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आदि पर्व · अध्याय 118

कुरु राज्य की समृद्धि और पाण्डु का राजा बनना

धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म से कुरु प्रदेश समृद्ध हो उठता है: समय पर वर्षा होती है, नगर व्यापारियों और शिल्पियों से भर जाते हैं, कहीं लुटेरे नहीं रहते, और भीष्म राज्य की रक्षा करते हुए धर्म-चक्र को चलाते रहते हैं। भीष्म द्वारा पुत्रों की भाँति पाले गए तीनों कुमार वेद, शस्त्र-विद्या और नीति में पारंगत होते हैं; पाण्डु सेनापति और युवा विदुर राजा के मन्त्री बनाए जाते हैं, और धृतराष्ट्र के नेत्रहीन तथा विदुर के शूद्रा-पुत्र होने के कारण पाण्डु राजा बनते हैं। भीष्म कुन्तिभोज, गान्धार और मद्र के राजघरानों की विवाह-योग्य कन्याओं के बारे में सुनकर विदुर से बात करते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.118.1)

धृतराष्ट्रे च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि । एषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् । कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ॥

dhṛtarāṣṭre ca pāṇḍau ca vidure ca mahātmani | eṣu triṣu kumāreṣu jāteṣu kurujāṅgalam | kuravo'tha kurukṣetraṃ trayametadavardhata

वैशम्पायन ने कहा — धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर — इन तीनों कुमारों के जन्म लेने पर कुरुजांगल देश, कुरुवंशी और कुरुक्षेत्र — ये तीनों समृद्ध होने लगे।

श्लोक 2 (1.118.2)

ऊर्ध्वसस्याऽभवद्भूमिः सस्यानि फलवन्ति च । यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ॥

ūrdhvasasyā'bhavadbhūmiḥ sasyāni phalavanti ca | yathartuvarṣī parjanyo bahupuṣpaphalā drumāḥ

भूमि पर ऊँची और भरपूर फसलें होने लगीं और फसलें दानों से भरी रहतीं; मेघ ऋतु के अनुसार बरसते और वृक्ष बहुत-से फूलों और फलों से लदे रहते।

श्लोक 3 (1.118.3)

वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः । गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥

vāhanāni prahṛṣṭāni muditā mṛgapakṣiṇaḥ | gandhavanti ca mālyāni rasavanti phalāni ca

वाहन-पशु हृष्ट-पुष्ट रहते, मृग और पक्षी आनन्दित रहते; मालाएँ सुगन्धित होतीं और फल रसीले होते।

श्लोक 4 (1.118.4)

वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः । शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ॥

vaṇigbhiścānvakīryanta nagarāṇyatha śilpibhiḥ | śūrāśca kṛtavidyāśca santaśca sukhino'bhavan

नगर व्यापारियों और शिल्पियों से भरे रहते; शूरवीर, विद्वान और सज्जन सुखी थे।

श्लोक 5 (1.118.5)

नाभवन्दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः । प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ॥

nābhavandasyavaḥ kecinnādharmarucayo janāḥ | pradeśeṣvapi rāṣṭrāṇāṃ kṛtaṃ yugamavartata

कहीं कोई लुटेरा न था, न अधर्म में रुचि रखने वाले लोग थे; राज्य के दूर-दराज़ के प्रदेशों में भी मानो सत्ययुग चल रहा था।

श्लोक 6 (1.118.6)

धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः । अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ॥

dharmakriyā yajñaśīlāḥ satyavrataparāyaṇāḥ | anyonyaprītisaṃyuktā vyavardhanta prajāstadā

उस समय प्रजा धर्म-कर्म करने वाली, यज्ञशील, सत्य और व्रत में तत्पर तथा परस्पर प्रेम से जुड़ी हुई थी, और निरन्तर फलती-फूलती रही।

श्लोक 7 (1.118.7)

मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः । अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ॥

mānakrodhavihīnāśca narā lobhavivarjitāḥ | anyonyamabhyanandanta dharmottaramavartata

लोग अभिमान और क्रोध से रहित तथा लोभ से मुक्त थे; वे एक-दूसरे का अभिनन्दन करते थे, और सर्वत्र धर्म ही प्रधान था।

श्लोक 8 (1.118.8)

तन्महोदधिवत्पूर्णं नगरं वै व्यरोचत । द्वारतोरणनिर्यूहैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ॥

tanmahodadhivatpūrṇaṃ nagaraṃ vai vyarocata | dvāratoraṇaniryūhairyuktamabhracayopamaiḥ

महासागर के समान भरा-पूरा वह नगर बादलों के समूह जैसे ऊँचे द्वारों, तोरणों और बुर्जों से सुशोभित था।

श्लोक 9 (1.118.9)

प्रासादशतसंबाधं महेन्द्रपुरसन्निभम् । नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु । काननेषु च रम्येषु विजह्रुर्मुदिता जनाः ॥

prāsādaśatasaṃbādhaṃ mahendrapurasannibham | nadīṣu vanakhaṇḍeṣu vāpīpalvalasānuṣu | kānaneṣu ca ramyeṣu vijahrurmuditā janāḥ

वह सैकड़ों महलों से भरा हुआ और देवराज इन्द्र की नगरी के समान था। नदियों में, वनखण्डों में, बावड़ियों, तालाबों और पर्वत-शिखरों पर तथा रमणीय काननों में लोग आनन्द से विहार करते थे।

श्लोक 10 (1.118.10)

उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा । विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ॥

uttaraiḥ kurubhiḥ sārdhaṃ dakṣiṇāḥ kuravastathā | vispardhamānā vyacaraṃstathā devarṣicāraṇaiḥ

दक्षिण के कुरु उत्तरकुरुओं के साथ, और देवर्षियों तथा चारणों के साथ भी होड़ करते हुए विचरते थे।

श्लोक 11 (1.118.11)

नाभवत्कृपणः कश्चिन्नाभवन्विधवाः स्त्रियः । तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ॥

nābhavatkṛpaṇaḥ kaścinnābhavanvidhavāḥ striyaḥ | tasmiñjanapade ramye kurubhirbahulīkṛte

कुरुओं द्वारा समृद्ध किए गए उस रमणीय जनपद में न कोई दीन था, न कोई स्त्री विधवा थी।

श्लोक 12 (1.118.12)

कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा । बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन्राष्ट्रे सदोत्सवाः ॥

kūpārāmasabhāvāpyo brāhmaṇāvasathāstathā | babhūvuḥ sarvarddhiyutāstasminrāṣṭre sadotsavāḥ

उस राज्य में कुएँ, उद्यान, सभाभवन, बावड़ियाँ और ब्राह्मणों के आवास सब प्रकार की समृद्धि से युक्त थे, और वहाँ सदा उत्सव होते रहते थे।

श्लोक 13 (1.118.13)

भीष्मेण धर्मतो राजन्सर्वतः परिरक्षिते । बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ॥

bhīṣmeṇa dharmato rājansarvataḥ parirakṣite | babhūva ramaṇīyaśca caityayūpaśatāṅkitaḥ

हे राजन्, भीष्म द्वारा धर्मपूर्वक चारों ओर से सुरक्षित वह देश रमणीय हो गया और सैकड़ों चैत्यों तथा यज्ञ-स्तम्भों से सुशोभित रहने लगा।

श्लोक 14 (1.118.14)

स देशः परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः । भीष्मेण विहितं राष्ट्रे धर्मचक्रमवर्तत ॥

sa deśaḥ pararāṣṭrāṇi vimṛjyābhipravardhitaḥ | bhīṣmeṇa vihitaṃ rāṣṭre dharmacakramavartata

वह देश दूसरे राज्यों को पीछे छोड़ते हुए बढ़ता गया, और राज्य में भीष्म द्वारा प्रवर्तित धर्म-चक्र चलता रहा।

श्लोक 15 (1.118.15)

क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् । पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः परमोत्सुकाः ॥

kriyamāṇeṣu kṛtyeṣu kumārāṇāṃ mahātmanām | paurajānapadāḥ sarve babhūvuḥ paramotsukāḥ

जब उन महात्मा कुमारों के संस्कार-कर्म सम्पन्न किए जाते, तब नगर और जनपद के सभी लोग अत्यन्त उत्साहित हो उठते।

श्लोक 16 (1.118.16)

गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप । दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥

gṛheṣu kurumukhyānāṃ paurāṇāṃ ca narādhipa | dīyatāṃ bhujyatāṃ ceti vāco'śrūyanta sarvaśaḥ

हे नरेश, कुरुवंश के प्रमुखों और पुरवासियों के घरों में सब ओर "दान दो, भोजन करो" के ही स्वर सुनाई देते थे।

श्लोक 17 (1.118.17)

धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः । जन्मप्रभृति भीष्मेण पुत्रवत्परिपालिताः ॥

dhṛtarāṣṭraśca pāṇḍuśca viduraśca mahāmatiḥ | janmaprabhṛti bhīṣmeṇa putravatparipālitāḥ

धृतराष्ट्र, पाण्डु और परम बुद्धिमान विदुर का भीष्म ने जन्म से ही पुत्रों की भाँति पालन किया।

श्लोक 18 (1.118.18)

संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्ययनसंयुताः । श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ॥

saṃskāraiḥ saṃskṛtāste tu vratādhyayanasaṃyutāḥ | śramavyāyāmakuśalāḥ samapadyanta yauvanam

संस्कारों से संस्कृत होकर, व्रत और अध्ययन में लगे हुए, शास्त्राभ्यास और व्यायाम में कुशल वे युवावस्था को प्राप्त हुए।

श्लोक 19 (1.118.19)

धनुर्वेदे च वेदे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि । तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ॥

dhanurvede ca vede ca gadāyuddhe'sicarmaṇi | tathaiva gajaśikṣāyāṃ nītiśāstreṣu pāragāḥ

वे धनुर्वेद और वेद में, गदायुद्ध तथा ढाल-तलवार के युद्ध में, हाथियों के प्रशिक्षण में और नीतिशास्त्र में पारंगत हो गए।

श्लोक 20 (1.118.20)

इतिहासपुराणेषु नानाशिक्षासु बोधिताः । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ॥

itihāsapurāṇeṣu nānāśikṣāsu bodhitāḥ | vedavedāṅgatattvajñāḥ sarvatra kṛtaniścayāḥ

उन्हें इतिहास, पुराण और अनेक प्रकार की विद्याओं की शिक्षा दी गई; वे वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाले थे और सभी विषयों में उनकी बुद्धि स्थिर थी।

श्लोक 21 (1.118.21)

वैदिकाध्ययने युक्तो नीतिशास्त्रेषु पारगः । भीष्मेण राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रोऽभिषेचितः ॥

vaidikādhyayane yukto nītiśāstreṣu pāragaḥ | bhīṣmeṇa rājā kauravyo dhṛtarāṣṭro'bhiṣecitaḥ

वैदिक अध्ययन में लगे और नीतिशास्त्र में पारंगत कुरुवंशी धृतराष्ट्र का भीष्म ने राजा के रूप में अभिषेक किया।

श्लोक 22 (1.118.22)

धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि । तथैव गजशिक्षायामस्त्रेषु विविधेषु च ॥

dhanurvede'śvapṛṣṭhe ca gadāyuddhe'sicarmaṇi | tathaiva gajaśikṣāyāmastreṣu vividheṣu ca

धनुर्वेद, घुड़सवारी, गदायुद्ध, ढाल-तलवार के युद्ध, हाथियों के प्रशिक्षण तथा अनेक प्रकार के अस्त्रों में,

श्लोक 23 (1.118.23)

अर्थधर्मप्रधानासु विद्यासु विविधासु च । गतः पारं यदा पाण्डुस्तदा सेनापतिः कृतः ॥

arthadharmapradhānāsu vidyāsu vividhāsu ca | gataḥ pāraṃ yadā pāṇḍustadā senāpatiḥ kṛtaḥ

तथा अर्थ और धर्म-प्रधान अनेक विद्याओं में जब पाण्डु पारंगत हो गए, तब उन्हें सेनापति बनाया गया।

श्लोक 24 (1.118.24)

पाण्डुर्धनुषि विक्रान्तो नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् । अन्येभ्यो बलवानासीद्धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥

pāṇḍurdhanuṣi vikrānto nareṣvabhyadhiko'bhavat | anyebhyo balavānāsīddhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ

पाण्डु धनुष चलाने में पराक्रमी थे और मनुष्यों में सबसे बढ़कर थे; राजा धृतराष्ट्र बल में अन्य सबसे अधिक बलवान थे।

श्लोक 25 (1.118.25)

अमात्यो मनुजेन्द्रस्य बाल एव यशस्विनः । भीष्मेण सर्वधर्माणां प्रणेता विदुरः कृतः ॥

amātyo manujendrasya bāla eva yaśasvinaḥ | bhīṣmeṇa sarvadharmāṇāṃ praṇetā viduraḥ kṛtaḥ

यशस्वी विदुर को बाल्यावस्था में ही भीष्म ने राजा का मन्त्री और समस्त धर्मों का मार्गदर्शक बना दिया।

श्लोक 26 (1.118.26)

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बुद्धिमेधापटुर्युवा । भावेनागमयुक्तेन सर्वं वेदयते जगत् ॥

sarvaśāstrārthatattvajño buddhimedhāpaṭuryuvā | bhāvenāgamayuktena sarvaṃ vedayate jagat

युवा होते हुए भी वे सब शास्त्रों के अर्थ और तत्त्व को जानते थे, बुद्धि और मेधा में निपुण थे; शास्त्र-सम्मत भाव से वे समस्त जगत् को ज्ञान कराते थे।

श्लोक 27 (1.118.27)

त्रिषु लोकेषु न त्वासीत्कश्चिद्विदुरसंमितः । धर्मनित्यस्तथा राजन्धर्मं च परमं गतः ॥

triṣu lokeṣu na tvāsītkaścidvidurasaṃmitaḥ | dharmanityastathā rājandharmaṃ ca paramaṃ gataḥ

हे राजन्, तीनों लोकों में विदुर के समान कोई न था; वे सदा धर्मपरायण रहे और परम धर्म को प्राप्त थे।

श्लोक 28 (1.118.28)

प्रनष्टं शान्तनोर्वंशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् । ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ॥

pranaṣṭaṃ śāntanorvaṃśaṃ samīkṣya punaruddhṛtam | tato nirvacanaṃ loke sarvarāṣṭreṣvavartata

शान्तनु के नष्ट हुए वंश का फिर से उद्धार हुआ देखकर संसार के सब राज्यों में यह कहावत चल पड़ी —

श्लोक 29 (1.118.29)

वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् । सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ॥

vīrasūnāṃ kāśisute deśānāṃ kurujāṅgalam | sarvadharmavidāṃ bhīṣmaḥ purāṇāṃ gajasāhvayam

"वीर-जननियों में काशिराज की पुत्रियाँ श्रेष्ठ हैं, देशों में कुरुजांगल, समस्त धर्मज्ञों में भीष्म और नगरों में हस्तिनापुर।"

श्लोक 30 (1.118.30)

धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद्राज्यं न प्रत्यपद्यत । पारसवत्वाद्विदुरो राजा पाण्डुर्बभूव ह ॥

dhṛtarāṣṭrastvacakṣuṣṭvādrājyaṃ na pratyapadyata | pārasavatvādviduro rājā pāṇḍurbabhūva ha

नेत्रहीन होने के कारण धृतराष्ट्र को राज्य नहीं मिला, और शूद्रा माता से उत्पन्न होने के कारण विदुर को भी नहीं; अतः पाण्डु राजा बने।

श्लोक 31 (1.118.31)

अथ शुश्राव विप्रेभ्यः कुन्तिभोजमहीपतेः । रूपयौवनसंपन्नां सुतां सागरगासुतः ॥

atha śuśrāva viprebhyaḥ kuntibhojamahīpateḥ | rūpayauvanasaṃpannāṃ sutāṃ sāgaragāsutaḥ

तब सागर-गामिनी गंगा के पुत्र भीष्म ने ब्राह्मणों से राजा कुन्तिभोज की रूप और यौवन से सम्पन्न पुत्री के विषय में सुना,

श्लोक 32 (1.118.32)

सुबलस्य च कल्याणीं गान्धाराधिपतेः सुताम् । सुतां च मद्रराजस्य रूपेणाप्रतिमां भुवि ॥

subalasya ca kalyāṇīṃ gāndhārādhipateḥ sutām | sutāṃ ca madrarājasya rūpeṇāpratimāṃ bhuvi

गान्धारराज सुबल की कल्याणमयी पुत्री के विषय में, और मद्रराज की उस पुत्री के विषय में भी, जो रूप में पृथ्वी पर अनुपम थी।

श्लोक 33 (1.118.33)

कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः । विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ॥

kadācidatha gāṅgeyaḥ sarvanītimatāṃ varaḥ | viduraṃ dharmatattvajñaṃ vākyamāha yathocitam

फिर एक दिन समस्त नीतिज्ञों में श्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्म ने धर्म के तत्त्व को जानने वाले विदुर से उचित वचन कहे।

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