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आदि पर्व · अध्याय 134

पाण्डु की मृत्यु और माद्री का सहगमन

जनमेजय के प्रश्न पर वैशम्पायन पहले पाण्डवों के जीवन के प्रत्येक चरण में उनकी आयु बताते हैं, जिसके अनुसार युधिष्ठिर की आयु एक सौ आठ वर्ष हुई। फिर वे बताते हैं कि वसन्त ऋतु में शतशृंग पर्वत पर पाण्डु माद्री के प्रति काम से अभिभूत हो गए और शाप को भूलकर उनके आलिंगन में ही प्राण त्याग बैठे। कुन्ती, माद्री और पाँचों पुत्र विलाप करते हैं; ऋषि दोनों विधवाओं से जीवित रहने का आग्रह करते हैं, परन्तु माद्री अपने जुड़वाँ पुत्र कुन्ती को सौंपकर, पाण्डु के अन्तिम संस्कार के बाद, कुन्ती की अनुमति से चिता पर उनका अनुगमन करती हैं।

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (1.134.1)

कस्मिन्वयसि संप्राप्ताः पाण्डवा गजसाह्वयम् । समपद्यन्त देवेभ्यस्तेषामायुश्च किं परम् ॥

kasminvayasi saṃprāptāḥ pāṇḍavā gajasāhvayam | samapadyanta devebhyasteṣāmāyuśca kiṃ param

देवताओं से उत्पन्न पाण्डव किस आयु में हस्तिनापुर पहुँचे थे? और उनकी पूरी आयु कितनी थी?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (1.134.2)

पाण्डवानामिहायुष्यं शृणु कौरवनन्दन । जगाम हास्तिनपुरं षोडशाब्दो युधिष्ठिरः ॥

pāṇḍavānāmihāyuṣyaṃ śṛṇu kauravanandana | jagāma hāstinapuraṃ ṣoḍaśābdo yudhiṣṭhiraḥ

हे कुरुनन्दन, अब पाण्डवों की आयु का वृत्तान्त सुनो। युधिष्ठिर सोलह वर्ष के थे जब वे हस्तिनापुर गए।

श्लोक 3 (1.134.3)

भीमसेनः पञ्चदशो बीभत्सुर्वै चतुर्दशः । त्रयोदशाब्दौ च यमौ जग्मतुर्नागसाह्वयम् ॥

bhīmasenaḥ pañcadaśo bībhatsurvai caturdaśaḥ | trayodaśābdau ca yamau jagmaturnāgasāhvayam

भीमसेन पन्द्रह वर्ष के थे, बीभत्सु (अर्जुन) चौदह के, और दोनों जुड़वाँ भाई तेरह वर्ष के थे, जब वे हाथी के नाम वाले नगर (हस्तिनापुर) पहुँचे।

श्लोक 4 (1.134.4)

तत्र त्रयोदशाब्दानि धार्तराष्ट्रैः सहोषिताः । षण्मासाञ्जातुषगृहान्मुक्ता जातो घटोत्कचः ॥

tatra trayodaśābdāni dhārtarāṣṭraiḥ sahoṣitāḥ | ṣaṇmāsāñjātuṣagṛhānmuktā jāto ghaṭotkacaḥ

वहाँ वे तेरह वर्ष धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ रहे। लाक्षागृह से छूटने के छह महीने बाद घटोत्कच का जन्म हुआ।

श्लोक 5 (1.134.5)

षण्मासानेकचक्रायां वर्षं पाञ्चालके गृहे । धार्तराष्ट्रैः सहोषित्वा पञ्च वर्षाणि भारत ॥

ṣaṇmāsānekacakrāyāṃ varṣaṃ pāñcālake gṛhe | dhārtarāṣṭraiḥ sahoṣitvā pañca varṣāṇi bhārata

छह महीने वे एकचक्रा में रहे और एक वर्ष पाञ्चालराज के घर में; फिर, हे भारत, पाँच वर्ष वे धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ रहे।

श्लोक 6 (1.134.6)

इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते त्रीणि वर्षाणि विंशतिम् । द्वादशाब्दानथैकं च बभूवुर्द्यूतनिर्जिताः ॥

indraprasthe vasantaste trīṇi varṣāṇi viṃśatim | dvādaśābdānathaikaṃ ca babhūvurdyūtanirjitāḥ

इन्द्रप्रस्थ में वे तेईस वर्ष रहे, और फिर जुए में हारकर तेरह वर्ष निर्वासित रहे।

श्लोक 7 (1.134.7)

भुक्त्वा षट्त्रिंशतं राजन्सागरान्तां वसुन्धराम् । मासैः षड्भिर्महात्मानः सर्वे कृष्णपरायणाः ॥

bhuktvā ṣaṭtriṃśataṃ rājansāgarāntāṃ vasundharām | māsaiḥ ṣaḍbhirmahātmānaḥ sarve kṛṣṇaparāyaṇāḥ

हे राजन्, फिर कृष्ण-परायण उन सब महात्माओं ने छत्तीस वर्ष और छह महीने तक समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का राज्य भोगा।

श्लोक 8 (1.134.8)

राज्ये परीक्षितं स्थाप्य दिष्टां गतिमवाप्नुवन् । एवं युधिष्ठिरस्यासीदायुरष्टोत्तरं शतम् ॥

rājye parīkṣitaṃ sthāpya diṣṭāṃ gatimavāpnuvan | evaṃ yudhiṣṭhirasyāsīdāyuraṣṭottaraṃ śatam

फिर परीक्षित को राज्य पर बिठाकर वे विधि द्वारा निश्चित गति को प्राप्त हुए। इस प्रकार युधिष्ठिर की आयु एक सौ आठ वर्ष की हुई।

श्लोक 9 (1.134.9)

अर्जुनात्केशवो ज्येष्ठस्त्रिभिर्मासैर्महाद्युतिः । कृष्णात्संकर्षणो ज्येष्ठस्त्रिभिर्मासैर्महाबलः ॥

arjunātkeśavo jyeṣṭhastribhirmāsairmahādyutiḥ | kṛṣṇātsaṃkarṣaṇo jyeṣṭhastribhirmāsairmahābalaḥ

महातेजस्वी केशव अर्जुन से तीन महीने बड़े थे, और महाबली संकर्षण (बलराम) कृष्ण से तीन महीने बड़े थे।

श्लोक 10 (1.134.10)

पाण्डुः पञ्च महातेजास्तान्पश्यन्पर्वते सुतान् । रेमे स काश्यपयुतः पत्नीभ्यां सुभृशं तदा ॥

pāṇḍuḥ pañca mahātejāstānpaśyanparvate sutān | reme sa kāśyapayutaḥ patnībhyāṃ subhṛśaṃ tadā

महातेजस्वी पाण्डु पर्वत पर अपने पाँचों पुत्रों को देखते हुए, (पुरोहित) काश्यप के साथ, अपनी दोनों पत्नियों के संग उस समय बड़े आनन्द से रहने लगे।

श्लोक 11 (1.134.11)

सुपुष्पितवने काले प्रवृत्ते मधुमाधवे । पूर्णे चतुर्दशे वर्षे फल्गुनस्य च धीमतः ॥

supuṣpitavane kāle pravṛtte madhumādhave | pūrṇe caturdaśe varṣe phalgunasya ca dhīmataḥ

फिर वसन्त ऋतु आई, जब वन फूलों से लदा था, और बुद्धिमान फाल्गुन (अर्जुन) का चौदहवाँ वर्ष पूरा हो चुका था।

श्लोक 12 (1.134.12)

यस्मिन्नृक्षे समुत्पन्नः पार्थस्तस्य च धीमतः । तस्मिन्नुत्तरफल्गुन्यां प्रवृत्ते स्वस्तिवाचने ॥

yasminnṛkṣe samutpannaḥ pārthastasya ca dhīmataḥ | tasminnuttaraphalgunyāṃ pravṛtte svastivācane

जिस नक्षत्र में बुद्धिमान पार्थ का जन्म हुआ था, उसी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में स्वस्तिवाचन का अनुष्ठान चल रहा था।

श्लोक 13 (1.134.13)

रक्षणे विस्मृता कुन्ती व्यग्रा ब्राह्मणभोजने । पुरोहितेन सहितान्ब्राह्मणान्पर्यवेषयत् ॥

rakṣaṇe vismṛtā kuntī vyagrā brāhmaṇabhojane | purohitena sahitānbrāhmaṇānparyaveṣayat

ब्राह्मण-भोजन में व्यस्त कुन्ती राजा की रखवाली करना भूल गईं; वे पुरोहित के साथ ब्राह्मणों को भोजन परोस रही थीं।

श्लोक 14 (1.134.14)

दर्शनीयांस्ततः पुत्रान्पाण्डुः पञ्च महावने । तान्पश्यन्पर्वते रम्ये स्वबाहुबलमाश्रितः ॥

darśanīyāṃstataḥ putrānpāṇḍuḥ pañca mahāvane | tānpaśyanparvate ramye svabāhubalamāśritaḥ

अपनी भुजाओं के बल पर भरोसा रखने वाले पाण्डु उस विशाल वन में, रमणीय पर्वत पर, अपने पाँचों दर्शनीय पुत्रों को देखा करते थे।

श्लोक 15 (1.134.15)

सुपुष्पितवने काले कदाचिन्मधुमाधवे । भूतसंमोहने राजा सभार्यो व्यचरद्वनम् ॥

supuṣpitavane kāle kadācinmadhumādhave | bhūtasaṃmohane rājā sabhāryo vyacaradvanam

एक बार वसन्त ऋतु में, जब वन फूलों से लदा था और वह ऋतु सब प्राणियों को मोहित कर रही थी, राजा अपनी पत्नी के साथ वन में विचर रहे थे।

श्लोक 16 (1.134.16)

पलाशैस्तिलकैश्चूतैश्चम्पकैः पारिभद्रकैः । अन्यैश्च बहुभिर्वृक्षैः फलपुष्पसमृद्धिभिः ॥

palāśaistilakaiścūtaiścampakaiḥ pāribhadrakaiḥ | anyaiśca bahubhirvṛkṣaiḥ phalapuṣpasamṛddhibhiḥ

वह वन पलाश, तिलक, आम, चम्पक और पारिभद्रक के वृक्षों से, तथा फल-फूलों से लदे और भी बहुत-से वृक्षों से भरा था,

श्लोक 17 (1.134.17)

जलस्थानैश्च विविधैः पद्मिनीभिश्च शोभितम् । पाण्डोर्वनं तत्संप्रेक्ष्य प्रजज्ञे हृदि मन्मथः ॥

jalasthānaiśca vividhaiḥ padminībhiśca śobhitam | pāṇḍorvanaṃ tatsaṃprekṣya prajajñe hṛdi manmathaḥ

और भाँति-भाँति के जलाशयों तथा कमल-सरोवरों से सुशोभित था। उस वन को देखकर पाण्डु के हृदय में काम जाग उठा।

श्लोक 18 (1.134.18)

प्रहृष्टमनसं तत्र विचरन्तं यथाऽमरम् । तं माद्र्यनुजगामैका वसनं बिभ्रती शुभम् ॥

prahṛṣṭamanasaṃ tatra vicarantaṃ yathā'maram | taṃ mādryanujagāmaikā vasanaṃ bibhratī śubham

प्रसन्नचित्त होकर देवता की भाँति वहाँ विचरते हुए पाण्डु के पीछे-पीछे केवल माद्री चल रही थीं, जो सुन्दर वस्त्र पहने हुए थीं।

श्लोक 19 (1.134.19)

समीक्षमाणः स तु तां वयःस्थां तनुवाससम् । तस्य कामः प्रववृधे गहनेऽग्निरिवोद्गतः ॥

samīkṣamāṇaḥ sa tu tāṃ vayaḥsthāṃ tanuvāsasam | tasya kāmaḥ pravavṛdhe gahane'gnirivodgataḥ

युवा और झीने वस्त्र पहने माद्री को देखते ही उनका काम घने वन में भड़की आग की तरह बढ़ने लगा।

श्लोक 20 (1.134.20)

रहस्येकां तु तां दृष्ट्वा राजा राजीवलोचनाम् । न शशाक नियन्तुं तं कामं कामवशीकृतः ॥

rahasyekāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā rājā rājīvalocanām | na śaśāka niyantuṃ taṃ kāmaṃ kāmavaśīkṛtaḥ

एकान्त में अकेली उस कमलनयनी को देखकर काम के वश में हुए राजा अपनी कामना को रोक न सके।

श्लोक 21 (1.134.21)

अथ सोऽष्टादशे वर्षे ऋतौ माद्रीमलङ्कृताम् । आजुहाव ततः पाण्डुः परीतात्मा यशस्विनीम् ॥

atha so'ṣṭādaśe varṣe ṛtau mādrīmalaṅkṛtām | ājuhāva tataḥ pāṇḍuḥ parītātmā yaśasvinīm

तब अठारहवें वर्ष में, काम से विह्वल पाण्डु ने ऋतुकाल में सजी-धजी यशस्विनी माद्री को अपने पास बुलाया।

श्लोक 22 (1.134.22)

तत एनां बलाद्राजा निजग्राह रहोगताम् । वार्यमाणस्तया देव्या विस्फुरन्त्या यथाबलम् ॥

tata enāṃ balādrājā nijagrāha rahogatām | vāryamāṇastayā devyā visphurantyā yathābalam

तब राजा ने उस एकान्त स्थान में उन्हें बलपूर्वक पकड़ लिया, यद्यपि देवी माद्री पूरी शक्ति से छटपटाती हुई उन्हें रोकती रहीं।

श्लोक 23 (1.134.23)

स तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्वबुध्यत । माद्रीं मैथुनधर्मेण सोऽन्वगच्छद्बलादिव ॥

sa tu kāmaparītātmā taṃ śāpaṃ nānvabudhyata | mādrīṃ maithunadharmeṇa so'nvagacchadbalādiva

काम से व्याकुल चित्त वाले पाण्डु को उस शाप का ध्यान ही न रहा, और उन्होंने मानो बलपूर्वक माद्री के साथ समागम किया।

श्लोक 24 (1.134.24)

जीवितान्ताय कौरव्य मन्मथस्य वशं गतः । शापजं भयमुत्सृज्य विधिना संप्रचोदितः ॥

jīvitāntāya kauravya manmathasya vaśaṃ gataḥ | śāpajaṃ bhayamutsṛjya vidhinā saṃpracoditaḥ

हे कौरव्य, काम के वश में होकर और विधाता की प्रेरणा से, शाप के भय को त्यागकर वे अपने जीवन के अन्त की ओर बढ़ गए।

श्लोक 25 (1.134.25)

तस्य कामात्मनो बुद्धिः साक्षात्कालेन मोहिता । संप्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रनष्टा सह चेतसा ॥

tasya kāmātmano buddhiḥ sākṣātkālena mohitā | saṃpramathyendriyagrāmaṃ pranaṣṭā saha cetasā

काम में डूबी उनकी बुद्धि को साक्षात् काल ने मोहित कर दिया था; वह इन्द्रियों के समूह को मथकर चेतना के साथ ही नष्ट हो गई।

श्लोक 26 (1.134.26)

स तया सह संगम्य भार्यया कुरुनन्दनः । पाण्डुः परमधर्मात्मा युयुजे कालधर्मणा ॥

sa tayā saha saṃgamya bhāryayā kurunandanaḥ | pāṇḍuḥ paramadharmātmā yuyuje kāladharmaṇā

अपनी पत्नी से समागम करते ही परम धर्मात्मा कुरुनन्दन पाण्डु मृत्यु को प्राप्त हो गए।

श्लोक 27 (1.134.27)

ततो माद्री समालिङ्ग्य राजानं गतचेतसम् । मुमोच दुःखजं शब्दं पुनः पुनरतीव हि ॥

tato mādrī samāliṅgya rājānaṃ gatacetasam | mumoca duḥkhajaṃ śabdaṃ punaḥ punaratīva hi

तब माद्री निष्प्राण राजा से लिपटकर बार-बार दुःख से चीत्कार करने लगीं।

श्लोक 28 (1.134.28)

सह पुत्रैस्ततः कुन्ती माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । आजग्मुः सहितास्तत्र यत्र राजा तथागतः ॥

saha putraistataḥ kuntī mādrīputrau ca pāṇḍavau | ājagmuḥ sahitāstatra yatra rājā tathāgataḥ

तब अपने पुत्रों के साथ कुन्ती और माद्री के दोनों पुत्र एक साथ उस स्थान पर आए जहाँ राजा उस दशा में पड़े थे।

श्लोक 29 (1.134.29)

ततो माद्र्यब्रवीद्राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः । एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः ॥

tato mādryabravīdrājannārtā kuntīmidaṃ vacaḥ | ekaiva tvamihāgaccha tiṣṭhantvatraiva dārakāḥ

हे राजन्, तब दुःखी माद्री ने कुन्ती से कहा — "तुम अकेली यहाँ आओ; बच्चे वहीं ठहरें।"

श्लोक 30 (1.134.30)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवाधाय दारकान् । हताऽहमिति विक्रुश्य सहसैवाजगाम सा ॥

tacchrutvā vacanaṃ tasyāstatraivādhāya dārakān | hatā'hamiti vikruśya sahasaivājagāma sā

उनकी बात सुनकर कुन्ती बच्चों को वहीं छोड़कर "हाय, मैं मारी गई!" चिल्लाती हुई तुरन्त वहाँ आ पहुँचीं।

श्लोक 31 (1.134.31)

दृष्ट्वा पाण्डुं च माद्रीं च शयानौ धरणीतले । कुन्ती शोकपरीताङ्गी विललाप सुदुःखिता ॥

dṛṣṭvā pāṇḍuṃ ca mādrīṃ ca śayānau dharaṇītale | kuntī śokaparītāṅgī vilalāpa suduḥkhitā

पाण्डु और माद्री को धरती पर पड़े देखकर शोक से व्याकुल कुन्ती अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं।

कुन्त्युवाच

श्लोक 32 (1.134.32)

रक्ष्यमाणो मया नित्यं वीरः सततमात्मवान् । कथं त्वामभ्यतिक्रान्तः शापं जानन्वनौकसः ॥

rakṣyamāṇo mayā nityaṃ vīraḥ satatamātmavān | kathaṃ tvāmabhyatikrāntaḥ śāpaṃ jānanvanaukasaḥ

मैं सदा इस वीर की रक्षा करती थी, और ये सदा संयमी रहे। फिर वनवासी मुनि के शाप को जानते हुए भी इन्होंने तुम्हारे साथ उसका उल्लंघन कैसे कर दिया?

श्लोक 33 (1.134.33)

ननु नाम त्वया माद्रि रक्षितव्यो नराधिपः । सा कथं लोभितवती विजने त्वं नराधिपम् ॥

nanu nāma tvayā mādri rakṣitavyo narādhipaḥ | sā kathaṃ lobhitavatī vijane tvaṃ narādhipam

माद्री, तुम्हें तो राजा की रक्षा करनी चाहिए थी। फिर तुमने इस निर्जन स्थान में राजा को लुभाया कैसे?

श्लोक 34 (1.134.34)

कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् । तं विचिन्तयतः शापं प्रहर्षः समजायत ॥

kathaṃ dīnasya satataṃ tvāmāsādya rahogatām | taṃ vicintayataḥ śāpaṃ praharṣaḥ samajāyata

वे तो शाप का चिन्तन करते हुए सदा उदास रहते थे; फिर एकान्त में तुम्हें पाकर उनमें यह हर्ष कैसे उत्पन्न हुआ?

श्लोक 35 (1.134.35)

धन्या त्वमसि बाह्लीकि मत्तो भाग्यतरा तथा । दृष्टवत्यसि यद्वक्त्रं प्रहृष्टस्य महीपतेः ॥

dhanyā tvamasi bāhlīki matto bhāgyatarā tathā | dṛṣṭavatyasi yadvaktraṃ prahṛṣṭasya mahīpateḥ

बाह्लीक-कुमारी, तुम धन्य हो और मुझसे अधिक भाग्यशाली हो, क्योंकि तुमने महाराज का हर्ष से खिला मुख देखा है।

माद्र्युवाच

श्लोक 36 (1.134.36)

विलपन्त्या मया देवि वार्यमाणेन चासकृत् । आत्मा न वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा ॥

vilapantyā mayā devi vāryamāṇena cāsakṛt | ātmā na vārito'nena satyaṃ diṣṭaṃ cikīrṣuṇā

देवि, मैं रोती रही और बार-बार उन्हें रोकती रही, फिर भी उन्होंने स्वयं को नहीं रोका, मानो वे विधि के लेख को सत्य करना चाहते थे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (1.134.37)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा कुन्ती शोकाग्निदीपिता । पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥

tasyāstadvacanaṃ śrutvā kuntī śokāgnidīpitā | papāta sahasā bhūmau chinnamūla iva drumaḥ

उनकी बात सुनकर शोक की आग में जलती कुन्ती जड़ से कटे वृक्ष की भाँति सहसा भूमि पर गिर पड़ीं।

श्लोक 38 (1.134.38)

निश्चेष्टा पतिता भूमौ मोहेन न चचाल सा । तस्मिन्क्षणे कृतस्नानमहताम्बरसंवृतम् ॥

niśceṣṭā patitā bhūmau mohena na cacāla sā | tasminkṣaṇe kṛtasnānamahatāmbarasaṃvṛtam

वे मूर्च्छित होकर निश्चेष्ट भूमि पर पड़ी रहीं, हिल भी न सकीं। उसी क्षण, नहलाकर नए वस्त्र में लपेटे गए पाण्डु को,

श्लोक 39 (1.134.39)

अलङ्कारकृतं पाण्डुं शयानं शयने शुभे । कुन्तीमुत्थाप्य माद्री तु मोहेनाविष्टचेतनाम् ॥

alaṅkārakṛtaṃ pāṇḍuṃ śayānaṃ śayane śubhe | kuntīmutthāpya mādrī tu mohenāviṣṭacetanām

जो आभूषणों से सजाए गए थे और सुन्दर शय्या पर लिटाए गए थे, माद्री ने मोह से अचेत कुन्ती को उठाया,

श्लोक 40 (1.134.40)

आर्ये एहीति तां कुन्तीं दर्शयामास कौरव । पादयोः पतिता कुन्ती पुनरुत्थाय भूमिपम् ॥

ārye ehīti tāṃ kuntīṃ darśayāmāsa kaurava | pādayoḥ patitā kuntī punarutthāya bhūmipam

और "आर्ये, आओ" कहकर, हे कौरव, उन्हें कुन्ती को दिखाया। कुन्ती उनके चरणों में गिर पड़ीं, फिर उठकर उन्होंने राजा को देखा,

श्लोक 41 (1.134.41)

रक्तचन्दनदिग्धाङ्गं महारजनवाससम् । सस्मितेन च वक्त्रेण वदन्तमिव भारतम् ॥

raktacandanadigdhāṅgaṃ mahārajanavāsasam | sasmitena ca vaktreṇa vadantamiva bhāratam

जिनके अंगों पर लाल चन्दन लगा था, जो केसरिया वस्त्र पहने थे, और जिनका मुख मुस्कराता-सा था मानो वे भरतवंशी कुछ कहने वाले हों।

श्लोक 42 (1.134.42)

परिरभ्य ततो मोहाद्विललापाकुलेन्द्रिया । माद्री चापि समालिङ्ग्य राजानं विललाप सा ॥

parirabhya tato mohādvilalāpākulendriyā | mādrī cāpi samāliṅgya rājānaṃ vilalāpa sā

उन्होंने उनका आलिंगन किया और व्याकुल होकर मोहवश विलाप करने लगीं; माद्री भी राजा से लिपटकर विलाप करने लगीं।

श्लोक 43 (1.134.43)

तं तथा शायिनं पुत्रा ऋषयः सह चारणैः । अभ्येत्य सहिताः सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन् ॥

taṃ tathā śāyinaṃ putrā ṛṣayaḥ saha cāraṇaiḥ | abhyetya sahitāḥ sarve śokādaśrūṇyavartayan

उन्हें इस प्रकार लेटे देखकर उनके पुत्र तथा चारणों सहित ऋषिगण सब एक साथ वहाँ आए और शोक से आँसू बहाने लगे।

श्लोक 44 (1.134.44)

अस्तं गतमिवादित्यं संशुष्कमिव सागरम् । दृष्ट्वा पाण्डुं नरव्याघ्रं शोचन्ति स्म महर्षयः ॥

astaṃ gatamivādityaṃ saṃśuṣkamiva sāgaram | dṛṣṭvā pāṇḍuṃ naravyāghraṃ śocanti sma maharṣayaḥ

अस्त हुए सूर्य और सूखे समुद्र जैसे नरश्रेष्ठ पाण्डु को देखकर महर्षि शोक करने लगे।

श्लोक 45 (1.134.45)

समानशोका ऋषयः पाण्डवाश्च बभूविरे । ते समाश्वासिते विप्रैर्विलेपतुरनिन्दिते ॥

samānaśokā ṛṣayaḥ pāṇḍavāśca babhūvire | te samāśvāsite viprairvilepaturanindite

ऋषियों और पाण्डवों का शोक एक-सा था। ब्राह्मणों के सान्त्वना देने पर भी वे दोनों निर्दोष रानियाँ विलाप करती रहीं।

कुन्त्युवाच

श्लोक 46 (1.134.46)

हा राजन्कस्य नो हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम् । हा राजन्मम मन्दायाः कथं माद्रीं समेत्य वै ॥

hā rājankasya no hitvā gacchasi tridaśālayam | hā rājanmama mandāyāḥ kathaṃ mādrīṃ sametya vai

हाय राजन्, हमें किसके सहारे छोड़कर तुम देवलोक को जा रहे हो? हाय राजन्, मुझ अभागिन के रहते माद्री के पास जाकर तुम

श्लोक 47 (1.134.47)

निधनं प्राप्तवान्राजन्मद्भाग्यपरिसंक्षयात् । युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ ॥

nidhanaṃ prāptavānrājanmadbhāgyaparisaṃkṣayāt | yudhiṣṭhiraṃ bhīmasenamarjunaṃ ca yamāvubhau

मेरे सौभाग्य के क्षीण होने से, हे राजन्, मृत्यु को कैसे प्राप्त हो गए? युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई,

श्लोक 48 (1.134.48)

कस्य हित्वा प्रियान्पुत्रान्प्रयातोऽसि विशांपते । नूनं त्वां त्रिदशा देवाः प्रतिनन्दन्ति भारत ॥

kasya hitvā priyānputrānprayāto'si viśāṃpate | nūnaṃ tvāṃ tridaśā devāḥ pratinandanti bhārata

इन प्रिय पुत्रों को किसके भरोसे छोड़कर, हे प्रजानाथ, तुम चले गए? हे भारत, निश्चय ही स्वर्ग के देवता तुम्हारा अभिनन्दन कर रहे हैं,

श्लोक 49 (1.134.49)

यतो हि तप उग्रं वै चरितं ब्रह्मसंसदि । आवाभ्यां सहितो राजन्गमिष्यसि दिवं शुभम् ॥

yato hi tapa ugraṃ vai caritaṃ brahmasaṃsadi | āvābhyāṃ sahito rājangamiṣyasi divaṃ śubham

क्योंकि तुमने ब्राह्मणों की सभा में कठोर तप किया था। हे राजन्, तुम्हें तो हम दोनों के साथ ही शुभ स्वर्ग में जाना था,

श्लोक 50 (1.134.50)

आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरतां गतिम् । ननु नाम सहावाभ्यां गमिष्यामीति यत्त्वया ॥

ājamīḍhājamīḍhānāṃ karmaṇā caratāṃ gatim | nanu nāma sahāvābhyāṃ gamiṣyāmīti yattvayā

हे आजमीढ, उस गति को जो आजमीढवंशी अपने कर्मों से पाते हैं। क्या तुमने नहीं कहा था कि "मैं तुम दोनों के साथ ही जाऊँगा"?

श्लोक 51 (1.134.51)

प्रतिज्ञाता कुरुश्रेष्ठ यदाऽस्मि वनमागता । आवाभ्यां चैव सहितो गमिष्यसि विशांपते । मुहूर्तं क्षम्यतां राजन्द्रक्ष्येऽहं च मुखं तव ॥

pratijñātā kuruśreṣṭha yadā'smi vanamāgatā | āvābhyāṃ caiva sahito gamiṣyasi viśāṃpate | muhūrtaṃ kṣamyatāṃ rājandrakṣye'haṃ ca mukhaṃ tava

हे कुरुश्रेष्ठ, जब मैं वन में आई थी, तब तुमने यही प्रतिज्ञा की थी। इसलिए हे प्रजानाथ, तुम हम दोनों के साथ ही जाओगे। हे राजन्, एक क्षण ठहरो, मैं तुम्हारा मुख देख लूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 52 (1.134.52)

विलपित्वा भृशं चैव निःसंज्ञे पतिते भुवि । यथा हते मृगे मृग्यौ लुब्धैर्वनगते तथा ॥

vilapitvā bhṛśaṃ caiva niḥsaṃjñe patite bhuvi | yathā hate mṛge mṛgyau lubdhairvanagate tathā

इस प्रकार बहुत विलाप करके वे दोनों अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ीं, जैसे वन में शिकारियों द्वारा हिरन के मारे जाने पर दो हिरनियाँ गिर पड़ती हैं।

श्लोक 53 (1.134.53)

युधिष्ठिरमुखाः सर्वे पाण्डवा वेदपारगाः । तेऽभ्यागत्य पितुर्मूले निःसंज्ञाः पतिता भुवि ॥

yudhiṣṭhiramukhāḥ sarve pāṇḍavā vedapāragāḥ | te'bhyāgatya piturmūle niḥsaṃjñāḥ patitā bhuvi

युधिष्ठिर आदि सभी वेदपारंगत पाण्डव अपने पिता के चरणों के पास आकर अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 54 (1.134.54)

पाण्डोः पादौ परिष्वज्य विलपन्ति स्म पाण्डवाः । हा विनष्टाः स्म तातेति हा अनाथा भवामहे ॥

pāṇḍoḥ pādau pariṣvajya vilapanti sma pāṇḍavāḥ | hā vinaṣṭāḥ sma tāteti hā anāthā bhavāmahe

पाण्डु के चरणों से लिपटकर पाण्डव विलाप करने लगे — "हाय पिताजी, हम नष्ट हो गए! हाय, हम अनाथ हो गए!"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 55 (1.134.55)

त्वद्विहीना महाप्राज्ञ कथं जीवाम बालकाः । लोकनाथस्य पुत्राः स्मो न सनाथा भवामहे ॥

tvadvihīnā mahāprājña kathaṃ jīvāma bālakāḥ | lokanāthasya putrāḥ smo na sanāthā bhavāmahe

हे महाप्राज्ञ, आपके बिना हम बालक कैसे जिएँगे? हम लोकनाथ के पुत्र हैं, फिर भी अनाथ हो गए हैं।

श्लोक 56 (1.134.56)

क्षणेनैव महाराज अहो लोकस्य चित्रता । नास्मद्विधा राजपुत्रा अधन्याः सन्ति भारत ॥

kṣaṇenaiva mahārāja aho lokasya citratā | nāsmadvidhā rājaputrā adhanyāḥ santi bhārata

हे महाराज, एक ही क्षण में यह क्या हो गया! अहो, संसार कितना विचित्र है! हे भारत, हमारे जैसे अभागे राजकुमार और कोई नहीं।

श्लोक 57 (1.134.57)

त्वद्विनाशाच्च राजेन्द्र राज्यप्रस्खलनात्तदा । पाण्डवाश्च वयं सर्वे प्राप्ताः स्म व्यसनं महत् ॥

tvadvināśācca rājendra rājyapraskhalanāttadā | pāṇḍavāśca vayaṃ sarve prāptāḥ sma vyasanaṃ mahat

हे राजेन्द्र, आपकी मृत्यु से और पहले ही राज्य छूट जाने से हम सब पाण्डव बड़ी विपत्ति में पड़ गए हैं।

श्लोक 58 (1.134.58)

किं करिष्यामहे राजन्कर्तव्यं च प्रसीदताम् ॥

kiṃ kariṣyāmahe rājankartavyaṃ ca prasīdatām

हे राजन्, अब हम क्या करें? कृपा करके बताइए कि हमें क्या करना चाहिए।

भीमसेन उवाच

श्लोक 59 (1.134.59)

हित्वा राज्यं च भोगांश्च शतशृङ्गनिवासिना ॥

hitvā rājyaṃ ca bhogāṃśca śataśṛṅganivāsinā

राज्य और भोगों को त्यागकर, शतशृंग पर्वत पर निवास करते हुए

श्लोक 60 (1.134.60)

त्वया लब्धाः स्म राजेन्द्र महता तपसा वयम् । हित्वा मानं वनं गत्वा स्वयमाहृत्य भक्षणम् ॥

tvayā labdhāḥ sma rājendra mahatā tapasā vayam | hitvā mānaṃ vanaṃ gatvā svayamāhṛtya bhakṣaṇam

हे राजेन्द्र, आपने बड़े तप से हमें पाया। अभिमान छोड़कर, वन में जाकर, स्वयं भोजन जुटाकर

श्लोक 61 (1.134.61)

शाकमूलफलैर्वन्यैर्भरणं वै त्वया कृतम् । पुत्रानुत्पाद्य पितरो यमिच्छन्ति महात्मनः ॥

śākamūlaphalairvanyairbharaṇaṃ vai tvayā kṛtam | putrānutpādya pitaro yamicchanti mahātmanaḥ

वन के शाक, कन्द-मूल और फलों से आपने हमारा पालन-पोषण किया। पुत्र उत्पन्न करके महात्मा पिता जिस फल की कामना करते हैं,

श्लोक 62 (1.134.62)

त्रिवर्गफलमिच्छन्तस्तस्य कालोऽयमागतः । अभुक्त्वैव फलं राजन्गन्तुं नार्हसि भारत ॥

trivargaphalamicchantastasya kālo'yamāgataḥ | abhuktvaiva phalaṃ rājangantuṃ nārhasi bhārata

धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों के फल की इच्छा से, उसका समय अब आया है। हे राजन्, हे भारत, वह फल भोगे बिना आपको नहीं जाना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 63 (1.134.63)

इत्येवमुक्त्वा पितरं भीमोऽपि विललाप ह ॥

ityevamuktvā pitaraṃ bhīmo'pi vilalāpa ha

पिता से ऐसा कहकर भीम भी विलाप करने लगे।

अर्जुन उवाच

श्लोक 64 (1.134.64)

प्रनष्टं भारतं वंशं पाण्डुना पुनरुद्धृतम् । तस्मिंस्तदा वनगते नष्टं राज्यमराजकम् ॥

pranaṣṭaṃ bhārataṃ vaṃśaṃ pāṇḍunā punaruddhṛtam | tasmiṃstadā vanagate naṣṭaṃ rājyamarājakam

नष्ट हो चुके भरतवंश का पाण्डु ने फिर से उद्धार किया था। जब वे वन चले गए, तो राजा के बिना राज्य नष्ट हो गया।

श्लोक 65 (1.134.65)

पुनर्निःसारितं क्षत्रं पाण्डुपुत्रैश्च पञ्चभिः । एतच्छ्रुत्वाऽनुमोदित्वा गन्तुमर्हसि शङ्कर ॥

punarniḥsāritaṃ kṣatraṃ pāṇḍuputraiśca pañcabhiḥ | etacchrutvā'numoditvā gantumarhasi śaṅkara

अब पाण्डु के पाँच पुत्रों के द्वारा क्षत्रिय-वंश फिर से प्रकट हुआ है। हे कल्याणकारी, यह सुनकर और इससे प्रसन्न होकर आप जा सकते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 66 (1.134.66)

इत्येवमुक्त्वा पितरं विललाप धनञ्जयः ॥

ityevamuktvā pitaraṃ vilalāpa dhanañjayaḥ

पिता से ऐसा कहकर धनंजय विलाप करने लगे।

यमावूचतुः

श्लोक 67 (1.134.67)

दुःसहं च तपः कृत्वा लब्ध्वा नो भरतर्षभ ॥

duḥsahaṃ ca tapaḥ kṛtvā labdhvā no bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, दुःसह तप करके आपने हमें पाया,

श्लोक 68 (1.134.68)

पुत्रलाभस्य महतः शुश्रूषादिफलं त्वया । न चावाप्तं किंचिदेव पुरा दशरथो यथा ॥

putralābhasya mahataḥ śuśrūṣādiphalaṃ tvayā | na cāvāptaṃ kiṃcideva purā daśaratho yathā

किन्तु पुत्र-प्राप्ति के उस महान लाभ का, उनकी सेवा आदि का कोई भी फल आपको नहीं मिला, जैसे प्राचीन काल में दशरथ को नहीं मिला था।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 69 (1.134.69)

एवमुक्त्वा यमौ चापि विलेपतुरथातुरौ ॥

evamuktvā yamau cāpi vilepaturathāturau

ऐसा कहकर दोनों जुड़वाँ भाई भी व्याकुल होकर विलाप करने लगे।

कुन्त्युवाच

श्लोक 70 (1.134.70)

अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम । अवश्यं भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ॥

ahaṃ jyeṣṭhā dharmapatnī jyeṣṭhaṃ dharmaphalaṃ mama | avaśyaṃ bhāvino bhāvānmā māṃ mādri nivartaya

मैं बड़ी हूँ और उनकी धर्मपत्नी हूँ; धर्म का प्रथम फल मेरा है। माद्री, जो अवश्य होना है उससे मुझे मत रोको।

श्लोक 71 (1.134.71)

अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् । उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान्रक्षस्व दारकान् ॥

anviṣyāmīha bhartāramahaṃ pretavaśaṃ gatam | uttiṣṭha tvaṃ visṛjyainamimānrakṣasva dārakān

मृत्यु के वश में गए अपने पति का मैं यहाँ से अनुगमन करूँगी। तुम उठो, इन्हें छोड़ो और इन बच्चों की रक्षा करो।

श्लोक 72 (1.134.72)

अवाप्य पुत्रांल्लब्धार्थान्वीरपत्नीत्वमर्थये ॥

avāpya putrāṃllabdhārthānvīrapatnītvamarthaye

पुत्रों को पाकर मेरा प्रयोजन पूरा हो गया है; अब मैं वीर पति की पत्नी के रूप में उनका अनुगमन चाहती हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 73 (1.134.73)

मद्रराजसुता कुन्तीमिदं वचनमब्रवीत् ॥

madrarājasutā kuntīmidaṃ vacanamabravīt

तब मद्रराज की पुत्री ने कुन्ती से ये वचन कहे —

माद्र्युवाच

श्लोक 74 (1.134.74)

अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् । न हि तृप्ताऽस्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ॥

ahamevānuyāsyāmi bhartāramapalāyinam | na hi tṛptā'smi kāmānāṃ jyeṣṭhā māmanumanyatām

कभी पीठ न दिखाने वाले अपने पति का अनुगमन मैं ही करूँगी। मैं भोगों से तृप्त नहीं हुई हूँ; बड़ी बहन मुझे अनुमति दें।

श्लोक 75 (1.134.75)

मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद्भरतसत्तमः । समुच्छिद्यामि तत्कामं कथं नु यमसादने ॥

māṃ cābhigamya kṣīṇo'yaṃ kāmādbharatasattamaḥ | samucchidyāmi tatkāmaṃ kathaṃ nu yamasādane

भरतश्रेष्ठ ये काम के कारण मेरे पास आकर नष्ट हुए। यमलोक में उनकी उस कामना को मैं अधूरा कैसे छोड़ दूँ?

श्लोक 76 (1.134.76)

मम हेतोर्हि राजाऽयं दिवं राजर्षिसत्तमः । न चैव तादृशी बुद्धिर्बान्धवाश्च न तादृशाः ॥

mama hetorhi rājā'yaṃ divaṃ rājarṣisattamaḥ | na caiva tādṛśī buddhirbāndhavāśca na tādṛśāḥ

मेरे ही कारण ये राजर्षिश्रेष्ठ राजा स्वर्ग सिधारे हैं। और न मेरी वैसी बुद्धि है, न वैसे बन्धु-बान्धव हैं।

श्लोक 77 (1.134.77)

न चोत्सहे धारयितुं प्राणान्भर्त्रा विना कृता । तस्मात्तमनुयास्यामि यान्तं वैवस्वतक्षयम् ॥

na cotsahe dhārayituṃ prāṇānbhartrā vinā kṛtā | tasmāttamanuyāsyāmi yāntaṃ vaivasvatakṣayam

पति से बिछुड़कर मैं प्राण धारण नहीं कर सकती। इसलिए वैवस्वत (यम) के लोक को जाते हुए उनका मैं अनुगमन करूँगी।

श्लोक 78 (1.134.78)

वर्तेयं न समां वृत्तिं जात्वहं न सुतेषु ते । तथाहि वर्तमानां मामधर्मः संस्पृशेन्महान् ॥

varteyaṃ na samāṃ vṛttiṃ jātvahaṃ na suteṣu te | tathāhi vartamānāṃ māmadharmaḥ saṃspṛśenmahān

मैं तुम्हारे पुत्रों के साथ कभी अपने पुत्रों जैसा समान व्यवहार न कर पाऊँ, और ऐसा करने पर मुझे बड़ा अधर्म लगेगा।

श्लोक 79 (1.134.79)

तस्मान्मे सुतयोर्देवि वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । अन्वेष्यामि च भर्तारं व्रजन्तं यमसादनम् ॥

tasmānme sutayordevi vartitavyaṃ svaputravat | anveṣyāmi ca bhartāraṃ vrajantaṃ yamasādanam

इसलिए देवि, मेरे दोनों पुत्रों के साथ तुम अपने पुत्रों जैसा व्यवहार करना। मैं यमलोक को जाते अपने पति का अनुगमन करूँगी।

श्लोक 80 (1.134.80)

मां हि कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः । राज्ञः शरीरेण सह मामपीदं कलेवरम् ॥

māṃ hi kāmayamāno'yaṃ rājā pretavaśaṃ gataḥ | rājñaḥ śarīreṇa saha māmapīdaṃ kalevaram

मेरी ही कामना करते हुए राजा मृत्यु के वश में हुए। इसलिए राजा के शरीर के साथ मेरा यह शरीर भी

श्लोक 81 (1.134.81)

दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नं त्वेतदार्ये प्रियं कुरु । दारकेष्वप्रमत्ता त्वं भवेश्चाभिहिता मया । अतोऽहं न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हितं तव ॥

dagdhavyaṃ supraticchannaṃ tvetadārye priyaṃ kuru | dārakeṣvapramattā tvaṃ bhaveścābhihitā mayā | ato'haṃ na prapaśyāmi saṃdeṣṭavyaṃ hitaṃ tava

भली-भाँति ढककर जलाया जाए। आर्ये, मेरा यह प्रिय कार्य करो। जैसा मैंने कहा है, बच्चों के प्रति सदा सावधान रहना। इसके अतिरिक्त तुम्हारे हित की कोई और बात मुझे कहने योग्य नहीं दिखती।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 82 (1.134.82)

ऋषयस्तान्समाश्वास्य पाण्डवान्सत्यविक्रमान् । ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विनः ॥

ṛṣayastānsamāśvāsya pāṇḍavānsatyavikramān | ūcuḥ kuntīṃ ca mādrīṃ ca samāśvāsya tapasvinaḥ

तब तपस्वी ऋषियों ने सत्यपराक्रमी पाण्डवों को धीरज बँधाया, और कुन्ती तथा माद्री को भी सान्त्वना देकर कहा —

ऋषय ऊचुः

श्लोक 83 (1.134.83)

सुभगे बालपुत्रा तु न मर्तव्यं कथंचन । पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्रं परन्तपान् ॥

subhage bālaputrā tu na martavyaṃ kathaṃcana | pāṇḍavāṃścāpi neṣyāmaḥ kururāṣṭraṃ parantapān

सौभाग्यवती, छोटे बच्चों की माँ को किसी भी प्रकार नहीं मरना चाहिए। हम शत्रुओं को तपाने वाले पाण्डवों को कुरुराष्ट्र ले चलेंगे।

श्लोक 84 (1.134.84)

अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान् । स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ॥

adharmeṣvarthajāteṣu dhṛtarāṣṭraśca lobhavān | sa kadācinna varteta pāṇḍaveṣu yathāvidhi

धृतराष्ट्र अधर्म से मिलने वाले धन के लोभी हैं; हो सकता है वे कभी पाण्डवों के साथ उचित व्यवहार न करें।

श्लोक 85 (1.134.85)

कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । माद्र्याश्च बलिनांश्रेष्ठः शल्यो भ्राता महारथः ॥

kuntyāśca vṛṣṇayo nāthāḥ kuntibhojastathaiva ca | mādryāśca balināṃśreṣṭhaḥ śalyo bhrātā mahārathaḥ

कुन्ती के रक्षक वृष्णिवंशी हैं और कुन्तिभोज भी; और माद्री के रक्षक उनके भाई, बलवानों में श्रेष्ठ महारथी शल्य हैं।

श्लोक 86 (1.134.86)

भर्त्रा तु मरणं सार्धं फलवन्नात्र संशयः । युवाभ्यां दुष्करं चैतद्वदन्ति द्विजपुङ्गवाः ॥

bhartrā tu maraṇaṃ sārdhaṃ phalavannātra saṃśayaḥ | yuvābhyāṃ duṣkaraṃ caitadvadanti dvijapuṅgavāḥ

पति के साथ मरना निश्चय ही फलदायक है, इसमें सन्देह नहीं; परन्तु श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं कि तुम दोनों के लिए यह कठिन कार्य है।

श्लोक 87 (1.134.87)

मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । यमैश्च नियमैः पूता मनोवाक्कायजैः शुभा ॥

mṛte bhartari sādhvī strī brahmacaryavrate sthitā | yamaiśca niyamaiḥ pūtā manovākkāyajaiḥ śubhā

पति की मृत्यु होने पर जो साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित रहती है, और मन, वाणी तथा शरीर के यम-नियमों से पवित्र रहती है,

श्लोक 88 (1.134.88)

भर्तारं चिन्तयन्ती सा भर्तारं निस्तरेच्छुभा । तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ॥

bhartāraṃ cintayantī sā bhartāraṃ nistarecchubhā | tāritaścāpi bhartā syādātmā putrastathaiva ca

और अपने पति का चिन्तन करती रहती है, वह शुभ स्त्री अपने पति को पार लगा देती है; उससे पति, वह स्वयं और उसका पुत्र भी तर जाते हैं।

श्लोक 89 (1.134.89)

तस्माज्जीवितमेवैतद्युवयोर्विद्म शोभनम् ॥

tasmājjīvitamevaitadyuvayorvidma śobhanam

इसलिए हम जानते हैं कि तुम दोनों के लिए जीवित रहना ही श्रेयस्कर है।

कुन्त्युवाच

श्लोक 90 (1.134.90)

यथा पाण्डोस्तु निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च । आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत्तथा ॥

yathā pāṇḍostu nirdeśastathā vipragaṇasya ca | ājñā śirasi nikṣiptā kariṣyāmi ca tattathā

जैसा पाण्डु का निर्देश था और जैसा इन ब्राह्मणों का आदेश है, उस आज्ञा को मैं सिर पर रखती हूँ और वैसा ही करूँगी।

श्लोक 91 (1.134.91)

यदाहुर्भगवन्तोऽपि तन्मन्ये शोभनं परम् । भर्तुश्च मम पुत्राणामात्मनश्च न संशयः ॥

yadāhurbhagavanto'pi tanmanye śobhanaṃ param | bhartuśca mama putrāṇāmātmanaśca na saṃśayaḥ

पूज्य मुनियों ने जो कहा है, उसे मैं अपने पति, अपने पुत्रों और अपने लिए परम कल्याणकारी मानती हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं।

माद्र्युवाच

श्लोक 92 (1.134.92)

कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे । अस्या हि न समा बुद्ध्या यद्यपि स्यादरुन्धती ॥

kuntī samarthā putrāṇāṃ yogakṣemasya dhāraṇe | asyā hi na samā buddhyā yadyapi syādarundhatī

कुन्ती पुत्रों के योग-क्षेम का भार उठाने में समर्थ हैं। बुद्धि में अरुन्धती भी इनकी बराबरी नहीं कर सकतीं।

श्लोक 93 (1.134.93)

कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ॥

kuntyāśca vṛṣṇayo nāthāḥ kuntibhojastathaiva ca | nāhaṃ tvamiva putrāṇāṃ samarthā dhāraṇe tathā

कुन्ती के रक्षक वृष्णिवंशी और कुन्तिभोज हैं। तुम्हारी तरह पुत्रों का पालन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 94 (1.134.94)

साऽहं भर्तारमन्विष्ये संतृप्ता नापि भोगतः । भर्तृलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ॥

sā'haṃ bhartāramanviṣye saṃtṛptā nāpi bhogataḥ | bhartṛlokasya tu jyeṣṭhā devī māmanumanyatām

इसलिए मैं अपने पति का अनुगमन करूँगी, क्योंकि भोगों से भी मैं तृप्त नहीं हुई हूँ। बड़ी रानी मुझे पतिलोक जाने की अनुमति दें।

श्लोक 95 (1.134.95)

धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यसन्धस्य धीमतः । पादौ परिचरिष्यामि तथार्याऽद्यानुमन्यताम् ॥

dharmajñasya kṛtajñasya satyasandhasya dhīmataḥ | pādau paricariṣyāmi tathāryā'dyānumanyatām

उन धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान स्वामी के चरणों की मैं सेवा करूँगी। आर्या आज मुझे अनुमति दें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 96 (1.134.96)

एवमुक्त्वा तदा राजन्मद्रराजसुता शुभा । ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाऽभिप्रणम्य च ॥

evamuktvā tadā rājanmadrarājasutā śubhā | dadau kuntyai yamau mādrī śirasā'bhipraṇamya ca

हे राजन्, ऐसा कहकर मद्रराज की शुभ पुत्री माद्री ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और दोनों जुड़वाँ पुत्र कुन्ती को सौंप दिए।

श्लोक 97 (1.134.97)

अभिवाद्य महर्षीन्सा परिष्वज्य च पाण्डवान् । मूर्ध्न्युपाघ्राय बहुशः पार्थानात्मसुतौ तदा ॥

abhivādya maharṣīnsā pariṣvajya ca pāṇḍavān | mūrdhnyupāghrāya bahuśaḥ pārthānātmasutau tadā

उन्होंने महर्षियों को प्रणाम किया, पाण्डवों को गले लगाया, और पृथा के पुत्रों तथा अपने दोनों पुत्रों का बार-बार सिर सूँघा।

श्लोक 98 (1.134.98)

हस्ते युधिष्ठिरं गृह्य माद्री वाक्यमभाषत । कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः ॥

haste yudhiṣṭhiraṃ gṛhya mādrī vākyamabhāṣata | kuntī mātā ahaṃ dhātrī yuṣmākaṃ tu pitā mṛtaḥ

युधिष्ठिर का हाथ पकड़कर माद्री ने यह वचन कहा — "कुन्ती तुम्हारी माता हैं और मैं धाय; पर तुम्हारे पिता अब नहीं रहे।

माद्र्युवाच

श्लोक 99 (1.134.99)

युधिष्ठिरः पिता ज्येष्ठश्चतुर्णां धर्मतः सदा । वृद्धाद्युपासनासक्ताः सत्यधर्मपरायणाः ॥

yudhiṣṭhiraḥ pitā jyeṣṭhaścaturṇāṃ dharmataḥ sadā | vṛddhādyupāsanāsaktāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ

धर्म के अनुसार ज्येष्ठ युधिष्ठिर सदा तुम चारों के पिता हैं। जो वृद्धजनों आदि की सेवा में लगे रहते हैं और सत्य तथा धर्म में तत्पर रहते हैं,

श्लोक 100 (1.134.100)

तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् । तस्मात्सर्वे कुरुध्वं वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिताः ॥

tādṛśā na vinaśyanti naiva yānti parābhavam | tasmātsarve kurudhvaṃ vai guruvṛttimatandritāḥ

वे न नष्ट होते हैं, न पराजित होते हैं। इसलिए तुम सब आलस्य छोड़कर उनके प्रति गुरुजन जैसा व्यवहार करना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 101 (1.134.101)

ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनःपुनः । आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तदा ॥

ṛṣīṇāṃ ca pṛthāyāśca namaskṛtya punaḥpunaḥ | āyāsakṛpaṇā mādrī pratyuvāca pṛthāṃ tadā

ऋषियों और पृथा को बार-बार प्रणाम करके दुःख से कातर माद्री ने तब पृथा से कहा —

माद्र्युवाच

श्लोक 102 (1.134.102)

ऋषीणां संनिधावेषां यथा वागभ्युदीरिता । दिदृक्षमाणायाः स्वर्गं न ममैषा वृथा भवेत् ॥

ṛṣīṇāṃ saṃnidhāveṣāṃ yathā vāgabhyudīritā | didṛkṣamāṇāyāḥ svargaṃ na mamaiṣā vṛthā bhavet

इन ऋषियों के सामने मैंने जो वचन कहे हैं, स्वर्ग देखने की इच्छा रखने वाली मेरे लिए वे व्यर्थ न हों।

श्लोक 103 (1.134.103)

धन्या त्वमसि वार्ष्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया । वीर्यं तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ॥

dhanyā tvamasi vārṣṇeyi nāsti strī sadṛśī tvayā | vīryaṃ tejaśca yogaṃ ca māhātmyaṃ ca yaśasvinām

वृष्णिकुल की पुत्री, तुम धन्य हो; तुम्हारे समान कोई स्त्री नहीं। यशस्वी पुरुषों का पराक्रम, तेज, योग और महिमा

श्लोक 104 (1.134.104)

कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् । आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ॥

kunti drakṣyasi putrāṇāṃ pañcānāmamitaujasām | āryā cāpyabhivādyā ca mama pūjyā ca sarvataḥ

हे कुन्ती, तुम अपने पाँचों अपार तेजस्वी पुत्रों में देखोगी। तुम आर्या हो, मेरी वन्दनीया हो और सब प्रकार से मेरी पूज्या हो।

श्लोक 105 (1.134.105)

ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ॥

jyeṣṭhā variṣṭhā tvaṃ devi bhūṣitā svaguṇaiḥ śubhaiḥ | abhyanujñātumicchāmi tvayā yādavanandini

देवि, तुम बड़ी और श्रेष्ठ हो, अपने शुभ गुणों से विभूषित हो। हे यादवनन्दिनी, मैं तुमसे अनुमति चाहती हूँ।

श्लोक 106 (1.134.106)

धर्मं स्वर्गं च कीर्तिं च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् । यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ॥

dharmaṃ svargaṃ ca kīrtiṃ ca tvatkṛte'hamavāpnuyām | yathā tathā vidhatsveha mā ca kārṣīrvicāraṇām

तुम्हारे कारण मुझे धर्म, स्वर्ग और कीर्ति प्राप्त हो। यहाँ जैसा उचित हो वैसा प्रबन्ध करो और कोई सोच-विचार मत करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 107 (1.134.107)

बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी । अनुज्ञाताऽसि कल्याणि त्रिदिवे सङ्गमोऽस्तु ते ॥

bāṣpasaṃdigdhayā vācā kuntyuvāca yaśasvinī | anujñātā'si kalyāṇi tridive saṅgamo'stu te

आँसुओं से रुँधे स्वर में यशस्विनी कुन्ती बोलीं — "कल्याणी, तुम्हें अनुमति है। स्वर्ग में तुम्हारा उनसे मिलन हो।

कुन्त्युवाच

श्लोक 108 (1.134.108)

भर्त्रा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि । संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ॥

bhartrā saha viśālākṣi kṣipramadyaiva bhāmini | saṃgatā svargaloke tvaṃ ramethāḥ śāśvatīḥ samāḥ

हे विशालनयनी भामिनी, आज ही शीघ्र स्वर्गलोक में पति से मिलकर तुम अनन्त वर्षों तक उनके साथ आनन्द करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 109 (1.134.109)

ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः । हिरण्यशकलानाज्यं तिलं दधि च तण्डुलान् ॥

tataḥ purohitaḥ snātvā pretakarmaṇi pāragaḥ | hiraṇyaśakalānājyaṃ tilaṃ dadhi ca taṇḍulān

तब प्रेतकर्म में निपुण पुरोहित ने स्नान करके, तपस्वियों के साथ मिलकर, सोने के टुकड़े, घी, तिल, दही और चावल,

श्लोक 110 (1.134.110)

उदकुम्भांश्च परशुं समानीय तपस्विभिः । अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ॥

udakumbhāṃśca paraśuṃ samānīya tapasvibhiḥ | aśvamedhāgnimāhṛtya yathānyāyaṃ samantataḥ

जल के घड़े और कुल्हाड़ी मँगवाए; और अश्वमेध की अग्नि लाकर उसे विधिपूर्वक चारों ओर स्थापित किया।

श्लोक 111 (1.134.111)

काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् । पुरोहितोक्तविधिना पाण्डोः पुत्रो युधिष्ठिरः ॥

kāśyapaḥ kārayāmāsa pāṇḍoḥ pretasya tāṃ kriyām | purohitoktavidhinā pāṇḍoḥ putro yudhiṣṭhiraḥ

काश्यप ने दिवंगत पाण्डु की वह प्रेत-क्रिया सम्पन्न करवाई। पुरोहित के बताए विधान के अनुसार पाण्डु के पुत्र युधिष्ठिर ने

श्लोक 112 (1.134.112)

तेनाग्निनाऽदहत्पाण्डुं कृत्वा चापि क्रियास्तदा । रुदञ्छोकाभिसंतप्तः पपात भुवि पाण्डवः ॥

tenāgninā'dahatpāṇḍuṃ kṛtvā cāpi kriyāstadā | rudañchokābhisaṃtaptaḥ papāta bhuvi pāṇḍavaḥ

उस अग्नि से पाण्डु का दाह किया और सब क्रियाएँ पूरी कीं; फिर रोते हुए, शोक से सन्तप्त होकर वे पाण्डुपुत्र भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 113 (1.134.113)

ऋषीन्पुत्रान्पृथां चैव विसृज्य च नृपात्मज । नमस्कृत्य चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् ॥

ṛṣīnputrānpṛthāṃ caiva visṛjya ca nṛpātmaja | namaskṛtya citāgnisthaṃ dharmapatnī nararṣabham

हे राजकुमार, तब ऋषियों, पुत्रों और पृथा से विदा लेकर, चिता की अग्नि में स्थित उन नरश्रेष्ठ को प्रणाम करके, उनकी धर्मपत्नी

श्लोक 114 (1.134.114)

मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद्यशस्विनी ॥

madrarājasutā tūrṇamanvārohadyaśasvinī

मद्रराज की यशस्विनी पुत्री, शीघ्र ही उनके पीछे चिता पर चढ़ गईं।

श्लोक 115 (1.134.115)

अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ॥

ahatāmbarasaṃvīto bhrātṛbhiḥ sahito'naghaḥ | udakaṃ kṛtavāṃstatra purohitamate sthitaḥ

नए वस्त्र पहने निष्पाप युधिष्ठिर ने भाइयों के साथ पुरोहित के निर्देश के अनुसार वहाँ जलांजलि दी।

श्लोक 116 (1.134.116)

अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः । तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह ॥

arhatastasya kṛtyāni śataśṛṅganivāsinaḥ | tāpasā vidhivaccakruścāraṇā ṛṣibhiḥ saha

शतशृंग पर निवास करने वाले तपस्वियों ने चारणों और ऋषियों के साथ मिलकर उन पूज्य राजा की सब क्रियाएँ विधिपूर्वक सम्पन्न कीं।

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