आदि पर्व · अध्याय 116
माण्डव्य का शूलारोपण
जनमेजय पूछते हैं कि धर्म ने ऐसा क्या किया था कि उन्हें शाप मिला और वे शूद्रा के गर्भ से जन्मे। वैशम्पायन तपस्वी ब्राह्मण माण्डव्य की कथा सुनाते हैं, जो अपने आश्रम के द्वार पर मौन तप में खड़े थे, जब राजा के रक्षकों से भागते लुटेरों ने वहाँ अपना लूटा हुआ धन छिपा दिया। रक्षकों को उत्तर न देने के कारण वे लुटेरों के साथ पकड़े गए और राजा की आज्ञा से शूल पर चढ़ा दिए गए, फिर भी तप के बल से उनकी मृत्यु नहीं हुई; ऋषि रात में पक्षियों का रूप धरकर उनके पास आए और पूछा कि किस पाप से उन्हें यह दशा मिली।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.116.1)
किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेयिवान् । कस्य शापाच्च ब्रह्मर्षेः शूद्रयोनावजायत ॥
kiṃ kṛtaṃ karma dharmeṇa yena śāpamupeyivān | kasya śāpācca brahmarṣeḥ śūdrayonāvajāyata
जनमेजय ने कहा — "धर्म ने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिससे उन्हें शाप मिला? और किस ब्रह्मर्षि के शाप से वे शूद्र-योनि में जन्मे?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (1.116.2)
बभूव ब्राह्मणः कश्चिन्माण्डव्य इति विश्रुतः । धृतिमान्सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ॥
babhūva brāhmaṇaḥ kaścinmāṇḍavya iti viśrutaḥ | dhṛtimānsarvadharmajñaḥ satye tapasi ca sthitaḥ
वैशम्पायन ने कहा — माण्डव्य नाम से विख्यात एक ब्राह्मण थे। वे धैर्यवान, सम्पूर्ण धर्म के ज्ञाता तथा सत्य और तप में दृढ़ थे।
श्लोक 3 (1.116.3)
स तीर्थयात्रां विचरन्नाजगाम यदृच्छया । संनिकृष्टानि तीर्थानि ग्रामाणां यानि कानि च । तत्राश्रमपदं कृत्वा वसति स्म महामुनिः ॥
sa tīrthayātrāṃ vicarannājagāma yadṛcchayā | saṃnikṛṣṭāni tīrthāni grāmāṇāṃ yāni kāni ca | tatrāśramapadaṃ kṛtvā vasati sma mahāmuniḥ
तीर्थयात्रा करते हुए वे संयोगवश कुछ गाँवों के निकट स्थित तीर्थों में आ पहुँचे। वहाँ उस महामुनि ने आश्रम बनाया और रहने लगे।
श्लोक 4 (1.116.4)
स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः । ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी तस्थौ मौनव्रतान्वितः ॥
sa āśramapadadvāri vṛkṣamūle mahātapāḥ | ūrdhvabāhurmahāyogī tasthau maunavratānvitaḥ
अपने आश्रम के द्वार पर एक वृक्ष के नीचे वह महातपस्वी, महायोगी मौन-व्रत धारण कर भुजाएँ ऊपर उठाए खड़े रहते थे।
श्लोक 5 (1.116.5)
तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि वर्ततः । तमाश्रममनुप्राप्ता दस्यवो लोप्त्रहारिणः ॥
tasya kālena mahatā tasmiṃstapasi vartataḥ | tamāśramamanuprāptā dasyavo loptrahāriṇaḥ
बहुत समय तक उनके उस तप में लगे रहने पर चोरी का माल लिए कुछ लुटेरे उस आश्रम में आ पहुँचे।
श्लोक 6 (1.116.6)
अनुसार्यमाणा बहुभी रक्षिभिर्भरतर्षभ । तामेव वसतिं जग्मुस्ते ग्रामाल्लोप्त्रहारिणः ॥
anusāryamāṇā bahubhī rakṣibhirbharatarṣabha | tāmeva vasatiṃ jagmuste grāmālloptrahāriṇaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, बहुत-से रक्षक उनका पीछा कर रहे थे। गाँव से माल लूटकर लाए वे चोर उसी निवास में जा पहुँचे,
श्लोक 7 (1.116.7)
यस्मिन्नावसथे शेते स मुनिः संशितव्रतः । ते तस्यावसथे लोप्त्रं दस्यवः कुरुसत्तम ॥
yasminnāvasathe śete sa muniḥ saṃśitavrataḥ | te tasyāvasathe loptraṃ dasyavaḥ kurusattama
जिसमें कठोर व्रत वाले वे मुनि रहते थे। हे कुरुश्रेष्ठ, उन लुटेरों ने उनके निवास में
श्लोक 8 (1.116.8)
निधाय च भयाल्लीनास्तत्रैवानागते बले । तेषु लीनेष्वथो शीघ्रं ततस्तद्रक्षिणां बलम् ॥
nidhāya ca bhayāllīnāstatraivānāgate bale | teṣu līneṣvatho śīghraṃ tatastadrakṣiṇāṃ balam
वह चोरी का धन रख दिया और रक्षक-दल के पहुँचने से पहले ही भय के मारे वहीं छिप गए। उनके छिप जाने के बाद रक्षकों का वह दल शीघ्र ही
श्लोक 9 (1.116.9)
आजगाम ततोऽपश्यंस्तमृषिं तस्करानुगाः । तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् ॥
ājagāma tato'paśyaṃstamṛṣiṃ taskarānugāḥ | tamapṛcchaṃstato rājaṃstathāvṛttaṃ tapodhanam
वहाँ आ पहुँचा। चोरों का पीछा करने वालों ने उन ऋषि को देखा और, हे राजन्, वैसे ही खड़े उस तपोधन से पूछा —
श्लोक 10 (1.116.10)
कतरेण पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम । तेन गच्छामहे ब्रह्मन्यथा शीघ्रतरं वयम् ॥
katareṇa pathā yātā dasyavo dvijasattama | tena gacchāmahe brahmanyathā śīghrataraṃ vayam
"हे द्विजश्रेष्ठ, लुटेरे किस मार्ग से गए हैं? हे ब्रह्मन्, बताइए, ताकि हम उसी मार्ग से और भी शीघ्र जा सकें।"
श्लोक 11 (1.116.11)
तथा तु रक्षिणां तेषां ब्रुवतां स तपोधनः । न किंचिद्वचनं राजन्नब्रवीत्साध्वसाधु वा ॥
tathā tu rakṣiṇāṃ teṣāṃ bruvatāṃ sa tapodhanaḥ | na kiṃcidvacanaṃ rājannabravītsādhvasādhu vā
रक्षकों के ऐसा कहने पर भी, हे राजन्, उस तपस्वी ने भला या बुरा कोई भी वचन नहीं कहा।
श्लोक 12 (1.116.12)
ततस्ते राजपुरुषा विचिन्वानास्तमाश्रमम् । ददृशुस्तत्र लीनांस्तांश्चोरांस्तद्द्रव्यमेव च ॥
tataste rājapuruṣā vicinvānāstamāśramam | dadṛśustatra līnāṃstāṃścorāṃstaddravyameva ca
तब राजा के उन सेवकों ने आश्रम की तलाशी ली और वहाँ छिपे हुए चोरों को तथा उस धन को भी पा लिया।
श्लोक 13 (1.116.13)
ततः शङ्का समभवद्रक्षिणां तं मुनिं प्रति । संयम्यैनं ततो राज्ञे दस्यूंश्चैव न्यवेदयन् ॥
tataḥ śaṅkā samabhavadrakṣiṇāṃ taṃ muniṃ prati | saṃyamyainaṃ tato rājñe dasyūṃścaiva nyavedayan
तब रक्षकों को उन मुनि पर संदेह हुआ। उन्होंने उन्हें बाँध लिया और लुटेरों के साथ उन्हें भी राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया।
श्लोक 14 (1.116.14)
तं राजा सह तैश्चोरैरन्वशाद्वध्यतामिति । स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ॥
taṃ rājā saha taiścorairanvaśādvadhyatāmiti | sa rakṣibhistairajñātaḥ śūle proto mahātapāḥ
राजा ने चोरों के साथ उन्हें भी मृत्युदण्ड देने की आज्ञा दी। उन रक्षकों ने उन्हें पहचाना नहीं, और वह महातपस्वी शूल पर चढ़ा दिए गए।
श्लोक 15 (1.116.15)
ततस्ते शूलमारोप्य तं मुनिं रक्षिणस्तदा । प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय तान्यथ ॥
tataste śūlamāropya taṃ muniṃ rakṣiṇastadā | pratijagmurmahīpālaṃ dhanānyādāya tānyatha
मुनि को शूल पर चढ़ाकर वे रक्षक वह धन लेकर राजा के पास लौट गए।
श्लोक 16 (1.116.16)
शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः । निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्यपद्यत ॥
śūlasthaḥ sa tu dharmātmā kālena mahatā tataḥ | nirāhāro'pi viprarṣirmaraṇaṃ nābhyapadyata
किंतु वह धर्मात्मा विप्रर्षि दीर्घ काल तक बिना आहार के शूल पर टँगे रहने पर भी मरे नहीं।
श्लोक 17 (1.116.17)
धारयामास च प्राणानृषींश्च समुपानयत् । शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना ॥
dhārayāmāsa ca prāṇānṛṣīṃśca samupānayat | śūlāgre tapyamānena tapastena mahātmanā
उन्होंने प्राणों को धारण किए रखा और ऋषियों को अपने पास बुला लिया। शूल की नोक पर कष्ट सहते हुए तप करने वाले उस महात्मा के कारण
श्लोक 18 (1.116.18)
सन्तापं परमं जग्मुर्मुनयस्तपसाऽन्विताः । ते रात्रौ शकुना भूत्वा सन्निपत्य तु भारत । दर्शयन्तो यथाशक्ति तमपृच्छन्द्विजोत्तमम् ॥
santāpaṃ paramaṃ jagmurmunayastapasā'nvitāḥ | te rātrau śakunā bhūtvā sannipatya tu bhārata | darśayanto yathāśakti tamapṛcchandvijottamam
तपस्वी मुनि अत्यन्त संतप्त हुए। हे भारत, वे रात में पक्षियों का रूप धरकर एकत्र हुए और यथाशक्ति अपने रूप प्रकट करते हुए उन्होंने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से पूछा —
श्लोक 19 (1.116.19)
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन्किं पापं कृतवानसि । येनेह समनुप्राप्तं शूले दुःखभयं महत् ॥
śrotumicchāmahe brahmankiṃ pāpaṃ kṛtavānasi | yeneha samanuprāptaṃ śūle duḥkhabhayaṃ mahat
"हे ब्रह्मन्, हम सुनना चाहते हैं कि आपने कौन-सा पाप किया है, जिसके कारण यहाँ शूल पर आपको यह महान दुःख और भय प्राप्त हुआ है।"