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आदि पर्व · अध्याय 115

धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का जन्म

व्यास आधी रात को अम्बिका (कौसल्या) के पास आते हैं; वह उनका रूप देखकर भय से आँखें मूँद लेती है, और व्यास बताते हैं कि उसका बलशाली पुत्र अन्धा होगा — यही धृतराष्ट्र हैं। सत्यवती दूसरे राजा की याचना करती हैं; अम्बालिका ऋषि को देखकर पीली पड़ जाती है, इसलिए उसका पुत्र पीत वर्ण का होता है और पाण्डु कहलाता है, जो पाँच पाण्डवों के पिता होंगे। अम्बिका को फिर भेजे जाने पर वह अपने स्थान पर एक दासी को भेज देती है, जो प्रेम से ऋषि की सेवा करती है और विदुर को जन्म देती है — माण्डव्य के शाप से पृथ्वी पर जन्मे स्वयं धर्मदेव। व्यास माता को इस छल की बात बताकर चले जाते हैं।

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.115.1)

ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा । संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत् ॥

tataḥ satyavatī kāle vadhūṃ snātāmṛtau tadā | saṃveśayantī śayane śanairvacanamabravīt

वैशम्पायन ने कहा — तब उचित समय पर, जब पुत्रवधू ऋतुस्नान कर चुकी थी, सत्यवती ने उसे शय्या पर लिटाते हुए धीरे से कहा —

सत्यवत्युवाच

श्लोक 2 (1.115.2)

कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वाऽनुप्रवेक्ष्यति । अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे ह्यागमिष्यति ॥

kausalye devaraste'sti so'dya tvā'nupravekṣyati | apramattā pratīkṣainaṃ niśīthe hyāgamiṣyati

"कौसल्या, तुम्हारे एक देवर हैं; वे आज तुम्हारे पास आएँगे। सावधान होकर उनकी प्रतीक्षा करना; वे आधी रात को आएँगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.115.3)

श्वश्र्वास्तद्वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे । साऽचिन्तयत्तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान् ॥

śvaśrvāstadvacanaṃ śrutvā śayānā śayane śubhe | sā'cintayattadā bhīṣmamanyāṃśca kurupuṅgavān

सास की बात सुनकर वह सुन्दर शय्या पर लेटी हुई भीष्म और अन्य कुरुश्रेष्ठों का ध्यान करने लगी।

श्लोक 4 (1.115.4)

ततः सुप्तजनप्रायेऽर्धरात्रे भगवानृषिः । दीप्यमानेषु दीपेषु शरणं प्रविवेश ह ॥

tataḥ suptajanaprāye'rdharātre bhagavānṛṣiḥ | dīpyamāneṣu dīpeṣu śaraṇaṃ praviveśa ha

फिर आधी रात को, जब लगभग सब लोग सो चुके थे, दीपकों के जलते रहते भगवान ऋषि ने कक्ष में प्रवेश किया।

श्लोक 5 (1.115.5)

ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृषिः । जगाम तस्याः शयनं विपुले तपसि स्थितः ॥

tato'mbikāyāṃ prathamaṃ niyuktaḥ satyavāgṛṣiḥ | jagāma tasyāḥ śayanaṃ vipule tapasi sthitaḥ

पहले अम्बिका के लिए नियुक्त सत्यवादी ऋषि, अपने महान तप में स्थित रहते हुए, उसकी शय्या के पास गए।

श्लोक 6 (1.115.6)

तं समीक्ष्य तु कौसल्या दुष्प्रेक्षमतथोचिता । विरूप इति वित्रस्ता संकुच्यासीन्निमीलिता ॥

taṃ samīkṣya tu kausalyā duṣprekṣamatathocitā | virūpa iti vitrastā saṃkucyāsīnnimīlitā

उन्हें, जिन्हें देखना भी कठिन था, देखकर ऐसे दृश्य की अनभ्यस्त कौसल्या 'यह कुरूप है' सोचकर डर गई और सिमटकर आँखें मूँद लीं।

श्लोक 7 (1.115.7)

विरूपो हि जटी चापि दुर्वर्णः परुषः कृशः । सुगन्धेतरगन्धश्च सर्वथा दुष्प्रधर्षणः ॥

virūpo hi jaṭī cāpi durvarṇaḥ paruṣaḥ kṛśaḥ | sugandhetaragandhaśca sarvathā duṣpradharṣaṇaḥ

क्योंकि वे कुरूप, जटाधारी, मलिन वर्ण वाले, रूखे और दुबले थे; उनकी देह से सुगन्ध नहीं, दुर्गन्ध आती थी — वे सब प्रकार से दुःसह थे।

श्लोक 8 (1.115.8)

तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने । बभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत् ॥

tasya kṛṣṇasya kapilāṃ jaṭāṃ dīpte ca locane | babhrūṇi caiva śmaśrūṇi dṛṣṭvā devī nyamīlayat

कृष्णद्वैपायन की कपिल जटाएँ, दहकते नेत्र और भूरी दाढ़ी-मूँछ देखकर रानी ने आँखें बंद कर लीं।

श्लोक 9 (1.115.9)

संबभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया । भयात्काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षितुम् ॥

saṃbabhūva tayā sārdhaṃ mātuḥ priyacikīrṣayā | bhayātkāśisutā taṃ tu nāśaknodabhivīkṣitum

माता का प्रिय करने की इच्छा से वे उसके साथ समागम में प्रवृत्त हुए; पर काशिराज की पुत्री भय के कारण उनकी ओर देख न सकी।

श्लोक 10 (1.115.10)

ततो निष्क्रान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह । अप्यस्यां गुणवान्पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ॥

tato niṣkrāntamāgamya mātā putramuvāca ha | apyasyāṃ guṇavānputra rājaputro bhaviṣyati

जब वे बाहर निकले, तो माता ने पुत्र के पास आकर कहा — "पुत्र, क्या इससे गुणवान राजकुमार उत्पन्न होगा?"

श्लोक 11 (1.115.11)

निशम्य तद्वचो मातुर्व्यासः सत्यवतीसुतः । प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना संप्रचोदितः ॥

niśamya tadvaco māturvyāsaḥ satyavatīsutaḥ | provācātīndriyajñāno vidhinā saṃpracoditaḥ

माता का वचन सुनकर अतीन्द्रिय ज्ञान वाले सत्यवतीनन्दन व्यास ने विधि की प्रेरणा से कहा —

व्यास उवाच

श्लोक 12 (1.115.12)

नागायुतसमप्राणो विद्वान्राजर्षिसत्तमः । महाभागो महावीर्यो महाबुद्धिर्भविष्यति ॥

nāgāyutasamaprāṇo vidvānrājarṣisattamaḥ | mahābhāgo mahāvīryo mahābuddhirbhaviṣyati

"वह दस हज़ार हाथियों के समान बलवान, विद्वान, राजर्षियों में श्रेष्ठ, महाभाग, महापराक्रमी और महाबुद्धिमान होगा।"

श्लोक 13 (1.115.13)

तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः । किंतु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ॥

tasya cāpi śataṃ putrā bhaviṣyanti mahātmanaḥ | kiṃtu mātuḥ sa vaiguṇyādandha eva bhaviṣyati

"उस महात्मा के भी सौ पुत्र होंगे। किन्तु माता के दोष के कारण वह अन्धा ही होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (1.115.14)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाऽब्रवीत् । नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā mātā putramathā'bravīt | nāndhaḥ kurūṇāṃ nṛpatiranurūpastapodhana

उनकी यह बात सुनकर माता ने पुत्र से कहा — "हे तपोधन, अन्धा व्यक्ति कुरुओं का राजा होने योग्य नहीं है,"

सत्यवत्युवाच

श्लोक 15 (1.115.15)

ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् । अपरस्यामपि पुनर्मम शोकविनाशनम् ॥

jñātivaṃśasya goptāraṃ pitṝṇāṃ vaṃśavardhanam | aparasyāmapi punarmama śokavināśanam

"न ही जाति-बन्धुओं और वंश का रक्षक तथा पितरों के वंश को बढ़ाने वाला बन सकता है। अतः दूसरी पत्नी से भी फिर मेरे शोक को मिटाने वाला"

श्लोक 16 (1.115.16)

तस्मादवरजं पुत्रं जनयान्यं नराधिपम् । भ्रातुर्भार्याऽवरा चेयं रूपयौवनशालिनी ॥

tasmādavarajaṃ putraṃ janayānyaṃ narādhipam | bhrāturbhāryā'varā ceyaṃ rūpayauvanaśālinī

"एक और, छोटा पुत्र उत्पन्न करो, जो नरेश बने। तुम्हारे भाई की यह छोटी पत्नी रूप और यौवन से सुशोभित है।"

श्लोक 17 (1.115.17)

अस्यामुत्पादयाऽपत्यं मन्नियोगाद्गुणाधिकम् । द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि ॥

asyāmutpādayā'patyaṃ manniyogādguṇādhikam | dvitīyaṃ kuruvaṃśasya rājānaṃ dātumarhasi

"मेरी आज्ञा से इससे अधिक गुणवान संतान उत्पन्न करो। तुम्हें कुरुवंश को दूसरा राजा देना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (1.115.18)

स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशाः । साऽपि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम् ॥

sa tatheti pratijñāya niścakrāma mahāyaśāḥ | sā'pi kālena kausalyā suṣuve'ndhaṃ tamātmajam

"ऐसा ही हो" कहकर वे महायशस्वी मुनि चले गए। और समय आने पर कौसल्या ने उस अन्धे पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 19 (1.115.19)

पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः । ऋषिमावाहयत्सत्या यथापूर्वमरिन्दम ॥

punareva tu sā devī paribhāṣya snuṣāṃ tataḥ | ṛṣimāvāhayatsatyā yathāpūrvamarindama

हे शत्रुदमन, फिर देवी सत्यवती ने पुत्रवधू को समझाकर पहले की भाँति ऋषि का आवाहन किया।

श्लोक 20 (1.115.20)

अम्बालिकां समाहूय तस्यां सत्यवती सुतम् । भूयो नियोजयामास सन्तानाय कुलस्य वै ॥

ambālikāṃ samāhūya tasyāṃ satyavatī sutam | bhūyo niyojayāmāsa santānāya kulasya vai

अम्बालिका को बुलाकर सत्यवती ने कुल की संतान के लिए फिर अपने पुत्र को उसके लिए नियुक्त किया।

श्लोक 21 (1.115.21)

विषण्णाम्बालिका साध्वी निषण्णा शयनोत्तमे । कोन्वेष्यतीति ध्यायन्ती नियतां संप्रतीक्षते ॥

viṣaṇṇāmbālikā sādhvī niṣaṇṇā śayanottame | konveṣyatīti dhyāyantī niyatāṃ saṃpratīkṣate

साध्वी अम्बालिका उदास होकर उत्तम शय्या पर बैठी, 'कौन आएगा?' यह सोचती हुई संयम से प्रतीक्षा करती रही।

श्लोक 22 (1.115.22)

ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत । अम्बालिकामथाऽभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च साऽपि तम् ॥

tatastenaiva vidhinā maharṣistāmapadyata | ambālikāmathā'bhyāgādṛṣiṃ dṛṣṭvā ca sā'pi tam

तब उसी विधि से महर्षि उसके पास पहुँचे। वे अम्बालिका के पास गए, और उसने भी ऋषि को देखकर

श्लोक 23 (1.115.23)

विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत । तां भीतां पाण्डुसंकाशां विषण्णां प्रेक्ष्य भारत ॥

vivarṇā pāṇḍusaṃkāśā samapadyata bhārata | tāṃ bhītāṃ pāṇḍusaṃkāśāṃ viṣaṇṇāṃ prekṣya bhārata

हे भारत, वह विवर्ण होकर पीली पड़ गई। हे भारत, उसे भयभीत, पीली और उदास देखकर

श्लोक 24 (1.115.24)

व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् । यस्मात्पाण्डुत्वमापन्ना विरूपं प्रेक्ष्य मामिह ॥

vyāsaḥ satyavatīputra idaṃ vacanamabravīt | yasmātpāṇḍutvamāpannā virūpaṃ prekṣya māmiha

सत्यवतीपुत्र व्यास ने यह वचन कहा — "क्योंकि मुझ कुरूप को यहाँ देखकर तुम पीली पड़ गईं,"

व्यास उवाच

श्लोक 25 (1.115.25)

तस्मादेष सुतस्ते वै पाण्डुरेव भविष्यति । नाम चास्यैतदेवेह भविष्यति शुभानने ॥

tasmādeṣa sutaste vai pāṇḍureva bhaviṣyati | nāma cāsyaitadeveha bhaviṣyati śubhānane

"इसलिए तुम्हारा यह पुत्र पाण्डु वर्ण का ही होगा, और हे सुमुखी, उसका नाम भी 'पाण्डु' ही होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (1.115.26)

इत्युक्त्वा स निराक्रामद्भगवानृषिसत्तमः । ततो निष्क्रान्तमालोक्य सत्या पुत्रमथाऽब्रवीत् ॥

ityuktvā sa nirākrāmadbhagavānṛṣisattamaḥ | tato niṣkrāntamālokya satyā putramathā'bravīt

यह कहकर ऋषिश्रेष्ठ भगवान व्यास बाहर निकल गए। उन्हें बाहर आया देखकर सत्यवती ने पुत्र से कहा —

सत्यवत्युवाच

श्लोक 27 (1.115.27)

कुमारो ब्रूहि मे पुत्र अप्यत्र भविता शुभः । शशंस स पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पाण्डुताम् ॥

kumāro brūhi me putra apyatra bhavitā śubhaḥ | śaśaṃsa sa punarmātre tasya bālasya pāṇḍutām

"पुत्र, मुझे बताओ — क्या यहाँ जन्म लेने वाला कुमार शुभ होगा?" तब उन्होंने माता को उस बालक के पीलेपन के विषय में बताया —

व्यास उवाच

श्लोक 28 (1.115.28)

भविष्यति सुविक्रान्तः कुमारो दिक्षु विश्रुतः । पाण्डुत्वं वर्णतस्तस्य मातृदोषाद्भविष्यति ॥

bhaviṣyati suvikrāntaḥ kumāro dikṣu viśrutaḥ | pāṇḍutvaṃ varṇatastasya mātṛdoṣādbhaviṣyati

"वह कुमार अत्यन्त पराक्रमी और सब दिशाओं में विख्यात होगा; पर माता के दोष से उसका वर्ण पीला होगा।"

श्लोक 29 (1.115.29)

तस्य पुत्रा महेष्वासा भविष्यन्तीह पञ्च वै । इत्युक्त्वा मातरं तत्र सोऽभिवाद्य जगाम ह ॥

tasya putrā maheṣvāsā bhaviṣyantīha pañca vai | ityuktvā mātaraṃ tatra so'bhivādya jagāma ha

"यहाँ उसके पाँच महाधनुर्धर पुत्र होंगे।" ऐसा कहकर उन्होंने वहाँ माता को प्रणाम किया और चले गए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (1.115.30)

तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत । तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत ॥

taṃ mātā punarevānyamekaṃ putramayācata | tatheti ca maharṣistāṃ mātaraṃ pratyabhāṣata

माता ने उनसे फिर एक और पुत्र माँगा, और महर्षि ने माता से कहा — "ऐसा ही हो।"

श्लोक 31 (1.115.31)

ततः कुमारं सा देवी प्राप्तकालमजीजनत् । पाण्डुलक्षणसंपन्नं दीप्यमानमिव श्रिया ॥

tataḥ kumāraṃ sā devī prāptakālamajījanat | pāṇḍulakṣaṇasaṃpannaṃ dīpyamānamiva śriyā

फिर समय आने पर उस रानी ने एक कुमार को जन्म दिया, जो पाण्डु वर्ण के लक्षणों से युक्त और मानो श्री से दीप्त था,

श्लोक 32 (1.115.32)

यस्य पुत्रा महेष्वासा जज्ञिरे पञ्च पाण्डवाः । तयोर्जन्मक्रियाः सर्वा यथावदनुपूर्वशः ॥

yasya putrā maheṣvāsā jajñire pañca pāṇḍavāḥ | tayorjanmakriyāḥ sarvā yathāvadanupūrvaśaḥ

जिसके पुत्र पाँच महाधनुर्धर पाण्डव हुए। उन दोनों बालकों के सभी जन्म-संस्कार यथाविधि क्रमशः

श्लोक 33 (1.115.33)

कारयामास वै भीष्मो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । अन्धं दृष्ट्वाऽम्बिकापुत्रं जातं सत्यवती सुतम् ॥

kārayāmāsa vai bhīṣmo brāhmaṇairvedapāragaiḥ | andhaṃ dṛṣṭvā'mbikāputraṃ jātaṃ satyavatī sutam

भीष्म ने वेदपारंगत ब्राह्मणों से करवाए। अम्बिका के पुत्र को अन्धा उत्पन्न हुआ देखकर सत्यवती ने

श्लोक 34 (1.115.34)

कौसल्यार्थे समाहूय पुत्रमन्यमयाचत । अन्धोऽयमन्यमिच्छामि कौसल्यातनयं शुभम् ॥

kausalyārthe samāhūya putramanyamayācata | andho'yamanyamicchāmi kausalyātanayaṃ śubham

अपने पुत्र को बुलाकर कौसल्या के लिए एक और पुत्र माँगा — "यह तो अन्धा है; मैं कौसल्या से एक और शुभ पुत्र चाहती हूँ।"

श्लोक 35 (1.115.35)

एवमुक्तो महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत । नियता यदि कौसल्या भविष्यति पुनःशुभा ॥

evamukto maharṣistāṃ mātaraṃ pratyabhāṣata | niyatā yadi kausalyā bhaviṣyati punaḥśubhā

ऐसा कहे जाने पर महर्षि ने माता से कहा — "यदि कौसल्या फिर से संयमित और शुद्ध होगी,"

व्यास उवाच

श्लोक 36 (1.115.36)

भविष्यति कुमारोऽस्या धर्मशास्त्रार्थतत्ववित् । तां समाधाय वै भूयः स्नुषां सत्यवती पुनः ॥

bhaviṣyati kumāro'syā dharmaśāstrārthatatvavit | tāṃ samādhāya vai bhūyaḥ snuṣāṃ satyavatī punaḥ

"तो उससे धर्मशास्त्र के अर्थ और तत्त्व को जानने वाला कुमार उत्पन्न होगा।" अपनी पुत्रवधू को फिर से समझा-बुझाकर सत्यवती ने

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (1.115.37)

ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजयत् । सा तु रूपं च गन्धं च महर्षेः प्रविचिन्त्य तं ॥

ṛtukāle tato jyeṣṭhāṃ vadhūṃ tasmai nyayojayat | sā tu rūpaṃ ca gandhaṃ ca maharṣeḥ pravicintya taṃ

फिर ऋतुकाल में बड़ी पुत्रवधू को उनके लिए नियुक्त किया। किन्तु वह महर्षि के रूप और गन्ध का स्मरण करके

श्लोक 38 (1.115.38)

नाकरोद्वचनं देव्या भयात्सुरसुतोपमा । ततःस्वैर्भूषणैर्दासीं भूषयित्वाऽप्सरोपमाम् ॥

nākarodvacanaṃ devyā bhayātsurasutopamā | tataḥsvairbhūṣaṇairdāsīṃ bhūṣayitvā'psaropamām

देवकन्या के समान उस राजकुमारी ने भय के कारण देवी सत्यवती की बात नहीं मानी। उसने अपने आभूषणों से अप्सरा-सी सुन्दर एक दासी को सजाया

श्लोक 39 (1.115.39)

प्रेषयामास कृष्णाय ततः काशिपतेः सुता । सा तं त्वृषिमनुप्राप्तं प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ॥

preṣayāmāsa kṛṣṇāya tataḥ kāśipateḥ sutā | sā taṃ tvṛṣimanuprāptaṃ pratyudgamyābhivādya ca

और काशिराज की उस पुत्री ने उसे कृष्णद्वैपायन के पास भेज दिया। ऋषि के आने पर दासी ने उठकर उनकी अगवानी की और प्रणाम करके

श्लोक 40 (1.115.40)

संविवेशाभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार ह । वाग्भावोपप्रदानेन गात्रसंस्पर्शनेन च ॥

saṃviveśābhyanujñātā satkṛtyopacacāra ha | vāgbhāvopapradānena gātrasaṃsparśanena ca

उनकी अनुमति से उनके साथ शय्या पर गई और आदरपूर्वक उनकी सेवा की — मधुर वाणी, प्रेमभाव और अंग-स्पर्श से।

श्लोक 41 (1.115.41)

कामोपभोगेन रहस्तस्यां तुष्टिमगादृषिः । तया सहोषितो राजन्महर्षिः संशितव्रतः ॥

kāmopabhogena rahastasyāṃ tuṣṭimagādṛṣiḥ | tayā sahoṣito rājanmaharṣiḥ saṃśitavrataḥ

एकान्त में उसके साथ काम-सुख पाकर ऋषि संतुष्ट हुए। हे राजन्, उसके साथ रहकर कठोर व्रत वाले महर्षि ने

श्लोक 42 (1.115.42)

उत्तिष्ठन्नब्रवीदेनामभुजिष्या भविष्यसि । अयं च ते शुभे गर्भः श्रेयानुदरमागतः । धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतां वरः ॥

uttiṣṭhannabravīdenāmabhujiṣyā bhaviṣyasi | ayaṃ ca te śubhe garbhaḥ śreyānudaramāgataḥ | dharmātmā bhavitā loke sarvabuddhimatāṃ varaḥ

उठते हुए उससे कहा — "अब तुम दासी नहीं रहोगी। हे शुभे, तुम्हारे गर्भ में यह श्रेष्ठ शिशु आया है; यह संसार में धर्मात्मा और सब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगा।"

श्लोक 43 (1.115.43)

स जज्ञे विदुरो नाम कृष्णद्वैपायनात्मजः । धृतराष्ट्रस्य वै भ्राता पाण्डोश्चैव महात्मनः ॥

sa jajñe viduro nāma kṛṣṇadvaipāyanātmajaḥ | dhṛtarāṣṭrasya vai bhrātā pāṇḍoścaiva mahātmanaḥ

वह विदुर नाम से उत्पन्न हुआ — कृष्णद्वैपायन का पुत्र, धृतराष्ट्र और महात्मा पाण्डु का भाई।

श्लोक 44 (1.115.44)

धर्मो विदुररूपेण शापात्तस्य महात्मनः । माण्डव्यस्यार्थतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः ॥

dharmo vidurarūpeṇa śāpāttasya mahātmanaḥ | māṇḍavyasyārthatattvajñaḥ kāmakrodhavivarjitaḥ

महात्मा माण्डव्य के शाप से स्वयं धर्म ही विदुर के रूप में उत्पन्न हुए थे, जो अर्थ के तत्त्व को जानने वाले और काम-क्रोध से रहित थे।

श्लोक 45 (1.115.45)

कृष्णद्वैपायनोऽप्येतत्सत्यवत्यै न्यवेदयत् । प्रलम्भमात्मनश्चैव शूद्रायाः पुत्रजन्म च ॥

kṛṣṇadvaipāyano'pyetatsatyavatyai nyavedayat | pralambhamātmanaścaiva śūdrāyāḥ putrajanma ca

कृष्णद्वैपायन ने यह सब सत्यवती को बता दिया — अपने साथ हुआ छल और शूद्रा स्त्री से पुत्र का जन्म।

श्लोक 46 (1.115.46)

स धर्मस्यानृणो भूत्वा पुनर्मात्रा समेत्य च । तस्यै गर्भं समावेद्य तत्रैवान्तरधीयत ॥

sa dharmasyānṛṇo bhūtvā punarmātrā sametya ca | tasyai garbhaṃ samāvedya tatraivāntaradhīyata

धर्म के ऋण से मुक्त होकर वे फिर माता से मिले, उन्हें गर्भ के विषय में बताया, और वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 47 (1.115.47)

एते विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रे द्वैपायनादपि । जज्ञिरे देवगर्भाभाः कुरुवंशविवर्धनाः ॥

ete vicitravīryasya kṣetre dvaipāyanādapi | jajñire devagarbhābhāḥ kuruvaṃśavivardhanāḥ

इस प्रकार विचित्रवीर्य के क्षेत्र में द्वैपायन से ये देवपुत्रों के समान तेजस्वी, कुरुवंश को बढ़ाने वाले पुत्र उत्पन्न हुए।

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