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आदि पर्व · अध्याय 132

अर्जुन का जन्म

भीम के जन्म के बाद पाण्डु संसार में सर्वश्रेष्ठ पुत्र की कामना करते हैं और इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए एक वर्ष तक एक पैर पर खड़े होकर तप करते हैं। इन्द्र अनुपम पुत्र का वचन देते हैं; पाण्डु के कहने पर कुन्ती उनका आवाहन करती हैं और अर्जुन का जन्म होता है। एक अशरीरी वाणी खाण्डव-दाह से लेकर पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति तक बालक के भावी कर्मों की घोषणा करती है। देवता, ऋषि, गन्धर्व, अप्सराएँ, आदित्य, रुद्र, नाग और विनता के पुत्र शिशु का सम्मान करने आते हैं और देवता पाण्डु को आशीर्वाद देते हैं। जब पाण्डु एक और पुत्र के लिए आग्रह करते हैं, तो कुन्ती यह कहकर मना कर देती हैं कि आपत्ति में भी इस रीति से चौथी सन्तान का विधान नहीं है।

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.132.1)

जाते बलवतां श्रेष्ठे पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत् । कथमन्यो मम सुतो लोके श्रेष्ठो भवेदिति ॥

jāte balavatāṃ śreṣṭhe pāṇḍuścintāparo'bhavat | kathamanyo mama suto loke śreṣṭho bhavediti

वैशम्पायन ने कहा — बलवानों में श्रेष्ठ (भीम) के जन्म लेने पर पाण्डु चिन्ता में पड़ गए — "मुझे ऐसा एक और पुत्र कैसे मिले, जो संसार में सबसे श्रेष्ठ हो?

श्लोक 2 (1.132.2)

दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं संप्रतिष्ठितः । तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ॥

daive puruṣakāre ca loko'yaṃ saṃpratiṣṭhitaḥ | tatra daivaṃ tu vidhinā kālayuktena labhyate

"यह संसार दैव और पुरुषार्थ — दोनों पर टिका है। इनमें दैव उचित विधि से और समय के संयोग से ही प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (1.132.3)

इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम् । अप्रमेयबलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः ॥

indro hi rājā devānāṃ pradhāna iti naḥ śrutam | aprameyabalotsāho vīryavānamitadyutiḥ

"हमने सुना है कि इन्द्र देवताओं के राजा और उनमें प्रधान हैं — अपार बल और उत्साह वाले, पराक्रमी और असीम तेजस्वी।

श्लोक 4 (1.132.4)

तं तोषयित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महाबलम् । यं दास्यति स मे पुत्रं स वरीयान्भविष्यति ॥

taṃ toṣayitvā tapasā putraṃ lapsye mahābalam | yaṃ dāsyati sa me putraṃ sa varīyānbhaviṣyati

"तपस्या से उन्हें प्रसन्न करके मैं महाबली पुत्र प्राप्त करूँगा। वे मुझे जो पुत्र देंगे, वह सबसे श्रेष्ठ होगा।

श्लोक 5 (1.132.5)

अमानुषान्मानुषांश्च संग्रामे स हनिष्यति । कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्तप्स्ये महत्तपः ॥

amānuṣānmānuṣāṃśca saṃgrāme sa haniṣyati | karmaṇā manasā vācā tasmāttapsye mahattapaḥ

"वह युद्ध में मनुष्यों और अमानुषों — दोनों का संहार करेगा। इसलिए मैं कर्म, मन और वाणी से महान तप करूँगा।"

श्लोक 6 (1.132.6)

ततः पाण्डुर्महाराजो मन्त्रयित्वा महर्षिभिः । दिदेश कुन्त्याः कौरव्यो व्रतं सांवत्सरं शुभम् ॥

tataḥ pāṇḍurmahārājo mantrayitvā maharṣibhiḥ | dideśa kuntyāḥ kauravyo vrataṃ sāṃvatsaraṃ śubham

तब कुरुवंशी महाराज पाण्डु ने महर्षियों से परामर्श करके कुन्ती को एक वर्ष तक चलने वाला शुभ व्रत करने का आदेश दिया।

श्लोक 7 (1.132.7)

आत्मना च महाबाहुरेकपादस्थितोऽभवत् । उग्रं स तप आस्थाय परमेण समाधिना ॥

ātmanā ca mahābāhurekapādasthito'bhavat | ugraṃ sa tapa āsthāya parameṇa samādhinā

और वे महाबाहु स्वयं एक पैर पर खड़े हो गए और परम समाधि के साथ उग्र तप में लग गए।

श्लोक 8 (1.132.8)

आरिराधयिषुर्देवं त्रिदशानां तमीश्वरम् । सूर्येण सह धर्मात्मा पर्यतप्यत भारत ॥

ārirādhayiṣurdevaṃ tridaśānāṃ tamīśvaram | sūryeṇa saha dharmātmā paryatapyata bhārata

हे भारत, तीस देवताओं के स्वामी उन इन्द्र को प्रसन्न करने की इच्छा से वह धर्मात्मा राजा सूर्य के साथ-साथ (उदय से अस्त तक) तप करता रहा।

श्लोक 9 (1.132.9)

तं तु कालेन महता वासवः प्रत्यपद्यत । पुत्रं तव प्रदास्यामि त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

taṃ tu kālena mahatā vāsavaḥ pratyapadyata | putraṃ tava pradāsyāmi triṣu lokeṣu viśrutam

बहुत समय बीतने पर इन्द्र उनके पास आए और बोले — "मैं तुम्हें तीनों लोकों में विख्यात पुत्र दूँगा,

शक्र उवाच

श्लोक 10 (1.132.10)

ब्राह्मणानां गवां चैव सुहृदां चार्थसाधकम् । दुर्हृदां शोकजननं सर्वबान्धवनन्दनम् ॥

brāhmaṇānāṃ gavāṃ caiva suhṛdāṃ cārthasādhakam | durhṛdāṃ śokajananaṃ sarvabāndhavanandanam

"जो ब्राह्मणों, गौओं और मित्रों का हित साधेगा, शत्रुओं को शोक देगा और सभी बन्धु-बान्धवों को आनन्दित करेगा।

श्लोक 11 (1.132.11)

सुतं तेऽग्र्यं प्रदास्यामि सर्वामित्रविनाशनम् । इत्युक्तः कौरवो राजा वासवेन महात्मना ॥

sutaṃ te'gryaṃ pradāsyāmi sarvāmitravināśanam | ityuktaḥ kauravo rājā vāsavena mahātmanā

"मैं तुम्हें सब शत्रुओं का नाश करने वाला श्रेष्ठ पुत्र दूँगा।" महात्मा इन्द्र के ऐसा कहने पर कुरुवंशी राजा,

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (1.132.12)

उवाच कुन्तीं धर्मात्मा देवराजवचः स्मरन् । उदर्कस्तव कल्याणि तुष्टो देवगणेश्वरः ॥

uvāca kuntīṃ dharmātmā devarājavacaḥ smaran | udarkastava kalyāṇi tuṣṭo devagaṇeśvaraḥ

धर्मात्मा पाण्डु ने देवराज के वचनों का स्मरण करते हुए कुन्ती से कहा — "कल्याणी, तुम्हारे शुभ फल का उदय हुआ है; देवगणों के स्वामी प्रसन्न हैं।

पाण्डुरुवाच

श्लोक 13 (1.132.13)

दातुमिच्छति ते पुत्रं यथा संकल्पितं त्वया । अतिमानुषकर्माणं यशस्विनमरिन्दमम् ॥

dātumicchati te putraṃ yathā saṃkalpitaṃ tvayā | atimānuṣakarmāṇaṃ yaśasvinamarindamam

"वे तुम्हें तुम्हारे संकल्प के अनुसार पुत्र देना चाहते हैं — अलौकिक कर्म करने वाला, यशस्वी और शत्रुओं का दमन करने वाला,

श्लोक 14 (1.132.14)

नीतिमन्तं महात्मानमादित्यसमतेजसम् । दुराधर्षं क्रियावन्तमतीवाद्भुतदर्शनम् ॥

nītimantaṃ mahātmānamādityasamatejasam | durādharṣaṃ kriyāvantamatīvādbhutadarśanam

"नीतिज्ञ, महात्मा, सूर्य के समान तेजस्वी, दुर्धर्ष, कर्मठ और अत्यन्त अद्भुत रूप वाला।

श्लोक 15 (1.132.15)

पुत्रं जनय सुश्रोणि धाम क्षत्रियतेजसाम् । लब्धः प्रसादो देवेन्द्रात्तमाह्वय शुचिस्मिते ॥

putraṃ janaya suśroṇi dhāma kṣatriyatejasām | labdhaḥ prasādo devendrāttamāhvaya śucismite

"सुन्दरी, क्षत्रिय-तेज के धाम-स्वरूप पुत्र को जन्म दो। देवराज की कृपा प्राप्त हो चुकी है; हे मधुर मुस्कान वाली, उनका आवाहन करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.132.16)

एवमुक्ता ततः शक्रमाजुहाव यशस्विनी । अथाजगाम देवेन्द्रो जनयामास चार्जुनम् ॥

evamuktā tataḥ śakramājuhāva yaśasvinī | athājagāma devendro janayāmāsa cārjunam

वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहे जाने पर यशस्विनी कुन्ती ने इन्द्र का आवाहन किया। देवराज आए और उन्होंने अर्जुन को उत्पन्न किया।

श्लोक 17 (1.132.17)

उत्तराभ्यां तु पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यां ततो दिवा । जातस्तु फाल्गुने मासि तेनासौ फल्गुनःस्मृतः ॥

uttarābhyāṃ tu pūrvābhyāṃ phalgunībhyāṃ tato divā | jātastu phālgune māsi tenāsau phalgunaḥsmṛtaḥ

उसका जन्म दिन में, उत्तरा और पूर्वा — दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों में, फाल्गुन मास में हुआ; इसीलिए वह 'फाल्गुन' नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 18 (1.132.18)

जातमात्रे कुमारे तु सर्वभूतप्रहर्षिणी । सूतके वर्तमानां तां वागुवाचाशरीरिणी । महागम्भीरनिर्घोषा नभो नादयती तदा ॥

jātamātre kumāre tu sarvabhūtapraharṣiṇī | sūtake vartamānāṃ tāṃ vāguvācāśarīriṇī | mahāgambhīranirghoṣā nabho nādayatī tadā

कुमार के जन्म लेते ही, प्रसूति-गृह में स्थित कुन्ती से, समस्त प्राणियों को हर्षित करने वाली एक अशरीरी वाणी बोली — अत्यन्त गम्भीर घोष वाली, जो आकाश को गुँजा रही थी।

श्लोक 19 (1.132.19)

शृण्वतां सर्वभूतानां तेषां चाश्रमवासिनाम् । कुन्तीमाभाष्य विस्पष्टमुवाचेदं शुचिस्मिताम् ॥

śṛṇvatāṃ sarvabhūtānāṃ teṣāṃ cāśramavāsinām | kuntīmābhāṣya vispaṣṭamuvācedaṃ śucismitām

सब प्राणियों और उन आश्रमवासियों के सुनते हुए उसने मधुर मुस्कान वाली कुन्ती को सम्बोधित कर स्पष्ट शब्दों में यह कहा —

श्लोक 20 (1.132.20)

कार्तवीर्यसमः कुन्ति शिवतुल्यपराक्रमः । एष शक्र इवाजय्यो यशस्ते प्रथयिष्यति ॥

kārtavīryasamaḥ kunti śivatulyaparākramaḥ | eṣa śakra ivājayyo yaśaste prathayiṣyati

"कुन्ती, यह कार्तवीर्य के समान और शिव के तुल्य पराक्रमी होगा; इन्द्र की भाँति अजेय रहकर यह तुम्हारा यश फैलाएगा।

श्लोक 21 (1.132.21)

अदित्या विष्णुना प्रीतिर्यथाऽभूदभिवर्धिता । तथा विष्णुसमः प्रीतिं वर्धयिष्यति तेऽर्जुनः ॥

adityā viṣṇunā prītiryathā'bhūdabhivardhitā | tathā viṣṇusamaḥ prītiṃ vardhayiṣyati te'rjunaḥ

"जैसे विष्णु ने अदिति का आनन्द बढ़ाया था, वैसे ही विष्णु के समान यह अर्जुन तुम्हारा आनन्द बढ़ाएगा।

श्लोक 22 (1.132.22)

एष मद्रान्वशे कृत्वा कुरूंश्च सह सोमकैः । चेदिकाशिकरूषांश्च कुरुलक्ष्मीं वहिष्यति ॥

eṣa madrānvaśe kṛtvā kurūṃśca saha somakaiḥ | cedikāśikarūṣāṃśca kurulakṣmīṃ vahiṣyati

"यह मद्रों को, सोमकों सहित कुरुओं को, और चेदि, काशी तथा करूष देशों को वश में करके कुरुकुल की लक्ष्मी को धारण करेगा।

श्लोक 23 (1.132.23)

एतस्य भुजवीर्येण खाण्डवे हव्यवाहनः । मेदसा सर्वभूतानां तृप्तिं यास्यति वै पराम् ॥

etasya bhujavīryeṇa khāṇḍave havyavāhanaḥ | medasā sarvabhūtānāṃ tṛptiṃ yāsyati vai parām

"इसके भुजबल से खाण्डव वन में अग्निदेव सब प्राणियों की मेदा से परम तृप्ति पाएँगे।

श्लोक 24 (1.132.24)

ग्रामणीश्च महीपालानेष जित्वा महाबलः । भ्रातृभिः सहितो वीरस्त्रीन्मेधानाहरिष्यति ॥

grāmaṇīśca mahīpālāneṣa jitvā mahābalaḥ | bhrātṛbhiḥ sahito vīrastrīnmedhānāhariṣyati

"यह महाबली वीर सामन्तों और राजाओं को जीतकर अपने भाइयों के साथ तीन महायज्ञ सम्पन्न करेगा।

श्लोक 25 (1.132.25)

जामदग्न्यसमः कुन्ति विष्णुतुल्यपराक्रमः । एष वीर्यवतां श्रेष्ठो भविष्यति महायशाः ॥

jāmadagnyasamaḥ kunti viṣṇutulyaparākramaḥ | eṣa vīryavatāṃ śreṣṭho bhaviṣyati mahāyaśāḥ

"कुन्ती, यह जमदग्निपुत्र (परशुराम) के समान और विष्णु के तुल्य पराक्रमी होगा; यह बलवानों में श्रेष्ठ और महायशस्वी होगा।

श्लोक 26 (1.132.26)

एष युद्धे महादेवं तोषयिष्यति शङ्करम् । अस्त्रं पाशुपतं नाम तस्मात्तुष्टादवाप्स्यति ॥

eṣa yuddhe mahādevaṃ toṣayiṣyati śaṅkaram | astraṃ pāśupataṃ nāma tasmāttuṣṭādavāpsyati

"यह युद्ध में महादेव शंकर को सन्तुष्ट करेगा और प्रसन्न हुए उनसे 'पाशुपत' नामक अस्त्र प्राप्त करेगा।

श्लोक 27 (1.132.27)

निवातकवचा नाम दैत्या विबुधविद्विषः । शक्राज्ञया महाबाहुस्तान्वधिष्यति ते सुतः ॥

nivātakavacā nāma daityā vibudhavidviṣaḥ | śakrājñayā mahābāhustānvadhiṣyati te sutaḥ

"निवातकवच नाम के दैत्य, जो देवताओं के शत्रु हैं — इन्द्र की आज्ञा से तुम्हारा यह महाबाहु पुत्र उनका वध करेगा।

श्लोक 28 (1.132.28)

तथा दिव्यानि चास्त्राणि निखिलेनाहरिष्यति । विप्रनष्टां श्रियं चायमाहर्ता पुरुषर्षभः ॥

tathā divyāni cāstrāṇi nikhilenāhariṣyati | vipranaṣṭāṃ śriyaṃ cāyamāhartā puruṣarṣabhaḥ

"यह सभी दिव्य अस्त्रों को पूर्ण रूप से प्राप्त करेगा, और यह पुरुषश्रेष्ठ खोई हुई राजलक्ष्मी को फिर लौटा लाएगा।"

श्लोक 29 (1.132.29)

एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्ती शुश्राव सूतके । वाचमुच्चरितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम् ॥

etāmatyadbhutāṃ vācaṃ kuntī śuśrāva sūtake | vācamuccaritāmuccaistāṃ niśamya tapasvinām

प्रसूति-काल में कुन्ती ने यह अत्यन्त अद्भुत वाणी सुनी। ऊँचे स्वर में कही गई उस वाणी को सुनकर

श्लोक 30 (1.132.30)

बभूव परमो हर्षः शतशृङ्गनिवासिनाम् । तथा देवमहर्षीणां सेन्द्राणां च दिवौकसाम् ॥

babhūva paramo harṣaḥ śataśṛṅganivāsinām | tathā devamaharṣīṇāṃ sendrāṇāṃ ca divaukasām

शतशृङ्ग पर रहने वाले तपस्वियों को परम हर्ष हुआ, और वैसे ही देवर्षियों तथा इन्द्र सहित स्वर्गवासियों को भी।

श्लोक 31 (1.132.31)

आकाशे दुन्दुभीनां च बभूव तुमुलः स्वनः । उदतिष्ठन्महाघोरः पुष्पवृष्टिभिरावृतः ॥

ākāśe dundubhīnāṃ ca babhūva tumulaḥ svanaḥ | udatiṣṭhanmahāghoraḥ puṣpavṛṣṭibhirāvṛtaḥ

आकाश में दुन्दुभियों का तुमुल नाद हुआ; पुष्प-वर्षा के साथ अत्यन्त गम्भीर घोष उठा।

श्लोक 32 (1.132.32)

समवेत्य च देवानां गणाः पार्थमपूजयन् । काद्रवेया वैनतेया गन्धर्वाप्सरसस्तथा । प्रजानां पतयः सर्वे सप्त चैव महर्षयः ॥

samavetya ca devānāṃ gaṇāḥ pārthamapūjayan | kādraveyā vainateyā gandharvāpsarasastathā | prajānāṃ patayaḥ sarve sapta caiva maharṣayaḥ

देवताओं के गण एकत्र होकर पार्थ का सम्मान करने लगे — कद्रू के पुत्र (नाग), विनता के पुत्र, गन्धर्व और अप्सराएँ, सभी प्रजापति और सातों महर्षि —

श्लोक 33 (1.132.33)

भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च । विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः । यश्चोदितो भास्करेऽभूत्प्रनष्टे । सोऽप्यत्रात्रिर्भगवानाजगाम ॥

bharadvājaḥ kaśyapo gautamaśca | viśvāmitro jamadagnirvasiṣṭhaḥ | yaścodito bhāskare'bhūtpranaṣṭe | so'pyatrātrirbhagavānājagāma

भरद्वाज, कश्यप और गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और वसिष्ठ; तथा सूर्य के लुप्त हो जाने पर जो (उसके स्थान पर) उदित हुए थे, वे भगवान अत्रि भी वहाँ आए।

श्लोक 34 (1.132.34)

मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । दक्षः प्रजापतिश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥

marīciraṅgirāścaiva pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | dakṣaḥ prajāpatiścaiva gandharvāpsarasastathā

मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और प्रजापति दक्ष, तथा गन्धर्व और अप्सराएँ भी आईं।

श्लोक 35 (1.132.35)

दिव्यमाल्याम्बरधराः सर्वालङ्कारभूषिताः । उपगायन्ति बीभत्सुं नृत्यन्तेऽप्सरसां गणाः ॥

divyamālyāmbaradharāḥ sarvālaṅkārabhūṣitāḥ | upagāyanti bībhatsuṃ nṛtyante'psarasāṃ gaṇāḥ

दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए, सब प्रकार के आभूषणों से सजे वे बीभत्सु (अर्जुन) का गुणगान करने लगे, और अप्सराओं के समूह नाचने लगे।

श्लोक 36 (1.132.36)

तथा महर्षयश्चापि जेपुस्तत्र समन्ततः । गन्धर्वैः सहितः श्रीमान्प्रागायत च तुम्बुरुः ॥

tathā maharṣayaścāpi jepustatra samantataḥ | gandharvaiḥ sahitaḥ śrīmānprāgāyata ca tumburuḥ

महर्षि भी चारों ओर जप करने लगे, और श्रीमान तुम्बुरु गन्धर्वों के साथ गाने लगे।

श्लोक 37 (1.132.37)

भीमसेनोग्रसेनौ च ऊर्णायुरनघस्तथा । गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चास्तथाष्टमः ॥

bhīmasenograsenau ca ūrṇāyuranaghastathā | gopatirdhṛtarāṣṭraśca sūryavarcāstathāṣṭamaḥ

भीमसेन और उग्रसेन, ऊर्णायु और अनघ, गोपति और धृतराष्ट्र, तथा आठवें सूर्यवर्चा;

श्लोक 38 (1.132.38)

युगपस्तृणपः कार्ष्णिर्नन्दिश्चित्ररथस्तथा । त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः ॥

yugapastṛṇapaḥ kārṣṇirnandiścitrarathastathā | trayodaśaḥ śāliśirāḥ parjanyaśca caturdaśaḥ

युगप, तृणप, कार्ष्णि, नन्दि और चित्ररथ; तेरहवें शालिशिरा और चौदहवें पर्जन्य;

श्लोक 39 (1.132.39)

कलिः पञ्चदशश्चैव नारदश्चात्र षोडशः । ऋत्वा बृहत्त्वा बृहकः करालश्च महामनाः ॥

kaliḥ pañcadaśaścaiva nāradaścātra ṣoḍaśaḥ | ṛtvā bṛhattvā bṛhakaḥ karālaśca mahāmanāḥ

पन्द्रहवें कलि और सोलहवें नारद; ऋत्वा, बृहत्त्वा, बृहक और महामना कराल;

श्लोक 40 (1.132.40)

ब्रह्मचारी बहुगुणः सुवर्णश्चेति विश्रुतः । विश्वावसुर्भुमन्युश्च सुचन्द्रश्च शरुस्तथा ॥

brahmacārī bahuguṇaḥ suvarṇaśceti viśrutaḥ | viśvāvasurbhumanyuśca sucandraśca śarustathā

ब्रह्मचारी, बहुगुण और विख्यात सुवर्ण; विश्वावसु, भुमन्यु, सुचन्द्र और शरु;

श्लोक 41 (1.132.41)

गीतमाधुर्यसंपन्नौ विख्यातौ च हहाहुहू । इत्येते देवगन्धर्वा जग्मुस्तत्र नराधिप ॥

gītamādhuryasaṃpannau vikhyātau ca hahāhuhū | ityete devagandharvā jagmustatra narādhipa

और मधुर गान से सम्पन्न विख्यात हाहा और हूहू — हे नरेश, ये देव-गन्धर्व वहाँ आए।

श्लोक 42 (1.132.42)

तथैवाप्सरसो हृष्टाः सर्वालङ्कारभूषिताः । ननृतुर्वै महाभागा जगुश्चायतलोचनाः ॥

tathaivāpsaraso hṛṣṭāḥ sarvālaṅkārabhūṣitāḥ | nanṛturvai mahābhāgā jaguścāyatalocanāḥ

उसी प्रकार सब आभूषणों से सजी, हर्षित, परम सौभाग्यवती, बड़ी-बड़ी आँखों वाली अप्सराएँ नाचीं और गाईं।

श्लोक 43 (1.132.43)

अनूचानाऽनवद्या च गुणमुख्या गुणावरा । अद्रिका च तथा सोमा मिश्रकेशी त्वलम्बुषा ॥

anūcānā'navadyā ca guṇamukhyā guṇāvarā | adrikā ca tathā somā miśrakeśī tvalambuṣā

अनूचाना और अनवद्या, गुणमुख्या और गुणावरा; अद्रिका और सोमा, मिश्रकेशी और अलम्बुषा;

श्लोक 44 (1.132.44)

मरीचिः शुचिका चैव विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा । अम्बिका लक्षणा क्षेमा देवी रम्भा मनोरमा ॥

marīciḥ śucikā caiva vidyutparṇā tilottamā | ambikā lakṣaṇā kṣemā devī rambhā manoramā

मरीचि, शुचिका, विद्युत्पर्णा और तिलोत्तमा; अम्बिका, लक्षणा, क्षेमा, देवी रम्भा और मनोरमा;

श्लोक 45 (1.132.45)

असिता च सुबाहुश्च सुप्रिया च वपुस्तथा । पुण्डरीका सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी ॥

asitā ca subāhuśca supriyā ca vapustathā | puṇḍarīkā sugandhā ca surasā ca pramāthinī

असिता और सुबाहु, सुप्रिया और वपु; पुण्डरीका और सुगन्धा, सुरसा और प्रमाथिनी;

श्लोक 46 (1.132.46)

काम्या शारद्वती चैव ननृतुस्तत्र संघशः । मेनका सहजन्या च कर्णिका पुञ्जिकस्थला ॥

kāmyā śāradvatī caiva nanṛtustatra saṃghaśaḥ | menakā sahajanyā ca karṇikā puñjikasthalā

काम्या और शारद्वती — ये टोलियाँ बनाकर वहाँ नाचीं। मेनका और सहजन्या, कर्णिका और पुञ्जिकस्थला,

श्लोक 47 (1.132.47)

ऋतुस्थला घृताची च विश्वाची पूर्वचित्त्यपि । उम्लोचेति च विख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ॥

ṛtusthalā ghṛtācī ca viśvācī pūrvacittyapi | umloceti ca vikhyātā pramloceti ca tā daśa

ऋतुस्थला और घृताची, विश्वाची और पूर्वचित्ति, उम्लोचा नाम से विख्यात और प्रम्लोचा — ये दस थीं;

श्लोक 48 (1.132.48)

उर्वश्येकादशी तासां जगुश्चायतलोचनाः । धाताऽर्यमा च मित्रश्च वरुणोंऽशो भगस्तथा ॥

urvaśyekādaśī tāsāṃ jaguścāyatalocanāḥ | dhātā'ryamā ca mitraśca varuṇoṃ'śo bhagastathā

और उनमें ग्यारहवीं उर्वशी थी; बड़ी आँखों वाली ये अप्सराएँ गाने लगीं। धाता, अर्यमा और मित्र, वरुण, अंश और भग,

श्लोक 49 (1.132.49)

इन्द्रो विवस्वान्पूषा च पर्जन्यो दशमः स्मृतः । ततस्त्वष्टा ततो विष्णुरजघन्यो जघन्यजः ॥

indro vivasvānpūṣā ca parjanyo daśamaḥ smṛtaḥ | tatastvaṣṭā tato viṣṇurajaghanyo jaghanyajaḥ

इन्द्र, विवस्वान् और पूषा, दसवें कहे जाने वाले पर्जन्य, फिर त्वष्टा, और फिर विष्णु, जो सबसे छोटे होकर भी किसी से छोटे नहीं —

श्लोक 50 (1.132.50)

इत्येते द्वादशादित्या ज्वलन्तः सूर्यवर्चसः ॥

ityete dvādaśādityā jvalantaḥ sūryavarcasaḥ

ये बारह आदित्य हैं, जो सूर्य के समान तेज से दमकते हैं।

श्लोक 51 (1.132.51)

मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः । अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतप ॥

mṛgavyādhaśca sarpaśca nirṛtiśca mahāyaśāḥ | ajaikapādahirbudhnyaḥ pinākī ca paraṃtapa

मृगव्याध और सर्प, महायशस्वी निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और पिनाकी, हे परन्तप;

श्लोक 52 (1.132.52)

दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशांपते । स्थाणुर्भगश्च भगवान्रुद्रास्तत्रावतस्थिरे ॥

dahano'theśvaraścaiva kapālī ca viśāṃpate | sthāṇurbhagaśca bhagavānrudrāstatrāvatasthire

दहन और ईश्वर, कपाली, हे प्रजानाथ, स्थाणु और भगवान भग — ये रुद्र वहाँ उपस्थित थे।

श्लोक 53 (1.132.53)

अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः । विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन्परितः स्थिताः ॥

aśvinau vasavaścāṣṭau marutaśca mahābalāḥ | viśvedevāstathā sādhyāstatrāsanparitaḥ sthitāḥ

दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव और साध्य — ये वहाँ चारों ओर खड़े थे।

श्लोक 54 (1.132.54)

कर्कोटकोऽथ सर्पश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः । कच्छपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ॥

karkoṭako'tha sarpaśca vāsukiśca bhujaṅgamaḥ | kacchapaścātha kuṇḍaśca takṣakaśca mahoragaḥ

कर्कोटक और सर्प, भुजङ्ग वासुकि, कच्छप और कुण्ड, तथा महानाग तक्षक —

श्लोक 55 (1.132.55)

आययुस्तपसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः । एते चान्ये च बहवस्तत्र नागा व्यवस्थिताः ॥

āyayustapasā yuktā mahākrodhā mahābalāḥ | ete cānye ca bahavastatra nāgā vyavasthitāḥ

ये तपोबल से युक्त, महाक्रोधी और महाबली नाग आए; ये और दूसरे बहुत-से नाग वहाँ उपस्थित थे।

श्लोक 56 (1.132.56)

तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः । अरुणश्चारुणिश्चैव वैनतेया व्यवस्थिताः ॥

tārkṣyaścāriṣṭanemiśca garuḍaścāsitadhvajaḥ | aruṇaścāruṇiścaiva vainateyā vyavasthitāḥ

तार्क्ष्य और अरिष्टनेमि, गरुड और असितध्वज, अरुण और आरुणि — विनता के ये पुत्र वहाँ खड़े थे।

श्लोक 57 (1.132.57)

तांश्च देवगणान्सर्वांस्तपःसिद्धा महर्षयः । विमानगिर्यग्रगतान्ददृशुर्नेतरे जनाः ॥

tāṃśca devagaṇānsarvāṃstapaḥsiddhā maharṣayaḥ | vimānagiryagragatāndadṛśurnetare janāḥ

विमानों पर और पर्वत-शिखरों पर स्थित उन सब देवगणों को तप से सिद्ध महर्षियों ने देखा; दूसरे लोग उन्हें नहीं देख सके।

श्लोक 58 (1.132.58)

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता मुनिसत्तमाः । अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन्पाण्डवं प्रति ॥

taddṛṣṭvā mahadāścaryaṃ vismitā munisattamāḥ | adhikāṃ sma tato vṛttimavartanpāṇḍavaṃ prati

उस महान आश्चर्य को देखकर श्रेष्ठ मुनि विस्मित हो गए और तब से पाण्डुपुत्र के प्रति और भी अधिक आदर रखने लगे।

श्लोक 59 (1.132.59)

पाण्डुः प्रीतेन मनसा देवतादीनपूजयत् । पाण्डुना पूजिता देवाः प्रत्यूचुर्नरसत्तमम् ॥

pāṇḍuḥ prītena manasā devatādīnapūjayat | pāṇḍunā pūjitā devāḥ pratyūcurnarasattamam

पाण्डु ने प्रसन्न मन से देवताओं तथा अन्य आगन्तुकों की पूजा की। पाण्डु से पूजित होकर देवताओं ने उस नरश्रेष्ठ को उत्तर दिया —

देवा ऊचुः

श्लोक 60 (1.132.60)

प्रादुर्भूतो ह्ययं धर्मो देवतानां प्रसादतः । मातरिश्वा ह्ययं भीमो बलवानरिमर्दनः ॥

prādurbhūto hyayaṃ dharmo devatānāṃ prasādataḥ | mātariśvā hyayaṃ bhīmo balavānarimardanaḥ

"देवताओं की कृपा से यह (युधिष्ठिर) स्वयं धर्म के रूप में प्रकट हुआ है, और यह भीम मातरिश्वा (वायु) है — बलवान और शत्रुओं को कुचलने वाला।

श्लोक 61 (1.132.61)

साक्षादिन्द्रः स्वयं जातः प्रसादाच्च शतक्रतोः । पितृत्वाद्देवतानां हि नास्ति पुण्यतरस्त्वया ॥

sākṣādindraḥ svayaṃ jātaḥ prasādācca śatakratoḥ | pitṛtvāddevatānāṃ hi nāsti puṇyatarastvayā

"और शतक्रतु की कृपा से साक्षात् इन्द्र स्वयं जन्मे हैं। देवताओं के पिता होने के कारण तुमसे बढ़कर पुण्यवान कोई नहीं है।

श्लोक 62 (1.132.62)

पितॄणामृणनिर्मुक्तः स्वर्गं प्राप्स्यसि पुण्यभाक् । इत्युक्त्वा देवताः सर्वा विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥

pitṝṇāmṛṇanirmuktaḥ svargaṃ prāpsyasi puṇyabhāk | ityuktvā devatāḥ sarvā viprajagmuryathāgatam

"पितरों के ऋण से मुक्त होकर, पुण्य के भागी बनकर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे।" यह कहकर सभी देवता जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 63 (1.132.63)

पाण्डुस्तु पुनरेवैनां पुत्रलोभान्महायशाः । प्रादिशद्दर्शनीयार्थी कुन्ती त्वेनमथाब्रवीत् ॥

pāṇḍustu punarevaināṃ putralobhānmahāyaśāḥ | prādiśaddarśanīyārthī kuntī tvenamathābravīt

किन्तु महायशस्वी पाण्डु ने पुत्रों के लोभ से, एक और दर्शनीय पुत्र की इच्छा से, कुन्ती को फिर (आवाहन के लिए) कहा। तब कुन्ती ने उनसे कहा —

कुन्त्युवाच

श्लोक 64 (1.132.64)

नातश्चतुर्थं प्रसवमापत्स्वपि वदन्त्युत । अतःपरं स्वैरिणी स्याद्बन्धकी पञ्चमे भवेत् ॥

nātaścaturthaṃ prasavamāpatsvapi vadantyuta | ataḥparaṃ svairiṇī syādbandhakī pañcame bhavet

"कहते हैं कि आपत्ति के समय में भी (इस रीति से) चौथी सन्तान का विधान नहीं है। इसके बाद स्त्री स्वैरिणी कहलाती है, और पाँचवीं बार में तो वह बन्धकी (कुलटा) हो जाती है।

श्लोक 65 (1.132.65)

स त्वं विद्वन्धर्ममिममधिगम्य कथं नु माम् । अपत्यार्थं समुत्क्रम्य प्रमादादिव भाषसे ॥

sa tvaṃ vidvandharmamimamadhigamya kathaṃ nu mām | apatyārthaṃ samutkramya pramādādiva bhāṣase

"हे विद्वन्, आप इस धर्म को जानते हैं; फिर सन्तान के लिए इसका उल्लंघन करके मुझसे मानो असावधानी में ऐसा कैसे कह रहे हैं?"

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