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आदि पर्व · अध्याय 140

कृप, द्रोण और अश्वत्थामा का जन्म

वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि बाणों के साथ जन्मे ऋषि शरद्वान् गौतम को इन्द्र की भेजी अप्सरा जालवती ने लुभाया; उनका वीर्य सरकण्डों पर गिरकर जुड़वाँ सन्तान बन गया, जिन्हें राजा शान्तनु ने पाया और कृपापूर्वक पाला, इसलिए उनके नाम कृप और कृपी पड़े। कृप धनुर्वेद के आचार्य बनकर कुरु राजकुमारों के गुरु हुए, फिर भीष्म ने उन्हें द्रोण को सौंप दिया। द्रोण के विषय में पूछे जाने पर वैशम्पायन बताते हैं कि अप्सरा घृताची को देखकर स्खलित हुए भरद्वाज के वीर्य से द्रोण कलश में उत्पन्न हुए; उन्होंने आग्नेय अस्त्र पाया, बचपन में राजकुमार द्रुपद के साथ खेले, कृपी से विवाह किया और अश्वत्थामा के पिता बने, जिसका नाम उसकी घोड़े जैसी हिनहिनाहट के कारण आकाशवाणी ने रखा; और वे महेन्द्र पर्वत पर परशुराम के पास गए, जिन्होंने अपना सारा धन पहले ही दान कर देने के कारण उन्हें अपने सब अस्त्र और सम्पूर्ण धनुर्वेद प्रदान किया।

अध्याय 139अध्याय-सूचीअध्याय 141

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (1.140.1)

कृपस्यापि मम ब्रह्मन्संभवं वक्तुमर्हसि । शरस्तम्बात्कथं जज्ञे कथं वाऽस्त्राण्यवाप्तवान् ॥

kṛpasyāpi mama brahmansaṃbhavaṃ vaktumarhasi | śarastambātkathaṃ jajñe kathaṃ vā'strāṇyavāptavān

जनमेजय ने कहा — "हे ब्रह्मन्! मुझे कृप के जन्म का वृत्तान्त भी सुनाइए। वे सरकण्डों के झुरमुट से कैसे उत्पन्न हुए और उन्होंने अस्त्र कैसे प्राप्त किए?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (1.140.2)

महर्षेर्गौतमस्यासीच्छरद्वान्नाम गौतमः । पुत्रः किल महाराज जातः सहशरैर्विभो ॥

maharṣergautamasyāsīccharadvānnāma gautamaḥ | putraḥ kila mahārāja jātaḥ sahaśarairvibho

वैशम्पायन ने कहा — हे महाराज, हे प्रभो! महर्षि गौतम के शरद्वान् नाम के एक पुत्र थे, जो गोत्र से गौतम थे। कहते हैं कि वे बाणों के साथ ही उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 3 (1.140.3)

न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्धिरजायत । यथास्य बुद्धिरभवद्धनुर्वेदे परन्तप ॥

na tasya vedādhyayane tathā buddhirajāyata | yathāsya buddhirabhavaddhanurvede parantapa

हे परन्तप! उनकी बुद्धि वेदों के अध्ययन में वैसी नहीं लगी, जैसी धनुर्वेद में लगी।

श्लोक 4 (1.140.4)

अधिजग्मुर्यथा वेदास्तपसा ब्रह्मचारिणः । तथा स तपसोपेतः सर्वाण्यस्त्राण्यवाप ह ॥

adhijagmuryathā vedāstapasā brahmacāriṇaḥ | tathā sa tapasopetaḥ sarvāṇyastrāṇyavāpa ha

जिस प्रकार ब्रह्मचारी तप के द्वारा वेदों को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार तपस्या से युक्त होकर उन्होंने सब अस्त्र प्राप्त कर लिए।

श्लोक 5 (1.140.5)

धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च । भृशं सन्तापयामास देवराजं स गौतमः ॥

dhanurvedaparatvācca tapasā vipulena ca | bhṛśaṃ santāpayāmāsa devarājaṃ sa gautamaḥ

धनुर्वेद में अपनी निष्ठा और विपुल तपस्या के कारण उन गौतम ने देवराज इन्द्र को बहुत सन्तप्त कर दिया।

श्लोक 6 (1.140.6)

ततो जालवतीं नाम देवकन्यां सुरेश्वरः । प्राहिणोत्तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव ॥

tato jālavatīṃ nāma devakanyāṃ sureśvaraḥ | prāhiṇottapaso vighnaṃ kuru tasyeti kaurava

हे कौरव! तब देवताओं के स्वामी ने जालवती नाम की एक देवकन्या को यह कहकर भेजा कि "जाकर उसकी तपस्या में विघ्न डालो।"

श्लोक 7 (1.140.7)

सा हि गत्वाऽऽश्रमं तस्य रमणीयं शरद्वतः । धनुर्बाणधरं बाला लोभयामास गौतमम् ॥

sā hi gatvā''śramaṃ tasya ramaṇīyaṃ śaradvataḥ | dhanurbāṇadharaṃ bālā lobhayāmāsa gautamam

शरद्वान् के रमणीय आश्रम में जाकर उस युवती ने धनुष-बाण धारण किए हुए गौतम को लुभाया।

श्लोक 8 (1.140.8)

तामेकवसनां दृष्ट्वा गौतमोऽप्सरसं वने । लोकेऽप्रतिमसंस्थानां प्रोत्फुल्लनयनोऽभवत् ॥

tāmekavasanāṃ dṛṣṭvā gautamo'psarasaṃ vane | loke'pratimasaṃsthānāṃ protphullanayano'bhavat

वन में एक ही वस्त्र पहने, संसार में अनुपम रूपवाली उस अप्सरा को देखकर गौतम के नेत्र खुले के खुले रह गए।

श्लोक 9 (1.140.9)

धनुश्च हि शरास्तस्य कराभ्यामपतन्भुवि । वेपथुश्चास्य सहसा शरीरे समजायत ॥

dhanuśca hi śarāstasya karābhyāmapatanbhuvi | vepathuścāsya sahasā śarīre samajāyata

उनके हाथों से धनुष और बाण भूमि पर गिर पड़े और सहसा उनके शरीर में कँपकँपी उत्पन्न हो गई।

श्लोक 10 (1.140.10)

स तु ज्ञानगरीयस्त्वात्तपसश्च समर्थनात् । अवतस्थे महाप्राज्ञो धैर्येण परमेण ह ॥

sa tu jñānagarīyastvāttapasaśca samarthanāt | avatasthe mahāprājño dhairyeṇa parameṇa ha

किन्तु अपने ज्ञान की गरिमा और तपस्या के सामर्थ्य से वे महाज्ञानी मुनि परम धैर्य के साथ स्थिर बने रहे।

श्लोक 11 (1.140.11)

यस्तस्य सहसा राजन्विकारः समदृश्यत । तेन सुस्राव रेतोऽस्य स च तन्नान्वबुध्यत ॥

yastasya sahasā rājanvikāraḥ samadṛśyata | tena susrāva reto'sya sa ca tannānvabudhyata

फिर भी, हे राजन्, उनमें सहसा जो विकार दिखाई दिया था, उससे उनका वीर्य स्खलित हो गया और उन्हें इसका पता भी नहीं चला।

श्लोक 12 (1.140.12)

धनुश्च सशरं त्यक्त्वा तथा कृष्णाजिनानि च । स विहायाश्रमं तं च तां चैवाप्सरसं मुनिः ॥

dhanuśca saśaraṃ tyaktvā tathā kṛṣṇājināni ca | sa vihāyāśramaṃ taṃ ca tāṃ caivāpsarasaṃ muniḥ

धनुष-बाण और काले मृगचर्म छोड़कर वे मुनि उस आश्रम और उस अप्सरा को त्यागकर

श्लोक 13 (1.140.13)

जगाम रेतस्तत्तस्य शरस्तम्बे पपात च । शरस्तम्बे च पतितं द्विधा तदभवन्नृप ॥

jagāma retastattasya śarastambe papāta ca | śarastambe ca patitaṃ dvidhā tadabhavannṛpa

चले गए। उनका वह वीर्य सरकण्डों के झुरमुट पर गिरा, और हे नरेश, सरकण्डों पर गिरकर वह दो भागों में बँट गया।

श्लोक 14 (1.140.14)

तस्याथ मिथुनं जज्ञे गौतमस्य शरद्वतः । महर्षेर्गौतमस्यास्य ह्याश्रमस्य समीपतः । मृगयां चरतो राज्ञः शान्तनोस्तु यदृच्छया ॥

tasyātha mithunaṃ jajñe gautamasya śaradvataḥ | maharṣergautamasyāsya hyāśramasya samīpataḥ | mṛgayāṃ carato rājñaḥ śāntanostu yadṛcchayā

उससे गौतम शरद्वान् के जुड़वाँ सन्तान उत्पन्न हुई, उन महर्षि गौतम के आश्रम के समीप ही। संयोग से राजा शान्तनु उस समय शिकार खेल रहे थे,

श्लोक 15 (1.140.15)

कश्चित्सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत । धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च ॥

kaścitsenācaro'raṇye mithunaṃ tadapaśyata | dhanuśca saśaraṃ dṛṣṭvā tathā kṛṣṇājināni ca

तब उनके एक सैनिक ने वन में उन जुड़वाँ बच्चों को देखा। धनुष-बाण और काले मृगचर्म देखकर

श्लोक 16 (1.140.16)

ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह । स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनुः ॥

jñātvā dvijasya cāpatye dhanurvedāntagasya ha | sa rājñe darśayāmāsa mithunaṃ saśaraṃ dhanuḥ

और उन्हें धनुर्वेद में पारंगत किसी ब्राह्मण की सन्तान जानकर उसने राजा को वे जुड़वाँ बच्चे और बाणों सहित धनुष दिखाया।

श्लोक 17 (1.140.17)

स तदादाय मिथुनं राजा च कृपयान्वितः । आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन् ॥

sa tadādāya mithunaṃ rājā ca kṛpayānvitaḥ | ājagāma gṛhāneva mama putrāviti bruvan

राजा करुणा से भरकर उन जुड़वाँ बच्चों को उठा लाए और "ये मेरी सन्तान हैं" कहते हुए अपने घर लौट आए।

श्लोक 18 (1.140.18)

ततः संवर्धयामास संस्कारैश्चाप्ययोजयत् । प्रातिपेयो नरश्रेष्ठो मिथुनं गौतमस्य तत् ॥

tataḥ saṃvardhayāmāsa saṃskāraiścāpyayojayat | prātipeyo naraśreṣṭho mithunaṃ gautamasya tat

तब प्रतीप के पुत्र नरश्रेष्ठ शान्तनु ने गौतम के उन जुड़वाँ बच्चों का पालन-पोषण किया और उनके संस्कार भी करवाए।

श्लोक 19 (1.140.19)

कृपया यन्मया बालाविमौ संवर्धिताविति । तस्मात्तयोर्नाम चक्रे तदेव स महीपतिः । तस्मात्कृप इति ख्यातः कृपी कन्या च साऽभवत् ॥

kṛpayā yanmayā bālāvimau saṃvardhitāviti | tasmāttayornāma cakre tadeva sa mahīpatiḥ | tasmātkṛpa iti khyātaḥ kṛpī kanyā ca sā'bhavat

"मैंने इन दोनों बालकों को कृपा करके पाला है" — यह सोचकर राजा ने उसी शब्द से उनका नामकरण किया। इसी से बालक कृप नाम से प्रसिद्ध हुआ और कन्या कृपी कहलाई।

श्लोक 20 (1.140.20)

पितापि गौतमस्तत्र तपसा तावविन्दत । आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा ॥

pitāpi gautamastatra tapasā tāvavindata | āgatya tasmai gotrādi sarvamākhyātavāṃstadā

उनके पिता गौतम ने भी तपोबल से उन दोनों का वहाँ होना जान लिया और राजा के पास आकर उन्हें उनके गोत्र आदि सब कुछ बता दिया।

श्लोक 21 (1.140.21)

कृपोऽपि च तदा राजन्धनुर्वेदपरोऽभवत् । चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च ॥

kṛpo'pi ca tadā rājandhanurvedaparo'bhavat | caturvidhaṃ dhanurvedaṃ śāstrāṇi vividhāni ca

हे राजन्! तब कृप भी धनुर्वेद में लग गए। चार प्रकार का धनुर्वेद और विविध शास्त्र —

श्लोक 22 (1.140.22)

निखिलेनास्य तत्सर्वं गुह्यमाख्यातवान्पिता । सोऽचिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गतः ॥

nikhilenāsya tatsarvaṃ guhyamākhyātavānpitā | so'cireṇaiva kālena paramācāryatāṃ gataḥ

यह सब गूढ़ ज्ञान उनके पिता ने उन्हें पूर्ण रूप से बता दिया, और थोड़े ही समय में वे श्रेष्ठ आचार्य बन गए।

श्लोक 23 (1.140.23)

कृपमाहूय गाङ्गेयस्तव शिष्या इति ब्रुवन् । पौत्रान्परिसमाधाय कृपमाराधयत्तदा ॥

kṛpamāhūya gāṅgeyastava śiṣyā iti bruvan | pautrānparisamādhāya kṛpamārādhayattadā

गंगापुत्र भीष्म ने कृप को बुलाकर "ये आपके शिष्य हैं" कहते हुए अपने पौत्रों को उन्हें सौंप दिया और फिर कृप का सत्कार किया।

श्लोक 24 (1.140.24)

ततोऽधिजग्मुः सर्वे ते धनुर्वेदं महारथाः । धृतराष्ट्रात्मजाश्चैव पाण्डवाः सह यादवैः ॥

tato'dhijagmuḥ sarve te dhanurvedaṃ mahārathāḥ | dhṛtarāṣṭrātmajāścaiva pāṇḍavāḥ saha yādavaiḥ

तब उन सभी महारथियों ने उनसे धनुर्वेद सीखा — धृतराष्ट्र के पुत्रों ने, यादवों सहित पाण्डवों ने,

श्लोक 25 (1.140.25)

वृष्णयश्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागताः । कृपमाचार्यमासाद्य परमास्त्रज्ञतां गताः । विशेषार्थी ततो भीष्मः पौत्राणां विनयेप्सया ॥

vṛṣṇayaśca nṛpāścānye nānādeśasamāgatāḥ | kṛpamācāryamāsādya paramāstrajñatāṃ gatāḥ | viśeṣārthī tato bhīṣmaḥ pautrāṇāṃ vinayepsayā

वृष्णियों ने तथा अनेक देशों से आए अन्य राजाओं ने भी। कृप को आचार्य बनाकर वे अस्त्रविद्या में परम निपुण हो गए। तब भीष्म ने अपने पौत्रों की शिक्षा के लिए कुछ और विशेष चाहते हुए

श्लोक 26 (1.140.26)

इष्वस्त्रज्ञान्पर्यपृच्छदाचार्यान्वीर्यसंमतान् । नाल्पधीर्नामहाभागस्तथा नानस्त्रकोविदः ॥

iṣvastrajñānparyapṛcchadācāryānvīryasaṃmatān | nālpadhīrnāmahābhāgastathā nānastrakovidaḥ

पराक्रम के लिए प्रसिद्ध धनुर्विद्या के आचार्यों के विषय में पूछताछ की। "जो अल्पबुद्धि हो, जो महान् न हो, जो अस्त्रविद्या में निपुण न हो,

श्लोक 27 (1.140.27)

नादेवसत्वो विनयेत्कुरूनस्त्रे महाबलान् । इति संचिन्त्य गाङ्गेयस्तदा भरतसत्तमः ॥

nādevasatvo vinayetkurūnastre mahābalān | iti saṃcintya gāṅgeyastadā bharatasattamaḥ

और जिसमें देवताओं जैसा सामर्थ्य न हो, वह महाबली कुरुवंशियों को अस्त्रविद्या नहीं सिखा सकता।" ऐसा विचार करके भरतश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्म ने तब

श्लोक 28 (1.140.28)

द्रोणाय वेदविदुषे भारद्वाजाय धीमते । पाण्डवान्कौरवांश्चैव ददौ शिष्यान्नरर्षभ ॥

droṇāya vedaviduṣe bhāradvājāya dhīmate | pāṇḍavānkauravāṃścaiva dadau śiṣyānnararṣabha

हे नरश्रेष्ठ! वेदवेत्ता, बुद्धिमान, भरद्वाजपुत्र द्रोण को पाण्डवों और कौरवों को शिष्य के रूप में सौंप दिया।

श्लोक 29 (1.140.29)

शास्त्रतः पूजितश्चैव सम्यक्तेन महात्मना । स भीष्मेण महाभागस्तुष्टोऽस्त्रविदुषां वरः ॥

śāstrataḥ pūjitaścaiva samyaktena mahātmanā | sa bhīṣmeṇa mahābhāgastuṣṭo'straviduṣāṃ varaḥ

महात्मा भीष्म द्वारा शास्त्रविधि से भली-भाँति पूजित होकर अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ महाभाग द्रोण सन्तुष्ट हुए।

श्लोक 30 (1.140.30)

प्रतिजग्राह तान्सर्वाञ्शिष्यत्वेन महायशाः । शिक्षयामास च द्रोणो धनुर्वेदमशेषतः ॥

pratijagrāha tānsarvāñśiṣyatvena mahāyaśāḥ | śikṣayāmāsa ca droṇo dhanurvedamaśeṣataḥ

उन महायशस्वी ने उन सबको शिष्य के रूप में स्वीकार किया, और द्रोण ने उन्हें सम्पूर्ण धनुर्वेद की शिक्षा दी।

श्लोक 31 (1.140.31)

तेऽचिरेणैव कालेन सर्वशस्त्रविशारदाः । बभूवुः कौरवा राजन्पाण्डवाश्चामितौजसः ॥

te'cireṇaiva kālena sarvaśastraviśāradāḥ | babhūvuḥ kauravā rājanpāṇḍavāścāmitaujasaḥ

हे राजन्! थोड़े ही समय में कौरव और अपार तेजस्वी पाण्डव सब प्रकार के शस्त्रों में निपुण हो गए।

जनमेजय उवाच

श्लोक 32 (1.140.32)

कथं समभवद्द्रोणः कथं चास्त्राण्यवाप्तवान् । कथं चागात्कुरून्ब्रह्मन्कस्य पुत्रः स वीर्यवान् ॥

kathaṃ samabhavaddroṇaḥ kathaṃ cāstrāṇyavāptavān | kathaṃ cāgātkurūnbrahmankasya putraḥ sa vīryavān

जनमेजय ने कहा — "हे ब्रह्मन्! द्रोण का जन्म कैसे हुआ और उन्होंने अस्त्र कैसे प्राप्त किए? वे कुरुओं के पास कैसे आए और वे पराक्रमी किसके पुत्र थे?

श्लोक 33 (1.140.33)

कथं चास्य सुतो जातः सोऽश्वत्थामाऽस्त्रवित्तमः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण प्रकीर्तय ॥

kathaṃ cāsya suto jātaḥ so'śvatthāmā'stravittamaḥ | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa prakīrtaya

"और उनके पुत्र, अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ अश्वत्थामा का जन्म कैसे हुआ? मैं यह सुनना चाहता हूँ, आप इसे विस्तार से कहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (1.140.34)

गङ्गाद्वारं प्रति महान्बभूव भगवानृषिः । भरद्वाज इति ख्यातः सततं संशितव्रतः ॥

gaṅgādvāraṃ prati mahānbabhūva bhagavānṛṣiḥ | bharadvāja iti khyātaḥ satataṃ saṃśitavrataḥ

वैशम्पायन ने कहा — गंगाद्वार के समीप भरद्वाज नाम से प्रसिद्ध एक महान् भगवान् ऋषि रहते थे, जो सदा कठोर व्रतों का पालन करते थे।

श्लोक 35 (1.140.35)

सोऽभिषेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवागतां सतीम् । महर्षिभिर्भरद्वाजो हविर्धाने चरन्पुरा ॥

so'bhiṣektuṃ gato gaṅgāṃ pūrvamevāgatāṃ satīm | maharṣibhirbharadvājo havirdhāne caranpurā

एक बार पूर्वकाल में महर्षियों के साथ हविर्धान यज्ञ करते हुए भरद्वाज गंगा में स्नान करने गए, जहाँ वह पहले से ही आई हुई थी।

श्लोक 36 (1.140.36)

ददर्शाप्सरसं साक्षाद्घृताचीमाप्लुतामृषिः । रूपयौवनसंपन्नां मददृप्तां मदालसाम् ॥

dadarśāpsarasaṃ sākṣādghṛtācīmāplutāmṛṣiḥ | rūpayauvanasaṃpannāṃ madadṛptāṃ madālasām

वहाँ ऋषि ने साक्षात् अप्सरा घृताची को स्नान करते देखा, जो रूप और यौवन से सम्पन्न, मद से गर्वित और मद से अलसाई हुई थी।

श्लोक 37 (1.140.37)

तस्या वायुर्नदीतीरे वसनं पर्यवर्तत । व्यपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे ततः ॥

tasyā vāyurnadītīre vasanaṃ paryavartata | vyapakṛṣṭāmbarāṃ dṛṣṭvā tāmṛṣiścakame tataḥ

नदी के तट पर वायु ने उसका वस्त्र उड़ाकर हटा दिया। उसका वस्त्र हटा हुआ देखकर ऋषि के मन में उसके प्रति कामना जाग उठी।

श्लोक 38 (1.140.38)

तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः । हृष्टस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे ॥

tatra saṃsaktamanaso bharadvājasya dhīmataḥ | hṛṣṭasya retaścaskanda tadṛṣirdroṇa ādadhe

बुद्धिमान भरद्वाज का मन उसमें आसक्त हो गया, और उत्तेजित होने से उनका वीर्य स्खलित हो गया। ऋषि ने उसे एक द्रोण (यज्ञ के कलश) में रख दिया।

श्लोक 39 (1.140.39)

ततः समभवद्द्रोणः कलशे तस्य धीमतः । अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥

tataḥ samabhavaddroṇaḥ kalaśe tasya dhīmataḥ | adhyagīṣṭa sa vedāṃśca vedāṅgāni ca sarvaśaḥ

उन बुद्धिमान ऋषि के उस कलश से द्रोण उत्पन्न हुए। उन्होंने सम्पूर्ण वेदों और वेदांगों का अध्ययन किया।

श्लोक 40 (1.140.40)

अग्नेरस्त्रमुपादाय यदृषिर्वेद काश्यपः । अध्यगच्छद्भरद्वाजस्तदस्त्रं देवकार्यतः ॥

agnerastramupādāya yadṛṣirveda kāśyapaḥ | adhyagacchadbharadvājastadastraṃ devakāryataḥ

भरद्वाज ने अग्नि से वह आग्नेय अस्त्र ग्रहण किया था, जिसे ऋषि काश्यप जानते थे, और देवताओं के कार्य के लिए उस अस्त्र को सिद्ध किया था।

श्लोक 41 (1.140.41)

अग्निवेश्यं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् । प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥

agniveśyaṃ mahābhāgaṃ bharadvājaḥ pratāpavān | pratyapādayadāgneyamastramastravidāṃ varaḥ

अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, प्रतापी भरद्वाज ने वह आग्नेय अस्त्र महाभाग अग्निवेश्य को प्रदान किया।

श्लोक 42 (1.140.42)

कनिष्ठजातं स मुनिर्भ्राता भ्रातरमन्तिके । अग्निवेश्यस्तथा द्रोणं तदा भरतसत्तम । भारद्वाजं तदाग्नेयं महास्त्रं प्रत्यपादयत् ॥

kaniṣṭhajātaṃ sa munirbhrātā bhrātaramantike | agniveśyastathā droṇaṃ tadā bharatasattama | bhāradvājaṃ tadāgneyaṃ mahāstraṃ pratyapādayat

हे भरतश्रेष्ठ! तब मुनि अग्निवेश्य ने, जैसे बड़ा भाई अपने पास रहनेवाले छोटे भाई को देता है, उसी प्रकार भरद्वाजपुत्र द्रोण को वह महान् आग्नेय अस्त्र प्रदान किया।

श्लोक 43 (1.140.43)

भरद्वाजसखा चासीत्पृषतो नाम पार्थिवः । तस्यापि द्रुपदो नाम तथा समभवत्सुतः ॥

bharadvājasakhā cāsītpṛṣato nāma pārthivaḥ | tasyāpi drupado nāma tathā samabhavatsutaḥ

पृषत नाम के एक राजा भरद्वाज के मित्र थे। उनके भी द्रुपद नाम का एक पुत्र हुआ।

श्लोक 44 (1.140.44)

स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्थिवः । चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः ॥

sa nityamāśramaṃ gatvā droṇena saha pārthivaḥ | cikrīḍādhyayanaṃ caiva cakāra kṣatriyarṣabhaḥ

वह क्षत्रियश्रेष्ठ राजकुमार प्रतिदिन आश्रम में जाकर द्रोण के साथ खेलता और अध्ययन करता था।

श्लोक 45 (1.140.45)

ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदोऽभवत् । पञ्चालेषु महाबाहुरुत्तरेषु नरेश्वरः ॥

tato vyatīte pṛṣate sa rājā drupado'bhavat | pañcāleṣu mahābāhuruttareṣu nareśvaraḥ

पृषत के देहान्त के बाद महाबाहु द्रुपद उत्तर पांचाल देश के राजा हुए।

श्लोक 46 (1.140.46)

भरद्वाजोऽपि भगवानारुरोह दिवं तदा । तत्रैव च वसन्द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः ॥

bharadvājo'pi bhagavānāruroha divaṃ tadā | tatraiva ca vasandroṇastapastepe mahātapāḥ

भगवान् भरद्वाज भी तब स्वर्ग चले गए, और महातपस्वी द्रोण वहीं रहते हुए तपस्या करने लगे।

श्लोक 47 (1.140.47)

वेदवेदाङ्गविद्वान्स तपसा दग्धकिल्बिषः । ततः पितृनियुक्तात्मा पुत्रलोभान्महायशाः ॥

vedavedāṅgavidvānsa tapasā dagdhakilbiṣaḥ | tataḥ pitṛniyuktātmā putralobhānmahāyaśāḥ

वेद और वेदांगों के विद्वान्, तप से पापों को भस्म कर चुके उन महायशस्वी ने तब पितरों की आज्ञा से और पुत्र की कामना से

श्लोक 48 (1.140.48)

शारद्वतीं ततो भार्यां कृपीं द्रोणोऽन्वविन्दत । अग्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रताम् ॥

śāradvatīṃ tato bhāryāṃ kṛpīṃ droṇo'nvavindata | agnihotre ca dharme ca dame ca satataṃ ratām

द्रोण ने शरद्वान् की पुत्री कृपी को पत्नी के रूप में प्राप्त किया, जो सदा अग्निहोत्र, धर्म और इन्द्रियसंयम में लगी रहती थी।

श्लोक 49 (1.140.49)

अलभद्गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च । स जातमात्रो व्यनदद्यथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥

alabhadgautamī putramaśvatthāmānameva ca | sa jātamātro vyanadadyathaivoccaiḥśravā hayaḥ

गौतमी (कृपी) ने अश्वत्थामा नामक पुत्र को जन्म दिया। जन्म लेते ही वह उच्चैःश्रवा घोड़े की भाँति हिनहिनाया।

श्लोक 50 (1.140.50)

तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत् । अश्वस्येवास्य यत्स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् ॥

tacchrutvāntarhitaṃ bhūtamantarikṣasthamabravīt | aśvasyevāsya yatsthāma nadataḥ pradiśo gatam

उसे सुनकर आकाश में स्थित एक अदृश्य प्राणी ने कहा — "घोड़े (अश्व) की भाँति हिनहिनाते इस बालक का स्वर-बल (स्थाम) सब दिशाओं में फैल गया है,

श्लोक 51 (1.140.51)

अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मान्नाम्ना भविष्यति । सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् ॥

aśvatthāmaiva bālo'yaṃ tasmānnāmnā bhaviṣyati | sutena tena suprīto bhāradvājastato'bhavat

इसलिए यह बालक अश्वत्थामा नाम से ही प्रसिद्ध होगा।" उस पुत्र से भरद्वाजपुत्र द्रोण अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 52 (1.140.52)

तत्रैव च वसन्धीमान्धनुर्वेदपरोऽभवत् । स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम् ॥

tatraiva ca vasandhīmāndhanurvedaparo'bhavat | sa śuśrāva mahātmānaṃ jāmadagnyaṃ paraṃtapam

वहीं रहते हुए वे बुद्धिमान द्रोण धनुर्वेद में तत्पर हो गए। तब उन्होंने शत्रुओं को सन्तप्त करनेवाले महात्मा जमदग्निपुत्र परशुराम के विषय में सुना,

श्लोक 53 (1.140.53)

सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन्दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥

sarvajñānavidaṃ vipraṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | brāhmaṇebhyastadā rājanditsantaṃ vasu sarvaśaḥ

जो सब प्रकार के ज्ञान के ज्ञाता ब्राह्मण और समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे, और हे राजन्, जो उस समय अपना सारा धन ब्राह्मणों को दान कर देना चाहते थे।

श्लोक 54 (1.140.54)

स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह । श्रुत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च ॥

sa rāmasya dhanurvedaṃ divyānyastrāṇi caiva ha | śrutvā teṣu manaścakre nītiśāstre tathaiva ca

परशुराम के धनुर्वेद और उनके दिव्य अस्त्रों के विषय में सुनकर द्रोण ने उन्हें प्राप्त करने का निश्चय किया, और इसी प्रकार नीतिशास्त्र को भी।

श्लोक 55 (1.140.55)

ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः । वृतः प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ॥

tataḥ sa vratibhiḥ śiṣyaistapoyuktairmahātapāḥ | vṛtaḥ prāyānmahābāhurmahendraṃ parvatottamam

तब व्रतधारी और तपस्वी शिष्यों से घिरे हुए वे महातपस्वी महाबाहु द्रोण पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र की ओर चल पड़े।

श्लोक 56 (1.140.56)

ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः । क्षत्रघ्नं तममित्रघ्नमपश्यद्भृगुनन्दनम् ॥

tato mahendramāsādya bhāradvājo mahātapāḥ | kṣatraghnaṃ tamamitraghnamapaśyadbhṛgunandanam

महेन्द्र पर्वत पर पहुँचकर उन महातपस्वी भरद्वाजपुत्र ने क्षत्रियों का संहार करनेवाले, शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुराम के दर्शन किए।

श्लोक 57 (1.140.57)

ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम् । आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुले ॥

tato droṇo vṛtaḥ śiṣyairupagamya bhṛgūdvaham | ācakhyāvātmano nāma janma cāṅgirasaḥ kule

तब शिष्यों से घिरे द्रोण ने भृगुश्रेष्ठ के पास जाकर उन्हें अपना नाम और अंगिरा के कुल में अपना जन्म बताया।

श्लोक 58 (1.140.58)

निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् । ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषुं तदा ॥

nivedya śirasā bhūmau pādau caivābhyavādayat | tatastaṃ sarvamutsṛjya vanaṃ jigamiṣuṃ tadā

अपना परिचय देकर उन्होंने भूमि पर सिर रखकर उनके चरणों में प्रणाम किया। तब सब कुछ त्यागकर वन जाने को उद्यत महात्मा जमदग्निपुत्र से

श्लोक 59 (1.140.59)

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् । भरद्वाजात्समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम् ॥

jāmadagnyaṃ mahātmānaṃ bhāradvājo'bravīdidam | bharadvājātsamutpannaṃ tathā tvaṃ māmayonijam

भरद्वाजपुत्र ने यह कहा — "हे द्विजश्रेष्ठ! भरद्वाज से उत्पन्न और गर्भ से जन्म न लेनेवाले

श्लोक 60 (1.140.60)

आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तम । तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः ॥

āgataṃ vittakāmaṃ māṃ viddhi droṇaṃ dvijottama | tamabravīnmahātmā sa sarvakṣatriyamardanaḥ

मुझ द्रोण को आप धन की कामना से आया हुआ जानिए।" तब समस्त क्षत्रियों का मर्दन करनेवाले उन महात्मा ने उनसे कहा —

श्लोक 61 (1.140.61)

स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे । एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद्वचः ॥

svāgataṃ te dvijaśreṣṭha yadicchasi vadasva me | evamuktastu rāmeṇa bhāradvājo'bravīdvacaḥ

"हे द्विजश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। आप क्या चाहते हैं, मुझसे कहिए।" परशुराम के ऐसा कहने पर भरद्वाजपुत्र ने

श्लोक 62 (1.140.62)

रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु । अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत ॥

rāmaṃ praharatāṃ śreṣṭhaṃ ditsantaṃ vividhaṃ vasu | ahaṃ dhanamanantaṃ hi prārthaye vipulavrata

योद्धाओं में श्रेष्ठ और नाना प्रकार का धन दान करने को इच्छुक परशुराम से यह वचन कहा — "हे महाव्रती! मैं अनन्त धन माँगता हूँ।"

राम उवाच

श्लोक 63 (1.140.63)

हिरण्यं मम यच्चान्यद्वसु किंचिदिह स्थितम् । ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत्तपोधन ॥

hiraṇyaṃ mama yaccānyadvasu kiṃcidiha sthitam | brāhmaṇebhyo mayā dattaṃ sarvametattapodhana

परशुराम ने कहा — "हे तपोधन! मेरे पास जो सोना और अन्य धन था, वह सब मैं ब्राह्मणों को दे चुका हूँ।

श्लोक 64 (1.140.64)

तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना । कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ॥

tathaiveyaṃ dharā devī sāgarāntā sapattanā | kaśyapāya mayā dattā kṛtsnā nagaramālinī

"इसी प्रकार समुद्र तक फैली, नगरों और पुरों की माला से सजी यह सम्पूर्ण पृथ्वी देवी भी मैंने कश्यप को दे दी है।

श्लोक 65 (1.140.65)

शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेषितम् । अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च ॥

śarīramātramevādya mamedamavaśeṣitam | astrāṇi ca mahārhāṇi śastrāṇi vividhāni ca

"अब मेरे पास केवल यह शरीर बचा है, और बहुमूल्य दिव्यास्त्र तथा अनेक प्रकार के शस्त्र।

श्लोक 66 (1.140.66)

अस्त्राणि वा शरीरं वा ब्रह्मञ्शस्त्राणि वा पुनः । वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ॥

astrāṇi vā śarīraṃ vā brahmañśastrāṇi vā punaḥ | vṛṇīṣva kiṃ prayacchāmi tubhyaṃ droṇa vadāśu tat

"हे ब्रह्मन्! दिव्यास्त्र, मेरा शरीर अथवा शस्त्र — जो चाहो चुन लो। हे द्रोण, बताओ, मैं तुम्हें क्या दूँ? शीघ्र कहो।"

द्रोण उवाच

श्लोक 67 (1.140.67)

अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव । सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः ॥

astrāṇi me samagrāṇi sasaṃhārāṇi bhārgava | saprayogarahasyāni dātumarhasyaśeṣataḥ

द्रोण ने कहा — "हे भार्गव! आप मुझे अपने समस्त दिव्यास्त्र, उनके उपसंहार की विधि तथा प्रयोग के रहस्यों सहित, पूर्ण रूप से प्रदान करें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 68 (1.140.68)

एतद्वसु वसूनां हि सर्वेषां विप्रसत्तम । तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः । सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः ॥

etadvasu vasūnāṃ hi sarveṣāṃ viprasattama | tathetyuktvā tatastasmai prādādastrāṇi bhārgavaḥ | sarahasyavrataṃ caiva dhanurvedamaśeṣataḥ

"हे विप्रश्रेष्ठ! क्योंकि यही समस्त धनों में श्रेष्ठ धन है।" तब "तथास्तु" कहकर भार्गव परशुराम ने उन्हें अस्त्र प्रदान किए, और रहस्यों तथा व्रतों सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद भी।

श्लोक 69 (1.140.69)

प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः । प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ॥

pratigṛhya tu tatsarvaṃ kṛtāstro dvijasattamaḥ | priyaṃ sakhāyaṃ suprīto jagāma drupadaṃ prati

वह सब ग्रहण करके अस्त्रविद्या में निपुण हुए वे द्विजश्रेष्ठ अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने प्रिय मित्र द्रुपद के पास गए।

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