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आदि पर्व · अध्याय 119

धृतराष्ट्र और गान्धारी का विवाह

भीष्म विदुर से कहते हैं कि जिस कुरुवंश को उन्होंने, सत्यवती और कृष्णद्वैपायन ने फिर से स्थापित किया है, उसे अब आगे बढ़ाना है, और वे यादव कन्या, सुबल की पुत्री तथा मद्रराज की पुत्री का नाम लेते हैं; विदुर निर्णय उन्हीं पर छोड़ देते हैं। यह सुनकर कि गान्धारी ने शिव से सौ पुत्रों का वर पाया है, भीष्म सुबल के पास संदेश भेजते हैं, जो धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने पर कुछ हिचककर अन्ततः गान्धारी को दे देते हैं। पति के नेत्रहीन होने की बात सुनकर गान्धारी कई तह किए वस्त्र से अपनी आँखें बाँध लेती है; शकुनि उसे कुरुओं के पास लाता है और विवाह सम्पन्न होता है। फिर सुबल उसकी दस बहनें भी दे देते हैं, और भीष्म धृतराष्ट्र के लिए सौ से अधिक राजकुमारियाँ लाते हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (1.119.1)

गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् । अत्यन्यान्पृथिवीपालान्पृथिव्यामधिराज्यभाक् ॥

guṇaiḥ samuditaṃ samyagidaṃ naḥ prathitaṃ kulam | atyanyānpṛthivīpālānpṛthivyāmadhirājyabhāk

भीष्म ने कहा — "सब गुणों से भली-भाँति सम्पन्न हमारा यह प्रसिद्ध कुल पृथ्वी के अन्य सब राजाओं से बढ़कर पृथ्वी पर अधिराज्य का भागी रहा है।

श्लोक 2 (1.119.2)

रक्षितं राजभिः पूर्वं धर्मविद्भिर्महात्मभिः । नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम् ॥

rakṣitaṃ rājabhiḥ pūrvaṃ dharmavidbhirmahātmabhiḥ | notsādamagamaccedaṃ kadācidiha naḥ kulam

पूर्वकाल में धर्मज्ञ, महात्मा राजाओं ने इसकी रक्षा की, और हमारा यह कुल यहाँ कभी नष्ट नहीं हुआ।

श्लोक 3 (1.119.3)

मया च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना । समवस्थापितं भूयो युष्मासु कुलतन्तुषु ॥

mayā ca satyavatyā ca kṛṣṇena ca mahātmanā | samavasthāpitaṃ bhūyo yuṣmāsu kulatantuṣu

मैंने, सत्यवती ने और महात्मा कृष्ण (व्यास) ने इसे फिर से तुम लोगों में, जो इस कुल के तन्तु हो, स्थापित किया है।

श्लोक 4 (1.119.4)

तच्चैतद्वर्धते भूयः कुलं सागरवद्यथा । तथा मया विधातव्यं त्वया चैव न संशयः ॥

taccaitadvardhate bhūyaḥ kulaṃ sāgaravadyathā | tathā mayā vidhātavyaṃ tvayā caiva na saṃśayaḥ

और यह कुल समुद्र की भाँति और भी बढ़े, इसके लिए मुझे भी उपाय करना है और तुम्हें भी — इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 5 (1.119.5)

श्रूयते यादवी कन्या स्वनुरूपा कुलस्य नः । सुबलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य च ॥

śrūyate yādavī kanyā svanurūpā kulasya naḥ | subalasyātmajā caiva tathā madreśvarasya ca

सुनने में आता है कि एक यादव कन्या हमारे कुल के सर्वथा योग्य है; इसी प्रकार सुबल की पुत्री और मद्रराज की पुत्री भी।

श्लोक 6 (1.119.6)

कुलीना रूपवत्यश्च ताः कन्याः पुत्र सर्वशः । उचिताश्चैव संबन्धे तेऽस्माकं क्षत्रियर्षभाः ॥

kulīnā rūpavatyaśca tāḥ kanyāḥ putra sarvaśaḥ | ucitāścaiva saṃbandhe te'smākaṃ kṣatriyarṣabhāḥ

पुत्र, वे सब कन्याएँ कुलीन और रूपवती हैं, और वे क्षत्रियश्रेष्ठ हमसे सम्बन्ध करने के योग्य हैं।

श्लोक 7 (1.119.7)

मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर । सन्तानार्थं कुलस्यास्य यद्वा विदुर मन्यसे ॥

manye varayitavyāstā ityahaṃ dhīmatāṃ vara | santānārthaṃ kulasyāsya yadvā vidura manyase

हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, मेरा विचार है कि इस कुल की संतान के लिए उनका वरण किया जाना चाहिए। अथवा विदुर, तुम क्या सोचते हो?"

विदुर उवाच

श्लोक 8 (1.119.8)

भवान्पिता भवान्माता भवान्नः परमो गुरुः । तस्मात्स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम् ॥

bhavānpitā bhavānmātā bhavānnaḥ paramo guruḥ | tasmātsvayaṃ kulasyāsya vicārya kuru yaddhitam

विदुर ने कहा — "आप ही हमारे पिता हैं, आप ही माता हैं और आप ही हमारे परम गुरु हैं। इसलिए इस कुल के लिए जो हितकर हो, उसे स्वयं विचार कर कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (1.119.9)

अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारीं सुबलात्मजाम् । आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् ॥

atha śuśrāva viprebhyo gāndhārīṃ subalātmajām | ārādhya varadaṃ devaṃ bhaganetraharaṃ haram

वैशम्पायन ने कहा — तब भीष्म ने ब्राह्मणों से सुना कि सुबल की पुत्री गान्धारी ने भग के नेत्र हरने वाले वरदायक देव हर (शिव) की आराधना की थी,

श्लोक 10 (1.119.10)

गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा । इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥

gāndhārī kila putrāṇāṃ śataṃ lebhe varaṃ śubhā | iti śuśrāva tattvena bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ

और यह कि शुभलक्षणा गान्धारी ने सौ पुत्रों का वर पाया है। कुरुवंश के पितामह भीष्म ने यह बात यथार्थ रूप में जानी।

श्लोक 11 (1.119.11)

ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत । अचक्षुरिति तत्रासीत्सुबलस्य विचारणा ॥

tato gāndhārarājasya preṣayāmāsa bhārata | acakṣuriti tatrāsītsubalasya vicāraṇā

हे भारत, तब उन्होंने गान्धारराज के पास संदेश भेजा। 'वर नेत्रहीन है' — यह सोचकर सुबल के मन में दुविधा हुई।

श्लोक 12 (1.119.12)

कुलं ख्यातिं च वृत्तं च बुद्ध्या तु प्रसमीक्ष्य सः । ददौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारीं धर्मचारिणीम् ॥

kulaṃ khyātiṃ ca vṛttaṃ ca buddhyā tu prasamīkṣya saḥ | dadau tāṃ dhṛtarāṣṭrāya gāndhārīṃ dharmacāriṇīm

किंतु कुल, कीर्ति और आचरण पर बुद्धि से भली-भाँति विचार करके उन्होंने धर्मपरायण गान्धारी को धृतराष्ट्र को दे दिया।

श्लोक 13 (1.119.13)

गान्धारी त्वथ शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् । आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ॥

gāndhārī tvatha śuśrāva dhṛtarāṣṭramacakṣuṣam | ātmānaṃ ditsitaṃ cāsmai pitrā mātrā ca bhārata

हे भारत, गान्धारी ने सुना कि धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं और उसके पिता-माता उसे उन्हीं को देना चाहते हैं।

श्लोक 14 (1.119.14)

ततः सा पटमादाय कृत्वा बहुगुणं तदा । बबन्ध नेत्रे स्वे राजन्पतिव्रतपरायणा ॥

tataḥ sā paṭamādāya kṛtvā bahuguṇaṃ tadā | babandha netre sve rājanpativrataparāyaṇā

हे राजन्, तब पतिव्रत-धर्म में तत्पर उस गान्धारी ने एक वस्त्र लेकर उसे कई तह में मोड़ा और उससे अपनी आँखें बाँध लीं,

श्लोक 15 (1.119.15)

नाभ्यसूयां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चया । ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् ॥

nābhyasūyāṃ patimahamityevaṃ kṛtaniścayā | tato gāndhārarājasya putraḥ śakunirabhyayāt

इस दृढ़ निश्चय के साथ कि 'मैं अपने पति से बढ़कर नहीं रहूँगी।' तब गान्धारराज का पुत्र शकुनि आया,

श्लोक 16 (1.119.16)

स्वसारं परया लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् । तां तदा धृतराष्ट्राय ददौ परमसत्कृताम् । भीष्मस्यानुमते चैव विवाहं समकारयत् ॥

svasāraṃ parayā lakṣmyā yuktāmādāya kauravān | tāṃ tadā dhṛtarāṣṭrāya dadau paramasatkṛtām | bhīṣmasyānumate caiva vivāhaṃ samakārayat

वह परम शोभा से युक्त अपनी बहन को कौरवों के पास ले आया। तब उसने बड़े सम्मान के साथ उसे धृतराष्ट्र को सौंपा और भीष्म की अनुमति से विवाह सम्पन्न कराया।

श्लोक 17 (1.119.17)

दत्त्वा स भगिनीं वीरो यथार्हं च परिच्छदम् । पुनरायात्स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः ॥

dattvā sa bhaginīṃ vīro yathārhaṃ ca paricchadam | punarāyātsvanagaraṃ bhīṣmeṇa pratipūjitaḥ

अपनी बहन को उचित सामग्री के साथ देकर, भीष्म द्वारा सम्मानित वह वीर अपने नगर लौट गया।

श्लोक 18 (1.119.18)

गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः । तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत ॥

gāndhāryapi varārohā śīlācāraviceṣṭitaiḥ | tuṣṭiṃ kurūṇāṃ sarveṣāṃ janayāmāsa bhārata

हे भारत, सुन्दरी गान्धारी ने भी अपने शील, आचार और व्यवहार से सब कुरुओं को संतुष्ट कर दिया।

श्लोक 19 (1.119.19)

गान्धारी सा पतिं दृष्ट्वा प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । अतिचाराद्भृशं भीता भर्तुः सा समचिन्तयत् ॥

gāndhārī sā patiṃ dṛṣṭvā prajñācakṣuṣamīśvaram | aticārādbhṛśaṃ bhītā bhartuḥ sā samacintayat

अपने पति, प्रज्ञाचक्षु स्वामी को देखकर गान्धारी पति के प्रति किसी भी अपराध से अत्यन्त भयभीत होकर गहराई से विचार करने लगी।

श्लोक 20 (1.119.20)

सा दृष्टिविनिवृत्त्या हि भर्तुश्च समतां ययौ । नहि सूक्ष्मेप्यतीचारे भर्तुः सा ववृते तदा ॥

sā dṛṣṭivinivṛttyā hi bhartuśca samatāṃ yayau | nahi sūkṣmepyatīcāre bhartuḥ sā vavṛte tadā

दृष्टि का त्याग करके वह अपने पति के समान हो गई; और तब से उसने पति के प्रति सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं किया।

श्लोक 21 (1.119.21)

वृत्तेनाराध्य तान्सर्वान्गुरून्पतिपरायणा । वाचापि पुरुषानन्यान्सुव्रता नान्वकीर्तयत् ॥

vṛttenārādhya tānsarvāngurūnpatiparāyaṇā | vācāpi puruṣānanyānsuvratā nānvakīrtayat

पतिपरायणा गान्धारी ने अपने आचरण से सब गुरुजनों को प्रसन्न किया; उत्तम व्रत वाली वह वाणी से भी दूसरे पुरुषों का नाम तक नहीं लेती थी।

श्लोक 22 (1.119.22)

तस्याः सहोदरीः कन्याः पुनरेव ददौ दश । गान्धारराजः सुबलो भीष्मेण च वृतस्तदा ॥

tasyāḥ sahodarīḥ kanyāḥ punareva dadau daśa | gāndhārarājaḥ subalo bhīṣmeṇa ca vṛtastadā

फिर भीष्म के माँगने पर गान्धारराज सुबल ने उसकी दस सगी कुमारी बहनें भी दे दीं —

श्लोक 23 (1.119.23)

सत्यव्रतां सत्यसेनां सुदेष्णां चापि संहिताम् । तेजश्श्रवां सुश्रवां च तथैव निकृतिं शुभाम् ॥

satyavratāṃ satyasenāṃ sudeṣṇāṃ cāpi saṃhitām | tejaśśravāṃ suśravāṃ ca tathaiva nikṛtiṃ śubhām

सत्यव्रता, सत्यसेना, सुदेष्णा और संहिता, तेजश्श्रवा और सुश्रवा, तथा निकृति और शुभा,

श्लोक 24 (1.119.24)

शंभ्वठां च दशार्णां च गान्धारीर्दश विश्रुताः । एकाह्ना प्रतिजग्राह धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ॥

śaṃbhvaṭhāṃ ca daśārṇāṃ ca gāndhārīrdaśa viśrutāḥ | ekāhnā pratijagrāha dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ

शम्भ्वठा और दशार्णा — गान्धार की ये दस विख्यात राजकुमारियाँ। राजा धृतराष्ट्र ने एक ही दिन इन सबका पाणिग्रहण किया।

श्लोक 25 (1.119.25)

ततः शान्तनवो भीष्मो धानुष्कस्तास्ततस्ततः । अददाद्धृतराष्ट्रस्य राजपुत्रीः परश्शतम् ॥

tataḥ śāntanavo bhīṣmo dhānuṣkastāstatastataḥ | adadāddhṛtarāṣṭrasya rājaputrīḥ paraśśatam

इसके बाद शान्तनुपुत्र धनुर्धर भीष्म ने इधर-उधर से राजकुमारियाँ लाकर धृतराष्ट्र को सौ से भी अधिक राजपुत्रियाँ दीं।

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