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आदि पर्व · अध्याय 133

नकुल और सहदेव का जन्म

माद्री निःसन्तान होने का दुःख पाण्डु से कहती है और अनुरोध करती है कि वे कुन्ती से उसे भी मन्त्र दिलवाएँ। कुन्ती मान जाती हैं, और माद्री दोनों अश्विनीकुमारों का ध्यान करके जुड़वाँ नकुल और सहदेव को जन्म देती है। शतशृङ्ग के ऋषि पाँचों राजकुमारों का नामकरण करते हैं; पर जब पाण्डु माद्री के लिए फिर आग्रह करते हैं, तो कुन्ती यह कहकर मना कर देती हैं कि माद्री ने एक साथ दो देवताओं को बुलाकर उन्हें छल लिया। जन्म का समाचार सुनकर वृष्णियों के कहने पर वसुदेव उपहारों के साथ पुरोहित काश्यप को भेजते हैं, जो कुमारों के संस्कार करते हैं; शर्याति के पुत्र राजा शुक्र उन्हें शस्त्रविद्या सिखाते हैं, जिसमें अर्जुन सबसे आगे निकलते हैं, और पाँचों पाण्डव तथा सौ कौरव शीघ्र ही बड़े हो जाते हैं।

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.133.1)

कुन्तीपुत्रेषु जातेषु धृतराष्ट्रात्मजेषु च । मद्रराजसुता पाण्डुं रहो वचनमब्रवीत् ॥

kuntīputreṣu jāteṣu dhṛtarāṣṭrātmajeṣu ca | madrarājasutā pāṇḍuṃ raho vacanamabravīt

वैशम्पायन ने कहा — जब कुन्ती के पुत्र और धृतराष्ट्र के पुत्र जन्म ले चुके, तब मद्रराज की पुत्री (माद्री) ने एकान्त में पाण्डु से कहा —

माद्र्युवाच

श्लोक 2 (1.133.2)

न मेऽस्ति त्वयि सन्तापो विगुणेऽपि परन्तप । नावरत्वे वरार्हायाः स्थित्वा चानघ नित्यदा ॥

na me'sti tvayi santāpo viguṇe'pi parantapa | nāvaratve varārhāyāḥ sthitvā cānagha nityadā

"हे परन्तप, आपके (सन्तान उत्पन्न करने में) असमर्थ होने पर भी मुझे आपके कारण कोई सन्ताप नहीं है; और हे निष्पाप, श्रेष्ठ स्थान के योग्य होते हुए भी सदा छोटे स्थान पर रहने का भी (दुःख नहीं है)।

श्लोक 3 (1.133.3)

गान्धार्याश्चैव नृपते जातं पुत्रशतं तथा । श्रुत्वा न मे तथा दुःखमभवत्कुरुनन्दन ॥

gāndhāryāścaiva nṛpate jātaṃ putraśataṃ tathā | śrutvā na me tathā duḥkhamabhavatkurunandana

"हे राजन्, हे कुरुनन्दन, गान्धारी के सौ पुत्रों के जन्म का समाचार सुनकर भी मुझे वैसा दुःख नहीं हुआ।

श्लोक 4 (1.133.4)

इदं तु मे महद्दुःखं तुल्यतायामपुत्रता । दिष्ट्या त्विदानीं भर्तुर्मे कुन्त्यामप्यस्ति सन्ततिः ॥

idaṃ tu me mahadduḥkhaṃ tulyatāyāmaputratā | diṣṭyā tvidānīṃ bharturme kuntyāmapyasti santatiḥ

"परन्तु मेरा यह बड़ा दुःख है कि (कुन्ती के) समान होकर भी मैं निःसन्तान हूँ। सौभाग्य से अब मेरे पति को कुन्ती से सन्तान प्राप्त हो गई है।

श्लोक 5 (1.133.5)

यदि त्वपत्यसन्तानं कुन्तिराजसुता मयि । कुर्यादनुग्रहो मे स्यात्तव चापि हितं भवेत् ॥

yadi tvapatyasantānaṃ kuntirājasutā mayi | kuryādanugraho me syāttava cāpi hitaṃ bhavet

"यदि कुन्तिराज की पुत्री मुझे भी सन्तान प्रदान करें, तो यह मुझ पर अनुग्रह होगा और आपका भी हित होगा।

श्लोक 6 (1.133.6)

संरम्भो हि सपत्नीत्वाद्वक्तुं कुन्तिसुतां प्रति । यदि तु त्वं प्रसन्नो मे स्वयमेनां प्रचोदय ॥

saṃrambho hi sapatnītvādvaktuṃ kuntisutāṃ prati | yadi tu tvaṃ prasanno me svayamenāṃ pracodaya

"सौत होने के अभिमान के कारण मैं कुन्ती से स्वयं नहीं कह पाती। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो आप ही उन्हें प्रेरित करें।"

पाण्डुरुवाच

श्लोक 7 (1.133.7)

ममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थः परिवर्तते । न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया ॥

mamāpyeṣa sadā mādri hṛdyarthaḥ parivartate | na tu tvāṃ prasahe vaktumiṣṭāniṣṭavivakṣayā

पाण्डु ने कहा — "माद्री, मेरे हृदय में भी यह बात सदा घूमती रहती है, पर तुम्हें यह प्रिय लगेगा या अप्रिय — इस दुविधा में मैं तुमसे कहने का साहस न कर सका।

श्लोक 8 (1.133.8)

तव त्विदं मतं मत्वा प्रयतिष्याम्यतः परम् । मन्ये ध्रुवं मयोक्ता सा वचनं प्रतिपत्स्यते ॥

tava tvidaṃ mataṃ matvā prayatiṣyāmyataḥ param | manye dhruvaṃ mayoktā sā vacanaṃ pratipatsyate

"अब तुम्हारा मत जानकर मैं आगे प्रयत्न करूँगा। मुझे निश्चित विश्वास है कि मेरे कहने पर वह मेरी बात मान लेगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (1.133.9)

ततः कुन्तीं पुनः पाण्डुर्विविक्त इदमब्रवीत् । अनुगृह्णीष्व कल्याणि मद्रराजसुतामपि । कुलस्य मम सन्तानं लोकस्य च कुरु प्रियम् ॥

tataḥ kuntīṃ punaḥ pāṇḍurvivikta idamabravīt | anugṛhṇīṣva kalyāṇi madrarājasutāmapi | kulasya mama santānaṃ lokasya ca kuru priyam

वैशम्पायन ने कहा — तब पाण्डु ने फिर एकान्त में कुन्ती से कहा — "कल्याणी, मद्रराज की पुत्री पर भी अनुग्रह करो। मेरे कुल की सन्तति बनाए रखो और लोक का प्रिय करो।

पाण्डुरुवाच

श्लोक 10 (1.133.10)

मम चापिण्डनाशाय पूर्वेषां च महात्मनाम् । मत्प्रियार्थं च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥

mama cāpiṇḍanāśāya pūrveṣāṃ ca mahātmanām | matpriyārthaṃ ca kalyāṇi kuru kalyāṇamuttamam

"ताकि मेरे और मेरे महात्मा पूर्वजों के पिण्ड का लोप न हो, और मेरा प्रिय करने के लिए, हे कल्याणी, यह उत्तम कल्याणकारी कार्य करो।

श्लोक 11 (1.133.11)

यशसोऽर्थाय चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् । प्राप्याधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशोऽर्थिना ॥

yaśaso'rthāya caiva tvaṃ kuru karma suduṣkaram | prāpyādhipatyamindreṇa yajñairiṣṭaṃ yaśo'rthinā

"यश के लिए तुम यह अत्यन्त कठिन कार्य करो। आधिपत्य पा लेने के बाद भी यश की इच्छा से इन्द्र ने यज्ञ किए।

श्लोक 12 (1.133.12)

तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुष्करम् । गुरूनभ्युपगच्छन्ति यशसोऽर्थाय भामिनि ॥

tathā mantravido viprāstapastaptvā suduṣkaram | gurūnabhyupagacchanti yaśaso'rthāya bhāmini

"इसी प्रकार मन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण अत्यन्त कठोर तप करके भी, हे भामिनी, यश के लिए गुरुओं की सेवा में जाते हैं।

श्लोक 13 (1.133.13)

तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः । चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ॥

tathā rājarṣayaḥ sarve brāhmaṇāśca tapodhanāḥ | cakruruccāvacaṃ karma yaśaso'rthāya duṣkaram

"उसी प्रकार सभी राजर्षियों और तपोधन ब्राह्मणों ने भी यश के लिए छोटे-बड़े अनेक कठिन कर्म किए।

श्लोक 14 (1.133.14)

सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविधानेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ॥

sā tvaṃ mādrīṃ plavenaiva tārayaināmanindite | apatyasaṃvidhānena parāṃ kīrtimavāpnuhi

"इसलिए हे अनिन्दिते, तुम माद्री को नौका की भाँति (इस दुःख से) पार उतारो; उसे सन्तान दिलाकर परम कीर्ति प्राप्त करो।"

कुन्त्युवाच

श्लोक 15 (1.133.15)

धर्मं वै धर्मशास्त्रोक्तं यथा वदसि तत्तथा । तस्मादनुग्रहं तस्याः करोमि कुरुनन्दन ॥

dharmaṃ vai dharmaśāstroktaṃ yathā vadasi tattathā | tasmādanugrahaṃ tasyāḥ karomi kurunandana

कुन्ती ने कहा — "आप जिस धर्म की बात कहते हैं, वह सचमुच धर्मशास्त्रों में वैसा ही कहा गया है। इसलिए हे कुरुनन्दन, मैं उस पर अनुग्रह करती हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.133.16)

एवमुक्ताऽब्रवीन्माद्रीं सकृच्चिन्तय दैवतम् । तस्मात्ते भविताऽपत्यमनुरूपमसंशयम् ॥

evamuktā'bravīnmādrīṃ sakṛccintaya daivatam | tasmātte bhavitā'patyamanurūpamasaṃśayam

वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहकर कुन्ती ने माद्री से कहा — "एक बार किसी देवता का चिन्तन करो; उससे तुम्हें निःसन्देह अपने अनुरूप सन्तान प्राप्त होगी।"

श्लोक 17 (1.133.17)

ततो मन्त्रे कृते तस्मिन्विधिदृष्टेन कर्मणा । ततो राजसुता स्नाता शयने संविवेश ह ॥

tato mantre kṛte tasminvidhidṛṣṭena karmaṇā | tato rājasutā snātā śayane saṃviveśa ha

तब विधि के अनुसार मन्त्र का उपदेश हो जाने पर राजकुमारी (माद्री) स्नान करके शय्या पर लेट गई।

श्लोक 18 (1.133.18)

ततो माद्री विचार्यैका जगाम मनसाऽश्विनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ । नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमौ भुवि ॥

tato mādrī vicāryaikā jagāma manasā'śvinau | tāvāgamya sutau tasyāṃ janayāmāsaturyamau | nakulaṃ sahadevaṃ ca rūpeṇāpratimau bhuvi

तब माद्री ने अकेले विचार करके मन में दोनों अश्विनीकुमारों का ध्यान किया। उन दोनों ने आकर उससे जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न किए — नकुल और सहदेव, जो रूप में पृथ्वी पर अद्वितीय थे।

श्लोक 19 (1.133.19)

तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी । धर्मतो भक्तितश्चैव शीलतो विनयैस्तथा ॥

tathaiva tāvapi yamau vāguvācāśarīriṇī | dharmato bhaktitaścaiva śīlato vinayaistathā

उसी प्रकार उन जुड़वाँ भाइयों के विषय में भी अशरीरी वाणी ने कहा — "धर्म और भक्ति में, शील और विनय में,

श्लोक 20 (1.133.20)

सत्वरूपगुणोपेतौ भवतोऽत्यश्विनाविति । भासते तेजसाऽत्यर्थं रूपद्रविणसंपदा ॥

satvarūpaguṇopetau bhavato'tyaśvināviti | bhāsate tejasā'tyarthaṃ rūpadraviṇasaṃpadā

"सत्त्व, रूप और गुणों से सम्पन्न ये दोनों अश्विनीकुमारों से भी बढ़कर होंगे।" वे तेज और रूप की सम्पदा से अत्यन्त दीप्तिमान थे।

श्लोक 21 (1.133.21)

नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः । भक्त्या च कर्मणा चैव तथाऽऽशीर्भिर्विशांपते ॥

nāmāni cakrire teṣāṃ śataśṛṅganivāsinaḥ | bhaktyā ca karmaṇā caiva tathā''śīrbhirviśāṃpate

हे प्रजानाथ, शतशृङ्ग-निवासी ऋषियों ने भक्ति, विधिपूर्वक कर्म और आशीर्वादों के साथ उनके नाम रखे।

श्लोक 22 (1.133.22)

ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् । अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन् ॥

jyeṣṭhaṃ yudhiṣṭhiretyevaṃ bhīmaseneti madhyamam | arjuneti tṛtīyaṃ ca kuntīputrānakalpayan

सबसे बड़े का नाम युधिष्ठिर, मझले का भीमसेन और तीसरे का अर्जुन — इस प्रकार उन्होंने कुन्ती के पुत्रों के नाम रखे।

श्लोक 23 (1.133.23)

पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् । माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ॥

pūrvajaṃ nakuletyevaṃ sahadeveti cāparam | mādrīputrāvakathayaṃste viprāḥ prītamānasāḥ

प्रसन्नचित्त ब्राह्मणों ने माद्री के पुत्रों में पहले जन्मे का नाम नकुल और दूसरे का सहदेव रखा।

श्लोक 24 (1.133.24)

अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्चसंवत्सरा इव ॥

anusaṃvatsaraṃ jātā api te kurusattamāḥ | pāṇḍuputrā vyarājanta pañcasaṃvatsarā iva

एक-एक वर्ष के अन्तर से जन्मे होने पर भी कुरुश्रेष्ठ पाण्डुपुत्र (युग-चक्र के) पाँच संवत्सरों के समान सुशोभित हुए।

श्लोक 25 (1.133.25)

महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमाः । पाण्डुर्दृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान्महौजसः ॥

mahāsattvā mahāvīryā mahābalaparākramāḥ | pāṇḍurdṛṣṭvā sutāṃstāṃstu devarūpānmahaujasaḥ

महान सत्त्व, महान वीर्य और महान बल-पराक्रम वाले, देवताओं जैसे रूप वाले उन महातेजस्वी पुत्रों को देखकर पाण्डु

श्लोक 26 (1.133.26)

मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः । ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ॥

mudaṃ paramikāṃ lebhe nananda ca narādhipaḥ | ṛṣīṇāmapi sarveṣāṃ śataśṛṅganivāsinām

नरेश को परम आनन्द हुआ और वे हर्षित हुए। शतशृङ्ग पर रहने वाले सभी ऋषियों के

श्लोक 27 (1.133.27)

प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् । कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदयत् ॥

priyā babhūvustāsāṃ ca tathaiva muniyoṣitām | kuntīmatha punaḥ pāṇḍurmādryarthe samacodayat

और वैसे ही मुनि-पत्नियों के भी वे प्रिय हो गए। तब पाण्डु ने माद्री के लिए फिर कुन्ती को प्रेरित किया।

श्लोक 28 (1.133.28)

तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती । उक्ता सकृद्द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ॥

tamuvāca pṛthā rājan rahasyuktā tadā satī | uktā sakṛddvandvameṣā lebhe tenāsmi vañcitā

हे राजन्, एकान्त में ऐसा कहे जाने पर साध्वी पृथा ने तब उनसे कहा — "एक बार (आवाहन करने को) कहे जाने पर इसने जोड़ा पा लिया; इसमें मैं छली गई।

कुन्त्युवाच

श्लोक 29 (1.133.29)

बिभेम्यस्याः परिभवात्कुस्त्रीणां गतिरीदृशी । नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ॥

bibhemyasyāḥ paribhavātkustrīṇāṃ gatirīdṛśī | nājñāsiṣamahaṃ mūḍhā dvandvāhvāne phaladvayam

"मुझे डर है कि यह मेरा तिरस्कार करेगी; बुरी स्त्रियों की यही रीति होती है। मैं मूढ़ यह नहीं जान पाई कि जोड़े (देवताओं) का आवाहन करने से दोहरा फल मिलता है।

श्लोक 30 (1.133.30)

तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषोऽस्तु वरो मम । एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ॥

tasmānnāhaṃ niyoktavyā tvayaiṣo'stu varo mama | evaṃ pāṇḍoḥ sutāḥ pañca devadattā mahābalāḥ

"इसलिए आप मुझे फिर इस कार्य में न लगाएँ; यही मेरे लिए वर हो।" इस प्रकार पाण्डु के पाँच पुत्र, जो देवताओं के दिए हुए और महाबली थे,

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (1.133.31)

संभूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः । शुभलक्षणसंपन्नाः सोमवत्प्रियदर्शनाः ॥

saṃbhūtāḥ kīrtimantaśca kuruvaṃśavivardhanāḥ | śubhalakṣaṇasaṃpannāḥ somavatpriyadarśanāḥ

उत्पन्न हुए — कीर्तिमान, कुरुवंश की वृद्धि करने वाले, शुभ लक्षणों से सम्पन्न, चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन,

श्लोक 32 (1.133.32)

सिंहदर्पा महेष्वासाः सिंहविक्रान्तगामिनः । सिंहग्रीवा मनुष्येन्द्रा ववृधुर्देवविक्रमाः ॥

siṃhadarpā maheṣvāsāḥ siṃhavikrāntagāminaḥ | siṃhagrīvā manuṣyendrā vavṛdhurdevavikramāḥ

सिंह के समान दर्प वाले, महान धनुर्धर, सिंह की-सी चाल वाले, सिंह जैसी ग्रीवा वाले, नरश्रेष्ठ और देवताओं जैसे पराक्रमी — वे बढ़ने लगे।

श्लोक 33 (1.133.33)

विवर्धमानास्ते तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ । विस्मयं जनयामासुर्महर्षीणां समेयुषाम् ॥

vivardhamānāste tatra puṇye haimavate girau | vismayaṃ janayāmāsurmaharṣīṇāṃ sameyuṣām

उस पवित्र हिमालय पर्वत पर बढ़ते हुए वे वहाँ एकत्र महर्षियों को विस्मित करने लगे।

श्लोक 34 (1.133.34)

जातमात्रानुपादाय शतशृङ्गनिवासिनः । पाण्डोः पुत्रानमन्यन्त तापसाः स्वानिवात्मजान् ॥

jātamātrānupādāya śataśṛṅganivāsinaḥ | pāṇḍoḥ putrānamanyanta tāpasāḥ svānivātmajān

शतशृङ्ग पर रहने वाले तपस्वियों ने पाण्डु के पुत्रों को जन्म से ही गोद में लेकर उन्हें अपनी ही सन्तान माना।

श्लोक 35 (1.133.35)

ततस्तु वृष्णयः सर्वे वसुदेवपुरोगमाः ॥

tatastu vṛṣṇayaḥ sarve vasudevapurogamāḥ

वैशम्पायन ने कहा — तब वसुदेव आदि सभी वृष्णियों ने सुना कि —

श्लोक 36 (1.133.36)

पाण्डुः शापभयाद्भीतः शतशृङ्गमुपेयिवान् । तत्रैव मुनिभिः सार्धं तापसोऽभूत्तपस्विभिः ॥

pāṇḍuḥ śāpabhayādbhītaḥ śataśṛṅgamupeyivān | tatraiva munibhiḥ sārdhaṃ tāpaso'bhūttapasvibhiḥ

"शाप के भय से डरे पाण्डु शतशृङ्ग पर्वत पर चले गए हैं और वहीं मुनियों और तपस्वियों के साथ स्वयं तपस्वी बन गए हैं;

श्लोक 37 (1.133.37)

शाकमूलफलाहारस्तपस्वी नियतेन्द्रियः । योगध्यानपरो राजा बभूवेति च वादकाः ॥

śākamūlaphalāhārastapasvī niyatendriyaḥ | yogadhyānaparo rājā babhūveti ca vādakāḥ

"साग, मूल और फल का आहार करते हुए, इन्द्रियों को वश में रखकर वह राजा योग और ध्यान में लीन हो गया है" — ऐसा सन्देशवाहक,

श्लोक 38 (1.133.38)

प्रब्रुवन्ति स्म बहवस्तच्छ्रुत्वा शोककर्शिताः । पाण्डोः प्रीतिसमायुक्ताः कदा श्रोष्याम संकथाः ॥

prabruvanti sma bahavastacchrutvā śokakarśitāḥ | pāṇḍoḥ prītisamāyuktāḥ kadā śroṣyāma saṃkathāḥ

बहुत-से लोग, कहते रहे। यह सुनकर वे शोक से दुर्बल हो गए और पाण्डु के प्रति प्रेम से भरकर कहने लगे — "हम उनका समाचार कब सुनेंगे?"

श्लोक 39 (1.133.39)

इत्येवं कथयन्तस्ते वृष्णयः सह बान्धवैः । पाण्डोः पुत्रागमं श्रुत्वा सर्वे हर्षसमन्विताः ॥

ityevaṃ kathayantaste vṛṣṇayaḥ saha bāndhavaiḥ | pāṇḍoḥ putrāgamaṃ śrutvā sarve harṣasamanvitāḥ

जब वृष्णि अपने बन्धु-बान्धवों के साथ ऐसी बातें कर रहे थे, तभी पाण्डु के यहाँ पुत्र होने का समाचार सुनकर वे सब हर्ष से भर गए।

श्लोक 40 (1.133.40)

सभाजयन्तस्तेऽन्योन्यं वसुदेवं वचोऽब्रुवन् । न भवेरन्क्रियाहीनाः पाण्डुपुत्रा महाबलाः ॥

sabhājayantaste'nyonyaṃ vasudevaṃ vaco'bruvan | na bhaverankriyāhīnāḥ pāṇḍuputrā mahābalāḥ

एक-दूसरे को बधाई देते हुए उन्होंने वसुदेव से कहा — "पाण्डु के महाबली पुत्र संस्कारों से वंचित न रहें।

श्लोक 41 (1.133.41)

पाण्डोः प्रियहितान्वेषी प्रेषय त्वं पुरोहितम् । वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम् ॥

pāṇḍoḥ priyahitānveṣī preṣaya tvaṃ purohitam | vasudevastathetyuktvā visasarja purohitam

"आप पाण्डु का प्रिय और हित चाहते हैं, इसलिए पुरोहित को भेजिए।" वसुदेव ने 'ऐसा ही हो' कहकर पुरोहित को विदा किया।

श्लोक 42 (1.133.42)

युक्तानि च कुमाराणां पारिबर्हाण्यनेकशः । कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम् ॥

yuktāni ca kumārāṇāṃ pāribarhāṇyanekaśaḥ | kuntīṃ mādrīṃ ca saṃdiśya dāsīdāsaparicchadam

कुमारों के लिए उन्होंने अनेक उपयुक्त उपहार, तथा कुन्ती और माद्री के लिए सन्देश सहित दासी-दासों का परिवार,

श्लोक 43 (1.133.43)

गावो हिरण्यं रौप्यं च प्रेषयामास भारत । तानि सर्वाणि संगृह्य प्रययौ स पुरोहितः ॥

gāvo hiraṇyaṃ raupyaṃ ca preṣayāmāsa bhārata | tāni sarvāṇi saṃgṛhya prayayau sa purohitaḥ

गौएँ, सोना और चाँदी भेजी, हे भारत। उन सबको लेकर वह पुरोहित चल पड़ा।

श्लोक 44 (1.133.44)

तमागतं द्विजश्रेष्ठं काश्यपं वै पुरोहितम् । पूजयामास विधिवत्पाण्डुः परपुरञ्जयः ॥

tamāgataṃ dvijaśreṣṭhaṃ kāśyapaṃ vai purohitam | pūjayāmāsa vidhivatpāṇḍuḥ parapurañjayaḥ

उस द्विजश्रेष्ठ पुरोहित काश्यप के आने पर शत्रुओं के नगर जीतने वाले पाण्डु ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया।

श्लोक 45 (1.133.45)

पृथा माद्री च संहृष्टे वसुदेवं प्रशंसताम् । ततः पाण्डुः क्रियाः सर्वाः पाण्डवानामकारयत् ॥

pṛthā mādrī ca saṃhṛṣṭe vasudevaṃ praśaṃsatām | tataḥ pāṇḍuḥ kriyāḥ sarvāḥ pāṇḍavānāmakārayat

पृथा और माद्री ने अत्यन्त प्रसन्न होकर वसुदेव की प्रशंसा की। तब पाण्डु ने पाण्डवों के सभी संस्कार करवाए।

श्लोक 46 (1.133.46)

गर्भाधानादिकृत्यानि चौलोपनयनानि च । काश्यपः कृतवान्सर्वमुपाकर्म च भारत ॥

garbhādhānādikṛtyāni caulopanayanāni ca | kāśyapaḥ kṛtavānsarvamupākarma ca bhārata

हे भारत, गर्भाधान आदि संस्कार, चूडाकर्म और उपनयन, तथा उपाकर्म भी — ये सब काश्यप ने सम्पन्न किए।

श्लोक 47 (1.133.47)

चौलोपनयनादूर्ध्वमृषभाक्षा यशस्विनः । वैदिकाध्ययने सर्वे समपद्यन्त पारगाः ॥

caulopanayanādūrdhvamṛṣabhākṣā yaśasvinaḥ | vaidikādhyayane sarve samapadyanta pāragāḥ

चूडाकर्म और उपनयन के बाद वृषभ के समान नेत्रों वाले वे सभी यशस्वी कुमार वेदाध्ययन में पारंगत हो गए।

श्लोक 48 (1.133.48)

शर्यातेः प्रथमः पुत्रः शुक्रो नाम परन्तपः । येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥

śaryāteḥ prathamaḥ putraḥ śukro nāma parantapaḥ | yena sāgaraparyantā dhanuṣā nirjitā mahī

शर्याति के ज्येष्ठ पुत्र शुक्र नामक शत्रुतापन राजा, जिन्होंने अपने धनुष से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी जीत ली थी,

श्लोक 49 (1.133.49)

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा स महात्मा महामखैः । आराध्य देवताः सर्वाः पितॄनपि महामतिः ॥

aśvamedhaśatairiṣṭvā sa mahātmā mahāmakhaiḥ | ārādhya devatāḥ sarvāḥ pitṝnapi mahāmatiḥ

वे महात्मा और महामति, सौ अश्वमेध तथा अन्य महायज्ञ करके, और सब देवताओं तथा पितरों की आराधना करके,

श्लोक 50 (1.133.50)

शतशृङ्गे तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः । तेनोपकरणश्रेष्ठैः शिक्षया चोपबृंहिताः ॥

śataśṛṅge tapastepe śākamūlaphalāśanaḥ | tenopakaraṇaśreṣṭhaiḥ śikṣayā copabṛṃhitāḥ

शतशृङ्ग पर साग, मूल और फल खाकर तप कर रहे थे। उनके द्वारा उत्तम साधनों और शिक्षा से समृद्ध किए जाकर

श्लोक 51 (1.133.51)

तत्प्रसादाद्धनुर्वेदे समपद्यन्त पारगाः । गदायां पारगो भीमस्तोमरेषु युधिष्ठिरः ॥

tatprasādāddhanurvede samapadyanta pāragāḥ | gadāyāṃ pārago bhīmastomareṣu yudhiṣṭhiraḥ

उनकी कृपा से वे धनुर्वेद में पारंगत हो गए। भीम गदा में पारंगत हुए और युधिष्ठिर तोमर में;

श्लोक 52 (1.133.52)

असिचर्मणि निष्णातौ यमौ सत्त्ववतां वरौ । धनुर्वेदे गतः पारं सव्यसाची परन्तपः ॥

asicarmaṇi niṣṇātau yamau sattvavatāṃ varau | dhanurvede gataḥ pāraṃ savyasācī parantapaḥ

बलवानों में श्रेष्ठ दोनों जुड़वाँ भाई ढाल-तलवार में निपुण हुए, और शत्रुतापन सव्यसाची (अर्जुन) धनुर्वेद में पार पहुँच गए।

श्लोक 53 (1.133.53)

शुक्रेण समनुज्ञातो मत्समोऽयमिति प्रभो । अनुज्ञाय ततो राजा शक्तिं खड्गं ततः शरान् ॥

śukreṇa samanujñāto matsamo'yamiti prabho | anujñāya tato rājā śaktiṃ khaḍgaṃ tataḥ śarān

हे प्रभो, शुक्र ने उन्हें 'यह मेरे समान है' कहकर स्वीकृति दी। तब उस राजा ने अनुमति देकर शक्ति, खड्ग और बाण,

श्लोक 54 (1.133.54)

धनुश्च ददतां श्रेष्ठस्तालमात्रं महाप्रभम् । विपाठक्षुरनाराचान्गृध्रपक्षैरलङ्कृतान् ॥

dhanuśca dadatāṃ śreṣṭhastālamātraṃ mahāprabham | vipāṭhakṣuranārācāngṛdhrapakṣairalaṅkṛtān

ताड़ के वृक्ष जितना ऊँचा, अत्यन्त दीप्तिमान धनुष, और गिद्ध के पंखों से सजे विपाठ, क्षुर और नाराच बाण — दाताओं में श्रेष्ठ उस राजा ने

श्लोक 55 (1.133.55)

ददौ पार्थाय संहृष्टो महोरगसमप्रभान् । अवाप्य सर्वशस्त्राणि मुदितो वासवात्मजः ॥

dadau pārthāya saṃhṛṣṭo mahoragasamaprabhān | avāpya sarvaśastrāṇi mudito vāsavātmajaḥ

बड़े सर्पों के समान चमकते वे सब प्रसन्न होकर पार्थ को दिए। ये सब शस्त्र पाकर इन्द्रपुत्र आनन्दित हुए

श्लोक 56 (1.133.56)

मेने सर्वान्महीपालानपर्याप्तान्स्वतेजसः ॥

mene sarvānmahīpālānaparyāptānsvatejasaḥ

और उन्होंने पृथ्वी के सब राजाओं को अपने तेज के आगे तुच्छ समझा।

श्लोक 57 (1.133.57)

एकवर्षान्तरास्त्वेवं परस्परमरिन्दमाः । अन्ववर्तन्त पार्थाश्च माद्रीपुत्रौ तथैव च ॥

ekavarṣāntarāstvevaṃ parasparamarindamāḥ | anvavartanta pārthāśca mādrīputrau tathaiva ca

इस प्रकार एक-एक वर्ष के अन्तर वाले वे शत्रुदमन पृथापुत्र और वैसे ही माद्री के दोनों पुत्र (आयु में) एक-दूसरे के पीछे-पीछे थे।

श्लोक 58 (1.133.58)

ते च पञ्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धनाः । सर्वे ववृधिरेऽल्पेन कालेनाप्स्विव पङ्कजाः ॥

te ca pañca śataṃ caiva kuruvaṃśavivardhanāḥ | sarve vavṛdhire'lpena kālenāpsviva paṅkajāḥ

और वे पाँचों तथा सौ (कौरव) — कुरुवंश की वृद्धि करने वाले — सभी थोड़े ही समय में जल में कमलों की भाँति बढ़ गए।

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