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आदि पर्व · अध्याय 113

दीर्घतमा का उपाख्यान

भीष्म सत्यवती को बताते हैं कि परशुराम द्वारा पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर देने के बाद क्षत्रिय स्त्रियों ने ब्राह्मणों से पुत्र उत्पन्न कराए और क्षत्रिय-वर्ग फिर से स्थापित हुआ। फिर वे दीर्घतमा की कथा सुनाते हैं — गर्भ में ही बृहस्पति के शाप से अन्धे हुए वे विद्वान ऋषि बने, उनकी पत्नी प्रद्वेषी और पुत्रों ने उन्हें गंगा में बहा दिया, और उन्होंने यह मर्यादा स्थापित की कि स्त्री का जीवन भर एक ही पति होगा। राजा बलि ने उन्हें बचाया; उन्होंने एक शूद्रा दासी से काक्षीवान आदि ग्यारह पुत्र और फिर रानी सुदेष्णा से अंग, वंग, कलिंग, पुण्ड्र और सुह्म उत्पन्न किए, जिनके नाम पर उनके देश प्रसिद्ध हुए। अन्त में भीष्म सत्यवती से कहते हैं कि इस उदाहरण को सुनकर वे जैसा उचित समझें वैसा करें।

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (1.113.1)

जामदग्न्येन रामेण पितुर्वधममृष्यता । राजा परशुना पूर्वं हैहयाधिपतिर्हतः ॥

jāmadagnyena rāmeṇa piturvadhamamṛṣyatā | rājā paraśunā pūrvaṃ haihayādhipatirhataḥ

प्राचीन काल में पिता के वध को सहन न कर पाने वाले जमदग्निपुत्र परशुराम ने अपने परशु से हैहयों के अधिपति राजा का वध किया था।

श्लोक 2 (1.113.2)

शतानि दशबाहूनां निकृत्तान्यर्जुनस्य वै । लोकस्याचरितो धर्मस्तेनाति किल दुश्चरः ॥

śatāni daśabāhūnāṃ nikṛttānyarjunasya vai | lokasyācarito dharmastenāti kila duścaraḥ

उन्होंने (कार्तवीर्य) अर्जुन की हज़ार भुजाएँ काट डालीं। कहते हैं, इस प्रकार उन्होंने संसार के लिए अत्यन्त दुष्कर धर्म का पालन किया।

श्लोक 3 (1.113.3)

पुनश्च धनुरादाय महास्त्राणि प्रमुञ्चता । निर्दग्धं क्षत्रमसकृद्रथेन जयता महीम् ॥

punaśca dhanurādāya mahāstrāṇi pramuñcatā | nirdagdhaṃ kṣatramasakṛdrathena jayatā mahīm

फिर धनुष उठाकर, महान अस्त्र छोड़ते हुए और रथ पर चढ़कर पृथ्वी को जीतते हुए उन्होंने बार-बार क्षत्रियों को भस्म कर डाला।

श्लोक 4 (1.113.4)

एवमुच्चावचैरस्त्रैर्भार्गवेण महात्मना । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा ॥

evamuccāvacairastrairbhārgaveṇa mahātmanā | triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivī kṛtā niḥkṣatriyā purā

इस प्रकार भृगुवंशी महात्मा परशुराम ने छोटे-बड़े अनेक अस्त्रों से पूर्वकाल में इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया।

श्लोक 5 (1.113.5)

एवं निःक्षत्रिये लोके कृते तेन महर्षिणा । ततः संभूय सर्वाभिः क्षत्रियाभिः समन्ततः ॥

evaṃ niḥkṣatriye loke kṛte tena maharṣiṇā | tataḥ saṃbhūya sarvābhiḥ kṣatriyābhiḥ samantataḥ

जब उस महर्षि ने इस प्रकार संसार को क्षत्रियों से रहित कर दिया, तब चारों ओर से एकत्र होकर सभी क्षत्रिय स्त्रियों ने

श्लोक 6 (1.113.6)

उत्पादितान्यपत्यानि ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । पाणिग्राहस्य तनय इति वेदेषु निश्चितम् ॥

utpāditānyapatyāni brāhmaṇairvedapāragaiḥ | pāṇigrāhasya tanaya iti vedeṣu niścitam

वेदों के पारंगत ब्राह्मणों से सन्तानें उत्पन्न कराईं। "पुत्र उसी का होता है जिसने (माता का) पाणिग्रहण किया हो" — ऐसा वेदों में निश्चित किया गया है।

श्लोक 7 (1.113.7)

धर्मं मनसि संस्थाप्य ब्राह्मणांस्ताः समभ्ययुः । लोकेऽप्याचरितो दृष्टः क्षत्रियाणां पुनर्भवः ॥

dharmaṃ manasi saṃsthāpya brāhmaṇāṃstāḥ samabhyayuḥ | loke'pyācarito dṛṣṭaḥ kṣatriyāṇāṃ punarbhavaḥ

धर्म को मन में स्थिर करके वे स्त्रियाँ ब्राह्मणों के पास गईं। लोक में भी क्षत्रियों का इस प्रकार पुनः उत्पन्न होना आचरित देखा गया है।

श्लोक 8 (1.113.8)

ततः पुनः समुदितं क्षत्रं समभवत्तदा । इमं चैवात्र वक्ष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ॥

tataḥ punaḥ samuditaṃ kṣatraṃ samabhavattadā | imaṃ caivātra vakṣye'hamitihāsaṃ purātanam

तब क्षत्रिय-वर्ग फिर से उठ खड़ा हुआ और पुनः स्थापित हो गया। इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास भी सुनाता हूँ।

श्लोक 9 (1.113.9)

अथोचथ्य इति ख्यात आसीद्धीमानृषिः पुरा । ममता नाम तस्यासीद्भार्या परमसंमता ॥

athocathya iti khyāta āsīddhīmānṛṣiḥ purā | mamatā nāma tasyāsīdbhāryā paramasaṃmatā

प्राचीन काल में उचथ्य नाम से प्रसिद्ध एक बुद्धिमान ऋषि थे। उनकी ममता नाम की पत्नी थी, जिसका वे अत्यन्त आदर करते थे।

श्लोक 10 (1.113.10)

उचथ्यस्य यवीयांस्तु पुरोधास्त्रिदिवौकसाम् । बृहस्पतिर्बृहत्तेजा ममतामन्वपद्यत ॥

ucathyasya yavīyāṃstu purodhāstridivaukasām | bṛhaspatirbṛhattejā mamatāmanvapadyata

उचथ्य के छोटे भाई, स्वर्गवासी देवताओं के पुरोहित, महातेजस्वी बृहस्पति ममता के पास पहुँचे।

श्लोक 11 (1.113.11)

उवाच ममता तं तु देवरं वदतां वरम् । अन्तर्वत्नी त्वहं भ्रात्रा ज्येष्ठेनारम्यतामिति ॥

uvāca mamatā taṃ tu devaraṃ vadatāṃ varam | antarvatnī tvahaṃ bhrātrā jyeṣṭhenāramyatāmiti

ममता ने वक्ताओं में श्रेष्ठ अपने देवर से कहा — "मैं तुम्हारे बड़े भाई से गर्भवती हूँ; अतः रुक जाओ।"

ममतोवाच

श्लोक 12 (1.113.12)

अयं च मे महाभाग कुक्षावेव बृहस्पते । औचथ्यो वेदमत्रापि षडङ्गं प्रत्यधीयत ॥

ayaṃ ca me mahābhāga kukṣāveva bṛhaspate | aucathyo vedamatrāpi ṣaḍaṅgaṃ pratyadhīyata

हे महाभाग बृहस्पति! मेरी कोख में स्थित यह उचथ्य-पुत्र यहीं रहते हुए छहों अंगों सहित वेद का अध्ययन कर चुका है।

श्लोक 13 (1.113.13)

अमोघरेतास्त्वं चापि द्वयोर्नास्त्यत्र संभवः । तस्मादेवं गते त्वद्य उपारमितुमर्हसि ॥

amogharetāstvaṃ cāpi dvayornāstyatra saṃbhavaḥ | tasmādevaṃ gate tvadya upāramitumarhasi

तुम भी अमोघवीर्य हो, और यहाँ दो के लिए स्थान नहीं है। इसलिए ऐसी स्थिति में अब तुम्हें रुक जाना चाहिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (1.113.14)

एवमुक्तस्तदा सम्यक् बृहस्पतिरुदारधीः । कामात्मानं तदात्मानं न शशाक नियच्छितुम् ॥

evamuktastadā samyak bṛhaspatirudāradhīḥ | kāmātmānaṃ tadātmānaṃ na śaśāka niyacchitum

इस प्रकार उचित ढंग से समझाए जाने पर भी उदारबुद्धि बृहस्पति उस समय काम के वश में हुए अपने मन को रोक न सके।

श्लोक 15 (1.113.15)

स बभूव ततः कामी तया सार्धमकामया । उत्सृजन्तं तु तं रेतः स गर्भस्थोऽभ्यभाषत ॥

sa babhūva tataḥ kāmī tayā sārdhamakāmayā | utsṛjantaṃ tu taṃ retaḥ sa garbhastho'bhyabhāṣata

तब कामातुर होकर उन्होंने उसकी अनिच्छा के बावजूद उसके साथ समागम किया। जब वे वीर्य छोड़ने लगे, तब गर्भस्थ शिशु ने उनसे कहा —

श्लोक 16 (1.113.16)

भोस्तात मा गमः कामं द्वयोर्नास्तीह संभवः । अल्पावकाशो भगवन्पूर्वं चाहमिहागतः ॥

bhostāta mā gamaḥ kāmaṃ dvayornāstīha saṃbhavaḥ | alpāvakāśo bhagavanpūrvaṃ cāhamihāgataḥ

"हे तात! काम के वश में मत होइए। यहाँ दो के लिए स्थान नहीं है। हे भगवन्! यहाँ जगह थोड़ी है और मैं पहले से यहाँ आया हुआ हूँ।

श्लोक 17 (1.113.17)

अमोघरेताश्च भवान्न पीडां कर्तुमर्हति । अश्रुत्वैव तु तद्वाक्यं गर्भस्थस्य बृहस्पतिः ॥

amogharetāśca bhavānna pīḍāṃ kartumarhati | aśrutvaiva tu tadvākyaṃ garbhasthasya bṛhaspatiḥ

और आपका वीर्य अमोघ है; आपको मुझे पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए।" किन्तु गर्भस्थ शिशु की बात को अनसुना करके बृहस्पति

श्लोक 18 (1.113.18)

जगाम मैथुनायैव ममतां चारुलोचनाम् । शुक्रोत्सर्गं ततो बुद्ध्वा तस्या गर्भगतो मुनिः ॥

jagāma maithunāyaiva mamatāṃ cārulocanām | śukrotsargaṃ tato buddhvā tasyā garbhagato muniḥ

सुन्दर नेत्रों वाली ममता के पास मैथुन के लिए चले ही गए। तब उसके गर्भ में स्थित मुनि ने वीर्य का स्खलन होता जानकर

श्लोक 19 (1.113.19)

पद्भ्यामारोधयन्मार्गं शुक्रस्य च बृहस्पतेः । स्थानमप्राप्तमथ तच्छुक्रं प्रतिहतं तदा ॥

padbhyāmārodhayanmārgaṃ śukrasya ca bṛhaspateḥ | sthānamaprāptamatha tacchukraṃ pratihataṃ tadā

अपने पैरों से बृहस्पति के वीर्य का मार्ग रोक दिया। तब वह वीर्य अपने स्थान तक न पहुँचकर, पीछे धकेल दिए जाने से,

श्लोक 20 (1.113.20)

पपात सहसा भूमौ ततः क्रुद्धो बृहस्पतिः । तं दृष्ट्वा पतितं शुक्रं शशाप स रुषान्वितः ॥

papāta sahasā bhūmau tataḥ kruddho bṛhaspatiḥ | taṃ dṛṣṭvā patitaṃ śukraṃ śaśāpa sa ruṣānvitaḥ

सहसा भूमि पर गिर पड़ा। इससे बृहस्पति क्रुद्ध हो उठे; उस वीर्य को गिरा देखकर उन्होंने रोष में भरकर शाप दिया।

श्लोक 21 (1.113.21)

उचथ्यपुत्रं गर्भस्थं निर्भर्त्स्य भगवानृषिः । यन्मां त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति ॥

ucathyaputraṃ garbhasthaṃ nirbhartsya bhagavānṛṣiḥ | yanmāṃ tvamīdṛśe kāle sarvabhūtepsite sati

उन भगवान ऋषि ने गर्भस्थ उचथ्य-पुत्र को फटकारते हुए कहा — "सब प्राणी जिसकी अभिलाषा करते हैं, ऐसे समय में तुमने

श्लोक 22 (1.113.22)

एवमात्थ वचस्तस्मात्तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि । स वै दीर्घतमा नाम शापादृषिरजायत ॥

evamāttha vacastasmāttamo dīrghaṃ pravekṣyasi | sa vai dīrghatamā nāma śāpādṛṣirajāyata

मुझसे ऐसी बात कही है, इसलिए तुम दीर्घ अन्धकार में प्रवेश करोगे।" इसी शाप के कारण वह ऋषि दीर्घतमा नाम से उत्पन्न हुआ —

श्लोक 23 (1.113.23)

बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्बृहस्पतिरिवौजसा । जात्यन्धो वेदवित्प्राज्ञः पत्नीं लेभे स विद्यया ॥

bṛhaspaterbṛhatkīrterbṛhaspatirivaujasā | jātyandho vedavitprājñaḥ patnīṃ lebhe sa vidyayā

महायशस्वी बृहस्पति के शाप से, यद्यपि तेज में वह स्वयं बृहस्पति के समान था। जन्म से अन्धा होने पर भी वेदज्ञ और विद्वान उस ऋषि ने अपनी विद्या के बल से पत्नी प्राप्त की —

श्लोक 24 (1.113.24)

तरुणीं रूपसंपन्नां प्रद्वेषीं नाम ब्राह्मणीम् । स पुत्राञ्जनयामास गौतमादीन्महायशाः ॥

taruṇīṃ rūpasaṃpannāṃ pradveṣīṃ nāma brāhmaṇīm | sa putrāñjanayāmāsa gautamādīnmahāyaśāḥ

प्रद्वेषी नाम की एक रूपवती तरुण ब्राह्मणी। उस महायशस्वी ऋषि ने उससे गौतम आदि पुत्र उत्पन्न किए,

श्लोक 25 (1.113.25)

ऋषेरुचथ्यस्य तदा सन्तानकुलवृद्धये । धर्मात्मा च महात्मा च वेदवेदाङ्गपारगः ॥

ṛṣerucathyasya tadā santānakulavṛddhaye | dharmātmā ca mahātmā ca vedavedāṅgapāragaḥ

ताकि ऋषि उचथ्य के वंश और कुल की वृद्धि हो। वह धर्मात्मा, महात्मा और वेद-वेदांगों में पारंगत था।

श्लोक 26 (1.113.26)

गोधर्मं सौरभेयाच्च सोऽधीत्य निखिलं मुनिः । प्रावर्तत तदा कर्तुं श्रद्धावांस्तमशङ्कया ॥

godharmaṃ saurabheyācca so'dhītya nikhilaṃ muniḥ | prāvartata tadā kartuṃ śraddhāvāṃstamaśaṅkayā

उस मुनि ने सुरभि (कामधेनु) के पुत्र से सम्पूर्ण गोधर्म — पशुओं की भाँति खुले में समागम — सीख लिया और फिर श्रद्धापूर्वक, निःशंक होकर उसका आचरण करने लगा।

श्लोक 27 (1.113.27)

ततो वितथमर्यादं तं दृष्ट्वा मुनिसत्तमाः । क्रुद्धा मोहाभिभूतास्ते सर्वे तत्राश्रमौकसः ॥

tato vitathamaryādaṃ taṃ dṛṣṭvā munisattamāḥ | kruddhā mohābhibhūtāste sarve tatrāśramaukasaḥ

उसे मर्यादा का उल्लंघन करते देखकर उस आश्रम में रहने वाले सभी श्रेष्ठ मुनि मोह से अभिभूत होकर क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 28 (1.113.28)

अहोऽयं भिन्नमर्यादो नाश्रमे वस्तुमर्हति । तस्मादेनं वयं सर्वे पापात्मानं त्यजामहे ॥

aho'yaṃ bhinnamaryādo nāśrame vastumarhati | tasmādenaṃ vayaṃ sarve pāpātmānaṃ tyajāmahe

"अहो! इसने मर्यादा तोड़ दी है; यह आश्रम में रहने योग्य नहीं है। इसलिए हम सब इस पापात्मा को त्याग देते हैं।"

श्लोक 29 (1.113.29)

इत्यन्योन्यं समाभाष्य ते दीर्घतमसं मुनिम् । पुत्रलाभाच्च सा पत्नी न तुतोष पतिं तदा ॥

ityanyonyaṃ samābhāṣya te dīrghatamasaṃ munim | putralābhācca sā patnī na tutoṣa patiṃ tadā

दीर्घतमा मुनि के विषय में वे आपस में ऐसा कहने लगे। उधर उनकी पत्नी पुत्र पा लेने के बाद अपने पति से सन्तुष्ट न रही।

श्लोक 30 (1.113.30)

प्रद्विषन्तीं पतिर्भार्यां किं मां द्वेक्षीति चाब्रवीत् । भार्याया भरणाद्भर्ता पालनाच्च पतिः स्मृतः ॥

pradviṣantīṃ patirbhāryāṃ kiṃ māṃ dvekṣīti cābravīt | bhāryāyā bharaṇādbhartā pālanācca patiḥ smṛtaḥ

पत्नी को द्वेष करते देख पति ने कहा — "तुम मुझसे द्वेष क्यों करती हो?" प्रद्वेषी बोली — "पत्नी का भरण करने से पुरुष 'भर्ता' और पालन करने से 'पति' कहलाता है।"

प्रद्वेष्युवाच

श्लोक 31 (1.113.31)

अहं त्वद्भरणाशक्ता जात्यन्धं ससुतं तदा । नित्यकालं श्रमेणार्ता न भरेयं महातपः ॥

ahaṃ tvadbharaṇāśaktā jātyandhaṃ sasutaṃ tadā | nityakālaṃ śrameṇārtā na bhareyaṃ mahātapaḥ

पर मैं जन्मान्ध तुम्हारा, पुत्रों सहित, भरण-पोषण करने में असमर्थ हूँ। सदा के परिश्रम से थकी हुई मैं अब तुम्हारा भरण नहीं करूँगी, हे महातपस्वी!

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (1.113.32)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ऋषिः कोपसमन्वितः । प्रत्युवाच ततः पत्नीं प्रद्वेषीं ससुतां तदा ॥

tasyāstadvacanaṃ śrutvā ṛṣiḥ kopasamanvitaḥ | pratyuvāca tataḥ patnīṃ pradveṣīṃ sasutāṃ tadā

उसकी यह बात सुनकर ऋषि क्रोध से भर गए और उन्होंने अपनी पत्नी प्रद्वेषी और उसके पुत्रों को उत्तर दिया —

श्लोक 33 (1.113.33)

नीयतां क्षत्रियकुले धनार्थश्च भविष्यति । त्वया दत्तं धनं विप्र नेच्छेयं दुःखकारणम् ॥

nīyatāṃ kṣatriyakule dhanārthaśca bhaviṣyati | tvayā dattaṃ dhanaṃ vipra neccheyaṃ duḥkhakāraṇam

"मुझे किसी क्षत्रिय-कुल में ले चलो, वहाँ धन और लाभ मिलेगा।" प्रद्वेषी बोली — "हे विप्र! तुम्हारा दिया धन मुझे नहीं चाहिए; वह दुःख ही देता है।"

प्रद्वेष्युवाच

श्लोक 34 (1.113.34)

यथेष्टं कुरु विप्रेन्द्र न भरेयं पुरा यथा । अद्यप्रभृति मर्यादा मया लोके प्रतिष्ठिता ॥

yatheṣṭaṃ kuru viprendra na bhareyaṃ purā yathā | adyaprabhṛti maryādā mayā loke pratiṣṭhitā

"हे विप्रश्रेष्ठ! जैसा चाहो करो; मैं पहले की भाँति तुम्हारा भरण नहीं करूँगी।" दीर्घतमा बोले — "आज से मैं संसार में यह मर्यादा स्थापित करता हूँ।"

दीर्घतमा उवाच

श्लोक 35 (1.113.35)

एक एव पतिर्नार्या यावज्जीवं परायणम् । मृते जीवति वा तस्मिन्नापरं प्राप्नुयान्नरम् ॥

eka eva patirnāryā yāvajjīvaṃ parāyaṇam | mṛte jīvati vā tasminnāparaṃ prāpnuyānnaram

स्त्री के लिए जीवन भर एक ही पति उसका आश्रय होगा। वह पति मर गया हो या जीवित हो, वह दूसरे पुरुष के पास नहीं जाएगी।

श्लोक 36 (1.113.36)

अभिगम्य परं नारी पतिष्यति न संशयः । अपतीनां तु नारीणामद्यप्रभृति पातकम् ॥

abhigamya paraṃ nārī patiṣyati na saṃśayaḥ | apatīnāṃ tu nārīṇāmadyaprabhṛti pātakam

दूसरे पुरुष के पास जाने वाली स्त्री निःसन्देह पतित होगी। आज से पतिहीन स्त्रियों के लिए ऐसा करना पाप होगा।

श्लोक 37 (1.113.37)

यद्यस्ति चेद्धनं सर्वं वृथाभोगा भवन्तु ताः । अकीर्तिः परिवादाश्च नित्यं तासां भवन्तु वै ॥

yadyasti ceddhanaṃ sarvaṃ vṛthābhogā bhavantu tāḥ | akīrtiḥ parivādāśca nityaṃ tāsāṃ bhavantu vai

यदि उनके पास सारा धन भी हो, तो भी उनके भोग व्यर्थ होंगे, और अपयश तथा निन्दा सदा उनके साथ रहेंगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 38 (1.113.38)

इति तद्वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणी भृशकोपिता । गङ्गायां नीयतामेष पुत्रा इत्येवमब्रवीत् ॥

iti tadvacanaṃ śrutvā brāhmaṇī bhṛśakopitā | gaṅgāyāṃ nīyatāmeṣa putrā ityevamabravīt

उनकी यह बात सुनकर ब्राह्मणी अत्यन्त क्रुद्ध हुई और बोली — "पुत्रो! इसे गंगा में ले जाओ।"

श्लोक 39 (1.113.39)

लोभमोहाभिभूतास्ते पुत्रास्तं गौतमादयः । बद्ध्वोडुपे परिक्षिप्य गङ्गायां समवासृजन् ॥

lobhamohābhibhūtāste putrāstaṃ gautamādayaḥ | baddhvoḍupe parikṣipya gaṅgāyāṃ samavāsṛjan

लोभ और मोह से अभिभूत उनके गौतम आदि पुत्रों ने उन्हें एक बेड़े पर बाँधकर गंगा में बहा दिया।

श्लोक 40 (1.113.40)

कस्मादन्धश्च वृद्धश्च भर्तव्योऽयमिति स्म ते । चिन्तयित्वा ततः क्रूराः प्रतिजग्मुरथो गृहान् ॥

kasmādandhaśca vṛddhaśca bhartavyo'yamiti sma te | cintayitvā tataḥ krūrāḥ pratijagmuratho gṛhān

"यह अन्धा और बूढ़ा क्यों पाला जाए?" — ऐसा सोचकर वे क्रूर पुत्र अपने घर लौट गए।

श्लोक 41 (1.113.41)

सोऽनुस्रोतस्तदा विप्रः प्लवमानो यदृच्छया । जगाम सुबहून्देशानन्धस्तेनोडुपेन ह ॥

so'nusrotastadā vipraḥ plavamāno yadṛcchayā | jagāma subahūndeśānandhastenoḍupena ha

उस बेड़े पर धारा के साथ यों ही बहते हुए वे अन्धे ब्राह्मण बहुत-से देशों से होकर गुज़रे।

श्लोक 42 (1.113.42)

तं तु राजा बलिर्नाम सर्वधर्मविदां वरः । अपश्यन्मज्जनगतः स्रोतसाऽभ्याशमागतम् ॥

taṃ tu rājā balirnāma sarvadharmavidāṃ varaḥ | apaśyanmajjanagataḥ srotasā'bhyāśamāgatam

सब धर्मज्ञों में श्रेष्ठ बलि नाम के राजा ने, जो स्नान करने गए थे, धारा के साथ अपने निकट आते हुए उन्हें देखा।

श्लोक 43 (1.113.43)

जग्राह चैनं धर्मात्मा बलिः सत्यपराक्रमः । ज्ञात्वा चैवं स वव्रेऽथ पुत्रार्थे भरतर्षभ ॥

jagrāha cainaṃ dharmātmā baliḥ satyaparākramaḥ | jñātvā caivaṃ sa vavre'tha putrārthe bharatarṣabha

सत्यपराक्रमी धर्मात्मा बलि ने उन्हें पकड़ लिया और उनका परिचय जानकर, हे भरतश्रेष्ठ, पुत्र-प्राप्ति के लिए उनका वरण किया।

श्लोक 44 (1.113.44)

तं पूजयित्वा राजर्षिर्विश्रान्तं मुनिमब्रवीत् । सन्तानार्थं महाभाग भार्यासु मम मानद । पुत्रान्धर्मार्थकुशलानुत्पादयितुमर्हसि ॥

taṃ pūjayitvā rājarṣirviśrāntaṃ munimabravīt | santānārthaṃ mahābhāga bhāryāsu mama mānada | putrāndharmārthakuśalānutpādayitumarhasi

उनका सत्कार करके, विश्राम कर चुके मुनि से राजर्षि ने कहा — "हे महाभाग, हे मानद! मेरे वंश को आगे बढ़ाने के लिए आप मेरी पत्नियों से धर्म और अर्थ में कुशल पुत्र उत्पन्न करें।"

श्लोक 45 (1.113.45)

एवमुक्तः स तेजस्वी तं तथेत्युक्तवानृषिः । तस्मै स राजा स्वां भार्यां सुदेष्णां प्राहिणोत्तदा ॥

evamuktaḥ sa tejasvī taṃ tathetyuktavānṛṣiḥ | tasmai sa rājā svāṃ bhāryāṃ sudeṣṇāṃ prāhiṇottadā

ऐसा कहे जाने पर उस तेजस्वी ऋषि ने उनसे कहा — "ऐसा ही हो।" तब राजा ने अपनी पत्नी सुदेष्णा को उनके पास भेजा।

श्लोक 46 (1.113.46)

अन्धं वृद्धं च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह । स्वां तु धात्रेयिकां तस्मै वृद्धाय प्राहिणोत्तदा ॥

andhaṃ vṛddhaṃ ca taṃ matvā na sā devī jagāma ha | svāṃ tu dhātreyikāṃ tasmai vṛddhāya prāhiṇottadā

परन्तु उन्हें अन्धा और बूढ़ा समझकर रानी स्वयं नहीं गई; उसने अपनी दासी, धाय की पुत्री, को उस वृद्ध के पास भेज दिया।

श्लोक 47 (1.113.47)

तस्यां काक्षीवदादीन्स शूद्रयोनावृषिस्तदा । जनयामास धर्मात्मा पुत्रानेकादशैव तु ॥

tasyāṃ kākṣīvadādīnsa śūdrayonāvṛṣistadā | janayāmāsa dharmātmā putrānekādaśaiva tu

उस शूद्र-योनि की स्त्री से धर्मात्मा ऋषि ने तब काक्षीवान आदि ग्यारह पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 48 (1.113.48)

काक्षीवदादीन्पुत्रांस्तान्दृष्ट्वा सर्वानधीयतः । उवाच तमृषिं राजा ममेम इति भारत ॥

kākṣīvadādīnputrāṃstāndṛṣṭvā sarvānadhīyataḥ | uvāca tamṛṣiṃ rājā mamema iti bhārata

हे भारत! काक्षीवान आदि उन सब पुत्रों को वेदाध्ययन करते देखकर राजा ने ऋषि से कहा — "ये मेरे हैं।"

श्लोक 49 (1.113.49)

नेत्युवाच महर्षिस्तं ममेम इति चाब्रवीत् । शूद्रयोनौ मया हीमे जाताः काक्षीवदादयः ॥

netyuvāca maharṣistaṃ mamema iti cābravīt | śūdrayonau mayā hīme jātāḥ kākṣīvadādayaḥ

महर्षि ने उनसे कहा — "नहीं," और बोले — "ये मेरे हैं। काक्षीवान आदि मुझसे एक शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं।"

दीर्घतमा उवाच

श्लोक 50 (1.113.50)

अन्धं वृद्धं च मां दृष्ट्वा सुदेष्णा महिषी तव । अवमन्य ददौ मूढा शूद्रां धात्रेयिकां मम ॥

andhaṃ vṛddhaṃ ca māṃ dṛṣṭvā sudeṣṇā mahiṣī tava | avamanya dadau mūḍhā śūdrāṃ dhātreyikāṃ mama

मुझे अन्धा और बूढ़ा देखकर तुम्हारी रानी सुदेष्णा ने मूर्खतावश मेरा अपमान किया और अपनी शूद्रा दासी मेरे पास भेज दी।

भीष्म उवाच

श्लोक 51 (1.113.51)

ततः प्रसादयामास पुनस्तमृषिसत्तमम् । बलिः सुदेष्णां स्वां भार्यां तस्मै स प्राहिणोत्पुनः ॥

tataḥ prasādayāmāsa punastamṛṣisattamam | baliḥ sudeṣṇāṃ svāṃ bhāryāṃ tasmai sa prāhiṇotpunaḥ

तब बलि ने उन श्रेष्ठ ऋषि को फिर से प्रसन्न किया और अपनी पत्नी सुदेष्णा को दोबारा उनके पास भेजा।

श्लोक 52 (1.113.52)

तां स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाब्रवीत् । भविष्यन्ति कुमारास्ते तेजसाऽऽदित्यवर्चसः ॥

tāṃ sa dīrghatamāṅgeṣu spṛṣṭvā devīmathābravīt | bhaviṣyanti kumārāste tejasā''dityavarcasaḥ

दीर्घतमा ने रानी के अंगों का स्पर्श करके उससे कहा — "तुम्हारे पुत्र तेज में सूर्य के समान कान्तिमान होंगे।"

श्लोक 53 (1.113.53)

अङ्गो वङ्गः कलिङ्गश्च पुण्ड्रः सुह्मश्च ते सुताः । तेषां देशाः समाख्याताः स्वनामकथिता भुवि ॥

aṅgo vaṅgaḥ kaliṅgaśca puṇḍraḥ suhmaśca te sutāḥ | teṣāṃ deśāḥ samākhyātāḥ svanāmakathitā bhuvi

अंग, वंग, कलिंग, पुण्ड्र और सुह्म — ये उसके पुत्र हुए। उनके देश पृथ्वी पर उन्हीं के नामों से प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 54 (1.113.54)

अङ्गस्याङ्गोऽभवद्देशो वङ्गो वङ्गस्य च स्मृतः । कलिङ्गविषयश्चैव कलिङ्गस्य च स स्मृतः ॥

aṅgasyāṅgo'bhavaddeśo vaṅgo vaṅgasya ca smṛtaḥ | kaliṅgaviṣayaścaiva kaliṅgasya ca sa smṛtaḥ

अंग से अंग देश हुआ, वंग का देश वंग कहलाया, और कलिंग का प्रदेश भी कलिंग के नाम से जाना गया।

श्लोक 55 (1.113.55)

पुण्ड्रस्य पुण्ड्राः प्रख्याताः सुह्माः सुह्मस्य च स्मृताः । एवं बलेः पुरा वंशः प्रख्यातो वै महर्षिजः ॥

puṇḍrasya puṇḍrāḥ prakhyātāḥ suhmāḥ suhmasya ca smṛtāḥ | evaṃ baleḥ purā vaṃśaḥ prakhyāto vai maharṣijaḥ

पुण्ड्र से पुण्ड्र और सुह्म से सुह्म देश प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार प्राचीन काल में महर्षि से उत्पन्न बलि का वंश विख्यात हुआ।

श्लोक 56 (1.113.56)

एवमन्ये महेष्वासा ब्राह्मणैः क्षत्रिया भुवि । जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महाबलाः । एतच्छ्रुत्वा त्वमप्यत्र मातः कुरु यथेप्सितम् ॥

evamanye maheṣvāsā brāhmaṇaiḥ kṣatriyā bhuvi | jātāḥ paramadharmajñā vīryavanto mahābalāḥ | etacchrutvā tvamapyatra mātaḥ kuru yathepsitam

इसी प्रकार पृथ्वी पर अन्य महाधनुर्धर क्षत्रिय भी ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए, जो परम धर्मज्ञ, पराक्रमी और महाबली थे। माता! यह सुनकर तुम भी इस विषय में जैसा चाहो वैसा करो।

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