा । राजानो ये च तत्रासन्स्वयंवरदिदृक्षवः ॥

svarājyamanvaśāccaiva dharmeṇa nṛpatistadā | rājāno ye ca tatrāsansvayaṃvaradidṛkṣavaḥ

और वह राजा धर्मपूर्वक अपने राज्य का शासन करने लगा। और जो राजा वहाँ स्वयंवर देखने की इच्छा से आए थे,

श्लोक 54 (1.109.54)

स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरञ्जयाः । एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ॥

svānyeva te'pi rāṣṭrāṇi jagmuḥ parapurañjayāḥ | evaṃ vijitya tāḥ kanyā bhīṣmaḥ praharatāṃ varaḥ

वे शत्रुनगर-विजेता भी अपने-अपने राज्यों को चले गए। इस प्रकार उन कन्याओं को जीतकर योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म

श्लोक 55 (1.109.55)

प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ॥

prayayau hāstinapuraṃ yatra rājā sa kauravaḥ | vicitravīryo dharmātmā praśāsti vasudhāmimām

हस्तिनापुर की ओर चल पड़े, जहाँ कुरुवंशी धर्मात्मा राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वी का शासन करते थे,

श्लोक 56 (1.109.56)

यथा पितास्य कौरव्यः शान्तनुर्नृपसत्तमः । सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप ॥

yathā pitāsya kauravyaḥ śāntanurnṛpasattamaḥ | so'cireṇaiva kālena atyakrāmannarādhipa

जैसे उनके पिता, नृपश्रेष्ठ कुरुवंशी शान्तनु करते थे। हे राजन्, थोड़े ही समय में भीष्म

श्लोक 57 (1.109.57)

वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधद्रुमान् । अक्षतः क्षपयित्वाऽरीन्सङ्ख्येऽसङ्ख्येयविक्रमः ॥

vanāni saritaścaiva śailāṃśca vividhadrumān | akṣataḥ kṣapayitvā'rīnsaṅkhye'saṅkhyeyavikramaḥ

वनों, नदियों, पर्वतों और नाना प्रकार के वृक्षों को पार कर गए। युद्ध में शत्रुओं का नाश करके भी स्वयं अक्षत, असंख्य पराक्रमों वाले

श्लोक 58 (1.109.58)

आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः । स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव चानुजाः ॥

ānayāmāsa kāśyasya sutāḥ sāgaragāsutaḥ | snuṣā iva sa dharmātmā bhaginīriva cānujāḥ

गंगापुत्र काशिराज की पुत्रियों को ले आए। उन धर्मात्मा ने उन्हें पुत्रवधुओं के समान, छोटी बहनों के समान

श्लोक 59 (1.109.59)

यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् । आनिन्ये स महाबाहुर्भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥

yathā duhitaraścaiva parigṛhya yayau kurūn | āninye sa mahābāhurbhrātuḥ priyacikīrṣayā

और पुत्रियों के समान मानकर कुरुदेश ले गए। अपने भाई का प्रिय करने की इच्छा से वे महाबाहु उन्हें ले आए।

श्लोक 60 (1.109.60)

ताः सर्वगुणसंपन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ॥

tāḥ sarvaguṇasaṃpannā bhrātā bhrātre yavīyase | bhīṣmo vicitravīryāya pradadau vikramāhṛtāḥ

पराक्रम से जीतकर लाई गई, सब गुणों से सम्पन्न उन कन्याओं को बड़े भाई भीष्म ने अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य को सौंप दिया।

श्लोक 61 (1.109.61)

एवं धर्मेण धर्मज्ञः कृत्वा कर्मातिमानुषम् । भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य विवाहायोपचक्रमे ॥

evaṃ dharmeṇa dharmajñaḥ kṛtvā karmātimānuṣam | bhrāturvicitravīryasya vivāhāyopacakrame

इस प्रकार धर्म के ज्ञाता भीष्म ने धर्मानुसार अलौकिक कर्म करके अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह की तैयारी आरम्भ की।

श्लोक 62 (1.109.62)

सत्यवत्या सह मिथः कृत्वा निश्चयमात्मवान् । विवाहं कारयिष्यन्तं भीष्मं काशिपतेः सुता । ज्येष्ठा तासामिदं वाक्यमब्रवीद्धसती तदा ॥

satyavatyā saha mithaḥ kṛtvā niścayamātmavān | vivāhaṃ kārayiṣyantaṃ bhīṣmaṃ kāśipateḥ sutā | jyeṣṭhā tāsāmidaṃ vākyamabravīddhasatī tadā

जब संयमी भीष्म सत्यवती के साथ एकान्त में निश्चय करके विवाह कराने वाले थे, तब काशिराज की पुत्रियों में सबसे बड़ी ने मुस्कुराते हुए उनसे यह कहा —

श्लोक 63 (1.109.63)

मया सौभपतिः पूर्वं मनसा हि वृतः पतिः । तेन चास्मि वृता पूर्वमेष कामश्च मे पितुः ॥

mayā saubhapatiḥ pūrvaṃ manasā hi vṛtaḥ patiḥ | tena cāsmi vṛtā pūrvameṣa kāmaśca me pituḥ

"मैंने पहले ही मन में सौभपति (शाल्व) को अपना पति चुन लिया था, और उन्होंने भी पहले ही मुझे चुन लिया था; यही मेरे पिता की भी इच्छा थी।

श्लोक 64 (1.109.64)

मया वरयितव्योऽभूत्साल्वस्तस्मिन्स्वयंवरे । एतद्विज्ञाय धर्मज्ञ धर्मतत्त्वं समाचर ॥

mayā varayitavyo'bhūtsālvastasminsvayaṃvare | etadvijñāya dharmajña dharmatattvaṃ samācara

उस स्वयंवर में मुझे शाल्व का ही वरण करना था। हे धर्मज्ञ, यह जानकर आप धर्म के तत्त्व के अनुसार आचरण कीजिए।"

श्लोक 65 (1.109.65)

एवमुक्तस्तया भीष्मः कन्यया विप्रसंसदि । चिन्तामभ्यगमद्वीरो युक्तां तस्यैव कर्मणः ॥

evamuktastayā bhīṣmaḥ kanyayā viprasaṃsadi | cintāmabhyagamadvīro yuktāṃ tasyaiva karmaṇaḥ

ब्राह्मणों की सभा में उस कन्या के ऐसा कहने पर वीर भीष्म इस विषय में उचित कर्तव्य पर विचार करने लगे।

श्लोक 66 (1.109.66)

अन्यसक्ता त्वियं कन्या ज्येष्ठा त्वम्बा मया जिता । वाचा दत्ता मनोदत्ता कृतमङ्गलवाचना ॥

anyasaktā tviyaṃ kanyā jyeṣṭhā tvambā mayā jitā | vācā dattā manodattā kṛtamaṅgalavācanā

"मेरी जीती हुई यह सबसे बड़ी कन्या अम्बा किसी दूसरे में अनुरक्त है। वाणी से वह दी जा चुकी है, मन से दी जा चुकी है, और उसके लिए मंगलवाचन भी हो चुका है।

श्लोक 67 (1.109.67)

निर्दिष्टा तु परस्यैव सा त्याज्या परचिन्तिनी । इत्युक्त्वा चानुमान्यैव भ्रातरं स्ववशानुगम् ॥

nirdiṣṭā tu parasyaiva sā tyājyā paracintinī | ityuktvā cānumānyaiva bhrātaraṃ svavaśānugam

जब वह दूसरे के लिए निर्दिष्ट है और दूसरे का ही चिन्तन करती है, तो उसे छोड़ देना चाहिए।" ऐसा विचार करके और अपने अनुगामी भाई की सहमति लेकर,

श्लोक 68 (1.109.68)

विनिश्चित्य स धर्मज्ञो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । अनुजज्ञे तदा ज्येष्ठामम्बां काशिपतेः सुताम् ॥

viniścitya sa dharmajño brāhmaṇairvedapāragaiḥ | anujajñe tadā jyeṣṭhāmambāṃ kāśipateḥ sutām

धर्मज्ञ भीष्म ने वेदों के पारगामी ब्राह्मणों के साथ निश्चय करके काशिराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा को जाने की अनुमति दे दी।

श्लोक 69 (1.109.69)

अम्बिकाम्बालिके भार्ये प्रादाद्भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

ambikāmbālike bhārye prādādbhrātre yavīyase | bhīṣmo vicitravīryāya vidhidṛṣṭena karmaṇā

और अम्बिका तथा अम्बालिका को भीष्म ने शास्त्रोक्त विधि से अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य को पत्नी के रूप में दे दिया।

श्लोक 70 (1.109.70)

तयोः पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा नाम्बामैच्छत्कथंचन ॥

tayoḥ pāṇī gṛhītvā tu rūpayauvanadarpitaḥ | vicitravīryo dharmātmā nāmbāmaicchatkathaṃcana

उन दोनों का पाणिग्रहण करके रूप और यौवन के गर्व से भरे धर्मात्मा विचित्रवीर्य ने अम्बा को किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं करना चाहा।

विचित्रवीर्य उवाच

श्लोक 71 (1.109.71)

अम्बामन्यस्य कीर्त्यन्तीमब्रवीच्चारुदर्शनाम् । पापस्य फलमेवैष कामोऽसाधुर्निरर्थकः । परतन्त्रोपभोगो मामार्य नाऽऽयोक्तुमर्हसि ॥

ambāmanyasya kīrtyantīmabravīccārudarśanām | pāpasya phalamevaiṣa kāmo'sādhurnirarthakaḥ | paratantropabhogo māmārya nā''yoktumarhasi

दूसरे का नाम लेने वाली सुन्दरी अम्बा के विषय में उन्होंने कहा — "यह कामना तो पाप का ही फल है, अनुचित और निरर्थक। हे आर्य, दूसरे के अधीन स्त्री के उपभोग में आप मुझे न लगाइए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 72 (1.109.72)

प्रातिष्ठच्छान्तनोर्वंशस्तात यस्य त्वमन्वयः । अकामवृत्तो धर्मात्मन्साधु मन्ये मतं तव ॥

prātiṣṭhacchāntanorvaṃśastāta yasya tvamanvayaḥ | akāmavṛtto dharmātmansādhu manye mataṃ tava

"तात, शान्तनु का वंश, जिसके तुम वंशज हो, सुप्रतिष्ठित है। हे धर्मात्मा, तुम काम के वश में नहीं चलते; मैं तुम्हारे विचार को उचित मानता हूँ।"

श्लोक 73 (1.109.73)

इत्युक्त्वाम्बां समालोक्य विधिवद्वाक्यमब्रवीत् । विसृष्टा ह्यसि गच्छ त्वं यथाकाममनिन्दिते ॥

ityuktvāmbāṃ samālokya vidhivadvākyamabravīt | visṛṣṭā hyasi gaccha tvaṃ yathākāmamanindite

ऐसा कहकर उन्होंने अम्बा की ओर देखा और विधिपूर्वक कहा — "हे अनिन्दिते, तुम मुक्त हो; जहाँ चाहो जाओ।

श्लोक 74 (1.109.74)

नानियोज्ये समर्थोऽहं नियोक्तुं भ्रातरं प्रियम् । अन्यभावगतां चापि को नारीं वासयेद्गृहे ॥

nāniyojye samartho'haṃ niyoktuṃ bhrātaraṃ priyam | anyabhāvagatāṃ cāpi ko nārīṃ vāsayedgṛhe

जो कार्य उस पर नहीं थोपा जाना चाहिए, उसमें मैं अपने प्रिय भाई को नहीं लगा सकता। और दूसरे में मन लगाए हुए स्त्री को भला कौन अपने घर में रखेगा?

श्लोक 75 (1.109.75)

अतस्त्वां न नियोक्ष्यामि अन्यकामासि गम्यताम् । अहमप्यूर्ध्वरेता वै निवृत्तो दारकर्मणि ॥

atastvāṃ na niyokṣyāmi anyakāmāsi gamyatām | ahamapyūrdhvaretā vai nivṛtto dārakarmaṇi

इसलिए मैं उसे इसके लिए विवश नहीं करूँगा; तुम किसी और को चाहती हो, अतः चली जाओ। मैं भी ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) हूँ और विवाह से विरत हूँ।

श्लोक 76 (1.109.76)

न संबन्धस्तदावाभ्यां भविता वै कथंचन । इत्युक्ता सा गता तत्र सखीभिः परिवारिता ॥

na saṃbandhastadāvābhyāṃ bhavitā vai kathaṃcana | ityuktā sā gatā tatra sakhībhiḥ parivāritā

इसलिए हम दोनों के बीच किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं हो सकता।" ऐसा कहे जाने पर वह अपनी सखियों से घिरी हुई वहाँ से चली गई,

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 77 (1.109.77)

निर्दिष्टा हि शनै राजन्साल्वराजपुरं प्रति । अथाम्बा साल्वमागम्य साऽब्रवीत्प्रतिपूज्य तं ॥

nirdiṣṭā hi śanai rājansālvarājapuraṃ prati | athāmbā sālvamāgamya sā'bravītpratipūjya taṃ

हे राजन्, उसे धीरे-धीरे शाल्वराज के नगर की ओर भेज दिया गया। तब अम्बा शाल्व के पास पहुँची और उसका सत्कार करके बोली —

श्लोक 78 (1.109.78)

पुरा निर्दिष्टभावा त्वामागतास्मि वरानन । देवव्रतं समुत्सृज्य सानुजं भरतर्षभम् ॥

purā nirdiṣṭabhāvā tvāmāgatāsmi varānana | devavrataṃ samutsṛjya sānujaṃ bharatarṣabham

"हे सुमुख, मैंने बहुत पहले ही अपना मन तुम्हें सौंप दिया था; इसलिए भरतश्रेष्ठ देवव्रत और उनके छोटे भाई को छोड़कर मैं तुम्हारे पास आई हूँ।

श्लोक 79 (1.109.79)

प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते विधिवन्मां समुद्यताम् ॥

pratigṛhṇīṣva bhadraṃ te vidhivanmāṃ samudyatām

तुम्हारा कल्याण हो, मुझे विधिपूर्वक ग्रहण करो; मैं स्वयं को तुम्हें अर्पित करने को उद्यत हूँ।"

श्लोक 80 (1.109.80)

तयैवमुक्तः साल्वोऽपि प्रहसन्निदमब्रवीत् । निर्जिताऽसीह भीष्मेण मां विनिर्जित्य राजसु ॥

tayaivamuktaḥ sālvo'pi prahasannidamabravīt | nirjitā'sīha bhīṣmeṇa māṃ vinirjitya rājasu

उसके ऐसा कहने पर शाल्व ने हँसकर कहा — "राजाओं के सामने मुझे हराकर भीष्म ने यहाँ तुम्हें जीता था।

श्लोक 81 (1.109.81)

अन्येन निर्जितां भद्रे विसृष्टां तेन चालयात् । न गृह्णामि वरारोहे तत्र चैव तु गम्यताम् ॥

anyena nirjitāṃ bhadre visṛṣṭāṃ tena cālayāt | na gṛhṇāmi varārohe tatra caiva tu gamyatām

हे भद्रे, दूसरे द्वारा जीती गई और उसी के द्वारा घर से विदा की गई स्त्री को, हे सुन्दरी, मैं ग्रहण नहीं करूँगा। तुम वहीं चली जाओ।"

श्लोक 82 (1.109.82)

इत्युक्ता सा समागम्य कुरुराज्यमनुत्तमम् । अम्बाब्रवीत्ततो भीष्मं त्वयाऽहं सहसा हृता ॥

ityuktā sā samāgamya kururājyamanuttamam | ambābravīttato bhīṣmaṃ tvayā'haṃ sahasā hṛtā

ऐसा कहे जाने पर अम्बा उत्तम कुरुराज्य में लौट आई और भीष्म से बोली — "तुमने मुझे बलपूर्वक हर लिया था।

श्लोक 83 (1.109.83)

क्षत्रधर्ममवेक्षस्व त्वं भर्ता मम धर्मतः । यां यः स्वयंवरे कन्यां निर्जयेच्छौर्यसंपदा ॥

kṣatradharmamavekṣasva tvaṃ bhartā mama dharmataḥ | yāṃ yaḥ svayaṃvare kanyāṃ nirjayecchauryasaṃpadā

क्षत्रिय-धर्म पर विचार करो; धर्म के अनुसार तुम्हीं मेरे पति हो। स्वयंवर में जो पुरुष अपने शौर्य के बल से किसी कन्या को जीतता है,

श्लोक 84 (1.109.84)

राज्ञः सर्वान्विनिर्जित्य स तामुद्वाहयेद्ध्रुवम् । अतस्त्वमेव भर्ता मे त्वयाऽहं निर्जिता यतः ॥

rājñaḥ sarvānvinirjitya sa tāmudvāhayeddhruvam | atastvameva bhartā me tvayā'haṃ nirjitā yataḥ

सब राजाओं को परास्त करके, उसे निश्चय ही उससे विवाह करना चाहिए। इसलिए तुम्हीं मेरे पति हो, क्योंकि तुमने ही मुझे जीता है।

श्लोक 85 (1.109.85)

तस्माद्वहस्व मां भीष्म निर्जितां संसदि त्वया । ऊर्ध्वरेता ह्यहमिति प्रत्युवाच पुनःपुनः ॥

tasmādvahasva māṃ bhīṣma nirjitāṃ saṃsadi tvayā | ūrdhvaretā hyahamiti pratyuvāca punaḥpunaḥ

इसलिए, हे भीष्म, सभा में तुम्हारे द्वारा जीती गई मुझसे विवाह करो।" "मैं ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) हूँ" — भीष्म ने बार-बार यही उत्तर दिया।

श्लोक 86 (1.109.86)

भीष्मं सा चाब्रवीदम्बा यथाजैषीस्तथा कुरु । एवमन्वगमद्भीष्मं षट्समाः पुष्करेक्षणा ॥

bhīṣmaṃ sā cābravīdambā yathājaiṣīstathā kuru | evamanvagamadbhīṣmaṃ ṣaṭsamāḥ puṣkarekṣaṇā

और अम्बा ने भीष्म से कहा — "जैसे तुमने मुझे जीता है, वैसा ही करो।" इस प्रकार कमलनयनी अम्बा छह वर्षों तक भीष्म के पीछे लगी रही।

श्लोक 87 (1.109.87)

ऊर्ध्वरेतास्त्वहं भद्रे विवाहविमुखोऽभवम् । तमेव साल्वं गच्छ त्वं यः पुरा मनसा वृतः ॥

ūrdhvaretāstvahaṃ bhadre vivāhavimukho'bhavam | tameva sālvaṃ gaccha tvaṃ yaḥ purā manasā vṛtaḥ

"हे भद्रे, मैं ऊर्ध्वरेता हूँ और विवाह से विमुख हो चुका हूँ। तुम उसी शाल्व के पास जाओ जिसे तुमने पहले मन से वरण किया था।

श्लोक 88 (1.109.88)

अन्यसक्तं किमर्थं त्वमात्मानमवदः पुरा । अन्यसक्तां वधूं कन्यां वासयेत्स्वगृहे न हि ॥

anyasaktaṃ kimarthaṃ tvamātmānamavadaḥ purā | anyasaktāṃ vadhūṃ kanyāṃ vāsayetsvagṛhe na hi

तुमने पहले स्वयं को दूसरे में अनुरक्त क्यों बताया? दूसरे में अनुरक्त कन्या को कोई अपनी वधू बनाकर घर में नहीं रखता।

श्लोक 89 (1.109.89)

नाहमुद्वाहयिष्ये त्वां मम भ्रात्रे यवीयसे । विचित्रवीर्याय शुभे यथेष्टं गम्यतामिति ॥

nāhamudvāhayiṣye tvāṃ mama bhrātre yavīyase | vicitravīryāya śubhe yatheṣṭaṃ gamyatāmiti

हे शुभे, मैं अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य से तुम्हारा विवाह नहीं कराऊँगा। तुम जहाँ चाहो चली जाओ।"

श्लोक 90 (1.109.90)

भूयः साल्वं समभ्येत्य राजन्गृह्णीष्व मामिति । नाहं गृह्णाम्यन्यजितामिति साल्वनिराकृता ॥

bhūyaḥ sālvaṃ samabhyetya rājangṛhṇīṣva māmiti | nāhaṃ gṛhṇāmyanyajitāmiti sālvanirākṛtā

फिर से शाल्व के पास जाकर उसने कहा — "राजन्, मुझे ग्रहण करो।" "मैं दूसरे द्वारा जीती गई स्त्री को ग्रहण नहीं करता" — कहकर शाल्व ने उसे लौटा दिया;

श्लोक 91 (1.109.91)

ऊर्ध्वरेतास्त्वहमिति भीष्मेण च निराकृता । अम्बा भीष्मं पुनः साल्वं भीष्मं साल्वं पुनः पुनः ॥

ūrdhvaretāstvahamiti bhīṣmeṇa ca nirākṛtā | ambā bhīṣmaṃ punaḥ sālvaṃ bhīṣmaṃ sālvaṃ punaḥ punaḥ

"मैं ऊर्ध्वरेता हूँ" — कहकर भीष्म ने भी उसे लौटा दिया। इस प्रकार अम्बा कभी भीष्म के पास, फिर शाल्व के पास, फिर भीष्म और फिर शाल्व के पास बार-बार जाती रही,

श्लोक 92 (1.109.92)

गमनागमनेनैवमनैषीत्षट् समा नृप । अश्रुभिर्भूमिमुक्षन्ती शोचन्ती सा मनस्विनी ॥

gamanāgamanenaivamanaiṣītṣaṭ samā nṛpa | aśrubhirbhūmimukṣantī śocantī sā manasvinī

और हे राजन्, इसी आने-जाने में उसने छह वर्ष बिता दिए। वह मनस्विनी आँसुओं से धरती भिगोती और शोक करती रही —

श्लोक 93 (1.109.93)

पीनोन्नतकुचद्वन्द्वा विशालजघनेक्षणा । श्रोणीभरालसगमा राकाचन्द्रनिभानना ॥

pīnonnatakucadvandvā viśālajaghanekṣaṇā | śroṇībharālasagamā rākācandranibhānanā

वह, जिसके स्तन पुष्ट और उन्नत थे, नितम्ब और नेत्र विशाल थे, नितम्बों के भार से जिसकी चाल मन्द थी, और जिसका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा था;

श्लोक 94 (1.109.94)

वर्षत्कादम्बिनीमूर्ध्नि स्फुरन्ती चञ्चलेव सा । सा ततो द्वादश समा बाहुदामभितो नदीम् । पार्श्वे हिमवतो रम्ये तपो घोरं समाददे ॥

varṣatkādambinīmūrdhni sphurantī cañcaleva sā | sā tato dvādaśa samā bāhudāmabhito nadīm | pārśve himavato ramye tapo ghoraṃ samādade

वह बरसती मेघमाला के शिखर पर चमकती बिजली के समान थी। फिर बारह वर्षों तक बाहुदा नदी के तट पर, हिमालय के सुरम्य पार्श्व में, उसने घोर तप किया।

श्लोक 95 (1.109.95)

संक्षिप्तकरणा तत्र तप आस्थाय सुव्रता । पादाङ्गुष्ठेन साऽतिष्ठदकम्पन्त ततः सुराः ॥

saṃkṣiptakaraṇā tatra tapa āsthāya suvratā | pādāṅguṣṭhena sā'tiṣṭhadakampanta tataḥ surāḥ

वहाँ उत्तम व्रत वाली उस स्त्री ने इन्द्रियों को समेटकर तप का आश्रय लिया और पैर के अँगूठे पर खड़ी रही; इससे देवता काँप उठे।

श्लोक 96 (1.109.96)

तस्यास्तत्तु तपो दृष्ट्वा सुराणां क्षोभकारकम् । विस्मितश्चैव हृष्टश्च तस्यानुग्रहबुद्धिमान् ॥

tasyāstattu tapo dṛṣṭvā surāṇāṃ kṣobhakārakam | vismitaścaiva hṛṣṭaśca tasyānugrahabuddhimān

देवताओं को क्षुब्ध कर देने वाले उसके उस तप को देखकर भगवान कुमार (स्कन्द) विस्मित और प्रसन्न हुए, और उन्होंने उस पर अनुग्रह करने का निश्चय किया —

श्लोक 97 (1.109.97)

अनन्तसेनो भगवान्कुमारो वरदः प्रभुः । मानयन्राजपुत्रीं तां ददौ तस्यै शुभां स्रजम् ॥

anantaseno bhagavānkumāro varadaḥ prabhuḥ | mānayanrājaputrīṃ tāṃ dadau tasyai śubhāṃ srajam

अनन्त सेनाओं के स्वामी, वरदायक, समर्थ भगवान कुमार ने उस राजकुमारी का सम्मान करते हुए उसे एक सुन्दर माला दी —

श्लोक 98 (1.109.98)

एषा पुष्करिणी दिव्या यथावत्समुपस्थिता । अम्बे त्वच्छोकशमनी माला भुवि भविष्यति ॥

eṣā puṣkariṇī divyā yathāvatsamupasthitā | ambe tvacchokaśamanī mālā bhuvi bhaviṣyati

"हे अम्बे, कमलों की यह दिव्य माला, जो तुम्हें यथोचित रूप से प्राप्त हुई है, पृथ्वी पर तुम्हारे शोक को शान्त करने वाली होगी।

श्लोक 99 (1.109.99)

एतां चैव मया दत्तां मालां यो धारयिष्यति । सोऽस्य भीष्मस्य निधने कारणं वै भविष्यति ॥

etāṃ caiva mayā dattāṃ mālāṃ yo dhārayiṣyati | so'sya bhīṣmasya nidhane kāraṇaṃ vai bhaviṣyati

और मेरी दी हुई इस माला को जो धारण करेगा, वही इस भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगा।"

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