आदि पर्व · अध्याय 137
सत्यवती का वनगमन और भीम के प्रति दुर्योधन का द्वेष
पाण्डु का श्राद्ध होता है और पाण्डवों को हस्तिनापुर लाया जाता है। व्यास अपनी माता सत्यवती को चेताते हैं कि कुरुवंश के लिए भयानक समय आने वाला है, और वे अम्बिका तथा अम्बालिका के साथ वन चली जाती हैं, जहाँ तीनों तप करते हुए देह त्याग देती हैं। धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ बड़े होते हुए भीम बचपन के हर खेल में उनसे आगे निकलते हैं और उन्हें खूब पटकते हैं; इससे दुर्योधन उन्हें मिटाने का निश्चय करता है — वह सोते हुए भीम को बाँधकर गंगा में फेंकता है, उन्हें साँपों से डँसवाता है और विष खिलाता है, पर भीम हर बार बच जाते हैं। युयुत्सु से सब जानकर भी पाण्डव विदुर की सलाह पर चुप रहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.137.1)
ततः क्षत्ता च भीष्मश्च व्यासो राजा च बन्धुभिः । ददुः श्राद्धं तदा पाण्डोः स्वधामृतमयं तदा ॥
tataḥ kṣattā ca bhīṣmaśca vyāso rājā ca bandhubhiḥ | daduḥ śrāddhaṃ tadā pāṇḍoḥ svadhāmṛtamayaṃ tadā
तब क्षत्ता विदुर, भीष्म, व्यास और राजा धृतराष्ट्र ने बन्धुओं के साथ पाण्डु का श्राद्ध किया और अमृत के समान स्वधा-अन्न अर्पित किया।
श्लोक 2 (1.137.2)
पुरोहितसहायास्ते यथान्यायमकुर्वत । कुरूंश्च विप्रमुख्यांश्च भोजयित्वा सहस्रशः । रत्नौघान्द्विजमुख्येभ्यो दत्त्वा ग्रामवरांस्तथा ॥
purohitasahāyāste yathānyāyamakurvata | kurūṃśca vipramukhyāṃśca bhojayitvā sahasraśaḥ | ratnaughāndvijamukhyebhyo dattvā grāmavarāṃstathā
पुरोहितों की सहायता से उन्होंने यह कर्म यथाविधि किया। उन्होंने कुरुओं और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को हजारों की संख्या में भोजन कराया और प्रमुख द्विजों को रत्नों के ढेर तथा उत्तम गाँव दान दिए।
श्लोक 3 (1.137.3)
कृतशौचांस्ततस्तांस्तु पाण्डवान्भरतर्षभान् । आदाय विविशुः सर्वे पुरं वारणसाह्वयम् ॥
kṛtaśaucāṃstatastāṃstu pāṇḍavānbharatarṣabhān | ādāya viviśuḥ sarve puraṃ vāraṇasāhvayam
फिर अशौच से शुद्ध हुए भरतश्रेष्ठ पाण्डवों को साथ लेकर सब लोग हस्तिनापुर नगर में प्रवेश कर गए।
श्लोक 4 (1.137.4)
सततं स्मानुशोचन्तस्तमेव भरतर्षभम् । पौरजानपदाः सर्वे मृतं स्वमिव बान्धवम् ॥
satataṃ smānuśocantastameva bharatarṣabham | paurajānapadāḥ sarve mṛtaṃ svamiva bāndhavam
नगर और जनपद के सब लोग उस भरतश्रेष्ठ के लिए निरन्तर ऐसे शोक करते रहे मानो उनका अपना ही कोई बन्धु मर गया हो।
श्लोक 5 (1.137.5)
श्राद्धावसाने तु तदा दृष्ट्वा तं दुःखितं जनम् । संमूढां दुःखशोकार्तां व्यासो मातरमब्रवीत् ॥
śrāddhāvasāne tu tadā dṛṣṭvā taṃ duḥkhitaṃ janam | saṃmūḍhāṃ duḥkhaśokārtāṃ vyāso mātaramabravīt
श्राद्ध समाप्त होने पर लोगों को दुःखी देखकर व्यास ने दुःख और शोक से व्याकुल, किंकर्तव्यविमूढ़ अपनी माता से कहा —
व्यास उवाच
श्लोक 6 (1.137.6)
अतिक्रान्तसुखाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः । श्वःश्वः पापिष्ठदिवसाः पृथिवी गतयौवना ॥
atikrāntasukhāḥ kālāḥ paryupasthitadāruṇāḥ | śvaḥśvaḥ pāpiṣṭhadivasāḥ pṛthivī gatayauvanā
"सुख के दिन बीत गए हैं और भयानक समय सामने आ खड़ा हुआ है। आने वाला हर दिन पिछले दिन से अधिक पापमय होगा; पृथ्वी का यौवन बीत चुका है।
श्लोक 7 (1.137.7)
बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः । लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति ॥
bahumāyāsamākīrṇo nānādoṣasamākulaḥ | luptadharmakriyācāro ghoraḥ kālo bhaviṣyati
छल-कपट से भरा, नाना दोषों से व्याप्त, धर्म-कर्म और आचार से रहित एक भयानक समय आने वाला है।
श्लोक 8 (1.137.8)
कुरूणामनयाच्चापि पृथिवी न भविष्यति । गच्छ त्वं योगमास्थाय युक्ता वस तपोवने ॥
kurūṇāmanayāccāpi pṛthivī na bhaviṣyati | gaccha tvaṃ yogamāsthāya yuktā vasa tapovane
कुरुओं की अनीति से यह पृथ्वी भी नहीं बचेगी। तुम योग का आश्रय लेकर जाओ और एकाग्र मन से तपोवन में निवास करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (1.137.9)
माद्राक्षीस्त्वं कुलस्यास्य घोरं संक्षयमात्मनः । तथेति समनुज्ञाय सा प्रविश्याब्रवीत्स्नुषाम् ॥
mādrākṣīstvaṃ kulasyāsya ghoraṃ saṃkṣayamātmanaḥ | tatheti samanujñāya sā praviśyābravītsnuṣām
"अपने इस कुल का भयानक विनाश तुम मत देखो।" "ऐसा ही हो" कहकर उन्होंने स्वीकार किया और भीतर जाकर अपनी पुत्रवधू से कहा —
सत्यवत्युवाच
श्लोक 10 (1.137.10)
अम्बिके तव पौत्रस्य दुर्नयात्किल भारताः । सानुबन्धा विनङ्क्ष्यन्ति पौराश्चैवेति नः श्रुतम् ॥
ambike tava pautrasya durnayātkila bhāratāḥ | sānubandhā vinaṅkṣyanti paurāścaiveti naḥ śrutam
"अम्बिके, कहा जाता है कि तुम्हारे पौत्र की अनीति से भरतवंशी अपने अनुयायियों सहित नष्ट हो जाएँगे, और नगरवासी भी — ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 11 (1.137.11)
तत्कौसल्यामिमामार्तां पुत्रशोकाभिपीडिताम् । वनमादाय भद्रं ते गच्छावो यदि मन्यसे ॥
tatkausalyāmimāmārtāṃ putraśokābhipīḍitām | vanamādāya bhadraṃ te gacchāvo yadi manyase
इसलिए यदि तुम उचित समझो तो पुत्रशोक से पीड़ित इस दुःखी कौसल्या को साथ लेकर हम वन चलें। तुम्हारा कल्याण हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (1.137.12)
तथेत्युक्ता त्वम्बिकया भीष्ममामन्त्र्य सुव्रता । वनं ययौ सत्यवती स्नुषाभ्यां सह भारत ॥
tathetyuktā tvambikayā bhīṣmamāmantrya suvratā | vanaṃ yayau satyavatī snuṣābhyāṃ saha bhārata
हे भारत, अम्बिका के "ऐसा ही हो" कहने पर उत्तम व्रत वाली सत्यवती भीष्म से अनुमति लेकर अपनी दोनों पुत्रवधुओं के साथ वन चली गईं।
श्लोक 13 (1.137.13)
ताः सुघोरं तपस्तप्त्वा देव्यो भरतसत्तम । देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां ययुस्तदा ॥
tāḥ sughoraṃ tapastaptvā devyo bharatasattama | dehaṃ tyaktvā mahārāja gatimiṣṭāṃ yayustadā
हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ उन देवियों ने अत्यन्त कठोर तप किया और हे महाराज, समय आने पर देह त्यागकर अभीष्ट गति प्राप्त की।
श्लोक 14 (1.137.14)
अथाप्तवन्तो वेदोक्तान्संस्कारान्पाण्डवास्तदा । संव्यवर्धन्त भोगांस्ते भुञ्जानाः पितृवेश्मनि ॥
athāptavanto vedoktānsaṃskārānpāṇḍavāstadā | saṃvyavardhanta bhogāṃste bhuñjānāḥ pitṛveśmani
तब पाण्डवों के वेदोक्त संस्कार हुए और वे पिता के घर में सुख-भोग करते हुए बड़े होने लगे।
श्लोक 15 (1.137.15)
धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः क्रीडन्तो मुदिताः सुखम् । बालक्रीडासु सर्वासु विशिष्टास्तेजसाऽभवन् ॥
dhārtarāṣṭraiśca sahitāḥ krīḍanto muditāḥ sukham | bālakrīḍāsu sarvāsu viśiṣṭāstejasā'bhavan
धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ आनन्दपूर्वक खेलते हुए वे बचपन के सभी खेलों में अपने तेज से उनसे बढ़कर निकलते थे।
श्लोक 16 (1.137.16)
जवे लक्ष्याभिहरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे । धार्तराष्ट्रान्भीमसेनः सर्वान्स परिमर्दति ॥
jave lakṣyābhiharaṇe bhojye pāṃsuvikarṣaṇe | dhārtarāṣṭrānbhīmasenaḥ sarvānsa parimardati
दौड़ में, लक्ष्य भेदने में, भोजन करने में और धूल उछालने में भीमसेन धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को पछाड़ देते थे।
श्लोक 17 (1.137.17)
हर्षात्प्रक्रीडमानांस्तान् गृह्य राजन्निलीयते । शिरःसु विनिगृह्यैतान्योजयामास पाण्डवैः ॥
harṣātprakrīḍamānāṃstān gṛhya rājannilīyate | śiraḥsu vinigṛhyaitānyojayāmāsa pāṇḍavaiḥ
हे राजन्, जब वे प्रसन्न होकर खेलते, तो भीम उन्हें पकड़कर छिप जाते; और उनके सिर पकड़कर उन्हें पाण्डवों से भिड़ा देते।
श्लोक 18 (1.137.18)
शतमेकोत्तरं तेषां कुमाराणां महौजसाम् । एक एव निगृह्णाति नातिकृच्छ्राद्वृकोदरः ॥
śatamekottaraṃ teṣāṃ kumārāṇāṃ mahaujasām | eka eva nigṛhṇāti nātikṛcchrādvṛkodaraḥ
उन एक सौ एक महाबली कुमारों को अकेले वृकोदर बिना विशेष कठिनाई के वश में कर लेते थे।
श्लोक 19 (1.137.19)
कचेषु च निगृह्यैनान्विनिहत्य बलाद्बली । चकर्ष क्रोशतो भूमौ घृष्टजानुशिरोंसकान् ॥
kaceṣu ca nigṛhyainānvinihatya balādbalī | cakarṣa krośato bhūmau ghṛṣṭajānuśiroṃsakān
वे बलवान भीम उनके बाल पकड़कर बलपूर्वक पटक देते और चिल्लाते हुए उन्हें धरती पर घसीटते, जिससे उनके घुटने, सिर और कंधे छिल जाते।
श्लोक 20 (1.137.20)
दश बालाञ्जले क्रीडन्भुजाभ्यां परिगृह्य सः । आस्ते स्म सलिले मग्नो मृतकल्पान्विमुञ्चति ॥
daśa bālāñjale krīḍanbhujābhyāṃ parigṛhya saḥ | āste sma salile magno mṛtakalpānvimuñcati
जल में खेलते समय वे दस बालकों को अपनी भुजाओं में जकड़कर पानी में डूबे रहते और जब वे अधमरे हो जाते, तब उन्हें छोड़ते।
श्लोक 21 (1.137.21)
फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ये तदा । तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते द्रुमान् ॥
phalāni vṛkṣamāruhya vicinvanti ca ye tadā | tadā pādaprahāreṇa bhīmaḥ kampayate drumān
जब वे बालक पेड़ पर चढ़कर फल तोड़ते, तब भीम लात मारकर पेड़ को हिला देते।
श्लोक 22 (1.137.22)
प्रहारवेगाभिहता द्रुमा व्याघूर्णितास्ततः । सफलाः प्रपतन्ति स्म द्रुमात्स्रस्ताः कुमारकाः ॥
prahāravegābhihatā drumā vyāghūrṇitāstataḥ | saphalāḥ prapatanti sma drumātsrastāḥ kumārakāḥ
प्रहार के वेग से आहत होकर पेड़ झूम उठते और वे बालक हिलकर फलों के साथ ही पेड़ से नीचे गिर पड़ते।
श्लोक 23 (1.137.23)
केचिद्भग्नशिरोरस्काः केचिद्भग्नकटीमुखाः । निपेतुर्भ्रातरः सर्वे भीमसेनभुजार्दिताः ॥
kecidbhagnaśiroraskāḥ kecidbhagnakaṭīmukhāḥ | nipeturbhrātaraḥ sarve bhīmasenabhujārditāḥ
भीमसेन की भुजाओं से पीड़ित होकर सब भाई गिर पड़ते — किसी का सिर और छाती टूटती, किसी की कमर और मुँह।
श्लोक 24 (1.137.24)
न ते नियुद्धे न जवे न योग्यासु कदाचन । कुमारा उत्तरं चक्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम् ॥
na te niyuddhe na jave na yogyāsu kadācana | kumārā uttaraṃ cakruḥ spardhamānā vṛkodaram
कुश्ती में, दौड़ में और व्यायाम में वृकोदर से होड़ करने वाले वे कुमार कभी उनसे आगे नहीं निकल पाए।
श्लोक 25 (1.137.25)
एवं स धार्तराष्ट्रांश्च स्पर्धमानो वृकोदरः । अप्रियेऽतिष्ठदत्यन्तं बाल्यान्न द्रोहचेतसा ॥
evaṃ sa dhārtarāṣṭrāṃśca spardhamāno vṛkodaraḥ | apriye'tiṣṭhadatyantaṃ bālyānna drohacetasā
इस प्रकार धृतराष्ट्र के पुत्रों से होड़ करते हुए वृकोदर उनका बहुत अप्रिय करते थे, पर बचपने के कारण, द्वेष-बुद्धि से नहीं।
श्लोक 26 (1.137.26)
ततो बलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् । भीमसेनस्य तज्ज्ञात्वा दुष्टभावमदर्शयत् ॥
tato balamatikhyātaṃ dhārtarāṣṭraḥ pratāpavān | bhīmasenasya tajjñātvā duṣṭabhāvamadarśayat
तब भीमसेन के उस प्रसिद्ध बल को जानकर प्रतापी धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन ने अपना दुष्ट भाव प्रकट किया।
श्लोक 27 (1.137.27)
तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः । मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ॥
tasya dharmādapetasya pāpāni paripaśyataḥ | mohādaiśvaryalobhācca pāpā matirajāyata
धर्म से विमुख और पाप पर दृष्टि रखने वाले उस दुर्योधन के मन में मोह और ऐश्वर्य के लोभ से एक पापपूर्ण विचार उत्पन्न हुआ —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 28 (1.137.28)
अयं बलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । मध्यमः कुन्तिपुत्राणां निकृत्या सन्निगृह्यतां ॥
ayaṃ balavatāṃ śreṣṭhaḥ kuntīputro vṛkodaraḥ | madhyamaḥ kuntiputrāṇāṃ nikṛtyā sannigṛhyatāṃ
"कुन्ती का यह पुत्र वृकोदर, जो कुन्ती के पुत्रों में मँझला है, बलवानों में सबसे श्रेष्ठ है। इसे छल से वश में करना होगा।
श्लोक 29 (1.137.29)
प्राणवान्विक्रमी चैव शौर्येण महताऽन्वितः । स्पर्धते चापि सहितानस्मानेको वृकोदरः ॥
prāṇavānvikramī caiva śauryeṇa mahatā'nvitaḥ | spardhate cāpi sahitānasmāneko vṛkodaraḥ
यह बलवान, पराक्रमी और महान शौर्य से युक्त वृकोदर अकेले ही हम सबसे एक साथ होड़ करता है।
श्लोक 30 (1.137.30)
तं तु सुप्तं पुरोद्याने गङ्गायां प्रक्षिपामहे । अथ तस्मादवरजं श्रेष्ठं चैव युधिष्ठिरम् ॥
taṃ tu suptaṃ purodyāne gaṅgāyāṃ prakṣipāmahe | atha tasmādavarajaṃ śreṣṭhaṃ caiva yudhiṣṭhiram
जब वह नगर के उद्यान में सोया हो, तब हम उसे गंगा में फेंक दें। फिर उसके छोटे भाई को और श्रेष्ठ युधिष्ठिर को
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (1.137.31)
प्रसह्य बन्धने बद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुन्धराम् । एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा । नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः ॥
prasahya bandhane baddhvā praśāsiṣye vasundharām | evaṃ sa niścayaṃ pāpaḥ kṛtvā duryodhanastadā | nityamevāntaraprekṣī bhīmasyāsīnmahātmanaḥ
बलपूर्वक बन्धन में डालकर मैं पृथ्वी पर शासन करूँगा।" ऐसा निश्चय करके पापी दुर्योधन सदा महात्मा भीम के विरुद्ध अवसर की ताक में रहने लगा।
श्लोक 32 (1.137.32)
ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत । चैलकम्बलवेश्मानि विचित्राणि महान्ति च ॥
tato jalavihārārthaṃ kārayāmāsa bhārata | cailakambalaveśmāni vicitrāṇi mahānti ca
हे भारत, तब उसने जल-विहार के लिए वस्त्र और कम्बल के बड़े-बड़े, विचित्र तम्बू लगवाए,
श्लोक 33 (1.137.33)
सर्वकामैः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च । तत्र संजनयामास नानागाराण्यनेकशः ॥
sarvakāmaiḥ supūrṇāni patākocchrāyavanti ca | tatra saṃjanayāmāsa nānāgārāṇyanekaśaḥ
जो सब मनचाही वस्तुओं से भरे थे और जिन पर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं; और वहाँ उसने अनेक प्रकार के बहुत-से घर बनवाए।
श्लोक 34 (1.137.34)
उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत । प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्यह ॥
udakakrīḍanaṃ nāma kārayāmāsa bhārata | pramāṇakoṭyāṃ taṃ deśaṃ sthalaṃ kiṃcidupetyaha
हे भारत, उसने गंगा-तट पर प्रमाणकोटि नामक स्थान में भूमि का एक भाग चुनकर वहाँ "उदकक्रीडन" नाम का जल-क्रीडा-स्थल बनवाया।
श्लोक 35 (1.137.35)
क्रीडावसाने ते सर्वे शुचिवस्त्राः स्वलङ्कृताः । सर्वकामसमृद्धं तदन्नं बुभुजिरे शनैः ॥
krīḍāvasāne te sarve śucivastrāḥ svalaṅkṛtāḥ | sarvakāmasamṛddhaṃ tadannaṃ bubhujire śanaiḥ
खेल समाप्त होने पर सबने स्वच्छ वस्त्र और आभूषण पहने और सब प्रकार के स्वादों से भरपूर भोजन धीरे-धीरे किया।
श्लोक 36 (1.137.36)
दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः । विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन् ॥
divasānte pariśrāntā vihṛtya ca kurūdvahāḥ | vihārāvasatheṣveva vīrā vāsamarocayan
दिन ढलने पर क्रीडा से थके हुए कुरुवंश के वे वीर विहार-भवनों में ही रात बिताना चाहने लगे।
श्लोक 37 (1.137.37)
खिन्नस्तु बलवान्भीमो व्यायामाभ्यधिकस्तदा । वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतान्विभुः ॥
khinnastu balavānbhīmo vyāyāmābhyadhikastadā | vāhayitvā kumārāṃstāñjalakrīḍāgatānvibhuḥ
पर बलवान भीम थक गए थे, क्योंकि उन्होंने औरों से अधिक परिश्रम किया था; उन समर्थ भीम ने जल-क्रीडा में लगे कुमारों को ढोया था,
श्लोक 38 (1.137.38)
प्रमाणकोट्यां वासार्थं सुष्वापारुह्य तत्स्थलम् । शीतं वासं समासाद्य शान्तो मदविमोहितः ॥
pramāṇakoṭyāṃ vāsārthaṃ suṣvāpāruhya tatsthalam | śītaṃ vāsaṃ samāsādya śānto madavimohitaḥ
इसलिए विश्राम के लिए वे प्रमाणकोटि के उस स्थल पर चढ़कर सो गए। ठंडी जगह पाकर, शान्त होकर और मद से अचेत-से होकर
श्लोक 39 (1.137.39)
निश्चेष्टः पाण्डवो राजन्सुष्वाप मृतवत्क्षितौ । ततो बद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः शनैः ॥
niśceṣṭaḥ pāṇḍavo rājansuṣvāpa mṛtavatkṣitau | tato baddhvā latāpāśairbhīmaṃ duryodhanaḥ śanaiḥ
हे राजन्, पाण्डुपुत्र भीम निश्चेष्ट होकर मुर्दे की तरह भूमि पर सो गए। तब दुर्योधन ने चुपके से भीम को लताओं के फंदों से बाँध दिया
श्लोक 40 (1.137.40)
प्रमाणकोट्यां संसुप्तं गङ्गायां प्राक्षिपज्जले । ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्वान्संछिद्य बन्धनान् ॥
pramāṇakoṭyāṃ saṃsuptaṃ gaṅgāyāṃ prākṣipajjale | tataḥ prabuddhaḥ kaunteyaḥ sarvānsaṃchidya bandhanān
और प्रमाणकोटि पर सोए हुए उन्हें गंगा के जल में फेंक दिया। तब कुन्तीपुत्र की नींद खुली, उन्होंने सारे बन्धन तोड़ डाले
श्लोक 41 (1.137.41)
उदतिष्ठद्बलाद्भूयो भीमः प्रहरतां वरः । स विमुक्तो महातेजा नाज्ञासीत्तेन तत्कृतम् ॥
udatiṣṭhadbalādbhūyo bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | sa vimukto mahātejā nājñāsīttena tatkṛtam
और योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम अपने बल से फिर उठ खड़े हुए। मुक्त होकर भी उन महातेजस्वी को यह पता न चला कि यह दुर्योधन का किया हुआ है।
श्लोक 42 (1.137.42)
पुनर्निद्रावशं प्राप्तस्तत्रैव प्रास्वपद्बली । अर्धरात्र्यां व्यतीतायामुत्तस्थुः कुरुपाण्डवाः । दुर्योधनस्तु कौन्तेयं दृष्ट्वा निर्वेदमभ्यगात् ॥
punarnidrāvaśaṃ prāptastatraiva prāsvapadbalī | ardharātryāṃ vyatītāyāmuttasthuḥ kurupāṇḍavāḥ | duryodhanastu kaunteyaṃ dṛṣṭvā nirvedamabhyagāt
वे बलवान फिर नींद के वश होकर वहीं सो गए। आधी रात बीतने पर कौरव और पाण्डव उठे, और कुन्तीपुत्र को देखकर दुर्योधन हताश हो गया।
श्लोक 43 (1.137.43)
सुप्तं चापि पुनः सर्पैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषैः । कुपितैर्दंशयामास सर्वेष्वेवाङ्गसन्धिषु ॥
suptaṃ cāpi punaḥ sarpaistīkṣṇadaṃṣṭrairmahāviṣaiḥ | kupitairdaṃśayāmāsa sarveṣvevāṅgasandhiṣu
फिर सोते हुए भीम को दुर्योधन ने तीखे दाँतों वाले, महाविषैले, क्रोधित साँपों से उनके अंगों के सभी जोड़ों पर डँसवाया।
श्लोक 44 (1.137.44)
दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां मर्मस्वपि तेन निपातिताः । त्वचं न चास्य बिभिदुः सारत्वात्पृथुवक्षसः ॥
daṃṣṭrāśca daṃṣṭriṇāṃ marmasvapi tena nipātitāḥ | tvacaṃ na cāsya bibhiduḥ sāratvātpṛthuvakṣasaḥ
उसने उन विषधरों के दाँत उनके मर्मस्थानों पर भी गड़वाए, पर अपनी कठोरता के कारण उस चौड़ी छाती वाले वीर की त्वचा को वे भेद न सके।
श्लोक 45 (1.137.45)
प्रबुद्धो भीमसेनस्तान्सर्वान्सर्पानपोथयत् । सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् ॥
prabuddho bhīmasenastānsarvānsarpānapothayat | sārathiṃ cāsya dayitamapahastena jaghnivān
जागने पर भीमसेन ने उन सब साँपों को कुचल डाला और उल्टे हाथ के प्रहार से दुर्योधन के प्रिय सारथि को मार डाला।
श्लोक 46 (1.137.46)
तथान्यदिवसे राजन्हन्तुकामोऽत्यमर्षणः । वलनेन सहामन्त्र्य सौबलस्य मते स्थितः ॥
tathānyadivase rājanhantukāmo'tyamarṣaṇaḥ | valanena sahāmantrya saubalasya mate sthitaḥ
हे राजन्, एक और दिन अत्यन्त असहिष्णु दुर्योधन ने उन्हें मारने की इच्छा से वलन के साथ परामर्श किया और सुबलपुत्र शकुनि की सलाह मानकर
श्लोक 47 (1.137.47)
भोजने भीमसेनस्य ततः प्राक्षेपयद्विषम् । कालकूटं विषं तीक्ष्णं संभृतं रोमहर्षणम् ॥
bhojane bhīmasenasya tataḥ prākṣepayadviṣam | kālakūṭaṃ viṣaṃ tīkṣṇaṃ saṃbhṛtaṃ romaharṣaṇam
भीमसेन के भोजन में विष डलवा दिया — कालकूट नामक तीक्ष्ण विष, जो सावधानी से जुटाया गया था और जिससे रोंगटे खड़े हो जाते थे।
श्लोक 48 (1.137.48)
तच्चापि भुक्त्वाऽजरयदविकारो वृकोदरः । विकारं नाभ्यजनयत्सुतीक्ष्णमपि तद्विषम् ॥
taccāpi bhuktvā'jarayadavikāro vṛkodaraḥ | vikāraṃ nābhyajanayatsutīkṣṇamapi tadviṣam
वृकोदर उसे भी खाकर बिना किसी विकार के पचा गए; वह विष अत्यन्त तीक्ष्ण होने पर भी उनमें कोई विकार उत्पन्न न कर सका।
श्लोक 49 (1.137.49)
भीमसंहननो भीमस्तस्मादजरयद्विषम् । ततोऽन्यदिवसे राजन्हन्तुकामो वृकोदरम् ॥
bhīmasaṃhanano bhīmastasmādajarayadviṣam | tato'nyadivase rājanhantukāmo vṛkodaram
इस प्रकार भयंकर शरीर वाले भीम ने वह विष पचा लिया। फिर हे राजन्, एक और दिन वृकोदर को मारने की इच्छा से
श्लोक 50 (1.137.50)
सौबलेन सहायेन धार्तराष्ट्रोऽभ्यचिन्तयत् । चिन्तयन्नालभन्निद्रां दिवारात्रमतन्द्रितः ॥
saubalena sahāyena dhārtarāṣṭro'bhyacintayat | cintayannālabhannidrāṃ divārātramatandritaḥ
धृतराष्ट्र-पुत्र सुबलपुत्र शकुनि की सहायता से उपाय सोचता रहा; सोचते-सोचते उसे दिन-रात नींद न आती और वह कभी चैन से न बैठता।
श्लोक 51 (1.137.51)
एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । अनेकैरप्युपायैस्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ॥
evaṃ duryodhanaḥ karṇaḥ śakuniścāpi saubalaḥ | anekairapyupāyaistāñjighāṃsanti sma pāṇḍavān
इस प्रकार दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि अनेक उपायों से पाण्डवों को मार डालना चाहते थे।
श्लोक 52 (1.137.52)
वैश्यापुत्रस्तदाचष्ट पार्थानां हितकाम्यया । पाण्डवा ह्यपि तत्सर्वं प्रत्यजानन्नरिन्दमाः । उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ॥
vaiśyāputrastadācaṣṭa pārthānāṃ hitakāmyayā | pāṇḍavā hyapi tatsarvaṃ pratyajānannarindamāḥ | udbhāvanamakurvanto vidurasya mate sthitāḥ
वैश्या के पुत्र युयुत्सु ने पाण्डवों के हित की इच्छा से यह सब उन्हें बता दिया। शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डव यह सब जानते थे, फिर भी विदुर के परामर्श पर चलते हुए उन्होंने इसे प्रकट नहीं किया।