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आदि पर्व · अध्याय 117

माण्डव्य द्वारा धर्म को शाप

माण्डव्य ऋषियों से कहते हैं कि वे किसी और को दोष नहीं देते। उनका परिचय जानकर राजा उनसे क्षमा माँगता है और उन्हें नीचे उतरवाता है; शूल निकल नहीं पाता, इसलिए उसे काट दिया जाता है, और उसकी नोक शरीर में लिए वह मुनि 'अणीमाण्डव्य' कहलाते हैं। वे धर्मराज की सभा में जाकर अपना पाप पूछते हैं; यह सुनकर कि उन्होंने बचपन में पतंगों को सींक से बींधा था, वे यह मर्यादा स्थापित करते हैं कि चौदह वर्ष की आयु से पहले किया कर्म पाप नहीं गिना जाएगा, और धर्म को शूद्रा के गर्भ से जन्म लेने का शाप देते हैं। इसी से धर्म विदुर के रूप में जन्मे, जो धर्म और अर्थ में निपुण तथा कुरुओं के हित में तत्पर थे।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.117.1)

ततः स मुनिशार्दूलस्तानुवाच तपोधनान् । दोषतः कं गमिष्यामि न हि मेऽन्योपराध्यति ॥

tataḥ sa muniśārdūlastānuvāca tapodhanān | doṣataḥ kaṃ gamiṣyāmi na hi me'nyoparādhyati

तब उस मुनिश्रेष्ठ ने उन तपस्वियों से कहा — "मैं किसे दोष दूँ? मेरा अपराध किसी और ने नहीं किया है।"

श्लोक 2 (1.117.2)

तं दृष्ट्वा रक्षिणस्तत्र तथा बहुतिथेऽहनि । न्यवेदयंस्तथा राज्ञे यथावृत्तं नराधिप ॥

taṃ dṛṣṭvā rakṣiṇastatra tathā bahutithe'hani | nyavedayaṃstathā rājñe yathāvṛttaṃ narādhipa

हे नरेश, बहुत दिन बीत जाने पर भी उन्हें वहाँ वैसी ही दशा में देखकर रक्षकों ने राजा को सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया।

श्लोक 3 (1.117.3)

राजा च तमृषिं श्रुत्वा निष्क्रम्य सह मन्त्रिभिः । प्रसादयामास तदा शूलस्थमृषिसत्तमम् ॥

rājā ca tamṛṣiṃ śrutvā niṣkramya saha mantribhiḥ | prasādayāmāsa tadā śūlasthamṛṣisattamam

उन ऋषि के विषय में सुनकर राजा अपने मन्त्रियों के साथ बाहर निकले और शूल पर स्थित उस ऋषिश्रेष्ठ को प्रसन्न करने लगे।

राजोवाच

श्लोक 4 (1.117.4)

यन्मयाऽपकृतं मोहादज्ञानादृषिसत्तम । प्रसादये त्वां तत्राहं न मे त्वं क्रोद्धुमर्हसि ॥

yanmayā'pakṛtaṃ mohādajñānādṛṣisattama | prasādaye tvāṃ tatrāhaṃ na me tvaṃ kroddhumarhasi

राजा ने कहा — "हे ऋषिश्रेष्ठ, मोह और अज्ञान के कारण मैंने आपका जो अपकार किया है, उसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। आप मुझ पर क्रोध न करें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (1.117.5)

एवमुक्तस्ततो राज्ञा प्रसादमकरोन्मुनिः । कृतप्रसादं राजा तं ततः समवतारयत् ॥

evamuktastato rājñā prasādamakaronmuniḥ | kṛtaprasādaṃ rājā taṃ tataḥ samavatārayat

वैशम्पायन ने कहा — राजा के ऐसा कहने पर मुनि प्रसन्न हो गए। उनके प्रसन्न हो जाने पर राजा ने उन्हें नीचे उतरवाया।

श्लोक 6 (1.117.6)

अवतार्य च शूलाग्रात्तच्छूलं निश्चकर्ष ह । अशक्नुवंश्च निष्क्रष्टुं शूलं मूले स चिच्छिदे ॥

avatārya ca śūlāgrāttacchūlaṃ niścakarṣa ha | aśaknuvaṃśca niṣkraṣṭuṃ śūlaṃ mūle sa cicchide

शूल की नोक से उतारकर राजा ने वह शूल खींचना चाहा; किंतु उसे निकाल न पाने पर उन्होंने उसे जड़ के पास से काट दिया।

श्लोक 7 (1.117.7)

स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनिः । कण्ठपार्श्वान्तरस्थेन शङ्कुना मुनिराचरत् । पुष्पभाजनधारी स्यादिति चिन्तापरोऽभवत् ॥

sa tathāntargatenaiva śūlena vyacaranmuniḥ | kaṇṭhapārśvāntarasthena śaṅkunā munirācarat | puṣpabhājanadhārī syāditi cintāparo'bhavat

इस प्रकार वे मुनि भीतर धँसे हुए शूल के साथ ही विचरने लगे। कण्ठ और पार्श्व के बीच अटकी उस कील के साथ ही वे अपना आचरण करते रहे, और यह सोचने लगे कि यह फूलों की डलिया टाँगने के काम आ सकती है।

श्लोक 8 (1.117.8)

स चातितपसा लोकान्विजिग्ये दुर्लभान्परैः ॥

sa cātitapasā lokānvijigye durlabhānparaiḥ

अपनी उत्कट तपस्या से उन्होंने ऐसे लोक जीत लिए जो दूसरों के लिए दुर्लभ हैं।

श्लोक 9 (1.117.9)

अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु गीयते । स गत्वा सदनं विप्रो धर्मस्य परमार्थवित् ॥

aṇīmāṇḍavya iti ca tato lokeṣu gīyate | sa gatvā sadanaṃ vipro dharmasya paramārthavit

तभी से वे लोकों में 'अणीमाण्डव्य' (शूल की नोक वाले माण्डव्य) नाम से प्रसिद्ध हुए। परमार्थ के ज्ञाता वे विप्र धर्म के भवन में गए

श्लोक 10 (1.117.10)

आसनस्थं ततो धर्मं दृष्ट्वोपालभत प्रभुम् । किं नु तद्दुष्कृतं कर्म मया कृतमजानता ॥

āsanasthaṃ tato dharmaṃ dṛṣṭvopālabhata prabhum | kiṃ nu tadduṣkṛtaṃ karma mayā kṛtamajānatā

और वहाँ आसन पर बैठे प्रभु धर्म को देखकर उन्हें उलाहना देते हुए बोले — "मैंने अनजाने में ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया था,

श्लोक 11 (1.117.11)

यस्येयं फलनिर्वृत्तिरीदृश्यासादिता मया । शीघ्रमाचक्ष्व मे तत्त्वं पश्य मे तपसो बलम् ॥

yasyeyaṃ phalanirvṛttirīdṛśyāsāditā mayā | śīghramācakṣva me tattvaṃ paśya me tapaso balam

जिसका ऐसा फल मुझे भोगना पड़ा? मुझे तुरन्त सच-सच बताओ; मेरी तपस्या का बल देखो!"

धर्म उवाच

श्लोक 12 (1.117.12)

पतङ्गिकानां पुच्छेषु त्वयेषीका प्रवेशिता । कर्मणस्तस्य ते प्राप्तं फलमेतत्तपोधन ॥

pataṅgikānāṃ puccheṣu tvayeṣīkā praveśitā | karmaṇastasya te prāptaṃ phalametattapodhana

धर्म ने कहा — "तुमने छोटे-छोटे पतंगों की पूँछों में सींक घुसा दी थी। हे तपोधन, उसी कर्म का यह फल तुम्हें मिला है।"

श्लोक 13 (1.117.13)

स्वल्पमेव यथा दत्तं दानं बहुगुणं भवेत् । अधर्म एवं विप्रर्षे बहुदुःखफलप्रदः ॥

svalpameva yathā dattaṃ dānaṃ bahuguṇaṃ bhavet | adharma evaṃ viprarṣe bahuduḥkhaphalapradaḥ

"जैसे थोड़ा-सा दिया हुआ दान भी बहुत गुना फल देता है, वैसे ही, हे विप्रर्षि, अधर्म भी बहुत दुःख-रूपी फल देता है।"

अणीमाण्डव्य उवाच

श्लोक 14 (1.117.14)

कस्मिन्काले मया तत्तु कृतं ब्रूहि यथातथम् । तेनोक्तं धर्मराजेन बालभावे त्वया कृतम् ॥

kasminkāle mayā tattu kṛtaṃ brūhi yathātatham | tenoktaṃ dharmarājena bālabhāve tvayā kṛtam

अणीमाण्डव्य ने कहा — "सच-सच बताओ, मैंने वह कर्म कब किया था?" धर्मराज ने उत्तर दिया — "तुमने यह बचपन में किया था।"

श्लोक 15 (1.117.15)

बालो हि द्वादशाद्वर्षाज्जन्मतो यत्करिष्यति । न भविष्यत्यधर्मोऽत्र न प्रज्ञास्यति वै दिशः ॥

bālo hi dvādaśādvarṣājjanmato yatkariṣyati | na bhaviṣyatyadharmo'tra na prajñāsyati vai diśaḥ

अणीमाण्डव्य ने कहा — "जन्म से बारह वर्ष की आयु तक बालक जो कुछ करेगा, वह अधर्म नहीं होगा, क्योंकि वह शास्त्र के आदेशों को नहीं जानता।"

श्लोक 16 (1.117.16)

अल्पेऽपराधेऽपि महान्मम दण्डस्त्वया धृतः । गरीयान्ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधादपि ॥

alpe'parādhe'pi mahānmama daṇḍastvayā dhṛtaḥ | garīyānbrāhmaṇavadhaḥ sarvabhūtavadhādapi

"थोड़े-से अपराध के लिए तुमने मुझे भारी दण्ड दिया है। ब्राह्मण का वध समस्त प्राणियों के वध से भी अधिक गुरुतर है।"

श्लोक 17 (1.117.17)

शूद्रयोनावतो धर्म मानुषः संभविष्यसि । मर्यादां स्थापयाम्यद्य लोके कर्मफलोदयाम् ॥

śūdrayonāvato dharma mānuṣaḥ saṃbhaviṣyasi | maryādāṃ sthāpayāmyadya loke karmaphalodayām

"इसलिए, हे धर्म, तुम शूद्र-योनि में मनुष्य होकर जन्म लोगे। आज मैं संसार में कर्मों के फल की एक मर्यादा स्थापित करता हूँ।"

श्लोक 18 (1.117.18)

आ चतुर्दशकाद्वर्षान्न भविष्यति पातकम् । परतः कुर्वतामेव दोष एव भविष्यति ॥

ā caturdaśakādvarṣānna bhaviṣyati pātakam | parataḥ kurvatāmeva doṣa eva bhaviṣyati

"चौदहवें वर्ष तक किया गया कर्म पाप नहीं होगा; उसके बाद कर्म करने वालों को ही दोष लगेगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (1.117.19)

एतेन त्वपराधेन शापात्तस्य महात्मनः । धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ॥

etena tvaparādhena śāpāttasya mahātmanaḥ | dharmo vidurarūpeṇa śūdrayonāvajāyata

वैशम्पायन ने कहा — इसी अपराध के कारण उस महात्मा के शाप से धर्म विदुर के रूप में शूद्र-योनि में जन्मे।

श्लोक 20 (1.117.20)

धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः । दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ॥

dharme cārthe ca kuśalo lobhakrodhavivarjitaḥ | dīrghadarśī śamaparaḥ kurūṇāṃ ca hite rataḥ

वे धर्म और अर्थ में कुशल, लोभ और क्रोध से रहित, दूरदर्शी, शान्तिपरायण और कुरुओं के हित में तत्पर थे।

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