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आदि पर्व · अध्याय 114

सत्यवती द्वारा व्यास के जन्म का रहस्य-कथन

भीष्म प्रस्ताव करते हैं कि किसी गुणवान ब्राह्मण को आमंत्रित करके विचित्रवीर्य की विधवा रानियों से पुत्र उत्पन्न कराए जाएँ। सत्यवती पहले स्वयं भीष्म से यह कार्य करने का आग्रह करती हैं, पर वे अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहते हैं। तब सत्यवती रहस्य खोलती हैं कि कुमारी अवस्था में यमुना पार कराते समय महर्षि पराशर से उन्हें व्यास उत्पन्न हुए थे, और वे व्यास का स्मरण करने का प्रस्ताव रखती हैं। भीष्म सहमत होते हैं; व्यास प्रकट होकर माता की बात स्वीकार करते हैं, और जब सत्यवती तुरंत गर्भाधान का आग्रह करती हैं तो चेताते हैं कि रानियों को उनकी कुरूपता सहनी होगी। इसके बाद सत्यवती कौसल्या (अम्बिका) को तैयार करती हैं।

अध्याय 113अध्याय-सूचीअध्याय 115

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (1.114.1)

पुनर्भरतवंशस्य हेतुं सन्तानवृद्धये । वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ॥

punarbharatavaṃśasya hetuṃ santānavṛddhaye | vakṣyāmi niyataṃ mātastanme nigadataḥ śṛṇu

भीष्म ने कहा — "माता, भरतवंश की संतान बढ़ाने का एक निश्चित उपाय मैं आपको बताता हूँ; मेरे कहते हुए उसे सुनिए।"

श्लोक 2 (1.114.2)

ब्राह्मणो गुणवान्कश्चिद्धनेनोपनिमन्त्र्यताम् । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत्प्रजाः ॥

brāhmaṇo guṇavānkaściddhanenopanimantryatām | vicitravīryakṣetreṣu yaḥ samutpādayetprajāḥ

"किसी गुणवान ब्राह्मण को धन देकर आमंत्रित किया जाए, जो विचित्रवीर्य की पत्नियों से संतान उत्पन्न करे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.114.3)

भीष्मस्य तु वचः श्रुत्वा धर्महेत्वर्थसंहितम् । माता सत्यवती भीष्मं पुनरेवाभ्यभाषत ॥

bhīṣmasya tu vacaḥ śrutvā dharmahetvarthasaṃhitam | mātā satyavatī bhīṣmaṃ punarevābhyabhāṣata

वैशम्पायन ने कहा — भीष्म के धर्म, युक्ति और प्रयोजन से युक्त वचन सुनकर माता सत्यवती ने भीष्म से फिर कहा।

सत्यवत्युवाच

श्लोक 4 (1.114.4)

औचथ्यमधिकृत्येदमङ्गं च यदुदाहृतम् । पौराणी श्रुतिरित्येषा प्राप्तकालमिदं कुरु ॥

aucathyamadhikṛtyedamaṅgaṃ ca yadudāhṛtam | paurāṇī śrutirityeṣā prāptakālamidaṃ kuru

"तुमने औचथ्य के विषय में जो कहा और अंग का जो उदाहरण दिया, वह प्राचीन श्रुति है। अब उसका समय आ गया है; यह कार्य करो।"

श्लोक 5 (1.114.5)

त्वं हि पुत्र कुलस्यास्य ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च भारत । यथा च ते पितुर्वाक्यं मम कार्यं तथाऽनघ ॥

tvaṃ hi putra kulasyāsya jyeṣṭhaḥ śreṣṭhaśca bhārata | yathā ca te piturvākyaṃ mama kāryaṃ tathā'nagha

"पुत्र, हे भारत, तुम ही इस कुल में सबसे बड़े और सबसे श्रेष्ठ हो। हे निष्पाप, जैसे पिता का वचन तुम्हारे लिए पालनीय है, वैसे ही मेरा भी।"

श्लोक 6 (1.114.6)

मम पुत्रस्तव भ्राता यवीयान्सुप्रियश्च ते । बाल एव गतः स्वर्गं भारतो भरतर्षभ ॥

mama putrastava bhrātā yavīyānsupriyaśca te | bāla eva gataḥ svargaṃ bhārato bharatarṣabha

"हे भरतश्रेष्ठ, मेरा पुत्र, तुम्हारा अत्यन्त प्रिय छोटा भाई, बालक रहते ही स्वर्ग चला गया।"

श्लोक 7 (1.114.7)

इमे महिष्यौ तस्येह काशिराजसुते उभे । रूपयौवनसंपन्ने पुत्रकामे च भारत ॥

ime mahiṣyau tasyeha kāśirājasute ubhe | rūpayauvanasaṃpanne putrakāme ca bhārata

"हे भारत, ये उसकी दोनों रानियाँ, काशिराज की पुत्रियाँ, रूप और यौवन से सम्पन्न हैं और पुत्र की कामना रखती हैं।"

श्लोक 8 (1.114.8)

धर्म्यमेतत्परं ज्ञात्वा सन्तानाय कुलस्य च । आभ्यां मम नियोगात्तु धर्मं चरितुमर्हसि ॥

dharmyametatparaṃ jñātvā santānāya kulasya ca | ābhyāṃ mama niyogāttu dharmaṃ caritumarhasi

"इसे परम धर्म जानकर और कुल की संतान के लिए, मेरी आज्ञा से तुम इन दोनों के साथ धर्म का पालन करो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (1.114.9)

असंशयं परो धर्मस्त्वया मातः प्रकीर्तितः । त्वमप्येतां प्रतिज्ञां तु वेत्थ या मयि वर्तते ॥

asaṃśayaṃ paro dharmastvayā mātaḥ prakīrtitaḥ | tvamapyetāṃ pratijñāṃ tu vettha yā mayi vartate

भीष्म ने कहा — "माता, निस्संदेह आपने परम धर्म बताया है। परन्तु आप मेरी उस प्रतिज्ञा को भी जानती हैं जो मुझ पर लागू है।"

श्लोक 10 (1.114.10)

अमरत्वस्य वा हेतोस्त्रैलोक्यसदनस्य वा । उत्सृजेयमहं प्राणान्न तु सत्यं कथंचन ॥

amaratvasya vā hetostrailokyasadanasya vā | utsṛjeyamahaṃ prāṇānna tu satyaṃ kathaṃcana

"अमरत्व के लिए, या तीनों लोकों के आधिपत्य के लिए भी, मैं प्राण त्याग सकता हूँ, पर सत्य को किसी भी प्रकार नहीं।"

सत्यवत्युवाच

श्लोक 11 (1.114.11)

जानामि त्वयि धर्मज्ञ सत्यं सत्यपराक्रम । इच्छंस्त्वमिह लोकांस्त्रीन्सृजेरन्यानरिन्दम ॥

jānāmi tvayi dharmajña satyaṃ satyaparākrama | icchaṃstvamiha lokāṃstrīnsṛjeranyānarindama

सत्यवती ने कहा — "हे धर्मज्ञ, हे सत्यपराक्रमी, मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा को जानती हूँ। हे शत्रुदमन, तुम चाहो तो दूसरे तीनों लोक रच सकते हो।"

श्लोक 12 (1.114.12)

यथा तु नः कुलं चैव धर्मश्च न पराभवेत् । सुहृदश्च प्रहृष्टाः स्युस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥

yathā tu naḥ kulaṃ caiva dharmaśca na parābhavet | suhṛdaśca prahṛṣṭāḥ syustathā tvaṃ kartumarhasi

"किन्तु तुम वैसा करो जिससे हमारा कुल और धर्म नष्ट न हो, और हमारे सुहृद प्रसन्न रहें।"

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (1.114.13)

त्वमेव कुलवृद्धासि गौरवं तु परं त्वयि । सोपायं कुलसन्ताने वक्तुमर्हसि नः परम् ॥

tvameva kulavṛddhāsi gauravaṃ tu paraṃ tvayi | sopāyaṃ kulasantāne vaktumarhasi naḥ param

भीष्म ने कहा — "आप ही कुल में सबसे बड़ी हैं, और आपके प्रति हमारा परम आदर है। कुल की संतान बनाए रखने का उत्तम उपाय आप ही हमें बताइए।"

श्लोक 14 (1.114.14)

स्त्रियो हि परमं गुह्यं धारयन्ति सदा कुले । पुरुषांश्चैव मायाभिर्बह्वीभिरुपगृह्णते ॥

striyo hi paramaṃ guhyaṃ dhārayanti sadā kule | puruṣāṃścaiva māyābhirbahvībhirupagṛhṇate

"क्योंकि स्त्रियाँ कुल के परम गुप्त रहस्यों को सदा अपने भीतर रखती हैं, और अनेक युक्तियों से पुरुषों को अपने अनुकूल कर लेती हैं।"

श्लोक 15 (1.114.15)

सा सत्यवति संपश्य धर्मं सत्यपरायणे । यथा न जह्यां सत्यं च न सीदेच्च कुलं हि नः ॥

sā satyavati saṃpaśya dharmaṃ satyaparāyaṇe | yathā na jahyāṃ satyaṃ ca na sīdecca kulaṃ hi naḥ

"अतः हे सत्यपरायणा सत्यवती, धर्म का विचार कीजिए, जिससे न मैं सत्य छोड़ूँ और न हमारा कुल डूबे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.114.16)

ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया । विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत् ॥

tataḥ satyavatī bhīṣmaṃ vācā saṃsajjamānayā | vihasantīva savrīḍamidaṃ vacanamabravīt

वैशम्पायन ने कहा — तब सत्यवती लड़खड़ाती वाणी में, मानो मुस्कराती और लजाती हुई, भीष्म से यह वचन बोलीं।

सत्यवत्युवाच

श्लोक 17 (1.114.17)

सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । विश्वासात्ते प्रवक्ष्यामि सन्तानाय कुलस्य नः ॥

satyametanmahābāho yathā vadasi bhārata | viśvāsātte pravakṣyāmi santānāya kulasya naḥ

"हे महाबाहु भारत, तुम जैसा कहते हो वह सत्य है। तुम पर विश्वास करके, अपने कुल की संतान के लिए, मैं तुम्हें एक बात बताती हूँ।"

श्लोक 18 (1.114.18)

न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्मं तथाविधम् । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः ॥

na te śakyamanākhyātumāpaddharmaṃ tathāvidham | tvameva naḥ kule dharmastvaṃ satyaṃ tvaṃ parā gatiḥ

"ऐसे आपत्ति-काल का धर्म तुमसे छिपाया नहीं जा सकता। हमारे कुल में तुम ही धर्म हो, तुम ही सत्य हो और तुम ही परम आश्रय हो।"

श्लोक 19 (1.114.19)

यत्त्वं वक्ष्यसि तत्कार्यमस्माभिरिति मे मतिः । तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् । शृणु भीष्म वचो मह्यं धर्मार्थसहितं हितम् ॥

yattvaṃ vakṣyasi tatkāryamasmābhiriti me matiḥ | tasmānniśamya satyaṃ me kuruṣva yadanantaram | śṛṇu bhīṣma vaco mahyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam

"मेरा मत है कि जो तुम कहोगे, वही हमें करना चाहिए। इसलिए मेरी सच्ची बात सुनकर आगे जो करना हो, करो। हे भीष्म, धर्म और अर्थ से युक्त मेरा हितकारी वचन सुनो।"

श्लोक 20 (1.114.20)

न च विस्रम्भकथितं भवान्सूचितुमर्हति । यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतस्ते भरतर्षभ ॥

na ca visrambhakathitaṃ bhavānsūcitumarhati | yastu rājā vasurnāma śrutaste bharatarṣabha

"विश्वास में कही गई बात तुम्हें प्रकट नहीं करनी चाहिए। हे भरतश्रेष्ठ, तुमने वसु नाम के राजा के विषय में सुना है।"

श्लोक 21 (1.114.21)

तस्य शुक्लादहं मत्स्या धृता कुक्षौ पुरा किल । मातरं मे जलाद्धृत्वा दाशः परमधर्मवित् ॥

tasya śuklādahaṃ matsyā dhṛtā kukṣau purā kila | mātaraṃ me jalāddhṛtvā dāśaḥ paramadharmavit

"कहते हैं, प्राचीन काल में उन्हीं के वीर्य से मैं एक मछली के पेट में धारण की गई थी। परम धर्मज्ञ एक मछुआरे ने मेरी माता, उस मछली, को जल से निकाला,"

श्लोक 22 (1.114.22)

मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वेऽभ्यकल्पयत् । धर्मयुक्तः स धर्मेण पिता चासीत्ततो मम ॥

māṃ tu svagṛhamānīya duhitṛtve'bhyakalpayat | dharmayuktaḥ sa dharmeṇa pitā cāsīttato mama

"और मुझे अपने घर लाकर पुत्री के रूप में अपना लिया। वह धर्मनिष्ठ व्यक्ति धर्म के अनुसार मेरा पिता बन गया।"

श्लोक 23 (1.114.23)

धर्मयुक्तस्य धर्मार्थं पितुरासीत्तरी मम । सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम् ॥

dharmayuktasya dharmārthaṃ piturāsīttarī mama | sā kadācidahaṃ tatra gatā prathamayauvanam

"मेरे धर्मनिष्ठ पिता धर्म के लिए एक नाव चलाते थे। एक दिन, यौवन के आरम्भ में, मैं वहाँ गई।"

श्लोक 24 (1.114.24)

अथ धर्मविदां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः । आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन्यमुनां नदीम् ॥

atha dharmavidāṃ śreṣṭhaḥ paramarṣiḥ parāśaraḥ | ājagāma tarīṃ dhīmāṃstariṣyanyamunāṃ nadīm

"तब धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान परमर्षि पराशर यमुना नदी पार करने के लिए उस नाव पर आए।"

श्लोक 25 (1.114.25)

स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत्तदा । सान्त्वपूर्वं मुनिश्रेष्ठः कामार्तो मधुरं वचः । उक्त्वा जन्म कुलं मह्यं नासि दाशसुतेति च ॥

sa tāryamāṇo yamunāṃ māmupetyābravīttadā | sāntvapūrvaṃ muniśreṣṭhaḥ kāmārto madhuraṃ vacaḥ | uktvā janma kulaṃ mahyaṃ nāsi dāśasuteti ca

"जब मैं उन्हें यमुना पार करा रही थी, तब कामातुर मुनिश्रेष्ठ मेरे पास आए और सान्त्वना भरे मधुर वचन कहे; उन्होंने मेरे जन्म और कुल के विषय में बताकर कहा — 'तुम मछुआरे की पुत्री नहीं हो।'"

श्लोक 26 (1.114.26)

तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत । वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे ॥

tamahaṃ śāpabhītā ca piturbhītā ca bhārata | varairasulabhairuktā na pratyākhyātumutsahe

"हे भारत, शाप के भय से और पिता के भय से भी, और दुर्लभ वरों का वचन पाकर, मैं उन्हें मना करने का साहस न कर सकी।"

श्लोक 27 (1.114.27)

प्रेक्ष्य तांस्तु महाभागान्पारावारे ऋषीन्स्थितान् । यमुनातीरविन्यस्तान्प्रदीप्तानिव पावकान् ॥

prekṣya tāṃstu mahābhāgānpārāvāre ṛṣīnsthitān | yamunātīravinyastānpradīptāniva pāvakān

"यमुना के इस और उस तट पर प्रज्वलित अग्नियों के समान स्थित उन महाभाग ऋषियों को देखकर मैंने कहा —"

श्लोक 28 (1.114.28)

पुरस्तादरुणश्चैव तरुणः संप्रकाशते । येनैषा ताम्रवस्त्रेव द्यौः कृता प्रविजृम्भिता ॥

purastādaruṇaścaiva taruṇaḥ saṃprakāśate | yenaiṣā tāmravastreva dyauḥ kṛtā pravijṛmbhitā

"'पूर्व दिशा में तरुण अरुण प्रकाशित हो रहा है, जिससे यह आकाश मानो ताम्रवर्ण वस्त्र पहनकर खिल उठा है।'"

श्लोक 29 (1.114.29)

उक्तमात्रो मया तत्र नीहारमसृजत्प्रभुः । पराशरः सत्यधृतिर्द्वीपे च यमुनाम्भसि ॥

uktamātro mayā tatra nīhāramasṛjatprabhuḥ | parāśaraḥ satyadhṛtirdvīpe ca yamunāmbhasi

"मेरे इतना कहते ही सत्यनिष्ठ प्रभु पराशर ने वहीं, यमुना के जल में स्थित द्वीप पर, कुहरा उत्पन्न कर दिया।"

श्लोक 30 (1.114.30)

अभिभूय स मां बालां तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ॥

abhibhūya sa māṃ bālāṃ tejasā vaśamānayat | tamasā lokamāvṛtya naugatāmeva bhārata

"हे भारत, संसार को अन्धकार से ढककर उन्होंने अपने तेज से मुझ बालिका को, जो नाव में ही थी, अभिभूत करके अपने वश में कर लिया।"

श्लोक 31 (1.114.31)

मत्स्यगन्धो महानासीत्पुरा मम जुगुप्सितः । तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात्स मे मुनिः ॥

matsyagandho mahānāsītpurā mama jugupsitaḥ | tamapāsya śubhaṃ gandhamimaṃ prādātsa me muniḥ

"पहले मुझमें मछली की तीव्र गन्ध थी, जो मुझे घृणित लगती थी। उस मुनि ने उसे दूर करके मुझे यह शुभ सुगन्ध प्रदान की।"

श्लोक 32 (1.114.32)

ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् । द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥

tato māmāha sa munirgarbhamutsṛjya māmakam | dvīpe'syā eva saritaḥ kanyaiva tvaṃ bhaviṣyasi

"तब उस मुनि ने मुझसे कहा — 'इसी नदी के द्वीप पर मेरे गर्भ को जन्म देकर तुम फिर से कन्या ही हो जाओगी।'"

श्लोक 33 (1.114.33)

कन्यात्वं च ददौ प्रीतः पुनर्विद्वांस्तपोधनः । तस्य वीर्यमहं दृष्ट्वा तथा युक्तं महात्मनः ॥

kanyātvaṃ ca dadau prītaḥ punarvidvāṃstapodhanaḥ | tasya vīryamahaṃ dṛṣṭvā tathā yuktaṃ mahātmanaḥ

"प्रसन्न होकर उस विद्वान तपस्वी ने मुझे फिर से कन्यात्व प्रदान किया। उस महात्मा का ऐसा प्रभाव देखकर"

श्लोक 34 (1.114.34)

विस्मिता व्यथिता चैव प्रादामात्मानमेव च । ततस्तदा महात्मा स कन्यायां मयि भारत । प्रहृष्टोऽजनयत्पुत्रं द्वीप एव पराशरः ॥

vismitā vyathitā caiva prādāmātmānameva ca | tatastadā mahātmā sa kanyāyāṃ mayi bhārata | prahṛṣṭo'janayatputraṃ dvīpa eva parāśaraḥ

"विस्मित और व्याकुल होकर मैंने स्वयं को उन्हें सौंप दिया। तब, हे भारत, महात्मा पराशर ने प्रसन्न होकर उसी द्वीप पर मुझ कुमारी से एक पुत्र उत्पन्न किया।"

श्लोक 35 (1.114.35)

पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः । कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः ॥

pārāśaryo mahāyogī sa babhūva mahānṛṣiḥ | kanyāputro mama purā dvaipāyana iti śrutaḥ

"पराशर का वह पुत्र महायोगी और महान ऋषि हुआ। कुमारी अवस्था में बहुत पहले मुझसे उत्पन्न वह 'द्वैपायन' नाम से प्रसिद्ध है।"

श्लोक 36 (1.114.36)

यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः । लोके व्यासत्वमापेदे कार्ष्ण्यात्कृष्णत्वमेव च ॥

yo vyasya vedāṃścaturastapasā bhagavānṛṣiḥ | loke vyāsatvamāpede kārṣṇyātkṛṣṇatvameva ca

"जिस भगवान ऋषि ने तप के बल से वेद को चार भागों में विभक्त किया, वे संसार में 'व्यास' कहलाए, और श्याम वर्ण के कारण 'कृष्ण' भी।"

श्लोक 37 (1.114.37)

सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः । सद्योत्पन्नः स तु महान्सह पित्रा ततो गतः ॥

satyavādī śamaparastapasvī dagdhakilbiṣaḥ | sadyotpannaḥ sa tu mahānsaha pitrā tato gataḥ

"वे सत्यवादी, शान्तिपरायण, तपस्वी और निष्पाप हैं। जन्म लेते ही वे महात्मा अपने पिता के साथ चले गए।"

श्लोक 38 (1.114.38)

स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः । भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति ॥

sa niyukto mayā vyaktaṃ tvayā cāpratimadyutiḥ | bhrātuḥ kṣetreṣu kalyāṇamapatyaṃ janayiṣyati

"मेरे और तुम्हारे द्वारा नियुक्त किए जाने पर वह अनुपम तेजस्वी निश्चय ही अपने भाई की पत्नियों से कल्याणकारी संतान उत्पन्न करेगा।"

श्लोक 39 (1.114.39)

स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छ्रेषु मामिति । तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि ॥

sa hi māmuktavāṃstatra smareḥ kṛcchreṣu māmiti | taṃ smariṣye mahābāho yadi bhīṣma tvamicchasi

"क्योंकि उसने उस समय मुझसे कहा था — 'संकट में मेरा स्मरण करना।' हे महाबाहु भीष्म, यदि तुम चाहो तो मैं उसका स्मरण करूँगी।"

श्लोक 40 (1.114.40)

तव ह्यनुमते भीष्म नियतं स महातपाः । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यति ॥

tava hyanumate bhīṣma niyataṃ sa mahātapāḥ | vicitravīryakṣetreṣu putrānutpādayiṣyati

"हे भीष्म, तुम्हारी अनुमति से वह महातपस्वी निश्चय ही विचित्रवीर्य की पत्नियों से पुत्र उत्पन्न करेगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (1.114.41)

महर्षेः कीर्तने तस्य भीष्मः प्राञ्जलिरब्रवीत् । देशकालौ च जानासि क्रियतामर्थसिद्धये ॥

maharṣeḥ kīrtane tasya bhīṣmaḥ prāñjalirabravīt | deśakālau ca jānāsi kriyatāmarthasiddhaye

वैशम्पायन ने कहा — उन महर्षि का नाम आते ही भीष्म ने हाथ जोड़कर कहा — "आप देश और काल को जानती हैं; प्रयोजन की सिद्धि के लिए ऐसा ही किया जाए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (1.114.42)

धर्ममर्थं च कामं च त्रीनेतान्योऽनुपश्यति । अर्थमर्थानुबन्धं च धर्मं धर्मानुबन्धनम् । कामं कामानुबन्धं च विपरीतान्पृथक्पृथक् ॥

dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca trīnetānyo'nupaśyati | arthamarthānubandhaṃ ca dharmaṃ dharmānubandhanam | kāmaṃ kāmānubandhaṃ ca viparītānpṛthakpṛthak

"जो धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों का विचार करता है; अर्थ और उसके परिणाम, धर्म और उसके परिणाम, काम और उसके परिणाम, तथा इनके विपरीत परिणामों को अलग-अलग देखता है,"

श्लोक 43 (1.114.43)

यो विचिन्त्य धिया धीरो व्यवस्यति स बुद्धिमान् । तदिदं धर्मयुक्तं च हितं चैव कुलस्य नः ॥

yo vicintya dhiyā dhīro vyavasyati sa buddhimān | tadidaṃ dharmayuktaṃ ca hitaṃ caiva kulasya naḥ

"और धीर होकर बुद्धि से विचार करके निर्णय लेता है, वही बुद्धिमान है। यह प्रस्ताव धर्मसम्मत है और हमारे कुल के लिए हितकारी भी।"

श्लोक 44 (1.114.44)

उक्तं भवत्या यच्छ्रेयस्तन्मह्यं रोचते भृशम् ॥

uktaṃ bhavatyā yacchreyastanmahyaṃ rocate bhṛśam

"आपने जो कल्याणकारी बात कही है, वह मुझे बहुत अच्छी लगती है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 45 (1.114.45)

ततस्तस्मिन्प्रतिज्ञाते भीष्मेण कुरुनन्दन ॥

tatastasminpratijñāte bhīṣmeṇa kurunandana

वैशम्पायन ने कहा — हे कुरुनन्दन, जब भीष्म ने इस प्रकार स्वीकृति दे दी,

श्लोक 46 (1.114.46)

कृष्णद्वैपायनं काली चिन्तयामास वै मुनिम् । स वेदान्विब्रुवन्धीमान्मातुर्विज्ञाय चिन्तितम् ॥

kṛṣṇadvaipāyanaṃ kālī cintayāmāsa vai munim | sa vedānvibruvandhīmānmāturvijñāya cintitam

सत्यवती ने, जो काली भी कहलाती थीं, मुनि कृष्णद्वैपायन का स्मरण किया। उस समय वेदों का प्रवचन कर रहे बुद्धिमान मुनि ने माता के मन की बात जान ली,

श्लोक 47 (1.114.47)

प्रादुर्बभूवाविदितः क्षणेन कुरुनन्दन । तस्मै पूजां ततः कृत्वा सुताय विधिपूर्वकम् ॥

prādurbabhūvāviditaḥ kṣaṇena kurunandana | tasmai pūjāṃ tataḥ kṛtvā sutāya vidhipūrvakam

और हे कुरुनन्दन, वे क्षणभर में बिना किसी के जाने वहाँ प्रकट हो गए। तब माता ने विधिपूर्वक अपने पुत्र का सत्कार किया,

श्लोक 48 (1.114.48)

परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रस्रवैरभ्यषिञ्चत । मुमोच बाष्पं दाशेयी पुत्रं दृष्ट्वा चिरस्य तु ॥

pariṣvajya ca bāhubhyāṃ prasravairabhyaṣiñcata | mumoca bāṣpaṃ dāśeyī putraṃ dṛṣṭvā cirasya tu

उसे भुजाओं में भरकर स्तनों से बहते दूध से नहला दिया; और मछुआरे की वह पुत्री बहुत समय बाद पुत्र को देखकर आँसू बहाने लगी।

श्लोक 49 (1.114.49)

तामद्भिः परिषिच्यार्तां महर्षिरभिवाद्य च । मातरं पूर्वजः पुत्रो व्यासो वचनमब्रवीत् ॥

tāmadbhiḥ pariṣicyārtāṃ maharṣirabhivādya ca | mātaraṃ pūrvajaḥ putro vyāso vacanamabravīt

उनके ज्येष्ठ पुत्र महर्षि व्यास ने दुःखी माता पर जल छिड़ककर उन्हें प्रणाम किया और यह वचन कहा —

व्यास उवाच

श्लोक 50 (1.114.50)

भवत्या यदभिप्रेतं तदहं कर्तुमागतः । शाधि मां धर्मतत्त्वज्ञे करवाणि प्रियं तव ॥

bhavatyā yadabhipretaṃ tadahaṃ kartumāgataḥ | śādhi māṃ dharmatattvajñe karavāṇi priyaṃ tava

"आप जो चाहती हैं, वही करने मैं आया हूँ। हे धर्म का तत्त्व जानने वाली, मुझे आज्ञा दीजिए; मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (1.114.51)

तस्मै पूजां ततोऽकार्षीत्पुरोधाः परमर्षये । स च तां प्रतिजग्राह विधिवन्मन्त्रपूर्वकम् ॥

tasmai pūjāṃ tato'kārṣītpurodhāḥ paramarṣaye | sa ca tāṃ pratijagrāha vidhivanmantrapūrvakam

तब पुरोहित ने उन परम ऋषि की पूजा की, और उन्होंने विधिपूर्वक मन्त्रों सहित उसे स्वीकार किया।

श्लोक 52 (1.114.52)

पूजितो मन्त्रपूर्वं तु विधिवत्प्रीतिमाप सः । तमासनगतं माता पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् ॥

pūjito mantrapūrvaṃ tu vidhivatprītimāpa saḥ | tamāsanagataṃ mātā pṛṣṭvā kuśalamavyayam

मन्त्रपूर्वक विधिवत् पूजित होकर वे प्रसन्न हुए। जब वे आसन पर बैठ गए, तब माता ने उनका अक्षय कुशल-क्षेम पूछा,

श्लोक 53 (1.114.53)

सत्यवत्यथ वीक्ष्यैनमुवाचेदमनन्तरम् । मातापित्रोः प्रजायन्ते पुत्राः साधारणाः कवे ॥

satyavatyatha vīkṣyainamuvācedamanantaram | mātāpitroḥ prajāyante putrāḥ sādhāraṇāḥ kave

फिर सत्यवती ने उनकी ओर देखकर कहा — "हे ज्ञानी, पुत्र माता और पिता दोनों के समान रूप से होते हैं।"

सत्यवत्युवाच

श्लोक 54 (1.114.54)

तेषां पिता यथा स्वामी तथा माता न संशयः । विधानविहितः स त्वं यथा मे प्रथमः सुतः ॥

teṣāṃ pitā yathā svāmī tathā mātā na saṃśayaḥ | vidhānavihitaḥ sa tvaṃ yathā me prathamaḥ sutaḥ

"जैसे पिता उन पर अधिकार रखता है, वैसे ही माता भी, इसमें संदेह नहीं। विधि के विधान से जैसे तुम मेरे पहले पुत्र हो,"

श्लोक 55 (1.114.55)

विचित्रवीर्यो ब्रह्मर्षे तथा मेऽवरजः सुतः । यथैव पितृतो भीष्मस्तथा त्वमपि मातृतः ॥

vicitravīryo brahmarṣe tathā me'varajaḥ sutaḥ | yathaiva pitṛto bhīṣmastathā tvamapi mātṛtaḥ

"वैसे ही, हे ब्रह्मर्षि, विचित्रवीर्य मेरा छोटा पुत्र था। जैसे पिता की ओर से भीष्म उसके भाई हैं, वैसे ही माता की ओर से तुम भी"

श्लोक 56 (1.114.56)

भ्राता विचित्रवीर्यस्य यथा वा पुत्र मन्यसे । अयं शान्तनवः सत्यं पालयन्सत्यविक्रमः ॥

bhrātā vicitravīryasya yathā vā putra manyase | ayaṃ śāntanavaḥ satyaṃ pālayansatyavikramaḥ

"विचित्रवीर्य के भाई हो — अथवा पुत्र, तुम जैसा मानो। ये सत्यपराक्रमी शान्तनुनन्दन अपने सत्य का पालन करते हुए"

श्लोक 57 (1.114.57)

बुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्याऽनुशासने । स त्वं व्यपेक्षया भ्रातुः सन्तानाय कुलस्य च ॥

buddhiṃ na kurute'patye tathā rājyā'nuśāsane | sa tvaṃ vyapekṣayā bhrātuḥ santānāya kulasya ca

"न संतान उत्पन्न करने का विचार करते हैं, न राज्य-शासन का। इसलिए तुम अपने भाई का ध्यान रखकर और कुल की संतान के लिए,"

श्लोक 58 (1.114.58)

भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ । अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय च ॥

bhīṣmasya cāsya vacanānniyogācca mamānagha | anukrośācca bhūtānāṃ sarveṣāṃ rakṣaṇāya ca

"इन भीष्म के कहने से और मेरी आज्ञा से, हे निष्पाप, सब प्राणियों पर करुणा करके और उनकी रक्षा के लिए,"

श्लोक 59 (1.114.59)

आनृशंस्याच्च यद्ब्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि । यवीयसस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे ॥

ānṛśaṃsyācca yadbrūyāṃ tacchrutvā kartumarhasi | yavīyasastava bhrāturbhārye surasutopame

"और दयाभाव से, मैं जो कहूँ उसे सुनकर करो। तुम्हारे छोटे भाई की दोनों पत्नियाँ, जो देवकन्याओं के समान हैं,"

श्लोक 60 (1.114.60)

रूपयौवनसंपन्ने पुत्रकामे च धर्मतः । तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक ॥

rūpayauvanasaṃpanne putrakāme ca dharmataḥ | tayorutpādayāpatyaṃ samartho hyasi putraka

"रूप और यौवन से सम्पन्न हैं और धर्मपूर्वक पुत्र की कामना रखती हैं। पुत्र, उनसे संतान उत्पन्न करो, क्योंकि तुम समर्थ हो,"

श्लोक 61 (1.114.61)

अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्याः प्रसवस्य च ॥

anurūpaṃ kulasyāsya saṃtatyāḥ prasavasya ca

"ऐसी संतान, जो इस कुल, इसकी परम्परा और वंश-वृद्धि के योग्य हो।"

व्यास उवाच

श्लोक 62 (1.114.62)

वेत्थ धर्मं सत्यवति परं चापरमेव च ॥

vettha dharmaṃ satyavati paraṃ cāparameva ca

व्यास ने कहा — "हे सत्यवती, तुम उच्च और सामान्य, दोनों प्रकार के धर्म को जानती हो,"

श्लोक 63 (1.114.63)

तथा तव महाप्राज्ञे धर्मे प्रणिहिता मतिः । तस्मादहं त्वन्नियोगाद्धर्ममुद्दिश्य कारणम् ॥

tathā tava mahāprājñe dharme praṇihitā matiḥ | tasmādahaṃ tvanniyogāddharmamuddiśya kāraṇam

"और हे महाप्राज्ञे, तुम्हारी बुद्धि धर्म में लगी है। इसलिए तुम्हारी आज्ञा से, धर्म को ही कारण मानकर,"

श्लोक 64 (1.114.64)

ईप्सितं ते करिष्यामि दृष्टं ह्येतत्सनातनम् । भ्रातुः पुत्रान्प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान् ॥

īpsitaṃ te kariṣyāmi dṛṣṭaṃ hyetatsanātanam | bhrātuḥ putrānpradāsyāmi mitrāvaruṇayoḥ samān

"मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, क्योंकि यह सनातन काल से देखी गई रीति है। मैं अपने भाई को मित्र और वरुण के समान पुत्र दूँगा।"

श्लोक 65 (1.114.65)

व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया । संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः ॥

vrataṃ caretāṃ te devyau nirdiṣṭamiha yanmayā | saṃvatsaraṃ yathānyāyaṃ tataḥ śuddhe bhaviṣyataḥ

"दोनों रानियाँ एक वर्ष तक, जैसा उचित है, मेरे बताए हुए व्रत का पालन करें; तब वे शुद्ध हो जाएँगी।"

श्लोक 66 (1.114.66)

नहि मामव्रतोपेता उपेयात्काचिदङ्गना ॥

nahi māmavratopetā upeyātkācidaṅganā

"क्योंकि जिस स्त्री ने व्रत नहीं किया, वह मेरे पास नहीं आ सकती।"

सत्यवत्युवाच

श्लोक 67 (1.114.67)

सद्यो यथा प्रपद्येते देव्यौ गर्भं तथा कुरु ॥

sadyo yathā prapadyete devyau garbhaṃ tathā kuru

सत्यवती ने कहा — "ऐसा करो जिससे दोनों रानियाँ तुरंत गर्भ धारण करें।"

श्लोक 68 (1.114.68)

अराजकेषु राष्ट्रेषु प्रजाऽनाथा विनश्यति । नश्यन्ति च क्रियाः सर्वा नास्ति वृष्टिर्न देवता ॥

arājakeṣu rāṣṭreṣu prajā'nāthā vinaśyati | naśyanti ca kriyāḥ sarvā nāsti vṛṣṭirna devatā

"राजा के बिना राज्यों में प्रजा अनाथ होकर नष्ट हो जाती है; सारे यज्ञ-कर्म लुप्त हो जाते हैं; न वर्षा होती है, न देवता रहते हैं।"

श्लोक 69 (1.114.69)

कथं चाराजकं राष्ट्रं शक्यं धारयितुं प्रभो । तस्माद्गर्भं समाधत्स्व भीष्मः संवर्धयिष्यति ॥

kathaṃ cārājakaṃ rāṣṭraṃ śakyaṃ dhārayituṃ prabho | tasmādgarbhaṃ samādhatsva bhīṣmaḥ saṃvardhayiṣyati

"हे प्रभु, बिना राजा का राज्य कैसे सँभाला जा सकता है? इसलिए गर्भ स्थापित करो; भीष्म उसका पालन-पोषण करेंगे।"

व्यास उवाच

श्लोक 70 (1.114.70)

यदि पुत्रः प्रदातव्यो मया भ्रातुरकालिकः । विरूपतां मे सहतां तयोरेतत्परं व्रतम् ॥

yadi putraḥ pradātavyo mayā bhrāturakālikaḥ | virūpatāṃ me sahatāṃ tayoretatparaṃ vratam

व्यास ने कहा — "यदि मुझे अपने भाई को असमय ही पुत्र देना है, तो वे मेरी कुरूपता को सहन करें; यही उनके लिए परम व्रत है।"

श्लोक 71 (1.114.71)

यदि मे सहते गन्धं रूपं वेषं तथा वपुः । अद्यैव गर्भं कौसल्या विशिष्टं प्रतिपद्यताम् ॥

yadi me sahate gandhaṃ rūpaṃ veṣaṃ tathā vapuḥ | adyaiva garbhaṃ kausalyā viśiṣṭaṃ pratipadyatām

"यदि कौसल्या मेरी गन्ध, रूप, वेष और शरीर को सह ले, तो वह आज ही उत्तम गर्भ धारण करे।"

श्लोक 72 (1.114.72)

तस्यापि च शतं पुत्रा भवितारो न संशयः । गोप्तारः कुरुवंशस्य भवत्याः शोकनाशनाः ॥

tasyāpi ca śataṃ putrā bhavitāro na saṃśayaḥ | goptāraḥ kuruvaṃśasya bhavatyāḥ śokanāśanāḥ

"उसके भी सौ पुत्र होंगे, इसमें संदेह नहीं; वे कुरुवंश के रक्षक और आपके शोक का नाश करने वाले होंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 73 (1.114.73)

एवमुक्त्वा महातेजा व्यासः सत्यवतीं तदा । शयने सा च कौसल्या शुचिवस्त्रा ह्यलङ्कृता ॥

evamuktvā mahātejā vyāsaḥ satyavatīṃ tadā | śayane sā ca kausalyā śucivastrā hyalaṅkṛtā

वैशम्पायन ने कहा — सत्यवती से ऐसा कहकर महातेजस्वी व्यास बोले — "कौसल्या स्वच्छ वस्त्र पहनकर और अलंकृत होकर शय्या पर

श्लोक 74 (1.114.74)

समागमनमाकाङ्क्षेदिति सोऽन्तर्हितो मुनिः । ततोऽभिगम्य सा देवी स्नुषां रहसि संगताम् ॥

samāgamanamākāṅkṣediti so'ntarhito muniḥ | tato'bhigamya sā devī snuṣāṃ rahasi saṃgatām

मेरे आगमन की प्रतीक्षा करे" — यह कहकर मुनि अन्तर्धान हो गए। तब देवी सत्यवती अपनी पुत्रवधू के पास गईं और एकान्त में उससे मिलकर

श्लोक 75 (1.114.75)

धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचनं हितम् । कौसल्ये धर्मतन्त्रं त्वां यद्ब्रवीमि निबोध तत् ॥

dharmyamarthasamāyuktamuvāca vacanaṃ hitam | kausalye dharmatantraṃ tvāṃ yadbravīmi nibodha tat

उससे धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन कहे — "कौसल्या, मैं तुमसे जो धर्मसम्मत बात कहती हूँ, उसे समझो।"

सत्यवत्युवाच

श्लोक 76 (1.114.76)

भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात् । व्यथितां मां च संप्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम् ॥

bharatānāṃ samucchedo vyaktaṃ madbhāgyasaṃkṣayāt | vyathitāṃ māṃ ca saṃprekṣya pitṛvaṃśaṃ ca pīḍitam

"स्पष्ट है कि मेरे भाग्य के क्षीण होने से भरतवंश का उच्छेद हो रहा है। मुझे व्यथित और पितरों के वंश को पीड़ित देखकर"

श्लोक 77 (1.114.77)

भीष्मो बुद्धिमदान्मह्यं कुलस्यास्य विवृद्धये । सा च बुद्धिस्त्वय्यधीना पुत्रि प्रापय मां तथा ॥

bhīṣmo buddhimadānmahyaṃ kulasyāsya vivṛddhaye | sā ca buddhistvayyadhīnā putri prāpaya māṃ tathā

"भीष्म ने इस कुल की वृद्धि के लिए मुझे एक उपाय सुझाया है। पर पुत्री, वह उपाय तुम्हारे अधीन है; उसे पूरा करने में मेरी सहायता करो।"

श्लोक 78 (1.114.78)

नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर । पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम् ॥

naṣṭaṃ ca bhārataṃ vaṃśaṃ punareva samuddhara | putraṃ janaya suśroṇi devarājasamaprabham

"नष्ट होते भरतवंश का फिर से उद्धार करो। हे सुन्दरी, देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दो।"

श्लोक 79 (1.114.79)

स हि राज्यधुरं गुर्वीमुद्वक्ष्यति कुलस्य नः । एवमुक्त्वा तु सा देवी स्नुषां सत्यवती तदा ॥

sa hi rājyadhuraṃ gurvīmudvakṣyati kulasya naḥ | evamuktvā tu sā devī snuṣāṃ satyavatī tadā

"वही हमारे कुल के राज्य का भारी भार उठाएगा।" अपनी पुत्रवधू से ऐसा कहकर देवी सत्यवती ने तब

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 80 (1.114.80)

सा धर्मतोऽनुनीयैनां कथंचिद्धर्मचारिणीम् । भोजयामास विप्रांश्च देवर्षीनतिथींस्तथा ॥

sā dharmato'nunīyaināṃ kathaṃciddharmacāriṇīm | bhojayāmāsa viprāṃśca devarṣīnatithīṃstathā

धर्म का हवाला देकर उस धर्मपरायणा राजकुमारी को किसी प्रकार मना लिया, और ब्राह्मणों, देवर्षियों तथा अतिथियों को भोजन कराया।

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