आदि पर्व · अध्याय 139
नागलोक से भीम का लौटना
दुर्योधन यह कहता हुआ नगर लौट आता है कि भीम आगे चला गया है। युधिष्ठिर और उनके भाई भीम को व्यर्थ खोजते हैं, और कुन्ती विदुर से अपनी आशंका कहती हैं कि दुर्योधन ने उसे मार डाला है; विदुर उन्हें अपने शेष पुत्रों की रक्षा के लिए चुप रहने को कहते हैं और मुनि का वचन याद दिलाते हैं कि उनके पुत्र दीर्घायु हैं। आठवें दिन नागलोक में भीम दस हजार नागों के बल के साथ जागते हैं, सत्कार पाकर घर भेजे जाते हैं और भाइयों को सब कुछ बताते हैं; युधिष्ठिर उन्हें यह बात गुप्त रखने को कहते हैं, और विदुर के परामर्श से भाई सतर्क रहते हैं। अध्याय के अन्त में राजा राजकुमारों को धनुर्वेद सीखने के लिए सरकण्डों के झुरमुट में जन्मे कृप को सौंपते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.139.1)
दुर्योधनस्तु पापात्मा भीममाशीविषह्रदे । प्रक्षिप्य कृतकृत्यं स्वमात्मानं मन्यते तदा ॥
duryodhanastu pāpātmā bhīmamāśīviṣahrade | prakṣipya kṛtakṛtyaṃ svamātmānaṃ manyate tadā
पापात्मा दुर्योधन भीम को विषधर सर्पों के कुण्ड में फेंककर स्वयं को कृतार्थ मानने लगा।
श्लोक 2 (1.139.2)
प्रभातायां रजन्यां च प्रविवेश पुरं ततः । ब्रुवाणो भीमसेनस्तु यातो ह्यग्रत एव नः ॥
prabhātāyāṃ rajanyāṃ ca praviveśa puraṃ tataḥ | bruvāṇo bhīmasenastu yāto hyagrata eva naḥ
रात बीतकर सवेरा होने पर वह यह कहता हुआ नगर में आ गया कि "भीमसेन तो हमसे आगे ही चला गया है।"
श्लोक 3 (1.139.3)
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा ह्यविदन्पापमात्मनि । स्वेनानुमानेन परं साधुं समनुपश्यति ॥
yudhiṣṭhirastu dharmātmā hyavidanpāpamātmani | svenānumānena paraṃ sādhuṃ samanupaśyati
पर धर्मात्मा युधिष्ठिर, अपने भीतर कोई पाप न जानने के कारण, अपने ही अनुमान से दूसरों को भी साधु ही समझते थे।
श्लोक 4 (1.139.4)
सोऽभ्युपेत्य तदा पार्थो मातरं भ्रातृवत्सलः । अभिवाद्याब्रवीत्कुन्तीमम्ब भीम इहागतः ॥
so'bhyupetya tadā pārtho mātaraṃ bhrātṛvatsalaḥ | abhivādyābravītkuntīmamba bhīma ihāgataḥ
तब भाइयों से प्रेम करने वाले पृथापुत्र ने माता के पास जाकर कुन्ती को प्रणाम किया और कहा — "माँ, क्या भीम यहाँ आया है?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (1.139.5)
क्व गतो भविता मातर्नेह पश्यामि तं शुभे । उद्यानानि वनं चैव विचितानि समन्ततः ॥
kva gato bhavitā mātarneha paśyāmi taṃ śubhe | udyānāni vanaṃ caiva vicitāni samantataḥ
हे माता, वह कहाँ गया होगा? हे शुभे, मैं उसे यहाँ नहीं देखता। हमने उद्यानों और वन को चारों ओर छान डाला,
श्लोक 6 (1.139.6)
तदर्थं न च तं वीरं दृष्टवन्तो वृकोदरम् । मन्यमानास्ततः सर्वे यातो नः पूर्वमेव सः ॥
tadarthaṃ na ca taṃ vīraṃ dṛṣṭavanto vṛkodaram | manyamānāstataḥ sarve yāto naḥ pūrvameva saḥ
उसके लिए, पर वीर वृकोदर को नहीं देख पाए। तब हम सबने यह मान लिया कि वह हमसे पहले ही चला गया है,
श्लोक 7 (1.139.7)
आगताः स्म महाभागे व्याकुलेनान्तरात्मना । इहागम्य क्व नु गतस्त्वया वा प्रेषितः क्व नु ॥
āgatāḥ sma mahābhāge vyākulenāntarātmanā | ihāgamya kva nu gatastvayā vā preṣitaḥ kva nu
और हे महाभागे, हम व्याकुल मन से यहाँ आ गए। यहाँ आकर वह कहाँ चला गया? या आपने उसे कहीं भेजा है?
श्लोक 8 (1.139.8)
कथयस्व महाबाहुं भीमसेनं यशस्विनि । नहि मे शुध्यते भावस्तं वीरं प्रति शोभने ॥
kathayasva mahābāhuṃ bhīmasenaṃ yaśasvini | nahi me śudhyate bhāvastaṃ vīraṃ prati śobhane
हे यशस्विनी, महाबाहु भीमसेन के विषय में मुझे बताइए। हे शोभने, उस वीर के बारे में मेरा मन आश्वस्त नहीं हो रहा,
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (1.139.9)
यतः प्रसुप्तं मन्येऽहं भीमं नेति हतस्तु सः । इत्युक्ता च ततः कुन्ती धर्मराजेन धीमता ॥
yataḥ prasuptaṃ manye'haṃ bhīmaṃ neti hatastu saḥ | ityuktā ca tataḥ kuntī dharmarājena dhīmatā
क्योंकि मुझे लगता है कि सोते हुए भीम को मार डाला गया है।" बुद्धिमान धर्मराज के ऐसा कहने पर कुन्ती
श्लोक 10 (1.139.10)
हाहेति कृत्वा संभ्रान्ता प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् । न पुत्र भीमं पश्यामि न मामभ्येत्यसाविति ॥
hāheti kṛtvā saṃbhrāntā pratyuvāca yudhiṣṭhiram | na putra bhīmaṃ paśyāmi na māmabhyetyasāviti
घबराकर "हाय, हाय!" कह उठीं और युधिष्ठिर को उत्तर दिया — "बेटा, मैंने भीम को नहीं देखा; वह मेरे पास नहीं आया।
श्लोक 11 (1.139.11)
शीघ्रमन्वेषणे यत्नं कुरु तस्यानुजैः सह । द्रुतं गत्वा पुरोद्यानं विचिन्वन्ति स्म पाण्डवाः ॥
śīghramanveṣaṇe yatnaṃ kuru tasyānujaiḥ saha | drutaṃ gatvā purodyānaṃ vicinvanti sma pāṇḍavāḥ
अपने छोटे भाइयों के साथ शीघ्र उसे खोजने का प्रयत्न करो।" पाण्डव तुरन्त नगर के उद्यान में जाकर खोजने लगे।
श्लोक 12 (1.139.12)
भीमभीमेति ते वाचा पाण्डवाः समुदैरयन् । विचिन्वन्तोऽथ ते सर्वे न स्म पश्यन्ति भ्रातरम् ॥
bhīmabhīmeti te vācā pāṇḍavāḥ samudairayan | vicinvanto'tha te sarve na sma paśyanti bhrātaram
वे "भीम! भीम!" पुकारते रहे, पर सब ओर खोजकर भी पाण्डव अपने भाई को न देख सके।
श्लोक 13 (1.139.13)
आगताः स्वगृहं भूय इदमूचुः पृथां तदा । न दृश्यते महाबाहुरम्ब भीमो वने चितः ॥
āgatāḥ svagṛhaṃ bhūya idamūcuḥ pṛthāṃ tadā | na dṛśyate mahābāhuramba bhīmo vane citaḥ
फिर घर लौटकर उन्होंने पृथा से कहा — "माँ, महाबाहु भीम कहीं दिखाई नहीं देता, यद्यपि हमने वन में खोजा है,
श्लोक 14 (1.139.14)
विचितानि च सर्वाणि ह्युद्यानानि नदीस्तथा । ततो विदुरमानाय्य कुन्ती सा स्वं निवेशनम् ॥
vicitāni ca sarvāṇi hyudyānāni nadīstathā | tato viduramānāyya kuntī sā svaṃ niveśanam
और सारे उद्यान तथा नदियाँ भी छान डाली हैं।" तब कुन्ती ने विदुर को अपने भवन में बुलवाया
श्लोक 15 (1.139.15)
उवाच बलवान्क्षत्तर्भीमसेनो न दृश्यते ॥
uvāca balavānkṣattarbhīmaseno na dṛśyate
और कहा — "हे क्षत्ता, बलवान् भीमसेन दिखाई नहीं दे रहा।
कुन्त्युवाच
श्लोक 16 (1.139.16)
उद्यानान्निर्गताः सर्वे भ्रातरो भ्रातृभिः सह । तत्रैकस्तु महाबाहुर्भीमो नाभ्येति मामिह ॥
udyānānnirgatāḥ sarve bhrātaro bhrātṛbhiḥ saha | tatraikastu mahābāhurbhīmo nābhyeti māmiha
सब भाई साथ-साथ उद्यान से निकल आए, पर उनमें अकेला महाबाहु भीम ही यहाँ मेरे पास नहीं लौटा।
श्लोक 17 (1.139.17)
न च प्रीणयते चक्षुः सदा दुर्योधनस्य सः । क्रूरोऽसौ दुर्मतिः क्षुद्रो राज्यलुब्धोऽनपत्रपः ॥
na ca prīṇayate cakṣuḥ sadā duryodhanasya saḥ | krūro'sau durmatiḥ kṣudro rājyalubdho'napatrapaḥ
वह दुर्योधन की आँखों को कभी नहीं सुहाया। वह क्रूर, दुर्बुद्धि, नीच, राज्य का लोभी और निर्लज्ज है।
श्लोक 18 (1.139.18)
निहन्यादपि तं वीरं जातमन्युः सुयोधनः । तेन मे व्याकुलं चित्तं हृदयं दह्यतीव च ॥
nihanyādapi taṃ vīraṃ jātamanyuḥ suyodhanaḥ | tena me vyākulaṃ cittaṃ hṛdayaṃ dahyatīva ca
क्रोध में भरा सुयोधन उस वीर को मार भी सकता है। इसी से मेरा मन व्याकुल है और हृदय जलता-सा है।"
विदुर उवाच
श्लोक 19 (1.139.19)
मैवं वदस्व कल्याणि शेषसंरक्षणं कुरु । प्रत्यादिष्टो हि दुष्टात्मा शेषेऽपि प्रहरेत्तव ॥
maivaṃ vadasva kalyāṇi śeṣasaṃrakṣaṇaṃ kuru | pratyādiṣṭo hi duṣṭātmā śeṣe'pi praharettava
विदुर ने कहा — "हे कल्याणी, ऐसा मत कहो; जो शेष हैं उनकी रक्षा करो। यदि उस दुष्टात्मा पर दोष लगाया गया, तो वह तुम्हारे शेष पुत्रों पर भी प्रहार कर सकता है।
श्लोक 20 (1.139.20)
दीर्घायुषस्तव सुता यथोवाच महामुनिः । आगमिष्यति ते पुत्रः प्रीतिं चोत्पादयिष्यति ॥
dīrghāyuṣastava sutā yathovāca mahāmuniḥ | āgamiṣyati te putraḥ prītiṃ cotpādayiṣyati
जैसा महामुनि ने कहा था, तुम्हारे पुत्र दीर्घायु हैं। तुम्हारा पुत्र लौट आएगा और तुम्हें आनन्द देगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (1.139.21)
एवमुक्त्वा ययौ विद्वान्विदुरः स्वं निवेशनम् । कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैर्गृहे ॥
evamuktvā yayau vidvānviduraḥ svaṃ niveśanam | kuntī cintāparā bhūtvā sahāsīnā sutairgṛhe
यह कहकर विद्वान् विदुर अपने घर चले गए, और कुन्ती चिन्ता में डूबी अपने पुत्रों के साथ घर में बैठी रहीं।
श्लोक 22 (1.139.22)
ततोऽष्टमे तु दिवसे प्रत्यबुध्यत पाण्डवः । तस्मिंस्तदा रसे जीर्णे सोऽप्रमेयबलो बली ॥
tato'ṣṭame tu divase pratyabudhyata pāṇḍavaḥ | tasmiṃstadā rase jīrṇe so'prameyabalo balī
फिर आठवें दिन, जब वह रस पच गया, तब अपार बल वाले वे बलवान् पाण्डुपुत्र जाग उठे।
श्लोक 23 (1.139.23)
तं दृष्ट्वा प्रतिबुध्यन्तं पाण्डवं ते भुजङ्गमाः । सान्त्वयामासुरव्यग्रा वचनं चेदमब्रुवन् ॥
taṃ dṛṣṭvā pratibudhyantaṃ pāṇḍavaṃ te bhujaṅgamāḥ | sāntvayāmāsuravyagrā vacanaṃ cedamabruvan
पाण्डुपुत्र को जागते देखकर उन सर्पों ने शान्त भाव से उन्हें सान्त्वना दी और यह वचन कहा —
नागा ऊचुः
श्लोक 24 (1.139.24)
यत्ते पीतो महाबाहो रसोऽयं वीर्यसंभृतः । तस्मान्नागायुतबलो रणेऽधृष्यो भविष्यसि ॥
yatte pīto mahābāho raso'yaṃ vīryasaṃbhṛtaḥ | tasmānnāgāyutabalo raṇe'dhṛṣyo bhaviṣyasi
नागों ने कहा — "हे महाबाहु, तुमने जो यह वीर्य से भरा रस पिया है, उससे तुम दस हजार नागों के बल वाले और युद्ध में अजेय हो जाओगे।
श्लोक 25 (1.139.25)
गच्छाद्य त्वं च स्वगृहं स्नातो दिव्यैरिमैर्जलैः । भ्रातरस्तेऽनुतप्यन्ति त्वां विना कुरुपुङ्गव ॥
gacchādya tvaṃ ca svagṛhaṃ snāto divyairimairjalaiḥ | bhrātaraste'nutapyanti tvāṃ vinā kurupuṅgava
आज इन दिव्य जलों में स्नान करके अपने घर जाओ। हे कुरुश्रेष्ठ, तुम्हारे बिना तुम्हारे भाई दुःखी हो रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (1.139.26)
ततः स्नातो महाबाहुः शुचिशुक्लाम्बरस्रजः । ततो नागस्य भवने कृतकौतुकमङ्गलः ॥
tataḥ snāto mahābāhuḥ śuciśuklāmbarasrajaḥ | tato nāgasya bhavane kṛtakautukamaṅgalaḥ
तब महाबाहु ने स्नान किया और पवित्र होकर, श्वेत वस्त्र और मालाएँ धारण कर, नागराज के भवन में मंगल-कृत्य सम्पन्न कराए।
श्लोक 27 (1.139.27)
ओषधीभिर्विषघ्नीभिः सुरभीभिर्विशेषतः । भुक्तवान्परमान्नं च नागैर्दत्तं महाबलः ॥
oṣadhībhirviṣaghnībhiḥ surabhībhirviśeṣataḥ | bhuktavānparamānnaṃ ca nāgairdattaṃ mahābalaḥ
उन महाबली ने नागों का दिया हुआ उत्तम अन्न खाया, जो विषनाशक और विशेष रूप से सुगन्धित ओषधियों से बना था।
श्लोक 28 (1.139.28)
पूजितो भुजगैर्वीर आशीर्भिश्चाभिनन्दितः । दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्त्र्य पाण्डवः ॥
pūjito bhujagairvīra āśīrbhiścābhinanditaḥ | divyābharaṇasaṃchanno nāgānāmantrya pāṇḍavaḥ
सर्पों द्वारा सम्मानित, आशीर्वादों से अभिनन्दित और दिव्य आभूषणों से अलंकृत पाण्डुपुत्र ने नागों से विदा ली
श्लोक 29 (1.139.29)
उदतिष्ठत्प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिन्दमः । उत्क्षिप्य च तदा नागैर्जलाज्जलरुहेक्षणः ॥
udatiṣṭhatprahṛṣṭātmā nāgalokādarindamaḥ | utkṣipya ca tadā nāgairjalājjalaruhekṣaṇaḥ
और वे शत्रुदमन प्रसन्न मन से नागलोक से ऊपर उठे। नागों ने उन कमलनयन को जल से बाहर निकालकर
श्लोक 30 (1.139.30)
तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापितः कुरुनन्दनः । ते चान्तर्दधिरे नागाः पाण्डवस्यैव पश्यतः ॥
tasminneva vanoddeśe sthāpitaḥ kurunandanaḥ | te cāntardadhire nāgāḥ pāṇḍavasyaiva paśyataḥ
कुरुनन्दन को उसी वन-प्रदेश में रख दिया; और वे नाग पाण्डुपुत्र के देखते-देखते अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 31 (1.139.31)
तत उत्थाय कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । आजगाम महाबाहुर्मातुरन्तिकमञ्जसा ॥
tata utthāya kaunteyo bhīmaseno mahābalaḥ | ājagāma mahābāhurmāturantikamañjasā
तब कुन्तीपुत्र महाबली भीमसेन उठे और वे महाबाहु सीधे अपनी माता के पास आ पहुँचे।
श्लोक 32 (1.139.32)
ततोऽभिवाद्य जननीं ज्येष्ठं भ्रातरमेव च । कनीयसः समाघ्राय शिरस्स्वरिविमर्दनः ॥
tato'bhivādya jananīṃ jyeṣṭhaṃ bhrātarameva ca | kanīyasaḥ samāghrāya śirassvarivimardanaḥ
तब माता और बड़े भाई को प्रणाम करके तथा छोटे भाइयों का सिर सूँघकर, शत्रुओं का मर्दन करने वाले भीम
श्लोक 33 (1.139.33)
तैश्चापि संपरिष्वक्तः सह मात्रा नरर्षभैः । अन्योन्यगतसौहार्दाद्दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन् ॥
taiścāpi saṃpariṣvaktaḥ saha mātrā nararṣabhaiḥ | anyonyagatasauhārdāddiṣṭyā diṣṭyeti cābruvan
उन नरश्रेष्ठ भाइयों और माता के आलिंगन में बँध गए, और परस्पर स्नेह से सब कहने लगे — "सौभाग्य है! सौभाग्य है!"
श्लोक 34 (1.139.34)
ततस्तत्सर्वमाचष्ट दुर्योधनविचेष्टितम् । भ्रातॄणां भीमसेनश्च महाबलपराक्रमः ॥
tatastatsarvamācaṣṭa duryodhanaviceṣṭitam | bhrātṝṇāṃ bhīmasenaśca mahābalaparākramaḥ
तब महान बल और पराक्रम वाले भीमसेन ने अपने भाइयों को दुर्योधन की सारी करतूत कह सुनाई,
श्लोक 35 (1.139.35)
नागलोके च यद्वृत्तं गुणदोषमशेषतः । तच्च सर्वमशेषेण कथयामास पाण्डवः ॥
nāgaloke ca yadvṛttaṃ guṇadoṣamaśeṣataḥ | tacca sarvamaśeṣeṇa kathayāmāsa pāṇḍavaḥ
और नागलोक में जो कुछ भला-बुरा घटा था, वह सब भी पाण्डुपुत्र ने पूरा-पूरा कह सुनाया।
श्लोक 36 (1.139.36)
ततो युधिष्ठिरो राजा भीममाह वचोऽर्थवत् । तूष्णीं भव न ते जल्प्यमिदं कार्यं कथंचन ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā bhīmamāha vaco'rthavat | tūṣṇīṃ bhava na te jalpyamidaṃ kāryaṃ kathaṃcana
तब राजा युधिष्ठिर ने भीम से सार्थक वचन कहा — "चुप रहो; यह बात तुम्हें किसी भी प्रकार किसी से नहीं कहनी चाहिए।
श्लोक 37 (1.139.37)
इतःप्रभृति कौन्तेयं रक्षतान्योन्यमादृताः । एवमुक्त्वा महाबाहुर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
itaḥprabhṛti kaunteyaṃ rakṣatānyonyamādṛtāḥ | evamuktvā mahābāhurdharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
अब से कुन्तीपुत्र की चौकसी रखो और सावधान होकर एक-दूसरे की रक्षा करो।" ऐसा कहकर महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर
श्लोक 38 (1.139.38)
भ्रातृभिः सहितः सर्वैरप्रमत्तोऽभवत्तदा । यदा त्ववगतास्ते वै पाण्डवास्तस्य कर्म तत् ॥
bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvairapramatto'bhavattadā | yadā tvavagatāste vai pāṇḍavāstasya karma tat
अपने सब भाइयों के साथ तब से सतर्क रहने लगे। पाण्डवों ने यद्यपि उसका वह कुकर्म जान लिया था,
श्लोक 39 (1.139.39)
नत्वेव बहुलं चक्रुः प्रयता मन्त्ररक्षणे । धर्मात्मा विदुरस्तेषां प्रददौ मतिमान्मतिम् ॥
natveva bahulaṃ cakruḥ prayatā mantrarakṣaṇe | dharmātmā vidurasteṣāṃ pradadau matimānmatim
फिर भी उन्होंने उसकी अधिक चर्चा नहीं की और अपनी मन्त्रणा गुप्त रखने में सावधान रहे; बुद्धिमान धर्मात्मा विदुर उन्हें परामर्श देते रहे।
श्लोक 40 (1.139.40)
दुर्योधनोऽपि तं दृष्ट्वा पाण्डवं पुनरागतम् । निश्वसंश्चिन्तयंश्चैवमहन्यहनि तप्यते ॥
duryodhano'pi taṃ dṛṣṭvā pāṇḍavaṃ punarāgatam | niśvasaṃścintayaṃścaivamahanyahani tapyate
दुर्योधन भी पाण्डुपुत्र को फिर लौट आया देखकर लम्बी साँसें लेता और सोचता हुआ दिन-प्रतिदिन संतप्त होता रहा।
श्लोक 41 (1.139.41)
कुमारान्क्रीडमानांस्तान्दृष्ट्वा राजातिदुर्मदान् । गुरुं शिक्षार्थमन्विष्य गौतमं तान्न्यवेदयत् ॥
kumārānkrīḍamānāṃstāndṛṣṭvā rājātidurmadān | guruṃ śikṣārthamanviṣya gautamaṃ tānnyavedayat
राजकुमारों को खेलते और अत्यन्त उद्दण्ड होते देखकर राजा ने उनकी शिक्षा के लिए गुरु की खोज की और उन्हें गौतम (कृप) को सौंप दिया,
श्लोक 42 (1.139.42)
शरस्तम्बे समुद्भूतं वेदशास्त्रार्थपारगम् । राज्ञा निवेदितास्तस्मै ते च सर्वे च निष्ठिताः । अधिजग्मुश्च कुरवो धनुर्वेदं कृपात्तु ते ॥
śarastambe samudbhūtaṃ vedaśāstrārthapāragam | rājñā niveditāstasmai te ca sarve ca niṣṭhitāḥ | adhijagmuśca kuravo dhanurvedaṃ kṛpāttu te
जो सरकण्डों के झुरमुट में उत्पन्न हुए थे और वेदों तथा शास्त्रों के अर्थ में पारंगत थे। राजा द्वारा सौंपे जाने पर वे सब उनके शिष्य बन गए, और कुरुकुमारों ने कृप से धनुर्वेद सीखा।