आदि पर्व · अध्याय 138
भीम को विष, जल में फेंका जाना और नागों का रस
दुर्योधन और उसके भाई भीम से छुटकारा पाने का षड्यन्त्र रचते हैं। प्रमाणकोटि में गंगा-तट के विहार-उद्यान में दुर्योधन अपने हाथों से भीम को विष मिला भोजन खिलाता है, फिर सोते हुए भीम को लताओं से बाँधकर शूलों से भरे जल में फेंक देता है, पर संयोग से वे शूलों से बच जाते हैं। डूबकर नागलोक पहुँचे भीम को नाग डसते हैं और उनके विष से कालकूट विष नष्ट हो जाता है; भीम जागकर नागों को खदेड़ देते हैं। वासुकि और कुन्ती के पूर्वज आर्यक उनका स्वागत करते हैं, और भीम उस रस के आठ कुण्ड पी जाते हैं जिसके प्रत्येक कुण्ड में हजार नागों का बल है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.138.1)
ततस्ते मन्त्रयामासुर्दुर्योधनपुरोगमाः । प्राणवान्विक्रमी चापि शौर्ये च महति स्थितः ॥
tataste mantrayāmāsurduryodhanapurogamāḥ | prāṇavānvikramī cāpi śaurye ca mahati sthitaḥ
तब दुर्योधन आदि ने आपस में मन्त्रणा की — "वृकोदर बलवान् और पराक्रमी है, और महान शौर्य पर अडिग रहता है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (1.138.2)
स्पर्धते चापि सततमस्मानेव वृकोदरः । तं तु सुप्तं पुरोद्याने जले शूले क्षिपामहे ॥
spardhate cāpi satatamasmāneva vṛkodaraḥ | taṃ tu suptaṃ purodyāne jale śūle kṣipāmahe
वह सदा हमसे ही होड़ करता रहता है। जब वह नगर के उद्यान में सो रहा हो, तब हम उसे जल में शूलों पर फेंक दें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (1.138.3)
ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत । प्रमाणकोट्यामुद्देशे स्थलं किंचिदुपेत्य ह ॥
tato jalavihārārthaṃ kārayāmāsa bhārata | pramāṇakoṭyāmuddeśe sthalaṃ kiṃcidupetya ha
हे भारत! तब उसने प्रमाणकोटि नामक स्थान पर एक भूभाग में जाकर जल-विहार की व्यवस्था करवाई।
श्लोक 4 (1.138.4)
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च । उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि ॥
bhakṣyaṃ bhojyaṃ ca peyaṃ ca coṣyaṃ lehyamathāpi ca | upapāditaṃ naraistatra kuśalaiḥ sūdakarmaṇi
वहाँ पाक-कला में निपुण लोगों ने चबाने और खाने योग्य व्यंजन, पेय, चूसने और चाटने योग्य — सभी प्रकार के पदार्थ तैयार किए।
श्लोक 5 (1.138.5)
न्यवेदयंस्तत्पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा । ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः ॥
nyavedayaṃstatpuruṣā dhārtarāṣṭrāya vai tadā | tato duryodhanastatra pāṇḍavānāha durmatiḥ
उन लोगों ने तब धृतराष्ट्र-पुत्र को इसकी सूचना दी। तब दुर्बुद्धि दुर्योधन ने वहाँ पाण्डवों से कहा —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 6 (1.138.6)
गङ्गां चैवानुयास्याम उद्यानवनशोभिताम् । सहिता भ्रातरः सर्वे जलक्रीडामवाप्नुमः ॥
gaṅgāṃ caivānuyāsyāma udyānavanaśobhitām | sahitā bhrātaraḥ sarve jalakrīḍāmavāpnumaḥ
दुर्योधन ने कहा — "हम उद्यानों और उपवनों से सुशोभित गंगा के तट पर चलें। हम सब भाई साथ मिलकर जल-क्रीड़ा का आनन्द लें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (1.138.7)
एवमस्त्विति तं चापि प्रत्युवाच युधिष्ठिरः । ते रथैर्नगराकारैर्देशजैश्च गजोत्तमैः ॥
evamastviti taṃ cāpi pratyuvāca yudhiṣṭhiraḥ | te rathairnagarākārairdeśajaiśca gajottamaiḥ
युधिष्ठिर ने उसे उत्तर दिया — "ऐसा ही हो।" फिर नगरों जैसे विशाल रथों और अपने देश में उत्पन्न उत्तम हाथियों पर सवार होकर
श्लोक 8 (1.138.8)
निर्ययुर्नगराच्छूराः कौरवाः पाण्डवैः सह । उद्यानवनमासाद्य विसृज्य च महाजनम् ॥
niryayurnagarācchūrāḥ kauravāḥ pāṇḍavaiḥ saha | udyānavanamāsādya visṛjya ca mahājanam
शूरवीर कौरव पाण्डवों के साथ नगर से निकले। उद्यान-वन में पहुँचकर उन्होंने साथ आई भारी भीड़ को लौटा दिया,
श्लोक 9 (1.138.9)
विशन्ति स्म तदा वीराः सिंहा इव गिरेर्गुहाम् । उद्यानमभिपश्यन्तो भ्रातरः सर्व एव ते ॥
viśanti sma tadā vīrāḥ siṃhā iva girerguhām | udyānamabhipaśyanto bhrātaraḥ sarva eva te
और वे वीर उसमें ऐसे प्रविष्ट हुए जैसे सिंह पर्वत की गुफा में प्रवेश करते हैं। सब भाई उस उद्यान को निहारने लगे,
श्लोक 10 (1.138.10)
उपस्थानगृहैः शुभ्रैर्वलभीभिश्च शोभितम् । गवाक्षकैस्तथा जालैर्यन्त्रैः सांचारिकैरपि ॥
upasthānagṛhaiḥ śubhrairvalabhībhiśca śobhitam | gavākṣakaistathā jālairyantraiḥ sāṃcārikairapi
जो उजले सभा-भवनों और छज्जेदार मण्डपों से, गोल झरोखों और जालियों से, तथा इधर-उधर ले जाए जा सकने वाले जल-यन्त्रों से सुशोभित था।
श्लोक 11 (1.138.11)
संमार्जितं सौधकारैश्चित्रकारैश्च चित्रितम् । दीर्घिकाभिश्च पूर्णाभिस्तथा पुष्करिणीषु च ॥
saṃmārjitaṃ saudhakāraiścitrakāraiśca citritam | dīrghikābhiśca pūrṇābhistathā puṣkariṇīṣu ca
चूना करने वालों ने उसे स्वच्छ किया था और चित्रकारों ने उसे चित्रों से सजाया था; उसमें जल से भरी लम्बी नहरें और कमल-सरोवर भी थे।
श्लोक 12 (1.138.12)
जलं तच्छुशुभे च्छन्नं फुल्लैर्जलरुहैस्तथा । उपच्छन्ना वसुमती तथा पुष्पैर्यथर्तुकैः ॥
jalaṃ tacchuśubhe cchannaṃ phullairjalaruhaistathā | upacchannā vasumatī tathā puṣpairyathartukaiḥ
वहाँ का जल खिले हुए कमलों से ढका होकर शोभा पा रहा था, और धरती ऋतु के फूलों से ढकी थी।
श्लोक 13 (1.138.13)
तत्रोपविष्टास्ते सर्वे पाण्डवाः कौरवाश्च ह । उपच्छन्नान्बहून्कामांस्ते भुञ्जन्ति ततस्ततः ॥
tatropaviṣṭāste sarve pāṇḍavāḥ kauravāśca ha | upacchannānbahūnkāmāṃste bhuñjanti tatastataḥ
सब पाण्डव और कौरव वहाँ बैठ गए और सामने रखे अनेक भोगों का एक-एक करके आनन्द लेने लगे।
श्लोक 14 (1.138.14)
अथोद्यानवरे तस्मिंस्तथा क्रीडागताश्च ते । परस्परस्य वक्त्रेषु ददुर्भक्ष्यांस्ततस्ततः ॥
athodyānavare tasmiṃstathā krīḍāgatāśca te | parasparasya vaktreṣu dadurbhakṣyāṃstatastataḥ
फिर उस श्रेष्ठ उद्यान में क्रीड़ा करते हुए वे इधर-उधर एक-दूसरे के मुँह में खाद्य पदार्थ डालने लगे।
श्लोक 15 (1.138.15)
ततो दुर्योधनः पापस्तद्भक्ष्ये कालकूटकम् । विषं प्रक्षेपयामास भीमसेनजिघांसया ॥
tato duryodhanaḥ pāpastadbhakṣye kālakūṭakam | viṣaṃ prakṣepayāmāsa bhīmasenajighāṃsayā
तब पापी दुर्योधन ने भीमसेन को मार डालने की इच्छा से उस भोजन में कालकूट विष मिलवा दिया।
श्लोक 16 (1.138.16)
स्वयमुत्थाय चैवाथ हृदयेन क्षुरोपमः । स वाचाऽमृतकल्पश्च भ्रातृवच्च सुहृद्यथा ॥
svayamutthāya caivātha hṛdayena kṣuropamaḥ | sa vācā'mṛtakalpaśca bhrātṛvacca suhṛdyathā
वह स्वयं उठा — हृदय में छुरे के समान, पर वाणी में अमृत के समान, भाई और मित्र जैसा व्यवहार करता हुआ —
श्लोक 17 (1.138.17)
स्वयं प्रक्षिपते भक्ष्यं बहु भीमस्य पापकृत् । प्रभक्षितं च भीमेन तं वै दोषमजानता ॥
svayaṃ prakṣipate bhakṣyaṃ bahu bhīmasya pāpakṛt | prabhakṣitaṃ ca bhīmena taṃ vai doṣamajānatā
और उस पापी ने स्वयं भीम को बहुत-सा भोजन खिलाया; भीम ने उसका दोष न जानते हुए वह सब खा लिया।
श्लोक 18 (1.138.18)
ततो दुर्योधनस्तत्र हृदयेन हसन्निव । कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते पुरुषाधमः ॥
tato duryodhanastatra hṛdayena hasanniva | kṛtakṛtyamivātmānaṃ manyate puruṣādhamaḥ
तब नराधम दुर्योधन मन ही मन हँसता हुआ-सा स्वयं को कृतार्थ मानने लगा।
श्लोक 19 (1.138.19)
ततस्ते सहिताः सर्वे जलक्रीडामकुर्वत । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च तदा मुदितमानसाः ॥
tataste sahitāḥ sarve jalakrīḍāmakurvata | pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca tadā muditamānasāḥ
तब पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र सब मिलकर प्रसन्न मन से जल-क्रीड़ा करने लगे।
श्लोक 20 (1.138.20)
विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन् । भीमस्तु बलवान्भुक्त्वा व्यायामाभ्यधिकं जले ॥
vihārāvasatheṣveva vīrā vāsamarocayan | bhīmastu balavānbhuktvā vyāyāmābhyadhikaṃ jale
वीरों ने विहार-भवनों में ही रात बिताना चाहा। पर बलवान् भीम, भोजन करके और जल में औरों से अधिक परिश्रम करके,
श्लोक 21 (1.138.21)
वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतांस्तदा । प्रमाणकोट्यां वासार्थी सुष्वापावाप्य तत्स्थलम् ॥
vāhayitvā kumārāṃstāñjalakrīḍāgatāṃstadā | pramāṇakoṭyāṃ vāsārthī suṣvāpāvāpya tatsthalam
और जल-क्रीड़ा में लगे राजकुमारों को अपनी पीठ पर ढोकर, विश्राम का स्थान चाहते हुए, प्रमाणकोटि में उस भूभाग पर पहुँचकर सो गए।
श्लोक 22 (1.138.22)
शीतं वातं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः । विषेण च परीताङ्गो निश्चेष्टः पाण्डुनन्दनः ॥
śītaṃ vātaṃ samāsādya śrānto madavimohitaḥ | viṣeṇa ca parītāṅgo niśceṣṭaḥ pāṇḍunandanaḥ
शीतल वायु पाकर, थके हुए और मद से अचेत-से पाण्डुनन्दन विष से व्याप्त अंगों के साथ निश्चेष्ट पड़े रहे।
श्लोक 23 (1.138.23)
ततो बद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः स्वयम् । शूलान्यप्सु निखायाशु प्रादेशाभ्यन्तराणि च ॥
tato baddhvā latāpāśairbhīmaṃ duryodhanaḥ svayam | śūlānyapsu nikhāyāśu prādeśābhyantarāṇi ca
तब दुर्योधन ने स्वयं भीम को लताओं के पाशों से बाँधा। फिर जल में शीघ्रता से एक-एक बित्ते की दूरी पर शूल गाड़कर
श्लोक 24 (1.138.24)
लतापाशैर्दृढं बद्धं स्थलाज्जलमपातयत् । सशेषत्वान्न संप्राप्तो जले शूलिनि पाण्डवः ॥
latāpāśairdṛḍhaṃ baddhaṃ sthalājjalamapātayat | saśeṣatvānna saṃprāpto jale śūlini pāṇḍavaḥ
उसने लता-पाशों से कसकर बँधे उन्हें तट से जल में गिरा दिया। पर आयु शेष रहने के कारण पाण्डुपुत्र जल में गड़े शूलों पर नहीं गिरे —
श्लोक 25 (1.138.25)
पपात यत्र तत्रास्य शूलं नासीद्यदृच्छया । स निःसंज्ञो जलस्यान्तमवाग्वै पाण्डवोऽविशत् । आक्रामन्नागभवने तदा नागकुमारकान् ॥
papāta yatra tatrāsya śūlaṃ nāsīdyadṛcchayā | sa niḥsaṃjño jalasyāntamavāgvai pāṇḍavo'viśat | ākrāmannāgabhavane tadā nāgakumārakān
जहाँ वे गिरे, संयोग से वहाँ कोई शूल नहीं था। अचेत पाण्डुपुत्र नीचे जल की तली तक डूब गए और नाग-शिशुओं को दबाते हुए नागों के भवन में जा पहुँचे।
श्लोक 26 (1.138.26)
ततः समेत्य बहुभिस्तदा नागैर्महाविषैः । अदश्यत भृशं भीमो महादंष्ट्रैर्विषोल्बणैः ॥
tataḥ sametya bahubhistadā nāgairmahāviṣaiḥ | adaśyata bhṛśaṃ bhīmo mahādaṃṣṭrairviṣolbaṇaiḥ
तब महाविषैले अनेक नाग एकत्र होकर अपने विष से भयंकर बड़े-बड़े दाँतों से भीम को बुरी तरह डसने लगे।
श्लोक 27 (1.138.27)
ततोऽस्य दश्यमानस्य तद्विषं कालकूटकम् । हतं सर्पविषेणैव स्थावरं जङ्गमेन तु ॥
tato'sya daśyamānasya tadviṣaṃ kālakūṭakam | hataṃ sarpaviṣeṇaiva sthāvaraṃ jaṅgamena tu
डसे जाते हुए उनके शरीर का वह कालकूट विष सर्पों के विष से ही नष्ट हो गया — स्थावर विष जंगम विष से मारा गया।
श्लोक 28 (1.138.28)
दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां तेषां मर्मस्वपि निपातिताः । त्वचं नैवास्य बिभिदुः सारत्वात्पृथुवक्षसः ॥
daṃṣṭrāśca daṃṣṭriṇāṃ teṣāṃ marmasvapi nipātitāḥ | tvacaṃ naivāsya bibhiduḥ sāratvātpṛthuvakṣasaḥ
उन विषधरों के दाँत मर्मस्थलों पर गड़ाए जाने पर भी उनकी त्वचा को भेद न सके, क्योंकि वह चौड़ी छाती वाला वीर अत्यन्त कठोर था।
श्लोक 29 (1.138.29)
ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्वं संछिद्य बन्धनम् । पोथयामास तान्सर्पान्केचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः ॥
tataḥ prabuddhaḥ kaunteyaḥ sarvaṃ saṃchidya bandhanam | pothayāmāsa tānsarpānkecidbhītāḥ pradudruvuḥ
तब कुन्तीपुत्र जाग उठे, उन्होंने सारे बन्धन काट डाले और उन सर्पों को कुचलने लगे; कुछ डरकर भाग गए।
श्लोक 30 (1.138.30)
हतावशेषा भीमेन सर्वे वासुकिमभ्ययुः । ऊचुश्च सर्पराजानं वासुकिं वासवोपमम् ॥
hatāvaśeṣā bhīmena sarve vāsukimabhyayuḥ | ūcuśca sarparājānaṃ vāsukiṃ vāsavopamam
भीम से मरने से बचे सब नाग वासुकि के पास गए और इन्द्र के समान नागराज वासुकि से बोले —
नागा ऊचुः
श्लोक 31 (1.138.31)
अयं नरो वै नागेन्द्र ह्यप्सु बद्ध्वा प्रवेशितः । यथा च नो मतिर्वीर विषपीतो भविष्यति ॥
ayaṃ naro vai nāgendra hyapsu baddhvā praveśitaḥ | yathā ca no matirvīra viṣapīto bhaviṣyati
नागों ने कहा — "हे नागराज! इस मनुष्य को बाँधकर जल में डाला गया है। हे वीर, हमारा अनुमान है कि इसने विष पिया होगा।
श्लोक 32 (1.138.32)
निश्चेष्टोऽस्माननुप्राप्तः स च दष्टोऽन्वबुध्यत । ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्त्वा बन्धनमाशु नः ॥
niśceṣṭo'smānanuprāptaḥ sa ca daṣṭo'nvabudhyata | sasaṃjñaścāpi saṃvṛttaśchittvā bandhanamāśu naḥ
वह निश्चेष्ट अवस्था में हमारे पास आ पहुँचा, पर डसे जाने पर जाग उठा। वह होश में आ गया है और अपने बन्धन शीघ्र काटकर
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (1.138.33)
पोथयन्तं महाबाहुं त्वं वै तं ज्ञातुमर्हसि । ततो वासुकिरभ्येत्य नागैरनुगतस्तदा ॥
pothayantaṃ mahābāhuṃ tvaṃ vai taṃ jñātumarhasi | tato vāsukirabhyetya nāgairanugatastadā
हमें कुचल रहा है। आप उस महाबाहु का पता लगाइए।" तब नागों के साथ वासुकि वहाँ आए
श्लोक 34 (1.138.34)
पश्यति स्म महाबाहुं भीमं भीमपराक्रमम् । आर्यकेण च दृष्टः स पृथाया आर्यकेण च ॥
paśyati sma mahābāhuṃ bhīmaṃ bhīmaparākramam | āryakeṇa ca dṛṣṭaḥ sa pṛthāyā āryakeṇa ca
और उन्होंने भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीम को देखा। आर्यक ने भी उन्हें देखा — पृथा के नाना आर्यक ने।
श्लोक 35 (1.138.35)
तदा दौहित्रदौहित्रः परिष्वक्तः सुपीडितम् । सुप्रीतश्चाभवत्तस्य वासुकिः स महायशाः ॥
tadā dauhitradauhitraḥ pariṣvaktaḥ supīḍitam | suprītaścābhavattasya vāsukiḥ sa mahāyaśāḥ
तब आर्यक ने अपने दौहित्र के दौहित्र को कसकर गले से लगा लिया; और महायशस्वी वासुकि भी उन पर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 36 (1.138.36)
अब्रवीत्तं च नागेन्द्रः किमस्य क्रियतां प्रियम् । धनौघो रत्ननिचयो वसु चास्य प्रदीयताम् ॥
abravīttaṃ ca nāgendraḥ kimasya kriyatāṃ priyam | dhanaugho ratnanicayo vasu cāsya pradīyatām
नागराज ने उससे कहा — "इसका कौन-सा प्रिय कार्य किया जाए? इसे धन की राशि, रत्नों के ढेर और सम्पत्ति दी जाए।"
श्लोक 37 (1.138.37)
एवमुक्तस्तदा नागो वासुकिं प्रत्यभाषत । यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयैः ॥
evamuktastadā nāgo vāsukiṃ pratyabhāṣata | yadi nāgendra tuṣṭo'si kimasya dhanasaṃcayaiḥ
ऐसा कहे जाने पर उस नाग ने वासुकि को उत्तर दिया — "हे नागराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो इसे धन-संचय से क्या प्रयोजन?
आर्यक उवाच
श्लोक 38 (1.138.38)
रसं पिबेत्कुमारोऽयं त्वयि प्रीते महाबलः । बलं नागसहस्रस्य यस्मिन्कुण्डे प्रतिष्ठितम् ॥
rasaṃ pibetkumāro'yaṃ tvayi prīte mahābalaḥ | balaṃ nāgasahasrasya yasminkuṇḍe pratiṣṭhitam
आपकी प्रसन्नता से यह महाबली बालक वह रस पिए, जिस कुण्ड में एक हजार नागों का बल प्रतिष्ठित है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (1.138.39)
यावत्पिबति बालोऽयं तावदस्मै प्रदीयताम् । एवमस्त्विति तं नागं वासुकिः प्रत्यभाषत ॥
yāvatpibati bālo'yaṃ tāvadasmai pradīyatām | evamastviti taṃ nāgaṃ vāsukiḥ pratyabhāṣata
जितना यह बालक पी सके, उतना इसे दिया जाए।" वासुकि ने उस नाग को उत्तर दिया — "ऐसा ही हो।"
श्लोक 40 (1.138.40)
ततो भीमस्तदा नागैः कृतस्वस्त्ययनः शुचिः । प्राङ्मुखश्चोपविष्टश्च रसं पिबति पाण्डवः ॥
tato bhīmastadā nāgaiḥ kṛtasvastyayanaḥ śuciḥ | prāṅmukhaścopaviṣṭaśca rasaṃ pibati pāṇḍavaḥ
तब नागों द्वारा स्वस्तिवाचन किए जाने पर पवित्र होकर पाण्डुपुत्र भीम पूर्व की ओर मुख करके बैठे और रस पीने लगे।
श्लोक 41 (1.138.41)
एकोच्छ्वासात्ततः कुण्डं पिबति स्म महाबलः । एवमष्टौ स कुण्डानि ह्यपिबत्पाण्डुनन्दनः ॥
ekocchvāsāttataḥ kuṇḍaṃ pibati sma mahābalaḥ | evamaṣṭau sa kuṇḍāni hyapibatpāṇḍunandanaḥ
उस महाबली ने एक ही साँस में पूरा कुण्ड पी लिया; इस प्रकार पाण्डुनन्दन ने आठ कुण्ड पी डाले।
श्लोक 42 (1.138.42)
ततस्तु शयने दिव्ये नागदत्ते महाभुजः । अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमरिंदमः ॥
tatastu śayane divye nāgadatte mahābhujaḥ | aśeta bhīmasenastu yathāsukhamariṃdamaḥ
तब शत्रुओं का दमन करने वाले महाबाहु भीमसेन नागों की दी हुई दिव्य शय्या पर सुखपूर्वक सो गए।