आदि पर्व · अध्याय 120
कर्ण का जन्म
वैशम्पायन बताते हैं कि यदुवंशी शूर ने अपनी पहली सन्तान पृथा को अपने निःसन्तान फुफेरे भाई कुन्तिभोज को दे दिया, और पृथा ने उग्र मुनि दुर्वासा की ऐसी सेवा की कि उन्होंने उसे किसी भी देवता को बुलाने वाला मन्त्र दिया। कौतूहलवश उस कुमारी ने सूर्य का आवाहन किया; सूर्य ने उसका भय दूर कर उससे संगम किया और उसका कौमार्य लौटा दिया। उसने कवच-कुण्डल के साथ जन्मे कर्ण को जन्म दिया, उसे मंजूषा में रखकर जल में बहा दिया, और राधा के पति सूत ने उसे वसुषेण नाम से पाला। अध्याय के अन्त में स्वप्न में सूर्य की चेतावनी, ब्राह्मण-वेश में इन्द्र की याचना, कर्ण का अपने शरीर से कवच-कुण्डल काटकर देना, और बदले में इन्द्र से मिली शक्ति का वर्णन है, जिससे उसके कर्ण और वैकर्तन नाम पड़े।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.120.1)
शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताऽभवत् । तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥
śūro nāma yaduśreṣṭho vasudevapitā'bhavat | tasya kanyā pṛthā nāma rūpeṇāpratimā bhuvi
वैशम्पायन ने कहा — यदुवंशियों में श्रेष्ठ शूर वसुदेव के पिता थे। उनकी पृथा नाम की एक कन्या थी, जो रूप में पृथ्वी पर अनुपम थी।
श्लोक 2 (1.120.2)
पितृष्वस्रीयाय स तामनपत्याय भारत । अग्र्यमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक् ॥
pitṛṣvasrīyāya sa tāmanapatyāya bhārata | agryamagre pratijñāya svasyāpatyaṃ sa satyavāk
हे भारत! उस सत्यवादी ने पहले ही प्रतिज्ञा कर रखी थी कि अपनी पहली सन्तान वह अपनी बुआ के निःसन्तान पुत्र को देगा।
श्लोक 3 (1.120.3)
अग्रजामथ तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षिणे । प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने ॥
agrajāmatha tāṃ kanyāṃ śūro'nugrahakāṅkṣiṇe | pradadau kuntibhojāya sakhā sakhye mahātmane
अतः शूर ने मित्रभाव से अपनी वह ज्येष्ठ कन्या उस कृपा के इच्छुक महात्मा कुन्तिभोज को सौंप दी।
श्लोक 4 (1.120.4)
नियुक्ता सा पितुर्गेहे ब्राह्मणातिथिपूजने । उग्रं पर्यचरत्तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥
niyuktā sā piturgehe brāhmaṇātithipūjane | ugraṃ paryacarattatra brāhmaṇaṃ saṃśitavratam
पिता के घर में उसे ब्राह्मणों और अतिथियों के सत्कार का काम सौंपा गया था। वहाँ उसने कठोर व्रत वाले एक उग्र ब्राह्मण की सेवा की।
श्लोक 5 (1.120.5)
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः । तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत् ॥
nigūḍhaniścayaṃ dharme yaṃ taṃ durvāsasaṃ viduḥ | tamugraṃ saṃśitātmānaṃ sarvayatnairatoṣayat
धर्म के विषय में जिनका निश्चय गूढ़ रहता था और जिन्हें लोग दुर्वासा के नाम से जानते हैं, उन उग्र और संयमी मुनि को उसने हर प्रकार के प्रयत्न से प्रसन्न किया।
श्लोक 6 (1.120.6)
दध्याज्यकादिभिर्नित्यं व्यञ्जनैः प्रत्यहं शुभा । सहस्रसङ्ख्यैर्योगीन्द्रमुपचारादनुत्तमा ॥
dadhyājyakādibhirnityaṃ vyañjanaiḥ pratyahaṃ śubhā | sahasrasaṅkhyairyogīndramupacārādanuttamā
सेवा में अद्वितीय वह सुन्दरी प्रतिदिन दही, घी आदि हज़ारों व्यंजनों से उन योगिराज का सत्कार करती रही।
श्लोक 7 (1.120.7)
दुर्वासा वत्सरस्यान्ते ददौ मन्त्रमनुत्तमम् । यशस्विन्यै पृथायै तदापद्धर्मान्ववेक्षया । अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनिः ॥
durvāsā vatsarasyānte dadau mantramanuttamam | yaśasvinyai pṛthāyai tadāpaddharmānvavekṣayā | abhicārābhisaṃyuktamabravīccaiva tāṃ muniḥ
एक वर्ष पूरा होने पर दुर्वासा ने आपत्ति के समय का ध्यान रखते हुए यशस्विनी पृथा को एक उत्तम मन्त्र दिया, जो वश में करके बुला लाने की शक्ति से युक्त था; और मुनि ने उससे कहा —
श्लोक 8 (1.120.8)
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रभावेण तव पुत्रो भविष्यति ॥
yaṃ yaṃ devaṃ tvametena mantreṇāvāhayiṣyasi | tasya tasya prabhāveṇa tava putro bhaviṣyati
"इस मन्त्र से तुम जिस-जिस देवता का आवाहन करोगी, उसी-उसी के प्रभाव से तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा।"
श्लोक 9 (1.120.9)
तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥
tathoktā sā tu vipreṇa kuntī kautūhalānvitā | kanyā satī devamarkamājuhāva yaśasvinī
ब्राह्मण के ऐसा कहने पर कौतूहल से भरी यशस्विनी कुन्ती ने, कुमारी होते हुए भी, सूर्यदेव का आवाहन किया।
श्लोक 10 (1.120.10)
ततो घनान्तरं कृत्वा स्वमार्गं तपनस्तदा । उपतस्थे स तां कन्यां पृथां पृथुललोचनाम् ॥
tato ghanāntaraṃ kṛtvā svamārgaṃ tapanastadā | upatasthe sa tāṃ kanyāṃ pṛthāṃ pṛthulalocanām
तब तपन (सूर्य) अपने मार्ग में बादलों को चीरकर उस विशाल नेत्रों वाली कुमारी पृथा के पास आ खड़े हुए।
श्लोक 11 (1.120.11)
सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम् । विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥
sā dadarśa tamāyāntaṃ bhāskaraṃ lokabhāvanam | vismitā cānavadyāṅgī dṛṣṭvā tanmahadadbhutam
उसने लोकों के पालक भास्कर को आते देखा, और उस महान् अद्भुत दृश्य को देखकर वह निर्दोष अंगों वाली कन्या विस्मित हो गई।
श्लोक 12 (1.120.12)
साब्रवीद्भगवन्कस्त्वमाविर्भूतो ममाग्रतः ॥
sābravīdbhagavankastvamāvirbhūto mamāgrataḥ
उसने कहा — "भगवन्! आप कौन हैं, जो मेरे सामने प्रकट हुए हैं?"
आदित्य उवाच
श्लोक 13 (1.120.13)
आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम् । विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्कं शुचिस्मिते ॥
āhūtopasthitaṃ bhadre ṛṣimantreṇa coditam | viddhi māṃ putralābhāya devamarkaṃ śucismite
आदित्य ने कहा — "हे भद्रे, हे पवित्र मुस्कान वाली! मुझे सूर्यदेव जानो, जो ऋषि के मन्त्र से प्रेरित होकर तुम्हारे बुलाने पर पुत्र-प्राप्ति के लिए यहाँ उपस्थित हुआ है।"
श्लोक 14 (1.120.14)
पुत्रस्ते निर्मितः सुभ्रु शृणु यादृक्छुभानने । आदित्ये कुण्डले बिभ्रत्कवचं चैव मामकम् ॥
putraste nirmitaḥ subhru śṛṇu yādṛkchubhānane | āditye kuṇḍale bibhratkavacaṃ caiva māmakam
"हे सुन्दर भौंहों वाली! तुम्हारे लिए एक पुत्र रचा जा चुका है। हे सुमुखी, सुनो, वह कैसा होगा — वह आदित्य के कुण्डल और मेरा अपना कवच धारण करेगा।"
श्लोक 15 (1.120.15)
शस्त्रास्त्राणामभेद्यश्च भविष्यति शुचिस्मिते । नास्य किंचिददेयं च ब्राह्मणेभ्यो भविष्यति ॥
śastrāstrāṇāmabhedyaśca bhaviṣyati śucismite | nāsya kiṃcidadeyaṃ ca brāhmaṇebhyo bhaviṣyati
"हे शुचिस्मिते! वह सभी शस्त्रों और अस्त्रों से अभेद्य होगा, और ब्राह्मणों के लिए उसके पास कुछ भी अदेय नहीं होगा।"
श्लोक 16 (1.120.16)
चोद्यमानो मया चापि न क्षमं चिन्तयिष्यति । दास्यत्येव हि विप्रेभ्यो मानी चैव भविष्यति ॥
codyamāno mayā cāpi na kṣamaṃ cintayiṣyati | dāsyatyeva hi viprebhyo mānī caiva bhaviṣyati
"मेरे प्रेरित करने पर भी वह मना करना उचित नहीं समझेगा; वह ब्राह्मणों को देगा ही, और वह स्वाभिमानी होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (1.120.17)
एवमुक्ता ततः कुन्ती गोपतिं प्रत्युवाच ह । कन्या पितृवशा चाहं पुरुषार्थो न चैव मे ॥
evamuktā tataḥ kuntī gopatiṃ pratyuvāca ha | kanyā pitṛvaśā cāhaṃ puruṣārtho na caiva me
वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहे जाने पर कुन्ती ने किरणों के स्वामी सूर्य को उत्तर दिया — "मैं कुमारी हूँ, पिता के अधीन हूँ; पुरुष से मेरा कोई प्रयोजन नहीं।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 18 (1.120.18)
कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद्वरं विद्यां च शत्रुहन् । तद्विजिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो ॥
kaścinme brāhmaṇaḥ prādādvaraṃ vidyāṃ ca śatruhan | tadvijijñāsayā''hvānaṃ kṛtavatyasmi te vibho
कुन्ती ने कहा — "हे शत्रुनाशक! एक ब्राह्मण ने मुझे वर के रूप में एक विद्या दी थी; उसी को परखने के लिए मैंने आपका आवाहन किया, हे प्रभो।
श्लोक 19 (1.120.19)
एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाऽहं प्रसादये । योषितो हि सदा रक्ष्यास्त्वपराधेऽपि नित्यशः ॥
etasminnaparādhe tvāṃ śirasā'haṃ prasādaye | yoṣito hi sadā rakṣyāstvaparādhe'pi nityaśaḥ
"इस अपराध के लिए मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगती हूँ। स्त्रियाँ अपराध करने पर भी सदा रक्षा के योग्य होती हैं।"
सूर्य उवाच
श्लोक 20 (1.120.20)
वेदाहं सर्वमेवैतद्यद्दुर्वासा वरं ददौ । संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां सङ्गमो मम ॥
vedāhaṃ sarvamevaitadyaddurvāsā varaṃ dadau | saṃtyajya bhayameveha kriyatāṃ saṅgamo mama
सूर्य ने कहा — "जो वर दुर्वासा ने तुम्हें दिया, वह सब मैं जानता हूँ। यहाँ भय को त्यागकर मेरे साथ संगम करो।
श्लोक 21 (1.120.21)
अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे । वृथाऽऽह्वानेऽपि ते भीरु दोषः स्यान्नात्र संशयः ॥
amoghaṃ darśanaṃ mahyamāhūtaścāsmi te śubhe | vṛthā''hvāne'pi te bhīru doṣaḥ syānnātra saṃśayaḥ
"मेरा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, और हे शुभे, तुमने मुझे बुलाया है। हे भीरु, व्यर्थ आवाहन करने पर भी तुम्हें दोष लगेगा, इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 22 (1.120.22)
यद्येवं मन्यसे भीरु किमाह्वयसि भास्करम् । यदि मामवजानासि ऋषिः स न भविष्यति ॥
yadyevaṃ manyase bhīru kimāhvayasi bhāskaram | yadi māmavajānāsi ṛṣiḥ sa na bhaviṣyati
"हे भीरु, यदि तुम ऐसा सोचती हो तो तुमने भास्कर को बुलाया ही क्यों? यदि तुम मेरा अनादर करोगी तो वह ऋषि नहीं बचेगा।
श्लोक 23 (1.120.23)
मन्त्रदानेन यस्मात्त्वमवलेपेन दर्पिता । कुलं च तेऽद्य धक्ष्यामि क्रोधदीप्तेन चक्षुषा ॥
mantradānena yasmāttvamavalepena darpitā | kulaṃ ca te'dya dhakṣyāmi krodhadīptena cakṣuṣā
"क्योंकि उसके दिए मन्त्र से तुम घमण्ड में आकर ढिठाई कर रही हो, इसलिए आज मैं क्रोध से दहकती अपनी दृष्टि से तुम्हारे कुल को भस्म कर दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (1.120.24)
एवमुक्ता बहुविधं सान्त्वपूर्वं विवस्वता । सा तु नैच्छद्वरारोहा कन्याहमिति भारत ॥
evamuktā bahuvidhaṃ sāntvapūrvaṃ vivasvatā | sā tu naicchadvarārohā kanyāhamiti bhārata
वैशम्पायन ने कहा — हे भारत! विवस्वान् ने पहले सान्त्वना देते हुए अनेक प्रकार से उससे कहा, पर वह सुन्दरी "मैं कुमारी हूँ" कहकर सहमत नहीं हुई।
श्लोक 25 (1.120.25)
बन्धुपक्षभयाद्भीता लज्जया च यशस्विनी । तामर्कः पुनरेवेदमब्रवीद्भरतर्षभ ॥
bandhupakṣabhayādbhītā lajjayā ca yaśasvinī | tāmarkaḥ punarevedamabravīdbharatarṣabha
वह यशस्विनी अपने बन्धु-बान्धवों के भय से डरी हुई थी और लज्जित भी थी। तब, हे भरतश्रेष्ठ, सूर्य ने उससे फिर कहा —
श्लोक 26 (1.120.26)
मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत ॥
matprasādānna te rājñi bhavitā doṣa ityuta
"हे राजकुमारी, मेरी कृपा से तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 27 (1.120.27)
प्रसीद भगवन्मह्यमवलेपो हि नास्ति मे । त्वयैव परिहार्यं स्यात्कन्याभावस्य दूषणम् ॥
prasīda bhagavanmahyamavalepo hi nāsti me | tvayaiva parihāryaṃ syātkanyābhāvasya dūṣaṇam
कुन्ती ने कहा — "भगवन्, मुझ पर प्रसन्न होइए; मुझमें कोई घमण्ड नहीं है। मेरे कौमार्य पर लगने वाले कलंक को आप ही दूर कीजिए।"
आदित्य उवाच
श्लोक 28 (1.120.28)
व्यपयातु भयं तेऽद्य कुमारं प्रसमीक्षसे । मया त्वं चाप्यनुज्ञाता पुनः कन्या भविष्यसि ॥
vyapayātu bhayaṃ te'dya kumāraṃ prasamīkṣase | mayā tvaṃ cāpyanujñātā punaḥ kanyā bhaviṣyasi
आदित्य ने कहा — "आज तुम्हारा भय दूर हो जाए। तुम पुत्र का दर्शन करोगी, और मेरी अनुमति से तुम फिर कुमारी हो जाओगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (1.120.29)
एवमुक्ता ततः कुन्ती संप्रहृष्टतनूरुहा । सङ्गताऽभूत्तदा सुभ्रूरादित्येन महात्मना ॥
evamuktā tataḥ kuntī saṃprahṛṣṭatanūruhā | saṅgatā'bhūttadā subhrūrādityena mahātmanā
वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहे जाने पर हर्ष से रोमांचित, सुन्दर भौंहों वाली कुन्ती का महात्मा आदित्य से संगम हुआ।
श्लोक 30 (1.120.30)
प्रकाशकर्मा तपनः कन्यागर्भं ददौ पुनः । तत्र वीरः समभवत्सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
prakāśakarmā tapanaḥ kanyāgarbhaṃ dadau punaḥ | tatra vīraḥ samabhavatsarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ
प्रकाश देना जिनका कर्म है, उन तपन ने उस कुमारी में गर्भ स्थापित किया, और उससे सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ एक वीर उत्पन्न हुआ —
श्लोक 31 (1.120.31)
आमुक्तकवचः श्रीमान्देवगर्भः श्रियान्वितः । सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलोद्द्योतिताननः ॥
āmuktakavacaḥ śrīmāndevagarbhaḥ śriyānvitaḥ | sahajaṃ kavacaṃ bibhratkuṇḍaloddyotitānanaḥ
कवचधारी, तेजस्वी, देवता के अंश से जन्मा, शोभा से सम्पन्न, जन्मजात कवच पहने और कुण्डलों से दमकते मुख वाला।
श्लोक 32 (1.120.32)
अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः । प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः ॥
ajāyata sutaḥ karṇaḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ | prādācca tasyai kanyātvaṃ punaḥ sa paramadyutiḥ
इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकों में विख्यात है। और उन परम तेजस्वी देव ने उसे फिर से कौमार्य लौटा दिया।
श्लोक 33 (1.120.33)
दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः । दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा ॥
dattvā ca tapatāṃ śreṣṭho divamācakrame tataḥ | dṛṣṭvā kumāraṃ jātaṃ sā vārṣṇeyī dīnamānasā
यह देकर तपने वालों में श्रेष्ठ सूर्यदेव स्वर्ग को चले गए। उत्पन्न हुए बालक को देखकर वृष्णिवंश की वह कन्या मन में दुःखी हो गई।
श्लोक 34 (1.120.34)
एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् । गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात्तदा ॥
ekāgraṃ cintayāmāsa kiṃ kṛtvā sukṛtaṃ bhavet | gūhamānāpacāraṃ sā bandhupakṣabhayāttadā
वह एकाग्र होकर सोचने लगी कि क्या करने से भला होगा। तब बन्धु-बान्धवों के भय से अपने उस दोष को छिपाते हुए
श्लोक 35 (1.120.35)
मञ्जूषां रत्नसंपूर्णां कृत्वा बालसमाश्रिताम् । उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ॥
mañjūṣāṃ ratnasaṃpūrṇāṃ kṛtvā bālasamāśritām | utsasarja kumāraṃ taṃ jale kuntī mahābalam
कुन्ती ने रत्नों से भरी एक मंजूषा बनवाकर उसमें बालक को रखा और उस महाबली कुमार को जल में बहा दिया।
श्लोक 36 (1.120.36)
तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः । पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ॥
tamutsṛṣṭaṃ jale garbhaṃ rādhābhartā mahāyaśāḥ | putratve kalpayāmāsa sabhāryaḥ sūtanandanaḥ
जल में बहाए गए उस शिशु को राधा के पति, महायशस्वी सूतपुत्र ने अपनी पत्नी सहित पुत्र के रूप में अपना लिया।
श्लोक 37 (1.120.37)
नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तावुभौ । वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवत्विति ॥
nāmadheyaṃ ca cakrāte tasya bālasya tāvubhau | vasunā saha jāto'yaṃ vasuṣeṇo bhavatviti
उन दोनों ने उस बालक का नामकरण किया — "यह वसु (धन) के साथ जन्मा है, इसलिए इसका नाम वसुषेण हो।"
श्लोक 38 (1.120.38)
स वर्धमानो बलवान्सर्वास्त्रेषूद्यतोऽभवत् । आपृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान् ॥
sa vardhamāno balavānsarvāstreṣūdyato'bhavat | āpṛṣṭhatāpādādityamupātiṣṭhata vīryavān
बड़ा होते हुए वह बलवान् बालक सब अस्त्रों के अभ्यास में लग गया। वह पराक्रमी तब तक सूर्य की उपासना करता था जब तक धूप उसकी पीठ को तपाने न लगे।
श्लोक 39 (1.120.39)
तस्मिन्काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत्किंचिद्वसु महीतले ॥
tasminkāle tu japatastasya vīrasya dhīmataḥ | nādeyaṃ brāhmaṇeṣvāsītkiṃcidvasu mahītale
जब वह बुद्धिमान वीर जप करता था, उस समय पृथ्वी पर ऐसा कोई धन नहीं था जो वह ब्राह्मणों को न दे।
श्लोक 40 (1.120.40)
ततः काले तु कस्मिंश्चित्स्वप्नान्ते कर्णमब्रवीत् । आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शृणु वीर वचो मम ॥
tataḥ kāle tu kasmiṃścitsvapnānte karṇamabravīt | ādityo brāhmaṇo bhūtvā śṛṇu vīra vaco mama
फिर किसी समय स्वप्न के अन्त में आदित्य ने ब्राह्मण का रूप धरकर कर्ण से कहा — "हे वीर, मेरी बात सुनो।"
सूर्य उवाच
श्लोक 41 (1.120.41)
प्रभातायां रजन्यां त्वामागमिष्यति वासवः । न तस्य भिक्षा दातव्या विप्ररूपी भविष्यति ॥
prabhātāyāṃ rajanyāṃ tvāmāgamiṣyati vāsavaḥ | na tasya bhikṣā dātavyā viprarūpī bhaviṣyati
सूर्य ने कहा — "रात बीतकर सवेरा होने पर इन्द्र तुम्हारे पास आएँगे। उन्हें भिक्षा मत देना; वे ब्राह्मण का रूप धरकर आएँगे।
श्लोक 42 (1.120.42)
निश्चयोऽस्यापहर्तुं ते कवचं कुण्डले तथा । अतस्त्वां बोधयाम्येष स्मर्तासि वचनं मम ॥
niścayo'syāpahartuṃ te kavacaṃ kuṇḍale tathā | atastvāṃ bodhayāmyeṣa smartāsi vacanaṃ mama
"उनका निश्चय तुम्हारा कवच और कुण्डल हर लेने का है। इसीलिए मैं तुम्हें सचेत कर रहा हूँ; मेरी बात याद रखना।"
कर्ण उवाच
श्लोक 43 (1.120.43)
शक्रो मां विप्ररूपेण यदि वै याचते द्विज । कथं तस्मै न दास्यामि यथा चास्म्यवबोधितः ॥
śakro māṃ viprarūpeṇa yadi vai yācate dvija | kathaṃ tasmai na dāsyāmi yathā cāsmyavabodhitaḥ
कर्ण ने कहा — "हे द्विज! यदि इन्द्र ब्राह्मण के रूप में मुझसे याचना करें, तो इस प्रकार सचेत किए जाने पर भी मैं उन्हें कैसे मना करूँ?
श्लोक 44 (1.120.44)
विप्राः पूज्यास्तु देवानां सततं प्रियमिच्छताम् । तं देवदेवं जानन्वै न शक्तोऽस्म्यवमन्त्रणे ॥
viprāḥ pūjyāstu devānāṃ satataṃ priyamicchatām | taṃ devadevaṃ jānanvai na śakto'smyavamantraṇe
"जो अपना हित चाहते हैं, उनके लिए, देवताओं के लिए भी, ब्राह्मण सदा पूजनीय हैं। उन्हें देवों का देव जानते हुए मैं उनका अनादर नहीं कर सकता।"
सूर्य उवाच
श्लोक 45 (1.120.45)
यद्येवं शृणु मे वीर वरं ते सोऽपि दास्यति । शक्तिं त्वमपि याचेथाः सर्वशत्रुविबाधिनीम् ॥
yadyevaṃ śṛṇu me vīra varaṃ te so'pi dāsyati | śaktiṃ tvamapi yācethāḥ sarvaśatruvibādhinīm
सूर्य ने कहा — "हे वीर, यदि ऐसा है तो मेरी बात सुनो: वे भी तुम्हें वर देंगे। तुम भी उनसे सब शत्रुओं को नष्ट करने वाली शक्ति माँग लेना।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 46 (1.120.46)
एवमुक्त्वा द्विजः स्वप्ने तत्रैवान्तरधीयत । कर्णः प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत्तदा ॥
evamuktvā dvijaḥ svapne tatraivāntaradhīyata | karṇaḥ prabuddhastaṃ svapnaṃ cintayāno'bhavattadā
वैशम्पायन ने कहा — यह कहकर वह ब्राह्मण स्वप्न में ही वहीं अन्तर्धान हो गया। कर्ण जाग उठा और उस स्वप्न के विषय में सोचता रहा।
श्लोक 47 (1.120.47)
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थं भूतभावनः । कुण्डले प्रार्थयामास कवचं च महाद्युतिः ॥
tamindro brāhmaṇo bhūtvā putrārthaṃ bhūtabhāvanaḥ | kuṇḍale prārthayāmāsa kavacaṃ ca mahādyutiḥ
प्राणियों के उत्पादक, महातेजस्वी इन्द्र ने अपने पुत्र के हित के लिए ब्राह्मण का रूप धरकर कर्ण से उसके कुण्डल और कवच माँगे।
श्लोक 48 (1.120.48)
उत्कृत्याविमनाः स्वाङ्गात्कवचं रुधिरस्रवम् । कर्णौ पार्श्वे च द्वे छित्त्वा प्रायच्छत्स कृताञ्जलिः ॥
utkṛtyāvimanāḥ svāṅgātkavacaṃ rudhirasravam | karṇau pārśve ca dve chittvā prāyacchatsa kṛtāñjaliḥ
बिना खिन्न हुए कर्ण ने अपने शरीर से रक्त बहाता कवच उधेड़ दिया, और दोनों ओर अपने दोनों कानों से कुण्डल काटकर हाथ जोड़े हुए उन्हें सौंप दिया।
श्लोक 49 (1.120.49)
प्रतिगृह्य तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा । अहो साहसमित्याह मनसा वासवो हसन् ॥
pratigṛhya tu deveśastuṣṭastenāsya karmaṇā | aho sāhasamityāha manasā vāsavo hasan
देवराज ने उन्हें ग्रहण किया और उसके इस कर्म से सन्तुष्ट होकर इन्द्र ने मन ही मन मुस्कराते हुए कहा — "अहो, कैसा साहस!"
इन्द्र उवाच
श्लोक 50 (1.120.50)
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । न तं पश्यामि यो ह्येतत्कर्म कर्ता भविष्यति ॥
devadānavayakṣāṇāṃ gandharvoragarakṣasām | na taṃ paśyāmi yo hyetatkarma kartā bhaviṣyati
इन्द्र ने कहा — "देवताओं, दानवों, यक्षों, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों में मैं ऐसा कोई नहीं देखता जो ऐसा कर्म कर सके।
श्लोक 51 (1.120.51)
प्रीतोऽस्मि कर्मणा तेन वरं ब्रूहि यदिच्छसि ॥
prīto'smi karmaṇā tena varaṃ brūhi yadicchasi
"तुम्हारे इस कर्म से मैं प्रसन्न हूँ। जो वर चाहते हो, माँगो।"
कर्ण उवाच
श्लोक 52 (1.120.52)
इच्छामि भगवद्दत्तां शक्तिं शत्रुनिबर्हणीम् ॥
icchāmi bhagavaddattāṃ śaktiṃ śatrunibarhaṇīm
कर्ण ने कहा — "भगवन्, मैं आपके द्वारा दी गई, शत्रुओं का संहार करने वाली शक्ति चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 53 (1.120.53)
शक्तिं तस्मै ददौ शक्रो विस्मयाद्वाक्यमब्रवीत् । देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ॥
śaktiṃ tasmai dadau śakro vismayādvākyamabravīt | devadānavayakṣāṇāṃ gandharvoragarakṣasām
वैशम्पायन ने कहा — इन्द्र ने उसे शक्ति दे दी और विस्मित होकर यह वचन कहा — "देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस —
श्लोक 54 (1.120.54)
यस्मै क्षेप्स्यसि रुष्टः सन्सोऽनया न भविष्यति । हत्वैकं समरे शत्रुं ततो मामागमिष्यति । इत्युक्त्वान्तर्दधे शक्रो वरं दत्त्वा तु तस्य वै ॥
yasmai kṣepsyasi ruṣṭaḥ sanso'nayā na bhaviṣyati | hatvaikaṃ samare śatruṃ tato māmāgamiṣyati | ityuktvāntardadhe śakro varaṃ dattvā tu tasya vai
"इनमें से जिस पर भी तुम क्रोध में इसे चलाओगे, वह इससे बच नहीं पाएगा। युद्ध में एक शत्रु को मारकर यह मेरे पास लौट आएगी।" यह कहकर और उसे वर देकर इन्द्र अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 55 (1.120.55)
प्राङ्नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ । कर्णो वैकर्तनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥
prāṅnāma tasya kathitaṃ vasuṣeṇa iti kṣitau | karṇo vaikartanaścaiva karmaṇā tena so'bhavat
पृथ्वी पर पहले उसका नाम वसुषेण कहा जाता था; उसी कर्म के कारण वह कर्ण और वैकर्तन कहलाया।